नेकी कर दरिया में डाल ..

मानव जीवन में अपने और अपने परिवार के मामलों की ही इतनी जिम्‍मेदारी होती है कि उसी के पालन पोषण में हमारा सारा जीवन कट जाता है। किसी परिवार में तीन पीढी तक की जबाबदेही प्रत्‍येक मनुष्‍य का कर्तब्‍य है और उसे कभी भी अपनी नेकी नहीं माननी चाहिए। कभी अपने सुख के लिए,  कभी अपनों के सुख के लिए और कभी समाज में स्‍थान पाने के लिए हम उस कर्तब्‍य का पालन करते हैं। इस दुनिया में हम बहुतों को गरीब , असहाय और कमजोर पाते हैं, पर किसी की मदद करने या उसे ऊंचाई पर ले जाने का हमें कभी भी ख्‍याल नहीं आता है। 

कभी कभी ख्‍याल आए भी तो हम वैसा कर पाने में असमर्थ ही होते हैं और सबकुछ उनके भरोसे छोड देते हैं। पर अपने पूरे जीवन में कभी कभार हमारे समक्ष ऐसा मौका जरूर आ जाया करता है , जहां हम  खुद और अपने परिवार के अतिरिक्‍त किसी और के लिए भी कुछ न कुछ व्‍यवस्‍था कर पाते हैं। ऐसा नहीं है कि हम उसकी मदद करते वक्‍त जीजान लगा देते हैं, वास्‍तव मे हमारे छोटे से त्‍याग या छोटी सी मदद से उस बेचारे या लाचार का बहुत बडा काम बन जाता है , यहां तक कि वहीं से उसके जीवन में सुधार आता है। यहां हमारा कोई स्‍वार्थ नहीं होता और मात्र सामाजिक मामलों में रूचि रखने के कारण हम अपना काम कर लेते हैं।

पर अक्‍सर ऐसा होता है कि सामने वाला हमारी उस मदद के बाद गायब ही हो जाता है या कभी कभी समय के साथ हमारे किए को भूल जाता है। ऐसी स्थिति में हमें बडा बुरा लगता है , आखिर उसकी मजबूती का एक बडा कारण हमारा उसके साथ खडा होना था। पर हम यह नहीं समझ पाते हैं कि यदि हमारे करने से किसी का जीवन सुधरना होता , तो हजारों लाखों लोगों का जीवन हम सुधार पाते , पर इस जीवन में ऐसा नहीं होता है , यहां तक कि हम अपने बच्‍चों तक का जीवन सुधारने में कभी कभी लाचार होते हैं। 

दरअसल प्रकृति में जो व्‍यवस्‍था है , उसी के अनुरूप हमें काम करना होता है। किसी व्‍यक्ति का काम करवाना प्रकृति की व्‍यवस्‍था है , वह कभी कभी हमें माध्‍यम बनाकर वह अवसर देना चाहती है , जहां हम किसी की मदद कर सकें। उस कर्तब्‍य को पूरा करने के बाद अपने पूरे जीवन में कहीं कोई संयोग या अवसर प्राप्‍त करने के हम लायक बन जाते हैं। पर प्रकृति के इस संकेत को न समझकर किसी की मदद न कर हम अक्‍सर अपने जीवन के अमूल्‍य अवसरों को खो देते हैं।

सामाजिक तौर पर इस प्रकार के कार्य नहीं होते तो आज मानव का इस दुनिया में टिक पाना भी मुश्किल होता। पर हम कहीं किसी की छोटी मदद कर देते हैं , तो इस संदेह में ही होते हैं कि हमने ही उसे बनाया । पर ऐसा नहीं है , उसका काम होना था , हम माध्‍यम बने तो इससे हमारे हिस्‍से भी वह बहुत सुख आया , जो आज हमें नहीं दिखाई दे रहा , पर उसके आगे हर सांसारिक सफलता छोटी होगी। 

यदि हम न बनते , कोई और बनता और उसकी तरक्‍की तो निश्चित थी , पर जो सुख हमारे हिस्‍से में आया , वह किसी और के हिस्‍से में जाता। इस दुनिया में यह आवश्‍यक नहीं कि हमने जिसकी की , वही हमारा भी करेगा , पर हमारी जरूरत पर भी कोई और खडा होकर हमें मुसीबत से निकाल लाएगा। समाज में इस प्रकार का लेन देन चलता रहता है , इसलिए हमें दूसरों की ऐसी मदद करनी ही चाहिए , और इसका परिणाम सार्थक होगा , यह सोंचकर निश्चिंत रहना चाहिए। इसलिए तो कहा गया है नेकी कर दरिया में डाल !

2012 में दुनिया के अंत की संभावना 4

जब अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की ओर से पृथ्‍वी के धुर बदलने या किसी प्रकार के ग्रह के टकराने की संभावना से इंकार किया जा रहा है , तो निश्चित तौर पर प्रलय की संभावना सुनामी, भूकम्‍प, ज्वालामुखी, ग्लोबल वार्मिग,अकाल, बीमारियां, आतंकवाद, युद्ध की विभीषिका व अणु बम जैसी घटनाओं से ही मानी जा सकती है, जिनका कोई निश्चित चक्र न होने से उसके घटने की निश्चित तिथि की जानकारी अभी तक वैज्ञानिकों को नहीं है। 

पिछले 40 वर्षों से‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’विश्‍व भर में होनेवाले इन प्राकृतिक या मानवकृत बुरी घटनाओं का ग्रहीय कारण ढूंढता रहा है। बहुत जगहों पर खास ग्रह स्थिति के वक्‍त दुनिया में कई प्रकार की घटनाएं होती दिख जाती हैं। पर चूंकि पूरे ब्रह्मांड में पृथ्‍वी की स्थिति एक विंदू से अधिक नहीं , इस कारण घटना की जगह को निर्धारित करने मे हमें अभी तक कठिनाई आ रही है। वैसे इन घटनाओं की तिथियों और समय को निकालने में जिस हद तक हमें सफलता मिल रही है , आनेवाले समय में आक्षांस और देशांतर रेखाओं की सहायता से स्‍थान की जानकारी भी मिल जाएगी , इसका हमें विश्‍वास है।

पिछले 16 सितम्‍बर को मैने एक आलेख ’19 सितंबर की ग्रह स्थिति से ... बचके रहना रे बाबा’शीर्षक से एक पोस्‍ट किया था , जिसमें एक खास ग्रह स्थिति की चर्चा करते हुए मैने लिखा था ... ऐसी ही सुखद या दुखद ग्रहीय स्थिति कभी सारे संसार , पूरे देश या कोई खास ग्रुप के लिए किसी जीत या मानवीय उपलब्धि की खुशी तथा प्राकृतिक विपत्ति का कारण बनती है तो कभी प्राकृतिक आपदा , मानवकृत कृत्‍य या किसी हार का गम एक साथ ही सब महसूस करते हैं। आनेवाले 19 सितम्‍बर को 5 बजे से 9 बजे सुबह भी आकाश में ग्रहों की ऐसी ही स्थिति बन रही है , जिसका पूरी दुनिया में यत्र तत्र कुछ बुरा प्रभाव महसूस किया जा सकता है। इसका प्रभाव 18 सितम्‍बर और 20 सितम्‍बर को भी महसूस किया जा सकता है।

ठीक 20 सितंबर 2009 , रविवार के दिन समाचार पत्र में पढने को मिला कि इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में शनिवार यानि 19 सितंबर को सुबह 6.04 बजे भूकम्प के तेज झटके महसूस किए गए। रिक्टर पैमाने पर 6.4 की तीव्रता वाले इस भूकम्प में नौ लोग घायल हो गए और कई भवन क्षतिग्रस्त हो गए। ठीक मेरे बताए गए दिन ठीक मेरे बताए गए समय में दुनिया के किसी कोने में भी प्राकृतिक आपदा का होना उन सबों को ज्‍योतिष के प्रति विश्‍वास जगाने में अवश्‍य समर्थ होगा, जिनका दिमाग ज्‍योतिष के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त न हो। पर पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त लोग उस तिथि और समय पर ध्‍यान न देते हुए अभी भी मुझसे यह मांग कर बैठेंगे कि आपने शहर या देश की चर्चा क्‍यूं नहीं की। इस प्रश्‍न का जबाब फिलहाल मेरे पास नहीं , जो मेरे हार मान लेने का एक बडा कारण है।

इस उदाहरण को देकर मैं ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की ओर आप सबों का ध्‍यान आकृष्‍ट करना चाहती हूं , ताकि आप इसकी भविष्‍यवाणियों पर गौर कर सके। इस सिद्धांत को समझने की कोशिश करते हुए इस टार्च के सहारे आप कुछ कार्यक्रम बना सकें। मेडिकल साइंस ने भी हड्डियों की आंतरिक स्थिति को जानने के लिए पहले एक्‍सरे को ढूंढा और जब उसे मान्‍यता मिली , उसपर खर्च हुआ , हजारो हजार लोगों ने रिसर्च करना शुरू किया , तो वे स्‍कैनिंग जैसी सूक्ष्‍म व्‍यवस्‍था तक पहुंचे , पर ज्‍योतिष में सबसे पहले ही सूक्ष्‍मतम बातों की मांग की जाती है, यही हमारे लिए अफसोस जनक है।

कल 6 जनवरी 2010 को भी असमान में ग्रहों की एक महत्‍वपूर्ण स्थिति बन रही है , यह योग लगभग सभी देशों में 9 बजे रात्रि से लेकर 12 बजे रात्रि तक के आसपास उपस्थित होगा। पर यह सिर्फ भयावह नहीं , इस ग्रहयोग के कारण छोटी बडी ही सही , किसी के समक्ष अच्‍छी तो किसी के समक्ष बुरी घटना उपस्थित हो सकती है। इस ग्रहयोग का पृथ्‍वी पर 5 जनवरी और 7 जनवरी को भी प्रभाव देखा जा सकता है। इस योग के कारण इस समय कहीं भी किसी प्रकार की दैवी या मानवकृत आपदा की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 

अभी तक हमारा आकलन विश्‍व में कहीं भी को लेकर ही चल रहा था , पर पहली बार देशांतर रेखा के आधार पर 110 डिग्री से 155 डिग्री पू तक पहुंचने की मैने कोशिश की है। आक्षांस रेखा के बारे में अभी तक किसी निष्‍कर्ष पर नहीं पहुंच सकी हूं , इस कारण इसकी चर्चा नहीं कर सकती , वैसे अनिवार्य नहीं कि कहीं कोई घटना घट ही जाए , पर ऐसे ग्रह योगों में कुछ कुछ घटनाओं के होने से 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सिद्धांत के अनुसार कुछ आशंका तो दिख ही रही है।

पूरे विश्‍व में प्रसारित 21 दिसंबर 2012 के प्रलय की संभावना के पक्ष में इतने सारे तर्क को देखते हुए इस दिन की ग्रह स्थिति का मैने गंभीरतापूर्वक अध्‍ययन किया। उस दिन की ग्रहीय स्थिति मानव मन के बिल्‍कुल मनोनुकूल दिख रही है। एक बृहस्‍पति को छोडकर बाकी सभी ग्रह गत्‍यात्‍मक शक्ति से संपन्‍न दिखाई दे रहे हैं , जो जनसंख्‍या के बडे प्रतिशत को किसी भी प्रकार का तनाव दे पाने में असमर्थ हैं।

 बृहस्‍पति की स्थिति कमजोर होते हुए भी इतनी बुरी नहीं कि वो प्रलय की कोई भी संभावना की पुष्टि करे, उस प्रलय से बचे दस, सौ , हजार, लाख या कुछ करोड व्‍यक्ति दुनिया को देखकर दुखी हों। इसका कारण यह है कि सुनामी, भूकम्‍प, ज्वालामुखी, ग्लोबल वार्मिग,अकाल, बीमारियां, आतंकवाद, युद्ध की विभीषिका या अणु बम के लिए जबाबदेह जो भी ग्रहस्थिति हमें अभी तक दिखाई पडी, उसमें से एक भी उस दिन मौजूद नहीं है , जैसे योग में जानेवाले तो चले जाते हैं , पर जीनेवाले गम में होते हैं, और यही कारण है कि उस दिन हमें ऐसी प्रलय की भी कोई संभावना नहीं दिखती।

आप सबों को मालूम हेगा कि ग्रहों की प्रतिदिन की स्थिति को जानने के लिए हमलोग पंचांग का उपयोग करते हैं। फिलहाल मेरे पास जो पंचांग उपलब्‍ध हैं , उनमें 1890 से लेकर 2010 तक की सारे ग्रहों की प्रतिदिन की स्थिति मौजूद है , पर अभी तक 2011 के बाद का पंचांग उपलब्‍ध नहीं हो पाया है। 21 दिसंबर 2012 की गणना यानि एक दिन की ग्रहस्थिति ही मैने बहुत मेहनत से निकाली है , 2012 के बाकी 365 दिनों की ग्रहों की स्थिति पर अभी तक गौर नहीं कर सकी हूं , इसलिए उस पूरे वर्ष के बारे में मैं अभी कोई संभावना व्‍यक्‍त नहीं कर सकती। 

जैसे ही नया पंचांग उपलब्‍ध हो जाएगा , मैं 2012 के वर्षभर की ग्रहदशा पर गौर करते हुए पूरे विश्‍व में होने वाली प्राकृतिक आपदा या मानवकृत आपदाओं से संबंधित घटनाओं की चर्चा करने की कोशिश करूंगी , लेकिन वो निश्चित तौर पर छोटी मोटी ही घटना होगी। क्‍यूंकि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' आज तक ग्रंथों में लिखी या अपने द्वारा प्रतिपादित उन्‍हीं सिद्धांतों को सच मानता आया है , जो उसके प्रयोग , परीक्षण के दौर से बारंबार गुजरी हो और अपनी सत्‍यता को प्रमाणित कर चुकी हो। एक ऐसा प्रलय, जिसमें सारे के सारे व्‍यक्ति मर जाएं, वैसा कभी हुआ ही नहीं और ऐसी किसी बात को हमने जांचा ही नहीं तो भला वैसी भविष्‍यवाणी मैं कैसे कर सकती हूं ??


देश के परंपरागत ज्ञान

आज विज्ञान का जितने व्‍यापक अर्थ में प्रयोग किया जाता है , उतना व्‍यापक अर्थ लेते हुए तो कम से कम इस शब्‍द को नहीं रचा गया था। 'विज्ञान' शब्‍द 'वि + ज्ञान' से बना था , जिसका अर्थ विशेष ज्ञान होता है। पूरी दुनिया के एक एक कण का भिन्‍न भिन्‍न स्‍वभाव है और सबका एक दूसरे से किसी  न किसी प्रकार का संबंध है। यही कारण है कि प्रकृति में रहस्‍य ही रहस्‍य भरे पडे हैं। 

जिस क्षेत्र से भी व्‍यक्तियों का समूह जुडा ,चाहे वो पशुपालन हो या कृषि कार्य , घर मकान का निर्माण हो या जलाशय का , यातायात हो या संचार , रसोई का क्षेत्र हो या चिकित्‍सा का , किसी भी क्षेत्र में प्रकृति के नियमों की मदद लेने की उसे आवश्‍यकता अवश्‍य पडी। प्रकृति के विशेषताओं की चर्चा करनेवाला खास नियमों का समूह ही विज्ञान कहलाया और इस विज्ञान की हर शाखा के विशेषज्ञ हमारे समाज में मौजूद थे। हमारा परंपरागत ज्ञान उसी पर आधारित है , जिसके बल बूते हमारी अभी तक की स्‍वस्‍थ परंपरागत जीवनशैली बनी हुई है ।

जैसे जैसे प्रकृति के रहस्‍यों का खुलासा होता गया , वैसे वैसे विज्ञान का भी विकास होता गया। क्रमिक विकास प्रकृति का नियम है , हजारो साल से इसी ढंग से विज्ञान का विकास हो रहा है। क्रमिक विकास में प्रकृति का नुकसान भी नहीं होता और हम इससे जुडे भी रह जाते हैं, पर इसमें प्रकृति के विपरीत चलने की शक्ति हमारे पास नहीं होती है। इधर हाल के वर्षों में तेजी से हुए विज्ञान का चहुंमुखी विकास न हो पाने से समस्‍याएं बढती जा रही हैं। 

मनुष्‍य की गल्‍ती के फलस्‍वरूप प्राकृतिक संपत्तियों का बडी मात्रा में नुकसान हुआ है और दिन प्रतिदिन स्थिति और बिगडती जा रही है। चाहे आज के वैज्ञानिक  इस विज्ञान के पक्ष में लाख दलीलें दें , पांच प्रतिशत लोगों को सुख सुविधा देने के लिए 95 प्रतिशत लोगों को कष्‍ट पहुंचाता विज्ञान का यह रूप सर्वमान्‍य नहीं हो सकता। हमें विज्ञान को इस ढंग से विकसित करने की आवश्‍यकता है ताकि अधिक से अधिक लोगों को लाभ पहुंच सके।

प्राचीन काल में हमारे देश में परंपरागत ज्ञान का आधार बहुत ही सटीक था, एक क्षेत्र का विकास दूसरे सभी क्षेत्रों से संतुलन बनाकर होता था। पर अचानक पाश्‍चात्‍य के प्रभाव ने परंपरागत ज्ञान को बेकार समझा और आज भी हम उसे महत्‍व नहीं दे रहे हैं। इस कारण हमारे परंपरागत ज्ञान को धरोहर के रूप में संभाले रखने वाले व्‍यक्ति आज उपेक्षित जीवन जीने को विवश है , आज उनके विशेष ज्ञान का कोई मूल्‍य नही रह गया है। 

भारतवर्ष में वर्षों से परंपरागत ज्ञान को विदेशियों द्वारा नुकसान पहुंचाया जाता रहा है। किसी भी प्रकार के परंपरागत ज्ञान को जाननेवालों की अंतिम पीढी ही अब जीवित रह सके हैं , इसलिए उन जानकारियों को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जाना चाहिए , जबकि 100 - 200 वर्ष पूर्व के विज्ञान के जानकार की तुलना आज के विकसित वैज्ञानिकों से करते हुए उन्‍हें कमजोर देखकर हम अक्‍सर उनके ज्ञान का उपहास उडाते हैं।

किसी भी क्षेत्र के विशेषज्ञ की तुलना हमें सामान्‍य व्‍यक्ति से करनी चाहिए।यदि सामान्‍य व्‍यक्ति की तुलना में उसका अनुमान , उसकी गणना , उसका निर्णय अधिक सटीक होता है तो हमें यह मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि वह उस क्षेत्र का विशेषज्ञ है। जिस दिन हम ऐसा मान लेंगे , हमारे चारों ओर परंपरागत ज्ञान के जानकार दिखाई देंगे , जिनके अनुभव से हम काफी लाभ उठा सकते हैं और आज की जीवनशैली से कोसों दूर खास जीवनशैली के सहारे अपने जीवन को खुशमय बना सकते हैं। यदि अभी भी नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी और हम हमेशा के लिए अपने परंपरागत ज्ञान को खो देंगे।

2012 में दुनिया के अंत की संभावना 3

दिसंबर 2012 में पृथ्‍वी पर प्रलय आने की संभावना को प्रमाणित करते एक दो नहीं , बहुत सारे सुबूत जुटाए गए हैं। यही कारण है कि अपने पहले और दूसरे आलेख के बाद इस तीसरे आलेख में भी मैं सारी बातें समेट नहीं पा रही हूं। दुनिया के नष्‍ट होने की संभावना में एक बडी बात यह भी आ रही है कि ऐसा संभवतः पृथ्‍वी के चुंबकीय ध्रुव बदलने के कारण होगा। वास्‍तव में हमलोग सूर्य की सिर्फ दैनिक और वार्षिक गति के बारे में जानते हैं , जबकि इसके अलावे भी सूर्य की कई गतियां हैं। 

सूर्य की तीसरी गति के अनुसार पृथ्वी क्रमश: अपनी धुरी पर भी झुकते हुए घूमती रहती है, इस समय पृथ्‍वी की धुरी सीधे ध्रुव तारे पर है इसलिये ध्रुवतारा हमको घूमता नहीं दिखाई पड़ता है। इस तरह हजारों साल पहले और हजारों साल बाद हमारा ध्रुव तारा परिवर्तित होता रहता है। धीरे धीरे ही सही , झुकते हुए पृथ्‍वी २५७०० साल में एक बार पूरा घूम जाती है।पर यह अचानक एक दिन में नहीं होता , जैसा भय लोगों को दिखाया जा रहा है। जिस तरह धरती की धुरी पलटने की बात की जा रही है, पर नासा के प्रमुख वैज्ञानिक और 'आस्क द एस्ट्रोबायलॉजिस्ट' के चीफ डॉ. डेविड मॉरिसन का कहना है कि ऐसा कभी न तो हुआ है, न ही भविष्य में कभी होगा।

इंटरनेट पर बिना नाम पते वाले कुछ वैज्ञानिकों के हवाले से लिखा जा रहा है कि प्लेनेट एक्स निबिरू नाम का एक ग्रह दिसंबर 2012 में धरती के काफी करीब से गुजरेगा। पर नासा का कहना है कि प्लेनेट एक्स निबिरू नाम के जिस ग्रह की 2012 दिसंबर को धरती से टकराने की बात की जा रही है, उसका कहीं अस्तित्व ही नहीं है। जबकि ये वैज्ञानिक कहते हैं कि यह टक्कर वैसी ही होगी, जैसी उस वक्‍त हुई थी , जब पृथ्वी से डायनासोर का नामोनिशान मिट गया था। आश्‍चर्य है , ये वैज्ञानिक डायनासोर का नोमोनिशान मिटने के सटीक कारण भी वे जानते हैं। 

अब यह कैसा टक्‍कर था , जो सिर्फ डायनोसोर का ही , और वो भी समूल नाश कर सका। अपने एक वक्तव्य में नासा ने यह स्‍वीकारा है कि इस समय एक ही लघुग्रह है, एरिस, जो सौरमंडल की बाहरी सीमा के पास की कुइपियर बेल्ट में पड़ता है और आज से 147 साल बाद 2257(ये हिसाब भी मेरी समझ में नहीं आ रहा) में पृथ्वी के कुछ निकट आएगा, तब भी उससे छह अरब चालीस करोड़ किलोमीटर दूर से निकल जाएगा। अब ऐसी स्थिति में दिसंबर 2012 में ऐसी संभावना की बात भी सही नहीं लगती।

इसके अलावे सुनामी, भूकम्‍प, ज्वालामुखी, ग्लोबल वार्मिग, अकाल, बीमारियां, आतंकवाद, युद्ध की विभीषिका व अणु बम जैसे कारणों से भी प्रलय आने की संभावना व्‍यक्‍त की जा रही है। चर्चा इस बात की भी हो रही है कि फ्रांसीसी भविष्यवक्ता माइकल द नास्त्रेदमस ने भी 2012 में धरती के खत्म होने की भविष्यवाणी की है, पर नास्‍त्रेदमस की भविष्‍यवाणी करने के आधार की मुझे कोई जानकारी नहीं कि उसकी भविष्‍यवाणियां ग्रहों के आधार पर थी या किसी प्रकार की सिद्धि के बाद। 

अभी तक घटना के घटित होने से पहले उसकी कितनी भविष्‍यवाणियां आ चुकी और कितने प्रतिशत सत्‍यता के साथ , वे तो नास्‍त्रेदमस के संकेतों को समझने वाले ही कुछ अधिक बता सकते हैं , इसलिए मैं इस विषय पर अधिक नहीं कहना चाहती। इसके अतिरिक्‍त कुछ कंप्‍यूटर इंजीनियरों द्वारा एक सॉफ्टवेयर विकसित किया गया है , जो इंटरनेट के पन्‍नों पर नजर रखकर उससे संबंधित आंकडों को एकत्रित कर आनेवाले समय के लिए भविष्‍यवाणी करता है। 

इस विधि से की गयी भविष्‍यवाणी ग्रहों के आधार पर की जानेवाली भविष्‍यवाणियों की तरह सटीक हो ही नहीं सकती इसलिए इसको मैं लॉटरी से अधिक नहीं समझती , जिसके अंधेरे में टटोलकर निकाले गए अच्‍छे या बुरे परिणाम को स्‍वीकार करने के लिए हमें बाध्‍य होना पडता है। ग्रहों के आधार पर की जानेवाली भविष्‍यवाणी के लिए अंतिम कडी कल ही प्रेषित करनेवाली हूं , इसके लिए आपको अधिक इंतजार करने की आवश्‍यकता नहीं पडेगी।

आप इतना सकारात्‍मक सोंच भी न रखें कि जरूरी बातें अनदेखी हो जाए !!

प्रकृति की कोई भी वस्‍तु और व्‍यक्ति अपने आपमें संपूर्ण नहीं होती , सबमें कुछ गुण होते हैं तो अवगुण। कुछ व्‍यक्ति उनके गुणों के साथ ही साथ अवगुणों से भी लाभ उठाने की कोशिश करते हैं , यदि अवगुणों से कोई लाभ न उठा सकें , तो उसे अनदेखा करने की कोशिश अवश्‍य करते हैं। यह उनके अच्‍छे दृष्टिकोण का परिचायक है और इससे उनके व्‍यक्तित्‍व में भी सकारात्‍मक प्रभाव पडता है। 

इसके विपरीत, कुछ व्‍यक्ति उनके गुणों का तो उपयोग कर लेते हैं , पर उसकी प्रशंसा न करते हुए अधिकांशत:  उनकी खामियों की चर्चा करते हैं। यह उनके गलत दृष्टिकोण का परिचायक है और इससे उनके व्‍यक्तित्‍व में भी ऋणात्‍मक प्रभाव पडता है। इस प्रकार हमारे व्‍यक्तित्‍व को प्रभावित करने में हमारी सोंच की बडी भूमिका होती है। पर इस दुनिया में बहुत ही कम व्‍यक्ति ऐसी सोंच वाले होते हैं , जो आधे गिलास पानी को भरा कहना चाहें , अधिकांश के लिए आधा गिलास खाली गिलास ही होता है।

कोई भी व्‍यक्ति अपने जीवन पर गौर करें , तो उसके सारे पहलू एक से नहीं दिखाई देंगे। कुछ बहुत ही संतोषजनक होगा , तो कुछ को देखकर आपको निराशा अवश्‍य होती होगी। निराशा भरे पहलूओं की अनदेखी कर और अच्‍छे पहलूओं को देखने से हमारा आत्‍मविश्‍वास बढता है। पर यदि आज आपके जीवन के सारे पहलू सुखद भी हैं तो पूरे जीवन इसके ऐसे ही बने रहने के भ्रम में न रहें। यहां सकारात्‍मक सोंच की कमी आपको हर पक्ष के प्रति सतर्क बना सकती है।  

इतने लंबे जीवन में हमारा हर दिन एक जैसा नहीं रहता है। कभी खुशियां तो कभी गम .. जीवन में सबकुछ झेलने को हम बाध्‍य होते ही हैं। जहां पुरानी उपलब्धियों को याद करके हमारा तन मन सुखी हो जाता है , वहीं अपनी पुरानी असफलता हमें कुंठित भी बना देती है। पर अधिकांश लोगों को अपने जीवन की उपलब्धियां याद नहीं रहती , वे असफलता को लेकर परेशान होते हैं। यहां सकारात्‍मक सोंच रखें , इसका आत्‍मविश्‍वास पर अच्‍छा प्रभाव पडता है।

किसी के जीवनभर को ध्‍यान से देखा जाए , तो हमें पता चलेगा कि सुख और दुख जीवन के अभिन्‍न अंग हैं। पूरे जीवन में बहुत जगहों पर ऐसा समय आता है , जब हमारे सम्‍मुख आगे बढने का रास्‍ता ही समाप्‍त दिखता है। वैसी स्थिति में बडा तनाव होता है , पर जहां ऐसी स्थिति आती है , वहीं से हमारे सामने एक नहीं , कई नए रास्‍ते दिखते हैं । उन नए रास्‍तों में से एक का चुनाव करना, साथ ही उस नए रास्‍ते में चलने में काफी दिक्‍कतें तो आती हैं , अनिश्चितता भरे वातावरण में संदेह भी स्‍वाभाविक है। 

पर कुछ ही दिनों में अधिकांश लोगों के लिए यह नया रास्‍ता सफलता के नए सोपानों को तय करने में मदद करता है। इसलिए यहां भी हमारी सकारात्‍मक सोंच मायने रखती है। संक्षेप में हम यही कह सकते हैं कि जिस परिस्थिति में या जिस मामले में आप जीने को विवश हैं , वहां अपने सकारात्‍मक सोंच से माहौल को अच्‍छा बनाएं , पर अपने कर्तब्‍यों के पालन में आप इतना सकारात्‍मक सोंच भी न रखें कि जरूरी बातें अनदेखी हो जाए।