2010 के दिल्‍ली ब्‍लॉगर मीट

हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडने के बाद प्रतिवर्ष भाइयों के पास दिल्‍ली यानि नांगलोई जाना हुआ , पर इच्‍छा होने के बावजूद ब्‍लोगर भाइयों और बहनों से मिलने का कोई बहाना न मिल सका। इस बार दिल्‍ली के लिए प्रस्‍थान करने के पूर्व ही ललित शर्मा जी और अविनाश वाचस्‍पति जी के द्वारा मुझे जानकारी मिल गयी थी कि हमारे दिल्‍ली यात्रा के दौरान एक ब्‍लॉगर मीट रखी जाएगी। रविवार का दिन होने से 23 मई ब्‍लागर मीट के लिए उपयुक्‍त था , यह काफी पहले तय हो चुका था , पर स्‍थान के बारे में मुझे कोई जानकारी न थी।  आभासी दुनिया के लोगों को प्रत्‍यक्ष देखने और उनके विचारों से रू ब रू होने की कल्‍पना ही मन को आह्लादित कर रही थी। पर 20 तारीख तक यानि दिल्‍ली जाने के पंद्रह दिनों बाद तक मुझे ऐसी कोई सूचना नहीं मिल पायी थी, ब्‍लॉग मीट की बात कैंसिल तो नहीं हो गयी , यह सोंचकर मैं थोडी अनिश्चितता में थी।

पर शीघ्र ही सूचना मिली कि पश्चिमी दिल्ली के छोटूराम जाट धर्मशाला में रविवार २३ मई को दोपहर तीन बजे से शाम के बजे तक एक ब्लोग बैठक का आयोजन किया गया है । नियत दिन और समय पर मैं जब इस बैठक में पहुंची तो वहां जिन्‍हें पहचान सकी , वो श्री ललित शर्मा जी , श्री अविनाश वाचस्पति जीश्री रतन सिंह शेखावत जी,  श्री जय कुमार झा जीश्री एम वर्मा जी, श्री राजीव तनेजा जी, श्रीमती संजू तनेजा जी, श्री विनोद कुमार पांडे जी , श्री पवन चंदन जी आदि थे , धीरे धीरे श्री मयंक सक्सेना जी , श्री नीरज जाट जी , श्री अमित (अंतर सोहिल ) , सुश्री प्रतिभा कुशवाहा जी श्री एस त्रिपाठी जी ,श्री आशुतोष मेहता जी , श्री शाहनवाज़ सिद्दकी जी , श्री सुधीर जीश्री राहुल राय जी, डावेद व्यथित जीश्री राजीव रंजनप्रसाद जी, श्री अजय यादव जी , अभिषेक सागर जी , डाप्रवीण चोपडा जी ,श्री प्रवीण शुक्ल प्रार्थी जी , श्री योगेश गुलाटी जी, श्री उमा शंकर मिश्रा जी, श्री सुलभ जायसवाल जी,श्री चंडीदत्त शुक्ला जी, श्री राम बाबू जी ,श्री देवेंद्र गर्ग जी , श्रीघनश्याम बाग्ला जी , श्री नवाब मियां जी, श्री बागी चाचा जी ,अजय कुमार झा जी , श्री खुशदीप सहगल जी ,श्री इरफ़ान जी वगैरह भी पहुंचे इतने ब्‍लॉगर भाइयों को पहचान पाना तो मुश्किल था , पर कार्यक्रम के शुरूआत में ही परिचय के औपचारिक आदान प्रदान ने इसे आसान कर दिया। इनके अलावा फ़ोन के माध्यम से भी हमारे बीच उपस्थित होने वालों में श्री समीर लाल जी , सुश्री शोभना चौरे जी ,सुश्री शोभना चौधरी जी , श्री राज भाटिया जी , श्री ताऊ जी ,दीपक मशाल जी और अदा जी थी राजीव तनेजा जी के सुपुत्र माणिक तनेजा सबका खास ख्‍याल रख रहे थे । ठंढा , गर्म और अल्‍पाहार की पूरी व्‍यवस्‍था को उन्‍होने अपने कम उम्र के बावजूद बखूबी संभाला।

 अविनाश वाचस्पति जी ने बैठक की प्रस्तावना पेश करते हुए कुछ अहम बातें कहीं । हिन्‍दी ब्लॉगिंग को उन दोषों से दूर रखने का प्रयास करेंगे , जो टी वीप्रिंट मीडिया और अन्‍य माध्‍यमों में दिखलाई दे रहे हैं। जो भाषा हम अपने लिएअपने बच्‍चों के लिए चाहते हैं - वही ब्‍लॉग पर लिखेंगे और वही प्रयोग करेंगे। ब्‍लॉगिंग को पारिवारिक और सामाजिक बनायेंगेजिससे भविष्‍ में इसे प्राइमरी शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सके। ब्‍लॉगिंग में वो आनंद आना चाहिए , जो संयुक्‍ परिवार में आता है। जिस प्रकार आज मोबाइल फोन का प्रसार हुआ है, उतना ही प्रचार प्रसार हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का भी हो परंतु उसके लिए हमें संगठित होना होगा। इसके लिए हमें एक संगठन बना लेना चाहिए। जो ब्‍लॉगर इस संबंध में पंजीकरणनियमों इत्‍यादि की पूरी जानकारी रखते हों , वो इस संबंध में कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए कार्रवाई शुरू कर लें। जिस प्रकार अपने बच्‍चों के लाभ के लिए हम सदा सक्रिय रहते हैंउसी प्रकार ब्‍लॉगों के भले के लिए जागृत रहना चाहिए। और जो काम हम अपने लिए नहीं चाहते वो दूसरों के लिए भी  करें – देखना सारे फसाद उसी दिन खत् हो जायेंगे। हम सबको मिलकर हिन्‍दी ब्‍लॉग की दुनिया को बेहतर बनाना है। 

मिश्र जी ने जिन्होंने ब्लोग्गर्स के किसीभी संगठन के निर्माण से पहले , या किसी भी संगठन को स्थापित किए जाने से पहले उसके उद्देश्यों को तय किये जाने की बात कहीं । श्री एम वर्मा जी जिन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य में ब्लोग्गर्स पर जो भी जिम्मेदारी बढने वाली है और संभावना है कि ब्लोग्गिंग की बढती ताकत को पहचानते हुए उसे दबाने की कोशिश की जाए तो इसके लिए अभी से तैयारी करना आवश्यक होगा । डा.प्रवीण चोपडा जी ने भी संगठन को अपनी सहमति देते हुए उसका उद्देश्य भी तय करने का विचार रखा । उन्होंने एक महत्वपूर्ण सुझाव रखते हुए कहा कि अच्छा होगा कि चूंकि हम सब ब्लोग्गर्स आभासी रूप से एक दूसरे से जुडे हैं इंडिया ब्लोगर्स फ़ोरम जैसा कुछ बनाया जा सकता है । इसके बाद इरफ़ान जीने अपने ब्लोग्गिंग और कार्टून के पेशेगत अनुभवों को बांटते हुए बताया कि किस तरह उनके एक कार्टून ने न्यायपालिका तक को मजबूर कर दिया । और यही अभिव्यक्ति की ताकत है । 

मयंक सक्सेना जी ने बताया कि प्रतिबंध और सेंसरशिप की गाज़ हिंदी ब्लोग्गिंग पर भी पडने वाली ही है एक दिन । उस दिन यदि उस ब्लोग्गर ने अपने आपको अलग थलग पाया तो उस दिन किसी ऐसे संगठन का न होना अधिक नुकसानदायक होगा । साहित्य शिल्पी के संचालक श्री राजीव रंजन जी ने अपने ओजपूर्ण शैली में सबके सामने रखा । उन्होंने बताया कि जब तक हिंदी ब्लोग्गिंग में आलोचना को स्वस्थ अंदाज़ में नहीं लिया जाएगा तब तक हिंदी ब्लोग्गिंग परिपक्व नहीं हो सकेगी । अजय कुमार झा जी ने कहा कि आखिर ब्लोग्गर्स के किसी भी संगठन को लेकर इतनी दुविधा इसलिए हो रही है क्‍यूंकि इस संगठन के प्रयास को किसी भी तरह की गुटबंदी समझने की जो भूल की जा रही है। चार व्‍यक्ति के साथ होने का अर्थ यह नहीं कि वो फलाने गुट में है ! ललित शर्मा जी ने भी ब्‍लॉगिंग में आने के बाद अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए इसकी ताकत के बारे मे समझाया। 

मैने भी ब्‍लॉगिंग के मुद्दे पर अपना विचार रखा , चूंकि प्रत्‍येक व्‍यक्ति ऊपर से देखने में एक होते हुए भी अंदर से बिल्‍कुल अलग बनावट लिए हैं , इसलिए इस दुनिया में घटने वाली सारी घटनाओं को विभिन्‍न कोणों से देखते हैं , जाहिर है , हम अलग कोण से लिखेंगे ही। भले ही कोई 'वाद' देश , काल और परिस्थिति के अनुसार सटीक होता हो , पर कालांतर में उसमें सिर्फ अच्‍छाइयां ही नहीं  रह जाती है। इसलिए ही समय समय पर हमारे मध्‍य विचारों का बडा टकराव होता है , उससे दोनो ही पक्ष में शामिल पाठकों या आनेवाली पीढी के समक्ष एक नया रास्‍ता खुलता है। ऐसा भी होता ही आया है कि भीड में भी समान विचारों वाले लोग छोटे छोटे गुट बना लेते हैं , कक्षा में भी  विद्यार्थियों के कई ग्रुप होते हैं , इसका अर्थ ये नहीं कि वे एक दूसरे पर पत्‍थर फेके। हमें समझना चाहिए कि जहां हमारे विचारों की विभिन्‍नता और वाद विवाद हिंदी ब्‍लॉगजगत को व्‍यापक बनाने में समर्थ है , वहीं एक दूसरे के प्रति मन की खिन्‍नता और आपस में गाली गलौज हिंदी ब्‍लॉग जगत का नुकसान कर रही है। मेरा अपना दृष्टिकोण है कि यदि हम संगठित नहीं हों तो हमारे ऊपर कभी भी आपत्ति आ सकती है और हमें विचारों की अभिव्‍यक्ति से संबंधित अपनी इस स्‍वतंत्रता को खोना पड सकता है। इसलिए संगठित बने रहने के प्रयास तो होने ही चाहिए !!

संगठन में ही बडी शक्ति है .. क्‍या आप इंकार कर सकते हैं ??

हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडने के बाद प्रतिवर्ष भाइयों के पास दिल्‍ली यानि नांगलोई जाना हुआ , पर इच्‍छा होने के बावजूद ब्‍लोगर भाइयों और बहनों से मिलने का कोई बहाना न मिल सका। इस बार दिल्‍ली के लिए प्रस्‍थान करने के पूर्व ही ललित शर्मा जी और अविनाश वाचस्‍पति जी के द्वारा मुझे जानकारी मिल गयी थी कि हमारे दिल्‍ली यात्रा के दौरान एक ब्‍लॉगर मीट रखी जाएगी। रविवार का दिन होने से 23 मई ब्‍लागर मीट के लिए उपयुक्‍त था , यह काफी पहले तय हो चुका था , पर स्‍थान के बारे में मुझे कोई जानकारी न थी।  आभासी दुनिया के लोगों को प्रत्‍यक्ष देखने और उनके विचारों से रू ब रू होने की कल्‍पना ही मन को आह्लादित कर रही थी। पर 20 तारीख तक यानि दिल्‍ली जाने के पंद्रह दिनों बाद तक मुझे ऐसी कोई सूचना नहीं मिल पायी थी, ब्‍लॉग मीट की बात कैंसिल तो नहीं हो गयी , यह सोंचकर मैं थोडी अनिश्चितता में थी।

23 मई को ही भाइयों को नांगलोई के जाट धर्मशाला में आयोजित एक कार्यक्रम के बारे में चर्चा करते सुना, तो वहां एक ब्‍लोगर मीट को आयोजित करने की मेरी भी इच्‍छा हो गयी। मेरे भाई ने इसमें पूर्ण तौर पर सहयोग देने का वादा किया। कार्यक्रम के बारे में जानने के लिए मैने अविनाश वाचस्‍पति जी को फोन लगाया , तो बातचीत में मालूम हुआ कि एम वर्मा जी के यहां 23 मई को ब्‍लॉगर मीट होना तय हुआ है , जिसमे कुछ ब्‍लोगरों का मिलना जुलना होगा। चूंकि राजीव तनेजा जी हमारे इलाके में थे , इसलिए मुझे वहां तक पहुंचाने की जिम्‍मेदारी राजीव तनेजा जी को दी गयी थी। कार्यक्रम के बारे में जानकर मेरी अनिश्चितता तो दूर हुई , पर जाट धर्मशाला के बडे हाल में अधिक से अधिक ब्‍लोगरों को बुलाया जाना और उनसे मिलना जुलना हो पाएगा , यह सोचते हुए मैने इस स्‍थल के बारे में अविनाश जी को जानकारी दे दी। अविनाश जी काफी खुश हुए , दूसरे ही दिन उन्‍होने इस हॉल में ब्‍लॉगर सम्‍मेलन होने की घोषणा अपने ब्‍लॉग में कर दी।

22 मई की शाम मैं भाई के साथ इस स्‍थल के निरीक्षण के लिए गयी , तो फोन कर राजीव तनेजा जी  को बुलाया, थोडी ही देर में वहां एम वर्माजी भी पहुंचे। हम तीन ब्‍लॉगरों की मीटिंग 22 मई को ही हो गयी, पर हम तीन तिगाडा ने काम बिल्‍कुल भी नहीं बिगाडा। हमारे द्वारा तय किए गए ऊपर का हाल छोटा लगा , तो भाई ने नीचे के हाल में ब्‍लॉगर मीट की व्‍यवस्‍था कर दी। वैसे तो इस ब्‍लॉगर मीट में थोडी जिम्‍मेदारी लेने की मेरी भी इच्‍छा थी , पर अविनाश वाचस्‍पतिजी और राजीव तनेजा जी ने इस ब्‍लॉग मीट को सफल बनाने की पूरी जिम्‍मेदारी संभाल ली और हमें हर प्रकार के इल्‍जाम से बचा लिया। दिल्‍ली में हिंदी ब्‍लोगरों की भारी संख्‍या और ब्‍लॉगर मीट पर पोस्‍ट लिखे जाने के बाद अधिक लोगों के उपस्थित होने की उम्‍मीद में थी मैं , लेकिन जितने उपस्थित हुए , वो कम भी नहीं थी , क्‍यूंकि उन्‍हें समय काफी कम मिला। पर जूनियर हों या सीनियर , महिला हों या पुरूष , हिंदी ब्‍लॉगिंग के प्रति  प्रेम से सराबोर सभी लोगों ने ब्‍लॉगिंग के विभिन्‍न पहलुओं पर अपने कुछ न कुछ विचार अवश्‍य रखा।

मैने भी ब्‍लॉगिंग के मुद्दे पर अपना विचार रखा , चूंकि प्रत्‍येक व्‍यक्ति ऊपर से देखने में एक होते हुए भी अंदर से बिल्‍कुल अलग होते हैं , इसलिए इस दुनिया में घटने वाली सारी घटनाओं को विभिन्‍न कोणों से देखते हैं , जाहिर है , हम अलग कोण से लिखेंगे ही। भले ही कोई 'वाद' देश , काल और परिस्थिति के अनुसार सटीक होता हो , पर कालांतर में उसमें सिर्फ अच्‍छाइयां ही नहीं  रह जाती है। इसलिए ही समय समय पर हमारे मध्‍य विचारों का बडा टकराव होता है , उससे दोनो ही पक्ष में शामिल पाठकों या आनेवाली पीढी के समक्ष एक नया रास्‍ता खुलता है। ऐसा भी होता ही आया है कि भीड में भी समान विचारों वाले लोग छोटे छोटे गुट बना लेते हैं , कक्षा में भी  विद्यार्थियों के कई ग्रुप होते हैं , इसका अर्थ ये नहीं कि वे एक दूसरे पर पत्‍थर फेके। हमें समझना चाहिए कि जहां हमारे विचारों की विभिन्‍नता और वाद विवाद हिंदी ब्‍लॉगजगत को व्‍यापक बनाने में समर्थ है , वहीं एक दूसरे के प्रति मन की खिन्‍नता और आपस में गाली गलौज हिंदी ब्‍लॉग जगत का नुकसान कर रही है। मेरा अपना दृष्टिकोण है कि यदि हम संगठित नहीं हों तो हमारे ऊपर कभी भी आपत्ति आ सकती है और हमें विचारों की अभिव्‍यक्ति से संबंधित अपनी इस स्‍वतंत्रता को खोना पड सकता है। इसलिए संगठित बने रहने के प्रयास तो होने ही चाहिए !!

पूरे महीने दिलो दिमाग में दुर्घटनाओं का खौफ छाया रहा !!

पिछले आलेख में मैने बताया कि इस बार की दिल्‍ली यात्रा मेरे लिए बहुत ही सुखद रही, पर पूरे महीने दिलो दिमाग में दुर्घटनाओं का खौफ छाया रहा। 5 मई को बोकारो से प्रस्‍थान की तैयारी में व्‍यस्‍त 4 मई को मिली एक भयावह दुर्घटना की खबर ने मन मे जो भय बनाया , वह पूरे महीने दूर न हो सका। 25 मई को बेटे के बंगलौर से दिल्‍ली प्रस्‍थान करने से पहले मंगलौर में हुई विमान दुर्घटना और बोकारो आने से पूर्व स्‍टेशन में हुई भगदड से हुई मौत और बोकारो पहुंचने से पहले ज्ञानेश्‍वरी ट्रेन हादसे की खबर यह अहसास दिलाने में समर्थ हो गयी कि यात्रा के दौरान हम भाग्‍य और भगवान के भरोसे ही सुरक्षित हैं।

यात्रा के दौरान खासकर लौटते वक्‍त कहीं कहीं परिस्थितियां गडबड बनीं , पर ईश्‍वर की कृपा है कि उसका कोई दुष्‍परिणाम देखने को नहीं मिला। 29 मई को पुरूषोत्‍तम एक्‍सप्रेस से बोकारो लौटना था , ट्रेन की टाइमिंग थी .. 10 :20 रात्रि , चूंकि हम तीन मां बेटे पूरे सामान के साथ थे , इसलिए दो ऑटो वाले को  8 बजे रात्रि को आने को कहा गया था। आठ की जगह साढे आठ बज गए , पर ऑटो नहीं आया। हमने तुरंत दो रिक्‍शे से नांगलोई के लिए प्रस्‍थान किया। रात के नौ बजे हम नांगलोई से चले , ऑटो वाले से बार बार पूछते हुए कि दस बजे तक हमलोग पहुंच पाएंगे या नहीं ? 'यदि कहीं पर जाम न हो तो पहुंच जाएंगे , पर इस वक्‍त जाम रहती है' , ऑटोवाले का जबाब सुनकर हमलोग परेशान हो जाते थे , पर रास्‍ते में जाम क्‍या , कहीं लाल बत्‍ती भी नहीं मिली और हम पौने दस बजे स्‍टेशन पहुच चुके थे।

बिल्‍कुल शांत दिमाग से पूछ ताछ कर हम उस प्‍लेटफार्म पर उस स्‍थान पर पहुंचे , जहां पुरूषोत्‍तम की वह बोगी आने वाली थी , जिससे हमें जाना था । पर ट्रेन तो देर से आयी ही , बोगियां भी सूचना के विपरीत लगी हुई थी । अब प्‍लेटफार्म पर अफरातफरी का माहौल बन गया , इधर के यात्री उधर और उधर के यात्री इधर जाते दिखाई दे रहे थे। ट्रेन यदि देर से न खुलती , तो यहां भी एक दुर्घटना के होने की संभावना थी , पर सबों के आराम से बैठने के बाद ही ट्रेन खुली , जिससे राहत मिली। पर सुबह उठते ही ज्ञानेश्‍वरी ट्रेन हादसे की खबर मिली , जिससे पुन: एक बार मन:स्थिति पर बुरा प्रभाव पडा।

शाम 5 बजे के बाद बोकारो से काफी निकट गोमो स्‍टेशन से ट्रेन के चलने के बाद घर पहुंचने की खुशी में बडा खलल उस वक्‍त पहुंचा , जब हमें यह मालूम हुआ कि ज्ञानेश्‍वरी हादसे के बाद सुरक्षा कारणों से ट्रेन बोकारो से नहीं , वरन् दूसरे रास्‍ते से बंगाल की दिशा में चल चुकी है। गोमो में हो रहे इस एनाउंसमेंट के वक्‍त हमारा ध्‍यान बेटे के ए आई ट्रिपल ई के रिजल्‍ट की ओर था , जिसकी सूचना हमें तुरंत मिली थी। एनाउंसमेंट न सुन पाने के कारण आयी इस विकट परिस्थिति से लगभग आधे घंटे हम सब हैरान परेशान रहे , पर खैरियत थी कि एक छोटे से स्‍टेशन 'मोहदा' में गाडी रूकी , दो मिनट के इस स्‍टॉपेज में गाडी रूकने का अंदाजा होने से हम अपने सामान के साथ गेट पर तैयार ही थे , इसलिए हमने सारा सामान जल्‍दी जल्‍दी उतार लिया। वहां से हम बाहर आए , एक टैक्‍सी ली और पौने सात बजे हम बोकारो में थे। इस तरह इस यात्रा के दौरान कुछ कुछ असमान्‍य घटनाएं होती रहीं , पर कुशल मंगल अपने घर पहुंच गयी।

दिल को खुश करनेवाली रही यह दिल्‍ली-यात्रा

यूं तो पिछले तीन वर्षों से मई या जून महीने में मुझे दिल्‍ली में ही रहने की जरूरत पडती रही है , पर इस वर्ष की दिल्‍ली यात्रा बहुत खास रही । पूरे मई महीने दिल्‍ली में व्‍यतीत करने के बाद कल ही बोकारो लौटना हुआ है , इस दिल्‍ली यात्रा में बहुत रंग आते जाते दिखे , खट्टे मीठे अनुभवों से युक्‍त पूरे महीने की खास बातों की चर्चा आनेवाले पोस्‍ट में अवश्‍य करूंगी , आज संक्षेप में मीठे अनुभवों की चर्चा .....

 मम्‍मी , दोनो भाभियों और तीनों भतीजे भतीजियों का साथ ...


दिल्‍ली की ब्‍लॉगर मीट .....

                             

भतीजे का मुंडन ......


और खासकर छोटे बेटे के द्वारा आई आई टी और बिट्स पिलानी दोनो ही संस्‍थानों में इंजीनियरिंग की एक सीट प्राप्‍त कर पाने की सफलता .....
 


मेरे लिए इस बार की दिल्‍ली यात्रा दिल को खुश कर देने वाली सिद्ध हुई।