हाथ कंगल को आरसी क्‍या

3 और 4 फरवरी को मौसम से संबंधित मेरे द्वारा की गयी भविष्‍यवाणी सही हुई या गलत , इसका फैसला करना आसान तो नहीं । मध्‍य प्रदेश , छत्‍तीसगढ और राजस्‍थान में जैसा मौसम देखने को मिला , वो सामान्‍य नहीं था और इस कारण इन प्रदेशों में रहनेवाले लोग मेरी भविष्‍यवाणी को सही मान रहे हैं , तो दूसरी ओर दिल्‍ली, उत्‍तर प्रदेश और उसके उसके आसपास के लोग पूरी धूप का आनंद लेते हुए इसे गलत भी कह रहे हैं। भविष्‍यवाणी पूर्ण तौर पर सही हुई , ऐसा मैं भी स्‍वीकार नहीं कर सकती , पर तिथि का प्रभाव दिख जाने से ग्रहयोग का प्रभाव तो दिख ही गया है और इसे हल्‍के में नहीं लिया जाना चाहिए। ज्‍योतिष में शोध की अनंत संभावनाएं हैं और भविष्‍य को देखने का थोडा भी ज्ञान हमें असत्‍य से सत्‍य की ओर , अंधकार से प्रकाश की ओर तथा अनिश्चित से निश्चितता की ओर ले जा सकता है।

अभी तक ज्‍योतिष के पूर्ण विकास न होने के बहुत सारे कारण है , जिसमे से एक मुख्‍य कारण इसका जमाने के साथ परिवर्तनशील नहीं होना है और इसके लिए हम भारतीय पूरी तरह जिम्‍मेदार हैं , जिन्‍होने बाद में ज्‍योतिष में कोई रिसर्च ही नहीं किया। दूसरों ने कह दिया कि हमारी परंपराएं गलत हैं , ज्‍योतिष अंधविश्‍वास है तो हम आंख, कान सब मूंदे इसे गलत मानते जा रहे हैं, किसी के कुछ कहने का हमपर कोई असर ही नहीं हो रहा। वो तो भला हो हमारे पूर्वजों का , जिन्‍होने हमारी सामाजिक व्‍यवस्‍था इतनी चुस्‍त दुरूस्‍त बनायी थी, प्राचीन ज्ञान और परंपरा को संभाले जाने के लिए इतने सशक्‍त प्रयास हुए थे कि बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा लाख चाहते हुए भी उसे तोडा नहीं जा सका। 

हां, विभिन्‍न मुद्दों को लेकर भ्रांतियां अवश्‍य बन गयी हैं, लेकिन व्‍यवस्‍था टस से मस नहीं हो रही, क्‍युंकि अधिकांश भारतीयों को, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान, सिक्‍ख हों या ईसाई या फिर किसी भी जाति के, अपनी सभ्‍यता और संस्‍कृति के बारे में उन्‍हें अच्‍छी तरह पता है। इससे अच्‍छी संस्‍कृति कहीं हो ही नहीं सकती, बस इसे सही दिशा देने की आवश्‍यकता है। विदेशी आक्रमणों के दौरान आयी लाख कमजोरियों के बावजूद भी हमारी परंपराओं को और ज्‍योतिष को जिन लोगो ने मात्र धरोहर की तरह भी संभाले रखा, उनका हमें शुक्रिया अदा करना चाहिए , क्‍यूंकि उन्‍हीं के कारण हम इनकी कमजोरियों को दूर कर इसे आगे बढा सकते हैं। पर इस देश से इन्‍हें उखाड फेकने में किसी को भी सफलता नहीं मिल सकती है। ज्‍योतिष को सत्‍य दिखलाते हुए प्रमाण हम आगे भी देते ही रहेंगे।

गूगल सर्च में 'आंधी बारिश' लिखकर न्‍यूज में सर्च करें, 12 जनवरी 2010 के आसपास के 13 खबर मिलेंगे और 4 फरवरी 2010 के एक स्‍थान पर 13 और दूसरे स्‍थान पर 3 खबर मिलेंगे, दोनो ही दिनों की तिथियों के बारे में मैने मौसम के लिए खास ग्रह स्थिति बतायी थी , तेज हवा और बारिश की संभावना जतायी थी और इतना ही 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को प्रमाणित करने के लिए काफी है। आनेवाले दिनों में बडे रूप में मौसम में अचानक बदलाव लाने वाली तिथियां 6 और 7 अप्रैल 2010 है , कृपया इसे अपनी डायरी में नोट कर लें। 

गर्मियों के दिन होने के बावजूद ऐसी ही आंधी आएगी, आसमान में बादल बनेंगे और कहीं तेज बारिश होगी , तो कहीं छींटे भी पडेंगे। इस प्रकार का मौसम कम से कम 9 अप्रैल तक बना रह सकता है , वैसे 11 अप्रैल तक भी उम्‍मीद दिखती है। इस बार लांगिच्‍यूड या लैटिच्‍यूड की चर्चा नहीं कर रही हूं, क्‍यूंकि चक्रवाती तूफान कहीं से शुरू होकर कहीं तक भी फैल सकता है। इस तरह अप्रैल में एक बार फिर से 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सिद्धांतों की परीक्षा की बारी आएगी। भला हाथ कंगन को आरसी क्‍या ??

अंतहीन कष्‍टों का जीवन झेलने का मजबूर एक दंपत्ति

पिछले दिनों अपनी एक पोस्‍ट में मैने बताया था कि लेखक का नजरिया ही किसी कहानी को सुखात्‍मक या दुखात्‍मक बनाता है। जीवन के सुखभरे समय में जब कहानी का अंत कर दिया जाता है , तो उसे सुखात्‍मक और जीवन के दुखभरे समय में कहानी का अंत कर दिया जाता है , तो नो दुखात्‍मक बनता है। 

पर जीवन में कभी कभी किसी के जीवन का अंतिम समय अंतहीन कष्‍टों का बन जाता है , उसे सुखात्‍मक बनाया ही नहीं जा सकता। इसी सिलसिले में मैने इस पोस्‍ट में मैने उस महिला की चर्चा की थी , जिसे अपने जीवन में सर्वाधिक कष्‍टप्रद जीवन झेलते देखा है । मैने जिनलोगों के जीवन को निकट से देखा है , उसमें दूसरे नंबर पर एक दंपत्ति को रखा जा सकता है।

उक्‍त दंपत्ति भी गांव के ही सही , पर अच्‍छे गृहस्‍थ परिवार के थे , उनके दो बेटे और तीन बेटियां थी। दोनों में से किसी को कोई बुरी आदत नहीं थी, पर किसी न किसी बीमारी या कुछ अन्‍य खर्च की वजह से धीरे धीरे सारे जमीन बिकते चले गए और जबतक बच्‍चे बडे हुए , वे लोग काफी गरीबी का जीवन गुजार रहे थे। गांव में रहते हुए लडकियों को मिडिल पास ही करवाया था , पर दोनो काफी सुंदर थी।

 सरकारी नौकरी कर रहे एक स्‍मार्ट लडके को उनकी बडी बेटी पसंद आ गयी। बिना दहेज के लडके ने अपनी ओर से पूरा खर्च और व्‍यवस्‍था करते हुए उससे ब्‍याह रचाया ही , दो चार वर्षों बाद एक संभ्रांत परिवार के अन्‍य लडके को ढूंढकर अपनी साली की शादी करवा दी। वह अपने ससुरालवालों को हर संभव मदद भी किया करता था। उसके बाद उनका जीवन कुछ राहत भरा हो गया।

दोनो बेटियों के तीन तीन बच्‍चे हुए , पर बेटियों के रंग रूप की तरह उनका भाग्‍य सुंदर न रहा। राजी खुशी कुछ दिन ही वे खुशी से रह पाए होंगे कि छोटे छोटे तीन बच्‍चों को छोडकर बडे दामाद चल बसे। बडी बेटी पर मुसीबत का पहाड टूट पडा , बेटी के ससुराल वाले बहू के नौकरी के पक्ष में नहीं थे , क्‍यूंकि वह उतनी पढी लिखी नहीं थी। 

उसे कंपनी में पति के जगह पर चपरासी की ही नौकरी मिल सकती थी , जो उनकी प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न बन रहा था। ससुरालवालों के दबाब में नौकरी दमाद के छोटे भाई को दे दी गयी। धीरे धीरे इस कष्‍ट से उन्‍होने समझौता किया और नाति नातिनों और अन्‍य बच्‍चों से भरे पूरे घर को देखकर ही खुश होते रहे। छोटे दामाद की आर्थिक स्थिति उतनी अच्‍छी न थी , इसलिए छोटी बेटी की ओर से भी चिंता बनी ही रही।

पर धीरे धीरे समय आराम से व्‍यतीत होता गया और शहर में रह रहे सभी नाती नातिने पढलिखकर अच्‍छे अच्‍छे जगहों पर पहुंच गए। छोटी बेटी का विवाह भी किसी तरह मिलजुलकर कर ही दिया गया , इस तरह उनका अपना सारा कष्‍ट जाता रहा। इन तीनो बेटियों के अलावे उनके दो बेटे थे , जिसमें से एक अपाहिज था , इसलिए उन्‍हें उससे कोई उम्‍मीद तो थी नहीं। एक बडे बेटे के सहारे जिंदगी की बाकी गाडी खींचने को वे तैयार थे। 

असुविधाओं के मध्‍य बेटा अच्‍छी तरह पढाई तो नहीं कर सका था, कोई व्‍यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी का भी अभाव था , इसलिए उसे एक सेठ के यहां काम करने को भेज दिया गया। बचपन से अपनी स्थिति को कमजोर देख रहा बेटा बहुत ही महत्‍वाकांक्षी होता जा रहा था। इसलिए उसने सेठ के यहां बहुत मन लगाकर पूरी जबाबदेही से काम करना शुरू किया , जिसके कारण शीघ्र ही वह अपने मालिक का प्‍यारा बन गया।

मालिक करोडपति थे , अच्‍छा खासा फर्म था उनका , बेटे को हर तरह की सुविधा दी गयी थी। उसके स्‍थायित्‍व और व्‍यवहार को देखते हुए उसका विवाह भी हो गया और एक बिटिया रानी ने जन्‍म भी ले लिया। जीवन भर के कष्‍ट के बाद उक्‍त दंपत्ति के जीवन की गाडी एक बार‍ फिर सही दिशा में मुड गयी थी , जिसे देखकर वे लोग कुछ शांति का अनुभव कर रहे थे , पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। बिटिया रानी एक वर्ष की भी नहीं होगी कि एक रात दुकान से घर लौटते वक्‍त किसी के द्वारा अपने मालिक पर चलायी गयी गोली का शिकार वह बन गया था और तत्‍काल घटनास्‍थल पर ही उसने दम तोड दिया था। 

भले ही अपनी जान देकर मालिक को बचाकर उसने नमक की कीमत चुका दी हो , पर माता के दूध की कीमत न चुका सका था। उसके माता पिता एक बार फिर अपनी विधवा बहू और अनाथ पोती को अपने अंतहीन आंसुओं के साथ संभालने को मजबूर थे। जहां छोटी मोटी समस्‍या में हम सब इतने परेशान हो जाते हैं , उन्‍होने जीवनभर इतनी तकलीफ कैसे झेली होगी और आगे भी झेलने को बाध्‍य हैं !!

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एक मजदूर के घर में कैसे बनी खीर ??

एक मजदूर के घर में कई दिनों से घर में खीर बनाने का कार्यक्रम बन रहा था , पर किसी न किसी मजबूरी से वे लोग खीर नहीं बना पा रहे थे। बडा सा परिवार , आवश्‍यक आवश्‍यकताओं को पूरी करना जरूरी था , खीर बनाने के लिए आवश्‍यक दूध और चीनी दोनो महंगे हो गये थे। बहुत कोशिश करने के बाद कई दिनों बाद उन्‍होने आखिरकार खीर बना ही ली। खीर खाकर पूरा परिवार संतुष्‍ट था , उसकी पत्‍नी आकर हमारे बरामदे पर बैठी। आज पूरे परिवार ने मन भर खीर खाया था , यहां तक कि उसके घर आनेवाले दो मेहमानों को भी खीर खिलाकर विदा किया था।


हमारे घरवालों को आश्‍चर्य हुआ , कितना खीर बनाया इनलोगों ने ?
पूछने पर मालूम हुआ कि उनके घर में एक किलो चावल का खीर बना था।
यह हमारे लिए और ताज्‍जुब की बात थी , दूध कितना पडा होगा ?
मालूम हुआ .. 1 किलो।
अब हमारी उत्‍सुकता बढनी ही थी ..चावल गला कैसे ?
उसमें दो किलो पानी डाला गया।
अब इतनी मात्रा में खीर बनें तो चीनी तो पर्याप्‍त मात्रा में पडनी ही है , पूछने का कोई सवाल नहीं !!

इस बात से आपको हंसी तो नहीं आ रही, जरूर आ रही होगी
पर सोंचिए यदि हमने उस मजदूर को उसकी मजदूरी के पूरे पैसे दिए होते ,
तो वह ऐसी खीर तो न खाता  !
इस प्रकार जैसे तैसे जीवनयापन करने को तो बाध्‍य नहीं होता !
इसी प्रकार धीरे धीरे उसका जीवन स्‍तर गिरता गया होगा और हम अपने स्‍तर पर नाज कर रहे हैं !
क्‍या स्‍वीकार करने की हिम्‍मत है आपको ??

बीटी बैगन की खेती क यत्र तत्र विरोध

हाल के दिनो में बीटी बैगन की खेती के विरोध में यत्र तत्र विरोध हो रहा है । ये बीटी बैगन क्‍या है , बता रहे हैं पवन कुमार अरविंद जी .....
बीटी बैगन- बैगन की सामान्य प्रजाति में आनुवंशिक संशोधन के बाद तैयार की गई नई फसल। आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें ऐसी फसले हैं, जिनके डीएनए में विशिष्ट बदलाव किए जाते हैं। अब तक ऐसे बदलाव सिर्फ प्राकृतिक हुआ करते थे, जिनके कारण आनुवंशिक बीमारियां होती हैं। लेकिन अब वैज्ञानिक भी प्रयोगशालाओं में आनुवंशिक बदलाव कर सकते हैं, ऐसे अधिकांश बदलाव जानलेवा होते हैं। हांलाकि, कुछ बदलाव जीव या फसलों में वांछित गुण भी पैदा कर सकते हैं। आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के जीन में इसी तरह के बदलाव किए जाते हैं। प्रायः फसलों की पैदावार और उनमें पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाने के लिए ऐसा किया जाता है।

इस लेख में अरविंद कुमार शर्मा जी भी जैनेटिकली माडिफाइड (जीएम) फसलों के बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं ....
जीईएसी की वैधानिकता को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा है कि लोगों के हित व भावनाओं का सम्मान करना भी सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। कृषि मंत्री शरद पवार की हरी झंडी के बावजूद जयराम रमेश देश भर में जन अदालत आयोजित कर इस मुद्दे पर लोगों की राय ले रहे हैं। उत्तरी क्षेत्र से लेकर दक्षिणी हिस्से में बीटी बैगन का विरोध हो रहा है। चंडीगढ़, कोलकाता, हैदराबाद, भुवनेश्वर, अहमदाबाद और नागपुर में आयोजित जन अदालतों में बीटी बैगन को लेकर उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा है। इस दौरान जयराम रमेश को कहना पड़ा कि बीटी बैगन की व्यावसायिक खेती से पहले उसके सभी पहलुओं पर विचार किया जाएगा।
कुसुम ठाकुर जी भी इस आलेख में बी टी बैगन के बारे में महत्‍वपूर्ण जानकारी प्रदान कर रही हैं ....
पिछले साल अक्टूबर में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा बीटी बैंगन को किसानों तक पहुंचाने का निर्णय लेते ही कार्यकर्ताओं और किसानों ने इसके खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया था। विरोध की वजह से सरकार को अपने निर्णय को स्थगित कर वैज्ञानिकों, कार्यकर्ताओं, किसानों और नागरिकों के साथ सार्वजनिक विचार-विमर्श शुरू करना पड़ा। इस खाद्य फसल बीज को किसानों में वितरित करने की मंजूरी जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) ने दी थी। वैसे तो दिल्ली सरकार सार्वजनिक विचार-विमर्श से दूर ही रही है, लेकिन सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर अपनी चिंताएं जताई हैं। एक रोचक बात यह है कि बीटी बैंगन का खुले आम विरोध करने वाले सभी राज्य गैर-कांग्रेस शासित हैं। दिल्ली इसमें एक मात्र अपवाद है।



इसी संदर्भ में अशोक पोडेय जी का यह आलेख भी ज्ञानवर्द्धक है .... 
जब कृषि, उपभोक्‍ता व पर्यावरण जैसे विभागों के मंत्री ही बीटी बैगन के पक्ष में इतनी जोरदार दलीलें दे रहे हों तो माना जाना चाहिए कि भारत में उसकी वाणिज्यिक खेती को मंजूरी अब औपचारिकता भर रह गयी है। कभी-कभी तो यह संदेह भी होने लगता है कि कहीं पहले ही पूरा मामला फिक्‍स तो नहीं कर लिया गया है। गौरतलब है कि केन्‍द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की राष्ट्रीय खाद्य नियामक संस्था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी पहले ही किसान संगठनों के कड़े विरोध के बावजूद बीटी बैगन को अंतिम मंजूरी दे चुकी है। कमेटी के कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया था। कमेटी के सदस्य और जाने-माने वैज्ञानिक पीएम भार्गव ने मॉलिक्यूलर प्रकृति का मुद्दा उठाया, लेकिन अन्य सदस्यों ने उसे खारिज कर दिया। अब यह मामला केन्‍द्र सरकार के पास है तथा सरकार के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की स्‍वीकृति के बाद बीटी बैगन के बीज को बाजार में उतारा जा सकेगा।


कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार जीएम फसलों की संरचना सामान्य पौधों की कोशिकाओं में अलग किस्म का जीन जीवाणु, कीटाणु, मकड़ी, सूअर व कछुआ आदि से लिया जाता है। इसके कारण स्वास्थ्यव पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जीवित पौधा होने के कारण इसका पूरी तरह से नाश संभव नहीं है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इसका पेटेंट बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का होगा जिससे छोटे-छोटे किसानों को इन कम्पनियों पर निर्भर करना पड़ेगा। विकसित अनुवांशिक रूप से वर्धित महिको के बीटी बैगन का विकास हुए नौ साल हो गए हैं। महिको का दावा है कि इस बैगन में कीड़ों को समाप्त करने की क्षमता जीन क्राई 1 एसी है। कीड़ा लगने से 50 से 70 प्रतिशत बैगन की फसल बर्बाद हो जाती है। बीटी हाईब्रिड के प्रयोग से बैगन उत्पादन में 166 प्रतिशत की वृद्धि होगी। कम्पनी के अनुसार जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमिटी ने इसको पर्यावरण के लिए सुरक्षित माना है।


उत्तर अंबाझरी रोड स्थित आई.एम.ए. सभागृह बी.टी. बैगन की जनसुनवाई के दौरान खचाखच भरा हुआ था। इसमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से आए वैज्ञानिक, किसान, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कई लोगों के तर्क सुनने के बाद पर्यावरण मंत्री ने पत्रकारों को बताया कि बी.टी. बैंगन पर अपना निर्णय वे 15 फरवरी से पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप देंगे। जनसुनवाई के दौरान अधिकतर लोगों ने बी.टी. बैंगन के विरोध में तर्क देते हुए इसे देसी बैंगन और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया। भारत में बी.टी. बैंगन के बीज बेचने वाली कंपनी कृभको के वैज्ञानिकों ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। विदर्भ के किसान नेता शरद जोशी ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक बीज पद्धति और उत्पादन में तकनीक का उपयोग आज जरूरत है। 




इस आलेख में पंकज अवधिया जी भी बता रहे हैं कि देशी बैगन स्‍वास्‍थ्‍य वर्द्धक है और  कैसे देशी बैगन को बढावा दिया जाये? 
मेरा उत्तर होगा “यह आप यानि उपभोक्ताओ पर निर्भर है। बाजार उपभोक्ताओ की माँग पर चलता है। यदि उपभोक्ता जहरीले बैगन लेने से मना कर दे तो मजाल है कि बाजार इसे उपभोक्ता के सामने परोसे। जब बाजार इंकार कर देगा तो किसान इसकी खेती बन्द करेंगे और देशी बैगन उगायेंगे। पर इसके लिये उपभोक्ताओ को एकजुट होना होगा और लम्बी जंग लडनी होगी। एक पूरी पीढी की जंग लगी सोच को बदलना होगा। बहुत विरोध का सामना भी करना पडेगा। इतनी आसानी से कैसे जहरीले बैगन पर से अन्ध-विश्वास हटेगा? पर उपभोक्ता यदि इसमे सफल होते है तो इसके बदले उन्हे रोगमुक्त जीवन मिलेगा और खुशहाल नयी पीढी मिलेगी। अब फैसला आपको करना है।


कर्म परिस्थितियों के नियंत्रण में

नदी का रास्ता कविता का भावार्थ

अपने भाग्‍य पर विश्‍वास न करते हुए अक्‍सर आप सभी कर्मयोग की चर्चा करते हैं , पर क्‍या आप सबों को ऐसा नहीं लगता कि हमारा कर्म भी परिस्थितियों के नियंत्रण में होता है। गत्यात्मक ज्योतिष का मानना है कि काम करते वक्‍त , सोंचते वक्‍त , निर्णय लेते वक्‍त हम बहुत सी सीमाओं में बंधे होते हैं , इसी बात को समझाने के लिए बालाकृष्‍ण राव की सुंदर रचना ( नदी को रास्‍ता किसने दिखाया ?? ) आपके लिए प्रस्‍तुत है......

इस कविता का भावार्थ - इस रचना के माध्यम से कवि बालाकृष्‍ण राव ने बताया है कि कोई भी अपनी उपलब्धियों को अपनी मेहनत का प्रतिफल मानता है, जबकि सत्य यह भी है कि प्रकृति जिसे जिधर ले जाना चाहती है, उसे उधर ही ले जाती है, जिससे जो करवाना चाहती है, वही करवाती है, हम प्रकृति की इच्छा का सम्मान करें और कर्तव्य के पथ पर बने रहे। 



नदी का रास्ता


नदी को रास्‍ता किसने दिखाया ?


सिखाया था उसे किसने


कि अपनी भावना के वेग को


उन्‍मुक्‍त बहने दे ?


कि वह अपने लिए


खुद खोज लेगी


सिंधु की गंभीरता


स्‍वच्‍छंद बहकर ?


इसे हम पूछते आए युगों से,


और सुनते भी युगों से आ रहे उत्‍तर नदी का।


मुझे कोई कभी आया नहीं था राह दिखलाने,


बनाया मार्ग मैने आप ही अपना।


ढकेला था शिलाओं को,


गिरी निर्भिकता से मैं कई ऊंचे प्रपातों से,


वनों में , कंदराओं में,


भटकती , भूलती मैं


फूलती उत्‍साह सेप्रत्‍येक बाधा विघ्‍न को


ठोकर लगाकर , ठेलकर,


बढती गयी आगे निरंतर


एक तट को दूसरे से दूरतर करती।

बढी संपन्‍नता के


और अपने दूर दूर तक फैले साम्राज्‍य के अनुरूप


गति को मंद कर...


पहुंची जहां सागर खडा था


फेन की माला लिए


मेरी प्रतीक्षा में।


यही इतिवृत्‍त मेरा ...


मार्ग मैने आप ही बनाया।

मगर भूमि का है दावा,


कि उसने ही बनाया था नदी का मार्ग ,


उसने ही


चलाया था नदी को फिर


जहां , जैसे , जिधर चाहा,


शिलाएं सामने कर दी


जहां वह चाहती थी


रास्‍ता बदले नदी ,


जरा बाएं मुडे


या दाहिने होकर निकल जाए,


स्‍वयं नीची हुई


गति में नदी के


वेग लाने के लिए


बनी समतल


जहां चाहा कि उसकी चाल धीमी हो।


बनाती राह,


गति को तीव्र अथवा मंद करती


जंगलों में और नगरों में नचाती


ले गयी भोली भूमि को भूमि सागर तक

किधर है सत्‍य ?


मन के वेग ने


परिवेश को अपनी सबलता से झुकाकर


रास्‍ता अपना निकाला था,


कि मन के वेग को बहना पडा था बेबस


जिधर परिवेश ने झुककर


स्‍वयं ही राह दे दी थी ?

किधर है सत्‍य?

क्‍या आप इसका जबाब देंगे ?