कुछ बच्‍चे 300 से ऊपर नंबर लाएंगे .. कुछ बच्‍चों के नंबर निगेटिव भी होंगे .. आखिर क्‍यूं ??

April 13, 2010
इधर काफी व्‍यस्‍तता चल रही है , एक खास काम में मेरा ध्‍यान संकेन्‍द्रण बना हुआ है , ऐसे में लिख पाना तो संभव नहीं ,  इसके बावजूद ब्‍लॉग जगत से दूरी नहीं बन पाती। दो चार घंटों में एक बार एग्रीगेटरों को खोलकर अपने रूचि के विषयों पर निगाह डाल ही लेती हूं, ज्‍योतिष से संबंधित पोस्‍टों का तो मेरी निगाहों से बचना मुश्किल ही होता है। हिंदी ब्‍लॉग जगत में इधर तीन चार दिनों से ज्‍योतिष पर कुछ चर्चा हो रही है। जहां मेरी भविष्‍यवाणियों के सच होने से मेरे और ज्‍योतिष के शुभचिंतक इसके पक्ष में लिखने को मजबूर हो जाते हैं , ठीक उसी प्रकार मेरी भविष्‍यवाणियों के गलत होने पर मेरे और ज्‍योतिष के विरोधी ज्‍योतिष के विपक्ष में लिखना स्‍वाभाविक है। अभी अभी यानि पिछले सप्‍ताह बारिश से संबंधित मेरा आकलन गलत सिद्ध हुआ है। मैने 29 मार्च की अपनी पोस्‍ट में लिखा था कि 6 अप्रैल तक भयंकर गर्मी पडने के बाद 7 अप्रैल को चतुर्दिक बारिश होने का योग है। 6 अप्रैल तक गर्मी बढी , पर उसके बाद के सप्‍ताह में बारिश नहीं हुई , उक्‍त महाशय का पूछना स्‍वाभाविक है कि यदि ज्‍योतिष विज्ञान है तो यह आकलन गलत क्‍यूं सिद्ध हुआ ? 

पिछले वर्ष जब जून के अंत अंत तक गर्मी से हाहाकार मचा हुआ था , तो मैने 29 जून से 4 जुलाई तक बारिश होने का आकलन किया था। जो भी मेरे पुराने पाठक होंगे और जो ज्‍योतिष के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त न होंगे , उन्‍हे बिल्‍कुल याद होगा कि 29 जून को ही अचानक बादल उमडने घुमडने लगे थे और यत्र तत्र बारिश होने लगी थी और मुझे बधाई भी मिलने लगे थे , इसे पुरानी पोस्‍टों में देखा जा सकता है। हां , एक विरोधी पाठक ने मुझे अवश्‍य टिप्‍पणी की थी कि ग्रहों की वजह से बारिश नहीं हुई है , तापमान 42 या 43 डिग्री पर पहुंचने के बाद बारिश होनी ही थी। आज उक्‍त पाठक से मैं पूछना चाहती हूं कि पारे के 44 डिग्री तक पहुंचने के बाद भी आज तक बारिश क्‍यूं नहीं हो रही है ??

उक्‍त पोस्‍ट में मैने बारिश के योग होने के बावजूद लिख दिया था कि 29 जून के बाद देश के अधिकांश हिस्‍सों में किसानों के लिए सुखदायक स्थिति बन जानी चाहिए। बारिश का क्रम बढता हुआ 3-4 जुलाई तक काफी जोरदार रूप ले लेगा । और यदि ऐसा हुआ तो फिर जुलाई के तीसरे सप्‍ताह तक लगभग निरंतर बारिश होती रहेगी। और यदि मेरी यह भविष्‍यवाणी गलत हुई , जिसकी संभावना भी कुछ हद तक है , तो इस वर्ष स्थिति के भयंकर होने से इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिए सब मिलकर ईश्‍वर से प्रार्थना करें कि 29 जून से 4 जुलाई तक जोर शोर की बारिश हो।

इस बात पर एक सज्‍जन ने टिप्‍पणी की कि मैं दोनो हाथ में लड्डू रखा करती हूं । इसपर मैने अलग से एक पोस्‍ट लिखकर समझाया था कि पिछली पोस्‍ट में यह लिखा जाना कि 29 जून से 5 जुलाई के मध्‍य बारिश का महत्‍वपूर्ण योग है , बारिश होनी चाहिए , पर फिर भी यदि बारिश्‍ा नहीं हो तो स्थिति भयावह होगी ही , यह कहना वैसे ही सही है , जैसे दो दिनों तक पैरासेटामोल और एंटीबायटिक खिलाने के बाद पूरी उम्‍मीद के बावजूद भी मरीज का बुखार न उतरे तो स्थिति की भयावहता को समझते हुए डाक्‍टर कई प्रकार के टेस्‍ट लिखते है। इसका यह मतलब नहीं कि पैरासेटामोल और एंटीबायटिक का कोई असर ही नहीं है।

पर लोगों के खुश होने के बावजूद पिछले वर्ष भी योग के हिसाब से बारिश नहीं होने से मैं परेशान थी और उसके बाद के एक पोस्‍ट 'चिंता की जाए या चिंतन किया जाए' में लिखा था कि‍ जहां तक हमारा मानना है , इतने बडे रूप में ग्रहों का प्रभाव पडने के पीछे मानवीय भूलों के फलरूवरूप पृथ्‍वी के स्‍वरूप में हुआ परिवर्तन ही है । आज पानी की कमी से सारे भारतवर्ष में हाहाकार मचा हुआ है , पीने के पानी की इतनी किल्‍लत हो गयी है , तो फसलों और सब्जियों के लिए पानी कहां से आए , इनकी कमी से कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है । यदि हम जल्‍द ही अपनी भूलों को सुधारने के लिए चिंतन नहीं करें , तो आनेवाले समय में प्रकृति की ओर से हमें इससे भी बडी सजा झेलने को मजबूर होना पडेगा।

पर सांकेतिक तौर पर इतनी भविष्‍यवाणियों के सही होने के बावजूद दुराग्रह रखनेवाले विरोधियों को ज्‍योतिष पर विश्‍वास दिलाना आसान नहीं। एक बीमार व्‍यक्ति डॉक्‍टर के पास गया , दो चार दिन या सप्‍ताह भर दवाइयां खायी , ठीक न होने पर ओझा के यहां झाडफूंक के लिए चल दिया। मैंने उसे मना किया , तो उसने कहा कि आज के डॉक्‍टर सिर्फ पैसे लूटने को ही हैं , बीमारी ठीक नहीं करते। कुछ ही दिनों में उसकी बीमारी ठीक भी हो गयी, आकर उसने मुझे रिपोर्ट दी कि झाडफूंक से वह ठीक हो गया है। मैंने उसे अज्ञानी और अंधविश्‍वासी कहकर समझाने की कोशिश की, तो मेरे समझाने पर उसने कहा कि यदि वह डॉक्‍टर है , तो उसकी दवा से मैं इतने दिनों में ठीक क्‍यूं नहीं हुआ ? मैं लाख समझाती रही कि एक डॉक्‍टर किसी खास प्रक्रिया के अनुसार ही इलाज करता है। तुम्‍हें वहां ठीक होने के लिए दुबारा और तिबारा भी जाना चाहिए था , लेकिन उसके कानों में जूं भी नहीं रेंगी , क्‍यूंकि वह अज्ञानी है। 

जब इतने दिनों से इतने प्रतिभाशालियों द्वारा रिसर्च  और हर देश की सरकार के अरबों रूपए खर्च किए जानेवाले एलोपैथी किसी अज्ञानी के लिए बेकार हो सकती है , तो फिर हजारो वर्षों से उपेक्षित ज्‍योतिष को न जाननेवाला इसे बेकार क्‍यूं नहीं कह सकता ? ज्‍योतिष के प्रति दुराग्रह का कारण भी लोगों की अज्ञानता है , सारी परेशानी की जड यही है कि ज्‍योतिषी को भगवान बना दिया जाना, उसकी भूल को स्‍वीकार न किया जाना। भविष्‍यवाणी सही हुई तो तुक्‍का बना देते हैं और गलत हुई तो शोर मचा देते हैं कि ज्‍योतिष अंधविश्‍वास है , उसके सिवा कुछ भी नहीं। एक ही जन्‍मकुंडली के लिए विभिन्‍न ज्‍योतिषियों द्वारा की गयी भविष्‍यवाणियों की विविधता को ज्‍योतिष की अवैज्ञानिकता की सबसे बडी वजह मानी जाती है। माना जाता है कि विज्ञान में निष्‍कर्ष एक ही होता है।

परसों यानि 11 अप्रैल को आई आई टी की प्रवेश परीक्षा हुई , मात्र 5000 सीटों के लिए न जाने कितने किशारों ने इसकी परीक्षा दी। कल प्रश्‍न पत्र का सोल्‍यूशन भी इंटरनेट में आ गया है , सभी बच्‍चों ने अपने अपने जबाबों को चेक किया, सबको अलग अलग नंबर प्राप्‍त हो रहे हैं ,गणित , रसायन और भौतिकी तो ज्‍योतिष की तरह अंधविश्‍वास नहीं , यह पूर्ण रूप से विज्ञान साबित किया जा चुका विषय हैं , सभी प्रतिभाशाली बच्‍चों ने इस परीक्षा को पास करने के लिए कोचिंग की है , सबों ने पूरी तन्‍मयता से दो वर्षों तक प्रैक्टिस भी किया है , तो हर बच्‍चों के हर प्रश्‍न के जबाब तो एक जैसे होने चाहिए थे । पर जहां कुछ बच्‍चे 300 से ऊपर नंबर लाएंगे , वहीं कुछ बच्‍चों के नंबर निगेटिव भी होंगे , वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कोई व्‍यक्ति मुझे समझाएं , आखिर ऐसा क्‍यूं होता है ??


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28 Komentar
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"उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि..."

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सही कहा आपने...

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जहाँ तक अंक लाने कि बात है तो वो तो हर परीक्षार्थी के द्वारा दिए गए उत्तरों पर ही निर्भर है...

आपसे एक बात यहाँ पूछना छह रही हूँ...कल के समाचार पत्र में एक लेख था कि आज कल बच्चों को जन्म देने के लिए मुहर्त निकलवाया जाने लगा है...जिसको ऑपरेशन से डिलीवरी बताई जाती है वो तो ज्योतिषियों से समय ले कर वही समय डॉक्टर को बताते हैं....क्या ऐसा करना चाहिए ? इसकी कितनी उपयोगिता होती है? आप इस विषय पर कोई पोस्ट बना कर भी बता सकती हैं...या फिर मेरा मेल ID पर भी...

sangeetaswarup@gmail.com

thanks

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"जहां कुछ बच्‍चे 300 से ऊपर नंबर लाएंगे , वहीं कुछ बच्‍चों के नंबर निगेटिव भी होंगे , वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कोई व्‍यक्ति मुझे समझाएं , आखिर ऐसा क्‍यूं होता है ??"

अलग-अलग स्कूल के दस बच्चों से गाय के ऊपर निबंध लिखने को कहें. क्या सभी के निबंध अक्षरशः होंगे?
हो सकते हैं पर उसी सूरत में जब उन्होंने एक ही किताब से रट्टा लगाया हो.

आप जिस परिकल्पना को लेकर चल रही हैं वह आज जंची नहीं.

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@संगीता स्‍वरूप जी,
ज्‍योतिषियों के भरोसे कोई काम करने से पहले उसकी योग्‍यता तो देखी ही जानी चाहिए।
@निशांत मिश्र जी,
आप लोगों का मत ... एक ही जन्‍मकुंडली के लिए विभिन्‍न ज्‍योतिषियों द्वारा की गयी भविष्‍यवाणियों की विविधता को ज्‍योतिष की अवैज्ञानिकता की सबसे बडी वजह मानी जाती है। माना जाता है कि विज्ञान में निष्‍कर्ष एक ही होता है।

इसपर मैने लिखा .... गणित , रसायन और भौतिकी तो ज्‍योतिष की तरह अंधविश्‍वास नहीं , यह पूर्ण रूप से विज्ञान साबित किया जा चुका विषय हैं , सभी प्रतिभाशाली बच्‍चों ने इस परीक्षा को पास करने के लिए कोचिंग की है , सबों ने पूरी तन्‍मयता से दो वर्षों तक प्रैक्टिस भी किया है , तो हर बच्‍चों के हर प्रश्‍न के जबाब तो एक जैसे होने चाहिए थे । पर जहां कुछ बच्‍चे 300 से ऊपर नंबर लाएंगे , वहीं कुछ बच्‍चों के नंबर निगेटिव भी होंगे , वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कोई व्‍यक्ति मुझे समझाएं , आखिर ऐसा क्‍यूं होता है ??

मेरा प्रश्‍न बिल्‍कुल सामान्‍य है ... बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट।

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अच्छी जानकारी के लिये धन्यवाद .....


मैं जब कभी उदास होता हूं, विदेशियों के इस तरह के बयान सुनकर तेज हंसी आती है. जैसे कोई बच्चा बेतुकी बातें कर सबका मनोरंजन कर रहा हो

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@निशांत जी,
परसों की परीक्षा के सारे सवाल विज्ञान और गणित पर आधारित वस्‍तुनिष्‍ठ प्रश्‍न हैं .. विवरणात्‍मक निबंध नहीं कि हर विद्यार्थी को अलग अलग नंबर मिले !!

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एक सवाल तुम करो एक सवाल मैं करून, हर सवाल का जवाब ही सवाल हो....

संगीताजी नमस्कार,
चूंकि मैं धावक हूँ तो आपसे एक प्रश्न है, क्या मैराथन दौड़ने वाले धावकों की जन्म कुण्डलियाँ देखकर बताया जा सकता है कि बहुत महत्वपूर्ण बोस्टन मैराथन इस बार कौन जीतेगा ? बोस्टन मैराथन अगले मंगलवार को है...

क्या कीनिया और इथियोपिया मैं पैदा होने वाले धावकों का मैराथन में अच्छा प्रदर्शन करना गत्यात्मक ज्योतिष से समझाया जा सकता है?
दूसरा, हमारी जन्मपत्री देखकर बताएं कि हम ५ किमी की दौड़ कभी १७ मिनट में पूरी कर पायेंगे या नहीं? अभी इसे पूरा करने में हमें लगभग १९ मिनट लगते हैं, अगर हमारे गृह कहे कि कभी १७ मिनट में नहीं दौड़ पायेंगे तो मेहनत करके पसीना भी क्यों बहायें...
हर बड़ी मैराथन में लगभग २०००० लोग दौड़ते हैं और केवल १०-२० लोग ही उसे २ घंटा १० मिनट के अन्दर पूरा कर पाते हैं, इसका आई आई टी वाले प्रश्न से कोई संयोग बनता है क्या?

आभार,
नीरज रोहिल्ला.

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@नीरज रोहिल्‍ला जी,
बाकी बातें बाद में .. इस पोस्‍ट के लिखने का उद्देश्‍य मात्र एक है .. जब विज्ञान के नियमों के अनुसार परिणाम एक आने चाहिए .. तो इसपर आधारित वस्‍तुनिष्‍ठ प्रश्‍नों के जबाब में विद्यार्थियों के नंबर में अंतर क्‍यूं ??

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जहां तक मैं समझता हूं कुछ बच्‍चे 300 से ऊपर नंबर लाएंगे .. कुछ बच्‍चों के नंबर निगेटिव इसलिये होंगे क्योंकि सब की दिमाग की शक्ति अलग है। यह बहुत कुछ उनके जीन्स् और उनके बड़े होने के तरीके पर निर्भर है। यह इस पर भी निर्भर है कि उस दिन उनका पेपर कैसा हुआ। मेरे विचार से इसका ग्रहों के योग से कोई संबन्ध नहीं हैं।

हां ज्योतिष का का मनोवैज्ञानिक असर हो सकता है।

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क्या कहा जाय?अब आगे की तारीखों पर देखते है.

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संगीता जी नमस्कार,

इसका सीधा जवाब है कि कुछ बच्चों ने विषयवस्तु को समझा है, कुछ ने नहीं समझा है, कुछ ने कम समझा है...

कुछ समय के दवाब में अपने कैलकुलेटर पर गलत बटन दबा गये होंगे, कुछ मार्क करते समय गलत स्थान पर गोला बना गये होंगे...
होने को तो ये भी होता है कि इतनी मेहनत के बाद भी कुछ बच्चे गलत जगह अपना नाम, रोल नम्बर लिख आते हैं।

ये खूब तर्क है आपका कि सभी बच्चों ने दो साल मेहनत की है तो सभी की तैयारी एक जैसी। वाह क्या खूब.....

आभार,
नीरज

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उन्‍मुक्‍त जी .. मैं भी नहीं कह रही हूं कि ग्रहों के योग से इसका कोई संबंध है .. मैं इस बात को मानती हूं कि .. ग्रह मनुष्‍य की मात्र चारित्रिक विशेषताओं और परिस्थितियों के उतार चढाव को संचालित करते हैं .. मेहनत कभी भी बेकार नहीं जाता .. इस लेख के द्वारा मैं यह पूछना चाहती हूं कि जब विज्ञान के निष्‍कर्ष एक होते हैं .. तो विद्यार्थी गलत जबाब क्‍यूं देते हैं ??

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नीरज रोहिल्‍ला जी,
अब आप ही बताएं .. दनिया भर के सभी ज्‍योतिषियों का निष्‍कर्ष अलग क्‍यूं नहीं हो सकते .. साधनहीनता के कारण अभी तक उन्‍हें यह भी पता नहीं कि .. ज्‍योतिष के किस सिद्धांत को माना जाना चाहिए .. और किसे नहीं !!

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संगीताजी नमस्कार,

बिल्कुल सही,

लेकिन ये जिद भी नहीं होनी चाहिये कि जो जवाब हम दे रहे हैं वो सही है या फ़िर ऐसा कि हम असल में विषयवस्तु को समझ गये हैं।

बिना विज्ञान की जानकारी वाले को आई आई टी के इम्तिहान मैं बैठा दो और उसे कहो कि प्रशन पढकर अपने हिसाब से गोले बना आओ तो इसकी सम्भावना है कि उसके अंक उस विद्यार्थी से ज्यादा आ जायें जिसने वाकई कई साल विज्ञान पढने का प्रयास किया है और वास्तव में जिस विद्यार्थी को विज्ञान की विषयवस्तु का ज्ञान उस गोले बनाने वाले छात्र से अधिक है, लेकिन इससे कुछ भी साबित नहीं होता।

आपका उदाहरण उस निषकर्ष के अनुकूल नहीं है जिस निष्कर्ष की तरफ़ आप चर्चा को मोडना चाह रही हैं।

इतनी जिद तो वो बच्चे भी नहीं करते जो फ़ेल हो जाते हैं, शान्ति से मान लेते हैं कि हमी गलत जवाब लिखकर आ गये होंगे। या कभी कभी मास्टर साहब ने जानकर फ़ेल कर दिया होगा।


नीरज...

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नीरज जी,
लगता है .. मैं आज के लेख में अपने मंतब्‍य को साफ नहीं कर पायी .. कल प्‍वाइंट के साथ पूरी बात को रखूंगी .. आप कल मेरा आलेख जरूर देखें .. दरअसल ज्‍योतिष को बहुत ही गलत ढंग से परिभाषित किया गया है .. सारी गलतफहमी की जड यही है .. मैं कोई जिद नहीं किया करती .. लोग एक ज्‍योतिषी की गल्‍ती नहीं स्‍वीकार कर पाते .. यही कारण है कि इतने दिनों के ब्‍लॉग लेखन के बाद भी मैं लोगों के पूर्वाग्रह को समाप्‍त नहीं कर पा रही हूं !!

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संगीता जी, यह किसने कह दिया की विज्ञान के समस्त निष्कर्ष एक (या अंतिम) होते हैं? आप विज्ञानं का इतिहास उठाकर देख लें तो पाएंगी कि पिछले कुछ सौ सालों में ही बुद्धिमान जनों ने अपनी धारणाओं और संकल्पनाओं को बारम्बार जांचकर उन्हें कई बार बदला है! विज्ञान के जो नियम या निष्कर्ष आज अटल माने जाते हैं वे कल गलत सिद्ध हो सकते हैं लेकिन उन्हें लेकर कोई 'अंतिम किताब' जैसा पूर्वाग्रह नहीं पालता. हो सकता है कल को प्रकाश की गति, अनिश्चितता का सिद्धांत, ऊर्जा या द्रव्यमान संरक्षण का नियम गलत सिद्ध हो जाये. इससे यह सिद्ध नहीं होगा कि पहले के लोग गलत विज्ञान पढ़ा गए.

आप बाकी बातें छोड़ दें और मुझे केवल यह बताएं कि एक ही नगर में एक ही अस्पताल में एक ही समय पर जन्म लेने वाले बच्चों के भविष्य के एक जैसा होने की संभावना कितनी है. कृपया यह न कहें कि कुछ ही सेकंडों में ही ग्रह नक्षत्र बदल जाते हैं. किसी बड़े शहर में एक ही समय में कई बच्चे होने की सम्भावना बहुत अधिक है और कुण्डली बनाते वक़्त हम मूलतः किसी नगर की स्तिथि की ही गणना करते हैं, उसके किसी अस्पताल की स्तिथि की नहीं.

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इस पूरी दुनिया में किसी भी दो व्‍यक्ति का भविष्‍य एक जैसा नहीं होता ..उनकी प्रवृत्तियां और जीवनभर की परिस्थितियां एक जैसी होती हैं .. इसे पढें ।
http://sangeetapuri.blogspot.com/2008/10/blog-post_19.html

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निशांत जी,
मैं एक युग की और एक सिलेबस में पढाए जाने वाले विज्ञान के नियमों की बात कर रही हूं .. विज्ञान के इतिहास की नहीं .. आप आज बारंबार बिना पढे समझे टिप्‍पणियां कर रहे हैं !!

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"इस पूरी दुनिया में किसी भी दो व्‍यक्ति का भविष्‍य एक जैसा नहीं होता ..उनकी प्रवृत्तियां और जीवनभर की परिस्थितियां एक जैसी होती हैं ."

माफ़ करिए संगीता जी, शायद मुझमें समझ की कुछ कमी है जो मैं आपकी पोस्ट समझ नहीं पा रहा हूँ. अब देखिये न, आपका ऊपर कहा हुआ वाक्य समझने के चक्कर में आपकी बताई पोस्ट तक हो आया लेकिन कुछ समझ न पाया. क्या आप दो-तीन वाक्यों में यहीं समझा सकतीं हैं कि 'उनकी प्रवृत्तियां और जीवनभर की परिस्थितियां एक जैसी होती हैं' से आपका क्या मतलब है.

प्रवृत्तियां मतलब मानव स्वभाव और इसकी शक्तियां और कमजोरियां.
परिस्थतियाँ मतलब... जैसे वे दोनों गरीब घर में पलेंगे या उन्हें उच्च शिक्षा नहीं मिल पायेगी... क्या आपका मंतव्य यही है?

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प्रवृत्तियों को तो आपने सही समझा .. जीवनभर की परिस्थितियां का अर्थ उसके जीवनभर के विभिन्‍न संदर्भों के सुख दुख और जीवन में आनेवाले उतार चढाव से हैं .. उस पोस्‍ट में तो उदाहरण देते हुए स्‍पष्‍टत: समझाया गया है .. पता नहीं आप कैसे नहीं समझ सके ..

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आज की यह पोस्‍ट अस्‍पष्‍ट है।

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