क्‍या लालू , बालू और कालू की मजेदार कहानी आपको याद है ??

amari kahani

अचानक बचपन में किसी पत्रिका में पढी एक मजेदार कहानी की आज मुझे याद आ गयी। किसी गांव में तीन भाई रहा करते थे .. लालू , बालू और कालू । लालू और बालू खेतों में काम करते , जबकि कालू का काम उस गांव के दारोगा जी के लिए खाना बनाना होता था। खेतों की फसल और कालू की तनख्‍वाह से तीनो भाइयों का जीवनयापन खुशी खुशी हो रहा था। पर कुछ ही दिनों बाद लालू और बालू को अहसास हुआ कि उन्‍हें खेत में बहुत अधिक मेहनत करनी पडती है और लालू सिर्फ दो समय का खाना बनाकर अच्‍छा अच्‍छा खाना खाकर आराम का जीवन जी रहा है। इस बात का अहसास होते ही दोनो भाई कालू से झगडा करने लगे।

 कालू ने बहुत देर तक उन्‍हे समझाने की कोशिश की कि दारोगा जी का खाना बनाना बहुत आसान काम नहीं है , वे दोनो नहीं कर सकते। पर दोनो भाई इसे समझने को तैयार ही नहीं थे। दोनो भाइयों के विरोध को देखते हुए कालू ने उन्‍हें शांत करने के लिए दो चार दिनों तक उन्‍हें दारोगा जी के यहां खाना बनाने के लिए भेजने का निश्‍चय किया। दूसरे ही दिन लालू को इस कार्य के लिए भेजा गया , लालू थाने के अहाते में बने दारोगा जी के निवास पर पहुंचा। दारोगा जी ने उसका परिचय पूछा। उसने बताया कि वह कालू का भाई लालू है और उनका खाना बनाने के लिए यहां आया है।

दो दिन पहले गांव से लौटे दारोगा जी अपने चाचाजी की मृत्‍यु के क्रियाकर्म में अपना सर मुंडवा चुके थे और लॉन में बैठे पेपर पढ रहे थे। लालू की निगाह जब उनके सर पर पडी , तो वह जोर जोर से हंसने लगा। दारोगा जी ने उससे हंसने का कारण पूछा तो उसने बताया कि आपका सर तकला है , उसमें बिल्‍कुल भी बाल नहीं है , यदि किन्‍ही कारणों से आपका सर कट जाए तो उसे ढोया कैसे जाएगा ?

'तुम्‍हें बात करने की बिल्‍कुल भी तमीज नहीं , तुम्‍हें यहां किसने भेजा ?' अपने चाचाजी की मृत्‍यु से दुखी दारोगा जी को यह बात बिल्‍कुल पसंद नहीं आयी और नाराज होकर उन्‍होने लालू को थाने में बंद कर दिया। शाम को खेत से लौटने के बाद बालू और कालू काफी देर तक लालू का इंतजार करते रहें । जब वह नहीं आया तो शाम के अंधेरे में ही कालू उसे ढंढने थाने की ओर चला। 

वहां जाकर गुस्‍से से भरे दारोगा जी से सारी बातें मालूम हुई। उसने दारोगा जी से कहा ' क्‍या बताऊं दारोगा जी , इसको थोडी भी अकल नहीं , इसे माफ कर दीजिए , अरे इतना तो दिमाग लगाना ही चाहिए था कि यदि आपका सर कट भी जाए , तो मुंह तो खुला होगा न , उसमें डंडा डालकर उससे आपके सर को उठाते हुए आराम से कहीं भी ले जाया जा सकता है।

दारोगा जी का गुस्‍सा और बढना ही था। उन्‍होने नाराज होकर बालू को भी थाने में बंद कर दिया। दोनो भाइयों का इंतजार करते हुए जब कालू थक गया , तो देर रात वह भी दारोगा जी के यहां पहुंचा। दारोगा जी ने उसका स्‍वागत किया और कहा कि तुमने किन बेवकूफ भाइयों को मेरे यहां भेज दिया था। उसके बाद उसे पूरी कहानी सुनायी। 'क्‍या कहूं सर, मैं तो इतने दिनों से इन्‍हें झेल रहा था, यह सोंचकर उन्‍हें यहां भेजा कि आप इनकी दो दिनों में अवश्‍य छुट्टी कर देंगे , तब मैं काम पर लग ही जाऊंगा, पर ये तो एक घंटे भी नहीं टिक सकें।'

'सर ये इतने बेवकूफ हैं , इन्‍हें इतना भी नहीं पता कि यदि किसी तरह आपका सर कट ही जाए , तो एक कान से धागा डालकर दूसरे कान से निकालकर आराम से आपके सर को ढुलकाते हुए ले जाया जा सकता है।'


उसके बाद कालू का भी क्‍या हाल हुआ होगा , इसका अनुमान आप लगा ही सकते हैं !!

कैसा हो कलियुग का धर्म ??


प्रत्‍येक माता पिता अपने बच्‍चों को शिक्षा देते हैं , ताकि उसके व्‍यक्तित्‍व का उत्‍तम विकास हो सके और किसी भी गडबड से गडबड परिस्थिति में वह खुद को संभाल सके। पूरे समाज के बच्‍चों के समुचित व्‍यक्तित्‍व निर्माण के लिए जो अच्‍छी शिक्षा दे, वो गुरू हो जाता है। इसी प्रकार सारी मानव जाति के कल्‍याण के लिए बनायी गयी शिक्षा धर्म और उसे देनेवाले धर्म गुरू हो जाते हैं। इस शिक्षा का मुख्‍य उद्देश्‍य ज्ञान की प्राप्ति होनी चाहिए, जिसका आज गंभीर तौर पर अभाव है। 

सिर्फ गणित और विज्ञान को पढकर शिक्षा तो प्राप्‍त की जा सकती है , पर इससे व्‍यवहारिक ज्ञान नहीं प्राप्‍त किया जा सकता। माता पिता , गुरू या धर्मगुरू को शिक्षा देने से पूर्व आज के समाज को ध्‍यान में रखना अति आवश्‍यक है , तभी उसकी शिक्षा का सही महत्‍व होता है। प्राचीन काल में समाज के या जन जन के कल्‍याण के लिए प्रत्‍येक नागरिक को कर्तब्‍यों की डोर से बांधा गया था , जिसके पालन के लिए उन्‍हें ईश्‍वर का भय दिखाया गया था।

ग्रहों के प्रभाव की सटीक जानकारी के क्रम में एक बात तो स्‍पष्‍ट हो गयी है कि इस दुनिया में कोई भी काम किसी के चाहने या मेहनत करने मात्र से नहीं होता, वरन् एक स्‍पष्‍ट नियम से होता है, जिसे किसी भी समय प्रमाणित किया जा सकता है। इसलिए एक परम पिता परमेश्‍वर की संभावना से तो मैं इंकार नहीं कर सकती , भले ही यह हो सकता है कि हमारे अपने पिता , राष्‍ट्रपति या प्रधानमंत्री की तरह वो भी किसी नियम से चलने को मजबूर हों। इसलिए चाहते हुए भी त्‍वरित ढंग से किसी को बुरे कर्मों की सजा और किसी को अच्‍छे कर्मों का इनाम दे पाने में मजबूर हो , इसलिए उन्‍हें सर्वशक्तिमान रूप में नहीं देख पाने से हम उनके प्रति अक्‍सर भ्रम में होते हैं ।

मैने हिंदू धर्म में जन्‍म लिया है , पर किसी भी धार्मिक नियमों को मानने की मुझे कोई मजबूरी नहीं है। मेरी अंतरात्‍मा साथ दे , तो मैं पूजा करूं , यदि न दे , पूजा न करूं। जिस देवी देवता को पूजने की इच्‍छा हो , पूजूं , जिसका मजाक उडाने का मन हो , मजाक उडाऊं । गंगा में जाकर छठ का व्रत करूं , टब में जल भरवाकर या फिर एक कठौती में , मेरी मर्जी या देश , काल परिस्थिति पर निर्भर करता है। अलग से एक आयोजन रखकर बच्‍चे का मुंडन जनेऊ करवाऊं या किसी के विवाह में या फिर उसके खुद के विवाह में , पूरा बाल मुंडवाऊं या फिर एक लट ही काटूं , सब हमारी अपनी मर्जी। 

मरने के बाद शरीर के हर अंग को दान करने के लिए उसके काट छांट करवाऊं या फिर दाह संस्‍कार , वो भी अपनी आवश्‍यकता और रूचि के अनुसार। जंगलों की अधिकता हो तो लकडियों से अंतिम संस्‍कार हो सकता है , यदि कमी हो तो विद्युत शवगृहों में भी। जैसा देश , वैसा भेष बनाने की सुविधा हमें हमारा धर्म देता है, जैसा वास्‍तव में धर्म को होना चाहिए।

सिर्फ ग्रंथों को पढने लिखने से ही ज्ञान नहीं आता , गंभीर चिंतन मनन और समस्‍त चर अचर के प्रति प्रेम से इसमें निखार आता है। काफी दिनों से मैने ईश्‍वर और धर्म के बारे में मैने बहुत चिंतन मनन किया है , इसलिए इस बारे में कुछ अधिक लिखने की इच्‍छा अवश्‍य थी , पर वो कभी बाद में , अभी मैं वर्षों पहले अपनी डायरी में लिखी चंद लाइनों को पोस्‍ट कर रही हूं .........


कंप्‍यूटर युग का मानव है तू  , धर्मग्रंथों से इतना मत डर।
मानव जाति के विकास हेतु , धर्म का स्‍वयं निर्माण कर।।
माना वैदिककालीन विद्या है, उपयोगी होगी उस युग में।
इसका अर्थ कदापि नहीं कि ये पूजी जाए हर युग में।।

उन ऋषि मुनियों की तुलना में , क्‍या कम है तेरा दिमाग।
गंभीर चिंतन करो, तो मिटा सकोगे समाज की हर दाग ।।
धर्म कहता है , लालच मत कर, तरक्‍की होगी भला कैसे ?
महत्‍वाकांक्षा के बिना मंजिल निश्चित होगी नहीं जैसे ।।

अतिथि और असहायों की सेवा कर , धर्म बताता है।
आज इसी विश्‍वास का , बुरा फल ही देखा जाता है।।
टोने टोटके, व्रत जाप , कर्मकांड , धर्म के तत्‍व नहीं।
सच्‍ची प्रार्थना के आगे, किसी का कोई महत्‍व नहीं।।

कलियुग का सबसे बडा धर्म है , करते रहो प्रयोग ।
अपने तन मन धन संपत्ति का , करो उत्‍तम उपयोग।।
पीछे झांककर कभी न देखों , पीछे ही मत रह जाओ।
आगे बढते रहो हरदम, और सबको राह दिखाओ।।

विज्ञान का वास्‍तविक तौर पर प्रचार प्रसार काफी मुश्किल लगता है !!

भारतवर्ष में फैले अंधविश्‍वास को देखते हुए बहुत सारे लोगों , बहुत सारी संस्‍थाओं का व्‍यक्तिगत प्रयास अंधविश्‍वास को दूर करते हुए विज्ञान का प्रचार प्रसार करना हो गया है। मैं उनके इस प्रयास की सराहना करती हूं , पर जन जन तक विज्ञान का प्रचार प्रसार कर पाना इतना आसान नहीं दिखता। पहले हमारे यहां 7वीं कक्षा तक  विज्ञान की पढाई अनिवार्य थी , पर अब सरकार ने 10वीं कक्षा तक विज्ञान की पढाई को अनिवार्य बना दिया है । 

10वीं कक्षा के विद्यार्थियों को पढाने वाले एक शिक्षक का मानना है कि कुछ विद्यार्थी ही गणित और विज्ञान जैसे विषय को अच्‍छी तरह समझने में कामयाब है,  बहुत सारे विद्यार्थी विज्ञान की नैय्या को भी अन्‍य विषयों की तरह रटकर ही पार लगाते हैं । उनका मानना है कि एक शिक्षक को भी बच्‍च्‍े के दिमाग के अनुरूप ही गणित और विज्ञान जैसे विषय को पढाना चाहिए। जो विज्ञान के एक एक तह की जानकारी के लिए उत्‍सुक और उपयुक्‍त हों , उन्‍हें अलग ढंग से पढाया जाना चाहिए, जबकि अन्‍य बच्‍चों को रटे रटाए तरीके से ही परीक्षा में पास करवाने भर की जिम्‍मेदारी लेनी चाहिए।उनका कहना मुझे इसलिए गलत नहीं लगता , क्‍यूंकि एक एक मानव की मस्तिष्‍क की बनावट अलग अलग है।

जहां भारत में अधिकांश लोग साक्षर भी नहीं , कई लोग साक्षर होते हुए भी अशिक्षित और अज्ञानी हैं , वहीं पढे लिखे लोगों डिग्रीधारी लोगों तक में विज्ञान की समझ काफी कम देखने को मिलती है, जबकि विश्‍व में न जाने कितने वैज्ञानिक ऐसे हुए , जो कभी स्‍कूल भी नहीं जा सके थे, प्रतिभा को जन्‍मजात तौर पर स्‍वीकारने को बाय कर देता है। दैनिक जीवन में छोटी छोटी जगहों पर भी विज्ञान के नियमों का सहारा लेकर लाभ प्राप्‍त किया जा सकता है, पर अधिकांश लोगों को इस बारे में कुछ भी पता नहीं होता। और बताने पर भी समझने में दिलचस्‍प्‍ी नहीं रखते हैं, हां यदि फायदा हो तो उस कार्य को करना अवश्‍य शुरू कर देते हैं।

हमारी एक पडोसिन जाडे के दिनों में इलेक्ट्रिक रॉड के सहारे वह एक बाल्‍टी पानी गर्म किया करती , जिसका एक दो मग पानी परिवार के सदस्‍य अपने स्‍नान करने हेतु रखे गए पानी में मिला लिया करते थे। हमारे मुहल्‍ले में 8 बजे से 10 बजे तक के पावर कट से वे काफी परेशान रहने लगी थी , क्‍यूंकि पावर कट की वजह से  परिवार के एक या दो व्‍यक्ति के नहाने के बाद ही सारा पानी ठंडा हो जाया करता था और बाकी लोगों को स्‍नान करने के लिए 10 बजे लाइट के आने का इंतजार करना पडता था। 

काफी दिनों से उनके द्वारा झेली जा रही परेशानी की भनक मुझतक भी पहुंची। मैने उन्‍हें सलाह दी कि 8 बजे पावर कट होते ही वह उस एक बाल्‍टी खौलते पानी को एक बडे ड्रम में डाल दे, जिससे सारा पानी नहाने लायक हो जाएगा और परिवार के सभी सदस्‍य आराम से नहा पाएंगे। उसकी वजह तो आप सभी ज्ञानी पाठक अवश्‍य समझ जाएंगे , पर न तो उस महिला को और उसकी पढी लिखी बेटी तक को कारण समझ में आ सका , हां वे मेरे कहे का फायदा अवश्‍य उठाती रहीं।

इसी प्रकार एक पडोसन को कस्‍टर्ड बनाने वक्‍त सूखे कस्‍टर्ड पाऊडर को घोलने के लिए दूध को बिना खौलाए प्रयोग करते देखा , कस्‍टर्ड के घोल को खौलते दूध में डालते ही वह तापमान को कम कर देता है और गाढा हो जाता है , जिसके कारण सारा दूध फिर से 100 डिग्री तापमान पर नहीं आ पाता। इसलिए स्‍वास्‍थ्‍य की दृष्टि से यह सही है कि पूरे दूध को खौलाकर कस्‍टर्ड पाउडर घोलने के लिए थोडे से दूध को ठंढा कर प्रयोग में लाया जाए।पर बहुत सारी गृहिणियां अपनी सुविधा के लिए कच्‍चे दूध का उपयोग करती हैं , जिसे समझाने का भी उपनपर कोई असर नहीं होता। 

विज्ञान को न समझने वाले तार्किक दृष्टि न रखनेवाले किसी बात के अर्थ का अनर्थ कैसे कर डालते हैं , यह इस उदाहरण से स्‍पष्‍ट हों जाएगा। एक गृहिणी ने अपने पति और उनके कुछ मित्रों की बातचीत को सुना। पानी की गंदगी को लेकर वे काफी चिंतित थे और पानीउबालकर पीना चाहिए , इसकी वकालत कर रहे थे। सुननेवाली महिला तबतक पानी उबालकर ही पिया करती थी। बातचीत का यह वाक्‍य उसके कान में गया , ' पानी उबलने के बाद भी 10 मिनट तक उसका 100 डिग्री तापमान मेनटेन किया जाना चाहिए। इसलिए उचित ये है कि पानी न सिर्फ उबाला जाना चाहिए, उसे गर्म हीटर पर ऑफ करके थोडी देर छोड भी देना चाहिए।

उस महिला पर इस बात का ऐसा प्रभाव पडा कि तब से उसने भगोने को नल के पानी से भरकर हीटर पर चढाकर हीटर को ऑफ करना शुरू किया। एक दिन पति का उस बात पर ध्‍यान गया तो उसने बताया कि आपलोग ही तो बात कर रहे थे कि पानी को खौलाना ही जरूरी नहीं है , उसे गर्म हीटर पर 10 मिनट छोड देना चाहिए। जहां समाज में ऐसे लोग मौजूद हों , वहां विज्ञान का प्रचार प्रसार कागज पर ही हो सकता है , वास्‍तविक तौर पर मुश्किल लगता है।



छोटी छोटी बात में भी मौलिक सोंच

पिछले दिनों सहारा इंडिया की विभिन्‍न प्रकार के बचत स्‍कीमों के लिए काम कर रहे एक एजेंट के बारे में जानकारी मिली। रोजी रोटी की समस्‍या से निजात पाने के लिए वह इसका एजेंट तो बन गया , पर यहां भी राह आसान न थी। पांच दस रूपए व्‍यर्थ में बर्वाद करनेवाले और कभी दस पंद्रह हजार रूपए की जरूरत पर महाजनों के यहों बडी ब्‍याज दर पर पैसे लेने वाले छोटे छोटे लोगों को वह गांव गांव , मुहल्‍ले मुहल्‍ले जाकर बचत के बारे में समझाता फिर रहा था।

 शहर से लेकर गांव तक की यात्रा में सब , खासकर महिलाएं उनकी बातों से प्रभावित होती , लोग प्रतिदिन पैसे जमा करना भी शुरू कर देते , पर महीने के अंत में जबतक एजेंट उनके पास पहुंचता , बचाए धन का कुछ हिस्‍सा खर्च हो जाया करता था। इससे जहां एक एक पैसे जमा करने वाले लोगों को भी तकलीफ होती ही थी , एजेंट का भी सारा मेहनत व्‍यर्थ हो रहा था। आखिर कुछ कमीशन न बचे , तो वो अपनी रोजी रोटी की समस्‍या कैसे हल कर सकता था ?

पर छोटी छोटी बात में भी मौलिक सोंच के सहारे कोई व्‍यक्ति आगे बढ सकता है , कुछ दिनों के चिंतन मनन के बाद उसने एक हल निकाल ही लिया। वह एक बढई के यहां गया, उसने सौ दो सौ बक्‍से बनवाए, सभी बक्‍सों के ऊपर रूपए डालने के लिए एक लंबा छिद्र करवाया। बाजार से छोटे छोटे सौ दो सौ ताले खरीदे, सभी बक्‍सों में ताला लगाया । सबको उठाया और गांव से लेकर शहर तक पैसे जमा करने के उत्‍सुक लोगों में से प्रत्‍येक के घर में एक एक बक्‍से रख दिए और सभी चाबियों में उस महिला या पुरूष का नाम लिखकर अपने बैग में रख लिया। 

ऐसी स्थिति में पुरूष या महिला द्वारा उस बक्‍से में पैसे तो डाले सकते थे , पर किसी मुसीबत में भी उसे नहीं निकाला जा सकता था और महीने भर किसी दूसरे विकल्‍प के सहारे ही काम चलाने को बाध्‍य होना पडता था।इस तरह सारी समस्‍या हल हो चुकी थी , महीने के अंत में वह उस बक्‍से को खोलकर जरूरत भर पैसे निकाल लेता और पुन: ताला बंद कर उसे वहीं छोड दिया करता था। जहां लोगों के पैसे बच रहे थे, वहीं उसकी रोजी रोटी की समस्‍या भी हल हो चुकी थी। इस सोंच को आप क्‍या कहेंगे ??

क्‍या सचमुच हमारे सोने के चेन में उस व्‍यक्ति का हिस्‍सा था ??

कभी कभी जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं अवश्‍य घट जाती हैं , जिसे संयोग या दुर्योग का पर्याय कहते हुए हम भले ही उपेक्षित छोड दें , पर हमारे मन मस्तिष्‍क को झकझोर ही देती है। आध्‍यात्‍म को मानने वाले इस बात को समझ सकते हैं कि निश्चित परिस्थितियों और निश्चित सीमाओं में ही रहकर व्‍यक्ति अपने जीवन जीने को बाध्‍य हैं और जो भी अधिक या कम प्राप्‍त करता है , उसमें प्रकृति का सहयोग या असहयोग स्‍पष्‍टत: झलकता है। 

इसी वर्ष 8 फरवरी को मैने क्‍या प्रकृति में लेने और देने का परस्‍पर संबंध होता है ?? नामक एक पोस्‍ट किया था , जिसमें लिखा था कि अनजाने में किस प्रकार मैने एक अपरिचित महिला का आतिथ्‍य करने के दो महीने बाद उसे उसी के घर जाकर वसूल लिया था इसी प्रकार की एक और घटना मेरे जीवन में घट चुकी है , जिससे मेरी समझ में एक बात आ गयी है कि इस प्रकृति में सबों को हिस्‍सा तय है और वह हर व्‍यक्ति प्राप्‍त कर ही लेता है।

बात मेरे बचपन की है , जब गांव गांव में सोने चांदी की सफाई करनेवाले एक व्‍यक्ति ने मेरे घर में दस्‍तक दी। मम्‍मी के द्वारा दरवाजा खोलते ही उसने सोने और चांदी को साफ कर बिल्‍कुल नया कर देने का दावा किया। सोने के गहने तो महिलाएं किसी अनजान को नहीं सौंपती , पर चांदी में ऐसा कोई बडा रिस्‍क नहीं होता। मम्‍मी मेरी दो वर्ष की छोटी बहन के पैरों की गंदी पायल को साफ करवाने का लालच न रोक पायी। 

उसकी मजदूरी देकर मम्‍मी तो उसे वापस लौटाने की कोशिश कर रही थी , पर उसकी नजर तो मम्‍मी के गले में पडी सोने की चेन पर थी। उसने मम्‍मी को कहा कि दो मिनट में आपकी चेन भी बिल्‍कुल नई हो जाएगी। मम्‍मी काफी देर तक 'ना' 'ना' करती रही , पर उसके बहुत जिद करने पर कि चुटकियों में वह उनकी चेन को साफ कर देगा , थोडे लालच में पड गयी। दरअसल एक दो दिनों में उन्‍हें एक विवाह के सिलसिले में बाहर भी जाना था , वह भी एक वजह बन गयी।

पर उस व्‍यक्ति की मंशा तो कुछ और थी, हाथ में चेन मिलते ही उसने सफाई के क्रम में चेन को ऐसी प्रक्रियाओं से गुजारा कि दो मिनट की जगह मम्‍मी को दस मिनट इंतजार करना पडा। उसके बाद चेन का वजन काफी हल्‍का हो गया था , मम्‍मी ने हाथ में लेते ही ऐसा महसूस किया। मम्‍मी के हल्‍ला मचाने पर वह भागनेवाला ही था कि गांव के कुछ लोगों ने उसे घेर लिया। 

अपने को मुसीबत में घिरा पाकर उसने अपनी गल्‍ती स्‍वीकार की और अपने अम्‍ल के घोल में से सोना निकालकर वापस करने का वादा किया। उसने कई ईंट को जोडकर चूल्‍हा बनाया , एक कटोरे में कुछ रखकर उसे काफी देर खौलाता रहा और उसके बाद 8 ग्राम के लगभग सोने का एक चमकता टुकडा निकालकर वापस लौटाया। उसके बाद थाने और पुलिस की धमकी दे रहे सारे गांव के लोगों ने उसपर रहम खाते हुए उसे माफ करते हुए इस शर्त के साथ वापस भेज दिया कि अब वो ऐसा काम नहीं करेगा , क्‍यूंकि इस प्रकार लोगों को धोखा देने से कभी भी वह विपत्ति में पड सकता है।

काफी दिनों बाद हमलोग उस बात को भूल ही गए थे। मेरे विवाह के वक्‍त मेरी मम्‍मी ने उस टुकडे को निकाला और मेरी चेन में उसे मिला दिया। विवाह के बाद मैं उसे हमेशा पहनने लगी। एक दिन हमलोग घर में अकेले थे कि सोने और चांदी की सफाई करने का पाऊडर बेचता हुआ एक लडका आया। सफाई के मामलों में अधिक रूचि रखने वाले , इस प्रकार के हर प्रोडक्‍ट में दिलचस्‍पी रखनेवाले मेरे पति बरामदे में ही बैठे थे। इन्‍होने उसे बिठा लिया और उसके प्रोडक्‍ट को देखने लगे। बातचीत की आवाज सुनकर मैं भी बरामदे में आयी , तो इन्‍होने मेरा पायल मांगा। उसे देखते ही मुझे पुरानी बातें याद आ गयी , मैने इन्‍हें चुपचाप बुलाकर सारी बातें बतायी , पर इन्‍होने मुझसे पायल ले ही लिया।एक मिनट में उसने पायल को चमका दिया , जिसे देखकर ये काफी खुश हुए।

जैसे ही मैं अंदर से बाहर आयी , इन्‍होने मुझसे चेन मांगा ,मै 'ना' 'ना' कहती रही , पर इन्‍होने कहा कि वे खुद अपने हाथों से उसके इंस्‍ट्रक्‍शन के अनुसार सफाई करेंगे। मुझे चिंति‍त होने की कोई आवश्‍यकता नहीं। इनपर विश्‍वास करके मैने अपना चेन उतारकर दे दिया। वह लडका मेरे को अच्‍छी तरह समझ चुका था , इसलिए  मुझे व्‍यस्‍त करने का एक तरीका ढूंढ निकाला था , बार बार मुझसे कुछ न कुछ मांगता , एक छोटा बरतन , थोडा सा पानी या कुछ और चीज। और इसी क्रम में वह इनके हाथ से चेन ले चुका था। फटाफट उसने क्‍या क्‍या करके मेरे चेन को भी हल्‍का कर दिया। 

मैने हाथ में लेकर इस बात का अंदाजा करने की कोशिश की , पर जबतक समझती और इन्‍हें समझाती , वह रफूचक्‍कर हो चुका था। इन्‍होने तुरंत स्‍कूटर स्‍टार्ट कर पूरे शहर को छान मारा , पर वो कहीं भी दिखाई नहीं दिया। न तो इस घटना से पहले या उसके बाद आजतक कभी भी मेरे पति किसी भी ठगी के शिकार हुए हैं। उसी चेन का कुछ हिस्‍सा , जो मेरी मम्‍मी से नहीं छीना जा सका था , वही अंश मेरे द्वारा वसूल कर लिया गया था । सोचने को बहुत कुछ मजबूर कर देती है ये घटना , क्‍या सचमुच हमारे चेन में उसका हिस्‍सा था ?