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चन्द्र दोष के उपाय

 

चन्द्र दोष के उपाय

गत्यात्मक ज्योतिष के रिसर्च के बाद 'हमलोग जब भी ग्रहों के प्रभाव और ज्‍योतिष की चर्चा करते हैं , आम लोगों की जिज्ञासा किन्‍ही अन्‍य बातों में न होकर ग्रहों के दुष्‍प्रभाव को दूर करने के उपायों, खासकर चंद्र दोष के उपाय को जानने की ही होती है। इस विषय पर हमने 'क्‍या भवितब्‍यता टाली जा सकती है ?' शीर्षक से 11 आलेखों की एक पूरी शृंखला ही तैयार की है , जिसमें स्‍पष्‍ट किया गया है कि प्रकृति के नियमों को समझना ही बहुत बडा ज्ञान है , उपचारों का विकास तो इसपर विश्‍वास होने या इस क्षेत्र में बहुत अधिक अनुसंधान करने के बाद ही हो सकता है। अभी तो परंपरागत ज्ञानों की तरह ही ज्‍योतिष के द्वारा ग्रहों के प्रभाव के तरीके को जानकर अपना बचाव कर पाने में हमें बहुत सहायता मिल सकती है। लेकिन फिर भी ज्‍योतिषियों द्वारा लालच दिखाए जाने पर लोग उनके चक्‍कर में पडकर अपने धन का कुछ नुकसान कर ही लेते हैं।



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ग्रहों के अनुसार हो या फिर पूर्वजन्‍म के कर्मों के अनुसार, जिस स्‍तर में हमने जन्‍म लिया , जिस स्‍तर का हमें वातावरण मिला,  उस स्‍तर में रहने में अधिक परेशानी नहीं होती। पर कभी कभी अपनी जीवनयात्रा में अचानक ग्रहों के अच्‍छे या बुरे प्रभाव देखने को मिल जाते हैं , जहां ग्रहों का अच्‍छा प्रभाव हमारी सुख और सफलता को बढाता हुआ हमारे मनोबल को बढाता है , वहीं ग्रहों का बुरा प्रभाव हमें दुख और असफलता देते हुए हमारे मनोबल को घटाने में भी सक्षम होता है। 

वास्‍तव में , जिस तरह अच्‍छे ग्रहों के प्रभाव से जितना अच्‍छा नहीं हो पाता , उससे अधिक हमारे आत्‍मविश्‍वास में वृद्धि होती है , ठीक उसी तरह बुरे ग्रहों के प्रभाव से हमारी स्थिति जितनी बिगडती नहीं , उतना अधिक हम मानसिक तौर पर निराश हो जाया करते हैं। ज्‍योतिष के अनुसार हमारी मन:स्थिति को प्रभावित करने में चंद्रमा का बहुत बडा हाथ होता है। धातु में चंद्रमा का सर्वाधिक प्रभाव चांदी पर पडता है। यही कारण है कि बालारिष्‍ट रोगों से बचाने के लिए जातक को चांदी का चंद्रमा पहनाए जाने की परंपरा रही है। बडे होने के बाद भी हम चांदी के छल्‍ले को धारण कर अपने मनोबल को बढा सकते हैं।

चंद्रमा पूर्णिमा के दिन अपनी पूरी शक्ति में

आसमान में चंद्रमा की घटती बढती स्थिति से चंद्रमा की ज्‍योतिषीय प्रभाव डालने की शक्ति में घट बढ होती रहती है। अमावस्‍या के दिन बिल्‍कुल कमजोर रहने वाला चंद्रमा पूर्णिमा के दिन अपनी पूरी शक्ति में आ जाता है। आप दो चार महीने तक चंद्रमा के अनुसार अपनी मन:स्थिति को अच्‍छी तरह गौर करें , पूर्णिमा और अमावस्‍या के वक्‍त आपको अवश्‍य अंतर दिखाई देगा। पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय के वक्‍त यानि सूर्यास्‍त के वक्‍त चंद्रमा का पृथ्‍वी पर सर्वाधिक अच्‍छा प्रभाव देखा जाता है। 

इस लग्‍न में दो घंटे के अंदर चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक छल्‍ला तैयार कर उसी वक्‍त उसे पहना जाए तो उस छल्‍ले में चंद्रमा की सकारात्‍मक शक्ति का पूरा प्रभाव पडेगा , जिससे व्‍यक्ति के मनोवैज्ञानिक क्षमता में वृद्धि होगी। इससे उसके चिंतन मनन पर भी सकारात्‍मक प्रभाव पडता है। यही कारण है कि लगभग सभी व्‍यक्ति को पूर्णिमा के दिन चंद्रमा के उदय के वक्‍त तैयार किए गए चंद्रमा के छल्‍ले को पहनना चाहिए।

पूर्णिमा की अंगूठी 

वैसे तो किसी भी पूर्णिमा को ऐसी अंगूठी तैयार की जा सकती है , पर विभिन्‍न राशि के लोगों को भिन्‍न भिन्‍न माह के पूर्णिमा के दिन ऐसी अंगूठी को तैयार करें। 15 मार्च से 15 अप्रैल के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को मेष राशिवाले , 15 अप्रैल से 15 मई के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को वृष राशिवाले , 15 मई से 15 जून के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को मिथुन राशिवाले , 15 जून से 15 जुलाई के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को कर्क राशिवाले , 15 जुलाई से 15 अगस्‍त के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को सिंह राशिवाले , 15 अगस्‍त से 15 सितम्‍बर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को कन्‍या राशिवाले , 15 सितम्‍बर से 15 अक्‍तूबर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को तुला राशिवाले , 15 अक्‍तूबर से 15 नवम्‍बर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को वृश्चिक राशिवाले , 15 नवम्‍बर से 15 दिसंबर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को धनु राशिवाले , 15 दिसंबर से 15 जनवरी के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को मकर राशिवाले , 15 जनवरी से 15 फरवरी के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को कुंभ राशिवाले तथा 15 फरवरी से 15 मार्च के मध्‍य आनेवाले पूर्णिमा को मीन राशिवाले अपनी अपनी अंगूठी बनवाकर पहनें , तो अधिक फायदेमंद होगा। इससे चन्द्र दोष के उपाय भी होते हैं।

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    समस्या का समाधान कैसे करें ? -1

     

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    हजारो वर्षों से विद्वानों द्वारा अध्ययन-मनन और चिंतन के फलस्वरुप मानव-मन-मस्तिष्‍क एवं अन्य जड़-चेतनों पर ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव के रहस्यों का खुलासा होता जा रहा है , किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने हेतु किए गए लगभग हर आयामों के उपाय में पूरी सफलता न मिल पाने से अक्सरहा मन में एक प्रश्न उपस्थित होता है,क्या भविष्‍य को बदला नहीं जा सकता ?  

    किसी व्‍यक्ति का भाग्यफल या आनेवाला समय अच्छा हो तो ज्योतिषियों के समक्ष उनका संतुष्‍ट होना स्वाभाविक है, परंतु आनेवाले समय में कुछ बुरा होने का संकेत हो तो उसे सुनते ही वे उसके निदान के लिए इच्छुक हो जाते हैं। हम ज्योतिषी अक्सर इसके लिए कुछ न कुछ उपाय सुझा ही देते हैं लेकिन हर वक्त बुरे समय को सुधारने में हमें सफलता नहीं मिल पाती है। उस समय हमारी स्थिति कैंसर या एड्स से पीड़ित किसी रोगी का इलाज कर रहे डॉक्टर की तरह होती है ,जिसने बीमारी के लक्षणों एवं कारणों का पता लगाना तो जान गया है परंतु बीमारी को ठीक करने का कोई उपाय न होने से विवश होकर आखिर प्रकृति की इच्छा के आगे नतमस्तक हो जाता है ।

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    ऐसी ही परिस्थितियों में हम यह मानने को मजबूर हो जाते हैं कि वास्तव में प्रकृति के नियम ही सर्वोपरि हैं। हमलोग पाषाण-युग, चक्र-युग, लौह-युग, कांस्य-युग, ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, से बढ़ते हुए आज आई टी युग में प्रवेश कर चुकें हैं, पर अभी भी हम कई दृष्टि से लाचार हैं। नई-नई असाध्य बीमारियॉ ,जनसंख्या-वृद्धि का संकट, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा ,कहीं भूकम्प तो कहीं ज्वालामुखी-विस्फोट--प्रकृति की कई गंभीर चुनौतियों से जूझ पाने में विश्व के अव्वल दर्जे के वैज्ञानिक भी असमर्थ होकर हार मान बैठे हैं। 

    यह सच है कि प्रकृति के इन रहस्यों को खुलासा कर हमारे सम्मुख लाने में इन वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिससे हमें अपना बचाव कर पाने में सुविधा होती है। प्रकृति के ही नियमो का सहारा लेकर कई उपयोगी औजारों को बनाकर भी हमने अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों का झंडा गाडा है , किन्तु वैज्ञानिकों ने किसी भी प्रकार प्रकृति के नियमों को बदलने में सफलता नहीं पायी है।

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    पृथ्वी पर मानव-जाति का अवतरण भी अन्य जीव-जंतुओं की तरह ही हुआ। प्रकृति ने जहॉ अन्य जीव-जंतुओं को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कुछ न कुछ शारिरिक विशेषताएं प्रदान की वहीं मनुष्‍य को मिली बौद्धिक विशेषताएं , जिसने इसे अन्य जीवों से बिल्कुल अलग कर दिया। बुद्धिमान मानव ने सभी जीव जंतुओं का निरिक्षण किया, उनकी कमजोरियों से फायदा उठाकर उन्हें वश में करना तथा खूबियों से लाभ लेना सीखा। जीव-जंतुओं के अध्ययन के क्रम में जीव-विज्ञान का विकास हुआ। प्राचीनकाल से अब तक के अनुभवों और प्रयोगों के आधार पर विभिन्न प्रकार के जीवों ,उनके कार्यकाल ,उनकी शरिरीक बनावट आदि का अध्ययन होता आ रहा है। 

    आज जब हमें सभी जीव-जंतुओं की विशेषताओं का ज्ञान हो चुका है , हम उनकी बनावट को बिल्कुल सहज ढंग से लेते हैं । कौए या चिड़ियां को उड़ते हुए देखकर हम बकरी या गाय को उड़ाने की भूल नहीं करतें। बकरी या गाय को दूध देते देखकर अन्य जीवों से यही आशा नहीं करते। बकरे से कुत्ते जैसी स्वामिभक्ति की उम्मीद नहीं करतें। घोड़े की तेज गति को देखकर बैल को तेज नहीं दौड़ाते। जलीय जीवों को तैरते देखकर अन्य जीवों को पानी में नहीं डालते। हाथी ,गधे और उंट की तरह अन्य जीवों का उपयोग बोझ ढोने के लिए नहीं करते।

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     इस वैज्ञानिक युग में पदार्पण के बावजूद अभी तक हमने प्रकृति के नियमों को नहीं बदला । न तो बाघ-शेर-चीता-तेदुआ-हाथी-भालू जैसे जंगली जानवरों का बल कम कर सकें , न भयंकर सर्पों के विष को खत्म करने में सफलता मिली , और न ही बीमारी पैदा करनेवाले किटाणुओं को जड़ से समाप्त किया। पर  अब जीन के अध्‍ययन में मिलती जा रही सफलता के बाद यह भी संभव हो सकता है कि किसी एक ही प्राणी को विकसित कर उससे हर प्रकार के काम लिया जा सके। पर इस प्रकार की सफलता के लिए हमें काफी समय तक विकास का नियमित क्रम तो रखना ही होगा। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!

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      समस्या का समाधान कैसे करें ? -2

       

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      जीव-जंतुओं के अतिरिक्त हमारे पूर्वजों ने पेड-पौधों का बारीकी से निरिक्षण किया। पेड़-पौधे की बनावट , उनके जीवनकाल और उसके विभिन्न अंगों की विशेषताओं का जैसे ही उसे अहसास हुआ, उन्होने जंगलो का उपयोग आरंभ किया। हर युग में वनस्पति-शास्त्र वनस्पति से जुड़े तथ्यो का खुलासा करता रहा ,जिसके अनुसार ही हमारे पूर्वजों ने उनका उपयोग करना सीखा। फल देनेवाले बड़े वृक्षों के लिए बगीचे लगाए जाने लगे। सब्जी देनेवाले पौधों को मौसम के अनुसार बारी-बारी से खाली जमीन पर लगाया जाने लगा। इमली जैसे खट्टे फलों का स्वाद बढ़ानेवाले व्यंजनों में इस्तेमाल होने लगा। मजबूत तने वाली लकड़ी फर्नीचर बनाने में उपयोगी रही। पुष्‍पों का प्रयोग इत्र बनाने में किया जाने लगा। कॉटेदार पौधें का उपयोग बाड़ लगाने में होने लगा। ईख के मीठे तनों से मीठास पायी जाने लगी। कडवे फलों का उपयोग बीमारी के इलाज में किया जाने लगा।

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      इसी तरह भूगर्भ में बिखरी धातुएं भी मानव की नजर से छुपी नहीं रहीं। प्रारंभ में लौह-अयस्क, ताम्र-अयस्क और सोने-चॉदी जैसे अयस्को को गलाकर शुद्ध रुप प्राप्त कर उनका उपयोग किया गया । भिन्‍न भिन्‍न धातुओं की प्रकृति के अनुरूप उनका उपयोग भिन्‍न भिन्‍न प्रकार के गहने और बर्तनों को बनाने में किया गया। फिर क्रमश: कई धातुओं को मिलाकर या कृत्रिम धातुओं को बनाकर उनका उपयोग भी किया जाने लगा। भूगर्भ के रहस्यों का खुलासा करने के लिए वैज्ञानिकों के द्वारा कितने साधन भी बनाए जा चुके , ध्येय भूगर्भ के आंतरिक संरचना की पहचान करना है, उसमें किसी प्रकार के बदलाव की कल्पना भी वैज्ञानिकों द्वारा नहीं की जा सकती ।

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      इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति में तरह-तरह के जीव-जंतु , पेड़-पौधे और खनिज-भंडार भरे पड़े हैं। गुण और स्वभाव की दृष्टि से देखा जाए , तो कुदरत की हर वस्तु का अलग-अलग महत्व है। बड़े फलदार वृक्ष दस-बीस वर्षों तक अच्छी तरह देखभाल करने के बाद ही फल देने लायक होते हैं। कुछ फलदार वृक्ष दो-तीन वर्षों में ही फल देना आरंभ कर देते हैं। सब्जियों के पौधे दो-चार माह में ही पूंजी और मेहनत दोनों को वापस लौटा देते हैं। फर्नीचर बनाने वाले पौधों में फल नहीं होता , इनकी लकड़ी ही काम लायक होती है। वर्षों बाद ही इन वृक्षों से लाभ हो पाता है। यदि हमें समुचित जानकारी नहीं हो और टमाटर के पौधों को चार-पॉच महीने बाद ही फल देते देखकर उपेक्षित दृष्टि से आम के पेड़ को देखें या आम के सुंदर पेड को देखकर बबूल को खरी-खोटी सुनाएं , तो यह हमारी भूल होगी।

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      आर्थिक दृष्टि से देखा जाए , तो कभी लोहे का महत्व अधिक होता है , तो कभी सोने का , कभी पेट्रोलियम का महत्व अधिक होता है , तो कभी अभ्रख का। कभी घोड़े-हाथी राजा-महाराजाओं द्वारा पाले जाते थे , जबकि आज घोडे हाथी दर दर की ठोकरें खा रहे हैं और चुने हुए नस्लों के कुत्तों का प्रचलन अच्‍छे घरानों में है। कभी आम के पेड़ से अधिक पैसे मिलते थे , कभी शीशम से और आज टीक के पेड़ विशेष महत्व पा रहे हैं। युग की दृष्टि से किसी वस्तु का विशेष महत्व हो जाने से हम पाय: उसी वस्तु की आकांक्षा कर बैठते हैं , तो क्या अन्य वस्तुओं को लुप्त होने दिया जाए। आज टीक सर्वाधिक पैसे देनेवाला पेड़ बन गया है , तो क्या आम का महत्व कम है ? आखिर आम का स्वाद तो आम का पेड़ ही तो दे सकता है। वर्षों से उपेक्षित पड़े देश पेट्रोलियम के निर्यात करने के क्रम में आज भले ही विश्व के अमीर देशों में शामिल हो गए हों , पर अन्य वस्तुओं के लिए उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना ही पड़ता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !

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        समस्या का समाधान कैसे करें ? -3

         

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        फिर हमारे पूर्वजों की नजरें आसमान तक भी पहुंच ही गयी। अगणित तारें, चंद्रमा, सूर्य , राशि ,नक्षत्र ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,भला इनके शोध क्षेत्र में कैसे शामिल न होते। ब्रह्मांड के रहस्यों का खुलासा करने में मानव को असाधारण सफलता भी मिली और इन प्राकृतिक नियमों के अनुसार उन्होने अपने कार्यक्रमों को निर्धारित भी किया। पृथ्वी अपनी घूर्णन 24 घंटे में पूरी करती है इस कारण 24 घंटे की घड़ी बनायी गयी। चंद्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करने में 28 दिन लगते हैं इसलिए चंद्रमास 28 दिनों का निश्चित किया गया। 365 दिनों में पृथ्वी अपने परिभ्रमण-पथ पर पूरी घूम जाती है , इसलिए 365 दिनों के एक वर्ष का कैलेण्डर बनाया गया। 6 घंटे के अंतर को हर चौथे वर्ष लीप ईयर मनाकर समायोजित किया गया। 

        दिन और रात , पूर्णिमा और अमावस्या , मौसम परिवर्तन ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सब प्रकृति के नियमों के अनुसार होते हैं इसकी जानकारी से न सिर्फ समय पर फसलों के उत्‍पादन में ही , वरन् हमें अपना बचाव करने में भी काफी सुविधा होती है। अधिक गर्मी पड़नेवाले स्थानों में ग्रीष्‍मऋतु में प्रात: विद्यालय चलाकर या गर्मियों की लम्बी छुटि्टयॉ देकर चिलचिलाती लू से बच्चों का बचाव किया जाता है। बरसात के दिनों में बाढ की वजह से रास्ता बंद हो जानेवाले स्थानों में बरसात में छुटि्टयॉ दे दी जाती हैं ।

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        ग्रह-नक्षत्रों की किसी खास स्थिति में पृथ्वी के जड़-चेतनों पर पड़नेवाले खास प्रभाव को महसूस करने के बाद ही `फलित ज्योतिष´ जैसे विषय का विकास किया गया होगा। परंतु शायद कुछ प्रामाणिक नियमों के न बन पाने से , भविष्‍यवाणियों के सटीक न हो पाने से या वैज्ञानिक सोंच रखनेवालों का ज्योतिष के प्रति दुराग्रह के कारण ही आधुनिक वैज्ञानिक युग में ज्योतिष का अच्छा विकास नहीं हो पाया। किन्तु वर्षों की साधना के बाद हम `गत्यात्मक ज्योतिष´ द्वारा सटीक भविष्‍यवाणियॉ करने में सफल हो रहे हैं। हमने पाया है कि विभिन्न जंतुओं और पेड़-पौधों में यह बात होती है कि उनके बीज से ही उन्हीं के गुण और स्वभाव वाले पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं का जन्म होता है , पर मनुष्‍य के बच्चे शारीरिक और आंतरिक संरचना में भले ही अपने माता-पिता से मिलते जुलते हों , परंतु उनकी मन और बुद्धि के काम करने के ढंग में विभिन्नता होती है। 

        जन्म के समय ही हर बच्चे में समानता नहीं देखी जाती है। कोई शरीर से मजबूत होता है , तो कोई कमजोर। किसी में रोग-प्रतिरोधक-क्षमता की प्रचुरता होती है , तो किसी में इसकी अल्पता। कोई दिमाग से तेज होते हैं , तो कोई कमजोर। पालन-पोषण के समय में भी बच्चे का वातावरण भिन्न-भिन्न होता है। बहुत बच्चों को भरपूर प्यार मिल पाता है ,जिससे उनका मनोवैज्ञानिक विकास अच्छी तरह हो पाता है। पूरे जीवन वे मनमौजी और चंचल हो जाते है , अपनी इच्छा पूरी करने में बेसब्री का परिचय देते है। अपनी बातें बेबाक ढंग से रख पाने में सफल होते है। 

        बहुत बच्चे प्यार की कमी महसूस करते हैं , जिससे इनका मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है। पूरी जिंदगी वे अपनी इच्छाओं को दबाने की प्रवृत्ति रखते हैं। उनके जन्मकालीन ग्रहों के प्रभाव से ही पूरी जिंदगी उनके सामने अलग-अलग तरह की परिस्थितियॉ आती हैं। जन्मकालीन ग्रहों के प्रभाव से ही किसी की रुचि व्यवसाय में , किसी की पढ़ाई में , किसी की कला में और किसी की राजनीति में होती है। किसी का ध्यान अपने शरीर को मजबूती प्रदान करने का होता है , तो किसी का कोष को बढ़ाने का , किसी का ध्यान संपत्ति की स्थिति को मजबूत बनाने का होता है , तो किसी का ध्यान अपनी घर गृहस्थी और संतान को मजबूती देने का।

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        ग्रहों के कारण आनेवाली कई समस्‍याओं के निराकरण कर पाने की दिशा में भी हमने काफी प्रयास किया है , हालॉकि विपरीत परिस्थितियों को पूर्ण रुप से सुधार न पाने का हमें अफसोस भी बना रहता है। लेकिन हम यह सोंचकर संतुष्‍ट हो जाते हैं कि प्रकृति के नियमों को बदल पाना इतना आसान नहीं । हो सकता है कुछ वर्षों में प्रकृति के किसी अन्य रहस्य को समझने के बाद हम बुरे ग्रहों के प्रभाव से पूर्णतया मुक्त हो सकें। पर अभी भी इस रहस्य का खुलासा कि अमुक ग्रह स्थिति में जन्म लेनेवालों की जीवन-यात्रा अमुक ढंग की होगी , निस्संदेह आज की बहुत बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है। 

        जिन्होनें भी इस धरती पर जन्म ले लिया है या लेनेवाले हैं ,उन्हें तो गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार उपस्थित होनेवाली परिस्थितियों के अनुसार जीवन जीना ही होगा ,परंतु यदि उन्हें अपने जीवन में आनेवाले सुखों और दुखों का पहले से ही अनुमान हो जाए तो वे तदनुरुप अपने कार्यक्रम बना सकते हैं । आनेवाले हर वर्ष या महीने के ग्रह स्थिति को जानकर अपने कार्य को अंजाम दे सकते हैं। यदि ग्रहो की स्थिति उनके पक्ष में हो तो वे हर प्रकार के कार्य को अंजाम देंगे।

        यदि ग्रहों की स्थिति उनके पक्ष में नहीं हो तो वे किसी प्रकार का रिस्क नहीं लेंगे। इस प्रकार वे अपने जीवनग्राफ के अच्छे समय के समुचित उपयोग द्वारा विशेष सफलता हासिल कर सकते हैं , जबकि बुरे समय में वे प्रतिरोधात्मक ढंग से जीवन व्यतीत कर सकते हैं । भविष्‍य में उत्पन्न होनेवाले बच्चों के लिए गत्यात्मक ज्योतिष वरदान हो सकता है। क्‍यूंकि विशेष मुहूर्तों में बच्चे को जन्म देकर उसकी जीवन-यात्रा को काफी महत्वपूर्ण तो बनाया ही जा सकता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!

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          समस्या का समाधान कैसे करें ? - 4

           

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          युगों-युगों से मनुष्‍य अपने समक्ष उपस्थित होनेवाली समस्याओं के कारणों की जानकारी और उसके समाधान के लिए चिंतन-मनन करता रहा है। मानव-मन के चिंतन मनन के फलस्वरुप ही नाना प्रकार के उपचारों के विवरण हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राकृतिक वनस्पतियों से ही सब प्रकार के रोगों का उपचार संभव है , उनकी पद्धति नेचरोपैथी कहलाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि जल ही जीवन है और इसके द्वारा ही सब प्रकार के रोगों का निदान संभव है। एक अलग वर्ग का मानना है कि विभिन्न प्रकार के योग और व्यायाम का भी मानव स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। 

          कुछ ऋषि-मुनियों का मानना है कि वातावरण को स्वास्थ्यवर्द्धक बनाने में समय-समय पर होनेवाले यज्ञ हवन की भी बड़ी भूमिका होती है। सतत् विकास के क्रम में इसी प्रकार आयुर्वेद , होम्योपैथी , एक्यूपंक्चर , एक्यूप्रेशर , एलोपैथी की भी खोज हुई। फलित ज्योतिष मानता है कि मनुष्‍य के समक्ष उपस्थित होनेवाली शरीरिक , मानसिक या अन्य प्रकार की कमजोरी का मुख्य कारण उसके जन्मकाल के किसी कमजोर ग्रह का प्रभाव है और उस ग्रह के प्रभाव को मानव पर पड़ने से रोककर ही उस समस्या को दूर किया जा सकता है। इसी क्रम में विभिन्न धातुओं और रत्नों द्वारा या तरह तरह के पूजा पाठ के द्वारा ग्रहों के प्रभाव को कम कर रोगों का इलाज करने की परंपरा की शुरुआत हुई।

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          पर इन सबसे अलग पिछले बीस वर्षों से `गत्यात्मक ज्योतिष` भी कमजोर ग्रहों से जातकों को बचाने के लिए प्रयत्नशील रहा है। `गत्यात्मक ज्योतिष` के अनुसार ग्रहों की तीन मुख्य स्थितियॉ होती हैं , जिसके कारण जातक के सामने शारीरिक , मानसिक , आर्थिक , पारिवारिक या अन्य किसी भी असामान्य परिस्थितियां उपस्थित होती हैं और उससे वह अच्‍छे या बुरे तौर पर प्रभावित हो सकता है ----

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          सभी वक्री ग्रह कमजोर होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित कमजोर तथा निराशाजनक वातावरण प्रदान करते हैं , दुखद फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

          2  सभी शीघ्री ग्रह मजबूत होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित मजबूती तथा उत्साहजनक वातावरण प्रदान करते हैं , सुखद फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

          3  सभी सामान्य ग्रह महत्वपूर्ण होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित स्तर तथा कार्य करने का वातावरण प्रदान करते हैं , स्तरीय फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

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          गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार ग्रहों के बुरे प्रभाव को परिवर्तित कर पाना यानि बुरे को अच्छे में तथा अच्छे को बुरे में बदल पाना कठिन ही नहीं असंभव है , किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए या अच्छे प्रभाव को और बढ़ा पाने के लिए निम्न सलाह दी जाती है --------------

          1   जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह शीघ्री होते हैं , उन्हें लगभग जीवनभर सारे संदर्भों की सुख-सुविधा आसानी से प्राप्त होती है , जिसके कारण वे थोड़े लापरवाह स्वभाव के हो जाते हैं , अपनी पहचान बनाने की इच्छा नहीं रखते हैं , इस कारण मेहनत से दूर भागते हैं। इस स्वभाव को कम करने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी पहननी चाहिए , जो उस दिन बनी हो , जब अधिकांश ग्रह सामान्य या मंद गति के हो।

          2  जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह सामान्य होते हैं , वे लगभग जीवनभर काफी महत्वाकांक्षी होते हैं , उन्हें अपनी पहचान बननने की दृढ़ इच्छा होती है , जिसके कारण ये सतत् प्रयत्नशील होते हैं , वैसे तो वर्तमान युग में ऐसे व्यक्तित्व का काफी महत्व है , किन्तु यदि ग्रह ऋणात्मक हो और फल प्राप्ति में कुछ विलम्ब की संभावना हो तो वे ऐसी अंगूठी पहनकर कुछ आराम कर सकते हैं , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।

          3  जिन जातकों के अधिकांश ग्रह वक्री हों , उन्हें लगभग जीवनभर काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है , निरंतर निराशाजनक परिस्थितियों में जीने के कारण वे काफी कुंठित हो जाते हैं। इन परिस्थितियों को कुछ सहज बनाने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी दी जा सकती है , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।

          ये अंगूठियॉ उस मुहूर्त्‍त में बनवायी जा सकती हैं , जब उन ग्रहों का शुभ प्रभाव पृथ्वी के उस स्थान पर पड़ रहा हो , जिस स्थान पर वह अंगूठी बनवायी जा रही हो। दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!

          गत्यात्मक ज्योतिष में ग्रहों के प्रभाव को दूर करने से सम्बंधित उपायों के बारे में प्रकाशित पुस्तक को पढ़ने के लिए अमेज़ॉन के किंडल में  इस लिंक पर क्लिक करें !

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            समस्या का समाधान कैसे करें ? - 5

             

            Jyotish Upay

            हम संगति के महत्व के बारे में हमेशा ही कुछ न कुछ पढ़ते आ रहें हैं। यहॉ तक कहा गया है -----` संगत से गुण होत हैं , संगत से गुण जात ´। गत्यात्मक ज्योतिष्‍ा भी संगति के महत्व को स्वीकार करता है। एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। 

            इस बात को एक उदाहरण की सहायता से अच्छी तरह समझाया जा सकता है। यदि एक बालक का जन्म अमावस्या के दिन हुआ हो , तो उन कमजोरियों के कारण , जिनका चंद्रमा स्वामी है ,बचपन में बालक का मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है और बच्चे का स्वभाव कुछ दब्बू किस्म का हो जाता है , उसकी इस स्थिति को ठीक करने के लिए बालक की संगति पर ध्यान देना होगा। 

            उसे उन बच्चों के साथ अधिकांश समय व्यतीत करना चाहिए , जिन बच्चों का जन्म पूर्णिमा के आसपास हुआ हो। उन बच्चों की उच्छृंखलता को देखकर उनके बाल मन का मनोवैज्ञानिक विकास भी कुछ अच्छा हो जाएगा। इसके विपरीत यदि उन्हें अमावस्या के निकट जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ ही रखा जाए तो बालक अधिक दब्बू किस्म का हो जाएगा। 

            इसी प्रकार अधिक उच्छृंखल बच्चों को अष्‍टमी के आसपास जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ रखकर उनके स्वभाव को संतुलित बनाया जा सकता है। इसी प्रकार व्‍यवसाय , विवाह या अन्‍य मामलों में अपने कमजोर ग्रहों के प्रभाव को कम करने या अपने कमजोर भावों की समस्‍याओं को कम करने के लिए सामनेवाले के यानि मित्रों या जीवनसाथी की जन्‍मकुंडली में उन ग्रहों या मुद्दों का मजबूत रहना अच्‍छा होता है।

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            इसके अलावे ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए हमारे धर्मशास्त्रों में हर तिथि पर्व पर स्नानादि के पश्चात् दान करने के बारे में बताया गया है।प्राचीनकाल से ही दान का अपना महत्व रहा है , परंतु दान किस प्रकार का किया जाना चाहिए , इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। दान के लिए शुद्ध द्रब्य का होना अनिवार्य है । दान के लिए सुपात्र वह व्यक्ति है , जो अनवरत किसी क्रियाकलाप में संलग्न होते हुए भी अभावग्रस्त है। 

            दुष्‍कर्म या पापकर्म करनेवाले या आलसी व्यक्ति को दान देना बहुत बड़ा पाप होता है । यदि दान के नाम पर आप ठगे जाते हैं , तो इसका पुण्य आपको नहीं मिलेगा। इसलिए दान का उचित फल प्राप्त करने के लिए आप दान करते या देते समय ध्यान रखें कि दान उस सुपात्र तक पहुंच सके , जहॉ इसका उचित उपयोग हो सके।ऐसे में आपको सर्वाधिक फल की प्राप्ति होगी।

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            साथ ही अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो , उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए। जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो अनाथाश्रम को दान करना चाहिए , खासकर 12 वर्ष से कम उम्र के अभावग्रस्त और जरुरतमंद बच्चों को दिए जानेवाले दान से उनका काफी भला होगा। जातक का बुध कमजोर हो तो उन्हें विद्यार्थियों को या किसी प्रकार के रिसर्च कार्य में लगे व्‍यक्ति को सहयोग देना चाहिए। जातक का मंगल कमजोर हो , तो उन्हें युवाओं की मदद और कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए। 

            जातक का शुक्र कमजोर हो तो उनके लिए कन्याओं के विवाह में सहयोग करना अच्छा रहेगा। सूर्य कमजोर हो तो प्राकृतिक आपदाओं में पड़नेवालों की मदद की जा सकती है। बृहस्पति कमजोर हो तो अपने माता पिता और गुरुजनों की सेवा से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शनि कमजोर हो तो वृद्धाश्रम को दान करें या अपने आसपास के जरुरतमंद अतिवृद्ध की जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करें। अगले लेख में पुन: इसके आगे का भाग पढें !! 

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            समस्या का समाधान कैसे करें ? - 6

             

            Colour astrology in hindi

            ज्योतिष में रंगों का महत्व - यह तथ्‍य सर्वविदित ही है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। जिन रंगों को वे अवशोषित करती हैं , वे हमें दिखाई नहीं देती , परंतु जिन रंगों को वे परावर्तित करती हैं , वे हमें दिखाई देती हैं। यदि ये नियम सही हैं तो चंद्र के द्वारा दूधिया सफेद , बुध के द्वारा हरे , मंगल के द्वारा लाल , शुक्र के द्वारा चमकीले सफेद , सूर्य के द्वारा तप्‍त लाल , बृहस्पति के द्वारा पीले और शनि के द्वारा काले रंग का परावर्तन भी एक सच्‍चाई होनी चाहिए।

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            पृथ्‍वी में हर वस्‍तु का अलग अलग रंग है , यानि ये भी अलग अलग रंगों को परावर्तित करती है । इस आधार पर सफेद रंग की वस्‍तुओं का चंद्र , हरे रंग की वस्‍तुओं का बुध , लाल रंग की वस्‍तुओं का मंगल , चमकीले सफेद रंग की वस्‍तुओं का शुक्र , तप्‍त लाल रंग की वस्‍तुओं का सूर्य , पीले रंग की वस्‍तुओं का बृहस्‍पति और काले रंग की वस्‍तुओं का श‍नि के साथ संबंध होने से इंकार नहीं किया जा सकता। शायद यही कारण है कि नवविवाहिता स्त्रियों को मंगल ग्रह के दुष्‍प्रभावों से बचाने के लिए लाल रंग को परावर्तित करने के लिए प्राय: लाल वस्त्र से सुशोभित करने तथा मॉग में लाल सिंदूर लगे की प्रथा है।

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            इसी कारण चंद्रमा के बुरे प्रभाव से बचने के लिए मोती , बुध के लिए पन्ना , मंगल के लिए मूंगा , शुक्र के लिए हीरा , सूर्य के लिए माणिक , बृहस्पति के लिए पुखराज और शनि के लिए नीलम पहनने की परंपरा समाज में बनायी गयी है। ये रत्न संबंधित ग्रहों की किरणों को उत्सर्जित कर देते हैं , जिसके कारण ये किरणें इन रत्नों के लिए तो प्रभावहीन होती ही हैं , साथ ही साथ इसको धारण करनेवालों के लिए भी प्रभावहीन बन जाती हैं। इसलिए रत्नों का प्रयोग सिर्फ बुरे ग्रहों के लिए ही किया जाना चाहिए , अच्छे ग्रहों के लिए नहीं। कभी-कभी पंडितों की समुचित जानकारी के अभाव के कारण ये रत्न जातक को अच्छे फल से भी वंचित कर देती है।

            ज्योतिष में रंगों का महत्व

            रंगों में अद्भूत प्रभाव होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि विभिन्न रंगों की बोतलों में रखा पानी सूर्य के प्रकाश में औषधि बन जाता है , जिसका उपयोग विभिन्न रोगों की चिकित्सा में किया जाता है। 'गत्यात्मक ज्योतिष' भी कमजोर ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए उससे संबंधित रंगों का अधिकाधिक प्रयोग करने की सलाह देता है। रत्न धारण के साथ साथ आप उसी रंग की प्रधानता के वस्त्र धारण कर सकते हैं । मकान के बाहरी दीवारों की पुताई करवा सकते हैं।

            Jyotish upay in hindi

            यदि व्यक्ति का जन्मकालीनचंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग का अधिक प्रयोग कर उन ग्रहों के प्रभाव को परावर्तित किया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे , मजबूत ग्रहों की किरणों का अधिकाधिक प्रभाव आपपर पड़े , इसके लिए उससे संबंधित रंगों का कम से कम प्रयोग होना चाहिए। इन रंगों की वस्तुओं का प्रयोग न कर आप दान करें , तो काफी फायदा हो सकता है। अगले लेख में पुन: इसके आगे का भाग पढें !!  

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              समस्या का समाधान कैसे करें ? - 7

              Jyotish Upay

              ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के उपायों की जो श्रृंखला चल रही है , उसे अंधविश्‍वास न समझा जाए , क्‍यूंकि हमलोग ग्रंथों को सिर्फ पढते ही नहीं , उसके सिद्धांतों की पूर्ण तौर पर परख करके गलत को गलत और सही को सही साबित करने के बाद लिखा करते हैं। अब यह हमारी विवशता ही है कि बंदूक की गोली की तरह न तो ग्रहों के प्रभाव को देखा और दिखाया जा सकता है , फिर उसके प्रभाव को रोकने के लिए किए गए उपायों को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास कोई साधन कैसे हो सकता हैं ? पहले के छह भागों को पढने के लिए यहां क्लिक करें , अब उसका आगे का यानि सातवां भाग पढे ...

               Vanaspati Vigyan

              प्राचीनकाल से ही पेड़-पौधें का मानव विकास के साथ गहरा संबंध रहा है। भारतीय ज्योतिष में रत्नधारण की ही तरह विभिन्न वनस्पतियों की जड़ों को भी धारण करने की भी परंपरा है। सूर्य की शांति के लिए बेल की जड़ , चंद्र के लिए खिन्नी की जड़ , मंगल के लिए अनंतमूल की जड़ , बुध के लिए विधारा की जड़ , गुरु के लिए संतरे या केले की जड़ , शुक्र के लिए सरफाकों की जड़ तथा शनि की शांति के लिए बिच्छुए की जड़ धारण करने की बात ज्‍योतिष के प्राचीन ग्रंथों में लिखी है। साथ ही रंगों के अनुसार ही विभिन्न पेड़-पौधें की पूजा या विभिन्न देवी देवताओं पर पुष्‍प अर्पण करने का भी विधान है। इससे साबित होता है कि हमारे ऋषि मुनियों को ग्रहों के दुष्‍प्रभाव को दूर करने के लिए पेड़-पौधों की भूमिका का भी पता था। अन्‍य बातों की तरह ही जब गंभीरतापूर्वक काफी दिनों तक ग्रहों के प्रभाव को दूर करने में पेड पौधों की भूमिका का भी परीक्षण किया गया तो निम्न बातें दृष्टिगोचर हुई --------------

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              1. यदि जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो उन्हें तुलसी या अन्‍य छोटे-छोटे औषधीय पौधे अपने अहाते में लगाकर उसमें प्रतिदिन पानी देना चाहिए।

              2. यदि जातक का बुध कमजोर हो तो उसे बिना फल फूलवाले या छोटे छोटे हरे फलवाले पौधे लगाने से लाभ पहुंच सकता है।

              3. इसी प्रकार जातक का मंगल कमजोर हो तो उन्हें लाल फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने  से लाभ होगा।

              4. इसी प्रकार जातक का शुक्र कमजोर हो तो उन्हें सफेद फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

              5. इसी प्रकार जातक का सूर्य कमजोर हो तो उन्हें तप्‍त लाल रंग के फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

              6. इसी प्रकार जातक का बृहस्पति कमजोर हो तो उन्हें पीले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

              7. इसी प्रकार जातक का शनि कमजोर हो तो उन्हें बिना फल-फूल वाले या काले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

              ध्यान रहे , ये सभी छोटे-बड़े पेड़-पौधे पूरब की दिशा में लगे हुए हों , इसके अतिरिक्‍त ग्रह के बुरे प्रभाव से बचने के लिए पश्चिमोत्‍तर दिशा में भी कुछ बड़े पेड़ लगाए जा सकते हैं , किन्तु अन्य सभी दिशाओं में आप शौकिया तौर पर कोई भी पेड़ पौधे लगा सकते हैं।

              उपरोक्त समाधानों के द्वारा जहॉ ग्रहों के बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है , वहीं अच्छे प्रभावों को बढा़ पाने में भी सफलता मिल सकती है।

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                समस्या का समाधान कैसे करें ? - 8

                  

                Jyotish Upay

                एक सप्‍ताह से मैं अपनी अप्रकाशित पुस्‍तक 'गत्‍यात्‍मक झरोखे से ज्‍योतिष' के एक लेख 'ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है' के हिस्‍से को प्रतिदिन पोस्‍ट करती जा रही थी। आपलोगों के द्वारा समय समय पर किए जानेवाले प्रश्‍न के जबाब में यह लेख लिखा गया था, पर आलोचना के भय से मैं इसे प्रकाशित करना नहीं चाहती थी। पर एक सप्‍ताह से पिताजी की बोकारो में उपस्थिति से मैं उनके साथ ज्‍योतिष से ही जुडे कई प्रकार के विमर्श में व्‍यस्‍त थी , नया कुछ न लिख पाने के कारण मैने इस पुराने आलेख को ही प्रतिदिन ठेलती गयी। 

                आज वे रांची के लिए निकल चुके हैं , तो मैं यह सफाई देना चाहती हूं कि इन आलेखों में लिखे गए सारे तथ्‍य सटीक हैं और ये सारे परीक्षण हमारे द्वारा किए जा चुके हैं, इसलिए किसी के द्वारा कहे जाने पर आपलोगों को गुमराह होने की आवश्‍यकता नहीं। मैं ऐसा एक भी वाक्‍य नहीं लिखती , जिसे उस समय तार्किक ढंग से समझाया नहीं जा सके , जब सभी लोगों को 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की जानकारी हो जाए , जो कि हमारा लक्ष्‍य है। इस आठवीं कडी को मैं आज लिख रही हूं , जिसे अपनी पुस्‍तक में जोडना होगा।

                jyotish ke achuk upay

                आलेखों की इस शृंखला को पढने के बाद एक पाठक का प्रश्‍न है कि पुराने जमाने में तो हमलोगों के लिए ये कोई उपाय नहीं किए गए , फिर हमलोगों पर ग्रहों का बुरा प्रभाव नहीं पडा , आज इसकी जरूरत क्‍यूं पड गयी। अभी हाल फिलहाल में मेरे यहां आए एक डॉक्‍टर ने भी मुझसे यही प्रश्‍न पूछा था। मैने डॉक्‍टर से पूछा कि क्‍या कारण है कि आपलोग गर्भवती स्‍त्री को इतने विटामीन लिखा करते हैं , कल तक गांव में अत्‍यंत निर्धन महिलाओं को छोडकर शायद किसी को भी ऐसी आवश्‍यकता नहीं पडती थी। 

                उन्‍होने कहा कि हमारे रहन सहन में आए फर्क के कारण ऐसा हो रहा है। गांव में औरतें पर्याप्‍त मात्रा में साग सब्जियां खाया करती थी , परंपरागत खाने की थालियों के बाद शरीर में किसी और चीज की जरूरत नहीं रह जाती है। पर आज कुछ व्‍यस्‍तता की वजह से , तो कुछ ताजी सब्जियों की अनुप्‍लब्‍धता के कारण महिलाओं में इसकी कमी हो जाया करती है। अर्थ यही है कि प्रकृति से आप जितनी ही दूरी बनाए रखेंगे , आपको कृत्रिम उपायों की आवश्‍यकता उतनी ही पडेगी।

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                मैने उन्‍हें समझाया कि ऐसी ही बात हर क्षेत्र में हैं , मेरी पूरी शृंखला को पढनेवाले ने पाया होगा कि सबसे पहले मैने शुभ मुहूर्त्‍त में बननेवाले अंगूठी यानि गहने की चर्चा की है। मुरारी पारीक जी ने पूछा भी कि हम यह कैसे पता करें कि अंगूठी शुभ मुहूर्त्‍त में बनी है। सचमुच हर बात में ज्‍योतिषीयों से राय लेना काफी कठिन है। इसी के लिए परंपरा बनायी गयी थी। जब आपके घर में कोई शुभ कार्य आराम से हो रहा हो , तो समझ जाएं कि आपके लिए ग्रहों की शुभ स्थिति बनी है। 

                संतान का जन्‍म खुशी खुशी हुआ , बच्‍च पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ है यानि ग्रह मनोनुकूल हैं , आप जन्‍मोत्‍सव की तैयारी करते हैं। इस समय सुनार को बुलाया गया , उसे ऑर्डर दिया गया , आपके शुभ समय में सोने या चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक वस्‍तु बनायी गयी , जिसे आपके गले , हाथ या पैर में धारण करवा दिया गया।यही नहीं अन्‍य लोगों के द्वारा उपहार में मिले सामान भी इसी समय के बने होते हैं , बाद में ग्रह अच्‍छा हो या बुरा , बच्‍चे की मानसिक स्थिति पर अधिक प्रभाव नहीं पडता है।

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                इसी तरह बेटे या बेटी के विवाह के लिए योग्‍य पार्टनर नहीं मिल रहा है , कितने दिनों से ढूंढ ढूंढकर लोग परेशान हैं , अचानक एक उपयुक्‍त पार्टनर मिल जाता है। वैज्ञानिकों की भाषा में इसे संयोग कहते हैं , पर इसमें भी शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है। इस समय फिर से सुनार को बुलाया गया , उसे ऑर्डर दिया गया , आपके शुभ समय में सोने या चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक वस्‍तु बनायी गयी , जिसे वर और वधू दोनो के गले , हाथ या पैर में धारण करवा दिया जाता है। 

                अब यदि इनके ग्रह बुरे भी हों तो मानसिक शांति देने के लिए ये जेवर काफी होते थे। सुख और दुख तो जीवन के नियम हैं , लडकी की शादी हो गयी , पति नहीं कमाता है , कोई बात नहीं , पापाजी बेटी जैसा प्‍यार कर रहे हैं , नौकरी नहीं हो रही है , चलो कोई बात नहीं , पापा की दुकान पर ही बैठ जाया जाए , कुछ और काम कर लिया जाए। मतलब संतोष ही संतोष। और फिर समय हमेशा एक जैसा तो हो ही नहीं सकता , कल सबकुछ मन मुताबिक होना ही है।

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                पर आजकल आपका शुभ मुहूर्त्‍त चल रहा होता है तो आप गहने नहीं बनवाते , गहने खरीदकर ले आते हैं , वह गहना उस समय का बना हो सकता है , जब आपके ग्रह कमजोर चल रहे थे। उसे पहनकर बच्‍चा या वर वधू शांति से तभी तक रह पाते हैं , जबतक उनके ग्रह मजबूत चल रहे हों , जैसे ही उनका ग्रह कमजोर होता है , उनपर दुगुना बुरा प्रभाव पडता है , वे परेशान हो जाते हैं , दुख से लडने की उनकी शक्ति नहीं होती। 

                छोटी छोटी समस्‍याओं से जूझना नहीं चाहते , असंतोष उनपर हावी हो जाता है। पति कमा रहा है तो सास ससुर के साथ क्‍यूं रहना पड रहा है , ट्रांसफर करवा लो , ट्रांसफर हो गया , तो मुझे नौकरी नहीं करने दे रहा , नौकरी भी करने दी , तो हमारे घूमने फिरने के दिन हैं , ये फ्लैट खरीद रहा है यानि हर बात में परेशानी। कैरियर में युवकों को ऐसी ही परेशानी है , इस तरह पति को वैसा ही असंतोष , किसी को किसी से संतुष्टि नहीं। 

                इसी प्रकार जब आपका बुरा समय चल रहा होता है और आप एक ज्‍योतिषी के कहने पर अंगूठी बनवाकर पहनते हैं , तो आप अपने कष्‍ट को दुगुनी कर लेते हैं, इसलिए कभी भी बुरे वक्‍त में नई अंगूठी बनवाने की कोशिश न करें। कल से दूसरे उपायों यानि संगति , दान , रंगों और पेड पौधों की वैज्ञानिकता पर बात की जाएगी !! 

                अपने अशुभ ग्रहों के प्रभाव को घटाने और शुभ ग्रहों के प्रभाव को बढ़ाने के उपाय के लिए 8292466723 ,  gatyatmakjytishapp@gmail.com पर संपर्क करें !
                ज्योतिषीय उपायों पर तैयार किये गए हमारे सारे लेख पढ़ें !

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                  समस्या का समाधान कैसे करें ? - 9

                   

                  Jyotish Upay

                  एक सप्‍ताह बाद अपने रिश्‍तेदारी के एक विवाह से लौटी मेरी बहन ने कल एक प्रसंग सुनाया। उस विवाह में दो बहनें अपनी एक एक बच्‍ची को लेकर आयी थी। हमउम्र लग रही उन बच्चियों में से एक बहुत चंचल और एक बिल्‍कुल शांत थी। उन्‍हें देखकर मेरी बहन ने कहा कि इन दोनो बच्चियों में से एक का जन्‍म छोटे चांद और एक का बडे चांद के आसपास हुआ लगता है। वैसे तो उनकी मांओं को हिन्‍दी पत्रक की जानकारी नहीं थी , इसलिए बताना मुश्किल ही था। 

                  पर हिन्‍दी त्‍यौहारों की परंपरा ने इन तिथियों को याद रखने में अच्‍छी भूमिका निभायी है , शांत दिखने वाली बच्‍ची की मां ने बताया कि उसकी बच्‍ची दीपावली के दिन हुई है यानि ठीक अमावस्‍या यानि बिल्‍कुल क्षीण चंद्रमा के दिन ही और इस आधार पर उसने बताया कि दूसरी यानि चंचल बच्‍ची उससे डेढ महीने बडी है। इसका अर्थ यह है कि उस चंचल बच्‍ची के जन्‍म के दौरान चंद्रमा की स्थिति मजबूत रही होगी। 

                  ज्‍योतिष की जानकारी न रखने वालों ने तो इतनी छोटी सी बात पर भी आजतक ध्‍यान न दिया होगा। क्‍या यह स्‍पष्‍ट अंतर पुराने जमाने के बच्‍चों में देखा जा सकता था ? कभी नहीं , आंगन के सारे बच्‍चे एक साथ उधम मचाते देखे जाते थे , कमजोर चंद्रमा के कारण बच्‍चे के मन में रहा भय भी दूसरों को खेलते कूदते देखकर समाप्‍त हो जाता था। मन में चल रही किसी बात को उसके क्रियाकलापों से नहीं समझा जा सकता था।

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                  ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए शुभ मुहूर्त्‍तों में जेवर बनवाने के बाद हमने संगति की चर्चा की है। हमने कहा कि एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। आज के युग में जब लोगों का संबंध गिने चुने लोगों से हो गया है , ग्रहों को समझने की अधिक आवश्‍यकता हो गयी है। प्राचीन काल में पूरे समाज से मेलजोल रखकर हम अपने गुणों और अवगुणों को अच्‍छी तरह समझने का प्रयास करते थे , हर प्रकार का समझौता करने को तैयार रहते थे। 

                  पर आज अपने विचार को ही प्रमुखता देते हैं और ऐसे ही विचारो वालों से दोसती करना पसंद करते हैं। यहां तक कि विवाह करने से पहले बातचीत करके सामनेवाले के स्‍वभाव को परख लेते हें , जबकि दो विपरीत स्‍वभाव हो और दोनो ओर से समझौता करने की आदत हो , तो व्‍यक्ति में संतुलन अधिक बनता है। पर अब हमें समझौता करना नागवार गुजरता है , अपनों से सही ढंग से तालमेल बना पाने वाले लोगों से ही संबंध बनाना पसंद करते हैं। ऐसी स्थिति में अपने और सामनेवालों के एक जैसे ग्रहों के प्रभाव से उनका संकुचित मानसिकता का बनना स्‍वाभाविक है।

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                  इसके अलावे हमने ग्रहों के बुरे प्रभाव के लिए दान की चर्चा की है। हमलोग जब छोटे थे , तो हर त्‍यौहार या खास अवसरों पर नहाने के बाद दान किया करते थे। घर में जितने लोग थे , सबके नाम से सीधा निकला हुआ होता था। स्‍नान के बाद हमलोगों को उसे छूना होता था। दूसरे दिन गरीब ब्राह्मण आकर दान कए गए सारे अनाज को ले जाता था। वे लोग सचमुच गरीब होते थे। उन्‍हें कोई लालच भी नहीं होता था , जितना मिल जाता , उससे संतुष्‍ट हो जाया करते थे। 

                  हालांकि गृहस्‍थ के घरों से मिले इस सीधे के बदले उन्‍हें समाज के लिए ग्रंथो का अच्‍छी तरह अध्‍ययन मनन करना ही नहीं , नए नए सत्‍य को सामने लाना था , जिसे उन्‍होने सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बिगडने के दौरान पीढीयों पूर्व ही छोड दिया था। पर फिर भी किसी गरीब को दान देकर हम अच्‍छी प्रवृत्ति विकसित कर ही लेते थे , साथ ही बुरे वक्‍त में मन का कष्‍ट भी दूर होता ही है।

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                  आज हमलोग उतने सही जगह दान भी नहीं कर पाते हैं। हमारे यहां एक ब्राह्मण प्रतिदिन शाम को आरती के बाद वह थाल लेकर प्रत्‍येक दुकान में घूमा करता है , कम से कम भी तो उसकी थाली में हजार रूपए प्रतिदिन हो जाते हैं। सडक पर आते जाते मेरे सामने से वह गुजरता है , मुझसे भी चंद सिक्‍के की उम्‍मीद रखता है , पर मैं उसे नहीं देती , मेरे अपने पुरोहित जी बहुत गरीब हैं , उन्‍हे देना मेरी दृष्टि में अधिक उचित है। 

                  जिस शहर में प्रतिदिन 12 से 14 घंटे काम करने के बाद एक ग्रेज्‍युएट को भी प्रतिमाह मात्र 2000 रू मिलते हों , वहां इसे शाम के दो घंटे मे 1000 रू मिल जाते हैं , उसको दिया जानेवाला दान दान नहीं हो सकता , पर आज ऐसे ही लोगों को दान मिला करता है। किसी भी क्षेत्र में पात्रता का हिसाब ही समाप्‍त हो गया है , इस कारण तो हर व्‍यक्ति ग्रहों के विशेष दुष्‍प्रभाव में है।

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                  पर इन सब बातों को समझने के लिए यह आवश्‍यक है कि पहले हमें ग्रहों के प्रभाव को स्‍वीकार करना होगा। जिस तरह ऊपर के उदाहरण से मैने स्‍पष्‍ट किया कि चंद्रमा से बच्‍चे का मन प्रभावित होता हैं , उसी तरह बुध से किशोर का अध्‍ययन , मंगल से युवाओं का कैरियर प्रभावित होता हैं और शुक्र से कन्‍याओं का वैवाहिक जीवन। इसी प्रकार बृहस्‍पति और शनि से वृद्धों का जीवन प्रभावित होता है , इसलिए इन सारे ग्रहों की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए संबंधित जगहों पर दान करना या मदद में खडे हो जाना उचित है। इसमें किसी तरह की शंका नहीं की जा सकती , सीधे स्‍वीकार कर लेना बेहतर है। कल अन्‍य उपाय यानि  रंगों और पेड पौधों की वैज्ञानिकता पर बात की जाएगी !!

                  गत्यात्मक ज्योतिष में ग्रहों के प्रभाव को दूर करने से सम्बंधित उपायों के बारे में प्रकाशित पुस्तक को पढ़ने के लिए अमेज़ॉन के किंडल में  इस लिंक पर क्लिक करें !

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                    समस्या का समाधान कैसे करें ? - 10

                     

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                    ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के उपायों की चर्चा के क्रम में विभिन्‍न रंगो के द्वारा इसे समायोजित करने की चर्चा की गयी है। इन रंगो का उपयोग आप विभिन्‍न रंग के रत्‍न के साथ ही साथ वस्‍त्र धारण से लेकर अपने सामानों और घरों की पुताई तक और विभिन्‍न प्रकार की वनस्‍पतियों को लगाकर प्राप्‍त कर सकते हैं। सुनने में यह बडा अजीब सा लग सकता है , पर इस ब्रह्मांड की हर वस्‍तु एक खास रंग का प्रतिनिधित्‍व करती है और इस कारण एक जैसे रंगों को परिवर्तित करनेवाली सभी वस्‍तुओं का आपस में एक दूसरे से संबंध हो जाता है। और यही ग्रहों के दुष्‍प्रभाव को रोकने में हमारी मदद करता है।

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                    किसी भी पद्धति के द्वारा उपचार किए जाने से पहले उसके आधार पर विश्‍वास करना आवश्‍यक होता है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का मानना है कि किसी भी प्रकार की शारीरिक , मानसिक या अन्‍य परिस्थितियों की गडबडी में उस व्‍यक्ति के जन्‍त्‍मकालीन ग्रहों की ‘गत्‍यात्‍मक शक्ति’ की कमी भी एक बडा कारण होती हैं , इसलिए उन्‍हें दूर करने के लिए हमें ग्रहों के इस दुष्‍प्रभाव को समाप्‍त करना ही पडेगा , जो कि असंभव है। हमलोग सिर्फ उसके प्रभाव को कुछ कम या अधिक कर सकते हैं। जिस ग्रह से हम प्रभावित हो रहे होते हैं , उससे संबंधित रंगों का प्रयोग हमें समस्‍याओं से मात्र आसानी से लडने की शक्ति प्रदान करता है।

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                    रंग हमारे मन और मस्तिष्‍क को काफी प्रभावित करते हैं। कोई खास रंग हमारी खुशी को बढा देता है तो कोई हमें कष्‍ट देने वाला भी होता है। यदि हम प्रकृति के अत्‍यधिक निकट हों , तो ग्रहों के अनुसार जिस रंग का हमें सर्वाधिक उपयोग करना चाहिए , उस रंग को हम खुद पसंद करने लगते हैं और उस रंग का अधिकाधिक उपयोग करते हैं। पर प्रकृति से दूर कंप्‍यूटर में विभिन्‍न रंगों के संयोजन से तैयार किए गए नाना प्रकार के रंगों में से एक को चुनना आज हमारा फैशन है और वह हमें ग्रहों के दुष्‍प्रभाव से लडने की शक्ति नहीं दे पाता। यही कारण है कि हमें कृत्रिम तौर पर रंगों की ऐसी व्‍यवस्‍था करनी होती है , ताकि हम विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रह सके। अब इस टॉपिक पर बहुत कुछ कह दिया , कहने को शायद कुछ नहीं , अनुभव की वृद्धि होने पर बाद में फिर कभी !! 

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