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ज्‍योतिष सही है या गलत ?

 

फलित ज्‍योतिष सही है या गलत ?

Jyotish is right or wrong

 विज्ञान है या अंधविश्‍वास ? यह सिर्फ तर्कों से सि‍द्ध नहीं की जा सकती। ( kundli dekhne ka tarika in hindi )हर मुददे में पक्ष और विपक्ष दोनो के पास बडे बडे तर्क होते हैं। ज्‍योतिष को विज्ञान सिद्ध कर पाने में भी अभी तक पक्ष के लोगों को सफलता नहीं मिल पायी है , इसलिए इनकी बात भी लोग नहीं सुनते। ज्‍योतिष को विज्ञान न सिद्ध कर पाने में भी अभी तक विपक्ष के लोगों को कोई सफलता नहीं मिल पायी है। लोग उनकी बातें भला क्‍यों सुनेंगे ? ओशो ने स्पष्ट कहा है कि फलित ज्योतिष शास्त्र पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है। 


Jyotish is right or wrong

लोगों का मानना है कि ज्‍योतिष जैसे विषय पर या ग्रह नक्षत्रों पर विश्‍वास करनेवाले आलसी , निकम्‍मे और निठल्‍ले हुआ करते हैं। पर मैं नहीं मानती , मैं मानती हूं कि एक जिम्‍मेदार व्‍यक्ति को ही भविष्‍य की चिंता होती है। हमारी कामवाली का युवा बेटा अपनी मां से जिद करके मोबाइल खरीदवाता है , अपने पिता के द्वारा खरीदे गए सेकंड हैंड मोटरसाइकिल पर बैठकर घूमता फिरता है। उसे भविष्‍य की कोई चिंता नहीं , क्‍यूंकि न सिर्फ तीन वक्‍त का खाना ही , वरन् भविष्‍य की छोटी मोटी हर जरूरत को वह दस बारह घरों में चौका बरतन करनेवाली अपनी मां या बीबी को दो तमाचे जडकर पूरा कर सकता है। इसलिए उसे भविष्‍य को लेकर कोई उत्‍सुकता नहीं , वह ज्‍योतिष या ज्‍योतिषियों की शरण में क्‍यूं जाए ?

कुछ समय पहले तक लोगों का जीवन इतना अनिश्चितता भरा नहीं हुआ करता था, संयुक्त परिवार होते थे, इस कारण यदि परिवार के एक दो व्यक्ति जीवन में आर्थिक क्षेत्र में सफल नहीं हुए, तो भी घर के छोटे मोटे कामों को संभालते हुए उनका जीवन यापन आराम से हो जाता था, क्यूंकि उन्हें संभालने वाले दूसरे भाई या परिवार के अन्य सदस्य होते थे। पर आज व्यक्तिगत तौर पर अधिक से अधिक सफलता पाने की इच्छा ने, व्यक्तिगत परिवारों की बहुलता ने हर व्यक्ति के जीवन को अनिश्चितता भरा बना दिया है। एक लड़के की कमाई के बिना उसका शादी विवाह या सामाजिक महत्व नहीं बन पाता है। 

इसके अलावा वैज्ञानिक सुख सुविधाओं ने व्यक्ति को आराम तलब बना दिया है। जो अच्छी जगह पर हैं, वो अपने आनेवाली पीढी के मामलों में काफी महत्वाकांक्षी हो गए हैं। दो लोगों, दो परिवारों की जीवनशैली में बडा फासला बनता जा रहा है, ऐसे में भविष्य की ओर लोगों का ध्यान स्वाभाविक है। इसी कारण भविष्य को जाननेवाली विधा यानि ज्योतिष पर लोगों का विश्वास बढता जा रहा है।

सफलता के लिहाज से इस दुनिया के लोगों को कई भागों में विभक्‍त किया जा सकता है। कुछ वैसे हैं , जिन्‍हें अपने जीवन में माहौल भी अच्‍छा नहीं मिला , वे काम भी नहीं करते या करना चाहते। किसी प्रकार उनके दिन कट ही जाते हैं , इस‍लिए उन्‍हें भविष्‍य की कोई चिंता नहीं होती , वे अपने इर्द गिर्द के माहौल के अनुसार अपने और अपने परिवार के भविष्‍य को एक सीमा के अंदर ही देख पाने से निश्चिंत रहते हैं।

दूसरे वैसे , जिन्‍हे अपने जीवन में माहौल भी मिला , काम भी कर पा रहे हैं और उसके अनुसार सफलता के पथ पर अग्रसर भी हैं , जीवन में भाग्‍य की किसी भूमिका को वे भी स्‍वीकार नहीं कर पाते , उन्‍हें अपना और अपने परिवार का भविष्‍य बहुत ही उज्‍जवल नजर आता है।

पर तीसरे वैसे लोग हैं , जो महत्‍वाकांक्षी बने होने और अपने साधन और मेहनत का भरपूर उपयोग करने के बावजूद भी कई कई वर्षों से असफल हैं ,चाहे समस्‍या कोई एक ही क्‍यूं न हो , उसके समाधान का कोई रास्‍ता उन्‍हें नजर नहीं आता । वैसी स्थिति में किसी अज्ञात शक्ति की ओर उनका रूझान स्‍वाभाविक है और ऐसे लोगों को फलित ज्‍योतिष की आवश्‍यकता पडती है। प्रकृति के किसी नियम को बदल पाना तो किसी के लिए संभव नहीं , पर ज्‍योतिष के सही ज्ञान से लोगों को कुछ सलाह तो दी ही जा सकती है , जो उन्‍हे बेहतर जीवन जीने में मदद करें । ज्योतिष गणित सूत्र

जयोतिष में हुए नए रिसर्च, गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में अधिक जानने के लिए ये लेख अवश्य पढ़ें  ------

अमेज़ॉन के किंडल में गुरूवर विद्या सागर महथा जी की  फलित ज्योतिष : कितना सच कितना झूठ को पढ़ने के लिए  इस लिंक पर क्लिक करें !

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    भाग्य क्या है ???

     

    Bhagya kya hai?

    विचित्रता से भरी इस प्रकृति में नाना प्रकार की विशेषताओं के साथ मौजूद पशु पक्षी , पेड पौधे तो अपने विकास के क्रम में सुविधाएं और बाधाएं प्राप्त करते ही हैं , इन सबके साथ ही साथ हानिकारक किटाणुओं विषाणुओं के साथ जीवनयापन करता मनुष्ये भी अपनी राह में तरह तरह के मोड प्राप्त करता है , इसके बाद भी आमजन का भाग्य के प्रति अनजान दिखना आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। भले ही उस भाग्य को पूर्ण तौर पर जान पाने में हम असमर्थ हों , पर उसके अनुकूल या प्रतिकूल होने में तो शक की कुछ भी गुंजाइश नहीं।

    सबसे पहले तो प्रकृति के विभिन्न पशु पक्षियों के जीवन पर ही गौर किया जा सकता है , जहां बलवान शिकार करता है और उसके डर से बलहीन दुबके पडे होते हैं। भाग्य भरोसे ही इनका जीवन चलता है , अच्छा रहा तो शिकार नहीं होता है , बुरा रहा तो तुरंत मौत के मुंह में चले जाते हैं , कर्म कोई मायने ही नहीं रखता। बलवान पशुओं से बचने के लिए ये कोई कर्म भी करते हैं , तो वह भाग्य से मिलने वाली इनकी विशेषताएं होती हैं। जैसे कि उडकर , डंसकर या भागकर ये खुद को बचा लेते हैं।


    bhagya kya hai ?

    Kya bhagya badal sakta hai

    आदिम मानव का जीवन भी पशुओं की तरह ही अनिश्चितता भरा था , कर्म कोई मायने नहीं रखता था , कब किसके चंगुल में आ जाएं और प्राणों से हाथ धो बैठे कहना मुश्किल था। इन्हें बुद्धि की विशेषता भाग्य से ही मिली है , जिसके उपयोग से वह बलवान पशुओं तक को नियंत्रित कर सका। प्रकृति में मौजूद हर जड चेतन की विशेषताओं का खुद के लिए उपयोग करना सीखा , पर इसके बावजूद इसके नियंत्रण में भी सबकुछ नहीं है , भाग्य से लडने की विवशता आज भी बनी ही है।

    क्रमश: मनुष्य का जीवन विकसित हुआ , पर यहां भी भाग्य की भूमिका बनी रही। एक बच्चे का भिखारी के घर तो एक अरबपति के घर में जन्म होता है , कोई हर सुख सुविधा में तो कोई फटेहाल जीवन जीने को विवश है। यदि आर्थिक स्तर को छोड भी दिया जाए , क्यूंकि अपने अपने स्तर पे ही जीने की सबकी आदत होती है , हर स्तर पर सुख या दुख से युक्त होने की संभावना बन सकती है। पर जन्म के बाद ही दो बच्चे में बहुत अंतर हो सकता है। एक मजबूत शरीर लेकर उत्साहित तो दूसरा शरीर के किसी अंग की कमी से मजबूर होता है। किसी का पालन पोषण माता पिता परिजनों के लाड प्यार में तो किसी को इनकी कमी भी झेलना होता है। पालन पोषण में ही वातावरण में अन्य विभिन्न्ता देखने को मिल सकती है।

    Karm bada ya bhagya

    आज प्रकृति से लडता हुआ मनुष्य बहुत ही विकसित अवस्था तक पहुंच चुका है , पर लोगों के जीवन स्तर के मध्य का फासला जितना बढता जा रहा है , भाग्य् की भूमिका उतनी अहम् होती जा रही है। किसी व्यक्ति की जन्मजात विशेषता उसे भीड से अलग महत्वपूर्ण बनाने में समर्थ है , इसी प्रकार जहां संयोग के कारण एक बडी सफलता या असफलता जीवन स्तर में बडा परिवर्तन ला देती है , वहीं किसी प्रकार का दुर्योग लोगों को असफल जीवन जीने को बाध्य कर देता है। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि हम प्रकृति की ओर से अपने वातावरण और जमाने के अनुकूल जो विशेषताएं प्राप्त‍ करते हैं , वो हमारा भाग्यु है , इसके प्रतिकूल हमारे व्यक्तित्व और वातावरण की विशेषताएं हमारा दुर्भाग्य कही जा सकती हैं।

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      इस दुनिया में सबकुछ नियम से होता है

       Meaning of astrology in Hindi

      इतने लंबे विकास के क्रम के बावजूद मानव जीवन में मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर लोगों के मन में भय के उपस्थित होने के कारण समाज में कई प्रकार की बुरी मान्‍यताएं , बुरी प्रथाएं आती जाती रही , ये तो विभिन्‍न उदाहरणों और कहानियों द्वारा हमारे सामने रखी जाती हैं , जिसे दूर करने के लिए समय समय पर हमारे समाजसेवियों ने संघर्ष भी किया , कई दूर भी हुईं , फिर भी आज भी कई मान्‍यताएं अच्‍छे और बुरे रूप में समाज में मौजूद हैं , इसे स्‍वीकारने में मुझे कोई आपत्ति नहीं। 

      आज अन्‍य क्षेत्रों की तरह ही ज्‍योतिष जैसा पवित्र विषय भी बहुत सारे स्‍वार्थी लोगों के द्वारा अपने स्‍वार्थ की पूर्ति का एक साधन बन गया है , एक तो यहां सच्‍चे अध्‍येताओं की कमी भी है , जो  हैं भी तो उनके सामने कई प्रकार के प्रश्‍न मुहं बाए खडे हैं , समाधान की कोई जगह नहीं , इसके कारण आज के युग के हर विज्ञान के समानांतर इसमें अध्‍ययन नहीं हो पा रहा , जिससे इसकी कुछ कमियों को स्‍वीकारने में मुझे परहेज नहीं , पर हमारे वैदिककालीन ग्रंथों में चर्चित वेदों को नेत्र कहा जानेवाला ज्‍योतिष अंधविश्‍वास कैसे हो गया , यह आजतक तो मेरी समझ में नहीं आया।

      Meaning of Science of Astrology in Hindi

      जिस प्रकार एक ज्‍योतिषी किसी प्रयोगशाला में प्रयोग कर ग्रहों के प्रभाव को प्रमाणित करने में असमर्थ हैं , उसी प्रकार वैज्ञानिक भी ये स्‍पष्‍ट नहीं कर पाते कि ग्रहों का प्रभाव जड चेतन पर नहीं पडता है , यही कारण है कि लोगों की भ्रांति नहीं दूर हो पाती। जब किसी प्रकार की भ्रांति दूर ही न की जा सके , तो फिर पत्र पत्रिकाओं में या टी वी चैनलों में ज्‍योतिष के कार्यक्रमों का जनसाधारण के लिए कोई उपयोग नहीं रह जाता। 

      हां , पाठकों के भ्रम के कारण , कि शायद इस बार कोई निष्‍कर्ष निकलकर सामने आए , चैनलों को उनके उद्देश्‍य के अनुरूप विज्ञापन के द्वारा बडे लाभ की व्‍यवस्‍था अवश्‍य हो जाती है। मीडिया को ही क्‍या दोष दिया जाए , आजतक सरकार या जनता ने भी कभी ज्‍योतिष की परीक्षा के लिए सार्थक कदम नहीं उठाए हैं, ज्‍योतिष की विवादास्‍पद स्थिति के यही सारे कारण है ।

      Meaning of astrology in Hindi

      Life-graph of any person 

      हम सभी जानते हैं कि विदेशी आक्रमण के दौरान हमारे ज्ञान विज्ञान को बडे पैमाने पर नष्‍ट किया गया। आधे अधूरे ज्ञान को विकसित होने के लिए न तो कभी सरकार द्वारा कोशिश की गयी और न ही आम जनता द्वारा । अधकचरे ज्ञान के सहारे एक ज्‍योतिषी अपनी पूरी शक्ति का उपयोग भले ही कर ले , पर आज के युग के अनुरूप संसाधनों के अभाव को तो महसूस करता ही है। ज्‍योतिष को विज्ञान सिद्ध नहीं कर पाने में उसके सामने बहुत अधिक विवशताएं मानी जा सकती हैं , पर ग्रहों के प्रभाव को तो साबित कर ही सकता है , लेकिन उसे समझने के लिए वैज्ञानिकों के पास जो नजरिया होना चाहिए , वो नहीं होता। ज्‍योतिष जैसे विषय की बातचीत के क्रम में वे अपना वैज्ञानिक नजरिया तक भूल जाते हैं।

      Vigyan ka bhram in Hindi 

      एक टी वी कार्यक्रम में प्रो यशपाल जी (विज्ञान में उनके महत्‍वपूर्ण योगदान के लिए मैं उनकी बहुत इज्‍जत करती हूं) का कहना था कि जीवनभर उन्‍हें ज्‍योतिषियो की आवश्‍यकता नहीं पडी , इसलिए उनका कोई महत्‍व नहीं है , ग्रहों के प्रभाव को वे नहीं मानते। एक वैज्ञानिक की इन बातों की तुलना मेरे गांव के उस वृद्धा से की जा सकती है , जो हमें सर्दी खांसी होने पर डॉक्‍टर के पास जाते देखकर हंसा करती थी और हमारे समझाने पर कहा करती थी कि इतनी लंबी उम्र में उन्‍हे डॉक्‍टर की कभी आवश्‍यकता नहीं पडी। अन्‍य वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ग्रहों के जितने प्रभाव को उन्‍होने ढूंढा है , उतने को ही वे मानते हैं , जब कोई और ढूंढा जाएगा तब फिर मानेंगे , अभी नहीं मान सकते। ये बात भी वैसी ही हास्‍यास्‍पद है , हमारे प्राचीन ज्ञान विज्ञान के कसौटी पर खरे उतरने के बाद भी उनके द्वारा ऐसी बाते कहा जाना विद्वता भरी भाषा तो नहीं कही जाएगी।

      ज्योतिष पर ओशो के विचार 

      ज्योतिष: अद्वैत का विज्ञान - 1

      Meaning of Rule of nature in Hindi

      इस दुनिया में जो भी हो रहा है , किसी खास नियम के तहत् ही हो रहा है। प्रकृति में से हजारो लाखों करोडो नियम ढूंढे जा चुके और प्रतिदिन लाखों शोध इस बात को स्‍पष्‍ट कर रहे हैं कि इस दुनिया में कोई भी कार्य बिना नियम के नहीं होता है। एक एक बीज में निहित उर्जा जिस ढंग से पौधों , फूलों और और फलों के माध्‍यम से प्रस्‍फुटित होती है , उसे हम उसके बीज को देखकर पहले ही अनुमान लगा लेते हैं। पर कोई व्‍यक्ति अमीर के घर पैदा हुआ , कोई  गरीब के घर , कोई बडी आई क्‍यू के साथ इस दुनिया में आया और किसी में आई क्‍यू की कमी हुई , कोई सुखद पीरस्थितियों में जी रहा है तो कोई दुखद , किसी को दाम्‍पत्‍य का सुख , किसी को इससे कष्‍टकर समझौता या फिर किसी का जीवन साथी समझौते के भी काबिल नहीं। इन सारी बातों का हम अनुमान क्‍यूं नहीं लगा पाते ? क्‍या ये काम बिना नियम के हो रहे हैं ?

      Meaning of Bhagya ya karm in Hindi 

      यदि हम ऐसा सोंचते हैं , तो यह भी हमारी अल्‍प बुद्धि ही मानी जाएगी । इस दुनिया में होनेवाली हर दुखद और सुखद घटनाओं को हम अपने कर्म से जोड देते हैं , जबकि कई जगहों पर हम कर्म से विपरीत फल की प्राप्ति होते देखते हैं। तब फिर हम इसे संयोग या दुर्योग से जोड देते हैं , अज्ञानता में और कर भी क्‍या सकते हैं ? लेकिन जब इस पूरी दुनिया में संयोग और दुर्योग का खेल कहीं देखने को नहीं मिलता , तो फिर हमारे जीवन में कैसे आ सकता है , जरूर इसके पीछे कुछ रहस्‍य है और बजाए इसे अस्‍वीकार करने के इसके रहस्‍य को ढूंढे जाने की आवश्‍यकता है । इस कार्य में सबका साथ बिल्‍कुल आवश्‍यक है , तभी बडे स्‍तर पर सफलता हाथ आ सकती है।

       Meaning of astrology in Hindi

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        गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ज्‍योतिष से भिन्‍न ?

         

        Kundli astrology in hindi

        मुझे अक्‍सर पाठको के प्रश्‍न मिलते हैं कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष क्‍या है ? यह एक अलग शास्‍त्र है क्‍या ? आज उन सबों की जिज्ञासा या शंका का समाधान करना ही आवश्‍यक समझूंगी। सबसे पहले तो आप सबो को इस बात की जानकारी दे दूं कि गत्यात्मक ज्योतिष अपने समय को जानने समझने की वैज्ञानिक पद्धति है। इसे एक विज्ञान के तौर पर विकसित किया गया है, पर इसे शास्त्र नहीं कहा जा सकता, क्योंकि किसी भी शास्‍त्र का जन्‍म एक दो लोगों के अध्‍ययन से नहीं होता। कई पीढी और अनकानेक लोगों के सहयोग से ही एक शास्‍त्र का जन्‍म संभव है। 

        गणित ज्योतिष (Astronomy) की पढ़ाई के बाद फलित ज्योतिष के सम्पूर्ण ग्रंथों का अध्ययन करने के क्रम में गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के जनक श्री विद्या सागर महथा जी को महसूस हुआ कि आज के प्रगतिशील युग में ज्योतिष को भी प्रगतिशील होने की आवश्यकता है। इसलिए ज्योतिष का समयानुसार बदलाव आवश्यक आवश्यक है।  इन्होने परंपरागत ज्‍योतिष को मथकर उसके सार तत्‍व को निकाला भी नहीं है , वरन् उसे ज्‍यों का त्‍यों जड और तने के रूप में सुरक्षित रखकर 'गत्यात्मक ज्योतिष' को विकसित करने की कोशिश की ।

        What is Kundli Astrology in Hindi

        भारत में ज्योतिष का अध्ययन बहुत पुराना है। परंपरागत ज्‍योतिष का जो जड है , वो है हमारे पूजनीय ऋषि , महर्षियों की निरंतर की गयी मेहनत , जिसके फलस्‍वरूप प्राचीन काल से ही खगोल शास्‍त्र का इतना विकास हो सका था। उसी जड के आधार पर फलित ज्‍योतिष का पौध विकसित किया गया , जो पूर्ण तौर पर पल्‍लवित और पुष्पित होकर बडा वृक्ष बन अपनी सुगंधि बिखेरने लगा। 

        ऋषि , महर्षियों की मेहनत से तैयार किया गया इस वृक्ष का तना इतना मजबूत है कि सैकडों वर्षों से विभिन्‍न ज्‍योतिषियों के द्वारा जितनी भी विचारधाराएं आयी , सबको थामे रखने के काबिल बना रहा और सभी टहनियां तरह तरह के फल फूल और पत्‍ते देकर इस एक वृक्ष को विविधता से परिपूर्ण बनाता रहा। पुन: टहनियों में से भी टहनियां निकली और यह तना सबको संभालने के काबिल बना रहा। हमारी ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ भी एक अलग प्रकार की विचारधारा लेकर इस वृक्ष की एक टहनी के रूप में शोभायमान है।

        Ganit jyotish in Kundli and astrology in Hindi

        पूरे विश्‍व में गणित ज्‍योतिष को लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं है । वैसे पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष हमारे निरयन अंश को नहीं मानकर सायन अंश को ही मानता है , जबकि भारत में प्रचलित निरयन ही ग्रहों की वास्‍तविक स्थिति है। इस गणित ज्‍योतिष के बाद फलित ज्‍योतिष का भाग आता है , जिसमें भी पूरे ब्रह्मांड के 30-30 डिग्री का विभाजन , उसका स्‍वामित्‍व , ग्रहों की मैत्री और शत्रुता , विभिन्‍न भावों के बंटवारे को लेकर पूरे विश्‍व में किसी प्रकार का विवाद नहीं है। पर जैसे ही फलित कथन में हम आगे बढते है , विवाद शुरू हो जाता है , कोई एक तो कोई दूसरी पद्धति को भविष्‍यवाणी के लिए सही मानने लगता है। ये थोडी तकनीकी बात हो गयी , आम भाषा में मै इसे समझाती हूं।


        Kundli astrology in hindi

        Kundli astrology in Hindi and Zodiac status

        पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से पूरब से उदित होती , पश्चिम कर ओर जाकर पश्चिम में अस्‍त होती एक पट्टी मान ली गयी है , जो पृथ्‍वी के चारों ओर घूमती रहती है और इसी पट्टी के सहारे सारे ग्रह भी पृथ्‍वी के चारों ओर चक्‍कर लगाते हैं। चूकि यह पट्टी वृत्‍ताकार है और पृथ्‍वी इसके केन्‍द्र में है , इसके 360 डिग्री को 12 भागों में बांट दिया जाता है तो 30-30 डिग्री की एक राशि निकलती है , जिसे मेष(0 से 30 डिग्री तक), वृष(30 से 60 डिग्री तक), मिथुन(60 से 90 डिग्री तक), कर्क(90 से 120 डिग्री तक), सिंह(120 से 150 डिग्री तक), कन्‍या(150 से 180 डिग्री तक), तुला(180 से 210 डिग्री तक), वृश्चिक(210 से 240 डिग्री तक), धनु(240 से 270 डिग्री तक), मकर(270 से 300 डिग्री तक), कुंभ(300 से 330 डिग्री तक)और मीन(330 से 360 डिग्री तक)कहा जाता है। इसमें से मेष और वृश्चिक को मंगल के स्‍वामित्‍व में ,वृष और तुला को शुक्र के स्‍वामित्‍व में , मिथुन और कन्‍या को बुध के स्‍वामित्‍व में , कर्क को चंद्रमा के स्‍वामित्‍व में , सिंह को सूर्य के स्‍वामित्‍व में , धनु और मीन को बृहस्‍पति के स्‍वामित्‍व में तथा मकर और कुंभ को शनि के स्‍वामित्‍व में दिया गया है। इन राशियों में से किसी बच्‍चे के जन्‍म के समय जिस राशि का उदय होता रहता है , वह बच्‍चे का लग्‍न कहलाता है।

        All houses in Kundli Astrology in Hindi

        परंपरागत ज्‍योतिष के अनुसार लग्‍न और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के शरीर विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के धन विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के भाई बंधु विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के माता और हर प्रकार की संपत्ति विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के बुद्धि ज्ञान विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवालेग्रहों से उस बच्‍चे के झंझट से जूझने की क्षमता विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के पति पत्‍नी और घर गृहस्‍थी विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के जीवनशैली विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के भाग्‍य और धर्म विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के पिता और सामाजिक प्रतिष्‍ठा विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के लाभ और लक्ष्‍य विषयक , उसके बाद वाली राशि और उसके साथ उदय होनेवाले ग्रहों से उस बच्‍चे के खर्च और बाहरी संदर्भों के विषय में भविष्‍यवाणी की जाती है। इन मुद्दों पर भी सारी दुनिया के साथ ही साथ गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष भी एकमत है। 

        पर इन सारे मुद्दो जिनकी चर्चा उपर गयी है ,के बारे में भविष्‍यवाणी करते वक्‍त ग्रहों की शक्ति निकालनी आवश्‍यक है , उसमें प्राचीन काल से अभी तक पूरे विश्‍व के साथ साथ भारतवर्ष के भी विद्वान एकमत नहीं दिखे। उसके लिए ज्‍योतिष शास्‍त्र में समय समय पर अनेकानेक सूत्र दिए गए हैं , इससे किसी सूत्र का उपयोग करके अपने ग्रहों को कमजोर और मजबूत दिखाना आपके बाएं हाथ का खेल बन जाता है।

        ज्योतिष में हुए नए रिसर्च, गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में अधिक जानने के लिए ये लेख अवश्य पढ़ें  ------

        Various dasha kal in Kundli astrology in Hindi

        इसके अलावे ग्रह आपके जीवन में किस वक्‍त प्रभावी होगा , इस बात पर भी दुनिया के विद्वान एकमत नहीं हैं। इसके लिए भी दस बारह पद्धतियां है , ज्‍योतिष में नया प्रवेश करनेवाले अपने जीवन में घटी घटनाओं के आधार पर किसी एक सिद्धांत को प्रभावी मान लेते हैं। इसलिए समय समय पर इसमें बहुत सारी टहनियां जन्‍म लेती जा रही है। इसमें सबसे मोटी टहनी विंशोत्‍तरी पद्धति की है और बहुत छोटी बडी टहनियां इनको आधार मानती हैं , नए ज्‍योतिषी इसमें से किसी टहनी पर चढ जाया करते हैं। पुराने ज्‍योतिषी हर टहनी पर चढचढकर फल पाने की आशा रखते हैं , पर इसमें उलझकर रह जाते हैं। 

        ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ को ग्रहों की शक्ति और उसके प्रतिफलन काल के लिए कोई मानक सूत्र न होना ज्‍योतिष की सबसे बडी कमजोरी लगती है और इसने ग्रहों की शक्ति और उसका प्रतिफलनकाल निकालने के अलग सूत्र का उपयोग करना आरंभ किया, जिसकी चर्चा 1975 से ही कई ज्योतिषीय पत्रिकाओं में होती रही।  दिसम्बर 2010 में 'फ्यूचर समाचार' में भी इस पद्धति के बारे में एक बड़ा आलेख प्रकाशित किया गया था। इस तरह विंशोत्‍तरी पद्धति के बगल से इसने भी एक शाखा का विकास कर लिया है। इस पद्धति की सटीकता के बारे में अपना दृष्टिकोण रखना और भविष्‍यवाणियां करना आवश्‍यक है , सटीकता के बारे में तो आप पाठक ही कुछ कह सकते हैं । इतना ही नहीं, ग्रहों के बुरे प्रभाव को रोकने और अच्छे प्रभाव को बढ़ने के लिए गत्यात्मक ज्योतिष के अचूक उपाय भी बताये हैं। 

        Today Kundli astrology in hindi 



        इसी प्रकार गोचर के ग्रहों के प्रभाव पर भी एक सूत्र 'गत्यात्मक गोचर प्रणाली 'विकसित  की गयी है। प्लेस्टोरे में मौजूद हमारा एप्प में दिन-प्रतिदिन के रिजल्ट और वर्षफल गत्यात्मक गोचर प्रणाली से ही निकाले जाते हैं , जो हमारे एप्प को डाउनलोड करनेवाले हज़ारो लोगों के लिए उनके मोबाइल में उनका अपना भविष्यफल बताता हैं। जब गोचर के ग्रहों का प्रभाव सामान्य होता है , तो इस एप्प की सटीकता पर संदेह हो सकता है , पर जैसे ही आपके गोचर के ग्रहों का अच्छा या बुरा प्रभाव पढ़ना शुरू होता है , इस एप्प की सटीकता पर विश्वास बन जाता है। आप भी इस एप्प को इनस्टॉल और गत्यात्मक ज्योतिष के सिद्धांतों की परख कर सकते हैं। 

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          ASTROLOGICAL GRAPH & CHART




          एक मित्र ने 6-8 साल पहले गत्यात्मक जन्मकुंडली बनवायी थी। शायद गत्यात्मक ज्योतिष से जुड़े लोगों को यह मालूम ही होगा कि गत्यात्मक जन्मकुंडली के साथ ग्रहों की गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति निकालकर पुरे जीवन के उतार चढ़ाव का ग्राफ और विभिन्न मामलों के सुख दुःख का चार्ट भी दिया जाता है। जीवन के हर 6 साल में परिवर्तन को दिखाता उनका जीवन ग्राफ 2013 से ही डाउनवार्ड और नेगेटिव जा रहा था, 2019 सर्वाधिक नीचे होने के बाद 2020 से अपवार्ड जा रहा था। उन्होंने उस समय हलके में लिया, परिस्थितिया दिन ब दिन बिगड़ती गयी 2018-2019 में परिस्थितियों को सुधारने के लिए बहुत बड़ा रिस्क लेना पड़ा। समय गड़बड़ था, परिस्थितियाँ नहीं सुधरी और सबकुछ खोना पड़ा उन्हें। सब हो जाने के बाद उन्होंने ग्राफ निकाला और उसे देखकर भौचक्के हुए। ग्राफ और चार्ट किसी के जीवन और विभिन्न मामलों को निचे दित्ये गए चित्र की तरह दिखते हैं। यह ग्राफ और चार्ट किसी और का है।

          यदि 2018 -2019 की परिस्थितियों को यूँ ही झेलकर व्यतीत करते और 2020 में अब सुधारने की कोशिश करते तो उन्हें अपना सबकुछ खोना नहीं पड़ता। समय की जानकारी से हमें इसी प्रकार का फ़ायदा होता है। गत्यात्मक ज्योतिष एप्प को डाउनलोड और इनस्टॉल करने वाले सज्जनो से अनुरोध है कि 2020 के लिए लिखी गयी हर मामले की परिस्थितयों यानी एक एक ड्रॉपडाउन को एक-एक दिन करके पढ़ें और समझे। समय की जानकारी से उन्हें निर्णय लेने में मदद मिलेगी।


          कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं, एप्प को डाउनलोड करने पर आपको 2020 के दिसंबर तक के लिए फ्री सब्सक्रिप्शन की सुविधा मिल रही है। इसलिए जल्द ही हमारा एप्प इनस्टॉल करके signup करें। 

          'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के प्रचार प्रसार में आपके सहयोग की अपेक्षा





          केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय (एमडब्ल्यूसीडी) ने देशभर की 100 फीमेल अचीवर्स का चुनाव करने के लिए फेसबुक के साथ मिलकर ‘#100वीमेन इनीशिएटिव’ नाम का कैंपेन शुरू किया। एमडब्ल्यूसीडी और फेसबुक का ये साझा प्रयास देश की 100 ऐसी महिलाओं को चुनना था जो अपने-अपने क्षेत्र में कुछ अनूठा कर रही है। लोगों को मंत्रालय के फेसबुक पेज में जाकर महिला के कार्यों से संबंधित एक वीडियो अपलोड करना और बताना था कि उसने जिस महिला का चुनाव किया वह क्यों भारत की 100 सबसे प्रभावशाली महिला के रूप में सम्मानित की जानी चाहिए.”


          15 जुलाई 2015 से 30 सितंबर 2015 तक मंत्रालय के फेसबुक पेज (https://www.facebook.com/ministryWCD) पर ऐसी महिलाओं का नामांकन शुरू हुआ जो कुछ हटकर और खास हैं. एक निर्णायक मंडल द्वारा देशभर से भेजी गई सभी प्रविष्टियों में से 200 प्रविष्टियों पर 7 नवंबर 2015 से वोटिंग शुरु हुई, इन 200 महिलाओं में से विजेता चुनी जाने वाली 100 महिलाओं को सम्मानित किया गया। विजेताओं की घोषणा जनवरी 2016 में हुई। 22 जनवरी को राष्‍ट्रपति भवन में लंच पर आमंत्रित करके महामहिम प्रणव मुखर्जी ने हमें सम्‍मानित किया।
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          #‎100women‬ में मेरे सेलेक्‍शन की खबर के साथ इस बार नया साल मेरे लिए खुशियां लेकर आया .. जनवरी के अंतिम सप्‍ताह ने इन खुशियों को पूर्ण रूप से अनुभव करने का आनंद दिया.... देशभर से चुनी गई 100 सशक्‍त महिलाओं में खुद को शामिल देखकर अवार्ड प्राप्‍त करना .. इसके साथ साथ राष्‍ट्रपति महोदय के साथ लंच करना ..... गणतंत्र दिवस समारोह में विशिष्‍ट अतिथि के रूप में सम्‍मान प्राप्‍त करना .... ये सब मेरे लिए अकाल्‍पनिक और अविस्‍मरणीय बातें रहीं .... जीवनभर एक खास क्षेत्र में मेरे समर्पण भरे कार्य ने मुझे जो पुरस्‍कार दिलाया ... उसके लिए महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गांधी जी का जितना आभार व्‍यक्‍त करूं कम ही होगा .... नोमिनेशन और वोटिंग के वक्‍त हमारे फेसबुक मित्रों ने हमें जो मदद की और मुझे यहां तक पहुंचाया उनका भी बहुत बहुत शुक्रिया!





          22 जनवरी को राष्‍ट्रपति भवन में हमारे बैठने की व्‍यवस्‍था पहले से तय थी , राष्‍ट्रपति महोदय और मेनका गांधी जी के 1 नं के अंडाकार टेबल के चारो ओर 12 टेबल और लगे हुए थे , मेरे बैठने की व्‍यवस्‍था 11 नं टेबल पर थी , जिसमें हम पांच वूमेन एचीवर्स के साथ WCD के तीन सदस्‍य , ईटीवी हिंदी और उर्दु के प्रमुख जगदीश चंद्र जी और दो मेहमान थे, हमारे साथ बैठे रोहतक से आए डॉक्‍टर जोगिन्‍द्र पाल चुग जी की पत्‍नी Renu Chugh , एजुकेशन के क्षेत्र से ही वूमेन एचीवर थी , टेबल नं 6 पर थी। दिल्‍ली के डीपीएस से रिटायर हो चुकी तमन्‍ना सपेशल स्‍कूल की फाउंडर , पेसिडेंट , एजुकेशन के क्षेत्र की ज्‍यूरी मेम्‍बर श्रीमती श्‍यामा कोना हमारे टेबल के बगल में ही टेबल नं 10 पर बैठी हुई थी। इस व्‍यवस्‍था के बारे में हमें राष्‍ट्रपति भवन में जाने से पूर्व ही मालूम हो चुका था। खाने से पहले श्रीमती मेनका गांधी ने हम 100 एचीवर्स की सराहना करते हुए हमें शुभकामनाएं दी। खाना शुरू हुआ, खाने के दौरान नौसेना की विशेष धुन बजती रही। खुद को विशेष अनुभव कराता हुआ आधे पौन घंटे का समय कैसे व्‍यतीत हो गया, पता भी न चला, सिर्फ यादें ही शेष रह गई।

          ज्‍योतिष के क्षेत्र में जीवन भर काम करती हुई , इस क्षेत्र में मौजूद सभी अंधविवश्‍वासों पर चोट करती हुई ,अपने पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा विकसित की गई ज्‍योतिष की नई शाखा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के बारे में जानकारी प्रदान करती हुई इतने वर्षों से इंटरनेट में नियमित लिखने का पूरा पूरा फायदा मुझे मिल गया, यह पुरस्‍कार समाज के बीच मुझे एक नई पहचान देने में समर्थ हुआ है , जिसके फलस्‍वरूप जीवन में एक मोड की संभावना प्रशस्‍त हुई है , जो समाज से अंधविश्‍वास का खात्‍मा कर ज्‍योतिष को विज्ञान के रूप में स्‍थापित कर सकता है, इसके लिए भी आप सबों का सहयोग अपेक्षित है। 






          एक ब्‍लॉगर्स मीट में मेरा विचार

          कलकत्‍ता के पार्क स्‍ट्रीट में 'द गोल्‍डेन पार्क' होटल में पिछले रविवार यानि 9 मार्च 2014 को 'अ बिलियन आइडियाज' की ओर से आयोजित एक ब्‍लॉगर्स मीट में भाग लेने का मौका मिला , इसमें विचार विमर्श के लिए निम्‍न मुद्दे थे .....

          How to retain the inclusiveness and secular fabric of the nation
          How to harness the potential of youth for innovation
          How to empower women to have a greater say in the household decision making
          How to increase transparency in the governance at all levels.

          दो पीढियों से चली आ रही महिलाओं की समस्‍याओं के समाधान का एक उपाय नजर आ रहा था , इसलिए मैं इसी पर अपने विचार प्रस्‍तुत करने गयी थी, जो इस प्रकार हैं .... 

          आज से पंद्रह साल पहले तक की मध्‍यम वर्गीय परिवारों की पढी लिखी महिलाओं की कहानी यही थी कि पढे लिखे होने के बावजूद घर परिवार संभालने की जिम्‍मेदारी के कारण अपने कैरियर पर अधिक ध्‍यान नहीं दे पाती थी। इस समय तक मुश्किल से दो प्रतिशत महिलाएं अपना कैरियर बना पायी , जिन्‍हें उनके पति और ससुरालवालों ने पूरा सहयोग दिया। बाकी की 98 प्रतिशत महिलाएं परिवार को संभालने के लिए , बच्‍चों की अच्‍छी परवरिश के लिए समझौते करती रही। उस वक्‍त बीएड करने वाली या प्रतियोगिता पास कर चुकी महिलाओं को भी घर परिवार संभालने के चक्‍कर में नौकरी छोडनी पडी। हमारे परिचय की एक स्‍त्री रोग विशेषज्ञा तक हैं , जिन्‍होने नौकरी के अधिकांश समय छुट्टियों में ही व्‍यतीत किए , फिर रिजाइन करना पडा , क्‍योंकि पतिदेव की पोस्टिंग जहां थी , वहां से वे तबादला नहीं करा सकते थे और ये न तो वहां आ सकती थी और न अकेले बच्‍चों को लेकर नौकरी संभालते हुए दूसरे शहर में रह सकती थी। सबसे बडी बात कि वे कैरियर को छोडकर भी राजी खुशी अपने पारिवारिक दायित्‍वों को निभाती रहीं। मैने खुद भी अपने परिवार और बच्‍चों को संभालने के लिए कैरियर के बारे में कभी नहीं सोंचा। पर आज की पीढी की लडकियां ऐसा समझौता नहीं कर सकती , ‘हमारा सबकुछ बर्वाद हो जाए , पर हम कैरियर को नहीं बर्वाद होने देंगे’ आज की पूरी पीढी की युवतियों की ये आवाज बन रही है और इसकी प्रेरणा उन्‍हें हम जैसी मांओं या चाचियों से ही मिल रही है , जो कल तक परिवार संभालने के कारण खुद के कैरियर पर ध्‍यान नहीं दे रही थी। समाज के लिए यह चिंतन का विषय है कि इन प्रौढ महिलाओं के चिंतन में बदलाव आने में कहीं उनका ही हाथ तो नहीं ?

          नौकरी कर रही महिलाओं को दो चार साल भले ही कभी दुधमुंहे , कभी कमजोर ,कभी बीमार बच्‍चे को छोडकर नौकरी को संभाल पाने में दिक्‍कत होती हो , पर बच्‍चों के स्‍कूल में एडमिशन के पश्‍चात हल्‍के रूप में और बच्‍चों के बारहवीं पास करते ही अचानक महिलाओं को कुछ अधिक ही फुर्सत मिलने लगती है। कम पढी लिखी कम विचारशील महिलाएं मंदिरों में , अपनी अपनी मंडलियों में आ जाकर , फिल्‍में टीवी देखकर समय काट ही नहीं लेती , अपने दायित्‍व विहीन अवस्‍था का नाजायज फायदा उठाती हैं और समय का पूरा पूरा दुरूपयोग करती हैं। उनकी छोटी मोटी जरूरतें पतियों के द्वारा पूरी हो जाने से वे निश्चिंत रहती हैं। पर विचारशील महिलाएं कोई न कोई रचनात्‍मक कार्य करना चाहती है , पर बढती उम्र के साथ कुछ बाधाएं भी आती हैं , और उनको काम में परिवार , समाज का सहयोग भी नहीं मिल पाता , तब उन्‍हें ऐसा महसूस होने लगता है कि उनकी प्रतिभा का कोई महत्‍व नहीं। उनकी प्रतिभा को समाज में महत्‍व दिया जाता , तो आज उनका दृष्टिकोण ऐसा नहीं होता। जाहिर है , जिस त्‍याग को आज वे भूल समझ रही हों , वैसा त्‍याग अपनी बच्चियों से नहीं करवा सकती। पर इस तरह की सोंच से आनेवाली पीढी को बहुत नुकसान है , यह बात समाज को समझनी चाहिए।

          आज की पूरी पीढी की युवतियों की यह सोंच कि परिवार के लिए कैरियर को छोडना उचित नहीं , आने वाले समय में बहुत बडी अव्‍यवस्‍था पैदा कर सकता है। पुरानी पीढी की गैर कामकाजी महिलाओं ने बच्‍चों के प्रत्‍येक क्रियाकलापो पर ध्‍यान रखा , उसे शारीरिक , नैतिक , बौद्धिक और चारित्रिक तौर पर सक्षम बनाया , जिससे समाज मजबूत बनता है। सारी कामकाजी महिलाओं के बच्‍चों का लालन पालन ढंग से न हो सका , ऐसी बात भी नहीं है , यदि परिवार में बच्‍चों पर ध्‍यान देने वाले कुछ अभिभावक हों या पति और पत्‍नी मिलकर ही बच्‍चों का ध्‍यान रख सकते हों , तो महिलाओं के नौकरी करने पर कोई दिक्‍कत नहीं आयी। पर आज की युवतियॉ कैरियर को अधिक महत्‍व देंगी , वो भी प्राइवेट जॉब को वरियता देती हैं , तो बच्‍चे आयाओं के भरोसे पलेंगे , उनके हिसाब से ही तो उनका मस्तिष्‍क विकसित होगा। एक भैया की शादी मेरे साथ ही हुई थी , पत्‍नी अपने जॉब में तरक्‍की कर रही हैं , इसलिए संतुष्‍ट हैं , पर बच्‍चों के विकास से संतुष्‍ट नहीं , अफसोस से कहती हैं , ‘जब सबका बच्‍चा बढ रहा था , मेरा बढा नहीं , जब सबका बच्‍चा पढ रहा है , मेरा पढा नहीं।‘ हां चारित्रिक तौर पर दोनो अच्‍छे हैं पर इस प्रकार की असंतुष्टि उस समय एक दो परिवार की कहानी थी , अब यही हर परिवार की कहानी होगी। हाल फिलहाल की कहानी है , पति के मना करने के बावजूद अपने बच्‍चे के जन्‍म के दो महीने बाद ही उसकी मां नौकरी पर जाने को तैयार थी , वो मानती थी कि बच्‍चे को संभालने की जिम्‍मेदारी पिता की भी बराबर ही है। हारकर पिता को ही नौकरी छोडनी पडी , घर से ही बच्‍चे को संभालते हुए कुछ काम करने लगा , पर बच्‍चे की परवरिश सामान्‍य नहीं हो सकी। आने वाली पीढी यानि आज के बच्‍चों का विकास ढंग से नहीं होगा , उनके व्‍यक्तित्‍व का पतन होगा तो उसे भी आनेवाले समय में देश को ही झेलना होगा।

          कैरियर को महत्‍व देते हुए विवाह न करने या विवाह के बाद बच्‍चे न पैदा करने का व्‍यक्तिगत फैसला समाज के लिए दुखदायी नहीं है , पर विवाह कर बच्‍चे को जन्‍म देने के बाद उसका उचित लालन पालन न हो , यह समाज के लिए सुखद संकेत नहीं। आने वाले समय में बच्‍चों का पालन पोषण , देख रेख भी सही हो , और महिलाएं भी संतुष्‍ट रहे , इसके लिए सरकार को बहुत गंभीरता से एक उपाय करने की आवश्‍यकता है। नौकरी को लेकर महिलाओं के सख्‍त होने का सबसे बडा कारण यह है कि उम्र बीतने के बाद उनके लिए कोई संभावनाएं नहीं बचती , जबकि बच्‍चों को पढाने के क्रम में उनकी पढाई लिखाई चलती रहती है और भले ही अपने विशिष्‍ट विषय को भूल भी गयी हूं , उनका सामान्‍य विषयों का सामान्‍य ज्ञान कम नहीं होता। इसलिए महिलाओं के लिए हर प्रकार की नौकरी में उम्र सीमा समाप्‍त किया जाना चाहिए । साथ ही हर क्षेत्र में उन्‍हें पर्याप्‍त आरक्षण मिलना चाहिए। उन्‍हें व्‍यवसाय के लिए बैंको से कम ब्‍याज दरों पर ऋण और अन्‍य तरह की सुविधाएं मुहैय्या करायी जानी चाहिए, ताकि घर परिवार संभालते वक्‍त भविष्‍य में कुछ आशाएं दिखती रहें। आने वाली बेहतर पीढी का ढंग से पालन पोषण करते वक्‍त महिलाओं का भविष्‍य के लिए आश्‍वस्‍त रहना बहुत आवश्‍यक है। 

          अन्‍य तीनों मुददों पर मेरे विचार इस प्रकार हैं .....

          1. हमारे देश में सदैव 'विविधता में एकता' की भावना विकसित होती रही है , इसलिए मेरे विचार से देश के लोगों की जाति , धर्म या रहन सहन जो भी हो कोई अंतर नहीं पडता , बस लोगों के अंदर देश भक्ति की भावना में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए , हम अपने बच्‍चों को ऐसी शिक्षा दें कि किसी के बहकावे में आकर वे देश का नुकसान न करें। सरकार को बस इतना करना है कि वे सभी नागरिकों को समान सुविधाएं दें। नौकरी में आरक्षण देकर समाज के कमजोर पक्ष को आर्थिक सुरक्षा भले ही आवश्‍यक हो , पर देश के हित के लिए जिम्‍मेदारी से भरे सरकारी उच्‍च पदों में या पदोन्‍नति में प्रतिभा को महत्‍व दिया जाना चाहिए। 
          2. देश की आनेवाली पीढी को यानि युवाओं को प्रतिभाशाली बनाने के लिए रटंत प्रणाली की शिक्षा को समाप्‍त कर इसे व्‍यावहारिक और उपयोगी बनाने पर बल दिया जाना चाहिए , अपनी अपनी रूचि और प्रतिभा के हिसाब से सभी युवाओं को सरकार की ओर से एक समान अवसर मिलना चाहिए। दबाबपूर्ण पाठ्यक्रम युवाओं के प्रतिभा को नुकसान पहुंचाती है। 
          3. आज प्राइवेट संस्‍थानों ने संचार क्रांति का पूरा फायदा उठाया है , एक एक कर्मचारी की गतिविधियों पर उनकी पूरी निगाह रहती है , सरकार के लिए तो यह और आसान है। संचार क्रांति के इस युग में सरकारी तंत्र की जनता के मध्‍य पारदर्शिता बहुत बडी बात नहीं , बस इच्‍छा शक्ति होनी चाहिए। 

          अपनी मातृभाषा में विचारों की अभिव्‍यक्त


          वैसे तो मनुष्‍य के पूरे शरीर की बनावट प्रकृति की एक उत्‍कृष्‍ट रचना है ही , खासकर इसके मन और मस्तिष्‍क की बनावट इसे दुनियाभर के जीवों से अलग करती है। जन्‍म लेने के पश्‍चात ही मनुष्‍य सूक्ष्‍मता से वातावरण का निरीक्षण करता रहता है। वातावरण में होनेवाले किसी भी परिवर्तन को ज्ञानेन्द्रियां तुरंत उसके मस्तिष्क तक पहुंचाती है। जानकारी से मनुष्‍य का मन प्रभावित होता है , निरंतर विचारों और भावनाओं का प्रवाह चलता रहता है। अपने ज्ञान, विचारों और भावनाओं को अभिव्‍यक्ति देने के लिए प्राचीन काल से ही मनुष्‍य ने अनेक तरीके ईजाद किए।

          प्रारंभ में हाथ, पैर के इशारे और मुख के हाव भाव से तो कुछ समय बाद तरह तरह के चित्रों द्वारा परस्‍पर संवाद किया गया। इसी कारण दुनिया के हर क्षेत्र में तरह तरह के पेण्टिंग , नृत्‍य , चित्र , मूर्ति जैसी कलाओं का विकास हुआ। कालांतर में मुख की ध्‍वनियों को नियंत्रित कर बोली विकसित हुई, जिसे सुव्‍यवस्थित कर भाषा का रूप दिया गया। सशक्‍त माध्‍यम के रूप में लेखन कला को ही सबसे अधिक पहचान मिली । हर भाषा में साहित्‍य लिखे गए, हालांकि बहुतों का लेखन नष्‍ट हो गया, फिर भी जो हैं, उन्‍हें पढकर हर देश, काल की परिस्थिति का, उसके इतिहास का अनुमान लगाया जा सकता है। 

          समय बदला, युग परिवर्तन के साथ साथ चिंतन का दायरा भी बढता गया, जिससे मानव मस्तिष्‍क में चलने वाली हलचल और बढने लगी, लोग अपने विचारो, भावनाओं को अभिव्‍यक्ति देने लगें। पर कुछ लोग ही इतने भाग्‍यशाली रहें , जिनका लिखा सुरक्षित रहा। अधिकांश का लिखा तो समकालीन भी नहीं पढ सकें। उनके अनुभव की पांडुलिपियां किसी न किसी बहाने कचरे तक पहुंच गयीं। कभी अपने परिवार , समाज और गांव के लोगों की, तो कभी किसी पत्र पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग की उपेक्षा से। 

          खासकर आज के व्‍यावसायिक युग ने तो जहां नए लेखकों को पनपने नहीं दिया , वहीं दूसरी ओर सरल व्‍यक्तित्‍व वाले अच्‍छे लेखकों को भी समाज से दूर कर डाला। ऐसे ही भुक्‍तभोगी लोगों में मेरे पिता श्रीविद्या सागर महथा जी का नाम लिया जा सकता है , जिनके लेखों ने दस वर्षों तक ज्‍योतिषीय पत्र पत्रिकाओं में धूम मचायी , ज्‍योतिष के क्षेत्र में उन्‍हें राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कितने सम्‍मान दिलाए, पर ज्‍योतिष की एक नई शाखा ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ को स्‍थापित करने के बाद परंपरागत ज्‍योतिषियों से उनकी नहीं बनी । इस कारण दिल्‍ली में आठ वर्षों तक अपनी पांडुलिपियों को लेकर प्रकाशकों के चक्‍कर काटते, फिर भी उन्‍हें सफलता नहीं मिली। उनके चिंतन से प्रभावित होकर विभिन्‍न चैनलों के पत्रकारों ने उनकी इंटरव्‍यू लेते हुए वीडीयो भी बनायी, पर उसका प्रसारण भी रोक दिया गया।

          ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ से जुड जाने के बाद इसके विकास के लिए प्रयत्‍नशील मैं उनकी इस असफलता से निराश थी कि मेरे सामने चिट्ठाकारिता एक वरदान बनकर आया। मैने झटपट ब्‍लॉगस्‍पॉट में अपना चिट्ठा बनाया और अपने कुछ लेख इसमें प्रकाशित किए , पर वहां हिंदी फॉण्‍टों को स्‍वीकार नहीं किया गया। हिंदी की दशा देखकर मैं असंतुष्‍ट थी , मुझे मजबूरी में अपने अंग्रेजी आलेख डालने पडे। लेकिन कुछ ही दिनों में मुझे यूनिकोड के बारे में जानकारी मिली, फिर मैने वर्डप्रेस में अपना ब्‍लॉग बनाया और ज्‍योतिष की एक शाखा के रूप में विकसित किए गए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के बारे मे जानकारियां प्रकाशित करनी शुरू कर दी।

          शुरूआती दौर में मैं हिंदी फॉण्‍ट में लिखे अपने आलेख को यूनिकोड में बदलती थी , पर बाद में शैलेश भारतवासी जी , अविनाश वाचस्‍पति जी आदि के सहयोग से मैने अपने कम्‍प्‍यूटर को हिंदीमय ही कर दिया। मेरा मानना है कि जिस तरह अपनी मातृभाषा में बच्‍चे को शिक्षा मिलने का अपना महत्‍व है , बिल्‍कुल वैसा ही अपनी मातृभाषा में विचारों की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का है। इसके अतिरिक्‍त हिंदी में चिट्ठाकारिता से ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के भारतवर्ष में हुए रिसर्च की प्रामाणिकता तय होती , मैं आनेवाले युग में अन्‍य शोधों की तरह इसे विवाद का विषय भी नहीं बनने देना चाहती थी।

          नियमित चिट्ठा लिखने से एक फायदा हुआ कि हमें एक मंच मिल गया, जहां हम ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सिद्धांत की चर्चा कर सकते हैं , इससे जुडे अपने विचारों को अभिव्‍यक्ति दे सकते हैं। विभिन्‍न समयांतराल में आसमान में चल रहे भिन्‍न भिन्‍न ग्रहों की खास स्थिति का किनपर अच्‍छा और किनपर बुरा प्रभाव पड रहा है , इसकी चर्चा कर सकते हैं। मौसम , शेयर बाजार , राजनीति आदि के भविष्‍य के बारे में कुछ आकलन कर पाठकों के समक्ष रख सकते हैं। हालांकि ज्‍योतिष जैसा विषय लोगों के लिए सहज ग्राह्य नहीं , पर मेरी भविष्‍यवाणियों ने पाठकों पर खासा प्रभाव डाला है।

          भूकम्‍प के बारे में एक खास तिथि को की गयी मेरी भविष्‍यवाणी के सत्‍य होने पर मेरे ब्‍लॉग में चार दिनों तक ज्‍योतिष के पक्ष और विपक्ष में चर्चा चलती रही थी। चार वर्षों के बाद अब भारत के हर शहर में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के नाम से परिचित कुछ लोग जरूर मिल जाएंगे , इसके विकास के लिए , इसके भविष्‍य के लिए यह सुखद चिन्‍ह है। इसके अलावा सिर्फ आत्‍म संतुष्टि से आरंभ किया गया चिट्ठाकारी कल व्‍यावसायिक सफलता की शुरूआत भी कर सकता है। विज्ञापन से अन्‍य भाषा के चिट्ठाकारों की कमाई शुरू हो गयी है , वह दिन देर नहीं , जब हिंदी के चिट्ठाकार भी कमाई कर पाएंगे।

          अन्‍य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अधिकांश मनोरंजन की ही बातें होती हैं , कुछ मुद्दों पर तात्‍कालिक चर्चा परिचर्चा अवश्‍य होती हैं, पर वो उतना महत्‍व नहीं रखता। चिट्ठाकारिता की बात ही अलग है , हर विषय पर पूरा साहित्‍य बनता जा रहा है। हर तरह के कीवर्ड पर सर्च इंजिन से हिंदी के लेखों के लिंक ढूढे जा सकते हैं , इसपर आयी टिप्‍पणियां पढी जा सकती हैं। हमें संविधान द्वारा विचारों को अभिव्यक्ति देने का अधिकार बहुत पहले दे दिया गया था , पर उसका इस्‍तेमाल हम 15 अगस्त 1995 से कर पा रहे हैं , जब हमें इंटरनेट पर विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार मिला है।

          पारदर्शिता बढ़ाने और जानकारी उपलब्ध कराने से लेकर लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में इसकी भागीदारी बढती जा रही है। मैं आरंभ से ही पत्र पत्रिकाएं पढने की शौकीन रही हूं , पर रेडियो, टेलीविजन या प्रकाशित सामग्री से अलग इंटरनेट के लेखों में एक ही विषय पर समान और असमान सोच वाले लोग मिलते हैं , जिससे निरपेक्ष चिंतन में मदद मिलती है। पर जैसा कि हर सुविधा का दुरूपयोग भी किया जाता है , यहां भी कुछ असामाजिक तत्‍व की सक्रियता हो सकती है। असमान विचार वालों को संतुलित ढंग से लेखों पर अपने विचार रखने की आवश्‍यकता है , ब्‍लॉगिंग की स्‍वतंत्रता को अक्षुण्‍ण बनाए रखने के लिए हमें पूरी सावधानी बनाए रखना चाहिए।

          धनात्‍मक सहसंबंध आवश्‍यक


          पृथ्‍वी की निरंतर गतिशीलता के कारण प्रत्‍येक दो घंटे में विभिन्‍न लग्‍नों का उदय है। इसकी दैनिक गति के कारण दिन और रात का अस्तित्‍व है, वार्षिक गति के कारण इसके ऋतु परिवर्तन का चक्र। गति के कारण ही चंद्रमा का बढता घटता स्‍वरूप है , गति के कारण विशिष्‍ट ग्रहों की पहचान है। सूर्य और चंद्र की गति के कारण ही नक्षत्रों का वर्गीकरण है , सूर्य और चंद्र का ग्रहण है। ग्रहों की गति के कारण ही संसार का नित नूतन पिरवेश है और इसी परिवर्तनशीलता के कारण इसका नाम जगत है। न्‍यूटन ने गति के सिद्धांत को समझा, तो भौतिक विज्ञान में क्रांति आ गयी। आज उन्‍ही सिद्धांतों को अधिक विकसित कर वैज्ञानिक अंतरिक्ष में अरबों मील की यात्रा करके तरह तरह की खोज करके सकुशल पृथ्‍वी पर लौट आते हैं।

          सृष्टि काल के आरंभ से ही सूर्य , चंद्र और सभी ग्रहों की गति हमारे लिए आकर्शण का केन्‍द्र बने रहें। वैदिककालीन विद्याओं में यह प्रमुख विद्या थी , इसलिए इसे वेद का नेत्र कहा जाता था। उस समय से आजतक आकाशीय पिंडों की गति और स्थिति के विषय में बहुत जानकारी प्राप्‍त कर ली गयी है , सभी पिंडों की गति और परिभ्रमण पथ की इतनी सूक्ष्‍म जानकारी आज है कि आज से सैकडों वर्ष बाद के सभी ग्रहों की स्थिति , सूर्य और चंद्र ग्रहण की जानकारी मिनट सेकण्‍ड की शुद्धता के साथ दी जा सकती है। सूर्य चंद्र परिभ्रमण पथ की सम्‍यक जानकारी के कारण यह भी बताया जा सकता है कि पृथ्‍वी के किस भाग में यह ग्रहण दिखाई पडेगा। यही कारण है कि गणित ज्‍योतिष की पढाई संपूर्ण विश्‍व में हो रही है। गति की सम्‍यक जानकारी के कारण ही पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग , करण आदि का समुचित उल्‍लेख किया जाता है , पर फलित के मामलों में गहों की गति की उपेक्षा की गयी है। फलित ज्‍योतिष में ग्रहों की सिर्फ स्थिति पर ही विचार किया गया है , इसलिए आज तक इसके द्वारा कहा जाने वाला फल अधूरा और अनिश्चित रह गया है।

          पृथ्‍वी स्‍वयं गतिशील है , दैनिक और वार्षिक गति के कारण अपने अक्ष और कक्षा में सदैव अपने को हजारो मील दूर ले जाती है। किंतु पृथ्‍वी वासी होने के कारण हमें इसकी गति का आभास भी नहीं हो पाता है , क्‍यूंकि पृथ्‍वी पर स्थित हर जड चेतन की गति पृथ्‍वी की गति के बराबर हो जाती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ट्रेन पर सवार सभी व्‍यक्ति विरामावस्‍था में होते हुए भी लंबी दूरी तय कर लेते हैं। फलित ज्‍योतिष के अध्‍येता अपने को ब्रह्मांड का केन्‍द्र विंदू मानकर इसे स्थिरावस्‍था में समझते हुए ही संपूर्ण ब्रह्मांड और आकाशीय पिंडों का अध्‍ययन करता है। ब्रह्मांड में दरअसल पृथ्‍वी के साथ शेष ग्रह भी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। अत: पृथ्‍वी को विरामावस्‍था में मानने से इसके सापेक्ष सभी ग्रहों की सापेक्षिक गति की जानकारी होती है।

          पृथ्‍वी सूर्य की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करता है , इस कारण उसके सापेक्ष सूर्य की समरूप गति को हम देख पाते हैं , चंद्रमा को भी पृथ्‍वी की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करते हुए देखा जा सकता है। भचक्र में ये दोनो ग्रह लगभग समरूप गति में होते हैं। सूर्य कभी उत्‍तरायण तो कभी दक्षिणायण होता है , उसके हिसाब से विभिन्‍न ऋतुएं होती हैं , विभिन्‍न नक्षत्रों से गुजरता है तो उसके अनुरूप उसका फल होता है। चंद्रमा के प्रकाशमान भाग के अनुरूप ही जातक की मनोवैज्ञानिक शक्ति होती है । किसी निश्चित तिथि को सूर्य आकाश के एक निश्चित भाग में ही होता है , पर उस दिन जन्‍म लेने वाले समस्‍त जातकों की कुंडली में विभिन्‍न भावों में दर्ज किया जाता है। उसका फल भी भिन्‍न भिन्‍न जातकों के लिए अलग अलग होता है।

          आकाश में शेष ग्रहों का पृथ्‍वी से अप्रत्‍यक्ष गत्‍यात्‍मक संबंध है। यानि की सौरमंडल में अन्‍य सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए कभी पृथ्‍वी की ओर आ जाते हैं , तो कभी पृथ्‍वी के विपरीत दिशा में। इसके कारण पृथ्‍वी से विभिन्‍न ग्रहों की दूरी और सापेक्षिक गति बढती घटती है। पृथ्‍वी के सापेक्ष कभी कभी ग्रहों की गति ऋणात्‍मक भी हो जाती है। ‘गणित ज्‍योतिष’ में इसकी विशद चर्चा है , पर ‘फलित ज्‍योतिष’ का अध्‍ययन करते वक्‍त आज तक ग्रहों की इस गति को नजरअंदाज कर दिय गया , जो ग्रहों के बलाबल का सही आधार है। यह विडंबना ही है कि बंदूक की छोटी सी गोली में उसकी शक्ति का अनुमान उसकी गति के कारण हम सहज ही कर लेते हैं। हथेली पर एक छोटा सा पत्‍थर का टुकडा रखकर अपने को बलवान समझते हैं , क्‍यंकि उसे गति देकर शक्ति उत्‍सर्जित की जा सकती है , पर हजारो मील प्रतिघंटा की गति वाले भीमकाय ग्रहों की शक्ति को आज तक ज्‍योतिषी इसकी स्थिति में ढूंढते आ रहे हें। जाने अनजाने ग्रहों की गति के रहस्‍य को नहीं समझ पाने से फलित ज्‍योतिष की गति स्‍वत: अवरूद्ध हो गयी। यही करण है कि हजारो वर्षों से इसकी स्थिति यथावत बनी हुई है और लोग इसे अनुमान शास्‍त्र कहने लगे हैं।

          प्रकृति के नियम बहुत ही सरल होते हैं , एक दो प्रतिशत ही अपवाद होते हैं,पर इसे समझने में हमें बहुत समय लग जाता है। फलित ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में ग्रह शक्ति के निर्धारण के लिए बहुत सारे नियम हैं। स्‍थान बल , काल बल , दिक बल , नैसर्गिक बल , चेष्‍टा बल , अंश बल , योग कारक बल , पक्ष बल , अयन बल , स्‍थान बल के अलावे भी ष्‍डवर्ग अष्‍टकवर्ग आदि आदि। इसका अभिप्राय यह है कि हमारे .षि मुनि पूर्व ज्‍योतिषियों ने ग्रह शक्ति को समझने की चुनौती को स्‍वीकार किया था। इस परिप्रेक्ष्‍य में उनके द्वारा बहुआयामी प्रयास किया गया , इस लिए ग्रहशक्ति से संबंधित इतने नियम हैं , किंतु व्‍यवहारिक दृष्टि से एक ज्‍योतिषी इतने नियमों को आतमसात करते हुए तल्‍लीन रहकर भविष्‍य कथन नहीं कर सकता। इतने नियमों के मध्‍य विभिन्‍न ज्‍योतिषियों के फलकथन में एकरूपता की बात हो ही नहीं सकती। ज्‍योतिष के इन जटिल सूत्रों ने ग्रह फल कथन में ज्‍योतिषियों के निष्‍कर्ष में विरूपता पैदा कर इसके वैज्ञानिक स्‍वरूप को नष्‍ट करते हुए इसे अनुमान शास्‍त्र बना दिया है। इन उलझनों से बचने के लिए एकमात्र उपाय ग्रहों की गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहरा लेना समीचीन सिद्ध हुआ है। फलित ज्‍योतिष में अन्‍य नियमों की तरह ये नियम भी ग्रह शक्ति निर्धारण के लिए एक नया प्रयोग नहीं है। सन् 1981 से अबतक चालीस पचास हजार कुंडलियों में किए गए प्रयोग का निचोड निष्‍कर्ष है।

          फलित ज्‍योतिष सबसे पुरानी विधाओं में एक वैदिककालीन विद्या है। किंतु भौतिक विज्ञान में वर्णित न्‍यूटन के गति के सिद्धांत का आविष्‍कार सन् 1887 में हुआ , इससे पूर्व ज्‍योतिष में इसका उपयोग संभव नहीं था। पर उसके बाद इसका उपयोग फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में भी होना चाहिए था , क्‍यूंकि किसी भी विज्ञान का विकास विकसित विज्ञान के साथ सहसंबंध बनाकर ही होता है। अगर हम फलित ज्‍योतिष को विज्ञान बनाना चाहते हैं तो हमें भौतिक विज्ञान में वर्णित गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहारा लेना , उसका उपयोग करना एक स्‍वस्‍थ दृष्टिकोण होगा। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में ग्रहों की गति की विशद व्‍याख्‍या करते हुए इसकी विभिन्‍न प्रकार की गतियों का सपष्‍ट भिन्‍न भिन्‍न प्रभाव मानव जाति पर कैसे पडता है , का अध्‍ययन किया गया है।

          मेरे पिताजी विद्या सागर महथा जी के द्वारा लिखा गया

          सॉफ्टवेयर को अपग्रेड करने में कल मिली एक बडी सफलता ( Astrology )

          अभी तक एक स्‍वर से गणित ज्‍योतिष को विज्ञान स्‍वीकार किए जाने के बावजूद इसी पर आधारित फलित पक्ष पर हमेशा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों के द्वारा सवालिया निशान लगाया जाता रहा है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने इसे चुनौतीपूर्ण ढंग से लेते हुए इस शास्‍त्र को भी वस्‍तुपरक बनाने का पूरा प्रयास किया है। इस चिट्ठे को नियमित तौर पर पढने वालों को मालूम हो ही गया होगा कि ग्रहों के प्रभाव की इस नई गत्‍यात्‍मक खोज के बाद किसी भी व्‍यक्ति के जन्‍म कालीन ग्रहों के आधार पर उसके पूरे जीवन के उतार चढाव का चिंत्र खींचा जा सकता है। लगभग 40 से 50 हजार लोगों की जन्‍मकुंडली में इस ग्राफ की सटीकता को देखा गया , इस पोस्‍ट में कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों के जन्‍मकालीन ग्रहों पर आधारित जीवन ग्राफ की चर्चा हुई है , जिसमें देखा जा सकता है कि उनके जीवन में परिस्थितियों का उतार चढाव इस ग्राफ के सापेक्ष ही रहा। इसी तरह हमारा सॉफ्टवेयर एक पाई चार्ट भी तैयार करता है , जिससे मालूम होता है कि पूरे जीवन आपके जीवन के विभिन्‍न संदर्भों का सुख दुख किस किस अनुपात में होगा। पर इस तरह के ग्राफ को देखने से यह स्‍पष्‍ट तो होता है कि किसी के जीवन में आनेवाला समय धनात्‍मक होगा या ऋणात्‍मक , पर यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पाता कि जीवन में उतार या चढाव किन किन संदर्भों को लेकर होगा।

          वस्‍तु परक ढंग से इसे समझाने के लिए मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी ने भी कई तरह के प्रयोग किए , जिसमें बीस पच्‍चीस वर्ष पूर्व उनके द्वारा बनायी जाने वाली हस्‍त लिखित जन्‍म कुंडली में बनाया गया एक चार्ट सबसे महत्‍वपूर्ण था ....
          इस चार्ट में एक ओर जीवन के विभिन्‍न संदर्भों का उल्‍लेख है तो दूसरी ओर जीवन के विभिन्‍न आयु वर्ग का भी। किस आयु वर्ग में किसी व्‍यक्ति के जीवन का कौन सा संदर्भ किस स्थिति में रहेगा , इसको उससे संबंधित खाने में भरा गया है।  A > B > C > D का चिन्‍ह बतलाता है कि जिस खाने में D लिखा हो उसे कार्यक्षमता , महात्‍वाकांक्षा , उत्‍तरदायित्‍व का बोध और स्‍तर के हिसाब से कमजोर और जिस खाने में A लिखा हो उसे  कार्यक्षमता , महात्‍वाकांक्षा , उत्‍तरदायित्‍व का बोध और स्‍तर के हिसाब से मजबूत समझा जाना चाहिए। इसी प्रकार + ऊंचे मनोबल के लिए तथा - मनोबल की गिरावट के लिए लिखा गया है। + और - में जितना अधिक पावर है , उस उम्र और उस संदर्भ में किसी का मनोबल उतना ही बढा या घटा हुआ होगा। इसी प्रकार दो तीन और चिन्‍ह के लिए भी अलग अलग अर्थ हैं , जिन्‍हें पाठक देख सकते हैं।

          पिछले दस वर्षों से मैं नियमित तौर पर अपने पिताजी के 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सभी सिद्धांतों को कंप्‍यूटराइज्‍ड कर कंप्‍यूटर से अलग अलग प्रकार के फल लेने की कोशिश करती आ रही हूं। काफी दिनों से मेरी भी इच्‍छा एक ऐसा ही चार्ट बनाने की थी , जिसमें अलग अलग आयु में लोगों के अलग अलग प्रकार के सुख और दुख को स्‍पष्‍टत: बताया जा सके। सहारा तो हमें इसी सूत्र का लेना था , पर परिणाम शब्‍दों में निकालना था। तीन महीने तक 84 खानों में अलग अलग सटीक परिणाम लाने के प्रयास में गंभीर मशक्‍कत होनी ही थी , पर इसके बाद कल मिली सफलता से मैं खुद ही चौंक गयी, जब मेरे सॉफ्टवेयर ने एक जन्‍मविवरण से इस तरह का पन्‍ना निकाला ........

          उम्र के जिस जिस भाग में उन्‍हें जिस जिस प्रकार की सफलताएं और असफलताएं मिली , इसका सटीक उल्‍लेख इस एक पन्‍ने में मिल जाता है , वैसे तो इस खोज का सारा श्रेय मेरे पिताजी को ही जाता है , पर मैं कंप्‍यूटर की थोडी जानकारी रखते हुए अपने सॉफ्टवेयर में सटीक परिणाम ले आती हूं तो वह भी कम बडी उपलब्धि नहीं। 

          हमारे सॉफ्टवेयर के आधार पर बने कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों के जीवनग्राफ



          मेरे ब्‍लॉग में और फेसबुक में अनेक बार जीवन ग्राफ शब्‍द की चर्चा हुई है .. शायद ही लोग जानते होंगे कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सूत्रों के आधार पर किसी के जन्‍मकालीन ग्रहों को देखकर किसी के पूरे के उतार चढाव का लेखा चित्र ख्‍ींचा जा सकता है ... जीवन ग्राफ के अनुसार ही या तो हम आराम से सफलता प्राप्‍त करते हैं या कठिन श्रम से सफलता या कठिन श्रम के बाद भी असफलता या फिर निराशाजनक वातावरण में जीने को बाध्‍य होते हैं .... कभी परिस्थितियां हमारे नियंत्रण में होती हैं तो कभी हम परिस्थितियों के नियंत्रण में ... मेरे सॉफ्टवेयर ने कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों का जीवन ग्राफ निकाला है ... इस लेख में कुछ उदाहरणों द्वारा स्‍पष्‍ट किया जा रहा है ...

          यह फिल्‍म स्‍टार संजय दत्‍त का जीवन ग्राफ है ... बचपन में मां की मृत्‍यु के उपरांत इनका 1983 तक का समय बहुत कठिनाईपूर्ण व्‍यतीत हुआ , उसके बाद 1989 तक आरामदायक जीवन था , पर 1989 के बाद से ही ग्राफ ने मोड लिया , 1995 के बाद किए जाने वाले मेहनत के बाद भी 2001 के आसपास का समय असफलतापूर्ण बना रहा , पर उसके बाद कानूनी शिकंजे में कुछ ढील मिली , इन्‍हें काम करने का वातावरण और 2007 से 2013 तक का समय तो जीवन के सर्वाधिक सफलता का समय बना रहा।। 2013 में अचानक कानूनी शिकंजा कुछ तेज हो गया है , ग्राफ के हिसाब से भी आगे समय सही नहीं दिखता।








          यह फिल्‍म स्‍टार अमिताभ बच्‍चन का जीवन ग्राफ है .. ये भी 1966 तक के जीवन को काफी सुखद नहीं मानते , परिस्थितियों की कुछ कठिनाई हो न हो स्‍वभाव के अतर्मुखी थे और उनके बाद में इतने बडे स्‍टार बन जाने की बात कोई नहीं सोंच सकता था , पर हम देख सकते हैं कि उसके बाद इनका पूरे जीवन ग्राफ सकारात्‍मक रहा और 2014 तक निरंतर काम का वातावरण और सफलता मिलती गई , 2006 से स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर यदा कदा परेशानी आती रही है वो 2014 के बाद बढ सकती है , क्‍योंकि 2014 के बाद इनके जीवन ग्राफ में ऋणात्‍मकता है।











          यह बिहार के मुख्‍य मंत्री लालू प्रसाद यादव का जीवन ग्राफ है .. बचपन से कमजोर परिस्थितियों के साथ आरंभ होने वाली जीवन यात्रा 1978 तक बहुत ही अच्‍छी बन गयी , जहां छात्र नेता के रूप में इनका व्‍यक्तित्‍व महत्‍वपूर्ण था , पर उसके बाद काम का वातावरण मिलने के बावजूद स्‍तर के बावजूद 1990 तक बडी सफलता नहीं दिख सकी , 1990 से 2002 तक ग्राफ के उत्‍तरोत्‍तर विकास के साथ मुख्‍यमंत्री के तौर पर ये महत्‍वपूर्ण बने रहें , 2002 के बाद ग्राफ में गिरावट के साथ ही इन्के सम्‍मुख कुछ न कुछ कठिनाई उपस्थित होनी आरंभ हुई और 2008 के बाद असफलता का क्रम 2014 तक किसी न किसी रूप में मौजूद रहा । 2014 में पुन: परिस्थितियों में कुछ सुधार की गुंजाइश है।










          यह मेनका गांधी का जीवन ग्राफ है .... जन्‍म से 1974 तक सुखद माहौल में पालन पोषण और व्‍यक्तित्‍व का संपूर्ण विकास प्राप्‍त करने के बाद इनका परिस्थितियों से नियंत्रण कमजोर दिखने लगा है , किस तरह की ऋणात्‍मक वातावरण को झेल रही थी , उनकी मन:स्थिति के बारे में तो मैं नहीं बता सकती , पर 1980 के बाद की परिस्थिति तो उनके ग्राफ के सत्‍य को बयान कर ही देती है। उनके साथ जो हुआ वह 1986 तक उन्‍हें निराश करने के लिए काफी था। 1986 के बाद वो निरंतर काम कर अपने महत्‍व को स्‍थापित करती जा रही है , पर 2010 तक का समय बडी सफलता का नहीं दिख रहा। 2016 के बाद कुछ अच्‍छी उम्‍मीद रखी जा सकती है।










          यह फिल्‍म स्‍टार सलमान खान का जीवन ग्राफ है , 2007 के आसपास के कुछ वर्षों को छोड दिया जाए तो 1989 से 2019 तक ग्राफ सकारात्‍मक ही दिख रहा है , निरंतर सफलता की सीढियां चढते जा रहे हैं , 2019 के बाद ही इनके जीवन में कुछ बाधाएं आ सकती हैं , जो 2025 के बाद बडा रूप ले लें।












          यह गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के जनक मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी का जीवन ग्राफ है .. जैसा कि ग्राफ की शुरूआत निम्‍न स्‍तर से हुई है , बचपन में हुए चेचक ने न सिर्फ छह महीने बिस्‍तर पर रहने मजबूर और शरीर को कुछ दिनों के लिए कमजोर किया , वरन् पूरे जीवन के लिए चेहरे पर चेचक के दाग दे दिया , पर क्रमश: बढते हुए ग्राफ ने इन्‍हें समाज में मेधावी छात्र के तौर पर स्‍थापित किया और 1963 तक की जीवनयात्रा एक विद्यार्थी के तौर पर बहुत अच्‍छी रही। पर 1963 के बाद जैसे ही ग्राफ में गिरावट आरंभ हुई , कैरियर में हर जगह असफलता ही हाथ आयी , 1969 तक निराशा के भंवर में डूबने उतराने के बाद उन्‍होने गंभीरता से प्रकृति के उस रहस्‍य को समझने की चेष्‍टा की , जिसके कारण इतने प्रतिभाशाली होते हुए भी वे ढंग की नौकरी न प्राप्‍त कर सके। छह वर्षों तक तरह तरह की ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में बिखरे पडे ज्‍योतिषीय तथ्‍यों के परत दर परत खोलते हुए उनके सामने 1975 तक सचमुच एक रहस्‍य सामने आया , उसके बाद तो ग्रहों के प्रभाव के एक एक रहस्‍य की गुत्‍थी सुलझती चली गई। 1981 के बाद प्रायोगिक तौर पर काम आरंभ हुआ और निरंतर चल रहा है।







          यह ग्राफ उ० प० के मुख्य मंत्री अखिलेश यादव की है, २०१५ तक अनायास सफलता प्राप्ति का ग्राफ दिख रहा है , ....






          यह ग्राफ क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का है , २०११ तक आसान सफलता के बाद गंभीरता बढ़ी है ……










          यह ग्राफ बॉलीवुड की महान अदाकारा हेमा मालिनी जी का है .......






          यह ग्राफ जैकी श्रॉफ को तब दिया गया था , जब लगातार उनकी हर फिल्म हिट हो रही थी ....






          यह ग्राफ संसद मनोज तिवारी का है....









          यह ग्राफ शबाना आजमी जी का है .......









          यह ग्राफ वरुण गांधी का है ...................










          यह ग्राफ पूरे आसमान में मौजूद सारे ग्रहों के चित्र को देखकर बनाया जाता है , अबतक 40,000 से ऊपर कुंडलियों में इसकी जांच हो चुकी है , विरले ही कहीं अपवाद नजर आया हो। इस खोज के बाद एक बात स्‍पष्‍ट हुई है कि आज के समाज की जो जीवनशैली है , वह प्राकृतिक तौर पर सही नहीं है , हमें अपनी जीवनशैली अपनी सोंच बदलनी होगी।