मिथ्‍या भ्रम (कहानी) ... संगीता पुरी

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‘क्‍या हुआ, ट्रेन क्‍यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए पूछा। ’अरे, तुम सो गयी क्‍या ? देखती नहीं , बोकारो आ गया।‘ बोकारो का नाम सुनते ही वह चौंककर उठी। तीन दिनों तक बैठे बैठे कमर में दर्द सा हो रहा था। कब से इंतजार कर रही थी वह , अपने गांव पहुंचने का , इंतजार करते करते तुरंत ही आंख लग गयी थी। अब मंजिल काफी नजदीक आ गयी थी। उसने अपने कपडे समेटे , मोनू को संभाला और सीट पर एक नजर डालती हुई ट्रेन से उतरने के लिए क्‍यू में खडी हो गयी।


दस वर्षों बाद वह मद्रास से वापस आ रही थी। गांव आने का कोई बहाना इतने दिनों तक नहीं मिल रहा था। गांव का मकान भी इतने दिनों से सूना पडा था। अपने अपने रोजगार के सिलसिले में सब बाहर ही जम गए थे। पर इस बार चाचाजी की जिद ने उन सबके लिए गांव का रास्‍ता खोल ही दिया था। वे अपने लडके की शादी गांव से ही करेंगे। सबके पीछे वह सामानों को लेकर ट्रेन से उतर पडी। एक टैक्‍सी ली और गांव के रास्‍ते पर बढ चली।

टैक्‍सी जितनी ही तेजी से अपने मंजिल की ओर जा रही थी , उतनी ही तेजी से वह अतीत की ओर। मद्रास के महानगरीय जीवन को जीती हुई वह अबतक जिस गांव को लगभग भूल ही चली थी , वह अचानक उसकी आंखों के सामने सजीव हो उठा था। घटनाएं चलचित्र के समान चलती जा रही थी। उछलते कूदते , उधम मचाते उनके कदम .. कभी बाग बगीचे में तो कभी खेल के मैदानों में। अपना लम्‍बा चौडा आंगन भी उन्‍हें धमाचौकडी में मदद ही कर देता था।

खेलने का कोई साधन नहीं , फिर भी खेल में इतनी विविधता। जो मन में आया, वही खेल लिया। खेल के लिए कार्यक्रम बनाने में उसकी बडी भूमिका रहती। वास्‍तविक जीवन में जो भी होते देखती , खेल के स्‍थान पर उतार लेती थी। घर के कुर्सी , बेंच , खाट और चौकी को गाडी बनाकर यात्रा का आनंद लेने का खेल बच्‍चों को खूब भाता था। कोई टिकट बेचता , कोई ड्राइवर बनता , तो कोई यात्री। रूट की तो कोई चिंता ही नहीं थी , उनकी मनमौजी गाडी कहीं से कहीं पहुंच सकती थी।

तब सरकार की ओर से परिवार नियोजन का कार्यक्रम जोरों पर था। भला उनके खेल में यह कैसे शामिल न होता। कुर्सी पर डाक्‍टर , बेंच पर उसके सहायक और खाट चौकी पर लेटे हुए मरीज । चाकू की जगह चम्‍मच , पेट काटा , आपरेशन किया , फटाफट घाव ठीक , एक के बाद एक मरीज का आपरेशन। भले ही अस्‍पताल के डाक्‍टर साहब का लक्ष्‍य पूरा न हुआ हो , पर उन्‍होने तो लक्ष्‍य से अधिक काम कर डाला था।

इसी तरह गांव में एक महायज्ञ का आयोजन हुआ। यज्ञ के कार्यक्रम को एक दिन ही देख लेना उनके लिए काफी था। अपने आंगन में यज्ञ का मंडप तैयार बीच में हवन कुंड और चारो ओर परिक्रमा के लिए जगह । मुहल्‍ले के सारे बच्‍चे हाथ जोडे हवनकुंड की परिक्रमा कर रहे थे और ‘श्रीराम , जयराम , जय जय राम, जय जय विघ्‍न हरण हनुमान’ के जयघोष से आंगन गूंज रहा था। कितना स्‍वस्‍थ माहौल था , बच्‍चे भी खुश रहते थे और अभिभावक भी।

लेकिन इसी क्रम में उसे एक बच्‍चे दीपू की याद अचानक आ गयी। जब सारे बच्‍चे खेल रहे होते , वह एक किनारे खडा उनका मुंह तक रहा होता। ‘दीपू , तुम भी आ जाओ’ उसे बुलाती , तो धीरे धीरे चलकर उनके खेल में शामिल होता। पर दीपू को शामिल करके खेलना शुरू करते ही तुरंत रानी को कुछ याद आ जाता और वह दौडकर घर के एक खास कमरे में जाती। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही होता। दीपू की मम्‍मी उस कमरे में फरही बना रही होती। अपनी कला में पारंगत वह छोटे छोटे चावल को मिट्टी के बरतन में रखे गरम रेत में तल तलकर निकाल रही होती।

उसकी दिलचस्‍पी चावल के फरही में कम होती , इसलिए वह अंदर जाकर चने निकाल लाती। ’काकी, इन चनों को तल दो ना’ वह उनसे आग्रह करती। ’इतनी जल्‍दी तलने से ये कठोर हो जाएंगे और इन्‍हे खाने में तुम्‍हारे दांत टूट जाएंगे, थोडी देर सब्र करो।‘ वह चने में थोडे नमक , हल्‍दी और पानी डालकर उसे भीगने को रख देती। अब भला उसका खेल में मन लग सकता था। हर एक दो मिनट में अंदर आती और फिर निराश होकर बाहर आती , लेकिन कुछ ही देर में उसे सब्र का सोंधा नमकीन फल मिल जाता और चने के भुंजे को सारे बच्‍चे मिलकर खाते। इस तरह शायद ही कभी दीपू को उनके साथ खेलने का मौका मिल पाया हो।

टैक्‍सी अब उसके गांव के काफी करीब आ चुकी थी। रबी के फसल खेतों में लहलहा रहे थे। बहुत कुछ पहले जैसा ही दिखाई पड रहा था। शीघ्र ही गांव का ब्‍लाक , मिड्ल स्‍कूल , बस स्‍टैंड , गांव का बाजार , सब क्रम से आते और देखते ही देखते आंखो से ओझल भी होते जा रहे थे। थोडी ही देर में उसका मुहल्‍ला भी शुरू हो गया था। बडे पापा का मकान , रमेश की दुकान, हरिमंदिर , शिवमंदिर , सबको देखकर खुशी का ठिकाना न था।

पर एक स्‍थान पर अचानक तीनमंजिला इमारत को देखकर उसके तो होश उड गए। यह मकान पहले तो नहीं था। फिर उसे दीपू की याद आ गयी। इसी जगह तो दीपू का छोटा सा दो कमरों का खपरैल घर था , जिसके बाहरवाले छोटे से कमरे को ड्राइंग , डाइनिंग या किचन कुछ भी कहा जा सकता था तथा उसी प्रकार अंदरवाले को बेडरूम , ड्रेसिंग रूम या स्‍टोर। यहां पर इस मकान के बनने का अर्थ यही था कि दीपू के पापा ने अपनी जमीन किसी और को बेच दी, क्‍यूंकि वे लोग काफी गरीब थे और इतनी जल्‍दी उनकी सामर्थ्‍य तीनमंजिला मकान बनाने की नहीं हो सकती थी।

घर पहुंचने से ठीक पहले उसका मन बहुत चिंतित हो गया था। पता नहीं वे लोग अब किस हालत में होंगे । दीपू के पापा तो बेरोजगार थे , उसकी मम्‍मी ही दिनभर भूखी , प्‍यासी , अपने भूख को तीन चार कप चाय पीकर शांत करती हुई लोगों के घरों में फरही बनाती अपने परिवार की गाडी को खींच रही थी। बृहस्‍पतिवार को वे भी बैठ जाती थी , क्‍यूंकि गांव में इस दिन चूल्‍हे पर मिट्टी के बरतन चढाना अशुभ माना जाता है। कहते हैं , ऐसा करने से लक्ष्‍मी घर से दूर हो जाती है , धन संपत्ति की हानि होती है।

एक दिन बैठ जाना दीपू की मम्‍मी के लिए बडी हानि थी। कुछ दिनों तक उन्‍होने इसे झेला , पर बाद में एक रास्‍ता निकाल लिया। अब वे बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाती मिलती , जो उनके घर से सप्‍ताहभर की बिक्री के लिए काफी होता। ’काकी , तुम अपने घर में बृहस्‍पतिवार को मिट्टी के बर्तन क्‍यू चढाती हो ? ‘ वह अक्‍सर उनसे पूछती। उनके पास जबाब होता ‘ बेटे , मुझे घरवालों के पेट भरने की चिंता है , मेरे पास कौन सी धन संपत्ति है , जिसे बचाने के लिए मुझे नियम का पालन करना पडे’ तब उसका बाल मस्तिष्‍क उनकी इन बातों को समझने में असमर्थ था।

पर अभी उसका वयस्‍क वैज्ञानिक मस्तिष्‍क दुविधा में पड गया था। ’क्‍या जरूरत थी , दीपू के मम्‍मी को बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाने की , लक्ष्‍मी सदा के लिए रूठ गयी , जमीन भी बेचना पड गया , अपनी जमीन बेचने के बाद न जाने वे किस हाल में होंगी , दीपू भी न जाने कहां भटक रहा होगा’ सोंचसोंचकर उसका मन परेशान हो गया था। टैक्‍सी के रूकते ही वे लोग घर के अंदर गए , परसों ही शादी थी , लगभग सारे रिश्‍तेदार आ चुके थे , इसलिए काफी चहल पहल थी। मिलने जुलने और बातचीत के सिलसिले में तीन चार घंटे कैसे व्‍यतीत हो गए , पता भी न चला।

अब थोडी ही देर में रस्‍मों की शुरूआत होने वाली थी। चूंकि घर में रानी ही सबसे बडी लडकी थी , उसे ही गांव के सभी घरों में औरतों को रस्‍म में सम्मिलित होने के लिए न्‍योता दे आने की जबाबदेही मिली। वह दाई के साथ इस काम को करने के लिए निकली। सबों के घर तो जाने पहचाने थे , पर सारे लोगों में से कुछ आसानी से पहचान में आ रहे थे , तो कुछ को पहचानने के लिए उसके दिमाग को खासी मशक्‍कत करनी पड रही थी।

एक मकान से दूसरे मकान में घूमती हुई वह आखिर उस मकान में पहुच ही गयी, जिसने चार छह घंटे से उसे भ्रम में डाल रखा था। इस मकान के बारे में उसने दाई से पूछा तो वह भाव विभोर होकर कहने लगी ‘अरे , दीपू जैसा होनहार बेटा भगवान सबको दे। उसने व्‍यापार में काफी तरक्‍की की और शोहरत भी कमाया। उसने ही यह मकान बनवाया है। इस बीच पिताजी तो चल बसे , पर अपनी मां का यह काफी ख्‍याल रखता है। अभी तीन चार महीने पूर्व इसका ब्‍याह हुआ है।

पत्‍नी भी बहुत अच्‍छे घर से है‘ दाई उसकी प्रशंसा में अपनी धुन में कुछ कुछ बोले जा रही थी और वह आश्‍चर्यचकित उसकी बातों को सुन रही थी। हां, उसके वैज्ञानिक मस्तिष्‍क को चुनौती देनेवाला एक मिथ्‍याभ्रम टूटकर जरूर चकनाचूर हो चुका था।

आदर्शवादी सास की बहू ...


आज प्रस्‍तुत है .. मेरी छोटी बहन श्रीमती शालिनी खन्‍ना की एक रचना 'आदर्शवादी सास की बहू'.. पहले यह नुक्‍कड पर भी पोस्‍ट हो चुकी है ..


टी वी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, स्‍कूटर,
क्‍या करूंगी ये सब लेकर,
बस एक अच्‍छी सी बहू चाहिए
और भला मुझे क्‍या चाहिए।
ऐसी बहू जो हर वक्‍त करे बडों की सेवा,
और न चाहत रखे मिले किसी से मेवा।‘
बोली मां संपन्‍न घराने में बेटे का विवाह तय कर,
और फिर चल दी,
मित्रमंडली में अपनी आदर्शवादिता की छाप छोडकर।

पर दिल में काफी इच्‍छाएं थी,
काफी अरमान थे,
हर समय सपने में बहू के दहेज में मिले
ढेर सारे सामान थे।
और जब बहू घर आयी,
उनकी खुशी का ठिकाना न था,
हर चीज साथ लेकर आयी थी,
उसके पास कौन सा खजाना न था।
हर तरफ दहेज का सामान फैला पडा था,
पर सास का ध्‍यान कहीं और अडा था।

बहू ने बगल में जो पोटली दबा रखी थी ,
इस कारण उनकी निगाह
इधर उधर नहीं हो पा रही थी।
न जाने क्‍या हो इसमें ,
सोंच सोंच कर परेशान थी,
बहू ने अब तक बताया नहीं ,
यह सोंचकर हैरान थी।
हो सकता है सुंदर चंद्रहार,
जो हो मां का विशेष उप‍हार,
या हो कोई पर्सनल चीज,
या फिर किसी महंगी कार के एडवांस पैसे ,
शायद मां ने दिए हो इसे।
पर खुद से अलग नहीं करती,
इसमें अंटके हो प्राण जैसे।

काफी देर तक सास अपना दिमाग दौडाती रही,
और मन ही मन बडबडाती रही।
कैसी बहू है ,
सास से भी घुल मिल नहीं पा रही,
अपनी पोटली थमाकर बाथरूम तक नहीं जा रही।
अब हो रही थी बर्दाश्‍त से बाहर,
जी चाहता हूं दे दूं इसे जहर
समझ में नहीं आता मैं क्‍या करूं ?
कैसे इस दुल्‍हन के अंदर अपना प्‍यार भरूं।
बहुत हिम्‍मत कर करीब जाकर प्‍यार से बोली,
बहू से बहुत मीठे स्‍वर में अपनी बात खोली।
'इसमें क्‍या है' , मेरी राजदुलारी,
इसे दबाए दबाए तो थक जाओगी प्‍यारी।

बहू भी काफी शांत एवं गंभीर स्‍वर में बोली,
आदर्शवादी सास के समक्ष पहली बार अपना मुंह खोली।
’सुना है ससुरालवाले दहेज के लिए सताते हैं,
ये लाओ, वो लाओ मायके से ये हमेशा बताते हैं।
जो मेरे साथ ऐसा बर्ताव करने की कोशिश करेगा,
वही मुझसे यह खास सबक लेगा।
उसके सामने मैं अपनी यह पोटली खोलूंगी,
इसमें रखे मूंग को उसकी छाती पर दलूंगी।‘


सिक्‍के का दूसरा पहलू

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एक झूठ के बाद पढें मेरी अगली कहानी ... सिक्‍के का दूसरा पहलू


आज इस व्‍हील चेयर पर बैठे हुए मुझे एक महीने हो गए थे। अपने पति से दूर बच्‍चों के सान्निध्‍य में कोई असहाय इतना सुखी हो सकता है , यह मेरी कल्‍पना से परे था। बच्‍चों ने सुबह से रात्रि तक मेरी हर जरूरत पूरी की थी। मैं चाहती थी कि थोडी देर और सो जाऊं , ताकि बच्‍चे कुछ देर आराम कर सके , पर नींद क्‍या दुखी लोगों का साथ दे सकती है ? वह तो सुबह के चार बजते ही मुझे छोडकर चल देती। नींद के बाद बिछोने में पडे रहना मेरी आदत न थी और आहट न होने देने की कोशिश में धीरे धीरे गुसलखाने की ओर बढती , पर व्‍हील चेयर की थोडी भी आहट बच्‍चों के कान में पड ही जाती और वे मां की सेवा की खातिर तेजी से दौडे आते , और मुझे स्‍वयं उठ जाने के लिए फिर मीठी सी झिडकी मिलती।


स्‍कूल जाने से पहले वे मेरे सारे काम समाप्‍त कर और मेरी सारी जरूरतों की चीजों को सहेजकर जाते , ताकि जरूरत पडने पर वह वस्‍तु उचित स्‍थान पर मिल जाए। स्‍कूल से आकर भी बच्‍चे मेरी सारी समस्‍याओं को सुनते और समाधान करते, रसोई के सारे कार्य और घर गृहस्‍थी के कार्य तो उनके हिस्‍से में थे ही। एक महीने से मैं अपनी लाचार हालतमें दोनो बच्‍चों के क्रियाकलापों को ही देख रही थी। क्‍यूंकि मेरे दोनो पैरों में प्‍लास्‍टर था और मैं उठने बैठने से भी लाचार हो गयी थी। ये तो व्‍हील चेयर की ही मेहरबानी थी कि घर के सभी हिस्‍सों में घूम घूमकर अपने शरीर के साथ ही साथ मन और दिमाग को भी चलायमान करने में मैं समर्थ हो पा रही थी , अन्‍यथा मेरी और भी बुरी हालत होती।

आज सिद्धांत के आने की प्रतीक्षा में बैठी बरामदे में बैठी जाडे के मीठी धूप का आनंद ले रही हूं। दोनो बच्‍चे ऋचा और ऋषभ पापा को लेने स्‍टेशन गए हुए हैं। दिल्‍ली से आनेवाली गाडी तो तीन बजे उसके शहर पहुंच जाती है , इस हिसाब से साढे तीन बजे उसे घर पहुंच जाना चाहिए था , पर अभी तो ढाई ही बजे हैं , इस तरह पूरे एक घंटे देर है , फिर गाडी का भी एकाध घंटे देर आना कोई नई बात नहीं , इस तरह पूरे दो घंटे का इंतजार करना पड सकता है मुझे। दो घंटे की देरी सोंचकर ही मेरे चेहरे पर उदासी छा गयी। इतना इंतजार करना व्‍हील चेयर पर बैठे किसी भी व्‍यक्ति के लिए बहुत मुश्किल है। यदि मैं अच्‍छी हालत में होती , तो रसोई में जाकर सिद्धांत का पसंदीदा व्‍यंजन ही बना लेती। वैसे वे खाने पीने के इतने शौकीन भी नहीं कि उनकी याद में थोडा समय रसोई में भी काटा जा सके।


कुछ सोंचकर मैं अंदर गयी और बुनाई का सामान लेकर बाहर आयी। इस एक महीने में बुनाई ही मेरी सच्‍ची सहेली बन गयी है। जब भी मन नहीं लग रहा होता है , बुनाई हाथ में आ जाती है। इस एक महीने में मैंने कितने ही स्‍वेटर बना डाले हैं। बेटे के लिए बन रहे स्‍वेटर में मेरे हाथ तेजी से चलने लगे। मुझे याद आया, सिद्धांत का ऐसा इंतजार मैंने कभी नहीं किया है। अबतक उनके घर में पहुंचने मात्र की खबर से ही मेरी स्‍वतंत्रता में खलल दिखाई पडती थी, चाहे मैं अपने मायके में होऊं , ससुराल में या फिर अपने घर पर।


ऐसी बात नहीं थी कि उनमें कोई अवगुण था या उनके चरित्र में कोई गडबडी थी , बात बस इतनी सी थी कि अभी तक उनके विचारों से मेरे विचारों का तालमेल नहीं हो सका था। सच तो यह है कि मैं ही अभी तक उन्‍हें कोसती आ रही थी, उन्‍हें जाहिल, गंवार या नीचले स्‍तर का समझती आ रही थी। पता नहीं , किस ढंग से माता पिता ने उनका पालन पोषण किया था , न खाने पीने का ढंग , न ही पहनने ओढने का सलीका , न घूमने फिरने या पिक्‍चर देखने की चाहत और न ही पत्‍नी या बच्‍चों को कोई उपहार देने का शौक। बात बात पर पैसे के महत्‍व को समझाता , आधुनिकता से संबंधित हर खर्च को फिजूलखर्ची समझता और हर प्रकार के खाते में पैसे जमा करने की चिंता में मेरे हर खर्च पर टोकाटोकी करनेकी आदत .. ऐसे पति से मुझे सामंजस्‍य बनाना होगा , मैंने सपने में भी नहीं सोंचा था।

हर कुंवारे दिल की तरह मेरे भी कुछ सपने थे। कोई राजकुमार मेरा पति होगा , जो मुझे जमीन पर पांव भी न धरने देगा, मेरे नाज नखरों को बर्दाश्‍त करेगा। मुझे नई नई जगहों पर घुमाएगा, फिराएगा, मैं नए स्‍टाइल के रंग बिरंगे कपडों और गहनों से सुसज्जित रहा करूंगी। मैने कुछ गलत भी तो नहीं सोंचा था , बचपन से ही पिताजी को मां की हर इच्‍छा पूरी करते पाया था। मां के मुंह से कुछ निकलने भर की देर होती , चाहे वो कपडे गहने हों, सौंदर्य प्रसाधन हों या घर गृहस्‍थी का समान, पापा को उसे खरीदने में थोडी भी देर नहीं होती। यहां तक कि मम्‍मी की हर इच्‍छा पापा इशारे सेसमझ जाते। बाजार में आयी नई से नई चीज भी हमारे घर में मौजूद रहती। पापा सिर्फ मम्‍मी की ही नहीं, हम दोनो भाई बहनों की भी इच्‍छा पूरी करते। शहर के स्‍तरीय स्‍कूल में हमारी शिक्षा पूरी हो रही थी और मम्‍मी पापा के सपने हमारे लिए बहुत ऊंचे थे। बेटा अफसर बनेगा और बेटी राज करेगी। पर्व, त्‍यौहार और छुट्टियों में हम सभी घूमते फिरते , बाजार करते , पिक्‍चर देखते और होटल से खाना खाकर ही घर लौटते थे। मम्‍मी के भाग्‍य से पडोसिनों को ईर्ष्‍या होती थी।

पापा की कमाई भी बहुत अधिक थी , ऐसी बात नहीं थी। वे भी एक बडे व्‍यवसायी नहीं , ईमानदार सरकारी अफसर ही थे। पर नौकरी करनेवालों को तनख्‍वाह तो इतनी मिल ही जाती है कि नियोजित परिवार आराम से गुजर बसर कर सके। परिवार के किन्‍हीं अन्‍य लोगों का दायित्‍व पापा पर नहीं था। दादाजी का पेंशन दादा जी और दादी जी के गांव में गुजारे के लिए काफी था। हमारे लिए गांव से भी आवश्‍यकता के बहुत सामान आ जाया करते थे। पापा और मम्‍मी दोनो ही खाओ पीओ और मौज करो’ के सिद्धांत पर विश्‍वास रखते थे। उनके विचारों का पूरा प्रभाव हम दोनों भाई बहनों पर भी पडा थी। हम दोनो खाने पीने के शौकीन नित्‍य नए नए व्‍यंजनों की फरमाइश करते और जो घर पर नहीं बन पाता , उसे खाने होटल में चल दिया करते थे। इसी प्रकार हम पहनने ओढने के लिए नए डिजाइन और फैशन के कपडों का चुनाव करते और मम्‍मी पापा उन कपडों को खरीदते हुए उनके चुनाव की प्रशंसा करते। छुट्टियों में भी हम लोग बडे उत्‍साह से घुमने फिरने का कार्यक्रम बनाते और इसमें भी उनका पूरा सहयोग मिलता। ऐसी हालत में हमलोग पढाई में कब सामान्‍य से अतिसामान्‍य होते चले गए , इसका किसी को ध्‍यान भी नहीं रहा , विशेष की तो महत्‍वाकांक्षा भी नहीं थी। सिर्फ अच्‍छे स्‍कूल में एडमिशन करवाकर और समय पर फी देकर मम्‍मी पापा अपने कर्तब्‍यों की इतिश्री समझते रहे।

जैसे ही मैंने बी ए की परीक्षा दी , मेरे विवाह की चर्चा जोर शोर से शुरू हुई। शीघ्र ही एक घर वर पापा को पसंद आ गया और मेरी शादी पक्‍की हो गयी। पढाई लिखाई के क्षेत्र में आगे कुछ कर पाने की क्षमता तो मुझमें थी नहीं, शीघ्र ही विवाह के लिए तैयार हो गयी और एक माह के अंदर दुल्‍हन बनकर ससुराल आ गयी। सिद्धांत भी उसी की तरह अपने घर का इकलौता था , विवाह में दोनो परिवार का उत्‍साह देखने लायक था। विवाह के कुछ दिनों बाद जब रिश्‍तेदारों की भीड छंट गयी , तो मैं सिद्धांत के साथ शहर आ गयी थी। पिताजी ने घर गृहस्‍थी बसाने के लिए जो भी उपहार दिए थे , सब मेरे साथ ही आ गए थे। पापा ने मेरी शादी में पूरा पी एफ खाली कर दिया गया था। जिस बेटी का पालन पोषण इतने नखरों के साथ किया गया था , उसके कपडे, गहने और गृहस्‍थी का अन्‍य सामान भी तो आधुनिकतम होने ही चाहिए। अपनी बन्‍नों की शादी में उन्‍होने कोई कसर नहीं छोडी थी। आखिर लडका भी तो उन्‍हें सर्वगुणसंपन्‍न मिला था। मम्‍मी और पापाजी की नजरों में पढा लिखा , सुंदर, शिष्‍ट , शालीन , चरित्रवान ,, सरकारी नौकरी करता हुआ अपने परिवार का इकलौता लडका था सिद्धांत।

विवाह के बाद बाजार से नई नई चीजें लाकर अपनी घर गृहस्‍थी को संवारने में मुझे बडा आनंद आता , पर शाम को घर आते ही सिद्धांत उन चीजों की प्रशंसा न कर व्‍यर्थ पैसे न बर्वाद करने की सलाह देते नजर आते। इससे कई दिनों तक मेरा मन उखडा रहता , पर आदतन फिर उत्‍साहित होकर बाजार करती और फिर नसीहत शुरू। कितनी कठिनाई से मैंने अपनी इस आदत पर काबू पाया था। उसके बाद तो बाजार में दिखाई पडनेवाली हर खूबसूरत वस्‍तु को देखकर सिर्फ मन मसोसकर ही रह जाती हूं। किसी पडोसन के घर नई टी वी , नए डिजाइन का फ्रिज या वाशिंग मशीन आया है , फोन लग गया है ... इस तरह की किसी भी चर्चा से सिद्धांत को सख्‍त नफरत है। इसमें से कुछ दिखावे की चीज है और कुछ शरीर को आलसी बनाने वाली। कभी कभी तो मैं रो ही पडती थी , पता नहीं लाड प्‍यार से पालन पोषण का यह चिन्‍ह था या मेरी उथली मानसिकता का।

पर दो वर्षों के अंतराल में मेरे दोनो बच्‍चों ने जन्‍म लेकर मेरी गोद खुशियों से भर दी थी। मेरे तो हर्ष का ठिकाना ही न था , सिद्धांत भी बडे उत्‍साहित थे। गर्भवती हालत में तो उन्‍होने मेरी देखभाल अच्‍छे से की ही , छोटे बच्‍चों की देख रेख में भी उन्‍होने मेरा पूरा हाथ बंटाया। इस कारण बच्‍चे तो खूबसूरत और तंदुरूस्‍त हुए ही , मेरा अपना स्‍वास्‍थ्‍य भी काफी अच्‍छा रहा। पर फिर भी वे मेरे दिल से अपने लिए कडुवाहट न निकाल सके। बच्‍चें की पढाई लिखाई पर भी पूरा ध्‍यान सिद्धांत ने ही दिया। शहर के सबसे अच्‍छे स्‍कूल में बच्‍चों का दाखिला और हर वर्ष कक्षा में अच्‍छे स्‍थान लाने का श्रेय सिद्धांत को ही जाता है। ऑफिस से आने के बाद दो घंटे बच्‍चों के साथ बैठकर उनकी समस्‍या सुलझाना वे नहीं भूलते। इसी कारण शाम को कहीं घूमने फिरने का भी कोई कार्यक्रम नहीं बन पाता। प्रारंभ में कभी कोई दंपत्ति घूमने आ भी जाते थे , पर धीरे धीरे उन्‍होने ये सिलसिला बंद ही कर दिया है। मनोरंजन , फिल्‍म , पर्यटन ... ये सब इनके लिए महत्‍वहीन है। बच्‍चों पर भी पिता के विचारों का पूरा प्रभाव है , यह सोंचकर मेरा क्षुब्‍ध और आशंकित रहा करना जायज भी था।

मुझे याद आया , एक शाम बच्‍चों ने जब नाश्‍ता मांगा था , मैंने फटाफट एक व्‍यंजन बनाया था। बच्‍चे खा ही रहे थे कि ये भी पहुंच गए थे। इनका हिस्‍सा भी निकालकर रख दिया था। बच्‍चों ने इतने चाव से नाश्‍ता किया कि मैं खुश ही हो गयी थी , मैने उनकी ओर भी प्‍लेट बढा दिया था और खुद भी खाने बैठ गयी थी। खाते हुए भी सिद्धांत की मुखमुद्रा गंभीर बनी रही , तो प्रशंसा सुनने की इच्‍छा से मैं पूछ बैठी .. ‘नाश्‍ता कैसा है ?’उन्‍होने उदासीनता पूर्वक जबाब दिया, ‘अच्‍छा है , पर बच्‍चों को ऐसी तली भूनी चीजें मत खिलाओ। उन्‍हें दूध में बनी या उबली चीजें ही खिलाया करो। इनका स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहेगा।‘ यह सुनकर मुझपर तो मानो वज्रपात ही हो गया था। जरूर इनकी कंजूसी की भावना ने ही ऐसा जबाब दिया है , मुझे याद आया , जब यह व्‍यंजन बनाना मैंने अपनी सहेली के यहां सीखा था , दूसरे ही दिन घर में इसे बनाने की इच्‍छा प्रकट की थी , मां ने अनुमति भी दे दी थी , पहली ही बार यह इतना स्‍वादिष्‍ट बना था , परिवार में सबने एक साथ बैठकर इस व्‍यंजन का मजा लिया था और यहां इसी व्‍यंजन को बनाने पर उन्‍होने प्रशंसा में एक शब्‍द भी नहीं कहा। उसके बाद मैंने कोई विशेष व्‍यंजन बनाना तक छोड दिया था।

मैंने फिर से घडी पर नजर डाला , साढे तीन बज गए थे। अभी तक उन लोगों के नहीं पहुंचने का अर्थ यह था कि गाडी थोडी लेट ही होगी। उस दिन मैं कितनी खुश थी , जब सिद्धांत ने उसे बताया था कि वह एक महीने के लिए ट्रेनिंग पर बाहर जा रहा है। मैंने सोंचा था , कुछ दिन तो अपने ढंग से जीने को मिलेंगे। सुबह 8 बजे उन्‍हें रवाना होना था , खुशी खुशी उनके जाने की तैयारी में लग गयी। कुछ सूखे नाश्‍ते साथ में पैक भी कर दिए थे और बढिया खाना खिलाकर उन्‍हें विदा किया था। कभी कभार तो ऐसा मौका मिलता है , वैसे तो घर के एक एक काम में इनकी निगाह रहती है ,हर बात में टोकाटोकी की आदत। आज रविवार था , बच्‍चे अपने कमरे में पढ रहे थे। उन्‍हें स्‍टेशन से छोडकर आयी तो घर में बिल्‍कुल शांति थी। एक महीने मैं अपने ढंग से घर चलाऊंगी , रसोई में जाकर सारे डब्‍बों को चेक किया , समाप्‍त हुए सामानों की लिस्‍ट तैयार की , पूरे महीने का मीनू तैयार किया , घूमने फिरने का कार्यक्रम बनाया , आज मेरा उत्‍साह देखते ही बनता था।

इस तरह के मौकों को मैं कभी भी बर्वाद नहीं करती थी। मेरे जीवन में पहली बार ऐसा मौका विवाह से पहले ही आया था। पंद्रह दिनों के लिए मममी और पापा हम दोनो भाई बहनों को छोडकर बाहर चले गए थे , हमारी परीक्षा का समय था , इसलिए छोडना उनकी मजबूरी थी। पढने की चिंता तो मम्‍मी और पापा को थी , हमने तो पुस्‍तकों को हाथ भी नहीं लगाया। कॉलेज की क्‍लासेज एटेंड करने के अलावे सारा दिन टी वी पर प्रोग्राम या फिल्‍में देखतें , शहर के मशहूर जगहों पर घुमते फिरते और कभी होटल तो कभी घर पर ही बनाकर नए नए व्‍यंजनों का आनंद लेते। हम दोनों ने सारे राशन और पैसे पंद्रह दिनों में ही खत्‍म कर दिए थे। फिर कभी कभी ऐसा मौका जीवन में आता रहा। सुखद कल्‍पना में खोयी, काम में व्‍यस्‍त कपडे लेकर गुसलखाने में जाने के लिए आंगन की सीढियां उतर ही रही थी कि मेरा पांव फिसल गया और मैं विचित्र ढंग से गिर पडी।



चीख सुनकर दोनो बच्‍चे दौडे हुए आए , गाडी मंगवाई और मुझे लेकर अस्‍पताल पहुंचे। दोनो पैरों में फैक्‍चर होने के कारण प्‍लास्‍टर के अलावे कोई उपाय न था। कई दिनों तक अस्‍पताल में रहने के बाद ही मैं वापस घर आयी। मैं तो भावना शून्‍य हो गयी थी। इस दौरान बच्‍चों से कई बार पापा को बुलाने को कहा , पर बच्‍चे पापा की ट्रेनिंग में कोई खलल नहीं डालना चाहते थे। उन्‍होने अपनी पढाई के साथ साथ घर की अन्‍य व्‍यवस्‍था किस प्रकार की , कम से कम मेरी समझ के तो परे था। 17 वर्ष की बेटी और 15 वर्ष के बेटे के क्रियाकलापों से तो मैं दंग ही रह गयी थी। मम्‍मी पापा जब हमें छोडकर गए थे तो मेरी उम्र 21 वर्ष और भैया की 19 वर्ष की थी , पर हममें कितना बचपना था और इन दोनो बच्‍चों का बडप्‍पन , दायित्‍व का बोध .. निश्‍चय ही सिद्धांत के लालन पालन के ढंग का परिणाम था। पहले की बात होती , तो मैं इस बात से कुढ ही जाती , पर इन एक महीने में मुझे पति की हर सीख का अर्थ समझ में आ गया था।

पति के व्‍यवहार से जब भी मैं क्षुब्‍ध होती , मन का बोझ हल्‍का करने के लिए अलका के पास पहुंच जाया करती थी। वह मेरी बचपन की एकमात्र सहेली थी , जो हमारे ही शहर में रहती थी , इस कारण उससे अभी तक मेरा संपर्क बना हुआ था। उम्र में एक होने के बावजूद वह विचारों से परिपक्‍व थी और हमेशा सही राय दिया करती थी। सिद्धांत की सारी शिकायतें सुनने के बाद भी वह स्थि‍रता से एक ही जबाब देती ... ‘शालू , तुम सिक्‍के के एक ही पहलू को देखा करती हो, जब तुम्‍हारे पति में कोई कमजोरी नहीं, तो व्‍यर्थ परेशान
रहती हो। अपने परिवार के लिए समर्पित पति पर व्‍यर्थ का दोषारोपण करती हो। अगर वो पैसे जमा करता है , तो तुम्‍ही लोगों के लिए न। जिस दिन तुम्‍हें सिक्‍के का दूसरा पहलू दिखाई पडेगा, तुम्‍हारे जीवन में सुख ही सुख होगा।‘ पर उस समय मेरी समझ में अलका की कोई बात नहीं आ सकी थी। भला तिल तिल कर मरने के बाद भी सुख नसीब होता है क्‍या ? तब मुझे क्‍या पता था कि सिक्‍के के दूसरे पहलू के दर्शन के लिए उनकी अनुपस्थिति में इतनी विषम परिस्थितियां उपस्थित हो जाएंगी।

अचानक ऑटो की आवाज सुनकर मेरी तंद्रा भंग हुई। तीनो ऑटो से उतरकर तेजी से मेरी ओर बढे। सिद्धांत को बच्‍चों से ही सारी बाते मालूम हो चुकी थी, सहानुभूति जताते हुए बोले .. ‘इतनी बडी बात हो गयी और तुमलोगों ने मुझे खबर भी नहीं की।‘ ’बच्‍चों ने मेरी बात नहीं मानी, मैने उन्‍हें आपको खबर करने को कहा था।‘ मैने शांत होकर कहा। ’बच्‍चे तुम्‍हारी बात कहां से मानेंगे, कभी मैने मानने ही नहीं दिया।‘ बरामदे में पडी कुर्सी पर बैठते हुए उन्‍होने बच्‍चों की ओर देखा। ’अच्‍छा किया , जो आपने उन्‍हें मेरी बात मानने नहीं दी , मेरी बात मानकर बच्‍चे बर्वाद ही हो जाते। मैने सोंचा भी नहीं था कि आपके पालन पोषण का ढंग इन्‍हें इतना परिपक्‍व बना देगा। इनके एक महीने के क्रियाकलाप से न सिर्फ मैं , वरन् मुझे देखने के लिए यहां आने जाने वाले हर व्‍यक्ति प्रभावित हुए है। इन्‍होने मुझे कोई दबाब न देते हुए मेरे इलाज से लेकर घर गृहस्‍थी तक का काम कुशलता पूर्वक संभाला है, इसका श्रेय सिर्फ आपको जाता है, पर मैने आपको हमेशा गलत समझा, इसका मुझे अफसोस है‘ मेरा स्‍वर भर्रा गया। ’अब बस भी करो मम्‍मी, सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।‘ मेरे द्वारा अपनी गल्‍ती स्‍वीकार किए जाने से बेटी ऋचा आज बहुत खुश थी। ‘उसे तो पाया कहते हैं’ दीदी की हर बात की टांग खींचने वाले ऋषभ ने शैतानी से कहा। और फिर तीनो हंस पडे। उन तीनों की हंसी में आज पहली बार मैं भी शामिल हो गयी।

आप सबों को गणतंत्र दिवस की बहुत बधाई और शुभकामनाएं ....



Republic Day scraps and greetings for orkut

एक झूठ ( कहानी ) ..... संगीता पुरी

hamari kahani

जब ब्‍लॉग जगत में आयी थी तो मैने सिर्फ 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' नाम का अपना ब्‍लॉग बनाया था और उसमें  ज्‍योतिषीय लेख ही  पोस्‍ट किया करती थी। डायरी में कुछ पुरानी कहानियां लिखी पडी थी , ज्‍योतिषीय ब्‍लॉग में उसे पोस्‍ट करना अच्‍छा नहीं लगा। एक दिन साहित्‍य शिल्‍पी पर निगाह पडी तो उन्‍हें ही अपनी सारी कहानियां प्रकाशित होने के लिए भेजती गयी। 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' बनाने के बाद कई बार इच्‍छा हुई कि मैं अपनी कहानियों को इसमें पोस्‍ट कर दूं , पर किसी न किसी कारणवश टालती रही। आज मेरे जीवन की पहली कहानी ' एक झूठ' आप सबों के समक्ष प्रस्‍तुत है .....


अनेक प्रकार की चिन्ताओं में डूबी, मन के उथल पुथल को शांत करने की असफल चेष्टा में वह उस रास्ते में चलती ही जा रही थी, जो उसके लिए नितांत अपरिचित था। इस रास्ते में चलते लोग, रास्ते के दोनो ओर बनी गगन चुंबी इमारतें , यत्र तत्र दिखाई देते पुराने घने ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, अपरिमित रोशनी देते स्ट्रीट लाइट के बडे बडे खम्भे सभी अपरिचित होते हुए भी उसके कदमों को रोकने में असमर्थ थे। यूं तो वह इस शहर में पहले भी आ चुकी थी, पर वह इस शहर का कौन सा हिस्सा था , उसे बिल्कुल भी याद न था। शीत ऋतु की इस प्यारी सी गोधूलि बेला का रूप देखकर वह तो दंग ही रह गयी थी। इस बेला में गाँव में जहां सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा रहता है , मनुष्य तो मनुष्य पशुपक्षी और अन्य जीव जंतु भी अपने अपने घर में दुबके पडे होते हैं , यहां दीपावली की सी रौनक नजर आ रही थी। 

रोशनी की ओर जैसे ही उसके कदम बढे , उसने अपने आपको एक खूबसूरत सजे धजे बाजार में पाया। बाजार में फैला प्रकाश इस बेला मे भी लोगों को काम करने का संदेश दे रहा था। हर ओर ग्राहको की भीड थी। कई राशन खरीद रहे थे , तो कई सब्जियां , कई बरतन तो कई खिलौने , कई कपडे तो कई गहनें। कुछ औरतें सौंदर्य प्रसाधन खरीदनें में व्यस्त थी। लेकिन इस भीड भरे वातावरण में उसे सिर्फ अपनी ही चिंता थी। वह करे तो करे क्या? जाए तो जाए कहां? कुछ न सोच पाने के बावजूद वह चलती ही जा रही थी। उसके कदम एक पल को भी रूके न थे। उसने अनुमान किया, मेले से बस स्टैंड और बस स्टैंड से इस बाजार तक आने में उसने चार पांच किमी की दूरी तय कर ली थी। उसके कदम बोझिल हो गए थे, पर एक आध घंटे विश्राम के लिए वह कोई भी जगह निश्चित नहीं कर पा रही थी। ऐसी वैसी जगह बैठ जाए, तो लोगों की संदेहात्मक दृष्टि का सामना करना पड सकता है। इसी से बचने के लिए वह चेहरे पर भय की भी रेखा आने नहीं देना चाहती थी, पर परेशानी के भाव चेहरे पर बार बार उपस्थि‍त होकर उसके आत्म‍विश्वास को कम करने का पूरा प्रयास कर रहे थे। 

अत्यधिक जिद का क्या नतीजा होता है, यह आज ही उसने जाना था। बचपन से अभी तक माता पिता और अन्ये परिवार जनों द्वारा मिलनेवाला लाड-प्यार इसे इस हद तक जिददी बना देगा, किसी ने सोचा भी न था। मनमौजी बच्चे भी समय के साथ साथ सुधर ही जाते हैं , ऐसी ही सोच के कारण माता पिता ने उसे फटकारा भी न था। यही कारण है कि उसकी जिद की प्रवृत्ति बढती ही जा रही थी। उसे याद है, उसके माता पिता ने कितनी ही बार उसे समझाया था ‘ बेटे , तुम लडकी हो। हमारा समाज लडके और लडकियों को भेदभाव वाली नजर से देखता है। तुम अपनी आदतें सुधार लो। यह जिदद करने की तुम्हारी आदत अच्छी नहीं।‘ किन्तु उसके दिमाग में तो बचपन से बैठायी गयी बातें ही गूंजती रहती थी ‘तुम मेरे लिए बेटा से कम नहीं हो’ पिताजी बचपन में ये बातें गर्व से कहा करते, जब वह लडकियों की तरह गुडियों और घरौंदो से न खेलकर लडको की तरह ही बंदूको एवं मशीनरी सामग्रियों को तोडकर खेला करती थी। उस समय तो पिताजी उसकी पीठ थपथपाकर कहा करते थे ‘ यह हमारा नाम रोशन करेगी’ पिताजी की इसी शाबाशी के कारण ही तो उसने अपने को कभी लडकी समझा ही नहीं। वह बडे होने के बाद भी लडको की तरह ही खेल में व्यस्त रहती।

उसके साथ पिताजी के इस व्यवहार का कारण भी स्पष्ट था। पिताजी और माँ के विवाह के तुरंत बाद ही माँ के गर्भ में आए उसे तीन माह भी नहीं हुए थे कि माँ की तबियत असामान्य हो गयी थी। बहुत मुश्किल से दवाइयों, टानिको, फल मेवों और छह महीने के उचित देखभाल के बाद ही मां की जान बची थी और बडे आपरेशन से ही उसका जन्म हो पाया था। जन्म के बाद भी कई तरह की उलझनें उपस्थित हो गयी थी, जिसके कारण डाक्टर ने दूसरा बच्चा न होने के लिए मां और पिताजी को सख्त हिदायत दे दी थी। उसके जन्म के पांच छ: महीनें बाद ही मां सामान्य हो सकी थी। उस समय तक पिताजी ने उसकी देख रेख में कोई कसर नहीं छोडी थी। यूं तो उसके लिए बाई की भी व्यवस्था की गयी थी पर अपने को संतुष्ट करने के लिए पिताजी बहुत से काम खुद ही किया करते थे। इसके लिए उन्हें आफिस से भी इतनी छुटिटयां लेनी पडी थी कि उनकी नौकरी पर भी संकट आ गया था, पर शीघ्र ही न सिर्फ नौकरी ही बची, वरन बहुत जल्द प्रोमोशन के साथ अपने गांव में ही स्थानांतरण भी हो गया। इस दैवी कृपा का सारा श्रेय उसे ही दिया गया और एक वर्ष तक इतने कष्ट देने के बावजूद उसे ’लक्ष्मी’ संबोधन से संयुक्त किया गया। लेकिन पुत्र न हो पाने की कसक ने भरतीय मानसिकता से संयुक्त मां पिताजी को उसे बेटे की तरह पालने को मजबूर कर दिया और वह बेटी होते हुए भी बेटा बन गयी। 

लेकिन गाँव के माहौल में जहां लडकियाँ थोडी बडी होने के बाद ही घरेलू बनकर कामकाज करना आरंभ कर देतीं हैं, पढाई के साथ साथ अपने को सिलाई, बुनाई, कढाई, पेण्टिंग्स एवं अन्यं स्त्रियोचित कलाओं में दक्ष बनाने की चेष्टा में लग जाती हैं, छठी कक्षा में पहुंचने और 10 वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी कन्या सुलभ चेष्टाओं को उसमें न विकसित होता देख उसकी मां परेशान थी। जब वह अपने को लडकी मानने को तैयार ही नहीं होती, तो मां प्यार से उसे कई तरह की बातें समझाना शुरू करती, पर उसके कानों में जूं भी न रेंगती थी।

सचिन तेंदुलकर की वह फैन थी। पिछले ही वर्ष उसके इस शहर में आने की सूचना उसकी कक्षा के अन्य छात्रों को मिली। जिस गेस्ट हाउस में उसके ठहरने का इंतजाम हुआ था, उसके एक कर्मचारी उसकी दोस्त के नजदीकी रिश्तेदार थे। कक्षा की कई छात्राओं ने सचिन से मिलने का प्रोग्राम बनाया। वह कहां पीछे रहनेवाली थी, झट उसमें शामिल हो गयी। 10 बजे उसके स्कूल की घंटी बजती थी। उसी समय गांव से शहर जाने के लिए एक बस खुलती थी। शाम 4 बजे उसका स्कू्ल बंद होता था, उसी समय शहर से बस गांव पहुंच जाती थी। गांव का सरकारी स्कूल था, बच्चों के लिए एक दो दिनों तक अनुपस्थित रहना आम बात थी। उस दिन नियत समय पर सभी जमा हुई, गांव से शहर पहुंची, बस स्टैंड से गेस्ट हाउस। कल्पना तो थी कि सचिन से ढेर सारी बातें करेंगी, पर सिर्फ आटोग्राफ से ही संतुष्ट होना पडा। वापस बस में पहुंची, फिर गांव, घर बस्ता लेकर इस प्रकार आयी मानो स्कू्ल से ही वापस आयी हो। पर मां को पता नहीं कैसे खबर लग चुकी थी, उन्होने समझाना शुरू किया और वह आदतन एक कान से सुनती और दूसरे कान से निकालती चली गयी। आज जब उसे शहर से गांव वापस जाने के लिए बस नहीं मिली , तब उसे पता चला कि उसने गांव से शहर वापस आकर कितनी बडी गलती की है। और कुछ सहेलियां रहती, तो कोई उपाय भी हो सकता था, पर अकेले एक लडकी………………।

आज लडकी होने के अहसास मात्र से मन में उपजा भय सारे वातावरण को डरावना बना रहा था। हुआ यूं कि कल उसकी दो तीन सहेलियां शहर में लगे मेले को देखने आयी थी। उन्होने मेले की इतनी तारीफ की कि उसका मन भी मेले को देखने के लिए उत्कंठित हो उठा। उसने कई सहेलियों को पूछा, पर उसका साथ देने को कोई भी तैयार नहीं हुई। शहर जाना और वहां से लौटना तो बिल्कुल ही आसान है, पिछली बार उसने यह महसूस किया था, इसलिए आज सुबह स्कूल में अपना बस्ता सहेलियों को सौंपकर वह झट से शहर जाने वाली बस में बैठ गयी थी। लडकियों ने उसे अकेले शहर जाने से मना भी किया, पर उसके दिमाग में जो बातें आ गयी, उसे पूरा करने की जिद ने उसे शहर जानेवाली बस में अकेले ही बैठा दिया। पाकेट खर्च के दो सौ रूपए उसके पास थे, जो मेले देखने के लिए काफी थे। लौटती बस में वापस आने के लिए जब वह स्टैंरड पहुंची, तो मालूम हुआ, बस बारात के लिए बुकिंग में चली गयी है। गांव के लिए और कोई दूसरी गाडी नहीं थी, यह जानकर उसके पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गयी। 

एक परिचित सा चेहरा नजर आते ही उसकी विचारों की तंद्रा भंग हुई। परेशानी के कारण वह उन्हें पहचान भी नहीं पा रही थी, पर उन्हें बार बार अपनी ओर देखता देख अपने दिमाग पर जोर डाला। अचानक ही उसे याद आया, उसने हाथ जोड नमस्ते की और कहा ‘आप जायसवाल जी हैं न। मै घनश्यासमदास जी की पुत्री किरण’ ‘हां हां’ उन्होने अभिवादन का जवाब देते हुए पूछा ‘तुम यहां कैसे?’ शाम के साढे सात बजे थोडे परिचित व्यक्ति को देखकर उसके खुशी की सीमा न रही। इतनी देर में तो उसने बाजार का कई चक्कर लगा लिया था। उसने जल्दी जल्दी अपनी सारी कहानी सुना दी। जायसवालजी के चेहरे पर जाने कितने भाव चढते उतरते नजर आए, जो कि उसकी समझ से परे थे। उन्होने स्कूटर स्टार्ट की, उसे बैठाया और अपने घर की ओर चले। सारे रास्ते उन्होने कोई बातचीत भी नहीं की। शायद उसके कारनामों से उन्हें दुख पहुंचा हो, पर उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी। ये उसे अपने घर ले जा रहे हैं, वहां उनके घरवालों के साथ उसे रात बिताने को जगह मिल जाएगी, सुबह ही वह वापस अपने घर चली जाएगी, उसकी अपनी सारी परेशानी छूमंतर हो गयी। 

उसे अब चिंता थी तो सिर्फ अपने मां पिताजी की। जब उसकी सहेलियां उसका बस्ता ले जाकर उन्हें देंगी और कहेंगी कि वह मेला देखने अकेले ही गयी है, मां पिताजी को मालूम होगा कि बस आज लौटकर वापस नहीं आएगी, तो वे कहां ढूढेंगे उसे? मां पिताजी के बारे में सोंचते ही वह परेशान हो गयी। गांव में फोन की सुविधा होती तो फोन ही कर देती उन्हें। मां पिताजी रात कैसे व्यतीत कर पाएंगे, वह तो उनके यहां जाकर आराम से खा पीकर सो जाएगी। मन ही मन माफी मांगकर उसने अपने आप को शांत किया। पश्चाताप के आंसू गालों पर लुढक पडें। 

छोटा छोटा परिचय भी कभी कभी कितना काम आता है, वह आज ही महसूस कर रही थी। ये जायसवालजी पिताजी के किसी दोस्त के रिश्तेदार थे। उन्होने अपने रिश्ते दार से पिताजी की कुछ कविताएं मांगकर पढी थी। वे पिताजी के लेखन से काफी प्रभावित हुए थे। बाद में उन्होने अखबार में प्रकाशित पिताजी की कविताओं को काट काटकर संकलित भी किया था। एक बार फुर्सत में वे पिताजी से मिलने उसके घर पर भी आए थे। उस दिन जब वह स्कूल से घर लौटी थी, बैठक में ही इनको पाया था। पिताजी ने उनका उससे परिचय करवाया था। फिर चाय नाश्ते वगैरह लेकर एक दो बार बैठक में वह पहुंची तो नजर उनके गंभीर चेहरे पर पडी थी। चेहरे में वही गांभीर्य आज भी नजर आ रहा था, जबकि उम्र 35 के अंदर की ही थी। वे इसी शहर में रहते थे। अचानक स्कूटर बंद हुआ और वह उतर गयी। उन्होने स्कूटर गैरेज में रखा और सीढियों से अपने फलैट की ओर बढें।

छोटे शहरों में भी आजकल जगह की कमी के कारण मकान मालिकों ने पैसे कमाने का एक अच्छा तरीका ढूंढ निकाला है। वे एक बडी इमारत में एक एक कमरे रसोई और बाथरूम को अलग अलग करते हुए फलैट बनाकर किराए पर लगा देते हैं। इससे उन्हें एक अच्छी रकम किराए के रूप में मिल जाती है। तीनमंजिला तीस फलैटों वाली इमारत थी ये। सबसे उपरी मंजिल पर सीढियां खत्म होते ही जायसवाल जी का दरवाजा आ गया। उन्होने जेब से चाबी निकाला और दरवाजा खोलने लगे। देखते ही उसके होश उड गए। ‘घर पर और कोई नहीं है क्या’ उसके मुंह से अनायास ही ये शब्द निकले। अंदर आने के बाद उन्होने कहा ‘पांच वर्ष पहले ही मेरी शादी हुई थी, पर तीन चार महीने बाद ही पत्नी मायके चली गयी। कुछ ही दिनों में मेरा उससे तलाक हो गया।‘ कारण पूछने पर उन्होने स्पष्ट कहा ‘उसे मेरे चरित्र पर संदेह था’ उसकी नजर घडी पर पडी। 8 बज रहे थे। वे बाजार से लाए सामानों को लेकर रसोई में चले गए। चाय बनाया और एक प्‍याला उसे भी थमा दी। शाम से ही वह इतनी परेशान थी कि चाय उसे अमृत की तरह लग रहा था, पर जायसवाल जी के घर में किसी और को न देखकर उसका मन पुन: अशांत हो गया। ये क्या, 'आकाश से गिरे खजूर पर अटके' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। उसका मन हुआ, जाकर कुछ मदद करे उनकी, पर हिम्मत रसोई में जाने की न हुई। अकेले उनके साथ रात कैसे व्यतीत करेगी, सोच सोचकर मन परेशान था।

वैसे तो उसकी उम्र काफी कम थी, अभी अभी उसने अपना तेरहवाँ जन्मदिन मनाया था, पर मां पिताजी और परिवार जनों के प्यार दुलार और खिलाने पिलाने की विशेष व्‍यवस्था से उसके स्वस्थ शरीर में इतना निखार आ गया था कि देखनेवालों को उसकी उम्र का सही अंदाजा भी नहीं लग सकता था। अपनी सारी सहेलियों की तुलना में वह काफी बडी दिखाई देती थी। इधर एक दो वर्षों में शरीर की बढोत्तरी के साथ साथ दिमाग में भी बहुत सारी बातें आ गयीं थीं। कुछ पिक्चर, कुछ घटनाएं, कुछ सखी-सहेलियो और कुछ कहानियों से युवावस्था, सेक्स, स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में काफी कुछ समझ में आ गया था। हालांकि जायसवाल जी उसके सामने काफी बुजुर्ग थे और उसने उनकी आंखो में ऐसा कुछ भी नहीं देखा था कि उन पर शक किया जाए, पर उनकी पत्नी, उसने इनके चरित्र पर शक क्यो किया, फिर इतने दिनो से ये क्वारें क्यो बैठे हैं, मन में ऊल-जुलूल बाते घूम रही थी। कई घटनाओं में एकांत मिलने पर मर्दों को सीमाओं का उल्लंघन करते उसने पाया था। मर्दों की उम्र के बारे में भी कहना बहुत मुश्किल है, क्योंकि गांव के एक अंकल, जिनकी उम्र किसी भी हालत में 35 से कम की नहीं होगी, उसके साथ पढनेवाली लडकियों को इस निगाह से देखते हें कि उन लोगों ने उस रास्ते से गुजरना ही छोड दिया है। दिन तो फिर भी किसी के साथ व्यतीत किया जा सकता है, पर रात इस एक कमरेवाले स्थान में एक अजनबी पुरूष के साथ………..उसे मां की समझायी हुई बातें याद आने लगीं। लडकियों की सबसे कीमती चीज का अर्थ अब समझ में आ गया था। इज्जत खोने के बाद सही में जिंदगी नर्क ही हो जाती होगी, वह क्या करे अब? कैसे बचाए अपने आपको? 

उसने खिडकी से बाहर देखा। चारो ओर की बत्तियां बुझनी शुरू हो गयी थी। सामने झिलमिल करती एक बडी सी इमारत नजर आयी, चारो ओर रोशनी बिखेरती, यह तो कोई सिनेमाहाल नजर आ रहा है, उसने सोचा। सामने ही चमकदार अक्षरों में लिखा था ‘नीलकमल’ उसे जाना पहचाना सा महसूस हुआ। अरे, इसी सिनेमाहाल के बगल में तो एक चाचाजी रहते हैं। दो साल पहले एक स्कूल में प्रवेश के लिए परीक्षा देने जब वह शहर आयी थी, तो उनके घर में ही तो ठहरी थी। चाचाजी तो बहुत मिलनसार किस्म के थे ही और उनके बेटे बंटी और बेटी पिंकी सब दो दिनों में ही तो उनके दोस्त बन गए थे। उसका मन खुशी से झूम उठा। वह वहीं चली जाएगी। वहां वह आराम से रात व्यतीत कर सकेगी। उसे वहां कोई परेशानी भी नहीं होगी। उसने रसोई में जाकर जायसवालजी से कहा ‘मै अपने एक संबंधी, जो बगल में ही रहते हैं, के यहां जा रही हूं। वहां से सुबह अपने गांव चली जाउंगी।‘ मै छोड आउं‘ उन्होने पूछा। ‘नहीं, नहीं, मैं आराम से चली जाउंगी’ उसने निश्चिंत होकर कहा। वह बाहर निकलकर तेजी से चलती हुई उस सिनेमाहाल के मेन गेट पर पहुंच गयी। 

इवनिंग शो तुरंत ही छूटा था और नाइट शो की शुरूआत होने ही वाली थी। इसलिए उतनी रात गए भी सडक पर अच्छी चहल पहल थी और इसलिए उसे किंचित मात्र को भी भय नहीं हुआ। हाल के मेन गेट पर पहुंच जाने के बाद उसे चाचाजी के यहां जाने का रास्ता भी आसानी से मिल गया। गेट पर पहुंचते ही वह खुशी से पिंकी पिंकी चिल्लाने का दुस्साहस कर बैठी। पर यह क्या? एक मोटे और नाटे व्यक्ति ने दरवाजा खोला। ‘क्या है रे!‘ उस मोटे व्यक्ति ने पूछा। उसकी तो जबान ही नहीं खुल रही थी, पर हिम्मत जुटाकर पूछा ‘पिंकी है’ ‘यहां कोई पिंकी नहीं रहती। मै यहां छह महीनों से रह रहा हूं।‘ उसने जवाब दिया। बगल में चंदा आंटी रहती थी, उसे याद आया, उसने घंटी बजायी, अंकल आण्टी बाहर निकले। ‘आण्टी मै किरण, कल्याणपुर से आयी हूं। पिंकी की बहन’ आण्टीं ने दिमाग पर जोर डाला, पर दो वर्षों का अंतराल, मात्र एकाध घंटे की भेंट और उसके कद काठी में आया परिवर्तन , वह पहचान न सकी। ‘मै अकेली हूं। कृपया रात गुजारने की जगह दे दो’ उसने फिर विनती की। अंकल ने कहा ‘अरे चलो! घर बंद करो। शरीफ घर की लडकियां इतनी रात गए बाहर रहती हैं क्या? आजकल बदमाश लडकियों का गिरोह शहर आया हुआ है। शरीफ बनकर घरों में घुसकर चोरियां, डकैतियां करवाती हैं’ खट के साथ दरवाजा बंद हुआ, जिसकी चोट दिल और दिमाग दोनो को ही लगी। थकहारकर उसने वापस अपने कदम जायसवाल जी के फलैट की ओर बढाए। रात्रि के साढे नौ बज चुके थे। रास्ता अब सुनसान हो चुका था। सन्नाटा ही सन्नाटा नजर आ रहा था। अभी के हालात में सबसे सुरक्षित स्थान जायसवालजी का फलैट ही था, पर वहां भी तो………………….

सोच सोच कर दिमाग और चलचलकर पांव थक गए थे। मेले में भी तो उसने कम शरारतें नहीं की थी। जिन जिन चीजों की प्रशंसा उसने अपनी सहेलियों से सुनी थी, सबकुछ देखा, खाया और आनंद लिया था। अब उसके शरीर को आराम की सख्त जरूरत थी, पर उस फलैट में भी उसे आराम नसीब होगा या नहीं, सोच कर मन परेशान था। इस भवंर से निकलने का रास्ता ढूंढने में उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था, पर कोई उपाय नजर ही नहीं आ रहा था। उसका दिल हुआ, जोर जोर से रोए, पर उसके आंसू पोछनेवाला भी कोई नहीं था। क्या ही अच्छा होता, अगर पिताजी यहां पहुंच गए होते। पिताजी की उपस्थिति में किसी की हिम्मत नहीं थी उसे नजर उठाकर भी देखने की। आज उसे पिताजी की बेइंतहा याद आ रही थी। काश, उसे ढूंढते हुए पिताजी यहां पहुंच जाते।

हां पिताजी, आजतक छोटी मोटी समस्या्ओं से ही उन्होने ही मुक्ति दिलायी है। ‘पिताजी तो पहुंच ही सकते हैं’, उसने सोंचा और उसके चेहरे पर चमक आ गयी। उसके कदम तेजी से जायसवाल जी के फलैट की ओर बढे। हाथों ने घंटी बजायी। दरवाजा खुला। जायसवालजी के आंखों में कई प्रश्न तैर रहे थे। ‘मेरे रिश्तेदार ने डेरा बदल लिया है। पर मैने वहां जाकर बहुत अच्छा किया। मुझे ढूंढते हुए पिताजी वहां पहुंच गए हैं। मुझे देखकर काफी खुश हुए। उनके पडोस में पिताजी का खाना बन रहा है। पिताजी जब पिछली बार यहां आए थे, तब उन्होने पिताजी की कविताएं सुनी थी। आज भी वहां ऐसी ही चर्चा चल रही है। पिताजी को मैने आपके फलैट के बारे में बता दिया है। उन्होनें मुझे यहां भेज दिया । वे यह जानकर बहुत खुश हुए कि मै आपके पास सुरक्षित पहुंच गयी।‘ इतना सारा झूठ एक सांस में अच्छी तरह बोलने के बाद उसके चेहरे का सारा तनाव दूर हो गया। उसने इतनी सफाई से झूठ बोला था कि जायसवाल जी भी अविश्वास न कर सके। उन्होंनें दो प्लेट में खाना निकाला। खुद भी खाए, उसे भी खिलाया। खाना खाने के बाद उसने एक लिहाफ मांगा और सोफे पर ही निश्चिंति से लुढक गयी।  

सुबह जब नींद खुलेगी, मालूम होगा, जायसवाल जी ने रात भर पिताजी का इंतजार किया है। दैनिक क्रियाकर्मो से निवृत होकर वह जल्द ही बाहर आटो पकडेगी और बस स्टैंड पहुंच जाएगी। मात्र एक झूठ से उसके दिमाग की सारी हलचल समाप्त हो गयी थी और दिमाग के अंदर बैठ गयी थी एक सबक, अब वह बडे बुजुर्गों के सीख का आदर करेगी। अपने घर सकुशल पहुंचने की कल्पना मात्र से उसकी सारी थकावट दूर हो गयी और वह कब नींद के आगोश में समा गयी, उसे मालूम भी न हो सका।