बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

मिथ्‍याभ्रम

मुझे परंपरागत मान्‍यताएं बहुत पसंद है , क्‍यूंकि उससे सामान्‍य तौर पर कुछ नुकसान नहीं दिखाई पडता तथा ध्‍यान देने पर उसमें अनेक अच्‍छी बातें छुपी महसूस होती हैं। पर कभी कभी समाज में प्रचलित कुछ ऐसे अंधविश्‍वासों को भी शामिल देखती हूं , जिससे किसी का नुकसान हो रहा हो , तो वह मुझे बुरा लगता है। इसी सोंच में मैने एक कहानी ‘मिथ्‍याभ्रम’ लिखी थी  , यह एक सत्‍य घटना पर आधारित है , जो आपको पढवा रही हूं। इसके अलावे मेरी दो कहानियां ‘एक झूठ’और ‘पहला विरोध’साहित्‍य शिल्‍पी में पहले प्रकाशित हो चुकी हैं , जिसे कभी समय निकालकर अवश्‍य पढें। तो लीजिए ‘मिथ्‍याभ्रम’ को पढना शुरू कीजिए ......

‘क्‍या हुआ, ट्रेन क्‍यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए पूछा। ’अरे, तुम सो गयी क्‍या ? देखती नहीं , बोकारो आ गया।‘ बोकारो का नाम सुनते ही वह चौंककर उठी। तीन दिनों तक बैठे बैठे कमर में दर्द सा हो रहा था। कब से इंतजार कर रही थी वह , अपने गांव पहुंचने का , इंतजार करते करते तुरंत ही आंख लग गयी थी। अब मंजिल काफी नजदीक आ गयी थी। उसने अपने कपडे समेटे , मोनू को संभाला और सीट पर एक नजर डालती हुई ट्रेन से उतरने के लिए क्‍यू में खडी हो गयी।

दस वर्षों बाद वह मद्रास से वापस आ रही थी। गांव आने का कोई बहाना इतने दिनों तक नहीं मिल रहा था। गांव का मकान भी इतने दिनों से सूना पडा था। अपने अपने रोजगार के सिलसिले में सब बाहर ही जम गए थे। पर इस बार चाचाजी की जिद ने उन सबके लिए गांव का रास्‍ता खोल ही दिया था। वे अपने लडके की शादी गांव से ही करेंगे। सबके पीछे वह सामानों को लेकर ट्रेन से उतर पडी। एक टैक्‍सी ली और गांव के रास्‍ते पर बढ चली।

टैक्‍सी जितनी ही तेजी से अपने मंजिल की ओर जा रही थी , उतनी ही तेजी से वह अतीत की ओर। मद्रास के महानगरीय जीवन को जीती हुई वह अबतक जिस गांव को लगभग भूल ही चली थी , वह अचानक उसकी आंखों के सामने सजीव हो उठा था। घटनाएं चलचित्र के समान चलती जा रही थी। उछलते कूदते , उधम मचाते उनके कदम .. कभी बाग बगीचे में तो कभी खेल के मैदानों में। अपना लम्‍बा चौडा आंगन भी उन्‍हें धमाचौकडी में मदद ही कर देता था।

खेलने का कोई साधन नहीं , फिर भी खेल में इतनी विविधता। जो मन में आया , वही खेल लिया। खेल के लिए कार्यक्रम बनाने में उसकी बडी भूमिका रहती। वास्‍तविक जीवन में जो भी होते देखती , खेल के स्‍थान पर उतार लेती थी। घर के कुर्सी , बेंच , खाट और चौकी को गाडी बनाकर यात्रा का आनंद लेने का खेल बच्‍चों को खूब भाता था। कोई टिकट बेचता , कोई ड्राइवर बनता , तो कोई यात्री। रूट की तो कोई चिंता ही नहीं थी , उनकी मनमौजी गाडी कहीं से कहीं पहुंच सकती थी।

तब सरकार की ओर से परिवार नियोजन का कार्यक्रम जोरों पर था। भला उनके खेल में यह कैसे शामिल न होता। कुर्सी पर डाक्‍टर , बेंच पर उसके सहायक और खाट चौकी पर लेटे हुए मरीज । चाकू की जगह चम्‍मच , पेट काटा , आपरेशन किया , फटाफट घाव ठीक , एक के बाद एक मरीज का आपरेशन। भले ही अस्‍पताल के डाक्‍टर साहब का लक्ष्‍य पूरा न हुआ हो , पर उन्‍होने तो लक्ष्‍य से अधिक काम कर डाला था।

इसी तरह गांव में एक महायज्ञ का आयोजन हुआ। यज्ञ के कार्यक्रम को एक दिन ही देख लेना उनके लिए काफी था। अपने आंगन में यज्ञ का मंडप तैयार बीच में हवन कुंड और चारो ओर परिक्रमा के लिए जगह । मुहल्‍ले के सारे बच्‍चे हाथ जोडे हवनकुंड की परिक्रमा कर रहे थे और ‘श्रीराम , जयराम , जय जय राम , जय जय विघ्‍न हरण हनुमान’ के जयघोष से आंगन गूंज रहा था। कितना स्‍वस्‍थ माहौल था , बच्‍चे भी खुश रहते थे और अभिभावक भी।

लेकिन इसी क्रम में उसे एक बच्‍चे दीपू की याद अचानक आ गयी। जब सारे बच्‍चे खेल रहे होते , वह एक किनारे खडा उनका मुंह तक रहा होता। ‘दीपू , तुम भी आ जाओ’ उसे बुलाती , तो धीरे धीरे चलकर उनके खेल में शामिल होता। पर दीपू को शामिल करके खेलना शुरू करते ही तुरंत रानी को कुछ याद आ जाता और वह दौडकर घर के एक खास कमरे में जाती। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही होता। दीपू की मम्‍मी उस कमरे में फरही बना रही होती। अपनी कला में पारंगत वह छोटे छोटे चावल को मिट्टी के बरतन में रखे गरम रेत में तल तलकर निकाल रही होती।

उसकी दिलचस्‍पी चावल के फरही में कम होती , इसलिए वह अंदर जाकर चने निकाल लाती। ’काकी, इन चनों को तल दो ना’ वह उनसे आग्रह करती। ’इतनी जल्‍दी तलने से ये कठोर हो जाएंगे और इन्‍हे खाने में तुम्‍हारे दांत टूट जाएंगे, थोडी देर सब्र करो।‘ वह चने में थोडे नमक , हल्‍दी और पानी डालकर उसे भीगने को रख देती। अब भला उसका खेल में मन लग सकता था। हर एक दो मिनट में अंदर आती और फिर निराश होकर बाहर आती , लेकिन कुछ ही देर में उसे सब्र का सोंधा नमकीन फल मिल जाता और चने के भुंजे को सारे बच्‍चे मिलकर खाते। इस तरह शायद ही कभी दीपू को उनके साथ खेलने का मौका मिल पाया हो।

टैक्‍सी अब उसके गांव के काफी करीब आ चुकी थी। रबी के फसल खेतों में लहलहा रहे थे। बहुत कुछ पहले जैसा ही दिखाई पड रहा था। शीघ्र ही गांव का ब्‍लाक , मिड्ल स्‍कूल , बस स्‍टैंड , गांव का बाजार , सब क्रम से आते और देखते ही देखते आंखो से ओझल भी होते जा रहे थे। थोडी ही देर में उसका मुहल्‍ला भी शुरू हो गया था। बडे पापा का मकान , रमेश की दुकान , हरिमंदिर , शिवमंदिर , सबको देखकर खुशी का ठिकाना न था।

पर एक स्‍थान पर अचानक तीनमंजिला इमारत को देखकर उसके तो होश उड गए। यह मकान पहले तो नहीं था। फिर उसे दीपू की याद आ गयी। इसी जगह तो दीपू का छोटा सा दो कमरों का खपरैल घर था , जिसके बाहरवाले छोटे से कमरे को ड्राइंग , डाइनिंग या किचन कुछ भी कहा जा सकता था तथा उसी प्रकार अंदरवाले को बेडरूम , ड्रेसिंग रूम या स्‍टोर। यहां पर इस मकान के बनने का अर्थ यही था कि दीपू के पापा ने अपनी जमीन किसी और को बेच दी , क्‍यूंकि इतनी जल्‍दी उनकी सामर्थ्‍य तीनमंजिला मकान बनाने की नहीं हो सकती थी।

घर पहुंचने से ठीक पहले उसका मन बहुत चिंतित हो गया था। पता नहीं वे लोग अब किस हालत में होंगे । दीपू के पापा तो बेरोजगार थे , उसकी मम्‍मी ही दिनभर भूखी , प्‍यासी , अपने भूख को तीन चार कप चाय पीकर शांत करती हुई लोगों के घरों में फरही बनाती अपने परिवार की गाडी को खींच रही थी। बृहस्‍पतिवार को वे भी बैठ जाती थी , क्‍यूंकि गांव में इस दिन चूल्‍हे पर मिट्टी के बरतन चढाना अशुभ माना जाता है। कहते हैं , ऐसा करने से लक्ष्‍मी घर से दूर हो जाती है , धन संपत्ति की हानि होती है।

 एक दिन बैठ जाना दीपू की मम्‍मी के लिए बडी हानि थी। कुछ दिनों तक उन्‍होने इसे झेला , पर बाद में एक रास्‍ता निकाल लिया। अब वे बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाती मिलती , जो उनके घर से सप्‍ताहभर की बिक्री के लिए काफी होता। ’काकी , तुम अपने घर में बृहस्‍पतिवार को मिट्टी के बर्तन क्‍यू चढाती हो ? ‘ वह अक्‍सर उनसे पूछती। उनके पास जबाब होता ‘ बेटे , मुझे घरवालों के पेट भरने की चिंता है , मेरे पास कौन सी धन संपत्ति है , जिसे बचाने के लिए मुझे नियम का पालन करना पडे’ तब उसका बाल मस्तिष्‍क उनकी इन बातों को समझने में असमर्थ था।

पर अभी उसका वयस्‍क वैज्ञानिक मस्तिष्‍क दुविधा में पड गया था। ’क्‍या जरूरत थी , दीपू के मम्‍मी को बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाने की , लक्ष्‍मी सदा के लिए रूठ गयी , जमीन भी बेचना पड गया , अपनी जमीन बेचने के बाद न जाने वे किस हाल में होंगी , दीपू भी न जाने कहां भटक रहा होगा’ सोंचसोंचकर उसका मन परेशान हो गया था। टैक्‍सी के रूकते ही वे लोग घर के अंदर गए , परसों ही शादी थी , लगभग सारे रिश्‍तेदार आ चुके थे , इसलिए काफी चहल पहल थी। मिलने जुलने और बातचीत के सिलसिले में तीन चार घंटे कैसे व्‍यतीत हो गए , पता भी न चला।

अब थोडी ही देर में रस्‍मों की शुरूआत होने वाली थी। चूंकि घर में रानी ही सबसे बडी लडकी थी , उसे ही गांव के सभी घरों में औरतों को रस्‍म में सम्मिलित होने के लिए न्‍योता दे आने की जबाबदेही मिली। वह दाई के साथ इस काम को करने के लिए निकली। सबों के घर तो जाने पहचाने थे , पर सारे लोगों में से कुछ आसानी से पहचान में आ रहे थे , तो कुछ को पहचानने के लिए उसके दिमाग को खासी मशक्‍कत करनी पड रही थी।

 एक मकान से दूसरे मकान में घूमती हुई वह आखिर उस मकान में पहुच ही गयी , जिसने चार छह घंटे से उसे भ्रम में डाल रखा था। इस मकान के बारे में उसने दाई से पूछा तो वह भाव विभोर होकर कहने लगी ‘अरे , दीपू जैसा होनहार बेटा भगवान सबको दे। उसने व्‍यापार में काफी तरक्‍की की और शोहरत भी कमाया । उसने ही यह मकान बनवाया है। इस बीच पिताजी तो चल बसे , पर अपनी मां का यह काफी ख्‍याल रखता है। अभी तीन चार महीने पूर्व इसका ब्‍याह हुआ है। पत्‍नी भी बहुत अच्‍छे घर से है‘ दाई उसकी प्रशंसा में अपनी धुन में कुछ कुछ बोले जा रही थी और वह आश्‍चर्यचकित उसकी बातों को सुन रही थी। हां , उसके वैज्ञानिक मस्तिष्‍क को चुनौती देनेवाला एक मिथ्‍याभ्रम टूटकर जरूर चकनाचूर हो चुका था।



मिथ्‍याभ्रम

मुझे परंपरागत मान्‍यताएं बहुत पसंद है , क्‍यूंकि उससे सामान्‍य तौर पर कुछ नुकसान नहीं दिखाई पडता तथा ध्‍यान देने पर उसमें अनेक अच्‍छी बातें छुपी महसूस होती हैं। पर कभी कभी समाज में प्रचलित कुछ ऐसे अंधविश्‍वासों को भी शामिल देखती हूं , जिससे किसी का नुकसान हो रहा हो , तो वह मुझे बुरा लगता है। इसी सोंच में मैने एक कहानी ‘मिथ्‍याभ्रम’ लिखी थी  , यह एक सत्‍य घटना पर आधारित है , जो आपको पढवा रही हूं। इसके अलावे मेरी दो कहानियां ‘एक झूठ’और ‘पहला विरोध’साहित्‍य शिल्‍पी में पहले प्रकाशित हो चुकी हैं , जिसे कभी समय निकालकर अवश्‍य पढें। तो लीजिए ‘मिथ्‍याभ्रम’ को पढना शुरू कीजिए ......

‘क्‍या हुआ, ट्रेन क्‍यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए पूछा। ’अरे, तुम सो गयी क्‍या ? देखती नहीं , बोकारो आ गया।‘ बोकारो का नाम सुनते ही वह चौंककर उठी। तीन दिनों तक बैठे बैठे कमर में दर्द सा हो रहा था। कब से इंतजार कर रही थी वह , अपने गांव पहुंचने का , इंतजार करते करते तुरंत ही आंख लग गयी थी। अब मंजिल काफी नजदीक आ गयी थी। उसने अपने कपडे समेटे , मोनू को संभाला और सीट पर एक नजर डालती हुई ट्रेन से उतरने के लिए क्‍यू में खडी हो गयी।

दस वर्षों बाद वह मद्रास से वापस आ रही थी। गांव आने का कोई बहाना इतने दिनों तक नहीं मिल रहा था। गांव का मकान भी इतने दिनों से सूना पडा था। अपने अपने रोजगार के सिलसिले में सब बाहर ही जम गए थे। पर इस बार चाचाजी की जिद ने उन सबके लिए गांव का रास्‍ता खोल ही दिया था। वे अपने लडके की शादी गांव से ही करेंगे। सबके पीछे वह सामानों को लेकर ट्रेन से उतर पडी। एक टैक्‍सी ली और गांव के रास्‍ते पर बढ चली।

टैक्‍सी जितनी ही तेजी से अपने मंजिल की ओर जा रही थी , उतनी ही तेजी से वह अतीत की ओर। मद्रास के महानगरीय जीवन को जीती हुई वह अबतक जिस गांव को लगभग भूल ही चली थी , वह अचानक उसकी आंखों के सामने सजीव हो उठा था। घटनाएं चलचित्र के समान चलती जा रही थी। उछलते कूदते , उधम मचाते उनके कदम .. कभी बाग बगीचे में तो कभी खेल के मैदानों में। अपना लम्‍बा चौडा आंगन भी उन्‍हें धमाचौकडी में मदद ही कर देता था।

खेलने का कोई साधन नहीं , फिर भी खेल में इतनी विविधता। जो मन में आया , वही खेल लिया। खेल के लिए कार्यक्रम बनाने में उसकी बडी भूमिका रहती। वास्‍तविक जीवन में जो भी होते देखती , खेल के स्‍थान पर उतार लेती थी। घर के कुर्सी , बेंच , खाट और चौकी को गाडी बनाकर यात्रा का आनंद लेने का खेल बच्‍चों को खूब भाता था। कोई टिकट बेचता , कोई ड्राइवर बनता , तो कोई यात्री। रूट की तो कोई चिंता ही नहीं थी , उनकी मनमौजी गाडी कहीं से कहीं पहुंच सकती थी।

तब सरकार की ओर से परिवार नियोजन का कार्यक्रम जोरों पर था। भला उनके खेल में यह कैसे शामिल न होता। कुर्सी पर डाक्‍टर , बेंच पर उसके सहायक और खाट चौकी पर लेटे हुए मरीज । चाकू की जगह चम्‍मच , पेट काटा , आपरेशन किया , फटाफट घाव ठीक , एक के बाद एक मरीज का आपरेशन। भले ही अस्‍पताल के डाक्‍टर साहब का लक्ष्‍य पूरा न हुआ हो , पर उन्‍होने तो लक्ष्‍य से अधिक काम कर डाला था।

इसी तरह गांव में एक महायज्ञ का आयोजन हुआ। यज्ञ के कार्यक्रम को एक दिन ही देख लेना उनके लिए काफी था। अपने आंगन में यज्ञ का मंडप तैयार बीच में हवन कुंड और चारो ओर परिक्रमा के लिए जगह । मुहल्‍ले के सारे बच्‍चे हाथ जोडे हवनकुंड की परिक्रमा कर रहे थे और ‘श्रीराम , जयराम , जय जय राम , जय जय विघ्‍न हरण हनुमान’ के जयघोष से आंगन गूंज रहा था। कितना स्‍वस्‍थ माहौल था , बच्‍चे भी खुश रहते थे और अभिभावक भी।

लेकिन इसी क्रम में उसे एक बच्‍चे दीपू की याद अचानक आ गयी। जब सारे बच्‍चे खेल रहे होते , वह एक किनारे खडा उनका मुंह तक रहा होता। ‘दीपू , तुम भी आ जाओ’ उसे बुलाती , तो धीरे धीरे चलकर उनके खेल में शामिल होता। पर दीपू को शामिल करके खेलना शुरू करते ही तुरंत रानी को कुछ याद आ जाता और वह दौडकर घर के एक खास कमरे में जाती। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही होता। दीपू की मम्‍मी उस कमरे में फरही बना रही होती। अपनी कला में पारंगत वह छोटे छोटे चावल को मिट्टी के बरतन में रखे गरम रेत में तल तलकर निकाल रही होती।

उसकी दिलचस्‍पी चावल के फरही में कम होती , इसलिए वह अंदर जाकर चने निकाल लाती। ’काकी, इन चनों को तल दो ना’ वह उनसे आग्रह करती। ’इतनी जल्‍दी तलने से ये कठोर हो जाएंगे और इन्‍हे खाने में तुम्‍हारे दांत टूट जाएंगे, थोडी देर सब्र करो।‘ वह चने में थोडे नमक , हल्‍दी और पानी डालकर उसे भीगने को रख देती। अब भला उसका खेल में मन लग सकता था। हर एक दो मिनट में अंदर आती और फिर निराश होकर बाहर आती , लेकिन कुछ ही देर में उसे सब्र का सोंधा नमकीन फल मिल जाता और चने के भुंजे को सारे बच्‍चे मिलकर खाते। इस तरह शायद ही कभी दीपू को उनके साथ खेलने का मौका मिल पाया हो।

टैक्‍सी अब उसके गांव के काफी करीब आ चुकी थी। रबी के फसल खेतों में लहलहा रहे थे। बहुत कुछ पहले जैसा ही दिखाई पड रहा था। शीघ्र ही गांव का ब्‍लाक , मिड्ल स्‍कूल , बस स्‍टैंड , गांव का बाजार , सब क्रम से आते और देखते ही देखते आंखो से ओझल भी होते जा रहे थे। थोडी ही देर में उसका मुहल्‍ला भी शुरू हो गया था। बडे पापा का मकान , रमेश की दुकान , हरिमंदिर , शिवमंदिर , सबको देखकर खुशी का ठिकाना न था।

पर एक स्‍थान पर अचानक तीनमंजिला इमारत को देखकर उसके तो होश उड गए। यह मकान पहले तो नहीं था। फिर उसे दीपू की याद आ गयी। इसी जगह तो दीपू का छोटा सा दो कमरों का खपरैल घर था , जिसके बाहरवाले छोटे से कमरे को ड्राइंग , डाइनिंग या किचन कुछ भी कहा जा सकता था तथा उसी प्रकार अंदरवाले को बेडरूम , ड्रेसिंग रूम या स्‍टोर। यहां पर इस मकान के बनने का अर्थ यही था कि दीपू के पापा ने अपनी जमीन किसी और को बेच दी , क्‍यूंकि इतनी जल्‍दी उनकी सामर्थ्‍य तीनमंजिला मकान बनाने की नहीं हो सकती थी।

घर पहुंचने से ठीक पहले उसका मन बहुत चिंतित हो गया था। पता नहीं वे लोग अब किस हालत में होंगे । दीपू के पापा तो बेरोजगार थे , उसकी मम्‍मी ही दिनभर भूखी , प्‍यासी , अपने भूख को तीन चार कप चाय पीकर शांत करती हुई लोगों के घरों में फरही बनाती अपने परिवार की गाडी को खींच रही थी। बृहस्‍पतिवार को वे भी बैठ जाती थी , क्‍यूंकि गांव में इस दिन चूल्‍हे पर मिट्टी के बरतन चढाना अशुभ माना जाता है। कहते हैं , ऐसा करने से लक्ष्‍मी घर से दूर हो जाती है , धन संपत्ति की हानि होती है।

 एक दिन बैठ जाना दीपू की मम्‍मी के लिए बडी हानि थी। कुछ दिनों तक उन्‍होने इसे झेला , पर बाद में एक रास्‍ता निकाल लिया। अब वे बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाती मिलती , जो उनके घर से सप्‍ताहभर की बिक्री के लिए काफी होता। ’काकी , तुम अपने घर में बृहस्‍पतिवार को मिट्टी के बर्तन क्‍यू चढाती हो ? ‘ वह अक्‍सर उनसे पूछती। उनके पास जबाब होता ‘ बेटे , मुझे घरवालों के पेट भरने की चिंता है , मेरे पास कौन सी धन संपत्ति है , जिसे बचाने के लिए मुझे नियम का पालन करना पडे’ तब उसका बाल मस्तिष्‍क उनकी इन बातों को समझने में असमर्थ था।

पर अभी उसका वयस्‍क वैज्ञानिक मस्तिष्‍क दुविधा में पड गया था। ’क्‍या जरूरत थी , दीपू के मम्‍मी को बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाने की , लक्ष्‍मी सदा के लिए रूठ गयी , जमीन भी बेचना पड गया , अपनी जमीन बेचने के बाद न जाने वे किस हाल में होंगी , दीपू भी न जाने कहां भटक रहा होगा’ सोंचसोंचकर उसका मन परेशान हो गया था। टैक्‍सी के रूकते ही वे लोग घर के अंदर गए , परसों ही शादी थी , लगभग सारे रिश्‍तेदार आ चुके थे , इसलिए काफी चहल पहल थी। मिलने जुलने और बातचीत के सिलसिले में तीन चार घंटे कैसे व्‍यतीत हो गए , पता भी न चला।

अब थोडी ही देर में रस्‍मों की शुरूआत होने वाली थी। चूंकि घर में रानी ही सबसे बडी लडकी थी , उसे ही गांव के सभी घरों में औरतों को रस्‍म में सम्मिलित होने के लिए न्‍योता दे आने की जबाबदेही मिली। वह दाई के साथ इस काम को करने के लिए निकली। सबों के घर तो जाने पहचाने थे , पर सारे लोगों में से कुछ आसानी से पहचान में आ रहे थे , तो कुछ को पहचानने के लिए उसके दिमाग को खासी मशक्‍कत करनी पड रही थी।

 एक मकान से दूसरे मकान में घूमती हुई वह आखिर उस मकान में पहुच ही गयी , जिसने चार छह घंटे से उसे भ्रम में डाल रखा था। इस मकान के बारे में उसने दाई से पूछा तो वह भाव विभोर होकर कहने लगी ‘अरे , दीपू जैसा होनहार बेटा भगवान सबको दे। उसने व्‍यापार में काफी तरक्‍की की और शोहरत भी कमाया । उसने ही यह मकान बनवाया है। इस बीच पिताजी तो चल बसे , पर अपनी मां का यह काफी ख्‍याल रखता है। अभी तीन चार महीने पूर्व इसका ब्‍याह हुआ है। पत्‍नी भी बहुत अच्‍छे घर से है‘ दाई उसकी प्रशंसा में अपनी धुन में कुछ कुछ बोले जा रही थी और वह आश्‍चर्यचकित उसकी बातों को सुन रही थी। हां , उसके वैज्ञानिक मस्तिष्‍क को चुनौती देनेवाला एक मिथ्‍याभ्रम टूटकर जरूर चकनाचूर हो चुका था।




मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

औरतों पर ही नहीं , हमने तो मर्द पर भी भूत आते देखा है ??

लगातार कई पोस्‍टों में भूत प्रेत की चर्चा सुनकर मुझे भी एक घटना याद आ गयी , जो मैं आपलोगों को सुना ही दूं। 1975 के आसपास की बात है , घर के बगल के सब्‍जी के खेत में मेरे पापाजी कई मजदूरों से काम करवा रहे थे। मुहल्‍ले के ही सारे मजदूर थे , इसलिए वे खाना खाने अपने अपने घर चले जाते थे। ठीक 1 बजे उनको खाने की छुट्टी देकर पापाजी भी खाना खाने घर आए। खेत की सब्जियां जानवर न खा लें, यह सोंचकर मेरे पापाजी को घर में देखकर थोडी ही देर में दादी जी उस खेत का दरवाजा बंद कर आ गयी।

अभी पापाजी खाना खा ही रहे थे कि घर के किसी बच्‍चे ने देखा कि एक मजदूर उसी बगीचे के पुआल के ढेर पर बंदर की तरह उपर चढता जा रहा है। उसके हल्‍ला मचाने के बावजूद वह उपर चढता गया और उपर चढकर डांस करने लगा। हमलोग सारे बच्‍चे जमा होकर तमाशा देखने लगे। हमलोगों का हल्‍ला सुनकर पापाजी खाना छोडकर आंगन मे आए। उससे डांटकर उतरने को कहा तो वह उतरकर आम के पेड पर बिल्‍कुल पतली टहनी पर चढ गया। आंय बांय क्‍या क्‍या बकने लगा। कभी इस पेड पर तो कभी उसपर , फिर पापाजी के डांटने पर उतरकर बगीचे के दीवार पर दौडने लगा।

उसकी शरारतें देखकर सबका डर से बुरा हाल था , पता नहीं , सांप बिच्‍छू ने काट लिया या भूत प्रेत का चक्‍कर है या फिर इसका दिमाग किसी और वजह से खराब हो गया है। अभी कुछ ही दिन पहले एक मजदूर हमारा काम करते हुए पेड से गिर पडा था , एक्‍सरे में उसकी हाथ की हड्डियां टूटी दिखी थी और हमारे यहां से उसका इलाज किया ही जा रहा था और ये दूसरी मुसीबत आ गयी थी। मेरी दादी जी परेशान ईश्‍वर से प्रार्थना कर रही थी कि हमारे घर में ही सारे मजदूरों को क्‍या हो जाता है , उनकी रक्षा करें और वह बेहूदी हरकतें करता जा रहा था।

10 - 15 मिनट तक डांट का कोई असर न होते देख मेरे पापाजी ने उसे प्‍यार से बुलाया। थोडी देर में वह सामने आया। पापाजी प्‍यार से उससे पूछने लगे कि तुम्‍हें क्‍या हुआ , किसी कीडे मकोडे ने काटा या कुछ और बात हुई। उसने शांत होकर कहा ‘पता नहीं मुझे क्‍या हो गया है , चाची से पूछिए न , मैने बगीचे के कितने बैगन भी तोड डाले’ , पापाजी चौंके ‘चाची से पूछिए न , बगीचे के बैगन’ , हमलोगों को बगीचे में भेजा , सचमुच बहुत से बैगन टूटे पडे थे। पापाजी को राज समझ में आ गया , उसे बैठाकर पानी पिलाया , खाना खिलाया और उसे दिनभर की छुट्टी दे दी और उसकी पत्‍नी को बुलाकर उसके साथ आराम करने को घर भेज दिया। पापाजी ने दादी जी से बैगन के बारे में पूछा तो उन्‍होने बताया कि उन्‍हे कुछ भी नहीं मालूम।

दरअसल मजदूरों को जब छुट्टी दी गयी थी , तो सारे चले गए , पर इसकी नजर बगीचे के बैगन पर थी , इसलिए यह उसी बगीचे के कुएं पर पानी पीने के बहाने रूक गया। घर ले जाने के लिए वह बैगन तोडने लगा , उसी समय दादी जी दरवाजा बंद करने गयी । उन्‍हें मोतियाबिंद के कारण धुंधला दिखाई देता था , वो मजदूर को नहीं देख पायीं , पर मजदूर ने सोंचा कि दादी जी ने बैगन तोडते उसे देख लिया है , इसलिए उसने चोरी के इल्‍जाम से बचने के लिए नाटक करना शुरू किया। माजरा समझ में आने पर हमारा तो हंसते हंसते बुरा हाल था। सचमुच यही बात थी , क्‍यूंकि दूसरे दिन वह बिल्‍कुल सामान्‍य तौर पर मजदूरी करने आ गया था।


औरतों पर ही नहीं , हमने तो मर्द पर भी भूत आते देखा है ??

लगातार कई पोस्‍टों में भूत प्रेत की चर्चा सुनकर मुझे भी एक घटना याद आ गयी , जो मैं आपलोगों को सुना ही दूं। 1975 के आसपास की बात है , घर के बगल के सब्‍जी के खेत में मेरे पापाजी कई मजदूरों से काम करवा रहे थे। मुहल्‍ले के ही सारे मजदूर थे , इसलिए वे खाना खाने अपने अपने घर चले जाते थे। ठीक 1 बजे उनको खाने की छुट्टी देकर पापाजी भी खाना खाने घर आए। खेत की सब्जियां जानवर न खा लें, यह सोंचकर मेरे पापाजी को घर में देखकर थोडी ही देर में दादी जी उस खेत का दरवाजा बंद कर आ गयी।

अभी पापाजी खाना खा ही रहे थे कि घर के किसी बच्‍चे ने देखा कि एक मजदूर उसी बगीचे के पुआल के ढेर पर बंदर की तरह उपर चढता जा रहा है। उसके हल्‍ला मचाने के बावजूद वह उपर चढता गया और उपर चढकर डांस करने लगा। हमलोग सारे बच्‍चे जमा होकर तमाशा देखने लगे। हमलोगों का हल्‍ला सुनकर पापाजी खाना छोडकर आंगन मे आए। उससे डांटकर उतरने को कहा तो वह उतरकर आम के पेड पर बिल्‍कुल पतली टहनी पर चढ गया। आंय बांय क्‍या क्‍या बकने लगा। कभी इस पेड पर तो कभी उसपर , फिर पापाजी के डांटने पर उतरकर बगीचे के दीवार पर दौडने लगा।

उसकी शरारतें देखकर सबका डर से बुरा हाल था , पता नहीं , सांप बिच्‍छू ने काट लिया या भूत प्रेत का चक्‍कर है या फिर इसका दिमाग किसी और वजह से खराब हो गया है। अभी कुछ ही दिन पहले एक मजदूर हमारा काम करते हुए पेड से गिर पडा था , एक्‍सरे में उसकी हाथ की हड्डियां टूटी दिखी थी और हमारे यहां से उसका इलाज किया ही जा रहा था और ये दूसरी मुसीबत आ गयी थी। मेरी दादी जी परेशान ईश्‍वर से प्रार्थना कर रही थी कि हमारे घर में ही सारे मजदूरों को क्‍या हो जाता है , उनकी रक्षा करें और वह बेहूदी हरकतें करता जा रहा था।

10 - 15 मिनट तक डांट का कोई असर न होते देख मेरे पापाजी ने उसे प्‍यार से बुलाया। थोडी देर में वह सामने आया। पापाजी प्‍यार से उससे पूछने लगे कि तुम्‍हें क्‍या हुआ , किसी कीडे मकोडे ने काटा या कुछ और बात हुई। उसने शांत होकर कहा ‘पता नहीं मुझे क्‍या हो गया है , चाची से पूछिए न , मैने बगीचे के कितने बैगन भी तोड डाले’ , पापाजी चौंके ‘चाची से पूछिए न , बगीचे के बैगन’ , हमलोगों को बगीचे में भेजा , सचमुच बहुत से बैगन टूटे पडे थे। पापाजी को राज समझ में आ गया , उसे बैठाकर पानी पिलाया , खाना खिलाया और उसे दिनभर की छुट्टी दे दी और उसकी पत्‍नी को बुलाकर उसके साथ आराम करने को घर भेज दिया। पापाजी ने दादी जी से बैगन के बारे में पूछा तो उन्‍होने बताया कि उन्‍हे कुछ भी नहीं मालूम।

दरअसल मजदूरों को जब छुट्टी दी गयी थी , तो सारे चले गए , पर इसकी नजर बगीचे के बैगन पर थी , इसलिए यह उसी बगीचे के कुएं पर पानी पीने के बहाने रूक गया। घर ले जाने के लिए वह बैगन तोडने लगा , उसी समय दादी जी दरवाजा बंद करने गयी । उन्‍हें मोतियाबिंद के कारण धुंधला दिखाई देता था , वो मजदूर को नहीं देख पायीं , पर मजदूर ने सोंचा कि दादी जी ने बैगन तोडते उसे देख लिया है , इसलिए उसने चोरी के इल्‍जाम से बचने के लिए नाटक करना शुरू किया। माजरा समझ में आने पर हमारा तो हंसते हंसते बुरा हाल था। सचमुच यही बात थी , क्‍यूंकि दूसरे दिन वह बिल्‍कुल सामान्‍य तौर पर मजदूरी करने आ गया था।


सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

ठीक 21-22-23-24 अगस्‍त से आप किसी खास बात को लेकर खुश या परेशान हैं ??

इसी वर्ष 21 अगस्‍त को मैने एक आलेखपोस्‍ट किया था , जिसमें लिखा था कि


“इसी वर्ष इसी महीने की 22 , 23 और 24 तारीख को आसमान में ग्रहों की एक खास खगोलीय स्थिति बनेगी , जिस नजारे को देखा तो नहीं जा सकता, पर व्‍यक्तिगत , सामाजिक और राष्‍ट्रीय तौर पर इसका ज्‍योतिषीय प्रभाव अवश्‍य महसूस किया जा सकता है।“



“यहां से यानि 22-23-24 अगस्‍त इस कार्यक्रम, सुख या कष्‍ट की जो शुरूआत होगी , वो कमाधिक होते हुए 7 अक्‍तूबर 2009 के बाद ही निश्चिंति दे सकेगी। इस मध्‍य 7 सितम्‍बर से 30 सितम्‍बर तक , खासकर 20 सितम्‍बर के आसपास का समय थोडी अधिक अनिश्चितता का हो सकता है।“



“किसी भी वर्ष अप्रैल में जन्‍मलेनेवालों पर इस ग्रह स्थिति का अच्‍छा ही प्रभाव देखा जा सकता है , पर 1945 , 1951 , 1958 , 1964 , 1971 , 1978 , 1984 , 1991 , 1997 के वर्ष में जिनलोगों ने अप्रैल में जन्‍म लिया हो , उनके लिए यह ग्रहयोग खासा अच्‍छा रहेगा। यहां तक कि इन वर्षों के आसपास के वर्षों यानि 1944 , 1946 , 1950 , 1952 , 1957 , 1959 , 1963 , 1965 , 1970 , 1972 , 1977 , 1979 , 1983 , 1985 , 1990 , 1992 , 1996 , 1998 में भी अप्रैल में जन्‍म लेने वालों पर कुछ अच्‍छा प्रभाव पड सकता है। यही नहीं , 1945 , 1951 , 1958 , 1964 , 1971 , 1978 , 1984 , 1991 , 1997 में अप्रैल के आसपास यानि मार्च और मई में जन्‍म लेनेवाले भी इसके अच्‍छे प्रभाव में आ सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त मेष राशिवालों पर भी इस खास ग्रह स्थिति का अच्‍छा प्रभाव पड सकता है।”



“इसके विपरीत , किसी भी वर्ष फरवरी में जन्‍म लेनेवालों पर इसका कुछ बुरा प्रभाव देखा जा सकता है , पर 1942 , 1948 , 1955 , 1962 , 1968 , 1975 , 1981 , 1988 , 1994 के वर्ष में जिन लोगों ने फरवरी में जन्‍म लिया हो उनके लिए यह ग्रह योग खासा बुरा होगा । यहां तक कि इन वर्षों के आसपास के वर्षों यानि 1941 , 1943 , 1947 , 1949 , 1954 , 1956 , 1961 , 1963 , 1967 , 1969 , 1974 , 1976 , 1980 , 1982 , 1987 , 1989 , 1993 , 1995 में भी फरवरी में जन्‍म लेनेवालों पर कुछ बुरा प्रभाव पड सकता है । यही नहीं , 1942 , 1948 , 1955 , 1962 , 1968 , 1975 , 1981 , 1988 , 1994 में फरवरी के आस पास यानि जनवरी और मार्च में जन्‍म लेनेवाले भी इसके बुरे प्रभाव में आ सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त , कुंभ राशिवालों पर भी इस खास ग्रह स्थिति का बुरा प्रभाव देखा जा सकता है।“



आज पुन: इसकी याद दिलाने का अर्थ यह है कि इस ग्रह का प्रभावी समय अब जानेवाला है। यदि इसके कारण आप कुछ अच्‍छा महसूस कर रहे हों , तो 1 से 6 अक्‍तूबर तक कोई निर्णय आपके पक्ष में हो सकता है। पर यदि इसके विपरीत आप कुछ बुरा झेल रहे हों , तो यह समस्‍या भी 6 अक्‍तूबर तक भले ही बढा हुआ दिखाई पडे , पर यह समाप्‍त ही होनेवाली है। इसके अतिरिक्‍त सामाजिक, राजनीतिक , प्रादेशिक , राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की भी समस्‍याएं , जो 21 अगस्‍त से ही खास शुरू हुई हों , उनका खात्‍मा 1 से 6 अक्‍तूबर के मध्‍य हो जाना चाहिए। इसी ग्रहगति से मैने बारिशको भी जोडा था और अभी कई प्रदेशों में बरिश सचमुच कहर ढा रही है। 9 अक्‍तूबर के बाद बारिश स्‍वयं कम होनी शुरू होगी और लोगों को राहत मिल जाएगी।

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

... और इस तरह मेरे द्वारा रची गयी गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता भी नष्‍ट हो गयी !!

पिछले दो कडी में मैने भृगुसंहिता के बारे में कुछ जानकारियां दी थी , पर दूसरे सामयिक मुद्दों में व्‍यस्‍तता बन जाने से उसकी आगे की कडी में रूकावट आ गयी थी। जहां पहली कडी में मैने इस कालजयी रचना के आधारको बताया था , वहीं दूसरी कडी में मैने अपने पिताजी के द्वारा लिखी जा रही गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता के अधूरे ही रह जाने कीजानकारी दी थी। अपनी जबाबदेही के समाप्‍त होने के बावजूद प्रकाशकों के किसी प्रकार की दिलचस्‍पी न लेने से मेरे पिताजी गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता का आधा भाग लिखने के बाद उसे और आगे न बढा सके तथा उनके द्वारा लिखा गया गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता का आधा भाग मेरे पास ज्‍यों का त्‍यों सुरक्षित रहा। उनके अधूरे सपने को पूरा करने की दृढ इच्‍छा होने के कारण इस गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता को भी पूरा करने की लालसा मेरे भीतर उमडती तो अवश्‍य थी , पर मुझमें इतनी योग्‍यता भी नहीं थी कि उनकी भाषा से सामंजस्‍य बनाकर इसका आधा भाग लिख सकूं और  पिताजी आगे बढने को तैयार ही नहीं थे, इस कारण मैं मायूस थी।

पर जीवन में नित्‍य नए नए प्रयोग करते रहने के शौक ने मुझे शांत बैठने नहीं दिया और मैने ’गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सूत्रों को कंप्‍यूटर में डालकर उसके द्वारा किसी व्‍यक्ति के जीवन के उतार चढाव और अन्‍य प्रकार के सुख दुख से संबंधित ग्राफों को प्राप्‍त करने के लिए 2002 में कंप्‍यूटर इंस्‍टीच्‍यूट में दाखिला ले लिया। 2003 में मैने एम एस आफिस सीखने के क्रम में ही ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सूत्रों पर आधारित मैने पहला प्रोग्राम एम एस एक्‍सेल की शीट पर बनाया , जिसमें जन्‍मविवरण डालने के बाद कुछ मेहनत भी करनी पडती थी , पर वह हमारे सिद्धांतों के अनुरूप ही हर प्रकार के ग्राफ देने में सफल था। पर मुख्‍य मुद्दा तो उसके लिए भविष्‍यवाणियां दे पाना था , जिसके लिए एक्‍सेल ही पर्याप्‍त नहीं था।


जब मै एम एस वर्ड के 'मेल मर्ज' प्रोग्राम को समझने में समर्थ हुई , भृगुसंहिता तैयार करने के लिए एक शार्टकट रास्‍ता नजर आ ही गया। पिताजी के द्वारा छह लग्‍न तक के तैयार किए गए वाक्‍यों को चुन चुनकर 'मेल मर्ज' का उपयोग करके बारहों लग्‍न तक की भविष्‍यवाणियां तैयार की जा सकती थी। पर भले ही यह शार्टकट था , पर इसमें भी कम मेहनत नहीं लगनी थी , क्‍यूंकि जहां भृगुसंहिता के ओरिजिनल में 1296 प्रकार के फलादेश और पिताजी के लिखे गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता में 2016 अनुच्‍छेद होते , वहीं मेरे द्वारा कंप्‍यूटर में तैयार होनेवाले इस गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता में 40,320 अनुच्‍छेद या इसे पृष्‍ठ ही कहें , क्‍यूंकि तबतक ग्रहों की अन्‍य कई प्रकार की शक्तियों की खोज की जा चुकी थी। पिताजी के लिखे भाग से मुख्‍य वाक्‍यों को श्रेणी बनाकर अलग करना , उसे एम एस एक्‍सेल में ग्रहों की शक्ति के आधार पर 40 तरह के शीट बनाकर 12 ग्रहों * 12 राशियों = 144 सेल तक लिखना , फिर सभी ग्रहों की 7 ग्रहों के बारे में अगले पन्‍नों पर भिन्‍न भिन्‍न बातों को लिखकर उससे उन 144 शीटों का मेल मर्ज करना आसान तो नहीं था, मुझे इसमें एक वर्ष से उपर ही लगे। पर इससे 12 * 12 * 7 * 40 = 40,320 पन्‍नों की एक भृगुसंहिता तैयार हो गयी , अपने सपने को पूरा हुआ देखकर मुझे खुशी तो बहुत हुई , पर इसे पढने पर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इसे बनाने में मुझे थोडा समय और देना चाहिए था।

खुद की लिखी भाषा और कंप्‍यूटर के द्वारा तैयार की जानेवाली भाषा में कुछ तो अंतर होता ही है , भविष्‍यवाणियां बहुत स्‍वाभाविक ढंग से लिखी गयी नहीं लग रही थी , पर प्रयोग के समय एक एक अनुच्‍छेद को एडिट करते हुए इसे सामान्‍य बनाना कठिन भी नहीं था। कुछ दिनों तक एडिट कर और प्रिंट निकालकर मैने इसकी भविष्‍यवाणियां लोगों को वितरित भी की , खासकर भविष्‍यवाणियों का उम्र के साथ तालमेल काफी अच्‍छा था , जो इसे लोकप्रिय बनाने के लिए काफी था। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार एक्‍सेल प्रोग्राम में किसी व्‍यक्ति का जीवन ग्राफ जो भी दर्शाता था , उसे यह प्रोग्राम शब्‍दों में बखूबी अभिव्‍यक्‍त कर देता था। यह प्रोग्राम अंदर किसी फोल्‍डर में पडा था , बार बार प्रयोग के क्रम में दिक्‍कत होने से मैने डेस्‍कटाप पर ही इसका शार्टकट बना लिया था। पहली बार कंप्‍यूटर को फारमैट करने की नौबत आयी , सारे फाइलों को सीडी में राइट करके रखा गया , पर अनुभवहीनता के कारण इस प्रोग्राम को कापी करने की जगह इसकेशार्टकट को ही कापी कर लिया गया और कंप्‍यूटर फारमैट हो गया और इसके साथ ही सारी मेहनत फिर से बेकार। पर 40 शीटों के एक्‍सेल के उस फाइल का सीडी में बच जाना बहुत राहत देनेवाला था, क्‍यूंकि उसके सहारे कभी भी नई गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता तैयार की जा सकती थी। लेकिन अधिक तैयारी करने में अधिक देर हो जाती है , इस बात के चार वर्ष होने जा रहे हैं, पर अभी तक उसपर काम करना संभव न हो सका। अगली कडी में इस बात की चर्चा करूंगी कि गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता के निर्माण के लिए मेरा अगला कदम क्‍या होगा ??


शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

गाय को पहली रोटी खिलाने का रहस्‍य पता है आपको ??

मैं रसोई में साफ सफाई का कुछ अधिक ही ध्‍यान रखती हूं। धोए हुए बर्तन का प्रयोग करते वक्‍त भी उसे फिर से धोना मेरी आदत में शुमार है । वास्‍तव में परिवार के सभी जनों के अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए मैं ऐसा किया करती हूं। प्रयोग करते वक्‍त कुछ बरतन गीले हों तो कुछ दिक्‍कत आती है , उसे मैं धोकर सूखने छोड दिया करती हूं। रोटी बेलने के लिए चकले और बेलन को थोडी देर पहले धोकर सूखने को रख देती हूं , ताकि रोटी बनाते समय वह सूखा मिले।


कुछ दिन पहले गांव से एक दूर के रिश्‍तेदार अपनी पत्‍नी को डाक्‍टर को दिखाने मेरे यहां पहुंचे। तबियत खराब होने और हमारे मना करने के बावजूद उनकी पत्‍नी रसोई में काम करने को पहुंच जाती। उसके काम करने का तरीका मुझे हायजनिक नहीं लगता , इसलिए उसे मना करती। पर उसको बुरा न लगे , यह सोंचकर एक दो कामों में मैं उसे शामिल कर ले रही थी। पर मेरा पूरा ध्‍यान उसके काम करने के तरीके पर ही रहता था।

एक दिन शाम को मैं थोडी देर के लिए बाहर गयी तो उसने आटा गूंधकर फुल्‍के बनानी शुरू कर दी। मैंने आकर देखा तो परेशान। धोकर और पलटकर रखे हुए बर्तन में आटा गूंधा जाना मुझे उतना परेशान नहीं कर रहा था , जितना उस बिना धोए हुए चकले और बेलन में उसे बेला जाना। अब उन फुल्‍कों को न तो फेका ही जा सकता था और न परोसा । पर शीघ्र ही मेरे दिमाग में एक विचार आया , चकले और बेलन की गंदगी तो एक या दो रोटी में ही बेलकर निकल गए होंगे। उसके बाद की रोटियां तो अवश्‍य कीटाणुओं से सुरक्षित होंगी , फिर क्‍यूं न पहले बनी दो रोटियों को फेक दिया जाए।

मैं सोंच ही रही थी कि किस बहाने से पहली दो रोटियों को मांगकर फेका जाए , तभी उसने नीचे से दो रोटियां निकालकर दी और कहा कि ये पहली रोटियां है और उसने इसे गाय के लिए रखा है। मेरी समस्‍या समाप्‍त हो गयी । मैने उन दोनो रोटियों को लिया और गाय को खिलाने चली गयी। इतने दिनों से गाय को पहली रोटी खिलाने का रहस्‍य मेरे सामने उस दिन उजागर हुआ।


गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

परंपरागत ज्ञान-विज्ञान के अनुसार शरीर में जीव तत्‍व की उपस्थिति

परंपरागत ज्ञान-विज्ञान पुराने युग के जीवन पद्धति के अनुकूल था, इसलिए आज की जीवनपद्धति के अनुसार देखा जाए , तो इसमें कुछ कमियां अवश्‍य दिखाई पडती हैं, पर इसके बावजूद यह मुझे बहुत आकर्षित करता है और शायद यही कारण है कि न सिर्फ इसकी वैज्ञानिक व्‍याख्‍या सुननी ही मुझे अच्‍छी लगती है , मैं स्‍वयं छोटी मोटी हर परंपरा तक की वैज्ञानिक व्‍याख्‍या में दिलचस्‍पी रखती हूं। 2004 में राष्‍ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला , दिल्‍ली में परंपरागत ज्ञान विज्ञान के एक सेमिनार में इस प्रकार के कई शोध प्रस्‍तुत किए गए थे , जिसमें से रानी दुर्गावती विश्‍व विद्यालय , जबलपुर के पूर्व कुलपति डा सुरेश्‍वर शर्मा द्वारा प्रस्‍तुत किए गए एक शोघपत्र ने मुझे आश्‍चर्यित कर दिया था , जो आपलोगों के लिए प्रस्‍तुत कर रही हूं ....


महामहोपाध्‍याय पं गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी ने अपने ग्रंथ ‘वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्‍कृति’ में एक प्राचीन श्‍लोक का उद्धरण दिया है , जिसमें जीव तत्‍व की उपस्थिति के आकार को बताया है ...
 
बालाग्र शतभागस्‍य शतधा कल्पितस्‍य च ।
तस्‍य भागस्‍य भागम् ऐषा जीवस्‍थ कल्‍पना ।।
 
एक जीवन से दूसरे जीवन की निरंतरता विज्ञान की भाषा में जीवन तत्‍व अथवा ‘जीन’ के नाम से और उसके द्वारा जानी जाती है। इसके आकार माप का जो वर्णन इस श्‍लोक में बताया गया है , वह अद्भुत और आश्‍चर्यजनक रूप से ठीक वही है , जो आधुनिक विज्ञान ने जीन अथवा आनुवंशिकी कारक अर्थात डी एन ए के अणु को मापा है। यह माप 10 नैनो मीटर है। मनुष्‍य के बाल की मोटाई 100 माइक्रोमीटर या एक मि मी के दसवें भाग के बराबर मापी गयी है। एक नैनोमीटर एक मि मी का सौ करोडवां भाग है। माइक्रोमीटर एक मीटर का दस लाखवां भाग है और मि मी का हजारवां भाग। इस प्रकार दस नैनोमीटर बाल की मोटाई का दस करोडवां भाग हुआ। प्राचीन और आधुनिक विज्ञानियों के सूक्ष्‍म मापन में अद्भुत समानता आ‍श्‍चर्यित करती है। यह अपने आपमें प्रमाण है कि सामान्‍य नेत्रों से देखकर इतनी सूक्ष्‍म माप संभव नहीं है। अत: उस समय उन्‍नत सूक्ष्‍मदर्शी यंत्र या उससे मिलती जुलती कुछ उपकरण व्‍यवस्‍था अवश्‍य होगी , जिसकी खोज की जानी चाहिए।
 
उसी प्रकार पं चतुर्वेदी ने मनुष्‍य के संतानोत्‍पादन करनेवाले गुणों को धारण करनेवाले तत्‍व को ‘सह:’ का नाम दिया है , जो इस बात को स्‍पष्‍ट करता है कि ये ‘सह:’ यानि साथ साथ चलते हैं। अर्थात् अनेक एक साथ रहते हैं , जिनकी संख्‍या 84 है। 'सह:' को आधुनिक भाषा में हम सेट भी कह सकते हैं। गुणसूत्र तो 23 जोडे होते हैं , परंतु उसमें जीन सेट अर्थात् लिंक्ड जीन सेट्स के समूह होते हैं। वे ही एक पीढी से दूसरी पीढी में अदल बदल कर स्‍थानांतरित होते हैं। जीन सेट ट्रांसमिशन की निश्चित संख्‍या का ज्ञान अभी ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्‍ट की शोध परियोजनाओं का विषय है।

इन 84 'सह:' के संयोग और पीढी स्‍थानांतरण में इनकी निश्चित संख्‍या भी हैरान करनेवाली है क्‍यूंकि अभी इस स्‍तर पर हमारा आधुनिक अनुवांशिकी‍ विज्ञान भी नहीं पहुंच सका है। 84 में से 56 'सह:' यानि जीन सेट अनुवांशिक होते हैं , 84 में से 28 'सह:' या जीन सेट उपार्जित होते हैं , 56 में से 21 'सह:' माता + पिता के मिलते हैं , 15 'सह:' दादा + दादी के‍ मिलते हैं , 10 'सह:' पडदादी + पढदादा के मिलते हैं , 6 'सह:' प्रपडदादी + प्रपडदादा के मिलते हैं , 3 'सह:' पूर्व प्रपडदादी + पूर्व प्रपडदादा के होते हैं और 1 'सह:' पूर्व छठी पीढी के। वंशावली तालिका बनाकर इन महत्‍वपूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान का सत्‍यापन कर ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्‍ट के शोधकर्ता इस प्राचीन ज्ञान को वैज्ञानिक ढंग से लोगों के सामने रख सकते हैं।