काम करना हमारे हाथ में है ?


जिस ब्रह्मांड में इतने बडे बडे पिंड एक खास पथ पर निरंतर चल रहे हों , वहां किसी व्‍यक्ति के द्वारा यह स्‍वीकार नहीं किया जाना कि हम सब अपने शरीर में स्थित उर्जा के अनुसार ही कार्य कर पाते हैं, मुझे अजूबा लगता है। हम सभी जानते हैं कि इस दुनिया में कोई भी व्‍यक्ति दूसरे के समान नहीं होता है। जन्‍म लेने के बाद की बात कौन कहे , गर्भ में ही हर बच्‍चे का स्‍वरूप और विकास भिन्‍न प्रकार का होता है । हर महीने उनका स्‍वास्‍‍थ्‍य भिन्‍न होता है , उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भिन्‍न होती है , उसका क्रियाकलाप अलग तरह का होता है। जन्‍म लेने के बाद तो सबकी परिस्थितियां अलग होती ही हैं, उसी के अनुरूप सबके क्रियाकलाप होते हैं।

गीता में कहा गया है ...
कर्मण्य एवाधिकारस ते मा फलेषु कथा चन 


इस बात को मानना ही चाहिए , मैं भी मानती हूं , पर क्‍या हम सब चाहे भी तो एक जैसा काम कर सकते हैं। हमारे आसपास का माहौल भिन्‍न होता है , हम उसी के अनुरूप अपना क्रियाकलाप रख सकते हैं। हमारी अपनी प्रकृति भी बिल्‍कुल भिन्‍न होती है , ये भी हमारे क्रिया कलाप पर बुरा प्रभाव डालती है। फिर हमारे वश में क्‍या रह जाता है ??

एक बच्‍चा जब जन्‍म लेता है तो उसके संपूर्ण शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विकास के लिए सबसे पहले माता और फिर पिता की आवश्‍यकता पडती है , उनका साथ न मिले तो इस विकास के बाधित होने की पूरी संभावना रहती है। इसके अलावे किसी के छोटे भाई बहन उसे स्‍वच्‍छंद माहौल देते हैं , तो किसी को अपने भाई बहन से पिटाई खा खाकर आधे होने की नौबत आती है। कोई अभिभावक के साथ किसी बात की जिद करता है तो उसका सारा जिद पूरा हो जाता है और दूसरा उसी जिद के कारण घर पहुंचकर दो चार बार ऐसी पिटाई खाता है कि उसकी जिद करने की आदत ही समाप्‍त हो जाती है। इस तरह अपने आप सबके अंदर सारे गुण और अवगुण विकसित होते रहते हैं। 

बडे होने पर एक किशोर का मानसिक विकास न सिर्फ उसकी आई क्‍यू और पढने की क्षमता पर निर्भर करता है , वरन् इसके लिए हमारे गुरू , शिक्षक और विद्यालय के साथ साथ माता और पिता दोनो की बडी भूमिका होती है। किसी का सारा माहौल मनोनुकूल होता है और खेल खेल में बौद्धिक विकास की पूरी संभावना बन जाती है , तो कोई परिस्थिति की गडबडी के कारण पूरे विद्यार्थी जीवन माथापच्‍ची करते ही व्‍यतीत कर देता है। न तो विद्यालय का माहौल या पढाई का कोर्स उसे रास आता है और न ही शिक्षक या माता पिता के पढाने का ढंग। ऐसी हालत में वह कर्म करे तो किस प्रकार ?

इसी प्रकार कैरियर के माहौल और वैवाहिक संबंधों पर भी वातावरण का प्रभाव तय है। आप सामने जैसा माहौल देखते हैं , जैसी आपकी रूचि होती है , आप वैसा ही तालमेल बना पाते हैं। इसका अर्थ यह है कि कर्म करने में आप कभी भी स्‍वतंत्र नहीं होते, कोई भी काम लाचारी में ही करते हैं। यह बात अलग है कि काम के सफल हो जाने पर इसका श्रेय आपको दिया जाए या असफल होने पर सारा दोष आप ही झेलने को विवश हों , पर सच तो यह है कि काम करने की प्रेरणा हमें अपने अंतर्मन से मिलती तो है , पर उसे पूरा करने में परिस्थितियों का हाथ होता है , जिसमे हमारा वश बिल्‍कुल भी नहीं । फिर हम कैसे कह सकते हें कि काम करना हमारे हाथ में है ??


साफ सफाई के लिए कितनी परंपरागत पद्धतियां

आज हर स्‍तर के टूथपेस्‍ट , डिटरजेंट , फेस वाश और साबुन से बाजार भरा पडा है , इसकी इतनी बडी मात्रा में खरीद और बिक्री हो रही है , जिससे हमारे दांत , चेहरे , शरीर और कपडों की सफाई हो रही है, जो प्राचीन काल से अबतक लोगों के द्वारा साफ सफाई के लिए न जाने कितने प्रयोग किए जाने का परिणाम हैं। 

आज पैकेट में बिकने वाली मुल्‍तानी मिट्टी फेस पैक के रूप में प्रयोग की जाती है , पर प्राचीन काल में भी खेतों में यत्र तत्र बिखरी चिकनी मिट्टी का प्रयोग चेहरे की सफाई के लिए किया जाता था। इसके अलावे चेहरे की सफाई के लिए तरह तरह के उबटन लगाए जाने की परंपरा थी , उबटन चेहरे की मालिश करते हुए सारी गंदगी को हटाने में समर्थ होता था।

चिकनी मिट्टी से धुले बाल तो रेशम से मुलायम हो जाया करते थे। बाल को धोने के लिए सरसों या अन्‍य तिलहनों के तेल निकालने के बाद के बचे भाग का प्रयोग किया जाता था , जिसे बिहार में 'खल्‍ली' कहा जाता है। इसके अलावे आंवले और शिकाकाई के उपयोग से अपने बालों को स्‍वस्‍थ रखने में मदद ली जाती थी। विभिन्‍न दालों के बेसन और दही को भी बालों की सुरक्षा हेतु उपयोग किया जाता था। इन परंपरागत पद्धतियों से अपने शरीर और बाल की सफाई की जाती थी।

ग्रामीण परिवेश में कोयले या लकडी के चूल्‍हे और अन्‍य धूप धूल में काम करती महिलाओं को अपने तन बदन साफ रखने के लिए धुलाई के लिए विभिन्‍न प्रकार के प्राकृतिक ब्रश भी उपलब्‍ध थे। विभिन्‍न पेडो , खासकर औषधिय पेडों की पतली टहनी को दांतों से चबाकर उसका उपयोग दतवन के रूप में दांतो की सफाई के लिए किया जाता था , यह बात तो आप सबों को मालूम होगी । इसी प्रकार बीज के लिए रखे गए  नेनुए , लौकी या झींगी जैसे सब्जियों के बीज निकालने के बाद जो झिल्‍ली बची रह जाती थी , उसका उपयोग हाथ पैरों की गंदगी को निकालने के लिए ब्रश के रूप में किया जाता था। घर बनाने के लिए प्रयोग किए जानेवाले खपडे के टूटे हुए हिस्‍से या ईंट के टुकडे से पैरों के एडी की सफाई की जाती थी।

रेशमी और ऊनी कपडे तो उच्‍च वर्गीय लोगों के पास ही होते थे , जिन्‍हे धोने के लिए रीठे की ही आवश्‍यकता होती थी। सूती वस्‍त्रों को धोने के लिए सोडे का प्रयोग कब शुरू हुआ , मै नहीं बता सकती। पर उससे पहले बंजर खेतों के ऊपर जमी मिट्टी , जिसे 'रेह' कहा जाता था , को निकालकर उससे सूती कपडे धोए जाते थे , उस मिट्टी में सोडे की प्रधानता होने से उससे धुले कपडे बहुत साफ हो जाते थे। अभी भी ग्रामीण महिलाएं अपने सूती वस्‍त्रों की सफाई में इसी पद्धति का इतेमाल करती हैं। इस प्रकार की सफाई में बहुत अधिक पानी की आवश्‍यकता पडती थी , पर नदी , तालाबों की प्रचुरता से इस काम को कर पाना मुश्किल नहीं होता था, आजकल इस पद्धति में थोडी दिक्‍कत अवश्‍य हो जाया करती है।

 गरम पानी में इस मिट्टी को डाल कर उससे सूती कपडों को साफ कर पाना अधिक आसान होता था , मिट्टी और तेल तक की गंदगी आराम से साफ हो जाया करती थी। कई स्‍थानों में केले के सूखे तने और पत्‍तों को जलाकर उसके राख से कपडों की सफाई की जाती थी। हमारे यहां आम या इमली की लकडी को जलाने पर जो राख बचता था , उसे सुरक्षित रखा जाता था और लूंगी , धोती , साडी से लेकर ओढने बिछाने तक के सारे सूती कपडे इसी राख से धोए जाते थे। 

इस राख से सफाई करने पर कई दिनों की जमी गंदगी और अन्‍य तरह के दाग धब्‍बे तक दूर हो जाया करते थे। आज भी ओढने बिछाने या अन्‍य प्रकार के गंदे वस्‍त्रो को धोने के लिए इस राख का उपयोग किया जाता है। आज नदियो और तालाबों में पानी की कमी और कम मूल्‍यों में सामान्‍य डिटरजेंटों की बिक्री होने के कारण सफाई की ये परंपरागत पद्धतियां समाप्‍त हो गयी हैं।


मेरी समझ से इस देश में छूआछूत की भावना इस तरह फैली होगी ??

आज भारत के परंपरागत नियमों को संदेहास्‍पद दृष्टि से देखने वाले अक्‍सर जाति प्रथा के विरोध में या खासकर छूआछूत के विरोध में हल्‍ला किया करते हैं। पर लोगों ने कभी चिंतन मनन करने की कोशिश नहीं की कि छूआछूत की भावना अपने देश में क्‍यूं आयी होगी। मैं स्‍पष्‍टत: कहना चाहूंगी कि मेरे गांव में हर जाति , हर धर्म के लोग बडे प्रेम से रहते हैं । 

छोटी से छोटी जाति भी एकजुट होकर किसी बात के विरोध में अनशन कर सकती है कि वो किसी कर्मकांड में इस जाति के लोगों का काम नहीं करेगी , तो बडी बडी जाति के लोगों के पसीने छूट जाते हैं। यदि ये मान्‍यता कहीं पर मुझे नहीं मिलती है , तो इसका जबाबदेह मैं विदेशी आक्रमण के दौरान हमारी सामाजिक स्थिति को छिनन भिन्‍न करने  की उनकी कोशिश को ही मानती हूं। 

स्‍वस्‍थ ग्रामीण पृष्‍ठभूमि में अपने जीवन का अधिकांश समय व्‍यतीत करने के कारण मैने स्‍पष्‍टत: परंपरागत नियमों के गुण दोषों पर ध्‍यान दिया है। समय समय पर आनेवाले हमारे हर पर्व त्‍यौहार मे अपने शरीर की क्‍या , घर द्वार, आंगन गोशाले से लेकर सारे बरतनों तक की विशेष तौर पर सफाई के नियम से यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि हमारे पूर्वज सफाई पसंद थे। उन्‍हें अच्‍छी तरह मालूम था कि अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य और सुखी होने के लिए स्‍वच्‍छता पहली शर्त है।

प्रतिदिन के रूटीन में भी साफ सफाई का विशेष ध्‍यान था , प्रतिदिन अपने घर, द्वार , आंगन , गोशाले की सफाई जहां अपने पर्यावरण को स्‍वस्‍थ जीवन जीने के लायक बनाती थी , वहीं सुबह सवेरे  शौच ,  दतुअन , स्‍नान किया जाना और बिना नहाए धोए न तो रसोई बनाना और न खाना भी स्‍वस्‍थ परंपरा ही थी। किसी किटाणु के संक्रमण का भय प्राचीन काल में इतना था कि लोग रसोई में जूत्‍ते पहनकर नहीं जाया करते थे। यहां तक कि शौच से आने के बाद कपडे बदलकर रसोई में जाया जाता था। 

काफी समय तक किसी गंभीर बीमारी का अचूक इलाज विकसित नहीं किया गया होगा , जिसके कारण वैसे बीमारी से ग्रस्‍त रोगियों को भी अपने परिवार से अलग रखा जाता था , यहां तक कि कुत्‍ते के काटने पर भी उसे काफी दिनों तक अलग रखा जाता था , यहां तक कि कई रोगियों के लिए अलग बरतनों का प्रयोग होता था, जो कि अनेक स्‍थानों पर अभी भी चलता है। चेचक निकलने की स्थिति में भी रोगी को एक अलग कमरे में रखकर उसकी भरपूर सेवा सुश्रुसा की जाती थी। ये सब नियम रोगों को फैलने से बचाने के लिए थे।

आज मेडिकल साइंस के विकसित होने पर पढे लिखे लोगों को इन नियमों की कोई आवश्‍यकता नहीं दिखती , पर मुझे ऐसा नहीं लगता , क्‍यूंकि भारत की बहुत बडी आबादी अभी भी एलोपैथी के इलाज में असमर्थ है और वैसी जगहों पर साफ सफाई बनाए रखकर बहुत सारी बीमारियों से बचा जा सकता है। जो एलोपैथी के हर संभव इलाज की सामर्थ्‍य रखते हैं , उनके लिए भी इन नियमों के पालन की आवश्‍यकता है , क्‍यूंकि एलोपैथी की दवाओं का अधिक प्रयोग जहां एक बीमारी को ठीक करता है , वहीं कई नई बीमारियां जन्‍म लेती है, जो पूर्ण तौर पर लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य का नुकसान करने में समर्थ है।

 आखिर बीमारियों को फैलने से बचाने के लिए ही तो बाजार में विभिन्‍न प्रकार के मास्‍क बिक रहे हैं , जो आज के पेशेवरों द्वारा इस्‍तेमाल किए जाते हैं। जहां ये इस्‍तेमाल नहीं किए जाते हैं , वहां कई क्षेत्र में काम कर रहे लोगों को किसी खास प्रकार के बीमारी से ग्रस्‍त देखा जाता है।

लेकिन पुराने किसी भी पेशे में लगे व्‍यक्ति के लिए किसी प्रकार की ऐसी सुविधा नहीं रही होगी। ऐसे लोग खुद भी काम करने के बाद साफ सुथरे होकर ही परिवार के सम्‍मुख आते रहे होंगे , ताकि परिवार में भी बीमारी न फैले। हमारे यहां बच्‍चों को जन्‍म देने के समय मदद के लिए जो दाइयां आती थी , वो न सिर्फ उसमें मदद करती थी , प्रसवोपरांत शरीर को पुन: पुरानी स्थिति में लाने के लिए भी उसके पास कई उपाय थे , उसके द्वारा की जाने वाली शरीर की मालिश और अन्‍य उपायों से महिलाएं काफी राहत महसूस करती थी। 

जब तक महिलाएं सौर गृह में होती , उनसे आराम से सेवा सुश्रुसा करवाती, पर सौर गृह से निकलने के बाद स्‍नान से पहले ही इन दाइयों से तेल लगवाना होता था । ऐसा इसलिए क्‍यूंकि वे कई घरों में इस प्रकार का काम करती थी , जिसके कारण प्रसूता को इन्‍फेक्‍शन का भय बना रहता था।  पर जब धीरे धीरे जाति के आधार पर पूरे परिवार के लिए वो काम निश्चित हुआ होगा, जिसके कारण लोग उनसे परहेज बनाने लगे होंगे , जो धीरे धीरे छूआछूत जैसी सामाजिक रूढि में बदल गया होगा।

जल्‍द अपने बच्‍चों को रंग बिरंगी सब्‍जी खिलाएं ..

हम सभी जानते हैं कि मनुष्‍य के जीवन में स्‍वास्‍थ्‍य का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है और इसे बनाए रखने के लिए भारत के हर प्रदेश की हमारी थाली सक्षम है। पर आजकल की व्‍यस्‍तता में जहां खाना बनाने में महिलाएं भी शार्टकट के प्रयास में होती हैं , वही बच्‍चे की रूचि भी रेडीमेड खानों में बढती जा रही है। हरी सब्जियां तो शायद ही आज के बच्‍चे पसंद से खाते हों। ऐसे में जरूरत होती है , बच्‍चों को बहाने से फायदेमंद खाना खिलाया जाए। कुछ दिन पहले मैने एक पोस्‍ट किया था जिसमें जेली के बहाने बच्‍चों को आंवला खिलाने के बारे में लिखा था और आंवले की जेली बनाने की विधि भी दी थी। 

आज बिना मसाले की एक रंग बिरंगी सूखी सब्‍जी बनाने की जानकारी दे रही हूं , जो बच्‍चों के लिए बहुत पौष्टिक है। खासकर जाडे के दिन में यह सब्‍जी इसलिए बनायी जा सकती है , क्‍यूंकि अभी बाजार में तरह तरह की सब्जियों मिल रही हैं। इसे बनाने के बाद तबतक  बार बार 'रंग बिरंगी सब्‍जी' की चर्चा करें, जबतक बच्‍चे उससे ललच नहीं जाएं , क्‍यूंकि बच्‍चे मन से कोमल होते हैं और उसपर उन घटनाओं का बहुत अधिक प्रभाव पडता है , जिन्‍हें बारंबार देखते या सुनते हैं।

आप बराबर मात्रा में आलू , प्‍याज , फूलगोभी , फ्रेंचबीन , गाजर , लाल चुकंदर , शिमला मिर्च , मटर के दाने और टमाटर या इसी प्रकार की सब्जियों को छीलकर इसके पतले पतले टुकडे करें । कडाही में तेल या रिफाइंड डालकर हरे मिर्च के बडे टुकडे डालें , ताकि बच्‍चों के लिए परोसने के पहले इसे हटाया जा सके , क्‍यूंकि एक दिन भी मिर्च लग गयी तो मनोवैज्ञानिक तौर पर इसका बुरा प्रभाव पडेगा। इसके अतिरिक्‍त कुछ दाने मेथीदाने के डाले। 

उसमें प्‍याज और गोभी डालकर तेज आंच पर थोडी देर चलाने के बाद मटर , टमाटर और शिमला मिर्च जैसे जल्‍द गलनेवाली सब्जियों को छोडकर बाकी सारे डालकर बिना मसाले के सिर्फ नमक और हल्‍दी डालकर इसे गलने छोड दें । जब ये गल जाए , तो बची सब्जियां डालकर ढंक ढंक कर तेज आंच पर इस तरह भूने की वे सिर्फ गलें , पर एक दूसरे से बिल्‍कुल मिक्‍स न हों। 

सभी सब्जियों के टुकडे अलग अलग दिखाई पडते रहें। मिर्च और मसाला न होने से तथा बनने के बाद सुंदर दिखने से इसे बच्‍चे खाना पसंद करते हैं और इसकी पौष्टिकता का तो आप अनुमान कर ही सकते हैं। तो जल्‍दी करें , रंग बिरंगी सब्जियों का मौसम समाप्‍त जो होने वाला है।

अपनी प्रकृति के अनुसार काम

काफी हद तक जीन का प्रभाव और कुछ हद तक परिस्थितियों का प्रभाव , पर इतने विशाल दुनिया में कोई भी दो बीज एक जैसे नहीं होते । रंग रूप , और बनावट में भिन्‍नता तो हमें स्‍पष्‍टत: दिखाई पडती है , पर वो एक होने पर भी कभी कभी स्‍वभाव तक में अच्‍छी खासी भिन्‍नता देखी जाती है। वास्‍तव मे विचित्रता से भरी इसी दुनिया में सुंदरता , स्‍वाद और व्‍यवहार का भिन्‍न भिन्‍न रूप हमारे सोंचने और समझने की शक्ति को बढाने में सहायक है। इनके वर्णन करने के क्रम में इतने साहित्‍य लिखे गए , पर लेखकों के लिए अभी भी न तो भाव की कमी हुई है और न ही शब्‍दों की और न ही आगे कभी होगी।

जीन की विभिन्‍नता के कारण ही नहीं , परिस्थितियों की विभिन्‍नता के कारण भी हम मनुष्‍य भी एक दूसरे से बिल्‍कुल भिन्‍न हैं। इतिहास की किताबों में हमने जितने महापुरूषों के बारे में पढा है , सबका व्‍यक्त्त्वि बिल्‍कुल भिन्‍न दिखाई पडा होगा , यहां तक कि किसी की किसी से तुलना भी नहीं की जा सकती है। अपने ही परिवार में हमें महसूस होगा कि हर व्‍यक्ति की रूचि , आई क्‍यू बात चीत करने का तरीका सब भिन्‍न है, पर इसे स्‍वीकारने में हमें कठिनाई आती रहती है।क्‍यूंकि हम अपने सामने वाले को एक ढांचे में फिट देखना चाहते हैं , जो कदापि संभव नहीं। इसके बावूजद हम एक दूसरे के दोष निकालते हैं , उसे भला बुरा कहते हैं , अपनी बातें मनवाने को मजबूर करते हैं।

बहुत से परिवार में अनुशासन के आड में बच्‍चों और बहू पर बहुत अंकुश रखा जाता है , यहां तक कि कई जगहों पर पति और पत्‍नी के द्वारा भी  एक दूसरे के साथ बहुत अधिक समायोजन की अपेक्षा रखी जाती है। बच्‍चे अभिभावक के मनमुताबिक कैरियर चुने , यह कहां का इंसाफ है ? पति पत्‍नी शादी विवाह के बंधन में अवश्‍य ही बंध गए हों , पर अपने अपने स्‍वभाव के अनुरूप जीने के लिए वो स्‍वतंत्र हैं , क्‍यूंकि किसी को अधिक खर्च करने की आदत होती है तो किसी को कम , किसी को घमने फिरने , मिलने जुलनेकी आदत होती है तो किसी की महत्‍वाकांक्षा उसके जीवन को व्‍यस्‍त बनाती है। पर कहीं पति इसे स्‍वीकार न करे तो उसे भला बुरा कहा कहा जाता है तो कहीं पत्‍नी को। घर कलह का केन्‍द्र बन जाता है , जिसका प्रभाव बच्‍चों पर बुरा पडता है।

यदि अधिक दिनों तक किसी व्‍यक्ति पर ऐसा दबाब बनाया जाए तो अपनी प्रकृति के अनुसार काम न कर पाने से उसके आत्‍मविश्‍वास पर बुरा प्रभाव पडता है। इसलिए चाहे वो आपका संतान हो , माता पिता हों या पति या फिर पत्‍नी जबतक किसी की जीवनशैली से  उसका या किसी और का बडा नुकसान न हो रहा हो , कोई खास समस्‍या न उपस्थित हो रही हो , उसे अपने मन मुताबिक काम करने से नहीं रोका जाना चाहिए। अपने मनमुताबिक काम करने से व्‍यक्ति सफलता के चरम तक पहुंच सकता है , दूसरों के दिखाए रास्‍ते पर कोई तभी चल सकता है , जब उसकी क्षमता कोई और काम कर पाने की न हो!