2012 में दुनिया के अंत की संभावना 3

दिसंबर 2012 में पृथ्‍वी पर प्रलय आने की संभावना को प्रमाणित करते एक दो नहीं , बहुत सारे सुबूत जुटाए गए हैं। यही कारण है कि अपने पहले और दूसरे आलेख के बाद इस तीसरे आलेख में भी मैं सारी बातें समेट नहीं पा रही हूं। दुनिया के नष्‍ट होने की संभावना में एक बडी बात यह भी आ रही है कि ऐसा संभवतः पृथ्‍वी के चुंबकीय ध्रुव बदलने के कारण होगा। वास्‍तव में हमलोग सूर्य की सिर्फ दैनिक और वार्षिक गति के बारे में जानते हैं , जबकि इसके अलावे भी सूर्य की कई गतियां हैं। 

सूर्य की तीसरी गति के अनुसार पृथ्वी क्रमश: अपनी धुरी पर भी झुकते हुए घूमती रहती है, इस समय पृथ्‍वी की धुरी सीधे ध्रुव तारे पर है इसलिये ध्रुवतारा हमको घूमता नहीं दिखाई पड़ता है। इस तरह हजारों साल पहले और हजारों साल बाद हमारा ध्रुव तारा परिवर्तित होता रहता है। धीरे धीरे ही सही , झुकते हुए पृथ्‍वी २५७०० साल में एक बार पूरा घूम जाती है।पर यह अचानक एक दिन में नहीं होता , जैसा भय लोगों को दिखाया जा रहा है। जिस तरह धरती की धुरी पलटने की बात की जा रही है, पर नासा के प्रमुख वैज्ञानिक और 'आस्क द एस्ट्रोबायलॉजिस्ट' के चीफ डॉ. डेविड मॉरिसन का कहना है कि ऐसा कभी न तो हुआ है, न ही भविष्य में कभी होगा।

इंटरनेट पर बिना नाम पते वाले कुछ वैज्ञानिकों के हवाले से लिखा जा रहा है कि प्लेनेट एक्स निबिरू नाम का एक ग्रह दिसंबर 2012 में धरती के काफी करीब से गुजरेगा। पर नासा का कहना है कि प्लेनेट एक्स निबिरू नाम के जिस ग्रह की 2012 दिसंबर को धरती से टकराने की बात की जा रही है, उसका कहीं अस्तित्व ही नहीं है। जबकि ये वैज्ञानिक कहते हैं कि यह टक्कर वैसी ही होगी, जैसी उस वक्‍त हुई थी , जब पृथ्वी से डायनासोर का नामोनिशान मिट गया था। आश्‍चर्य है , ये वैज्ञानिक डायनासोर का नोमोनिशान मिटने के सटीक कारण भी वे जानते हैं। 

अब यह कैसा टक्‍कर था , जो सिर्फ डायनोसोर का ही , और वो भी समूल नाश कर सका। अपने एक वक्तव्य में नासा ने यह स्‍वीकारा है कि इस समय एक ही लघुग्रह है, एरिस, जो सौरमंडल की बाहरी सीमा के पास की कुइपियर बेल्ट में पड़ता है और आज से 147 साल बाद 2257(ये हिसाब भी मेरी समझ में नहीं आ रहा) में पृथ्वी के कुछ निकट आएगा, तब भी उससे छह अरब चालीस करोड़ किलोमीटर दूर से निकल जाएगा। अब ऐसी स्थिति में दिसंबर 2012 में ऐसी संभावना की बात भी सही नहीं लगती।

इसके अलावे सुनामी, भूकम्‍प, ज्वालामुखी, ग्लोबल वार्मिग, अकाल, बीमारियां, आतंकवाद, युद्ध की विभीषिका व अणु बम जैसे कारणों से भी प्रलय आने की संभावना व्‍यक्‍त की जा रही है। चर्चा इस बात की भी हो रही है कि फ्रांसीसी भविष्यवक्ता माइकल द नास्त्रेदमस ने भी 2012 में धरती के खत्म होने की भविष्यवाणी की है, पर नास्‍त्रेदमस की भविष्‍यवाणी करने के आधार की मुझे कोई जानकारी नहीं कि उसकी भविष्‍यवाणियां ग्रहों के आधार पर थी या किसी प्रकार की सिद्धि के बाद। 

अभी तक घटना के घटित होने से पहले उसकी कितनी भविष्‍यवाणियां आ चुकी और कितने प्रतिशत सत्‍यता के साथ , वे तो नास्‍त्रेदमस के संकेतों को समझने वाले ही कुछ अधिक बता सकते हैं , इसलिए मैं इस विषय पर अधिक नहीं कहना चाहती। इसके अतिरिक्‍त कुछ कंप्‍यूटर इंजीनियरों द्वारा एक सॉफ्टवेयर विकसित किया गया है , जो इंटरनेट के पन्‍नों पर नजर रखकर उससे संबंधित आंकडों को एकत्रित कर आनेवाले समय के लिए भविष्‍यवाणी करता है। 

इस विधि से की गयी भविष्‍यवाणी ग्रहों के आधार पर की जानेवाली भविष्‍यवाणियों की तरह सटीक हो ही नहीं सकती इसलिए इसको मैं लॉटरी से अधिक नहीं समझती , जिसके अंधेरे में टटोलकर निकाले गए अच्‍छे या बुरे परिणाम को स्‍वीकार करने के लिए हमें बाध्‍य होना पडता है। ग्रहों के आधार पर की जानेवाली भविष्‍यवाणी के लिए अंतिम कडी कल ही प्रेषित करनेवाली हूं , इसके लिए आपको अधिक इंतजार करने की आवश्‍यकता नहीं पडेगी।

आप इतना सकारात्‍मक सोंच भी न रखें कि जरूरी बातें अनदेखी हो जाए !!

प्रकृति की कोई भी वस्‍तु और व्‍यक्ति अपने आपमें संपूर्ण नहीं होती , सबमें कुछ गुण होते हैं तो अवगुण। कुछ व्‍यक्ति उनके गुणों के साथ ही साथ अवगुणों से भी लाभ उठाने की कोशिश करते हैं , यदि अवगुणों से कोई लाभ न उठा सकें , तो उसे अनदेखा करने की कोशिश अवश्‍य करते हैं। यह उनके अच्‍छे दृष्टिकोण का परिचायक है और इससे उनके व्‍यक्तित्‍व में भी सकारात्‍मक प्रभाव पडता है। 

इसके विपरीत, कुछ व्‍यक्ति उनके गुणों का तो उपयोग कर लेते हैं , पर उसकी प्रशंसा न करते हुए अधिकांशत:  उनकी खामियों की चर्चा करते हैं। यह उनके गलत दृष्टिकोण का परिचायक है और इससे उनके व्‍यक्तित्‍व में भी ऋणात्‍मक प्रभाव पडता है। इस प्रकार हमारे व्‍यक्तित्‍व को प्रभावित करने में हमारी सोंच की बडी भूमिका होती है। पर इस दुनिया में बहुत ही कम व्‍यक्ति ऐसी सोंच वाले होते हैं , जो आधे गिलास पानी को भरा कहना चाहें , अधिकांश के लिए आधा गिलास खाली गिलास ही होता है।

कोई भी व्‍यक्ति अपने जीवन पर गौर करें , तो उसके सारे पहलू एक से नहीं दिखाई देंगे। कुछ बहुत ही संतोषजनक होगा , तो कुछ को देखकर आपको निराशा अवश्‍य होती होगी। निराशा भरे पहलूओं की अनदेखी कर और अच्‍छे पहलूओं को देखने से हमारा आत्‍मविश्‍वास बढता है। पर यदि आज आपके जीवन के सारे पहलू सुखद भी हैं तो पूरे जीवन इसके ऐसे ही बने रहने के भ्रम में न रहें। यहां सकारात्‍मक सोंच की कमी आपको हर पक्ष के प्रति सतर्क बना सकती है।  

इतने लंबे जीवन में हमारा हर दिन एक जैसा नहीं रहता है। कभी खुशियां तो कभी गम .. जीवन में सबकुछ झेलने को हम बाध्‍य होते ही हैं। जहां पुरानी उपलब्धियों को याद करके हमारा तन मन सुखी हो जाता है , वहीं अपनी पुरानी असफलता हमें कुंठित भी बना देती है। पर अधिकांश लोगों को अपने जीवन की उपलब्धियां याद नहीं रहती , वे असफलता को लेकर परेशान होते हैं। यहां सकारात्‍मक सोंच रखें , इसका आत्‍मविश्‍वास पर अच्‍छा प्रभाव पडता है।

किसी के जीवनभर को ध्‍यान से देखा जाए , तो हमें पता चलेगा कि सुख और दुख जीवन के अभिन्‍न अंग हैं। पूरे जीवन में बहुत जगहों पर ऐसा समय आता है , जब हमारे सम्‍मुख आगे बढने का रास्‍ता ही समाप्‍त दिखता है। वैसी स्थिति में बडा तनाव होता है , पर जहां ऐसी स्थिति आती है , वहीं से हमारे सामने एक नहीं , कई नए रास्‍ते दिखते हैं । उन नए रास्‍तों में से एक का चुनाव करना, साथ ही उस नए रास्‍ते में चलने में काफी दिक्‍कतें तो आती हैं , अनिश्चितता भरे वातावरण में संदेह भी स्‍वाभाविक है। 

पर कुछ ही दिनों में अधिकांश लोगों के लिए यह नया रास्‍ता सफलता के नए सोपानों को तय करने में मदद करता है। इसलिए यहां भी हमारी सकारात्‍मक सोंच मायने रखती है। संक्षेप में हम यही कह सकते हैं कि जिस परिस्थिति में या जिस मामले में आप जीने को विवश हैं , वहां अपने सकारात्‍मक सोंच से माहौल को अच्‍छा बनाएं , पर अपने कर्तब्‍यों के पालन में आप इतना सकारात्‍मक सोंच भी न रखें कि जरूरी बातें अनदेखी हो जाए।

महिलाएं अपने को कमजोर न समझें !!

शारीरिक तौर पर पुरूषों से काफी कमजोर होते हुए भी महिलाएं मानसिक तौर पर बहुत ही सशक्‍त है। यह हमारा भ्रम है कि आज पढाई लिखाई के बाद महिलाएं  मजबूत हुई हैं , वास्‍तव में महिलाएं हर युग में , हर क्षेत्र में मजबूत रही हैं। तभी तो एक मर्द पत्‍नी की आकस्‍मिक मृत्‍यु या अन्‍य किसी बीमारी वगैरह में खुद को ही संभाल नहीं पाता , बच्‍चों के कष्‍ट की न सोंचकर वह दूसरे विवाह के लिए तैयार हो जाता है , वहीं एक महिला ऐसी स्थिति आने पर न खुद स्‍वयं को संभालती है , खुद सारे कष्‍ट झेलकर भी बच्‍चों को भी अपने और पिता के सपने पर खरा उतारती है। वह आज की तरह पढी लिखी हो , या अनपढ , गांवों में रहती हो या शहर में , कोई अंतर नहीं पडता , वह जो भी ठान लेती है , कर दिखाती है। इनकी इस खासियत को उसकी कमजोरी बना दिया जाए , तो इसमें महिलाओं का कोई कसूर नहीं ।

वैसे तो प्रकृति ने महिलाओं और पुरूष दोनो को एक दूसरे का पूरक बनाया है , पर वर्तमान में नहीं , किसी भी युग में कोई भी क्षेत्र महिलाओं से अछूता नहीं रहा। यदि समाज का दबाब न रहे तो अधिकांश महिला पुरूषों के बिना आराम से जीवन यापन कर सकती है , पर महिलाओं का सहारा लिए बिना अधिकांश पुरूषों का जीवन यापन मुश्किल है। यहां तक कि बलपूर्वक नारी को हासिल कर भी कोई पुरूष सुख का अनुभव नहीं कर सकता, उन्‍हें एक समर्पित नारी की ही आवश्‍यकता होती है। खासकर आनेवाली पीढी की जिम्‍मेदारी अच्‍छी तरह निभाने में महिलाओं की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। नारी की उन्‍नति पर ही , नारी की प्रगति पर ही समाज और राष्‍ट्र को मजबूत बनाया जा सकता है।  इससे स्‍पष्‍ट है कि महिलाओं के बिना ये दुनिया एक कदम भी आगे नहीं बढ सकती।

महिलाओं के इतना मजबूत होने के बावजूद प्राचीन काल से अबतक नारियों की बदतर होती दशा के कुछ कारण मुझे स्‍पष्‍ट नजर आते हैं। सबसे बडा कारण नारियों का दो वर्ग में विभाजन है , जिसमें युग या देश के अनुरूप होनेवाला हमारा जीवनस्‍तर कोई मायने नहीं रखता। जहां कुछ महिलाएं , जो हर वक्‍त पिता , पति , भाई और पुत्र की ओर से दी जानेवाली हर प्रकार की सुख सुविधा में जी रही है , घर से बाहर भी उसके कदम सुरक्षित स्‍थलों पर होते हैं , वो अपनी स्थिति से पूरी संतुष्‍ट है , नारी के रूप में अपने को पुरूषों से कम महत्‍वपूर्ण नहीं समझ पाती। वहीं दूसरी ओर कुछ महिलाएं , जो पिता , पति , भाई और पुत्र की ओर से दिए गए कष्‍टों से ही नहीं , घर से बाहर भी हर प्रकार से संघर्ष कर रही है , कदम कदम पर अपने को पुरूषों के आगे शक्तिहीन मानने को बाध्‍य है। इन दोनो वर्गों के मध्‍य तालमेल की कमी ही महिलाओं की स्थिति को कमजोर बनाता है। जबतक  पीडित नारी का हम सही विश्‍लेषण नहीं कर पाएंगे , महिलाओं पर अत्‍याचार समाप्‍त नहीं होनेवाला।

चाहे दहेज के कारण लगातार प्रताडित किया जा रहा हो या किसी अन्‍य कारण से , आंकडे ही स्‍पष्‍ट करते हैं कि महिलाएं हर युग में प्रताडना की शिकार है महिलाओं के ऊपर होनेवाले अत्‍याचार का विरोध करने के लिए हम सभी महिलाओं को मिलजुलकर सबसे समाज का भय समाप्‍त करना होगा । आखिर समाज की आधी आबादी तो हम हैं , फिर क्‍या कारण है कि जो अत्‍याचार करता है , उसे समाज में प्रतिष्‍ठा मिलती है और महिलाएं सहे तो ठीक है न सहे तो उसकी इज्‍जत जाती है , उसका दोष निकाला जाता है। उसने कैसे कपडे पहना , किस समय बाहर गयी ,कहकर न सिर्फ उसका व्‍यवहार गलत माना जाता है ,  यहां तक कि उसके परिवारवालों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। जिसकी गल्‍ती बडी है , उसपर बडा दोषारोपण हो और जिसकी गलती छोटी हो उसपर छोटा , पर ऐसा नहीं होता। यही कारण है कि पीडित महिलाएं अपना मुंह न खोलकर सब कुछ सहने को विवश हो जाती हैं। ऐसी हालत में स्‍वाभाविक है कि जिसने गलती की , उसकी हौसला अफजाई होगी।

प्राचीन काल में महिलाओं के घर के अंदर सीमित होने से उनके प्रताडित होने की भी कोई सीमा थी , अभी भी घर के अंदर एक सीमा में ही सही , उनको प्रताडित किए जाने में महिलाओं की ही भागेदारी होती है। पढाई लिखाई और कैरियर से जुडने के बाद महिलाओं की प्रताडना का दायरा भी असीमित होता जा रहा है। पर अधिकांश समय महिलाओं को इसलिए ही प्रताडित किया जाता है , क्‍यूंकि महिलाओं को कमजोर समझा जाता है और महिलाओं को इसलिए कमजोर माना जाता है , क्‍यूंकि वे एकजुट नहीं हैं । वे स्‍वयं एक दूसरे की खामियां निकालने में लगी होती हैं और एक दो ही सही, पर पुरूष निरंकुश होकर पूरे पुरूष वर्ग को बदनाम करते जा रहे हैं। आइए, आज हम महिलाएं मिलकर प्रण लें कि किसी भी महिला को प्रताडना से बचाने के लिए , उसके हक के लिए हम एकजुट हो जाएं , क्‍यूंकि आज जो समस्‍या कहीं और दिखाई देती है , वो किसी भी क्षण हमारे साथ घट सकती है , हमारे खुद के साथ , अपनी मित्र के साथ , अपनी बहन या बेटी के साथ , क्‍यूं न हम समाज से ही इस समस्‍या को ही दूर करें।

पूर्णिमा और कई ग्रहों की अनुकूलता

दिसंबर 2012 में माया पंचांग के समाप्‍त होने के कारण विश्‍व में प्रलय आने की संभावना को काटती हुई मेरे आलेखों की श्रृंखला अभी पूरी भी नहीं हुई और कल से ही मेरे पास चंद्रग्रहण से शुरू होनेवाले इस वर्ष में ग्रहों के अच्‍छे या बुरे प्रभाव की जिज्ञासा को लेकर फोन आ रहे हैं। एक ब्‍लॉगर महेश कुमार वर्मा जी के अनुरोध पर विशेष रूप से समय निकालकर मै इस आलेख को लिखकर पोस्‍ट कर रही हूं। 20 जुलाई को सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के जड चेतन पर पडने वाले प्रभाव को काटते हुए मैने इस बात को स्‍पष्‍टत: समझाया था कि ऋषि, महर्षियों ने जन्‍मकुंडली निर्माण से लेकर भविष्‍य कथन तक के सिद्धांतों में कहीं भी आसमान के त्रिआयामी स्थिति को ध्‍यान में नहीं रखा है ।

 इसका अर्थ यह है कि फलित ज्‍योतिष में आसमान के द्विआयामी स्थिति भर का ही महत्‍व है। शायद यही कारण है कि पंचांग में प्रतिदिन के ग्रहों की द्विआयामी स्थिति ही दी होती है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ भी ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडने वाले प्रभाव में ग्रहों की द्विआयामी स्थिति को ही स्‍वीकार करता है। इस कारण सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण से प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न कैसा ?

हममें से अधिकांश लोगों को यह जानकारी नहीं होगी कि हिन्‍दी तिथि या संक्रांति के अनुसार वर्ष के शुरूआत का कोई आकाशीय आधार होता है और उसकी गणना के अनुसार वर्ष के शुरूआत को पूरे वर्ष का प्रतिनिधित्‍व करनेवाला समय माना जा सकता है , यानि सूर्य और चंद्र की स्थिति या आसमान के 360 डिग्री के बारह भागों में बंटवारा, जो 0 डिग्री से शुरू किया जाता है ,उसका पर्याप्‍त आधार है और उसे किसी भी युग में 15 डिग्री से शुरू नहीं किया जा सकता। पर अंग्रेजी कैलेण्‍डर बनाए जाने के क्रम में आसमान में स्थिर सूर्य की परिक्रमा करते हुए पृथ्‍वी की 1 जनवरी की स्थिति का कोई ऐसा महत्‍वपूर्ण आधार नहीं , जिसके कारण 1 जनवरी के 12 बजकर 1 मिनट को ही पूरे वर्ष का प्रतिनिधित्‍व करनेवाला समय माना जाए। किसी भी युग में अंग्रेजी कैलेण्‍डर को 1 जनवरी से बदलकर 15, 16, 20 जनवरी या वर्ष के किसी भी अन्‍य दिन से शुरू किया जा सकता है। फिर इस समय के चंद्रग्रहण के शुरूआत से वर्षभर का भय कैसा ?

यदि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से देखा जाए तो 2009 का अंत और 2010 के शुरूआत के वक्‍त ग्रहों की स्थिति बहुत ही अच्‍छी दिख रही है, पूर्ण चंद्र तो वैसे ही मनोनुकूल कार्यों को संपन्‍न कराने में मदद करता है , उसके साथ अन्‍य कई ग्रहों की अनुकूलता के कारण नववर्ष के कार्यक्रमों का लोग सही ढंग से आनंद ले पाएंगे। यदि वर्षभर में कहीं कोई गडबडी आएगी , तो तात्‍कालीन ग्रहों का प्रभाव होगा , न कि वर्ष की श्‍ुरूआत में होनेवाले ग्रहण के कारण का। वर्ष 2010 आपके , आपके परिवार के लिए बहुत खुशियां लेकर आए , आपकी मनोकामना पूरी हो , आप बहुत बहुत नाम यश प्राप्‍त करें , इन्‍हीं शुभकामनाओं के साथ .....

2010 आपके लिए मंगलमय हो !!

इस दुनिया में आने के बाद हमारी इच्‍छा हो या न हो , हम अपने काल , स्‍थान और परिस्थिति के अनुसार स्‍वयमेव काम करने को बाध्‍य होते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं , अपने काल , स्‍थान और परिस्थिति  के अनुरूप ही हमें फल प्राप्‍त करने की लालसा भी होती है। पर हमेशा अपने मन के अनुरूप ही प्राप्ति नहीं हो पाती , जीवन का कोई पक्ष बहुत मनोनुकूल होता है , तो कोई पक्ष हमें समझौता करने को मजबूर भी करता र‍हता है। पर यही जीवन है , इसे मानते हुए , जीवन के लंबे अंतराल में कभी थोडा अधिक , तो कभी थोडा कम पाकर भी हम अपने जीवन से लगभग संतुष्‍ट ही रहते हैं। यदि संतुष्‍ट न भी हों , तो आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु इतनी भागदौड करनी पडती है और हमारे पास समय की इतनी कमी होती है कि तनाव झेलने का प्रश्‍न ही नहीं उपस्थि‍त होता।

पर समय समय पर छोटी बडी अच्‍छी या बुरी घटनाएं आ आकर कभी हमारा उत्‍साह बढाती है , तो कभी हमें अपने कर्तब्‍यों के प्रति सचेत भी करती है। यदि हमें सर्दी जुकाम हो , तो इसका अर्थ यह है कि प्रकृति के द्वारा अगली बार ठंड से बचने के लिए हमें आगाह किया जाता है। इसी प्रकार पेट की गडबडी हो तो हम संयम से खाने पीने की सीख लेते हैं। ऐसी घटनाओं में कभी भी अनर्थ नहीं हुआ करता। पर इस दुनिया के लाखों लोगों में से कभी कभी किसी एक के साथ कोई बडी सुख भरी या कोई दुखभरी घटना घट जाया करती है , जो सिर्फ उसके लिए ही नहीं , पूरे समाज और देश तक के लिए आनंददायक या कष्‍टकर हो जाती है। 

प्रकृति में ये घटनाएं सामूहिक रूप से हमारा उत्‍साह बढाने या हमें सावधान करने के लिए होती रहती है। कहीं ठीक से पालन पोषण होने से किसी का बच्‍चा 'बडा आदमी' बन जाता है तो कहीं ठीक से न होने से किसी का बच्‍चा 'चोर डाकू' भी बन जाता है। कहीं पर रिश्‍तो की मजबूती हमारे जीवन को स्‍वर्ग बनाने में सक्षम है तो कहीं ढंग से रिश्‍तो को नहीं निभाए जाने से पति पत्‍नी के मध्‍य तलाक तक की नौबत आती है। कहीं ढंग से काम न करने से किसी प्रकार की दुर्घटना होती है , तो कहीं सही देखभाल न होने से किसी की मौत। यदि सामूहिक तौर पर देखा जाए एक लाख से भी अधिक लोगों में से  किसी एक व्‍यक्ति के साथ हुई इस प्रकार की घटना से बाकी 99,999 से भी अधिक लोग सावधानी से जीना सीख जाते हैं।

पर सावधान बने रहने की इस सीख को भयावह रूप में देखकर हम अक्‍सर अपने तनाव को बढा लेते हैं। प्रकृति में अति दुखद घटनाओं की संख्‍या बहुत ही विरल होती है। ऐसी समस्‍याएं अक्‍सर नहीं आती, कभी कभार ही लोगों को इस प्रकार की समस्‍या में जीना पडता है। पर प्रकृति के इस नियम को हम बिल्‍कुल नहीं समझ पाते। सबसे पहले तो अपने धन , पद और आत्‍मविश्‍वास में हम किसी प्रकार की अनहोनी की संभावना को ही नकार देते हैं। प्रकृति के महत्‍व को ही स्‍वीकार नहीं करते और जब कोई छोटी समस्‍या भी आए तो उसे छोटे रूप में स्‍वीकार ही नहीं कर पाते। मामूली बातों को भी वे भयावह रूप में देखने लगते हैं।  

जैसे किसी अच्‍छे स्‍कूल या कॉलेज में बच्‍चे का दाखिला न हो सका , तो हमें बच्‍चे का पूरा जीवन व्‍यर्थ नजर आने लगता है। बच्‍चे को कहीं थोडी सी चोट लग गयी हो तो भयावह कल्‍पना करते हुए हमारा मन घबराने लगता है , बेटे का पढाई में मन नहीं लग रहा तो भविष्‍य में उसके रोजी रोटी की समस्‍या दिखने लगती है। बच्‍ची का विवाह नहीं हो रहा हो , तो उसके जीवनभर अविवाहित बने रहने की चिंता सताने लगती है। लेकिन ऐसा नहीं होता , देश , काल और परिस्थिति के अनुसार सभी के काम होने ही हैं , इसलिए अपने परिवार के कर्तब्‍यों का पालन करते हुए इसकी छोटी छोटी चिंता को छोड हमें अपने कर्तब्‍यों के द्वारा देश और समाज को मजबूत बनाने के प्रयास करने चाहिए।

अपने अनुभव में मैंने पाया है कि चिंता में घिरे अधिकांश लोग सिर्फ शक या संदेह में अपना समय बर्वाद करते हैं। इस दुनिया में सारे लोगों का काम एक साथ होना संभव नहीं , यह जानते हुए भी लोग बेवजह चिंता करते हैं। हमारे धर्मग्रंथ 'गीता' का सार यही है कि हमारा सिर्फ कर्म पर अधिकार है , फल पर नहीं। इसका अर्थ यही है कि फल की प्राप्ति में देर सवेर संभव है।  इस बात को समझते हुए हम कर्तब्‍य के पथ पर अविराम यात्रा करते रहें , तो 2010 ही क्‍या , उसके बाद भी आनेवाला हर वर्ष हमारे लिए मंगलमय होगा। मैं कामना करती हूं कि आनेवाले वर्ष आपके लिए हर प्रकार की सुख और सफलता लेकर आए !