ये कैसे कैसे अंधविश्‍वास 3

पहली और दूसरी कडी के बाद आते हैं , तीसरी कडी पर  हमारे अंधविश्‍वास का फल सदा से निरीह जानवारों को भी भुगतना पडता रहा है , सरिता झाजी लिखती हैं गाधीमाई के पुजारियों और आयोजकों का कहना है कि इस साल मेले में भी कम से कम 5 लाख पक्षियों और जानवरों सहित तक़रीबन 25,000 भैंसों की बलि दी जाएगी. नेपाल में हर साल धर्म के नाम पर इतनी बड़ी संख्या में जानवरों और पक्षियों को बलि दी जाती है और मरने के बाद उनकी लाशों को या तो जला दिया जाता है या फिर महीनों तक मरे हुए पक्षी और जानवर खुले में पड़े रहते हैं. नेपाल में जानवरों की हत्या के ख़िलाफ़ एक अभियान भी छेड़ा गया है और नेपाल के प्रधानमंत्री को याचिका भी सौंपी गई है जिसमें दो सौ लोगों ने हस्ताक्षर कर इन हत्याओं को बंद करने का निवेदन किया है. इस अभियान में जानवरों के अधिकारों की हिमायती भारतीय सांसद मेनका गांधी भी शामिल हैं.

मनुष्य की अज्ञानता और अंधविश्वास ने उसमें कुछ ऐसे शौक पैदा कर दिये हैं, जोकि बरबादी का रास्ता दिखाते हैं। ऐसे ही शौक में एक शौक है-प्रकृति की सुन्दर पैदावार जंगली जानवरों का शिकार। कई जंगली जानवरों के अंग ही मनुष्य के आकर्षण है, जो उनकी मृत्यु का कारण बनते हैं। ऐसे ही एक जंगली जीव है-गैंडा, जिसके नाक पर लगा सख्त सींग ही उसकी मृत्यु है। सदियों से अज्ञानता वश मनुष्य गैंडे का शिकार कर रहा है, क्योंकि उसका अंधविश्वास है कि गैंडे के इस शक्तिशाली सींग में कोई जादुई ताकत है।

गांव में फैले एक अंधविश्‍वास पर डॉ मनोज मिश्रा जी बहुत चिंतित हैं या तो लोग झूठ बोल रहें हैं या फिर भयवश मर रहें है या चाहे जो भी हो इससे पर्दा उठाना जरूरी है नहीं तो इस नन्हे जीव को लोग बेमौत मर डालेंगे .गाँव में इसको लेकर कई भ्रांतियां हैं,कईकिस्से कहानियाँ हैं ,तरह -तरह की चर्चाएँ है .लोग-बाग़ इसको देखते ही भयवश इसको मार डाल रहें है जल्द ही यदि इसके बारे में लोंगों के भय का निवारण  किया गया तो मुझे भय है कि लोग कहीं इस प्रजाति को विलुप्त ही नकर दें .इस बारे में आपके उत्तर की हमें प्रतीक्षा है .

गुजरात में उल्लू के आँख का प्रयोग लोग भोजन के रूप में करते हैं। ऐसी मान्यता है कि उल्लू की आँखें खाने से आँखों की रौशनी बढ़ती है। इसकी गुर्दा भी ऊँचे दाम पर बिकती है। वहीं उनके पैर और माँस का प्रयोग भोजन के साथ दवा के रूप में किया जाता है। विदेशों में उल्लू के पैर और पंख की काफी माँग है। विशेषज्ञों की राय में उल्लू के माँस और पैर से कोई दवा नहीं बनता बल्कि ये अल्प जानकारी एवं सुनी-सुनाई रूढ़ीवादी बातें हैं, जिससे अल्पसंख्यक उल्लू प्रजाति के पक्षियों के जीवन पर खतरा मंडरा रहा है। मध्य प्रदेश में कई जानवरों के चमड़े एवं चर्वी से दवा बनायी जाती है लेकिन इसके विश्लेशण की अभी आवश्यकता है। इन सब भ्रांतियों की वजह से गुजरात एवं मध्यप्रदेश उल्लू के अंगो का बाजार बन गया है, जबकि झारखण्ड और बिहार से उल्लूओं का सफाया हो रहा है। ये वेजुबान एवं संकटापन्न प्राणी, विलुप्प्ति के कगार पर इन अन्धविश्वासों के चलते पहुँच गये हैं।

संताल परगना में अब भी अंधविश्वास की जड़ें गहरी हैं. विवार को पालोजोरी प्रखंड के पथरघटिया गांव में ऐसा ही कुछ देखने को मिला. आश्चर्य यह कि महिलाएं ही महिलाओं के उत्पीड़न का कारण बनीं. डायन होने के संदेह में गांव की पांच महिलाओं को  केवल बर्बरता से पीटा गया, बल्कि तीन हजार लोगों की भीड़ के सामने खुले मैदान में निर्वस्त्र कर नचाया गया. इन महिलाओं को मैला भी पिलाया गया. भीड़ तमाशबीन रही. हालांकि आगे कुछ और अनर्थ होता, इससे पहले पुलिस और प्रशासनिक पदाधिकारियों ने पीड़ित महिलाओं को बचाया.महिलाएं ढोती हैं मौकिल साहब की सवारी : प्रत्यक्षदर्शियों  पुलिस सूत्रों के अनुसार, गांव की छह महिलाएं सकीना बीबी, सबीना बीबी, समिना बीबी, मैमूल बीबी, अझोला बीबी  खूतेजा बीबी पर कोई मौकिल साहब सवार होते हैं. वही गांव में डायन की पहचान कराते हैं. रविवार को भी यही हुआ.शेष पेज नौ परडायन बता कर .मौकिल साहब की सवारी ढोनेवाली महिलाओं ने गांव की ही विधवा ससीना बीबी, सगिरन बीबी  गुलेनार बीबी और सुशीला पंडित  ससूजन बीबी को डायन बताया. इसके बाद क्या था. अंधविश्वासी लोगों की दरिंदगी जाग उठी. लोगों ने इन महिलाओं को पहले टोले में ही बुरी तरह पीटा.मैदान में नचायाइस बात का प्रचार आसपास के गांवों में भी किया गया.

सूर्यग्रहण खत्म हो गयालेकिन समाज पर अंधविश्वास का ग्रहण अब भी लगा है. कर्नाटक में गुलबर्गा के इलाकों में 108 बच्चों को ग्रहण के दौरान जमीन में गाड़े रखा गयामासूमों का कसूर बस इतना था कि ये मानसिक रूप से कमजोर हैं और इन पर जुल्मोसितम इलाज के नाम पर किया गया.
बीमारी दूर करने के लिए बच्चों को गाड़ा
गुलबर्गा के इस इलाके में ऐसी मान्यता है कि सूर्यग्रहण के दौरान अगर ऐसे बच्चों को तालाब के पास जमीन में गले तक गाड़ दिया जाए तो उनकी बीमारी ठीक हो जाती हैऐसा करने से बच्चों में ताकत और बुद्धि आती हैइसे अंधविश्वास या अक्ल पर ग्रहण नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगेदुनिया जब सदी के सबसे बड़ा सूर्यग्रहण का नजारा ले रही थीगुलबर्गा में कुछ लोग गड्ढा खोदने में लगे थे.
एक भारत आसमान के रहस्यों को खंगाल रहा थातो दूसरा भारत ज्ञान की जमीन खोदने में लगा थानगड्ढा खोदा जाता हैबच्चों को उसमें डालकर मिट्टी भरा जाता हैबच्चे रोते-बिलखतेहैंलेकिन किसी को इन पर रहम नहीं आतारहम आता भी कैसेलोगों की आंखों पर अंधविश्वास की चर्बी जो चढ़ी थी.

अरविंद चतुर्वेदी जी कहते हैं कि गये वे ज़माने जब पुरोहित,पंडित ,पुजारी अपने अपने यजमानों को ढूंढने के लिये या तो मन्दिर मे जाकर ठीया जमाते थे या अपने पुश्तैनी यजमानों के घर के चक्कर लगाते थे. अब ज़माना हाई फाई हो गया है तो पंडित-पुरोहित भी कैसे पीछे रहते.अब तो टेलीविज़न चैनल घर बैठे ईश्वर के दर्शन कराने को तैयार हैं और आपके नाम के संकल्प के माध्यम से ओनलाइन पूजा- थाली भी अर्पित कर रहे हैं . अब हवन करते हाथ जलाने की आवश्यकता नहीं और  ही चिंता कि आम की लकडी कहां से लायेंगे और पुरोहित कहां ढूंढेंगे. सब कुछ ओनलाइन उपलब्ध है.
मन्दिरों ,विशेषकर बडे मन्दिरों ,की अपनी अपनी वेबसाइट हैं ,जहां  केवल आप दर्शन कर सकते हैं बल्कि चढ़ावा भी आपके नाम से पंजीकृत हो कर लगाया जा सकता है.

दीपाली पांडे लिखती हैं कि मौनसून की बेरुखी से बिहार-यूपी में किसानों की शामत आई हुई है । बारिश न हुई तो खेती -बाड़ी चौपट ,खाने को अन्न मिलना मुश्किल हो जाएगा । फसल के मौके पर बादलों के देव की नाराजगी से खौफजदा इन किसानों की आंखों में विदर्भ और बुंदेलखंड के दृश्य तैरते रहते हैं । जब इन्सान डरा हुआ हो तो अंधविश्वास की डोर और भी पक्की हो जाती है ।यूपी- बिहार के विभिन्न इलाकों में आए दिन देवराज इन्द्र को मनाने के लिए तरह -तरह के टोटके कर रहे हैं । कहीं मेढक-मेढकी की शादी करवाई जा रही है तो कहीं बैलों की जगह लोग ख़ुद जुए में लग खेत जोत रहे हैं । ऐसे में इस घटना को अंधविश्वास कहें या कुछ भी पर इन ग्रामीण किसानों को पूरा भरोसा है कि इन्द्र को भी शर्म आएगी और वो जलवृष्टि अवश्य करेंगे 

पड़ोसी देश नेपाल में किसी कमउम्र बच्ची को जीवित देवी के रूप में पूजने की परंपरा शताब्दियों से चली  रही है। स्थानीय शाक्य समुदाय से चुनी जाने वाली इस लड़की को अपना बचपन एक छोटे महलनुमा मंदिर में बिताना पड़ता है। पुजारियों के अनुसार कुमारी बनने के लिए लड़की का शरीर विशिष्ट गुणसंपन्न होना चाहिए। इसके साथ ही उसको अपनी बहादुरी साबित करने के लिए एक कमरे में अकेले बैठकर भैंसे की बलि का दृश्य बिना रोये देखना पड़ता है। सिर्फ त्योहारों के अवसर पर ही कुमारी को राजधानी काठमांडू में भक्तों के दर्शनार्थ बाहर घुमाया जाता है। 

अंधविश्‍वास से न जाने कितने ठगे जा रहे हैं , धर्म रिपोर्टर की ये खबर  ठगी का शिकार हुए सांसी समाज के मुताबिक खुद को मां शकोतरा माता का भक्त बता कर अशोक जाडेजा नें सांसी समाज के लोगों को पहले तो धर्म और आस्था के नाम पर विश्वास मे लिया फिर उसने अपनी पत्नी के साथ मिलकर इस महाघोटाले को अंजाम दिया।
पाखंडी बाबा अशोक जाडेजा ने इस ठग विद्या की शुरुआत अपने ससुराल जोधपुर से की जहां उसने पहले तो लोगों के बीच में खुद को बाबा के रूप में प्रसिद्ध किया। फिर जनता का विश्वास इस कदर उसने जीता कि लोग उस देखते ही उसके पैरों पर पैसों की बरसात करने लगते थे। इसी अंधविश्वास का सहारा लेकर आखिर कार उसने एक लंबी प्लानिंग कर डाली, ऐसी प्लानिंग की जिसमें उसने आम भोली भाली जनता को अपना शिकार बनाया खास तौर पर उसके चंगुल में सांसी समाज के लोग ज्यादा फंसे। जाडेजा ने लोगों को तीन महींनें में अपनी रकम तिगुना करने का लालच देकर तकरीबन 1800 करोंड़ ऐंठ लिए।
यह तो मान्यताएँ हैं, लेकिन यहाँ के पानी की तासीर कुछ अलग है। अभी इसकी पूरी वैज्ञानिक जाँच होनी बाकी है, क्योंकि यहाँ की बावड़ी ही नहीं, बल्कि आसपास के कुओं के पानी में भी कुछ खास है। गर्मियों में जब बावड़ी का पानी सूख जाता है, तब आसपास के कुओं से बावड़ी में पानी डाला जाता है। इस पानी का भी रोगियों पर सकारात्मक असर होता है।

पर इस न्‍यूज को हम आस्‍था भी कह सकते हैंइससे पता चलता है कि यहाँ के पानी में ही कुछ खास है। हमने अपनी खोजबीन में महसूस किया कि यहाँ आने वाले कई लोग दावा कर रहे थे कि यहाँ आने के बाद उनका लकवा ठीक हुआ है, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ता है। यहाँ के लोगों का कहना है, हम सभी माँ की औलाद हैं। यदि हम उन पर जननी की तरह विश्वास रखकर तकलीफ दूर करने की विनती करेंगे तो वे हमारी मुराद जरूर पूरी करेंगी। अब आप इसे आस्था कहें या अंधविश्वास, लेकिन यह सच है कि यहाँ स्नान करने वाले कई लकवा रोगी ठीक हो जाने का दावा करते हैं। 

अंधविश्वास को बढावा देकर माल अंटी करना क्या उचित है ??
दोपहर, देर रात और सुबह सवेरे अगर आपने अपना बुद्धू बाक्स खोलें तो आपको स्वयंभू भविष्य वक्ता अंक ज्योतिषी और ना ना प्रकार के रत्न, गण्डे, तावीज बेचने वाले विज्ञापनों की दुकानें साफ दिख जाएंगी। यह सच है कि हर कोई अनिष्ट से घबराता है। मानव स्वभाव है कि वह किसी अनहोनी के  घटने के लिए हर जतन करने को तत्पर रहता है। इसी का फायदा अंधविश्वास का व्यापार करने वाले बडे ही करीने से उठाते हैं। विडम्बना यह है कि इस अंधविश्वास की मार्केटिंग में ``न्यूज चेनल्स`` द्वारा अपने आदशोZ पर लालच को भारी पडने दिया जा रहा है।

डॉक्‍टरी के कॉलेज में दाखिले के लिए कोचिंग देने वाली संस्‍थाएं भी अंधविश्‍वास से नहीं बच पा रही हैं ... कमाल कानपुर की रिपोर्ट देखिए न्यू का बड़ा नाम है काकादेव की कोचिंग मंडी में न्यू की तलाश में दिखे कुछ कोचिंग्स के बोर्ड खुद कह देते हैं पूरी कहानी
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विदेशों की ओर मुंह ताकते रहनेवाले भी अब निराश हो सकते हैं , क्‍यूंकि वैज्ञानिक शोध भी अब अंधविश्वास फैला रहे हैं , ये देखिए ...
Detriot( America ) के Wayne state university मनोवैज्ञानिको ने दावा किया है कि बच्चो का नाम यदि अंग्रेजी के अक्षर "A" से शुरू हो तो उनकी आयु दस साल तक बढ़ सकती है, जबकि "D" से नाम शुरू होने पर बच्चो का जीवनकाल घट जाता है। नाम के "E" से "Z" के बीच किसी भी अक्षर से शुरू होने पर आयु में कोई विशेष अंतर नहीं आता है। शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष १०,००० हज़ार से अधिक खिलाडियो, चिकित्सकों  वकीलों के जीवनकाल का अध्ययन करने के बाद निकाला। A से नाम शुरू होने वाले लोगो कि औसत आयु ७३. वर्ष, "D" से नाम शुरू होने वाले लोगो कि ६९. वर्ष  "E" से "Z" के बीच किसी भी अक्षर से नाम शुरू होने वाले लोगो की ७१. वर्ष होती है, ऐसा इस शोध का कहना है। शोधकर्ताओ ने कहा की "D" grade पढ़ाई में पिछड़ने की निशानी है, इसी कारण "D" अक्षर से नाम शुरू होने वाले लोगो का आत्मविश्वास कम होता है, जिसका असर उनकी प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है।

रविकांत प्रसाद लिखते हैं‍ कि अंधविश्‍वास के कारण मृत्‍यु के बाद भी चैन नहीं मुर्दों को भी चाहिए पैसे कहते हैं कि मरने के बाद व्यक्ति खाली हाथ ही जाता है। सत्य है, पर शास्त्र बताते हैं कि मरनेवाले की आत्मा को तबतक शांति नहीं मिलती, जबतक उसका क्रियाक्रम ठीक ढंग से  किया जाए। बस, इसी का फायदा उठाते हैं डोम और पंडित। पंडित जी मरनेवाले परिवार से हजारों तो डोम भी सैकड़ों रुपए वसूल लेते हैं। अपनों के मरने के गम में सराबोर अनगिनत लोगों को इस आडम्बर को पूरा करने में जेवर  जमीन तक बेच देनी पड़ती है। 21वीं सदी में भी डोम श्मशान घाट का राजा बना हुआ है। बिहार की बात करें तो यहां कोई ऐसा श्मशान घाट नहीं है, जहां डोम मनमानी और रंगदारी  करते हों। यदि जेबें भरी  हों तो मृतक का शव जलाना मुश्किल नहीं असंभव है। अर्थात, मरने के बाद भी चाहिए हजारों-हजार रुपए, यानी शव...श्मशान...डोम...रुपए भी सत्य है। 
मनुष्य जीवन भर किसी व्यक्ति को चाहे कितना कष्ट क्यों  पहुंचाए परंतु उसके मरने के बाद धूमधाम से दाह संस्कार जरूर करता है। उसे डर रहता है कि कहीं उसकी आत्मा उसे तंग करना  शुरू कर दे। इस अंधविश्वास में लगभग सभी मनुष्य रहते हैं, जीते हैं। इसी का फायदा उठाते हैं डोम और पंडित। दाह-संस्कार के क्रम में पंडित जी बार-बार यह कहना नहीं भूलते कि दान में कमी होने पर मृतक की आत्मा भटकती रहेगी।




एक ही गोत्र या अल्‍ल में विवाह क्‍यूं वर्जित माना जाता है ??

वैवाहिक मामलों के कई प्रकार के प्रश्‍न जैसे जन्‍मपत्री मिलान, विवाह की रीति , सात फेरे, विवाह में गोत्र का महत्‍व आदि हमारे मस्तिष्‍क में घूमते रहते हैं , जिनका सटीक जबाब हमारे पास नहीं होता। ऐसे ही कुछ प्रश्‍न 'अखिल भारतीय खत्री महासभा' द्वारा पूछे गए थे , जिनका मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा दिया गया निम्‍न प्रकार जबाब मुझे एक पत्रिका मे मिला, जो आपके लिए पोस्‍ट कर रही हूं ...........

प्रश्‍न .. जन्‍मपत्र मिलाने की प्रथा कब से चली ?
उत्‍तर .. वैदिक काल , श्री रामचंद्र जी के समय, महाभारत काल और प्राक् ऐतिहासिक काल में भी स्‍वयंवर ही हुआ करते थे, किंतु इतना निश्चित है कि स्‍वयंवर काल में वर और कन्‍या निश्चित तौर पर बालिग और समझदार हुआ करते थे। विवाह सुनिश्चित करने में परिवार के सदस्‍यों की तुलना में उनकी भूमिका निर्णायक हुआ करती थी। किंतु हजार दो हजार वर्षों में भारत में अनेक बार विदेशी हमले हुए , फलस्‍वरूप सामाजिक सांस्‍कृतिक परिस्थितियां बहुत अधिक प्रभावित हुईं। कई बार प्रतिष्‍ठा की रक्षा के क्रम में बाल विवाह का सिलसिला चला और संभवत: इन्‍हीं दिनों पात्र पात्राओं की चारित्रिक विशेषताओं की जानकारी हेतु कुंडली निर्माण की प्रथा चल पडी। जन्‍मपत्र मिलाने की प्रथा कब से चली , इसकी निश्चित तिथि का उल्‍लेख करना कठिन है।

प्रश्‍न .. जब हम जानते हैं कि जोडे ऊपर से ही बनकर आए हैं , तो फिर पत्री मिलाने के क्‍या लाभ हैं ?
उत्‍तर .. जन्‍मपत्री मिलाना , जो परंपरावश जारी है , मुझे बहुत वैाानिक नहीं लगती। इस कारण यह है कि सभी अन्‍य ग्रहों को नजरअंदाज करके सिर्फ चंद्रमा के नक्षत्र के आधार पर गुण का मिलान किया जाता है। किंतु सभी ग्रहों पर सयक् रूप से ध्‍यान दिया जाए , तो वर या कन्‍या की चारित्रिक विशेषताओं को जाना जा सकता है .. कुंडली मिलाने से यही लाभ है। जोडे ऊपर से बनकर आते हैं या नहीं , इसके बारे में भी प्रमाण तो नहीं दिया जा सकता। पर कुंडली मिलाने के बहाने दूरस्‍थ भविष्‍य की जानकारी होती है , हम जोडे का चयन कर सकते हैं , ऐसी बात नहीं है।

प्रश्‍न .. विवाह रात्रि में ही क्‍यूं होते हैं ? दिन में क्‍यूं नहीं किए जा सकते ?
उत्‍तर .. प्राय: हर युग में वरपक्ष अपने काफिले के साथ कन पक्ष के यहां जाता रहा है। वरपक्ष को सुबह से शाम तक कई प्रकार के लोकाचार को निबटाते हुए यातायात की सुविधा के अभाव में कन्‍या पक्ष के यहां देर से पहुंचते हैं। पुन: आर्य आतिथ्‍य सत्‍कार को सबसे बडा धर्म समझते रहे हैं , इस कारण देर होता जाना स्‍वाभाविक है। नक्षत्रों को साक्षी रखने के लिए भी विवाह प्राय: रात्रि में ही हुआ करता था। परिपाटी यही चलती आ रही है। पर साज सजावट में यह व्‍यय साध्‍य प्रतीत हो ख्‍ तो विवाह दिन में भी किए जा सकते हैं।

प्रश्‍न.. गोत्र या अल्‍लों का क्‍या महत्‍व है ? एक ही गोत्र में विवाह क्‍यूं वर्जित है ?
उत्‍तर .. यूं तो पूरा भारतीय समाज पुरूष प्रधान है और हमारा खत्री समाज भी इससे भिन्‍न नहीं। जो समाज बहुत दिनों तक अपनी संस्‍कृति को ढोने की क्षमता रखता है , उसकी एक बडी विशेषता अपने पूर्वजों को याद रखने की होती है। सभी गोत्र का नामकरण ऋषियों के नाम पर आधृत हैं , इससे ये तो स्‍पष्‍ट है कि सभी गोत्र वाले अपने पूर्व पुरूषों में किसी अपने वंशज के ऋषि को याद करते हैं। उस महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति विशेष का जो अल्‍ल था , वही उस गोत्र का अल्‍ल कहलाता है। इसी प्रकार सभी व्‍यक्ति अपने गोत्र और अल्‍ल से लाभान्वित होते हैं। कालांतर में जब उसी गोत्र का कोई महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति किसी खिताब से नवाजा जाता है , तो गोत्र के अंतर्गत ही कई अल्‍ल आ जाते हैं। कुछ अल्‍ल कर्मानुसार भी जुडते चले जाते हैं। कभी एक गोत्र और एक अल्‍ल से एक ही वंश का बोध होता था , इसलिए परस्‍पर विवाह वर्जित था। पर इस समय एक ही गोत्र और अल्‍ल में लोगों की संख्‍या लाखों में है। अत: प्रमुख रक्‍तधारा की बात काल्‍पनिक हो जाती है। भले ही यह समाज पुरूष प्रधान हो , पा व्‍यावहारिक दृष्टि से देखा जाए , तो अर्द्धांगिनी के रूप में भिन्‍न भिन्‍न वंशजों की नारियां इतनी ही संख्‍या में सम्मिलित हो‍कर रक्‍त धारा , सभ्‍यता , संस्‍कृति सभी में महत्‍वपूर्ण परिवर्तन कर डालती है। अत: एक ही गोत्र और अल्‍ल में विवाह में कोई दिक्‍कत नहीं, बशर्तें दोनो के पूर्वज परिचित न हों।

प्रश्‍न .. क्‍या विवाह वैदिक रीति से ही होना चाहिए या आर्यसमाज रीति से भी ठीक है ?
उत्‍तर .. विवाह की दोनो रीतियों को मैं मानता हूं , दोनो की अपनी अपनी विशेषताएं हैं।

प्रश्‍न .. क्‍या विवाह में चार फेरे भी मान्‍य हैं ?
उत्‍तर .. दिनों का नामकरण भी उस समय तक विदित प्रमुख सात आकाशीय ग्रहों के आधार पर हुआ है। सप्‍तर्षि मंडल में सात सुविख्‍यात ऋषियों को साक्षी रखकर ही या ब्रह्म की भांति दाम्‍पत्‍य जीवन में पूर्णता सात ग्रहों की परिकल्‍पना का अनुकरण संभावित है , अत: सात फेरों में कोई कटौती मुझे उचित नहीं लगती।