2008 में राजपथ पर हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत की झांकी


दो वर्ष पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर राजपथ पर हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत की झांकी निकली थी , उसकी रिपोर्ट मैने बनायी थी ,जो आज आप नए पाठकों के लिए पुन: प्रेषित कर रही हूं ..........

इंडिया गेट न्यूज से अजय सेतियाजी की खबर है कि आज गणतंत्र दिवस के मौके पर अनुराधा श्रीवास्तवजी के सहयोग से ब्लागर भाई.बहनों के अंतर्मन के अस्तित्व को जीवनधारा देती एक झांकी राजपथ पर देखी गयी सुनील दोईफोड़ेजी केशून्याकार का यह कारवां पोपुलर इंडिया के दिल की आवाज को दर्शाने में समर्थ था। शास्त्री जे सी फिलिपजी इस रथ के सारथी थे। 

इसकी सुरक्षा के लिए चारो ओर बारमर पुलिस की तैनाती थी। जहां इस रथ के आगे राव गुमान सिंघजी का ‘GOOD MORNING INDIA’ लिखा गया वहीं दूसरी ओर पीछे महाशक्तिजी का बैनर लगा था. समय नष्ट करने का भ्रष्ट साधन । दायीं ओर मीनाक्षीजी का प्रेम ही सत्य है तथा बायीं ओर बिना लाग लपेट के जो कहा जाए ,वही सत्य है ‘ लिखकर सत्य को समझाने की कोशिश की गयी थी। 

डा महेश परिमलजी ने संवेदनाओं के पंख से इसे सजाया था। तुषार जोशीजी के शब्दचित्र इसपर खूब फब रहे। सिर्फ नीलिमाजी ही नहींसभी ब्लागर भाई.बहनों के आपस के लिंकित मन को दिखाते इस रथ को सजाए जाने का भार दर्शनजी की एकआवाज पर पिरामीड सायनीरा थियेटर लिमिटेड के द्वारा अंकित माथुरजी जैसे रंगकर्मी को दिया गया था। 

इस रथ में रवीश कुमारजी का कस्बा बनाकर उसमें रविन्द्र रंजनजी के साथ साथ सभी ब्लागर भाई.बहनों का आशियाना बनाया गया था,जिसमें चौखट लगाने में पवनचंदनजी ने सहयोग दिया था। विवेक रस्तोगीजी का कल्पतरू बिल्कुल मध्य में सजाया गया था जिसकी महक से वातावरण सुरभित हो रहा था। इसमें एक ओर अविनाश वाचस्पति जी की बगीची तथा दूसरी ओर सुभाष नीरवजी की वाटिका लगाकर इसको पर्यावरणीय दृष्टि से भी उत्तम बना दिया गया था। 

इसमें चारो ओर जगदीश भाटियाजी का आईना लगाया गया था ताकि दीप्ति गरजोलाजी के साथ.साथ सभी अपना प्रतिबिम्ब देख सकें। आगे में ही अतुलजी का चौपाल और अविनाश वाचस्पतिजी का नुक्कड सजाया गया था जिसमें छत्तीसगढ़ समाचार देते राजेश अग्रवालजी झारखंड समाचार देते राजेश कुमारजी मजेदार समाचार देते हुए खबरचीजी मौजूद थे । इस रथ में जहां एक ओर एक ओर एडमिन कवि सम्मेलन करा रहे थे तो दूसरी ओर पंकज.सुबीर संवाद सेवा और तकनीकी संवाद भी चल रही थी । 

पीछे चंद्रिकाजी ने दखल की दुनिया और पी डी ने अपनी छोटी सी दुनिया बनायी थी। एक ओर परमजीत बालीजी कठिन साधना में व्यस्त थे तो दूसरी ओर तपस्विनीजी भी। डा व्योमजी नें लोकसाहित्य का मंच सजाया था, जिसमें अन्य पुस्तकों के साथ भुवनेश शर्माजी का हिन्दी पन्ना शामिल किया गया था तो अशोक पांडेजी का कबाड़खाना भी सजाया गया था जिसमें  अन्य कबाड़ों के साथ दिलीप मंडलजी का रिजेक्ट माल भी लगाया गया था। शशिभूषणजी ने बिहारी ईशानीजी ने ओडीसी , डी एन बरॅलाजी ने उत्तराखंड, प्रभाकर पांडेय ने भोजपुर नगरिया तथा अन्य लोगों ने भी अपने.अपने क्षेत्रों के मंचों का भार संभाला था।

बेजीजी की कठपुतलियों का नाच गायत्रीजी की तरह भीड़ में भी तन्हा महसूस करने वालों के लिए भी मनोरंजक था। अजित वडनेकरजी के शब्दों के सफर और अरूंधतीजी की शब्दयात्रा के साथ ही साथ यह रथ आगे बढ़ता रहा। संजीव कुमार सिन्हाजी एक नागरिक के रूप में सबों को देश का हितचिंतक बनने का आह्वान करते रहें राज भाटिया जी ने कहा यह कोई पराया देश नहीं ,सबका अपना है   


(कोरी कल्पना पर आधारित , जिसमें पूरे तिरेपन ब्लागों के नाम हैं। जिनको शामिल करने से प्रवाह में कमी आ रही थी , वैसे बहुत से ब्लागर भाई.बहनों के नाम छूट गए थे, जिसके लिए खेद है , कृपया अन्यथा न लें। हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत के सभी लेखकों और पाठकों को गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं !!  

कहां है महंगाई ??

विवाह के बाद अपने को वैज्ञानिक दृष्टिकोण का माननेवाले मेरे ससुराल वाले बात बात पर मेरे ज्‍योतिषिय ज्ञान की परीक्षा लेते और मेरे पोथी पत्रे तक फेक डालने की धमकी दिया करते थे। उस वक्‍त मैं उनपर हंस ही सकती थी , क्‍यूंकि जहां तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सवाल है , इस पूरी दुनिया में मैं अपने पिताजी से आगे किसी को भी नहीं पाती। खैर , दो वर्ष के अंदर ही मैने सबको सोंचने को मजबूर कर दिया था कि ग्रहों का प्रभाव पृथ्‍वी पर पडता है।

इसके बाद मेरे अध्‍ययन और चिंतन में कोई रूकावट नहीं आ सकी थी। जबसे मैं संयुक्‍त परिवार से अलग अपने बच्‍चों के साथ बोकारो में हूं , इनके द्वारा घर के बाहर के हर कार्य से दूर रखे जाने से मुझे अध्‍ययन मनन के लिए पर्याप्‍त समय मिल जाता है। इस कारण मैं कभी बाजार जाती नहीं , आटे दाल के भाव का कुछ भी पता नहीं , पर कुछ दिनों से चारो ओर से हो रहे महंगाई के शोर ने इस बात का अहसास अवश्‍य दिया कि महंगाई बढ गयी है।

पिछले पंद्रह दिनों के दौरान हुई भागदौड और रेल के सफर से लगी ठंढ से कल इनकी तबियत कुछ बिगड गयी थी, ये नाश्‍ते में कुछ भी लेना नहीं चाह रहे थे , सो बहुत दिनों बाद मुझे बाजार निकलने का मौका मिला। मैने इनके लिए रसगुल्‍ले लाने को मिष्‍टान्‍न भंडार का रूख किया। दूध और शक्‍कर की कीमतों की वृद्धि से सारी मिठाइयां महंगी हो गयी हैं , पर बाजार में खरीदने वालों के भीड की कोई कमी नहीं। आराम से लोग मिठाइयां खरीद रहे थे , मानो बढते मूल्‍य से उनके बजट पर कोई असर नहीं पडा हो। मैने भी दस रसगुल्‍ले के ऑर्डर दिए और दुकानदार की ओर पचास का नोट बढाया ।

थोडी देर में मुझे रसगुल्‍ले भी मिल गए और साठ रूपए वापस भी। ये क्‍या लोग कहते हैं , महंगाई बढ गयी , मुझे तो रसगुल्‍ले खरीदने के बदले में दस रूपए भी मिल रहे थे । मैने जब प्रश्‍नवाचक निगाह से दुकानदार की ओर देखा , तो उसने पूछा ' आपने पचास के नोट दिए थे या सौ के' मैने कहा 'पचास के' तब उसे अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने मुझसे पचास रूपए वापस लिए।

मिठाई लेकर घर आयी , तो ये सो चुके थे, इनको आज आराम ही करने दिया जाए , सोंचकर मैने झोला उठाया और सब्‍जी लेने भी चल पडी। मैने कई तरह की सब्‍जी ली , मुझे कहीं भी बहुत महंगाई नहीं दिखी। शायद अभी कुछ कम महंगी हो या मात्रा में कमी की वजह से मुझे महसूस नहीं हुई हो। एक जगह पत्‍ते गोभी का ढेर दिखा, अपने छोटे परिवार की आवश्‍यकता भर एक छोटा सा पत्‍तागोभी उठाकर मैने दुकानदार से उसका वजन करने को कहा और बगल में हरे मटर खरीदने लगी।

 हरे मटर का मूल्‍य चुकाने के बाद मैने पत्‍तागोभी उठाया और दुकानदार की ओर भी दस के नोट बढाए , उसने तुरंत मुझे आठ रूपए वापस कर दिए। मैने समझ लिया कि मिष्‍टान्‍न भंडार वाले दुकानदार की तरह ही ये भी मुझे अधिक पैसे लौटा रहा है। किसी गरीब को मेरी वजह से घाटा न हो जाए , यह सोंचते हुए मैने उससे पत्‍तागोभी का भाव और वजन पूछा। पर उसके जबाब ने तो मुझे चौंका ही दिया 'दो रूपए में आप कितनी ठगी जा सकती हैं' ।

 मैने अपनी सफाई में कुछ कहना ही शुरू किया था कि वह दुबारा बोल पडा 'ठगे जाने की चिंता नहीं है आपको तो क्‍यूं इतना हिसाब किताब कर रही हैं' अब उसके मुहं लगकर अपनी ओर भीड का ध्‍यानाकर्षण करना मुझे अच्‍छा नहीं लगा , मुझे संतोष हो गया कि उसे घाटा नहीं हुआ है और मैं वापस घर लौट गयी।

आज के पूंजीपति

अति प्राचीन काल में कंद मूल खाते , गुफाओं में रहते ,वृक्ष की छाल लपेटते हुए लोगों को धीरे धीरे समझ में आ गया था कि इस धरती पर प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के सही उपयोग से उनके लिए भोजन की व्‍यवस्‍था बहुत कठिन नहीं है, बहुत कम लोग भी मेहनत कर कुल जनसंख्‍या के लिए इसका प्रबंध कर सकते हैं। 

ऐसी सोंच विकसित होने के बाद बाकी जनसंख्‍या को भोजन के अलावे मनुष्‍य की अन्‍य मुख्‍य जरूरतों जैसे वस्‍त्र ,आवास , वस्‍त्र , सुरक्षा जैसे जरूरी कार्यों में लगाकर एक पूरा समाज बनाया गया। क्रमश: सभ्‍य होते हुए मनुष्‍य की आवश्‍यकताएं बढती चली गयी और हर प्रकार के कार्य को संभालने के लिए उस क्षेत्र की विशेषज्ञता रखने वाले लोगों को जिम्‍मेदारी दी गयी। उन सभी प्रकार के काम में लगे लोगों के लिए भोजन की व्‍यवस्‍था करना खेतिहरों की जिम्‍मेदारी होती थी।

इसलिए भूस्‍वामी के घर में भले ही अनाज का ढेर दिखाई देता था , पर उसमें समाज के सभी वर्गों की हिस्‍सेदारी होती थी। यही कारण था कि मनुष्‍य की दूसरी आवश्‍यकताओं को पूरी करने वालों को अपने प्रतिदिन के भोजन या अन्‍य आवश्‍यकताओं के बारे में कुछ भी सोंचने की आवश्‍यकता नहीं होती थी। गृहस्‍थों को विभिन्‍न प्रकार के कर्मकांडों के बहाने से समाज के सभी वगों की जरूरत महसूस करवायी जाती थी और प्रत्‍येंक घर से उनके काम के बदले दिया जाने वाला अनाज वर्षभर यहां से वहां घूमता हुआ सभी वर्गों की आवश्‍यकताओं को पूरी करता था। 

उदार गृहस्‍थों , जिसमें भूमिपति, पूंजीपति और बलवान लोग शामिल थे , को अपना सारा अनाज गंवा देने का कोई भय नहीं था , क्‍यूंकि वे जानते थे कि अगले वर्ष अनाज फिर से उनके पास आ जाएगा, उन्‍हें प्रकृति पर विश्‍वास था। अपनी आवश्‍यकताओं के प्रति निश्चिंत होने से समाज के सभी वर्ग के लोग अपने काम में और निष्‍णात होते जा रहे थे , इसी कारण प्राचीन भारत में इतने प्रकार की कलाएं विकसित हुईं।

पर इस उदार पीढी के बाद क्रमश: नौकरों चाकरों की बढती हुई भीड के मध्‍य गृहस्‍थों की सुविधाभोगी अपने को 'तेज' कहने वाली पीढी ने कमान अपने हाथों में ली, जो अपने घर के सारे अनाज पर अपनी मिल्कियत समझने लगे। समाज के विभिन्‍न वर्गो को उनके कार्यों के लिए अनाज का इतना बडा हिस्‍सा देना उन्‍हें स्‍वीकार्य नहीं हुआ । उस अनाज में समाज के सभी वर्गों का हिस्‍सा मानने से उन्‍होने इंकार करना आरंभ किया । 

 इस पीढी ने कर्मकांडों में कटौती करना , मजदूरों से अधिक से अधिक काम करवाना, कलाकारों को उनकी कला के पूरी कीमत नहीं देना , अपने को ऊंचा और उन्‍हें नीचा समझना आरंभ किया । इनकी बचत करने की प्रवृत्ति जैसे जैसे बढती गयी , समाज के अन्‍य वर्गों का नुकसान होना शुरू हुआ। जहां एक ओर कई वर्षों का अनाज सड रहा था , वहीं दूसरी ओर गरीबों के बच्‍चों को भूखों मरने की नौबत आ गयी थी। शुरूआती दौर में घर में अनाज की मात्रा की कमी के कारण वे अपने घर के गहने जेवर और बरतन तक बेचने को मजबूर हुए। 

फिर जब घर में कुछ न बचा , तो धीरे धीरे न सिर्फ वे ही भूमिपति, पूंजीपति और बलवान गृहस्‍थों के शोषण के शिकार होते चले गए, वरन् उनके बच्‍चे भी उन्‍हीं के बनाए जाल में फंसते चले गए। अपनी आवश्‍यक आवश्‍यकताओं को पूरी न कर पाने के कारण उनके जीवन स्‍तर में तेज गति से गिरावट आयी। इस तरह समाज के कमजोर वर्ग और कमजोर होते चले गए और इसका प्रभाव उनके काम पर भी पडा। उनकी कला में पहले वाली खासियत नहीं रह गयी।

उसके बाद से आजतक तो लोगों की सुख सुविधा के लिए नए नए उपकरण भी इजाद होने लगी , जिससे लोगों का लालच और बढता चला गया और आज पूर्ण तौर पर सुविधा भोगी संस्‍कृति ने गरीब और अमीर वर्ग के मध्‍य बडा फासला बना दिया है। वास्‍तव में , चाहे कोई भी युग हो, कोई भी व्‍यापार हो , अपने 'लाभ' को प्राथमिकता देते हुए ही एक व्‍यापारी आगे बढता है , पर व्‍यवसाय का मुख्‍य लक्ष्‍य जनहित का होता है। 

आज के व्‍यापारियों की तरह स्‍वार्थ में अंधे होकर 'कोई भी' रास्‍ता उठाना एक व्‍यापारी के लिए उचित नहीं , इसलिए इससे परहेज करना चाहिए। अपने खर्चों में अधिक से अधिक कटौती कर सामान्‍य जनता के लिए सारी संभावनाओं को नष्‍ट कर देना एक सफल व्‍यवसायी का लक्ष्‍य नहीं होना चाहिए। अंधाधुंध पैसे कमाने के लिए आज प्रोफेशनल तक को इसी प्रकार की शिक्षा मिल रही है और बिना सोंचे समझे लगातार विकास का क्रम बनाए रखने के लिए कुछ भी किया जा रहा है , उसका फल आज भी कमजोर वर्ग की जनता को भुगतना पड रहा है। 

किसी कंपनी के पास क्‍या कहा जाए , एक व्‍यक्ति तक के पास करोडो अरबो रूपए और लाखों जनता को दो जून की रोटी में भी दिक्‍कत , आज का यह सच हो गया है। मुट्ठी भर लोगों के हाथ में सारे संसाधनों का आ जाना समाज के लिए बिल्‍कुल उचित नहीं , इसी का बुरा परिणाम कई सामाजिक समस्‍याओं के रूप में हमें देखने को मिल रहा है। आज के पूंजीपतियों को अपना दृष्टिकोण थोडी उदारता का बनाना होगा , तभी समाज के सभी वर्गों का कल्‍याण हो सकता है। देश के स्‍थायी आर्थिक विकास के लिए ये सबसे महत्‍वपूर्ण बात है , पर आज इसे सोंचनेवाला कोई भी नहीं। आज गरीबों का तो भगवान ही मालिक रह गया है !!



काम करना हमारे हाथ में है ?


जिस ब्रह्मांड में इतने बडे बडे पिंड एक खास पथ पर निरंतर चल रहे हों , वहां किसी व्‍यक्ति के द्वारा यह स्‍वीकार नहीं किया जाना कि हम सब अपने शरीर में स्थित उर्जा के अनुसार ही कार्य कर पाते हैं, मुझे अजूबा लगता है। हम सभी जानते हैं कि इस दुनिया में कोई भी व्‍यक्ति दूसरे के समान नहीं होता है। जन्‍म लेने के बाद की बात कौन कहे , गर्भ में ही हर बच्‍चे का स्‍वरूप और विकास भिन्‍न प्रकार का होता है । हर महीने उनका स्‍वास्‍‍थ्‍य भिन्‍न होता है , उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भिन्‍न होती है , उसका क्रियाकलाप अलग तरह का होता है। जन्‍म लेने के बाद तो सबकी परिस्थितियां अलग होती ही हैं, उसी के अनुरूप सबके क्रियाकलाप होते हैं।

गीता में कहा गया है ...
कर्मण्य एवाधिकारस ते मा फलेषु कथा चन 


इस बात को मानना ही चाहिए , मैं भी मानती हूं , पर क्‍या हम सब चाहे भी तो एक जैसा काम कर सकते हैं। हमारे आसपास का माहौल भिन्‍न होता है , हम उसी के अनुरूप अपना क्रियाकलाप रख सकते हैं। हमारी अपनी प्रकृति भी बिल्‍कुल भिन्‍न होती है , ये भी हमारे क्रिया कलाप पर बुरा प्रभाव डालती है। फिर हमारे वश में क्‍या रह जाता है ??

एक बच्‍चा जब जन्‍म लेता है तो उसके संपूर्ण शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विकास के लिए सबसे पहले माता और फिर पिता की आवश्‍यकता पडती है , उनका साथ न मिले तो इस विकास के बाधित होने की पूरी संभावना रहती है। इसके अलावे किसी के छोटे भाई बहन उसे स्‍वच्‍छंद माहौल देते हैं , तो किसी को अपने भाई बहन से पिटाई खा खाकर आधे होने की नौबत आती है। कोई अभिभावक के साथ किसी बात की जिद करता है तो उसका सारा जिद पूरा हो जाता है और दूसरा उसी जिद के कारण घर पहुंचकर दो चार बार ऐसी पिटाई खाता है कि उसकी जिद करने की आदत ही समाप्‍त हो जाती है। इस तरह अपने आप सबके अंदर सारे गुण और अवगुण विकसित होते रहते हैं। 

बडे होने पर एक किशोर का मानसिक विकास न सिर्फ उसकी आई क्‍यू और पढने की क्षमता पर निर्भर करता है , वरन् इसके लिए हमारे गुरू , शिक्षक और विद्यालय के साथ साथ माता और पिता दोनो की बडी भूमिका होती है। किसी का सारा माहौल मनोनुकूल होता है और खेल खेल में बौद्धिक विकास की पूरी संभावना बन जाती है , तो कोई परिस्थिति की गडबडी के कारण पूरे विद्यार्थी जीवन माथापच्‍ची करते ही व्‍यतीत कर देता है। न तो विद्यालय का माहौल या पढाई का कोर्स उसे रास आता है और न ही शिक्षक या माता पिता के पढाने का ढंग। ऐसी हालत में वह कर्म करे तो किस प्रकार ?

इसी प्रकार कैरियर के माहौल और वैवाहिक संबंधों पर भी वातावरण का प्रभाव तय है। आप सामने जैसा माहौल देखते हैं , जैसी आपकी रूचि होती है , आप वैसा ही तालमेल बना पाते हैं। इसका अर्थ यह है कि कर्म करने में आप कभी भी स्‍वतंत्र नहीं होते, कोई भी काम लाचारी में ही करते हैं। यह बात अलग है कि काम के सफल हो जाने पर इसका श्रेय आपको दिया जाए या असफल होने पर सारा दोष आप ही झेलने को विवश हों , पर सच तो यह है कि काम करने की प्रेरणा हमें अपने अंतर्मन से मिलती तो है , पर उसे पूरा करने में परिस्थितियों का हाथ होता है , जिसमे हमारा वश बिल्‍कुल भी नहीं । फिर हम कैसे कह सकते हें कि काम करना हमारे हाथ में है ??


साफ सफाई के लिए कितनी परंपरागत पद्धतियां

आज हर स्‍तर के टूथपेस्‍ट , डिटरजेंट , फेस वाश और साबुन से बाजार भरा पडा है , इसकी इतनी बडी मात्रा में खरीद और बिक्री हो रही है , जिससे हमारे दांत , चेहरे , शरीर और कपडों की सफाई हो रही है, जो प्राचीन काल से अबतक लोगों के द्वारा साफ सफाई के लिए न जाने कितने प्रयोग किए जाने का परिणाम हैं। 

आज पैकेट में बिकने वाली मुल्‍तानी मिट्टी फेस पैक के रूप में प्रयोग की जाती है , पर प्राचीन काल में भी खेतों में यत्र तत्र बिखरी चिकनी मिट्टी का प्रयोग चेहरे की सफाई के लिए किया जाता था। इसके अलावे चेहरे की सफाई के लिए तरह तरह के उबटन लगाए जाने की परंपरा थी , उबटन चेहरे की मालिश करते हुए सारी गंदगी को हटाने में समर्थ होता था।

चिकनी मिट्टी से धुले बाल तो रेशम से मुलायम हो जाया करते थे। बाल को धोने के लिए सरसों या अन्‍य तिलहनों के तेल निकालने के बाद के बचे भाग का प्रयोग किया जाता था , जिसे बिहार में 'खल्‍ली' कहा जाता है। इसके अलावे आंवले और शिकाकाई के उपयोग से अपने बालों को स्‍वस्‍थ रखने में मदद ली जाती थी। विभिन्‍न दालों के बेसन और दही को भी बालों की सुरक्षा हेतु उपयोग किया जाता था। इन परंपरागत पद्धतियों से अपने शरीर और बाल की सफाई की जाती थी।

ग्रामीण परिवेश में कोयले या लकडी के चूल्‍हे और अन्‍य धूप धूल में काम करती महिलाओं को अपने तन बदन साफ रखने के लिए धुलाई के लिए विभिन्‍न प्रकार के प्राकृतिक ब्रश भी उपलब्‍ध थे। विभिन्‍न पेडो , खासकर औषधिय पेडों की पतली टहनी को दांतों से चबाकर उसका उपयोग दतवन के रूप में दांतो की सफाई के लिए किया जाता था , यह बात तो आप सबों को मालूम होगी । इसी प्रकार बीज के लिए रखे गए  नेनुए , लौकी या झींगी जैसे सब्जियों के बीज निकालने के बाद जो झिल्‍ली बची रह जाती थी , उसका उपयोग हाथ पैरों की गंदगी को निकालने के लिए ब्रश के रूप में किया जाता था। घर बनाने के लिए प्रयोग किए जानेवाले खपडे के टूटे हुए हिस्‍से या ईंट के टुकडे से पैरों के एडी की सफाई की जाती थी।

रेशमी और ऊनी कपडे तो उच्‍च वर्गीय लोगों के पास ही होते थे , जिन्‍हे धोने के लिए रीठे की ही आवश्‍यकता होती थी। सूती वस्‍त्रों को धोने के लिए सोडे का प्रयोग कब शुरू हुआ , मै नहीं बता सकती। पर उससे पहले बंजर खेतों के ऊपर जमी मिट्टी , जिसे 'रेह' कहा जाता था , को निकालकर उससे सूती कपडे धोए जाते थे , उस मिट्टी में सोडे की प्रधानता होने से उससे धुले कपडे बहुत साफ हो जाते थे। अभी भी ग्रामीण महिलाएं अपने सूती वस्‍त्रों की सफाई में इसी पद्धति का इतेमाल करती हैं। इस प्रकार की सफाई में बहुत अधिक पानी की आवश्‍यकता पडती थी , पर नदी , तालाबों की प्रचुरता से इस काम को कर पाना मुश्किल नहीं होता था, आजकल इस पद्धति में थोडी दिक्‍कत अवश्‍य हो जाया करती है।

 गरम पानी में इस मिट्टी को डाल कर उससे सूती कपडों को साफ कर पाना अधिक आसान होता था , मिट्टी और तेल तक की गंदगी आराम से साफ हो जाया करती थी। कई स्‍थानों में केले के सूखे तने और पत्‍तों को जलाकर उसके राख से कपडों की सफाई की जाती थी। हमारे यहां आम या इमली की लकडी को जलाने पर जो राख बचता था , उसे सुरक्षित रखा जाता था और लूंगी , धोती , साडी से लेकर ओढने बिछाने तक के सारे सूती कपडे इसी राख से धोए जाते थे। 

इस राख से सफाई करने पर कई दिनों की जमी गंदगी और अन्‍य तरह के दाग धब्‍बे तक दूर हो जाया करते थे। आज भी ओढने बिछाने या अन्‍य प्रकार के गंदे वस्‍त्रो को धोने के लिए इस राख का उपयोग किया जाता है। आज नदियो और तालाबों में पानी की कमी और कम मूल्‍यों में सामान्‍य डिटरजेंटों की बिक्री होने के कारण सफाई की ये परंपरागत पद्धतियां समाप्‍त हो गयी हैं।