रविवार, 7 फ़रवरी 2010

सी बी एस ई बोर्ड की 10 वीं और 12 वीं की परीक्षाओं में इस वर्ष के पेपर कैसे रहेगे ??

ज्‍योतिष में बुध ग्रह को बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है और विद्धार्थियों को पढाई लिखाई के अनुकूल या प्रतिकूल माहौल देने में इस ग्रह की अच्‍छी खासी भूमिका होती है। किसी व्‍यक्ति के जन्‍म के समय बुध ग्रह की स्थिति अच्‍छी हो तो अपनी आई क्‍यू और माहौल के बल पर वे विद्यार्थी जीवन में अनायास सफलता प्राप्‍त करते हैं , इसके विपरीत बुध में गडबडी हो तो अपनी आई क्‍यू या माहौल की गडबडी के कारण वे इस समय असफलता प्राप्‍त करते हैं। इसलिए पढाई लिखाई के मामलों में किसी भी प्रकार की गणना करते वक्‍त मैं बुध ग्रह की स्थिति पर अन्‍य ग्रहों की तुलना में अधिक ध्‍यान देती हूं।

जन्‍मकालीन ग्रहों के अनुसार विद्यार्थियों का जीवन और पढाई लिखाई तो अच्‍छी चलती ही है , पर अस्‍थायी तौर पर मानसिकता को बदलने में समय समय पर आसमान में अपनी खास खास स्थिति में भी मौजूद बुध की भूमिका होती है। जब आसमान में बुध ग्रह की स्थिति अच्‍छी हो , तो विद्यार्थी आरामदायक स्थिति में होते हें , किसी प्रकार की परीक्षा , परीक्षाफल या अन्‍य जगहों पर उनके सामने सामान्‍य अच्‍छी परिस्थितियां होती हैं। पर यदि आसमान में बुध ग्रह की स्थिति कमजोर हो , तो किसी प्रकार की परीक्षा, परीक्षाफल या अन्‍य जगहों पर उनके समक्ष असामान्‍य तौर पर बुरी परिस्थितियां बनी होती हैं। वैसे इससे स्‍थायी तौर पर कोई नुकसान नहीं होता है।

यही कारण है कि बोर्ड की परीक्षाओं के वक्‍त  बुध ग्रह की स्थिति अच्‍छी होती है , तो प्रश्‍नमात्र अपेक्षाकृत आसान होते है और जब बुध ग्रह की स्थिति कमजोर हो तो प्रश्‍नपत्र कठिन। मैंने कई वर्षों से इस बात पर गौर करते हुए विद्यार्थियों की बातचीत के आधार पर यह डाटाबेस तैयार किया है, जिसके आधार पर परीक्षा के दौरान कठिन और आसान प्रश्‍न के आने का अनुमान करती आ रही हूं। इसी के आधार पर इस वर्ष भी दसवीं और 12 वी बोर्ड की परीक्षाओं के वक्‍त प्रश्‍नपत्र के कठिन या आसान आने का अनुमान लगाते हुए यह पोस्‍ट लिख रही हूं।

सबसे पहले तो विद्यार्थियों के लिए इस वर्ष एक खुशखबरी है कि इस वर्ष आसमान में बुध ग्रह की स्थिति के मजबूत होने के कारण बोर्ड की परीक्षाएं , चाहे वह किसी भी बोर्ड के द्वारा ली जाएं , हर वर्ष की अपेक्षा आसान रहेंगी। बुध ग्रह की स्थिति मजबूत होने से अभी से ही परीक्षा का कार्यक्रम भी विद्यार्थियों को काफी मनोनुकूल लग रहा होगा। भले ही 9 मार्च से चंद्रमा की कमजोर होने वाली 15 मार्च तक की परीक्षाओं को काफी मनोनुकूल होने देने में थोडी बाधा उपस्थित कर दे , पर उसके बाद क्रमश: स्थिति में सुधार होगा।

जहां तक सी बी एस ई के द्वारा ली जानेवाली दोनो परीक्षाओं का सवाल है , 14 और 15 मार्च को कोई भी महत्‍वपूर्ण परीक्षा नहीं होनेवाली है , इसलिए उनके लिए चिंता की कोई बात ही नहीं। 9 और 10 मार्च को ग्रहों की स्थिति के परीक्षा के आरंभ में प्रतिकूल होने का अर्थ यह माना जा सकता है कि परीक्षा में पेपर कुछ कठिन आएंगे , जिसके कारण थोडा तनाव बढेगा , पर धीरे धीरे ही सही , अपनी क्षमता से अधिक हल कर लेने के कारण अंत तक थोडी राहत तो अवश्‍य हो जाएगी। सी बी एस ई के कार्यक्रम के अनुसार 12 वीं कक्षा के विद्यार्थियों की 10 मार्च को अंग्रेजी की परीक्षा होगी , इसलिए इन विषयों की अच्‍छी तैयारी की जानी चाहिए।

11 और 12 मार्च को ग्रहों की स्थिति परीक्षा के आरंभ में तो सामान्‍य दिखती है , पर धीरे धीरे अच्‍छा खास दबाब पडता दिखाई देता है , जिससे स्‍पष्‍ट है कि उस दिन के पेपर को हल करने में समय कुछ अधिक लग सकता है। 11 मार्च को 10वीं के विद्यार्थियों की गणित की परीक्षा होगी। इस दिन विद्यार्थियों को परीक्षा के दौरान समय का अच्‍छी तरह नियोजन करने की आवश्‍यकता है , क्‍यूंकि जैसे जैसे कांटे बढते जाएंगे , उनपर दबाब बढता चला जाएगा और निकलने के वक्‍त समय की कमी का अफसोस होगा । अन्‍य दिनों के पेपर सामन्‍य तौर पर अच्‍छे रहेंगे , भले ही अपनी तैयारी के अनुसार व्‍यक्तिगत तौर पर उससे कुछ कम या अधिक संतुष्‍ट रहा जाए।



नाना मुनि के नाना मत ... हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत के आलेखों को पढकर कमेंट किया जाए या नहीं ??


मैंने हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत से जुडने के सालभर बाद इंटरनेट का अनलिमिटेड डाउनलोड का पैकेज लिया तो इसके आलेखों को अधिक से अधिक पढने और उनमें टिप्‍पणी करने का लोभ संवरण नहीं कर पायी , पर इससे मुझे कितनी फजीहत उठानी पडी , यह तो सबों को मालूम होगा , जिसके कारण मैंने आलेखों को पढना तो नहीं छोडा , पर टिप्‍पणियां करनी बंद कर दी थी। आज गिरिश बिल्‍लौरे जी के द्वारा समीर लाल जी की इंटरव्‍यू सुनने पर मुझे फिर से आलेखों पर टिप्‍पणी करने की इच्‍छा हो गयी है , क्‍या है टिप्‍पणियों पर हमारे ब्‍लॉगर बंधुओं के विचार , आप भी जानिए.....
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अदा जी ने तो कमाल की कविता लिखी है .........

आभासी दुनिया की बस आधार है टिप्पणी
मृतक भावों में संजीवनी संचार है टिप्पणी
छोटों का हठीलापन, तकरार है टिप्पणी
कभी आदेश भईया का कभी फटकार है टिप्पणी
बहन बन रूठ जाए कभी, दुलार है टिप्पणी
कभी सुरसा सरि गटक जाए, तैयार है टिप्पणी


कल जो मैंने लिखा उसके पीछे कोई कारण नहीं था ना ही में किसी छद्म ब्लोगर से परेशान था . मैंने एक प्रयोग किया की विवादास्पद लिखो तो क्या स्थिति होगी . और मुझे उम्मीद से कई गुना मिला . बहुतो ने पढ़ा और टिप्पणी की तो पुछीये मत . आप खुद ही महसूस कर सकते है पढ़ कर .


हम भी हमेशा सोचते हैं कि अच्छे लेखन के लिए प्रोत्साहन देने टिप्पणी करनी चाहिए। लेकिन इस कम्बख्त वक्त का क्या किया जाए जो मिलता ही नहीं है। वो तो अच्छा हो निंद्रा रानी का जिन्होंने अपने आगोश से हमें कल रात बाहर कर दिया जिसके कारण हम टिप्पणी करने में सफल हो गए। ऐसा रोज-रोज तो नहीं हो सकता है। लेकिन हमने सोच लिया है कि रोज कम से कम पांच ब्लागों को पढऩे के बाद टिप्पणी करने का प्रयास करेंगे। हम सिर्फ प्रयास की ही बात कर सकते हैं वादा नहीं कर सकते हैं। 



देखिये मानव मन  ही ऐसा है कि वह अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है .ऐसा न होता तो चमचे चाटुकारों का बिलियन डालर का व्यवसाय न होता .जिनके चलते देशों के सरकारे हिल डुल जाती हैं .उनके पद्म चुम्बन से पद्म पुरस्कारों तक में भी धांधली हो जाती है .तो वही मानव मन  यहाँ ब्लागजगत में अपनी पोस्टों पर टिप्पणियाँ भी चाहता है .कौन नहीं चाहता ? मैं नहीं चाहता या समीर भाई नहीं चाहते . मगर हम उतनी उत्फुल्लता से दूसरों के पोस्ट पर टिप्पणियाँ नहीं  करते .

रामपुरिया का हरियाणवी ताऊ जी ने तो ब्‍लॉग हिट कराऊ और टिप्‍पणी खींचू तेल भी बना ली है .....

बडे दिनों की रिसर्च के बाद ताऊ और रामप्यारी इस नतीजे पर पहुंचे कि आजकल बाल लंबे और घने करने के तेल, लंबाई बढाने के तेल, भाग्यवर्धक तेल-ताबीज और ब्लाग जगत मे ब्लाग हिट कराऊ और टिप्पणी खींचू तेल की अच्छी खपत हो रही है. सो दिन रात रिसर्च करके आखिर इन के लिये उन्होने दवाई इजाद कर ही ली. दवाई का फ़ार्मुला गुप्त है. उन्होने बढिया पैकिंग करवा ली.

टिप्‍प्‍णी के बारे में ज्ञानदत्‍त पांडेय जी का आलेख पढें ....


मैने पढ़ा था - Good is the enemy of excellent. अच्छा, उत्कृष्ट का शत्रु है। फर्ज करो; मेरी भाषा बहुत अच्छी नहीं है, सम्प्रेषण अच्छा है (और यह सम्भव है)। सामाजिकता मुझे आती है। मैं पोस्ट लिखता हूं - ठीक ठाक। मुझे कमेण्ट मिलते हैं। मैं फूल जाता हूं। और जोश में लिखता हूं। जोश और अधिक लिखने, और टिप्पणी बटोरने में है। लिहाजा जो सामने आता है, वह होता है लेखन का उत्तरोत्तर गोबरीकरण! एक और गोबरीकरण बिना विषय वस्तु समझे टिप्पणी ठेलन में भी होता है - प्रतिटिप्पणी की आशा में। टिप्पणियों के स्तर पर; आचार्य रामचन्द्र शुक्ल होते; तो न जाने क्या सोचते।


जी के अवधिया जी बता रहे हैं कि वे टिप्‍पणी क्‍यूं करते हैं ....

मैं उन्हीं पोस्टों में टिप्पणी करता हूँ जिन्हें पढ़कर प्रतिक्रयास्वरूप मेरे मन में भी कुछ विचार उठते हैं। जिन पोस्टों को पढ़कर मेरे भीतर यदि कुछ भी प्रतिक्रिया न हो तो मैं उन पोस्टों में जबरन टिप्पणी करना व्यर्थ समझता हूँ। यदि मेरे किसी पोस्ट को पढ़कर किसी पाठक के मन में कुछ विचार न उठे तो मैं उस पाठक से किसी भी प्रकार की टिप्पणी की अपेक्षा नहीं रखता।

प्रवीण शाह जी लिखते हैं कि टिप्‍पणी को लंबे समय तक प्रकाशित करने से रोके रखना उचित नहीं .....

अब जो बात मैं कहने जा रहा हूँ वह उन ब्लॉगरों के लिये है जिनके ब्लॉग पर मॉडरेशन लागू है... कई बार यह होता है कि वे एक ज्वलंत और विचारोत्तेजक विषय पर बहुत अच्छी पोस्ट लगाते हैं...परंतु दुर्भाग्यवश मॉडरेशन करने के बाद टिप्पणियों को Real Time में क्लियर करने के लिये समय नहीं निकाल पाते हैं... नतीजा... एक संभावनापूर्ण पोस्ट, जिसे काफी पाठक मिलते और वह एक वृहत चर्चा को जन्म देती, असमय ही दम तोड़ देती है...

कुमारेन्‍द्र सिंह सेंगर जी ने तो टिप्‍पणी द्वार ही बंद कर दिया है ....

इसके अलावा उन महानुभावों के प्रति हम वाकई शर्मिन्दा हैं जो निस्वार्थ रूप से हमारी पोस्ट पर टिप्पणी देते रहे। हमारा यह फर्ज बनता है कि हम उनकी पोस्ट को भी अपनी टिप्पणी देते। उनको हम विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमने उनकी सभी पोस्ट को पढ़ा है और शायद स्वयं को इस लायक नहीं समझा कि उनके लिखे का मूल्यांकन कर सकें, बस इस कारण कुछ नहीं लिखा जा सका। 

हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में टिप्‍पण्णियों की  गुणात्‍मक पहलूओं को दिखाने के लिए अजय कुमार झा जी ने टिप्‍पणियों की चर्चा भी शुरू कर दी है .....











जब हमने ये टिप्पी पे टिप्पा धरने वाला ब्लोग शुरू किया था तब मन में बस एक ही विचार था कि लोग जब यहां अपनी टीपों को टीप कर चल देते हैं तो फ़िर वो उस पोस्ट के साथ ही सिमट जाती हैं । सो सोचा कि पोस्टों की चर्चा,पोस्टों की बातें तो खूब होती हैं ,मगर टिप्पणि्यों का क्या, और फ़िर ऐसा तो नहीं कि उन टीपों को सजा के कोई गुलदस्ता न बनाया जा सके । तो बस गुलदस्ता सजाने के बाद ऊपर से गुलाब जल छिडक दिया है ॥आप मजा लीजीए



वाणी गीत जी पूछ रही हैं कि क्‍या टिप्‍पणी करना और टिप्‍पणी पाना इतना बडा गुनाह है ??

एक दिन ब्लॉग पर कुछ लाईंस लिख ही डाली ...और लिख कर भूल गयी ...२-३ बाद अचानक देखा तो इतनी सारी टिप्पणीयांऔर स्वागत सन्देश ... और लिखने का हौसला मिला....फिर धीरे धीरे फोलोअर्स बनते गए और टिप्पणीयां भी ....जिनमे अक्सर लेखन और ब्लॉग सम्बन्धी सुझाव मिलते रहे ....और इन टिप्पणी का ही असर है कि एक साधारण गृहिणी की जिंदगी जीते पहली बार किसी अखबार में अपनी लिखी कविता भेजने का साहस कर पायी ...तो मेरे लिए तो ये टिपण्णीयां किसी वरदान से कम नहीं है ..क्या अब भी आप कहेंगे कि टिपण्णी देने के लिए ही टिपण्णी करना सही नहीं है ...कौनजाने ये टिप्पणी कितनी छुपी हुई प्रतिभाओं प्रोत्साहित कर सामने आने का मौका और हौसला प्रदान कर दे ...इसलिए टिप्पणी तो जरुर की जानी चाहिए ...भले बिना पढ़े की जाए ....मुझे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती ...!!

कुछ दिन पूर्व मिथिलेश दूबे जी ने भी टिप्‍पणी पर एक सुंदर कविता लिखी थी ....

बहुत दिंनो से देख रहा हूँ कि टिप्पणी को लेकर ब्लोगजगत में काफी उधम मचा हुआ है, कोई ब्लोगिंग ही छोड़ कर जा रहा,, कारण बस टिप्पणी ना मिलना । कभी-कभी लगता है कि टिप्पणी हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या टिप्पणी मात्र से ही कविता या अन्य विधा का मूल्यांकन हो सकता है, ये शायद बड़ा सवाल हो, बात सही कि टिप्पणी मिलने से उत्साह वर्धन जरुर होता है, लेकिन ध्यान ये भी दिया जाना चाहिए कि टिप्पणी है कैसी, यहाँ है कैसी का मतलब यह है कि वह आपको टिप्पणी मिलीं क्यो, आपके रचना के ऊपर या आग्रह के ऊपर ।

तरकश के एक आलेख में लिखा गया था कि टिप्पणी आपकी लोकप्रियता नहीं दर्शाती:











टिप्पणी आपकी लोकप्रियता नहीं दर्शाती:
यदि आपको 30 टिप्पणी मिलती है और आपके साथी को 5 तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपका साथी कमतर लेखक है. टिप्पणियों से लोकप्रियता का अंदाजा नहीं लगता. यह देखिए कि आपके लिखे को कितने लोग पढ़ते हैं, यह मत देखिए कि कितनों के टिप्पणी दी. ऐसा हो सकता है कि आपके लेख पर टिप्पणी देने जैसा कुछ हो भी नहीं, पर आपके लेख को पसंद किया जा रहा हो
२० मिनट में फ्रस्ट फेज (छोटी छोटी पोस्ट, कविता) १५ मिनट में सेकेन्ड फेज (समाचार, फोटो आदि ), १५ मिनट में बाकी स्कैनिंग (बड़े गद्यों में अधिकतर स्कैन मोड़) बाकि का समय अपना पसंदीदा इस स्कैनिंग मोड से उपलब्ध लेखन. अब यदि आप १.३० घंटा दे रहे हैं तो पसंदीदा देखने के लिये आपके पास ४० मिनट बच रहे याने कम से कम १२० लाईन...अधिकतर गद्य २० से ४० लाईन के भीतर ही होते हैं ब्लॉग पर.(अपवाद माननीय फुरसतिया जी, उस दिन अलग से समय देना होता है खुशी खुशी) तो कम से कम ४ से ५ आराम से. चलो, कम भी करो तो ३. बहुत है गहराई से एक दिन में पढने के लिये. (कुछ इस श्रेणी में भी निकल जाते हैं - कुछ पठन की प्रस्तावना, शीर्षक और विषय देखकर भी आप उसे छोड़ सकते हैं कि वो आपके पसंद का नहीं हो सकता.) 
हिमांशु जी ने एक ब्‍लॉग्‍ा टिप्‍पणी की आत्‍मकथा ही लिख डाली थी .....

अपने अस्तित्व के लिए क्या कहूं ? अथवा अपनी प्रकृति के लिए ? जो जैसे चाहता है, वैसे मेरा उपयोग करता है । किसी के लिए मैं व्यवहार हूँ- रिश्तेदारी का सबब, मेलजोल का उपकरण । किसी के लिए व्यापार हूँ- एक हाँथ दो, दूसरे हाँथ लो का हिसाब या पूंजी से पूंजी का जुगाड़ । कभी किसी के लिए अतृप्ति का आत्मज्ञान हूँ तो किसी के लिए उसकी संस्कृति, उसका स्वभाव । मैं सुकृति, विकृति दोनों हूँ । तो इसलिए मैं अपने अस्तित्व के प्रति सजग हूँ- धकियायी जाकर भी, आलोचित होकर भी; क्योंकि ('अज्ञेय' के शब्दों में ) -




"पूर्णता हूँ चाहता मैं ठोकरों से भी मिले
धूल बन कर ही किसी के व्योम भर में छा सकूँ।"


घुघुती बासुती जी का यह आलेख देखिए , जिसमें वो कहती हैं .......

अरे भइया कुछ तो 'वेरी गुड' लायक भी होगा! क्या वेरी गुड के लिए अपने पूरे खानदान को मरवाना होगा या भैंसो के पूरे तबेले को? बात यह है कि बचपन से 'वेरी गुड' पाने की आदत पाली हुई है, जब भी अध्यापक बिना 'वेरी' वाला 'गुड' देते थे तो मन असन्तुष्ट ही रहता था, आज भी यह बीमारी लगी ही हुई है।

डॉ जे सी फिलिप जी को डॉ अरविंद जी की तीन शब्‍दों की टिप्‍पणी इतनी अच्‍छी लगी कि उन्‍होने इसपर एक पोस्‍ट ही लिख डाला .....











तीन शब्द ही सही, लेकिन इस टिप्पणी को पढ कर बढा अच्छा लगा. अच्छा इसलिये कि डॉ अरविंद बहुत ही सुलझे हुए व्यक्ति हैं एवं सुलझे हुए चिट्ठाकार हैं. वे अधिकतर वैज्ञानिक विषयों पर लिखते हैं, और इस कारण कई बार कई चिट्ठाकार उनका विरोध कर चुके हैं.
इजहारे- खुराफात की  ज़हमत ना कीजिये
खो जाये अमन-चैन ऐसी जुर्रत ना कीजिये

जब ठेस लगे दिल पर शिकायत दर्ज कीजिये
बहस कीजिये खुल कर अदावत ना कीजिये

कलम चलाने के लिए यहाँ मुद्दे भरपूर हैं
महज दिखावे के वास्ते खिलाफत ना कीजिये
ग्रीन्बौम के ब्लॉग में किसी ने बेनामी रहते हुए गाली दी . पहली बार तो उसने स्पाम बटन दबा कर छोड़ दिया . दुबारा जब फिर से ऐसा हुआ तो उसने उस बेनामी का IP पता पता लगाया . यह एक स्कूल का निकला . उसने स्कूल को यह बात बताई कि शायद किसी विद्यार्थी ने शरारत की है. स्कूल ने जांच की तो पता चला यह एक नौकर ने की थी . नौकर ने पकडे जाने पर इस्तीफ़ा दिया.





वैसे तो हर पोस्ट की हर टिप्पणी (स्पैम को छोड़ दें) अमूल्य और अनमोल होती है, मगर किसी ब्लॉग पर आपकी एक टिप्पणी के बदले पाँच रुपए का दान दिया जा रहा है तो वहाँ आप एक टिप्पणी तो दे ही सकते हैं?
अनघ देसाई इस दफ़ा दीपावली कुछ खास तरीके से मना रहे हैं. वे अपने ब्लॉग पर 15 अक्तूबर से 19 अक्तूबर 2009 के बीच मिले प्रत्येक टिप्पणी के बदले 5 रुपए का दान देंगे. इसी तरह इस दौरान फेसबुक/ईमेल/ट्विटर पर (स्पैम नहीं) मिले शुभकामना संदेशों पर वे 0.25 रुपए का दान देंगे तथा प्रत्येक एसएमएस पर वे 0.50 रुपए का दान देंगे. उनके इस विचार को लोगों ने हाथों हाथ लिया है और बहुत से लोग अनघ के साथ दान देने के लिए जुड़ गए हैं और मामला इन पंक्तियों के लिखे जाने तक रुपए 17.50 प्रति शुभकामना संदेश तक जा चुका है. ये दान बालिका शिक्षा (एजुकेटिंग गर्ल चाइल्ड) के लिए दिए जाएंगे


हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत की टिप्‍पणियों को महत्‍वपूर्ण देखते हुए फुरसतिया जी ने भी एक बार इनकी चर्चा की थी ...
आप देखिये कि हम लोगों (अरे आप भी शामिल हैं हममें) ब्लागिंग से लोगों के साहित्य के कीड़े जाग रहे हैं। मतलब ब्लागिंग को ऐसा-वैसा न समझो ये बड़े काम की चीज है।
शास्त्रीजी की टिप्पणी का कुछ ऐसा होता है कि वह हमेशा स्पैम में पाई जाती है। मामला आचार संहिता का बनता है। ये कुछ ऐसा ही है कि धर्मोपदेशक आचार-सदाचार की बातें करते-सकते अनायास अनाचार करते रहने वालों के मोहल्ले में पाया जाय। आखिर उसको उनका भी उद्धार करना है। वे भी खुदा के बंदे हैं। पहले अतुल की कुछ टिप्पणियां भी स्पैम में मिलीं। ऐसा कैसे होता है? क्या ई-मेल पते में कुछ लफ़ड़ा होता है। 
 हम ज्यादा से ज्यादा चिट्ठा खुलवाते जाए, लेकिन उसमें सिर्फ बकवास और बेजरूरत का माल पड़ा रहे, तो कैसी सेवा होगी, सोचिये? और इसकी समीक्षा करनेवाले हिन्दी चिट्ठाकारों के प्रति कैसा भाव रखेंगे?भगवान करे, एक लाख का आंकड़ा हिन्दी ब्लागों का पार कर जाये, लेकिन इस एक लाख में अगर ९९ हजार बकवास ही हों, तो हो गया सत्यानाश। अब अगर अपील की जाये, तो ये भी अपील की जाये कि सकारात्मक लेखों के सहारे हिन्दी भाषा को आगे बढ़ायें। और कृपा करके बेहतर विषय चुनें। साथ ही टिप्पणी देने के नाम पर भी वैसी ही सख्ती बरतें, जैसे कि अच्छी सब्जी चुनने के नाम पर बाजार में बरतते हैं।
कही से आप ब्लाॅगर से भिन्न दृष्टिकोण रखते है तो उसकी चर्चा करेें। जब उससे ब्लाॅग की विषयवस्तु समृद्ध होती हो, ऐसी बात जरूर कहें ।जिससे छुटी बात पूरी हो ऐसे में टिप्पणी जरूर करनी चाहिए। चिट्ठे में  रहीं कमी का उल्लेख भी किया जा सकता है।आप इस पर क्या सोचते है? अपनी भिन्न सोच हो तो जरूर टिप्पणी करें ।
यद्यपि हिन्दी भाषा में लिखने वाले नये ब्लाॅगरो को प्रोत्साहन देने हेतु  टिप्पणी करना उचित  एवं आवश्यक है। ब्लाॅग जगत में टिप्पणी एक आवश्यक अंग है। मैं टिप्पणी के खिलाफ नहीं हुॅ ।
मैं धुरंधर और लिक्खाड़ चिट्ठेकारों की बात नहीं कर रहा हूँ । नया ब्लोगर कुछ नया लिख देता है, लेकिन वह खुद कन्फ्यूज होता है.'ठीक ठाक है की नहीं यार! एक तो पहले से ही भयानक कन्फ्यूजन, दूसरे छपने के बाद टिप्पणियाँ , सुन्दर! वाह! खूब! लिखते रहिये अब ब्लोगर अपना नया पुराना सारा कचरा पाठकों के सामने परोस देता है।
हाल ही में अंग्रेज़ी की एक अत्यंत लोकप्रिय ब्लॉग साइट एंगजेट ने अपने ब्लॉग से टिप्पणी की सुविधा बंद कर दी. इसका कारण गिनाते हुए बताया गया कि लोग बाग वहाँ भद्दे, अत्यंत निम्न स्तरीय, मुद्देहीन, व्यक्तिगत, छिछोरी टिप्पणियाँ किए जा रहे थे. एंगजेट ने ये भी बताया कि टिप्पणियों में हिस्सेदारी उनके पाठक वर्ग का एक अत्यंत छोटा हिस्सा ही लेता रहा था और गंदी टिप्पणियाँ करने वाले लोगों की संख्या और भी कम थी, मगर उनके कारण मामला सड़ता जा रहा था, और मॉडरेशन जैसा हथियार भी काम नहीं आ पा रहा था.

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

गिरीश बिल्‍लौरे जी के द्वारा ली गयी मेरी पॉडकास्‍ट इंटरव्‍यू का दूसरा भाग सुनें !!

कई दिन पूर्व गिरीश बिल्‍लौरे जी के द्वारा ली गयी इंटरव्‍यू के पहले भाग का लिंक मैने आपलोगों को दिया था । आज दूसरे भाग का लिंक भी दे रही हूं , कृपया सुने और उचित प्रतिक्रिया देने का कष्‍ट करें !!

घुंघराले बालों वाली गोरी खूबसूरत कन्‍या बारंबार मेरी अंतरात्‍मा को झकझोर रही है !!

अपने लक्ष्‍य के प्रति मैं जितनी ही गंभीर रहती हूं और सफलता के लिए जितना ही प्रयत्‍न करती हूं , अपने सुख की चिंता उतनी ही कम रहती है। मुझे न तो ईश्‍वर से , न अपने परिवार से और न ही जान या पहचानवालों से कोई शिकायत रहती है। मुझपर बडा से बडा कष्‍ट भी आ जाए , तो मैं उन दीन दुखियों के बारे में सोंचती हूं , जिनके हिस्‍से कष्‍ट ही कष्‍ट आया। ऐसे बहुत सारे लोग हैं , जिनके कष्‍ट को देखने के बाद अपने कष्‍ट बहुत छोटे लगते हैं। जिनके जीवन को मैने काफी नजदीक से देखा है , उसमें सबसे अधिक कष्‍ट पाने वाले दो परिवार की कहानी मैने इस और इस आलेख में प्रेषित की है। इनकी चर्चा करने के बाद 19 वर्ष की एक घुंघराले बालों वाली गोरी खूबसूरत कन्‍या निरीह भाव से बारंबार मेरी अंतरात्‍मा को झकझोर रही है कि क्‍या उससे दुखी भी इस दुनिया में कोई हो सकता है, जो मैने उसे इन दोनो के स्‍थान पर नहीं रखा ??

हालांकि अब उसकी उम्र 42 वर्ष की हो चुकी है , उसके जीवन का बहुत हिस्‍सा अभी बाकी है , शायद कोई सुखात्‍मक मोड आए , यही सोंचकर मैने इसे तीसरे स्‍थान में रखा है , पर कहीं से कोई भी सकारात्‍मक उम्‍मीद नहीं दिखती है। मेरे चेहरे के सामने उसका वही रूप आ रहा है , जिसे मैने उसके विवाह के पूर्व ही देखा था । बचपन से ही उसके प्‍यारे रूप को देखती आ रही थी, उसके लंबे चौडे परिवार में पांच बुआ थी , जिसमें से दो विवाह के बाद भी अपने बच्‍चों को लेकर पिता के घर में ही रहा करती थी। उसमें से एक परित्‍यक्‍ता और दूसरी विधवा थी , बाकी तीन बुआ की शादी भी नहीं हुई थी, उसी में से एक मेरी दोस्‍त थी। उसके पिताजी का नहाते वक्‍त डैम में डूबकर प्राणांत हो चुका था और वह अपनी विधवा मां के साथ अपने दादाजी के घर में रहा करती थी। दिनभर इतने बडे परिवार की सेवा टहल में व्‍यस्‍त मां से वह कितने प्‍यार की उम्‍मीद रख सकती थी ? पर लाचारों के दिन भी तो कट ही जाते हैं । धीरे धीरे तीनों बुआ का विवाह भी हो गया और वह घर में इकलौती रह गयी। बडे होने के बाद अपनी दोस्‍त यानि मेरी छोटी बहन के साथ मैने उसे देखा तो देखती ही रह गयी थी। अपनी मां की प्रतिमूर्ति उसकी सुंदरता की प्रशंसा भी कैसे करूं ?

फिर कुछ ही दिनों में मालूम हुआ कि घर के सारे लोग मिलकर उसके विवाह की तैयारी कर रहे थे। जानकर बहुत खुशी हुई , सुदर और स्‍मार्ट तो थी ही , एक सरकारी स्‍कूल के बहुत सुंदर और स्‍मार्ट शिक्षक से उसका विवाह तय हो गया। दादाजी और मामाजी , फूफाजी और अन्‍य सभी रिश्‍तेदार उसके विवाह में कुछ न कुछ मदद करने को तैयार थे। बहुत धूमधाम से उसका विवाह हुआ था , यहां तक कि गांव में पहली बार उसके विवाह में ही शादी की वीडियो रिकार्डिंग हुई थी , उनकी जोडी को देखकर गांववालों की खुशी का ठिकाना न था। खुशी खुशी वह ससुराल में रहने लगी और गुडिया जैसी एक कन्‍या को जन्‍म दिया। पर उस परिवार की खुशी को भी ग्रहण लग गया, उसके पति ने तबियत खराब होने पर अस्‍पताल की शरण ली तो डॉक्‍टरों ने उसे किसी गंभीर बीमारी से पीडित पाया । इलाज के दौरान ही उसकी मौत हो गयी और मात्र 22 वर्ष की उम्र में अपनी मां के समान ही एक बेटी को लेकर वह पूरी जिंदगी काटने को लाचार हुई। उसकी मां के लिए तो यह बहुत अच्‍छा हुआ कि ये सब देखने के पहले ही स्‍वर्ग सिधार गयी थी , पर बेटी के लिए यह और बुरा हुआ , जीवन भर बुरी से बुरी परिस्थिति में रोने के लिए उसे मां की गोद भी नसीब नहीं हो सकी। यहां भी पति की नौकरी पर उसके भाई ने ही अधिकार जमाया।

वो अकेली ससुरालवालों के साथ समायोजन कर किसी तरह जीवन की गाडी खींचती चली गयी। जिसका पति साथ न हो , उस भारतीय स्‍त्री की मुसीबत का अंदाजा कोई भी लगा सकता है। जीवनभर जो कहानी उसकी मां के साथ हुई थी , वही इसे भी झेलने को मजबूर होना पडा। मां को तो कभी कभार मन बहलाने को एक मायका भी था , पर बेटी के हिस्‍से से तो वह सुख भी प्रकृति ने छीन लिया था। आज अपनी मां और नानी से भी सुंदर उसकी बेटी बिल्‍कुल सयानी हो चुकी है , इंटर में पढ रही है। उसे बेटी के विवाह की चिंता है , मेरी बहन यानि अपनी सहेली से एक अच्‍छा सा लडका ढूंढने को कह रही है। ईश्‍वर से मेरी प्रार्थना है , उसका कष्‍ट यहीं से दूर करे , उसे बेटे समान एक दामाद दे दे , उसे ढेर सारी खुशियां दे , ताकि मेरे द्वारा बनायी गयी लिस्‍ट से वे दोनो बाहर हो जाएं । आशा है , आप सब भी उनके लिए प्रार्थना करेंगे।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

हाथ कंगल को आरसी क्‍या .. फिर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के मौसम के सिद्धांत की सत्‍यता की बारी आएगी !!

3 और 4 फरवरी को मौसम से संबंधित मेरे द्वारा की गयी भविष्‍यवाणी सही हुई या गलत , इसका फैसला करना आसान तो नहीं । मध्‍य प्रदेश , छत्‍तीसगढ और राजस्‍थान में जैसा मौसम देखने को मिला  , वो सामान्‍य नहीं था और इस कारण इन प्रदेशों में रहनेवाले लोग मेरी भविष्‍यवाणी को सही मान रहे हैं , तो दूसरी ओर दिल्‍ली, उत्‍तर प्रदेश और उसके उसके आसपास के लोग पूरी धूप का आनंद लेते हुए इसे गलत भी कह रहे हैं। भविष्‍यवाणी पूर्ण तौर पर सही हुई , ऐसा मैं भी स्‍वीकार नहीं कर सकती , पर तिथि का प्रभाव दिख जाने से ग्रहयोग का प्रभाव तो दिख ही गया है और इसे हल्‍के में नहीं लिया जाना चाहिए। ज्‍योतिष में शोध की अनंत संभावनाएं हैं और भविष्‍य को देखने का थोडा भी ज्ञान हमें असत्‍य से सत्‍य की ओर , अंधकार से प्रकाश की ओर तथा अनिश्चित से निश्चितता की ओर ले जा सकता है।


अभी तक ज्‍योतिष के पूर्ण विकास न होने के बहुत सारे कारण है , जिसमे से एक मुख्‍य कारण इसका जमाने के साथ परिवर्तनशील नहीं होना है और इसके लिए हम भारतीय पूरी तरह जिम्‍मेदार हैं , जिन्‍होने बाद में ज्‍योतिष में कोई रिसर्च ही नहीं किया। दूसरों ने कह दिया कि हमारी परंपराएं गलत हैं , ज्‍योतिष अंधविश्‍वास है तो हम आंख, कान सब मूंदे इसे गलत मानते जा रहे हैं, किसी के कुछ कहने का हमपर कोई असर ही नहीं हो रहा। वो तो भला हो हमारे पूर्वजों का , जिन्‍होने हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था इतनी चुस्‍त दुरूस्‍त बनायी थी, प्राचीन ज्ञान और परंपरा को संभाले जाने के लिए इतने सशक्‍त प्रयास हुए थे कि बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा लाख चाहते हुए भी उसे तोडा नहीं जा सका। हां, विभिन्‍न मुद्दों को लेकर भ्रांतियां अवश्‍य बन गयी हैं, लेकिन व्‍यवस्‍था टस से मस नहीं हो रही, क्‍युंकि अधिकांश भारतीयों को, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान, सिक्‍ख हों या ईसाई या फिर किसी भी जाति के, अपनी सभ्‍यता और संस्‍कृति के बारे में उन्‍हें अच्‍छी तरह पता है। इससे अच्‍छी संस्‍कृति कहीं हो ही नहीं सकती, बस इसे सही दिशा देने की आवश्‍यकता है। विदेशी आक्रमणों के दौरान आयी लाख कमजोरियों के बावजूद भी हमारी परंपराओं को और ज्‍योतिष को जिन लोगो ने मात्र धरोहर की तरह भी संभाले रखा, उनका हमें शुक्रिया अदा करना चाहिए , क्‍यूंकि उन्‍हीं के कारण हम इनकी कमजोरियों को दूर कर इसे आगे बढा सकते हैं। पर इस देश से इन्‍हें उखाड फेकने में किसी को भी सफलता नहीं मिल सकती है। ज्‍योतिष को सत्‍य दिखलाते हुए प्रमाण हम आगे भी देते ही रहेंगे।


गूगल सर्च में 'आंधी बारिश' लिखकर न्‍यूज में सर्च करें, 12 जनवरी 2010 के आसपास के 13 खबर मिलेंगे और 4 फरवरी 2010 के एक स्‍थान पर 13 और दूसरे स्‍थान पर 3 खबर मिलेंगे, दोनो ही दिनों की तिथियों के बारे में मैने मौसम के लिए खास ग्रह स्थिति बतायी थी , तेज हवा और बारिश की संभावना जतायी थी और इतना ही 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को प्रमाणित करने के लिए काफी है। आनेवाले दिनों में बडे रूप में मौसम में अचानक बदलाव लाने वाली तिथियां 6 और 7 अप्रैल 2010 है , कृपया इसे अपनी डायरी में नोट कर लें। गर्मियों के दिन होने के बावजूद ऐसी ही आंधी आएगी, आसमान में बादल बनेंगे और कहीं तेज बारिश होगी , तो कहीं छींटे भी पडेंगे। इस प्रकार का मौसम कम से कम 9 अप्रैल तक बना रह सकता है , वैसे 11 अप्रैल तक भी उम्‍मीद दिखती है। इस बार लांगिच्‍यूड या लैटिच्‍यूड की चर्चा नहीं कर रही हूं, क्‍यूंकि चक्रवाती तूफान कहीं से शुरू होकर कहीं तक भी फैल सकता है। इस तरह अप्रैल में एक बार फिर से 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सिद्धांतों की परीक्षा की बारी आएगी। भला हाथ कंगन को आरसी क्‍या ??





अंतहीन कष्‍टों का जीवन झेलने का मजबूर एक दंपत्ति

पिछले दिनों अपनी एक पोस्‍ट में  मैने बताया था कि लेखक का नजरिया ही किसी कहानी को सुखात्‍मक या दुखात्‍मक बनाता है। जीवन के सुखभरे समय में जब कहानी का अंत कर दिया जाता है , तो उसे सुखात्‍मक और जीवन के दुखभरे समय में कहानी का अंत कर दिया जाता है , तो नो दुखात्‍मक बनता है। पर जीवन में कभी कभी किसी के जीवन का अंतिम समय अंतहीन कष्‍टों का बन जाता है , उसे सुखात्‍मक बनाया ही नहीं जा सकता। इसी सिलसिले में मैने  इस पोस्‍ट में मैने उस महिला की चर्चा की थी , जिसे अपने जीवन में सर्वाधिक कष्‍टप्रद जीवन झेलते देखा है । मैने जिनलोगों के जीवन को निकट से देखा है , उसमें दूसरे नंबर पर एक दंपत्ति को रखा जा सकता है।



उक्‍त दंपत्ति भी गांव के ही सही , पर अच्‍छे गृहस्‍थ परिवार के थे , उनके दो बेटे और तीन बेटियां थी। दोनों में से किसी को कोई बुरी आदत नहीं थी, पर किसी न किसी बीमारी या कुछ अन्‍य खर्च की वजह से धीरे धीरे सारे जमीन बिकते चले गए और जबतक बच्‍चे बडे हुए , वे लोग काफी गरीबी का जीवन गुजार रहे थे। गांव में रहते हुए लडकियों को मिडिल पास ही करवाया था , पर दोनो काफी सुंदर थी। सरकारी नौकरी कर रहे एक स्‍मार्ट लडके को उनकी बडी बेटी पसंद आ गयी। बिना दहेज के लडके ने अपनी ओर से पूरा खर्च और व्‍यवस्‍था करते हुए उससे ब्‍याह रचाया ही , दो चार वर्षों बाद एक संभ्रांत परिवार के अन्‍य लडके को ढूंढकर अपनी साली की शादी करवा दी। वह अपने ससुरालवालों को हर संभव मदद भी किया करता था। उसके बाद उनका जीवन कुछ राहत भरा हो गया।

दोनो बेटियों के तीन तीन बच्‍चे हुए , पर बेटियों के रंग रूप की तरह उनका भाग्‍य सुंदर न रहा। राजी खुशी कुछ दिन ही वे खुशी से रह पाए होंगे कि छोटे छोटे तीन बच्‍चों को छोडकर बडे दामाद चल बसे। बडी बेटी पर मुसीबत का पहाड टूट पडा , बेटी के ससुराल वाले बहू के नौकरी के पक्ष में नहीं थे , क्‍यूंकि वह उतनी पढी लिखी नहीं थी। उसे कंपनी में पति के जगह पर चपरासी की ही नौकरी मिल सकती थी , जो उनकी प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न बन रहा था। ससुरालवालों के दबाब में नौकरी दमाद के छोटे भाई को दे दी गयी। धीरे धीरे इस कष्‍ट से उन्‍होने समझौता किया और नाति नातिनों और अन्‍य बच्‍चों से भरे पूरे घर को देखकर ही खुश होते रहे। छोटे दामाद की आर्थिक स्थिति उतनी अच्‍छी न थी , इसलिए छोटी बेटी की ओर से भी चिंता बनी ही रही।

पर धीरे धीरे समय आराम से व्‍यतीत होता गया और शहर में रह रहे सभी नाती नातिने पढलिखकर अच्‍छे अच्‍छे जगहों पर पहुंच गए। छोटी बेटी का विवाह भी किसी तरह मिलजुलकर कर ही दिया गया , इस तरह उनका अपना सारा कष्‍ट जाता रहा। इन तीनो बेटियों के अलावे उनके दो बेटे थे , जिसमें से एक अपाहिज था , इसलिए उन्‍हें उससे कोई उम्‍मीद तो थी नहीं। एक बडे बेटे के सहारे जिंदगी की बाकी गाडी खींचने को वे तैयार थे। असुविधाओं के मध्‍य बेटा अच्‍छी तरह पढाई तो नहीं कर सका था, कोई व्‍यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी का भी अभाव था , इसलिए उसे एक सेठ के यहां काम करने को भेज दिया गया। बचपन से अपनी स्थिति को कमजोर देख रहा बेटा बहुत ही महत्‍वाकांक्षी होता जा रहा था। इसलिए उसने सेठ के यहां बहुत मन लगाकर पूरी जबाबदेही से काम करना शुरू किया , जिसके कारण शीघ्र ही वह अपने मालिक का प्‍यारा बन गया।

मालिक करोडपति थे , अच्‍छा खासा फर्म था उनका , बेटे को हर तरह की सुविधा दी गयी थी। उसके स्‍थायित्‍व और व्‍यवहार को देखते हुए उसका विवाह भी हो गया और एक बिटिया रानी ने जन्‍म भी ले लिया। जीवन भर के कष्‍ट के बाद उक्‍त दंपत्ति के जीवन की गाडी एक बार‍ फिर सही दिशा में मुड गयी थी , जिसे देखकर वे लोग कुछ शांति का अनुभव कर रहे थे , पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। बिटिया रानी एक वर्ष की भी नहीं होगी कि एक रात दुकान से घर लौटते वक्‍त किसी के द्वारा अपने मालिक पर चलायी गयी गोली का शिकार वह बन गया था और तत्‍काल घटनास्‍थल पर ही उसने दम तोड दिया था। भले ही अपनी जान देकर मालिक को बचाकर उसने नमक की कीमत चुका दी हो , पर माता के दूध की कीमत न चुका सका था। उसके माता पिता एक बार फिर अपनी विधवा बहू और अनाथ पोती को अपने अंतहीन आंसुओं के साथ संभालने को मजबूर थे। जहां छोटी मोटी समस्‍या में हम सब इतने परेशान हो जाते हैं , उन्‍होने जीवनभर इतनी तकलीफ कैसे झेली होगी और आगे भी झेलने को बाध्‍य हैं !!

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

मेरी भविष्‍यवाणी में जगह का अंतर , थोडी देर , तीव्रता में कमी क्‍या हुई .. विरोधियों के तो बल्‍ले बल्‍ले ही हो गए !!










मेरे ब्‍लॉग को नियमित तौर पर पढनेवाले पाठक इस बात से अवश्‍य परिचित हो गए होंगे कि मैं ज्‍योतिष के सैद्धांतिक आलेख नहीं लिखा करती। जहां एक ओर ज्‍योतिष में समाहित अवैज्ञानिक तथ्‍यों का भी मैं रहस्‍योद्घाटन करती हूं , वहीं ज्‍योतिष के वैज्ञानिक स्‍वरूप के व्‍यवहारिक प्रयोग की भी चर्चा करती हूं। ज्‍योतिष पर लोगों का विश्‍वास बनाने के लिए मैं हमेशा तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणियां किया करती हूं , जिसमें तुक्‍का का कोई सवाल ही नहीं उठता। सटीक हुई भविष्‍यवाणियां मेरे सिद्धांत की प्रामाणिकता को स्‍पष्‍ट करते हुए मेरे आत्‍म विश्‍वास में जितनी बढोत्‍तरी करती है , गलत होने वाली भविष्‍यवाणियां भी उस सिद्धांत में अपवाद को ढूंढकर मेरे 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को और सटीक बनाती है। इसलिए भविष्‍यवाणियों के सही और गलत होने से मेरे आत्‍म विश्‍वास पर कोई अंतर नहीं पडता , किसी भी विज्ञान में अपवाद न हो , तो फिर उसका विकास ही रूक जाएगा। 

3 और 4 फरवरी की ग्रहस्थिति के कारण भारत में उपस्थित होनेवाली परिस्थितियों , चाहे वो मौसम का हो , राजनीति का हो या फिर शेयर बाजार का , मैने जो भी आकलन किया था , परिस्थितियां वैसी नहीं बन सकी । यह जहां ज्‍योतिष प्रेमियों के लिए आहत वाली खबर होगी , विरोधियों के तो बल्‍ले बल्‍ले ही हो गए। वैसे जहां तक मेरा मानना है , मेरी भविष्‍यवाणियों के सटीक होने पर कई बार ज्‍योतिष प्रेमी खुश होते हैं , तो कभी कभार विरोधियों को भी खुश होने की थोडी जगह तो मिलनी ही चाहिए। शेयर बाजार और राजनीतिक उथल पुथल के बारे में मेरी भविष्‍यवाणियां यदा कदा गलत हुई हैं , इसलिए सिद्धांतों की सटीकता पर कुछ संदेह बना हुआ है। 

पर मौसम के मामलों में ऐसा पहली बार हुआ है , इससे यही समझा जा सका है कि शायद अपवाद का जो कारक हो , वह बहुत वर्षों बाद इस वर्ष आया हो। अपवाद का कारण अभी तक भी समझ में नहीं आया , इसकी खोज जारी है। हालांकि छत्‍तीसगढ से कल रात से ही मौसम बिगडने की सूंचना ब्‍लॉग पर प्रकाशित की गयी है , पर यदि उसका प्रभाव एक दो दिन में उत्‍तरी भारत के अधिकांश हिस्‍सों पर पड जाता है , तब ही मैं अपनी भविष्‍यवाणी को सटीक समझूंगी , अन्‍यथा मैं उसे सटीक बनाने के प्रयास में ही लगी रहूंगी। अभी भी मुझे ग्रहों के प्रभाव पर विश्‍वास है , मौसम को प्रभावित करने वाले ग्रह स्थिति के आधार पर 2010 के पूरे वर्षभर के मौसम का खाका खींचते हुए एक आलेख का वादा मैने पाठकों से किया था , जिसे कुछ ही दिनों में अवश्‍य प्रेषित करूंगी। एक भविष्‍यवाणी के गलत होने से मैं कैसे मान लूं कि ग्रहों का प्रभाव मौसम पर नहीं पडता !


मुझे तो मालूम था ही कि मेरी गलती के कारण ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता पर सवाल उठाए जाएंगे। ज्‍योतिष की यही तो विडंबना है, सटीकता पर कोई पीठ थपथपाए या नहीं, गल्‍ती पर ध्‍यानाकर्षण स्‍वाभाविक है और यही ज्‍योतिष जैसे दैवी ज्ञान के पतन का कारण भी, अब ढाई वर्षो में तीन बार विरोधियों को ऐसा मौका मिला है। सब समय समय की बात होती है , 16 जनवरी को मेरे द्वारा दी गयी तिथि को भूकम्‍प के आ जाने से वे लोग उलूल जुलूल तर्क दे रहे थे और मैं आत्‍मविश्‍वास से भरी हुई थी। आज उनका आत्‍म विश्‍वास बढा हुआ है और मैं जो भी जबाब दूंगी, वह उलूल जुलूल तर्क होगा, बेहतर होगा कि चुप ही रहा जाए।


वैसे कोई भी क्षेत्र अपवाद से अछूता नहीं, अंतरिक्ष विज्ञान भी कल्‍पना चावला जी की मौत का जिम्‍मेदार है। प्रतिदिन डॉक्‍टर के द्वारा हजारों मरीजों के जान बचाए जा रहे हैं तो उन्‍हीं के द्वारा लापरवाही या अज्ञानता के कारण कुछ मौत के मुंह में भी ढकेले जा रहे हैं। विज्ञान के विकास से जितना सुख सुविधा मनुष्‍यों को मिली है , उससे कम ह्रास भी नहीं हुआ है। यहां तक कि ग्रहों के खराब रहने से बडे से बडे क्रिकेटर फॉर्म में नहीं होते, इतिहास की पुस्‍तकों में बडे से बडे राजाओं पर भी ग्रहों का प्रभाव देखा गया है ,  'महाभारत' भी गवाह है‍ कि अर्जुन जैसे पराक्रमी धनुर्धारी को एक आदिवासी भील से पराजित होना पडा था, जो प्रमाणित करता है कि समय बडा बलवान होता है। 


वैसे इस पोस्‍ट के लिखने और प्रकाशित होने तक बहुत जगहों पर आंधी और बारिश की खबर आ चुकी है , हां मेरे हिसाब से इस योग की तीव्रता जितनी होनी चाहिए थी , अभी तक नहीं दिखाई पडी है , वैसे अभी भी 4 फरवरी को पूरा होने में 6 घंटे बाकी है और इतने कम साधनों के मध्‍य एक दो दिन के एरर की छूट मुझे मिलनी चाहिए, विभिन्‍न हिस्‍सों में आंधी पानी के ये रहे सबूत ...
http://lalitdotcom.blogspot.com/2010/02/3-4.html
http://navbharattimes.indiatimes.com/delhiarticleshow/5511670.cms
http://www.bhaskar.com/2010/01/13/100113145501_188297.html
http://www.bhaskar.com/2010/01/24/100124034555_coldwave.html
http://www.bhaskar.com/2010/02/04/100204120602_249694.html
http://www.bhaskar.com/2010/02/04/100204015734_252326.html


बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

एक मजदूर के घर में कैसे बनी खीर ??

एक मजदूर के घर में कई दिनों से घर में खीर बनाने का कार्यक्रम बन रहा था , पर किसी न किसी मजबूरी से वे लोग खीर नहीं बना पा रहे थे। बडा सा परिवार , आवश्‍यक आवश्‍यकताओं को पूरी करना जरूरी था , खीर बनाने के लिए आवश्‍यक दूध और चीनी दोनो महंगे हो गये थे। बहुत कोशिश करने के बाद कई दिनों बाद उन्‍होने आखिरकार खीर बना ही ली। खीर खाकर पूरा परिवार संतुष्‍ट था , उसकी पत्‍नी आकर हमारे बरामदे पर बैठी। आज पूरे परिवार ने मन भर खीर खाया था , यहां तक कि उसके घर आनेवाले दो मेहमानों को भी खीर खिलाकर विदा किया था।

हमारे घरवालों को आश्‍चर्य हुआ , कितना खीर बनाया इनलोगों ने ?
पूछने पर मालूम हुआ कि उनके घर में एक किलो चावल का खीर बना था।
यह हमारे लिए और ताज्‍जुब की बात थी , दूध कितना पडा होगा ?
मालूम हुआ .. 1 किलो।
अब हमारी उत्‍सुकता बढनी ही थी ..चावल गला कैसे ?
उसमें दो किलो पानी डाला गया।
अब इतनी मात्रा में खीर बनें तो चीनी तो पर्याप्‍त मात्रा में पडनी ही है , पूछने का कोई सवाल नहीं !!

इस बात से आपको हंसी तो नहीं आ रही, जरूर आ रही होगी
पर सोंचिए यदि हमने उस मजदूर को उसकी मजदूरी के पूरे पैसे दिए होते ,
तो वह ऐसी खीर तो न खाता  !
इस प्रकार जैसे तैसे जीवनयापन करने को तो बाध्‍य नहीं होता !
इसी प्रकार धीरे धीरे उसका जीवन स्‍तर गिरता गया होगा और हम अपने स्‍तर पर नाज कर रहे हैं !
क्‍या स्‍वीकार करने की हिम्‍मत है आपको ??




आज का दिन शेयर बाजार के लिए सर्वाधिक बुरा रह सकता है !!

अगस्‍त 2007 के बाद शेयर बाजार पर ग्रहों के पडने वाले प्रभाव के विश्‍लेषण के बाद अपने अनुभवों के आधार पर नवम्‍बर 2008 के बाद से ही मैं ग्रहों की सप्‍ताह भर की स्थिति को देखते हुए शेयर बाजार की साप्‍ताहिक स्थिति का आकलन करते हुए  मोल तोल के लिए साप्‍ताहिक कॉलम लिखती आ रही हूं। इस आकलन में कितने प्रतिशत की सत्‍यता रहती है , ये तो मेरे नियमित पाठक ही बता सकते हैं , पर यह बात अवश्‍य है कि अत्‍यधिक काम की भीड के कारण होनेवाले समयाभाव में कभी कभार कॉलम लिखना बंद भी हो जाता है। जनवरी 2010 में भी पहले सप्‍ताह आलेख लिखने के बाद अभी तक यह बंद ही रहा है।

27 दिसंबर 2009 को मोल तोल में प्रकाशित किए गए आलेख में मैने लिखा था .......
इस प्रकार वर्ष 2009 आर्थिक मामलों में एक यादगार वर्ष बन गया है। मंदी का भय भी वर्ष के समाप्‍त होते होते खत्‍म हुआ। नौकरियों में फिर से रौनक आ गई है। यहां तक कि अप्रैल में किसी तिथि को कुछ अस्‍थाई ग्रहीय योगों को देखकर मैं थोडी सशंकित भी रही, उनमें से भी बहुत जगह मुझे निराश नहीं होना पडा और दिसंबर तक मैने कहीं भी ग्रहों को कमजोर देखते हुए शेयर बाजार के बारे में बडी निराशाजनक भविष्‍यवाणी नहीं की थी। और उसी के अनुरूप पूरे वर्ष तेजी का बाजार निवेशकों को काफी लुभाता रहा है। अभी भी बाजार में जितने संकेत दिख रहे हैं, उनमें सकारात्मक बातें ही ज्यादा हैं। यहां तक कि तकनीकी रूप से छोटी अवधि के लिए ज्यादातर संकेतक मौजूदा तेजी कायम रहने का इशारा कर रहे हैं, लेकिन मुझे जनवरी 2010 में ऐसा नहीं दिखाई दे रहा। जनवरी 2010 में बाजार की स्थिति थोडी अनिश्चितता की बनेगी और इसकी शुरूआत अगले सप्‍ताह से ही आरंभ हो सकती है।


फिर उसके बाद मोल तोल के लिए आलेख लिखने का मुझे मौका न मिल सका। पर जनवरी के अंत तक की बात क्‍या करूं , कल 2 फरवरी के शेयर बाजार की भी 27 दिसंबर 2009 की शेयर बाजार की स्थिति से तुलना की जाए , तो उसकी स्थिति सचमुच ही बहुत ही कमजोर दिखाई पड रही है। इस दृष्टि से आज यानि 3 फरवरी का दिन शेयर बाजार के लिए सर्वाधिक कमजोर दिखता है। इसलिए सेंसेक्‍स और निफ्टी में आज सबसे बडी गिरावट की संभावना दिखती है। 4 फरवरी को भी बाजार सामान्‍य तौर पर कुछ कमजोर भी रह सकता है , पर उसके बाद तेजी की संभावना बनेगी, क्‍यूंकि आनेवाले समय में ग्रहों के आधार पर शेयर बाजार में बडे स्‍तर की गडबडी नहीं दिखती है। इसलिए निवेशकों को अधिक घबडाने की आवश्‍यकता नहीं है।