11 सितंबर के शुक्र चंद्र युति के दर्शन किया जाए या नहीं ??

11 अगस्‍त को पोस्‍ट किए गए अपने आलेख में मैने चर्चा की थी कि सिर्फ 13 अगस्‍त को ही नहीं , आने वाले दिनों में लगभग पांच महीनों तक यानि 11 सितंबर , 9 अक्‍तूबर , 2 दिसंबर , 31 दिसंबर और 29 जनवरी को भी आसमान में ऐसी स्थिति बनती रहेगी, जिसमें सर्वाधिक चमक के साथ शुक्र और सबसे छोटा चांद 9 अक्‍तूबर को दिखेगा , जो आसमान में वाकई देखने में खूबसूरत लगता है। 13 अगस्‍त के शुक्र चंद्र युति को तो हमलोग अत्‍यधिक बारिश की वजह से नहीं देख सकें , कल ही 11 सितंबर है और इस योग के फलस्‍वरूप अधिकांश जगह बारिश या कम से कम बादल की संभावना भी दिख रही है। ऐसे में कल भी इसके दर्शन मुश्किल ही लग रहे हैं।

वैसे पाठकों को कल इस युति के दर्शन करने की सलाह दी जाए या नहीं , ये समझ में नहीं आ रहा। । वैसे तो कल गणेश चतुर्थी है , देशभर में यह त्‍यौहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता हैं , खासकर महाराष्‍ट्र में तो गणेश चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी तक दस दिन गणेशोत्सव मनाया जाता है। पर मान्‍यता है कि एक बार चंद्रमा ने गणेश जी का मजाक उड़ाया था, गणेश जी ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि आज से आज के दिन जो भी तुम्हें देखेगा उसे मिथ्या कलंक लगेगा । इसलिए भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है। जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों का निर्देश है। इस दिन चांद के दर्शन करने से भगवान श्री कृष्ण को भी मणि चोरी का कलंक लगा था। और हमारे पाठकों को कोई कलंक लगे , ये तो मैं कतई नहीं चाहूंगी।



वैसे इतने बडे देश में अनेकता में भी एकता , हर क्षेत्र में व्रत मनाने का ढंग भिन्‍न भिन्‍न है। मिथिलांचल में महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और शाम को चंद्र दर्शन के बाद ही वे व्रत तोडती हैं। इस क्षेत्र में इस दिन चंद्रमा की पूजा करने का विधान है। यहां बिना कुछ अर्घ्‍य के खाली हाथ चंद्रमा का दर्शन निषिद्ध है , परे परिवार के एक एक व्‍यक्ति हाथ में कुछ न कुछ लेकर ही चंद्र का दर्शन करते हैं। माना जाता है कि चंद्रमा को देखने का बुरा प्रभाव उसकी पूजा से समाप्‍त हो जाता है। भूल चूक से देखे गए इस चंद्रमा के इस बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए मंत्र भी हैं , पर जनसामान्‍य इसे टोटकों से भी दूर करते हैं। कुछ लोग कच्चे मकानों और खपरैल वाले मकानों के जमाने में चन्द्रमा की ओर पत्थर उछालने पर मकान के कवेलुओं के टूटने से मामूली विवाद की स्थिति से चन्द्र दर्शन का ताजा कुफल समाप्त होता मानते है। 

हमारे गांव में तो इस चंद्र के दर्शन का बडा दोष माना जाता है। 'चौक चंदा का फंदा' बडा बलवान माना जाता है , और इस दिन का चांद भी अंधेरा होने से पहले ही जगमगाने लगता है। इसलिए इस दिन अंधेरा होने से पहले ही सबलोग घरों में दुबके होते हैं। मनाहीवाले काम को बच्‍चे खूब किया करते हैं , इसलिए बच्‍चों को इसकी जानकारी नहीं दी जाती है , पर कोशिश ऐसी की जाती है कि बच्‍चे शाम होने से पहले घर में आ जाएं। खेलने जाते हुए बच्‍चों को कहा जाता है 'आज घर थोडी जल्‍दी आ जाना , अंधेरा होने से काफी पहले' 
'क्‍यूं भला?' बच्‍चे पूछते हैं। 
'आज फलाने चाचाजी आनेवाले हैं'  बडों का जबाब होता है। 
बच्‍चे संतुष्‍ट हो जाते हैं। 
'सीधा नजर नीची रखते हुए आना , इधर उधर देखना मत' बडों का एक और निर्देश। 
'ऐसा क्‍यूं ??' बच्‍च्‍े की उत्‍सुकता तो बढेगी ही। 
'अरे आज हवा चल रही है बहुत , आंखों में कुछ पड जाए तो' बडों के द्वारा एक और झूठ। 
कई वर्षों तक लगातार ऐसी बातचीत से बडे बच्‍चों को तो समझ में आ जाता। पर चंद्र दर्शन के दुष्‍प्रभावों को समझते हुए और छोटे बच्‍चे धूल और आंधी से आंखों को बचाते हुए नीची निगाह किए खेल के मैदानों से सारे बच्‍चे घर वापिस आते, मेरे ख्‍याल से अंधविश्‍वास को बढावा देते और प्रचारित करते!

पर इस अनुच्‍छेद में जो कहा जा रहा है , वह अंधविश्‍वास नहीं , 25 फरवरी 2009 को भी शुक्र चंद्र युति के अवसर पर पोस्‍ट लिखने के दूसरे ही दिन सरकारी कर्मचारियों के लिए अच्‍छे महंगाई भत्‍ते की घोषणा हुई थी।  आसमान के पश्चिमी क्षितिज की ओर कोई देखे या न देखे , शुक्र और चंद्र के इस विशेष मिलन का पृथ्‍वी के जड चेतन पर प्रभाव तो पडेगा ही। वैसे तो पृथ्‍वी पर इसके अच्‍छे खासे प्रभाव से 10 , 11 और 12 सितंबर को जनसामान्‍य तन मन या धन से किसी न किसी प्रकार के खास सुखदायक या दुखदायक कार्यों में उलझे रहेंगे , पर सबसे अधिक प्रभाव सरकारी कर्मचारियों पर पड सकता है यानि उनके लिए खुशी की कोई खबर आ सकती है। दूसरा अंतरिक्ष से संबंधित कोई विशेष कार्यक्रम की संभावना बनती दिखाई दे सकती है। सफेद वस्‍तुओं पर इसका अच्‍छा प्रभाव देखा जा सकता है। यह योग वृष और तुला राशि वालों के लिए काफी अच्‍छा और मीन  राशिवालों के लिए कुछ बुरा रह सकता है।  


नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ??

how did religion influence indian society

पिछली पोस्‍ट में पूरी बात तो हो नहीं पायी , आज उसी प्रसंग को आगे बढाती हूं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले और विज्ञान की मोटी मोटी पुस्‍तके पडनेवाले मेरे पापाजी और अन्‍य भाइयों के कारण हमलोगों ने बचपन से ही धर्म पर तो नहीं , पर धार्मिक क्रियाकलापों पर जरूर ऊंगली उठाते पाया था। बडे संयुक्‍त परिवार में दादाजी और उनके सभी बच्‍चे कर्म पर विश्‍वास रखनेवाले तो दादी जी और उनकी बहूएं धर्म पर आस्‍था रखनेवाली , दोनो पार्टियों के मध्‍य पुरजोर बहस होना निश्चित था।  ज्‍योतिष के अध्‍ययन के कारण पापाजी के समक्ष कुछ रहस्‍यों का पर्दाफाश हो चुका था , इसलिए तर्क करने में वो भयभीत नहीं होते थे। जबकि दूसरे भाई विज्ञान के नियमों तक की बात तो पूरे विश्‍वास से करते , पर धार्मिक या आध्‍यात्मिक बातों के लिए उनके पास तर्क नहीं होते , थोडा भय भी होता , सो चुप्‍पी साधने की मजबूरी होती। पर पापाजी के वैज्ञानिक नजरिये से हम बच्‍चों की भी तर्क शक्ति बढती गयी।

how did religion influence indian society

मेरे पापाजी प्रकृति के सारे नियमों को ही सर्वशक्तिमान मानते हैं , जिसके हिसाब से प्रकृति में एक एक क्रिया की प्रतिक्रिया तय है। उनके अनुसार किसी भी कर्मकांड का मुख्‍य उद्देश्‍य समाज के एक एक वर्ग और प्रकृति की एक एक वस्‍तु के महत्‍व को बढाने के लिए है , जो हमारे दूरदर्शी महापुरूषों द्वारा तय किया गया है , इनका ईश्‍वर से कोई लेना देना नहीं और इससे ईश्‍वर खुश हो जाएंगे , ऐसा नहीं है। ईश्‍वर या प्राकृतिक वातावरण को अपने पक्ष में करने के लिए हमें उन गुणों को विकसित करना होगा , जिसका प्राचुर्य हमें प्रकृति की ओर से मिला है। प्रत्‍येक व्‍यक्ति अच्‍छे या बुरे दोनो प्रकार के गुणों से युक्‍त होता है , अध्‍यवसाय द्वारा अपनी अच्‍छी आदतों को विकसित करना और संयम द्वारा बुरी आदतों को समाप्‍त करना हमारा लक्ष्‍य होना चाहिए और यही आध्‍यात्‍म तक पहुंचने का रास्‍ता है। इसके लिए कर्मकांड का सहारा भी लिया जा सकता है , पर इसे भी हर युग में परिवर्तनशील होना चाहिए।

पर धर्म के मामलों में पापाजी के इतने अच्‍छे दृष्टिकोण के बावजूद भी दादी जी और मम्‍मी के कारण हमलोगों में आस्तिकता आ ही गयी और पूजा पाठ , धर्म कर्म के मामले में हम आस्‍था अवश्‍य रखने लगे। वैसे इससे पापाजी को उतनी आपत्ति नहीं होती , सामान्‍य तौर पर व्रत वगैरह में भी नहीं , पर यदि घर पर किसी की तबियत खराब हो और व्रत करना जरूरी हो , तो इतना हल्‍ला मचाते कि व्रत करनेवाली की हालत और नाजुक हो जाती। ऐसे में व्रत की परंपरा हमारे घर से तो समाप्‍त ही हो गयी। मेरे ससुराल पहुंचने पर मेरी माताजी भी कर्मकांड को लेकर अधिक गंभीर नहीं दिखी। हालांकि वो खुद तो व्रत त्‍यौहार करती रही , पर हम बहूओं के लिए कुछ भी अनिवार्य नहीं रहने दिया , हां , पंडितों के अधिकार में अभी तक उन्‍होने कोई कटौती नहीं होने दी है। धार्मिक कर्मकांडों में कम रूचि के बावजूद भी मेरे मायके या ससुराल में कोई बडी हानि या असफलता को घटित होते नहीं देखा , जिससे इस मान्‍यता को बल मिले कि पूजा पाठ नहीं करने से कोई बडा नुकसान होता है।

मायके और ससुराल .. दोनो का मिला जुला प्रभाव ऐसा बना कि धार्मिक कर्मकांडों से तो मैं मुक्‍त ही हो गयी , पर मंदिर , मस्जिद , गुरूद्वारे या गिरजाघर को देखकर सर को झुका लेना , पर्व त्‍यौहार में पूजा पाठ में सम्मिलित होना .. ये दिलचस्‍पी तो बिल्‍कुल सहज ढंग से बनी रही । जीवन में समय समय पर उपस्थित होनेवाली ऐसी विपत्ति या परिस्थिति , जहां किसी का भी वश नहीं होता , विज्ञान के विकास के बावजूद एक संयोग या दुर्योग समस्‍या को बढा या घटा सकती है। किसी बडी शक्ति को याद करते हुए मेरा सर स्‍वयमेव झुक जाया करता है, उस समय मेरे सारे वैज्ञानिक तर्क एक ओर पडे होते हैं। पालन पोषण में ईश्‍वर के प्रति आस्‍था का ही परिणाम है कि किसी असामान्‍य परिस्थिति में मेरे साथ ईश्‍वर होते हैं , जो कुछ क्षण बाद , कुछ घंटों बाद , कुछ दिनों बाद , कुछ महीनों बाद , यहां तक कि कुछ वर्षों बाद मुझे उस मुसीबत से निकाल देते हैं , ऐसा मुझे अहसास होता रहता है , जो निर्मूल भी हो सकता है। पर ईश्‍वर की आसपास उपस्थिति को महसूस करने के कारण इतना समय व्‍यतीत कर लेने में मुझे दिक्‍कत नहीं होती।

पर हमारे व्‍यक्तित्‍व में पापाजी का कहीं न कहीं प्रभाव अवश्‍य था कि मैं इसे अपनी कमजोरी मानने लगी थी। हालांकि कर्तब्‍य पथ पर हमेशा ही चलती रही , फिर भी अपनी असफलताओं को भाग्‍यवाद से जोड दिया तथा अपने बच्‍चों को हमेशा कर्म के लिए प्रेरित करती रही । जैसे थे मेरे पापाजी , वैसे ही बच्‍चों के पापाजी , बच्‍चों के पालन पोषण के क्रम में ईश्‍वर के प्रति कोई आस्‍था ही नहीं विकसित होने दी।  घर में बडे स्‍तर पर धार्मिक क्रियाकलापों की कमी के कारण पूजा पाठ , धर्म या आस्‍था से बच्‍चों का संबंध भी नहीं रहा , जिसका बाद में मुझे अफसोस हुआ। कम उम्र में ही बडे बेटे के समक्ष एक मुसीबत आयी , मुझे प्रतिदिन ईश्‍वर की रट्ट लगाते देखा , तो वह तो मानने लगा , पर छोटा तो अभी तक ईश्‍वर के अस्तित्‍व से इंकार करता है। जीवन में उतार और चढाव आना तो तय है , आस्तिक मुसीबत का समय प्रार्थना और संतोष में गुजार देते हैं , पर नास्तिकों के लिए मुसीबत का समय काटना अधिक मुश्किल होता है ।

कर्म के अनुसार या उससे अधिक सफलता से जीवन भर संयुक्‍त होने के बाद अपनी असफलता का कोई कारण नहीं समझ पाते , तब उनका दृष्टिकोण अंधविश्‍वासी हो जाता है , पापाजी के जीवन में आनेवाले सैकडों लोग ऐसे उदाहरण हैं। छोटे छोटे लोग तो साधनहीनता के कारण अंधविश्‍वास में पडे होते हैं , एक डॉक्‍टर के यहां जाने के पैसे न हो और झाडफूंक वाले से ही इलाज करा लिया तो इसमें कैसा अंधविश्‍वास ?? उससे समाज को कोई नुकसान नहीं होता। प्रकृति तो उसकी सलामती के लिए बीमारी से लड ही रही है , अधिकांश लोगों का दो चार दिनों में स्‍वस्‍थ होना तय है। पर बडे स्‍तर पर सर्वे हो , तो आपको मिलेगा कि आज जितने भी अंधविश्‍वासी हैं , वे कभी भी धार्मिक नहीं रहें , विपत्ति में पडकर धार्मिक होने का नाटक कर रहे हैं। सही भी है , आस्तिक तो अपना समय ईश्‍वर को आसपास महसूस करते हुए काट लेती हूं , भला नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ??

मेरी पहली प्राथमिकता ज्‍योतिष का विकास करने की थी !!

अभी तक आपने पढा .... दूसरे ही दिन से टी वी पर ज्‍योतिष के उस विज्ञापन की स्‍क्रॉलिंग शुरू हो गयी थी , जो मैने पिछली पोस्‍ट में लिखा है....

FOR ACCURATE TIME BOUND PREDICTION AND PROPER COUNSELLING BASED ON NEW GRAPHICAL TECHNIQUE CONTACT SANGITA PURI , PH No ******** , TIME .. 10AM to 2 PM , FEE .. 100 RS , NO SATISFACTION: NO FEE

पर नई नई पिक्‍चर देखने में व्‍यस्‍त लोगों का अधिक ध्‍यान इस ओर जाता नहीं है , यदि ध्‍यान जाता भी है तो लोगों को यह भ्रम है कि एक ज्‍योतिषी के पास हमें मुसीबत पडने पर ही जाना चाहिए। मुसीबत के वक्‍त भी बहुत दूर तक लोग स्‍वयं संभालना चाहते हैं , क्‍यूंकि एक ज्‍योतिषी को ठग मानते हुए लोग उससे संपर्क करना नहीं चाहते। यदि एक ज्‍योतिषी के पास जाने से समस्‍याएं सुलझने की बजाए उलझ जाती हों , तो उसके पास जाने का क्‍या औचित्‍य ??  पर फिर भी कुछ लोग तो समस्‍याओं के अति से गुजरते ही होते हैं , जिनके पास समस्‍या के समाधान को कोई रास्‍ता नहीं होता , उनका ध्‍यान बरबस इस ओर आकृष्‍ट हो जाता है। वैसे ही लोगों में से कुछ के फोन मेरे पास आने लगे थे ।

भले ही टोने टोटके , तंत्र मंत्र या झाडफूंक की समाज के निम्‍न स्‍तरीय लोगों और समाज में गहरी पैठ हो , पर ज्‍योतिष से हमेशा उच्‍च वर्ग की ही दिलचस्‍पी रही है। राजा , सेनापति ,मंत्री  , बडे नेता और बडे से छोटे हर स्‍तर तक के व्‍यवसायियों को बिना ज्‍योतिषी के काम शुरू करते नहीं देखा जाता। यह भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऊंची सामाजिक और आर्थिक स्थिति के होते हुए भी ये ग्रहों के प्रभाव को लेकर अंधविश्‍वास में होते हैं। पर मैने उनके मध्‍य विज्ञापन न कर बोकारो स्‍टील सिटी के सेक्‍टरों  में प्रसारित होते चैनल में विज्ञापन किया था , जहां आमतौर पर व्‍यवसायी नहीं , अच्‍छे पढे लिखे नौकरीपेशा निवास करते हैं , जो स्‍थायित्‍व के संकट से नहीं गुजरते होते हैं और जिनमें तर्क करने की पूरी शक्ति होती है।  एप्‍वाइंटमेंट लेने के बाद वे हमारे पास आते , अपना जन्‍म विवरण दे देते और चुपचाप रहते , कोई प्रश्‍न तक न करते। अपने ज्‍योतिष में विश्‍वास दिलाने की पूरी जबाबदेही मुझपर होती।

मैं तबतक एक गृहिणी के तौर पर घर के अंदर रह रही थी , एक प्रोफेशनल के तौर पर बातें करने में बिल्‍कुल अयोग्‍य। लंबे जीवनयात्रा से गुजरनेवाले अधेड उम्र के लोगों को तो उनके अच्‍छी और बुरी जीवनयात्रा के बारे में जानकारी देकर विश्‍वास में लिया जा सकता था , पर अधिकांश लोग खुद की परेशानी को लेकर मेरे पास नहीं आया करते थे। वे अपने बेटे बेटियों की समस्‍याएं , मुख्‍य तौर पर कैरियर या विवाह की समस्‍याएं लेकर आते , उन बच्‍चों की जन्‍मकुंडली के अनुसार छोटी सी जीवनयात्रा में कोई बडा उतार चढाव मुझे नहीं दिखता , जिसको बताकर मैं उन्‍हें विश्‍वास में लेती। दस पंद्रह मिनट तक पूरी शांति का माहौल बनता , पर इसके बाद मुझे कई विंदू मिल ही जाते , जिससे मैं उन्‍हें विश्‍वास में ले पाती । मैं साफ कर देती कि समय के साथ कह रही भूतकाल की बातों से यदि उन्‍हें विश्‍वास न हो , तो वे वापस जा सकते हैं , उन्‍हे फी देने की कोई जरूरत नहीं। पर छह महीने तक स्‍क्रॉलिंग चली , हर दिन एक दो लोग आते रहें , पर भूतकाल की बातें सुनकर कोई भी बिना भविष्‍य की जानकारी के नहीं लौटे। हां, इन छह महीनों में दो बार ऐसा वाकया हुआ , जानबूझकर प्‍लानिंग बनाकर दो युवा भाई बहन आए , सबकुछ पूछ भी लिया और कहा कि वे संतुष्‍ट नहीं हुए , मैने कहा कि आपने मेरा इतना समय क्‍यूं लिया , तो उन्‍होने कहा कि मुझसे अधिक उनका समय बर्वाद हुआ है।

धीरे धीरे चार महीने व्‍यतीत हो चुके थे , इस मध्‍य मैं बहुतों को प्रभावित कर चुकी थी , इसलिए उनके परिचय से भी कुछ लोग आने लगे थे। चूंकि मेरी पहली प्राथमिकता ज्‍योतिष का विकास करने की थी , पैसे कमाने की नहीं , इसलिए मैने विज्ञापन बंद कर दिया था। एक ज्‍योतिषी के पास आनेवाले तो बहुत अपेक्षा से मेरे पास आते , पर मेरे पास आने के बाद उन्‍हें मालूम होता कि ज्‍योतिषी भगवान नहीं होता। एक डॉक्‍टर , एक वकील , एक शिक्षक की तरह ही ज्‍योतिष भी कुछ सीमाओं के मध्‍य स्थित होता है , यहां सबकुछ स्‍पष्‍ट नहीं दिखाई देता और हमलोग ग्रहों की सांकेतिक स्थिति को देखकर भविष्‍यवाणियां करते हैं। इसके अलावे ग्रह के प्रभाव को कम या अधिक कर पाना तो संभव है , पर दूर कर पाना प्रकृति को वश में करना है , जो कदापि संभव नहीं , हमारे विश्‍लेषण से वे पूर्णत: संतुष्‍ट होते। पर बहुत दिनों तक मैं इस ज्ञान को न बांट सकी , क्‍यूंकि मेरे सामने अन्‍य काम भी बिखरे पडे थे , इसे जानने के लिए फिर अगली कडी ....

विज्ञान को ईश्‍वर कैसे कहा जा सकता है ??

धर्म का मतलब क्या है

पिछले चार छह दिनों से शहर के बाहर थी , बाहर होने पर ही मुझे कभी कभार टी वी देखने का मौका मिल जाया करता है। आज सुबह आते वक्‍त भी जी न्‍यूज चैनल पर एक कार्यक्रम चलता पाया , जो अति उत्‍साह में एक वैज्ञानिक स्‍टीफेंस हॉकिंस द्वारा विज्ञान को ईश्‍वर मानने के वक्‍तब्‍य पर आधारित थी। हालांकि इनसे पहले बहुत सारे वैज्ञानिकों ने एक सर्वशक्तिमान की अवधारणा की पुष्टि भी की है , पर इनका मत भिन्‍न है। चैनल पर ही दिखाया गया कि इस बात पर धार्मिक लोग भी उलझे हैं , जिनका मानना है कि कर्म कभी भी कर्ता के बिना नहीं होते और इस दुनिया में ऐसा बहुत कुछ होता है , जिसके कर्ता को नहीं देखा जा सकता , वो ही  ईश्‍वर है। प्राचीन काल से अबतक आस्तिकों , नास्तिकों के मध्‍य बहस की सीमा नहीं है , पर अंतिम निष्‍कर्ष पर नहीं आया जा सका है और आनेवाले समय में भी इसका अंत नहीं हो , जबतक विज्ञान हर एक रहस्‍य पर से पर्दा न हटा दे।

धर्म का मतलब क्या है

आज के वैज्ञानिक युग में ईश्‍वर का जो भी नाम दे दिया जाए , हमलोग इसे प्रकृति भी मान सकते हैं , पर प्राचीनकाल से ही लोगों में ईश्‍वर , अल्‍लाह या गॉड के नाम पर एक सर्वशक्तिमान को मानने और उसके क्रियाकलापों के बारे में चिंतन करने प्रवृत्ति रही है। इस सर्वशक्तिमान के रूप में सत्‍य को समझने के क्रम में हम भावावेश में आकर भले ही अंधविश्‍वासी हो जाते हों , पर तलाश तो अवश्‍य सत्‍य की हुआ करती है। पर विज्ञान भावना में नहीं बहता , कार्य और कारण के मध्‍य एक स्‍पष्‍ट संबंध को देखते हुए सत्‍य की ओर बढता है , इसलिए इस रास्‍ते में अंधविश्‍वास का विरोध है। पर ईश्‍वर या सर्वशक्तिमान साध्‍य है , तो धर्म की तरह ही विज्ञान उसे प्राप्‍त करने का एक साधन। प्रकृति के सारे नियमों को ढूंढकर ही ईश्‍वर तक पहुंचा जा सकता है , पर प्रकृति के सारे रहस्‍यों से पर्दा उठाने में विज्ञान को युगों लग जाएंगे। विज्ञान तो धर्म की तरह ही उसके क्रियाकलापों को समझने का एक साधन मात्र है , इसे ईश्‍वर कैसे कहा जा सकता है ??

ज्‍योतिष के व्‍यावहारिक पक्ष

अभी तक आपने पढा ... इस तरह घर गृहस्‍थी में उलझने के बाद अपने कैरियर की ओर मेरा ध्‍यान नहीं रह गया था। भले ही स्‍वयं की संतुष्टि के लिए मै कुछ रचनाएं लिख लिया करती थी , पर मुझे अपनी इस योग्‍यता पर इतना विश्‍वास नहीं था कि इसकी बदौलत मैं अपनी पहचान बना सकती हूं। जबकि ज्‍योतिष में पापाजी के पूरे जीवन का रिसर्च आमजन के लिए बिल्‍कुल नया और बहुत उपयोगी था , जिसपर लिखने के ज्‍योतिष के क्षेत्र में इतनी जल्‍द मैने पहचान बना ली थी। इधर पापाजी की उम्र भी बढती जा रही थी और उनके वृद्धावस्‍था में प्रवेश करते देख उनके मित्र , चेले , जो कि उनसे धार्मिक , ज्‍योतिषीय और अन्‍य प्रकार के वैचारिक सहयोग लिया करते थे , अक्‍सर उनसे पूछा करते कि वे अपने जीवनभर के अनुभवों से जुटाए गए ज्ञान को किसके पास छोडकर जाएंगे ??

आरंभ में तो मुझे ज्‍योतिष सिखलाने की पापाजी की बिल्‍कुल भी इच्‍छा नहीं थी , पर मनुष्‍य के सोंचने से होता ही क्‍या है ?? पढाई के बाद के कुछ दिन और विवाह के बाद के कुछ दिनों में ही मैने ज्‍योतिष का सामान्‍य ज्ञान प्राप्‍त कर लिया था। इसके बाद हर वक्‍त पापाजी से कुछ न कुछ प्रश्‍न करती , जबाब देने के बाद पापाजी चौंकते कि अनजाने ही एक और रहस्‍य मैने जान लिया है। 1980 के बाद पापाजी ने पत्र पत्रिकाओं में लिखना बंद कर दिया था , इसलिए ज्‍योतिष के क्षेत्र में आ रही नई पीढी पापाजी से परिचित नहीं थी , इसलिए 1992 से मैने उनके खोज को 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के नाम से पत्र पत्रिकाओं में भेजना शुरू किया। 1996 में मेरी पुस्‍तक भी छपकर आ गयी थी।

पर उस समय तक पापाजी को इतना विश्‍वास नहीं था कि अपने उत्‍तराधिकारी के तौर पर वे उनलोगों से मेरा परिचय करवाते। पर मेरे तर्क वितर्क को देखकर तथा कुछ रचनाओं को खासकर ज्‍योतिष का समयानुसार बदलाव पढने के बाद उन्‍हें मुझपर भरोसा हो गया था । फिर तो वे धीरे धीरे मुझे सबसे मिलवाना शुरू किया। लोगों से मिलने के बाद , उनके प्रश्‍नों को सुनने के बाद मुझे महसूस होने लगा कि ज्‍योतिष की मात्र सैद्धांतिक जानकारी से लोगों का कल्‍याण नहीं किया जा सकता है। इसके लिए ज्‍योतिष के व्‍यावहारिक पक्ष को मजबूत बनाए जाने की आवश्‍यकता है। महीने में एक दो व्‍यक्ति या परिवार की समस्‍या को सुनकर ज्‍योतिष को पूरा गत्‍यात्‍मक नहीं बनाया जा सकता , जैसा कि पापाजी का लक्ष्‍य है। मुझे महीने भर लोगों से मिलते जुलते रहना चाहिए। पर नए जगह में , जहां एक ज्‍योतिषी के तौर पर मुझे कोई नहीं जानता , लोगों से मिलना जुलना संभव नहीं था।

10 बजे से 1 बजे तक खाली समय में एक दिन टी वी खोलने पर मैने उसमें एक नई फिल्‍म को चलता पाया । बोकारो में उस समय कोई स्‍थानीय चैनल तो था नहीं , केबल वाले तीन घंटे किसी खास चैनल का प्रसारण रोककर उसमें नई पिक्‍चर दिखलाया करते थे , चूंकि उस वक्‍त आज की तरह घर घर सीडी या डीवीडी प्‍लेयर नहीं होते थे , इसलिए पूरी कॉलोनी के दर्शकों का इसपर ध्‍यान बना होता था। दर्शकों की भीड को देखते हुए उन्‍हें स्‍थानीय विज्ञापन मिलते , जिसकी उन तीन घंटे में स्‍क्रालिंग की जाती थी , महीनेभर पिक्‍चर के नीचे चलनेवाली स्‍क्रालिंग के लिए केबलवाले 800 रूपए चार्ज करते थे। मैने उनको फोन लगाया और अपना पहला विज्ञापन स्‍क्रॉलिंग में चलवाया , जो निम्‍न था .....

FOR ACCURATE TIME BOUND PREDICTION AND PROPER COUNSELLING BASED ON NEW GRAPHICAL TECHNIQUE CONTACT SANGITA PURI , PH No ******** , TIME .. 10AM to 2 PM , FEE .. 100 RS , NO SATISFACTION: NO FEE

दूसरे दिन से ही टी वी पर स्‍क्रालिंग शुरू हो गयी थी , पर आलेख लंबा होता जा रहा है , इसलिए इसके परिणाम की बातें अगले पोस्‍ट में  ........