19 मई 2012

अगले सप्‍ताह से पुन: प्रति रविवार 11 से 1 बजे तक फोन की सुविधा जारी रहेगी .. संगीता पुरी

पिछले लेख में मैने लिखा था कि अर्थप्रधान युग में भविष्‍य के प्रति आशंका से अंधविश्‍वास और बढता जा रहा है। अंधविश्‍वास का मूल कारण अज्ञानता है , आग , वर्षा, बाढ , बिजली, रोग, भूकंप, चंद्रग्रहण , सूर्यग्रहण आदि घटनाओं के बारे में पर्याप्‍त जानकारी न होने से आदिम मानव के मध्‍य इन्‍हें लेकर अंधविश्‍वास था। पर जैसे जैसे रहस्‍यों का पर्दाफाश होता गया , अंधविश्‍वास समाप्‍त होता गया। प्रकृति के रहस्‍यों की जानकारी के बाद बहुत सारे अंधविश्‍वास समाप्‍त होते चले गए , यदि आज समाज में कुछ अंधविश्‍वास प्रचलित हैं , तो इसकी वजह कुछ ऐसे रहस्‍य हैं , जिनका पता विज्ञान नहीं लगा सका है।

 1981 से अबतक पच्‍चीस तीस हजार जन्‍मकुंडलियों के विश्‍लेषण के बाद ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का दावा है कि समय समय पर आनेवाली मनुष्‍य की हर अच्‍छी भली परिस्थिति के पीछे उसके जन्‍मकालीन और गोचर के ग्रहों का हाथ होता है और इसे समझा और समझाया जा सकता है। जन्‍म के ग्रहों से उनके जीवन में आनेवाली विभिन्‍न संदर्भों की परिस्थितियों और उनके जीवन के उतार चढाव की जानकारी देने के लिए मैने नि:शुल्‍क सेवा शुरू की है , कोई भी व्‍यक्ति अपना जन्‍म विवरण (नाम , जन्‍म तिथि , जन्‍म समय और जन्‍म स्‍थान ) हमें मो नं +919835192280 पर एस एम एस कर सकता है , एक मोबाइल नं से एक ही डिटेल्‍स भेजे जा सकते हैं , ईमेल से भेजे जाने वाले विवरणों का जबाब नहीं दिया जाएगा।

जो विवरण भेजे जा चुके हैं , उनके बारे में प्रत्‍येक रविवार को हमारे यहां से दिन 11 बजे से 1 बजे के मध्‍य इसी फोन पर जानकारी ली जा सकती है , हम प्रकृति से प्राप्‍त सुख दुख के संदर्भों और उसकी जीवन यात्रा के बारे में उन्‍हें जानकारी देने की कोशिश करेंगे। जबाब देते हुए लिखने की तुलना में मौखिक तौर पर बताना आसान है , इसलिए कई सप्‍ताह से बहुत सारे पाठकों को उनके ही बारे में  जानकारी उन्‍हें दी जा रही है। पर ध्‍यान से मेरे लेख को न पढने के कारण कुछ लोग मेरी बात को समझ नहीं पा रहे हैं। वे रविवार को 11 बजे से 1 बजे के मध्‍य वे SMS करते हैं और बाकी दिन मुझे परेशान ।

जब से मैने नि:शुल्‍क ज्‍योतिषीय जानकारी देने की शुरूआत की है , प्रतिदिन दस बीस SMS मेरे पास पहुंच रहे हैं , जिन्‍हें मैं अपने सॉफ्टवेयर में सेव कर देती हूं और रविवार 11 बजे से 1 बजे के मध्‍य कंप्‍यूटर में सॉफ्टवेयर को खोलकर बैठ जाती हूं , इस दौरान फोन करने वाले सभी लोगों को उनके जबाब मिल जाते हैं। पर अधिकांश पाठक उस दिन फोन न करके दूसरे दिनों में भी परेशान करते हैं। पाठक यदि यह उम्‍मीद रखें कि मैं प्रतिदिन उनकी ही सेवा में व्‍यस्‍त रहूं तो यह संभव नहीं है। अभी तक चार छह घंटे मुझे सॉफ्टवेयर को और अच्‍छी तरह विकसित करने में देने पड रहे हैं। इसके अलावे पुस्‍तकों का लेखन संपादन का भी काम चल रहा है।

आज सभी पाठकों को यह जानकारी देना चाहूंगी कि आनेवाले सप्‍ताह में रविवार से  मंगलवार मैं शहर से बाहर रहूंगी , इस कारण उन्‍हें फोन पर जबाब दे पाना संभव नहीं है। जिन्‍होने अभी तक अपने जन्‍म विवारण भेजे हैं , वे बुधवार यानि 23 मई को ही अब फोन करें , समय वहीं रहेगा 11 बजे से 1 बजे के मध्‍य । बाकी दिनों में फोन करने से कोई फायदा नहीं। अगले सप्‍ताह से पुन: प्रति रविवार 11 से 1 बजे तक फोन की सुविधा जारी रहेगी ..

9 मई 2012

बोलने और लिखने में सरल सार्थक नाम अधिक उचित है !!

किसी खास तरह की ग्रहस्थिति का प्राचीन ऋषि महर्षियों ने पृथ्‍वी पर कुछ खास प्रभाव देखा , तो उसे सही ढंग से समझने के लिए पूरी ताकत लगा दी और उसका ही परिणाम है कि एक सुव्‍यवस्थित ज्ञान के रूप में ज्‍योतिष शास्‍त्र विकसित हो सका। चंद्रमा के किसी खास नक्षत्र और उनके विभिन्‍न चरणों में जन्‍म लेने वाले जातकों के स्‍वभाव पर पूरा रिसर्च करने के लिए उन्‍होने जातको के नाम खास अक्षर से रखने की परंपरा शुरू की , ताकि जन्‍म विवरण या जन्‍मकुंडली नहीं होने पर भी उनके चरित्र के बारे में कुछ समझा जा सके। प्राचीन काल में हर गांव के पंडितों को इतनी जानकारी होती ही थी कि वे पंचांग से बच्‍चों की जन्‍मकुंडली बना सके और नक्षत्र के आधार पर उनका नामकरण कर सकें। उस नाम से ही जातक के चारित्रिक विशेषताओं को समझने में मदद मिलती थी, इसलिए नाम का महत्‍व माना गया।

भारतीय संस्कृति में 16 संस्कारों में नामकरण संस्कार का कम महत्‍व नहीं होता था। विधि विधान से नामकरण करने की परंपरा का ज्‍योतिषीय आधार हुआ करता था। किसी शुभ मुहूर्त्‍त में नामकरण जन्म के 11 से 27 दिन के अंदर किया जाता था। शिशु के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में संचरण करता है, वह राशि जन्म राशि कहलाती है और इस राशि में आने वाले नामाक्षर पर उसका नाम रखा जाता है। अक्षर विशेष में नाम रखने के लिए कुल 27 नक्षत्रों के चार चार चरण किए गए हैं। इनमें जिस चरण में जन्म होता है, उसी अक्षर विशेष पर नाम रखा जाता है। उदाहरण के लिए बालक का जन्म अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में हुआ है तो बालक का नामाक्षर चू होगा। अश्विनी नक्षत्र में चार अक्षर चू, चे, चो और ला अक्षर होते हैं। नाम कम अक्षरों वालों होना अधिक उचित होता है। पुत्र का नाम सम व पुत्री का नाम विषम संख्या में रखा जाता है।

जब पंडितो के द्वारा नाम रखे जाने की परंपरा समाप्‍त हुई या जन्‍मकुंडली तक ही सीमित रह गयी , तब भी बहुत दिनों तक नाम दिन, महीने , तिथि , पक्ष, प्रहर या कभी कभी उनकी शारिरीक या पारिवारिक स्थिति के हिसाब से रखा जाता रहा , पर फिर भी लोगों के दिलोदिमाग में नाम का महत्‍व बना रहा और बच्‍चों में चारित्रिक विशेषताओं को बनाए रखने के लिए सुंदर और सार्थक नाम रखने की परंपरा शुरू हुई। आज तो बच्‍चे का सटीक नाम रखने के लिए अभिभावक काफी माथापच्‍ची करते हैं।पुराने बहुत से नामों को तो लोगों ने ओल्ड फैशन बनाकर साइड लाइन कर दिया है, आज हर कोई अपने बच्चे को नाम से एक अलग पहचान देना चाह रहा है। कुछ समय से लडकियों के नाम में अनन्या, नेहा, शगुन, भव्या, आस्था, अदिति, रिया, खुशी, अणिता, अन्या, अनुष्का, परी, दिया, नव्या, काव्या आदि बहुतायत में रखे जा रहे हैं , तो लडकों में प्रतीक, पीयूष, हर्षित, यश, शुभम, आर्यन, कृष्णा, अर्णव, सांई, आरुष, इशान, नील, ओम, विहान, आयुष, अभिनव, वैदांत, विवान, शौर्य आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से नाम रखने में जातक की जन्‍मकुंडली को ध्‍यान में रखने की आवश्‍यकता नहीं, बच्‍चे का पुकारने का या वास्‍तविक नाम कुछ भी हो सकता है , पर बोलने और लिखने में सरल सार्थक नाम अधिक उचित है।

बच्‍चों के नाम चुनकर रखने की समस्‍या बहुत ही बडी है , इसका हल कई वेबसाइटों में मिल सकता है ....
www.indif.com
www.bachpan.com
www.pitarau.com
www. hinduchildnames.com
www.babynamenetwork.com
www.whereincity.com
www.hindubabynames.net
www.indianhindunames.com
www.hindunames.net
www.babynamesindia.com

6 मई 2012

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर सूपरमून ... बडा और चमकीला होगा आज का चांद !!


खगोलीय घटनाओं और दृश्‍यों में रूचि रखने वाले लोगों के लिए 5 और 6 मई की रात कुछ खास है , क्योंकि इस वक्‍त चांद पूरे वर्ष के हिसाब से सबसे चमकीला और बड़ा नजर आएगा। ऐसे संयोग पूर्णिमा के दिन ही बनते हैं और चूंकि चांद धरती के सबसे निकट होगा , इसलिए अपनी कक्षा में घूमते हुए चांद पहले की अपेक्षा पृथ्वी से अधिक निकट वाले बिंदु पर पहुंचेगा। इस घटनाक्रम को 'सुपरमून' कहा जाता है और इस साल ऐसा बुद्घ पुर्णिमा के अवसर पर हो रहा. छह मई को सूर्योदय से कुछ मिनट पहले चंद्रमा पश्चिमी क्षितिज पर डूबेगा और उसी शाम सूर्यास्त के एक घंटे के बाद पूर्वी क्षितिज पर उसका उदय होगा।

इस वर्ष नवंबर की 28 तारीख को पूर्णिमा के दिन चांद धरती से सबसे दूर रहेगा और दोनों की बीच की दूरी 4,06,349 रहेगी, जबकि अभी पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी घटकर 3,56,955 किलोमीटर होगी विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूर्णिमा को चांद औसत से 14 फीसदी अधिक चमकीला नजर आएगा। चांद के ज्यादा चमकीला होने के कारण गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ेगा और इसका समुद्र के ज्वार भाटे पर अधिक असर पड़ेगा। अब तक के सबसे बड़े और बेहद चमकीले चांद का किसी भी रूप में प्राकृतिक आपदा से कोई सम्बंध नहीं है। लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ने से समुद्र में ज्वार-भाटा की ऊंची लहरें उठ सकती हैं और उस पर चमकीले चांद की रोशनी अद्भुत दृश्य बना सकती है।

कल से ही इस मनोहारी दृश्य को निहारने को लोगों में उत्सुकता रही। तमाम लोग चांद के दर्शन के लिए आंगन , बाहर या छतों पर निकल गये। देर रात तक उसका लुत्फ उठाया। शनिवार दोपहर 12.52 बजे से पूर्णिमा लग गयी, जो रविवार को दोपहर प्रात: 9.05 बजे तक रहेगी। चंद्रमा तुला राशि में होने और दिन में भी पूर्णिमा लगने की वजह से चंद्रमा का आकार बढ़ता गया । दिन में पूर्णिमा शुरू होने के बाद रात नौ बजे तक चांद पूर्ण आकार में पहुंच गया। धीरे-धीरे उसका प्रभाव कम होता गया। तांत्रिकों के हिसाब से इस रात को मंत्र साधना लाभदायक रहती

अन्‍य खगोलीय स्थिति की तरह इस चंद्र का प्रभाव पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडेगा , इस संभावना से तो हम इंकार नहीं कर सकते , पर सामान्‍य तौर पर यह सुखद स्थिति के ही होने का संकेत दे रहा है। पर इससे वृष और मिथुन राशि वाले अधिक अच्‍छे ढंग से प्रभावित होंगे। अक्‍तूबर नवंबर में जन्‍म लेनेवालों पर भी इसका अच्‍छा प्रभाव देखा जा सकती है। इसलिए प्रकृति की इस गतिविधि से  चिंतित होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है , लुत्‍फ उठाइए इसका।