नगों वाला सेट ...(कहानी)

hamari kahani


बाजार जाने के लिए ज्‍योंहि मैं तैयार होकर बाहर निकली, बारिश शुरू हो चुकी थी। लौटकर बरामदे में एक कुर्सी डालकर एक पत्रिका हाथ में लेकर बारिश थमने का इंतजार करने लगी। बाजार के कई काम थे, बैंक से पैसे निकालने थे, राशन और सब्जियां भी लानी थी। कभी कभी बाजार निकल जाना मन लगाने के लिए तो अच्‍छा होता ही है, सेहत के लिए भी अच्‍छा रहता है। वास्‍तव में वक्‍त काटने के लिए घर में कोई काम भी तो नहीं , एक पत्रिका को इतनी बार पढ लेती हूं कि उसके एक एक शब्‍द रटे से लगते हैं। मैगजीन को एक ओर रखती हुई सामने नजर डाला , तो बारिश और तेज हो चुकी थी। पिछले तीन दिनों की तरह ही आज भी घर से निकल पाने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। वो तो भला हुआ कि कुछ जरूरी सामान कई दिन पहले ही नौकर से मंगवा लिया था , नहीं तो आज खाने पीने की भी आफत हो जाती। कई दिनों से झमाझम बारिश जो हो रही है।


विजय को तो आफिस के लगातार प्रोमोशन के साथ ही साथ व्‍यस्‍तता इतनी बढती चली गयी थी कि अब घर के कार्यों के लिए या मेरा साथ देने के लिए उन्‍हें फुर्सत ही नहीं। जब भी उनकी इस व्‍यस्‍तता से मैं खीझ उठती हूं , मुझे किसी न किसी तरह मना ही लेते हैं। एक समय था , जब वे समय पर घर आया करते थे , जब तब ऑफिस से छुट्टी लेते थे , तब मैं ही अपनी घर गृहस्‍थी में उलझी रहती थी , तब विजय खीझ उठते थे मुझसे , अब उल्‍टा ही हो गया है। खैर, अब दो तीन वर्ष की ही तो बात है , सेवानिवृत्‍त होने के बाद आपस में सुख दुख बांटते हम दोनो दिन रात साथ साथ रह पाएंगे, मैने संतोष की सांस ली।

मानसून के आरंभ की ये बरसात भले ही किसानो के लिए वरदान हो , पर मुझे तो सारे कार्यों मे बाधा डालनेवाला असमय का बरसात नजर आ रहा था। तीन चार दिनों से ऐसा ही हो रहा था। सुबह नाश्‍ता के बाद विजय को विदा करती , तो बाई आ जाती। उसके बाद खाना बनाने का टाइम हो जाता। खाना खिलाकर जैसे ही विजय को ऑफिस भेजती , कभी मेरे तैयार होने से पहले ही बारिश आती , तो कभी मेरे तैयार होने के बाद। अजीब उलझन में फंस गयी हूं मैं , इस समय के अलावे कभी कहीं निकलने को समय ही नहीं मिलता, अकेले इतने बडे घर के देखरेख की जिम्‍मेदारी जो निभानी पड रही है।

कितने छोटे से क्‍वार्टर में मैने अपने जीवन का प्रारंभिक समय गुजार दिया था। जरूरत भर सामान भी उसमें नहीं आ पाता था। दो छोटे छोटे कमरों में ही अपनी आधी से अधिक जिंदगी काट दी थी मैने। सीमित मासिक तनख्‍वाह में अपनी जरूरतें पूरी करने में मैं हमेशा असमर्थ रहती थी। इसलिए तो एक आलोक के होने के बाद हमलोगों को किसी दूसरे बच्‍चे की इच्‍छा भी नहीं थी। हमलोग आलोक को पढा लिखाकर ऊंचे पद पर पहुंचाने का सपना देखते अपना जीवन काट रहे थे। पर इस सपने के अधूरे रहते ही हमारी लापरवाही से अचानक प्राची और प्रखर गर्भ में हलचल मचाने लगे थे। इस अहसास से मेरी हालत बहुत बुरी हो गयी थी, पर कोई उपाय न था और मुझे दोनों को एक ही साथ जन्‍म देना पडा था। आलोक तब पंद्रह वर्ष का हो चुका था और अपने अकेलापन को दूर होता देख प्राची और प्रखर के जन्‍म से बहुत खुश था।

लेकिन प्राची और प्रखर के जन्‍म के बाद भी हमने उसकी पढाई लिखाई में कोई बाधा न आने दी थी और उसने इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर इसी शहर में एक कंपनी ज्‍वाइन कर ली थी। कुछ ही दिनों में उसने हमलोगों से अपनी सहकर्मी अलका से प्रेम विवाह करने की स्‍वीकृति मांगी थी। अलका के व्‍यक्तित्‍व , पढाई लिखाई या पारिवारिक पृष्‍ठभूमि में कोई कमजोरी नहीं थी , जिसके कारण हमलोग इस विवाह को मंजूरी नहीं देते। सच तो यह था कि अलका को अपनी बहू के रूप में पाकर हम सब बहुत खुश थे , यही कारण था कि हमने पूरे उत्‍साह से भव्‍य आयोजन करते हुए उनका विवाह संपन्‍न कराया था।

उसने आते ही सारा घर संभाल लिया था। चाहे घर गृहस्‍थी का कोई मुद्दा हो या रसोई का काम , प्राची या प्रखर की पढाई हो या कोई और महत्‍वपूर्ण फैसला ... सबमें उसकी भूमिका अहम् होती। इसी कारण विजय , आलोक , प्राची और प्रखर उसे काफी महत्‍व देते। इस बात से मैं दुखी हो जाती , मुझे अक्‍सर महसूस होता कि इस घर में मेरा महत्‍व काफी कम हो गया है। समय पंख लगाकर उडता रहा , विजय ,आलोक और अलका को ऑफिस में प्रोमोशनो , प्रखर को व्‍यवसायिक सफलताओं और सबों के वैवाहिक सुखों के बौछार से , बच्‍चों के खिलखिलाहट से घर में रौनक आती गयी और सबके जीवनस्‍तर में काफी बढोत्‍तरी हुई। पर इससे परिवार के अन्‍य लोगों की तुलना मे वैचारिक दृष्टि से मैं काफी पीछे छूट गयी। मैं उसके बढते अधिकारों को देखकर चिंतित हो जाया करती, मुझे अपने अस्तित्‍व का भय सताने लगता था और इस भय के कारण ही मैं वैसे वैसे कार्यों में हस्‍तक्षेप करने लगी थी , जो एक मां की दृष्टि से अनुचित था।

फिर एक दिन वही हुआ , जिसका विजय को भय था। मेरे रोज रोज के उलाहने और बात बात पर हस्‍तक्षेप से तंग आकर आलोक और अलका किराए के एक फ्लैट में शिफ्ट कर गए। प्राची और प्रखर के लिए तो यह एक सदमा ही था। महीनों बाद ही वे सामान्‍य हो पाए, वैसे उनका भावनात्‍मक जुडाव तो उनके साथ अब भी बना हुआ है। उस दिन के बाद अकेलेपन से भयभीत मैं हमेशा विजय के सेवानिवृत्ति का इंतजार करती रही, ताकि मेरा समय भी आराम से कट सके। प्राची और प्रखर छुट्टियां व्‍यतीत करने भी अलका और आलोक के पास ही आते , इसलिए कभी कभार ही बेटी , बहू , दामाद , नाती , पोते मेरे पास आते थे , फिर दो चार घंटे में ही उनके लौटने का समय हो जाता और परिवार के वे सदस्‍य मुझे मेहमान से भी अधिक गैर नजर आते।

फोन की घंटी ने मुझे वर्तमान में लाकर खडा कर दिया था।

‘हलो’

’नमस्‍ते मम्‍मी’ फोन पर अलका ही थी।

’ओह बेटे, अभी मैं तुम्‍हें ही याद कर रही थी।‘

‘वाह, आपने तो मेरी उम्र ही बढा दी’

’वो कैसे?’

’कोई किसी को याद करे और वो उसी वक्‍त पहुंच जाए, तो उसकी उम्र बढ जाती है’

’अच्‍छा, तो बताओ, तुमलोग कैसे हो?’

’हमलोग तो अच्‍छे हैं, आप अपनी बताएं, पापा की तबियत कैसी है?’

’सबलोग अच्‍छे हैं’

’मम्‍मी, पापा के साथ कल बैंक में जाकर मेरा वो नगों वाला सेट निकालकर ले आइएगा, बुआजी के बेटे की शादी है, काफी दिनों से मैने उसे नहीं पहना है, कल शाम को आलोक जाकर ले आएंगे। परसों शाम की गाडी से हमें निकलना है।‘

’ठीक है, मुझे भी बाजार के कई काम निबटाने हैं। ऐसे तो ये व्‍यस्‍तता का बहाना बनाते हैं। तेरे नाम से छुट्टी ले ही लेंगे या ऑफिस से समय निकालकर थोडी देर पहले चल देंगे। मेरा भी टेंशन दूर हो गया। कई दिनों से बारिश की वजह से काम भी नहीं कर पा रही हूं।‘

बारिश अभी भी लगातार जारी थी , और उसके साथ मेरे विचारों की श्रृंखला भी। पता नहीं क्‍यूं , आज मन वर्तमान में टिक ही नहीं रहा था। किसी जगह पर कर्तब्‍यों का पालन करनेवालों को अधिकारों से तो वंचित नहीं किया जा सकता। पर सच ही कहा गया है , स्‍त्री की सबसे बडी दुश्‍मन स्‍त्री ही होती है। एक बच्‍ची को माता पिता अधिक लाड प्‍यार करें , तो बच्‍ची का भविष्‍य अंधकारमय नजर आने लगता है, बहू को अधिक प्‍यार देने का भी परिणाम घरवालों के लिए बुरा माना जाता है, यहां तक कि मां को अधिक प्‍यार मिले तो बहू के लिए अच्‍छा नहीं माना जाता है। सच तो यह है कि स्‍त्री के हक के विरूद्ध ये बातें स्‍त्री ही किया करती है। इस तरह पीढी दर पीढी किसी स्‍त्री को यह अधिकार ही नहीं मिल पाता , जिसकी वह हकदार है। लेकिन यह बात तो मेरे मन में आज आ रही थी , यही बात दस वर्ष पहले आ गयी होती , तो यह घर तो बिखरने से बच गया होता। मैने अलका को बहुत परेशान किया है , इसे तो मुझे स्‍वीकारना ही पडेगा। वो तो उन दोनों का बडप्‍पन ही है कि कुछ ही दिनों में सारी बातों को भूलकर वे हमारी गल्‍ती को माफ करते आए हैं।

बीती हुई घटनाएं मेरे दिमाग में चलचित्र की भांति घूमती रहती थी , अधिकांश जगहों पर दोष मेरा होता । मेरी आत्‍मा हमेशा मुझे धिक्‍कारा करती , क्‍या इस घर में अलका को प्राची सा अधिकार नहीं मिलना चाहिए था ? आखिर उसका दोष क्‍या था ? अचानक ही मेरे दिमाग ने अलका के दोषों पर ध्‍यान देना आरंभ किया। उसने क्‍या क्‍या गलतियां की थी ... एक , दो , तीन ........ गल्तियों से तो भगवान भी नहीं बच पाए , भला मनुष्‍य के जीवन में गल्तियां न मिले , बहुत सारी गल्तियां नजर आने लगी। अलका को जब भी इन गल्तियों के बारे में टोकती , आलोक और विजय उसका पक्ष लेकर मुझे ही चुप करवा देते। इन दोनो के प्‍यार से ही अलका का दिमाग चढ जाता था।

उन बातों को सोंचकर फिर मेरा तनाव घटने की बजाए बढ गया। हमारे बैंक के लॉकर में अलका का एकमात्र नगों वाला सेट ही तो बचा था , जो हमलोगों ने उसे उसके विवाह के लिए इतने चाव से खरीदा था। मायके से मिले सारे जेवर उसने धीरे धीरे मंगवा ही लिए थे, कभी किसी बहाने तो कभी किसी। आज यह सेट मंगवाकर मानो वह इस घर से रिश्‍ता ही तोड रही हो। आलोक भी कैसा मर्द है , अलका की सब हां में हां मिलाता है। खाली दिमाग शैतान का घर ही तो होता है, मेरे मन में इसी तरह की उलूल जुलूल बातें आती रही और मैं व्‍यथित होती रही। विजय के आते ही अलका के बारे में इधर उधर की बातें कहते हुए अपने मन की सारी भडास निकालने में जरा भी देर नहीं की। आलोक के दोषों को भी गिन गिनकर सुनाया। इन बातों से विजय भी परेशान और चिंतित हो गए। हम दोनों ने बेटे बहू के नालायक होने के गम में पलंग पर करवटें बदलते रात काटी। फिर विजय ने दूसरे दिन ऑफिस से छुट्टी ली और हमने सारा काम निबटाया और लौटते वक्‍त बैंक से बहू का नगों वाला सेट निकालकर ले आए।

शाम को ऑफिस से लौटता हुआ आलोक अकेले ही गेट से पापा , पापा पुकारता घर में घुसा , पर घर में बिल्‍कुल सन्‍नाटा था। सहमते हुए उसने ड्राइंग रूम में अपने कदम रखे। कोई और दिन होता , तो पापा उससे लिपट ही गए होते , पर आज हमलोग सोफे पर निर्विकार भाव से बैठे थे। इस शांति को देखकर किसी तूफान के होने के आशंका से उसका चेहरा भयभीत हो गया , पर इससे उसे जन्‍म देनेवाले हम मम्‍मी पापा के मन में कोई सहानुभूति नहीं थी । हमने उसे फटकारना आरंभ किया , एक के बाद एक ... अलका पर और उसपर तरह तरह के इल्‍जाम लगाते हुए, अपने शिकायतों का पुलिंदा खोलते हुए हमने जेवर का डब्‍बा उसके हाथ में दे दिया। ऑफिस से लौटते हुए थके हारे मूड पर इस अप्रत्‍याशित डॉट आलोक के क्रोध को कईगुणा भडका गया। वह इतने दिनों में अलका को नहीं समझ पाया था, ऐसी बात नहीं थी , अलका ने आजतक परिवार के मामले में सिर्फ सहयोग ही दिया था। पर अलका के पक्ष में कुछ कहने से तो वह ‘जोरू का गुलाम’ ही बनता, सो चुप रहना ही श्रेयस्‍कर था। उसके समझ में आ गया था कि लाख कोशिश कर‍के भी वह मम्‍मी और पापा को खुश नहीं रख सकता था, वह चुपचाप पल्‍टा, उसके कदम तेज गति से अपने घर की ओर चल पडे।

आलोक को उल्‍टा पांव लौटते देखने के बाद मैं अचानक होश में आयी , विजय के चेहरे पर परेशानी देख मेरी हालत खराब थी। मन ने कहा कि मैं आलोक से भी तेज गति से कदम बढाते हुए उसे लौटा लाऊं , पर कैसे ? आलोक से आंख या नजर मिलाने की शक्ति भी अब मुझमें नहीं बची थी। बहू के एक छोटे से नगों वाले सेट ने हमारे मध्‍य इतनी दूरी पैदा कर दी थी। एक बार फिर से मैने वह गल्‍ती दुहरायी है , जो अक्‍सर हमारे मध्‍य दूरियां पैदा करती है और जिसे न करने का संकल्‍प अक्‍सर करती आयी हूं। आज भी शायद अंत नहीं है , यह गल्‍ती मुझसे तबतक होती रहेगी ,जबतक मैं अलका और प्राची को बिल्‍कुल एक रूप में न देखूं।

नसीब अपना अपना .......

समाज की विसंगतियों पर आधारित यह पोस्‍ट पूर्व में नुक्‍कड मे भी प्रकाशित हो चुकी है .. पर अपनी रचनाओं को एक स्‍थान पर रखने के क्रम में इसे पुन: यहां प्रकाशित कर रही हूं ....



प्रथम दृश्‍य

‘अब तबियत कैसी है तुम्‍हारी’ आफिस से लौटते ही बिस्‍तर पर लेटी हुई पत्‍नी पर नजर डालते हुए पति ने पूछा।
‘अभी कुछ ठीक है, बुखार तो दिनभर नहीं था , पर सर में तेज दर्द रहा’
’तुमने आराम नहीं किया होगा, दवाइयां नहीं खायी होगी, चलो डाक्‍टर के पास चलते हैं’
’दिनभर आराम ही तो किया है , पडोसी ने खाना बनाने को मना कर रखा था , स्‍कूल से आते ही बच्‍चों को ले गए , खाना खिलाकर भेजा , डाक्‍टर के यहां जाने की जरूरत नहीं , अभी आराम है’
’ठीक है, आराम ही करो, मैं होटल से खाना ले आता हूं’
’इसकी जरूरत नहीं, फ्रिज में राजमें की सब्‍जी है , थोडे चावल कूकर में डालकर सिटी लगा लेती हूं , आपलोग खा लेंगे’
’नहीं, हमें नहीं खाना चावल, आंटी ने बहुत खिला दिया है , हल्‍की भूख ही है हमें’ बच्‍चे चावल के नाम से बिदक उठे।
’ठीक है, तो चार फुल्‍के ही सेंक दूं , आटे भी गूंधे पडे हैं फ्रिज में’
‘नहीं मम्‍मा, रोटी खाने की भी इच्‍छा नहीं’
’तो फिर क्‍या खाओगे’
’बिल्‍कुल हल्‍का फुल्‍का’
‘ब्रेड का ही कुछ बना दूं’
’नहीं, नूडल्‍स वगैरह’
’ठीक है, दो मिनट में तो बन जाएगा, मैगी ही बना देती हूं’
‘अरे, क्‍या कर रही हो’ पतिदेव बाथरूम से आ चुके थे।
’कुछ भी तो नहीं बच्‍चों के लिए मैगी बना दूं’
’अरे नहीं, तुम्‍हें परेशान होने की क्‍या जरूरत, मैं ले आता हूं होटल से , तुम आराम करो भई’ उन्‍होने हाथ पकडकर पत्‍नी को बिस्‍तर पर लिटा दिया और सबका खाना होटल से ले आए।

द्वितीय दृश्‍य

सुबह से सर में तेज दर्द है , पर मजदूरी करने जाना जरूरी था। जाते वक्‍त मुहल्‍ले की दुकान से उधार ही सही , सरदर्द की दो दवाइयां ले ली थी , सबह और दोपहर दोनो वक्‍त उस दवाई को खा लेने का ही परिणाम था कि वह आज की दिहाडी कमा चुकी थी। कुल 60 रूपए हाथ में , पति की कमाई का कोई भरोसा नहीं , सारा पैसा शराब में ही खर्च कर देता है वह। 60 रूपए में क्‍या ले , क्‍या नहीं , 4 रूपए की दवा ले ही चुकी है वह। 18 रूपए वाले चावल ले तो उसमें कंकड नहीं होता , पर बाकी काम के लिए पैसे कम पड जाएंगे । 15 रूपएवाले चावल ही ले लें , कंकड तो चुने भी जा सकते हैं। दो किलो चावल लेने भी जरूरी हैं, थोडा भात बच जाए तो बासी भात के सहारे बच्‍चे दिनभर काट लेते हैं। घर में तेल भी नहीं , दाल भी नहीं , सब्‍जी भी नहीं , ईंधन भी नहीं , 26 रूपए में क्‍या ले क्‍या नहीं। नहीं आज तेल छोड देना चाहिए , थोडे दाल ले ले , थोडे साग है बगीचे में , आलू है घर में , कोयला लेना जरूरी है और किरासन तेल भी। काफी मशक्‍कत करके वह 56 रूपए में उसने आज की सभी जरूरतें पूरी कर ही ली। आकर चूल्‍हे जलाए , चावल बीने , साग चुने। खाने के लिए चावल , दाल , साग और आलू के चोखे बनाए। दिनभर के भूखे बच्‍चे गरम गरम खाना खा ही रहे थे कि झूमते झामते पति पहुंच गया। उसका खाना भी परोसा गया , पर यह क्‍या , पहला कौर खाते ही मुंह में कंकड। पति का गुस्‍सा सातवें आसमान पर , पूरी थाली फेक दी और जड दिए चार थप्‍पड उसकी गालों पर। ‘साली खाना बनाना भी नहीं आता , आंख की जगह पत्‍थर लगे हैं क्‍या ? ‘ बेसुध पति को जवाब देकर और मार खाने की ताकत तो उसकी थी नहीं , रोकर भी समय जाया नहीं कर सकती , बच्‍चों को खिलाकर खुद भी खाना है , बरतन साफ करने हैं तबियत ठीक करने के लिए सोना भी जरूरी है , सुबह फिर मजदूरी पर भी तो जाना है।

आइए चलें एक बार फिर से ... हिंदी भवन की ओर !!

अतिवृद्धों की स्थिति बिगडेगी

‘खगोल शास्‍त्र’ के अंतर्गत ग्रहों के अध्‍ययन में हमेशा ही कुछ दिक्‍कतें आती रही हैं। कुछ गणनाओ के आधार पर यूरेनस औरनेप्च्यून की गति में हमेशा एक विचलन का कारण ढूंढते हुए वैज्ञानिकों ने एक ‘क्ष’ ग्रह (Planet X) की भविष्यवाणी की , जिसके कारण यूरेनस और नेप्च्यून की गति पर प्रभाव पड रहा था। अंतरिक्ष विज्ञानी क्लाइड डबल्यू टोमबौघ इस ‘क्ष’ ग्रह के रूप में 1930 में प्लूटो खोज निकाला। लेकिन प्लूटो इतना छोटा निकला कि यह नेप्च्यून और यूरेनस की गति पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता है। वास्‍तव में प्‍लूटो इतना छोटा है कि सौरमंडल के सात चन्द्रमा ( हमारे चन्द्रमासहित) इससे बड़े है। इसकी कक्षा का वृत्ताकार नहीं होना और वरुण की कक्षा को काटना भी इसे ग्रह का दर्जा देने में विवाद पैदा करते रहें। इस बौने से ग्रह प्लूटो की पृथ्वी से लगभग 14 करोड़ 96 लाख किलोमीटर दूरी पर स्थित है और 248.5 साल में सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है। इस तरह एक एक राशि पार करने में इसे लगभग पंद्रह वर्ष लग जाते हैं।


खगोलशास्त्रियों की अंतरराष्ट्रीय संस्था (आईएयू) , जो सभी खगोलकीय नामों और उनकी श्रेणियों को अंतिम रुप देती है , ने प्लूटो को सौरमंडल के नौ ग्रहों से अलग करते हुए कहा कि उसमें ग्रह जैसे पूरे गुण नहीं हैं , पर ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने अपने अध्‍ययन में पाया है कि समय समय पर किसी भी देश में लगातार बारह से पंद्रह वर्षों तक के युग में किसी खास वर्ग के लोगों के एक सी परिस्थिति का कारण प्‍लूटों की खास चाल ही होती है। गोचर में यह जिस ग्रह की राशि में मौजूद होता है , उस ग्रह से प्रभावित होनेवाले लोगों के सुख में कमी लाता है। राशि परिवर्तन के बाद लोग बडी राहत प्राप्‍त करते हैं। इस तरह किसी देश या क्षेत्र में खास युग और काल को बुरे रूप में प्रभावित करने में इस ग्रह की खासी भूमिका रही है और इस आधार पर आनेवाले समय में किसी खास निष्‍कर्ष पर पहुंचने में इस ग्रह की मदद ली जा सकती है। इसलिए इसे ग्रह माना जाना चाहिए।

भारतवर्ष में प्‍लूटो के राशि परिवर्तन के बाद एक खास प्रकार का माहौल तैयार होते देखा जा सकता है। वैसे तो पूर्व में भी यह नियम काम कर रहा होगा , पर मैने इधर हाल फिलहाल हुए प्‍लूटों के राशि परिवर्तन पर खास गौर किया। प्‍लूटो की स्थिति 1980 से 1992 तक तुला राशि में बनी रही। तुला राशि शुक्र की राशि है , ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ शुक्र का दशाकाल 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र के बुजुर्गों के लिए मानता आया है , 1980 से 1992 तक मैने 36 से 48 वर्ष के अधिकांश बुजुर्गों को परेशान पाया , खास गडबडी मध्‍य के वर्षों 1985–1986 में दिखाई पडी। जन्‍मकुंडली अच्‍छी हो तो थोडी राहत और जन्‍मकुंडली गडबड हो तो पूरे परेशानी में इन्‍हें देखा। कारण स्‍पष्‍ट था , परिवार नियोजन के कम प्रचार प्रसार के कारण सबों के परिवार बडे थे , व्‍यक्तिगत सुख का ख्‍याल न कर पारिवारिक मूल्‍यों की कद्र करना उनका जीवन था , दायित्‍व के हिसाब से आय के साधन सीमित थे। 1986 के बाद परिवार नियोजन के प्रचार प्रसार से परिवार सीमित होते गए और उनका दबाब कम हुआ। लगभग इसी समय से सरकारी कर्मचारियों की आय में लगातार वृद्धि होने लगी और उसका असर अन्‍य प्रकार के कार्य करनेवालों पर भी पडा। 1992 में बुजुर्गों की स्थिति में सुधार से समाज की स्थिति में सुधार तो अया , पर युवा वर्ग के लिए परेशानी बढ गयी।

आसमान में प्‍लूटो की स्थिति 1992 से 2006 तक वृश्चिक राशि में बनीं रही। वृश्चिक राशि मंगल की राशि है , ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ मंगल का दशाकाल 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र के युवाओं के लिए मानता आया है। 1992 से 2006 तक मैने 24 से 36 वर्ष की उम्र के अधिकांश युवाओं को परेशान पाया। खास गडबडी मध्‍य के वर्षों 1998–1999 में दिखाई पडी। जन्‍मकुंडली अच्‍छी हो तो थोडी राहत और जन्‍मकुंडली गडबड हो तो पूरे परेशानी में इन्‍हें देखा। कारण स्‍पष्‍ट था , छोटे बडे सभी संस्‍थान कर्मचारियों की कटौती कर रहे थे , इसलिए सरकारी नौकरियां की वेकेंसी ही बंद थी। प्राइवेट नौकरी में युवाओं का भरपूर शोषण हो रहा था , उनका परेशान रहना स्‍वाभाविक था। योग्‍य लडकों के अभाव से समाज में तिलक और दहेज जैसी कुप्रथाएं बढीं , जिससे युवतियां भी प्रभावित हुईं। पर 1999 से ही क्रमश: सुधार का क्रम लेता युवा वर्ग 2006 के बाद ऊंची उडान भरने लगा है , युवकों की कौन कहे , युवतियां भी आज किसी से कम नहीं रह गयी हैं , लेकिन इसका बुरा प्रभाव वृद्धों के जीवन पर पडा है।

आसमान में प्‍लूटो की स्थिति 2006 के पश्‍चात धनु राशि में चल रही है। धनु राशि बृहस्‍पति की राशि है , ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ बृहस्‍पति का दशाकाल 60 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र के लिए मानता आया है। 2006 के बाद मैं अधिकांश वृद्धों को परेशान ही देख रही हूं। जन्‍मकुंडली अच्‍छी हो तो थोडी राहत और जन्‍मकुंडली गडबड हो तो पूरे परेशानी में इन्‍हें देख रही हूं। कारण स्‍पष्‍ट है , बेटे–बहू , बेटियां–दामाद ..... सब आपने आपने प्रोफेशन , अपनी अपनी महत्‍वाकांक्षाओं में व्‍यस्‍त हैं , इनके लिए समय काटना दूभर है।वृ द्धों के लिए खास गडबडी मध्‍य के वर्षों 2012-2013 में बनी रहेगी। पर उसके बाद वृद्धों की जो पीढियां आएंगी , वो आर्थिक तौर पर अपनी स्‍वतंत्रता को खोकर इनकी मुहंताज रहना नहीं पसंद करेंगी। अपना समय काटने के लिए इनके पास भी कोई न कोई उपाय होगा और 2019 के बाद के 60 से 72 वर्ष की उम्र के वृद्धों को हम बूढा नहीं पाएंगे , इसी प्रकार अभी तक की प्‍लूटों के चाल के कारण दिखाई देनेवाली परिस्थिति के हिसाब से आनेवाले युग के बारे में कुछ अनुमान अवश्‍य लगाया जा सकता है।

आसमान में प्‍लूटो की स्थिति 2019 के पश्‍चात् मकर राशि में और 2033 के पश्‍चात् 2047 तक कुंभ राशि में चलेगी। मकर और कुंभ दोनो ही राशि शनि की राशि है , ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ शनि का दशाकाल 72 वर्ष की उम्र से 84 वर्ष की उम्र तक का मानता आया है। 2019 से 2047 तक लगातार अतिवृद्धों की स्थिति बहुत ही गडबड दिखाई देगी , उनकी देखभाल करने को कोई न बचेगा। जन्‍मकुंडली अच्‍छी हो तो थोडी राहत और जन्‍मकुंडली गडबड हो तो पूरे परेशानी में ये रहेंगे । कारण स्‍पष्‍ट है , अभी ही समाज में अतिवृद्धों की देखभाल वृद्धों के जिम्‍मेदारी में हैं , जब वृद्ध भी व्‍यक्तिगत सुख का ख्‍याल करने लगेंगे , तो अतिवृद्धों की हालत दयनीय होना तय है।

फिलहाल ज्‍योतिष का अध्‍ययन छोडने का मेरा कोई इरादा नहीं !!

कुछ दिन पूर्व यह समाचार मिलते ही कि हिंदी साहित्‍य निकेतन अपनी पचासवीं सालगिरह पर एक कार्यक्रम आयोजित कर रहा है.जिसमें परिकल्‍पना डॉट कॉम द्वारा पिछले वर्ष घोषित किए गए 51 ब्‍लॉगरों और  नुक्‍कड़ डॉट कॉम के द्वारा निर्वाचित हिंदी 13 ब्‍लॉगरों को उनके उल्‍लेखनीय योगदान के लिए सम्‍मानित करेगा। ऐसे कार्यक्रमों में सम्मिलित होने और लोगों से मिलने जुलने का कोई मौका मैं हाथ से जाने नहीं देती, इसलिए रविन्‍द्र प्रभात जी के द्वारा दिए गए आमंत्रण को मैने सहर्ष स्‍वीकार कर लिया। इस कार्यक्रम के लिए मैं बोकारो से 28 को ही निकल पडी , 29 को दिल्‍ली पहुंची और 30 को साढे तीन बजे तक आयोजन स्‍थल में पहुंच गयी। आसपास कोई परिचित ब्‍लॉगर के न दिखाई देने से मैं निराश ही बैठी थी कि पहले वंदना जी और फिर तनेजा दंपत्ति भी वहां पहुंचे। संजू तनेजा जी से कई बार मुलाकात हो चुकी थी , हालांकि मुलाकात से पहले भी राजीव जी के द्वारा बिगाडे गए सभी चित्रों में मैं उन्‍हें पहचान जाती थी । वंदना जी से पहली बार मिलने के बावजूद कोई झिझक नहीं थी , उनकी कविताएं मैं नियमित जो पढती हूं। इसलिए उनके साथ आत्‍मीयता से बातचीत करने और कुछ लोगों से मिलने जुलने में एकाध घंटे का समय व्‍यतीत हो गया और कार्यक्रम की शुरूआत भी हो गयी। कार्यक्रम के बारे में तो आप सबों को जानकारी मिल ही चुकी है , इसलिए अधिक लिखना व्‍यर्थ है , बस इतना ही कहूंगी कि ब्‍लॉगिंग से जुडे इस प्रकार के कार्यक्रम होते रहने चाहिए।


धीरे धीरे बहुत सारे ब्‍लोगर पहुंचते गए और हॉल खचाखच भर गया। समय की कमी के कारण सभी ब्‍लोगरों से जान पहचान का मौका नहीं मिल पाया , पर बहुतों से परिचय हुआ। कुछ ने मेरे लेखन को सराहा , कुछ ने मेरी टिप्‍पणियों को ।  पवन चंदन जी ने कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में बारिश नहीं होनवाली भविष्‍यवाणी के सही होने की चर्चा की , तो कनिष्‍क कश्‍यप जी खुद की शादी की सटीक भविष्‍यवाणी के लिए मुझे गिफ्ट भेजने की चर्चा की , गिफ्ट क्‍या होगा , इसे सरप्राइज ही रहने दिया। कई ब्‍लॉगर बंधु मुझसे अगली भविष्‍यवाणी के बारे में पूछते रहें , पाबला जी ने खासकर भूकम्‍प की मेरी अगली भविष्‍यवाणी के बारे में पूछा। गिरीश बिल्‍लौरे जी पूरी श्रद्घा के साथ मुझसे मिले।  भी जिन्‍हे पहचान पायी , उनसे बातचीत करती रही , हालांकि संजीव तिवारी जी जैसे कुछ ब्‍लोगरों को मुझसे निराशा ही मिली। संजीव तिवारी जी के ब्‍लॉग्‍स पढा जरूर करती हूं , यदा कदा टिप्‍पणियां भी देती हूं , पर व्‍यक्तिगत तौर पर संजीव तिवारी जी से मेरा कोई परिचय नहीं रहा। पूर्ण परिचय के बाद मैं सामान्‍य हो जाती हूं , पर जिससे परिचय नहीं हो , उनके समक्ष मेरा स्‍वभाव कुछ संकोची होता है , दूसरी बात कि एक विषय में अधिक ध्‍यान संकेन्‍प्‍द्रण और किसी भी घटना को ग्रह नक्षत्रों से जोडने की आदत के कारण मैं कभी कभी ग्रहों की दुनिया में भी खो जाती हूं। इसी में से कोई वजह रही होगी , जो मै संजीव तिवारी जी को प्रत्‍युत्‍तर नहीं दे सकी , अगली बार ख्‍याल रखूंगी।


विचारों में प्रबल विरोध रखनेवाले जाकिर अली रजनीश जी ने अभिवादन करते हुए हाल फिलहाल के दिनों में ब्‍लॉगिंग में मेरे कम सक्रियता की चर्चा की। मैने जबाब दिया कि जल्‍द ही उनसे तर्क वितर्क करने मैं उनके ब्‍लोगों पर हाजिरी लगाने वाली हूं। दिनेश राय द्विवेदी जी ज्‍योतिष पढ चुके हैं , पर उन्‍हें यह विषय अवैज्ञानिक लगता है , इसलिए उन्‍होने कहा कि वे जिस काम को करके छोड चुके हैं , मैं वही काम कर रही हूं। इसलिए वे मेरे विचारों से सहमति नहीं रखते। मैने उन्‍हें कहा कि आपको रास्‍ता नहीं मिला , आप भटक गए , ज्‍योतिष का अध्‍ययन छोड दिया। मुझे जबतक रास्‍ता मिल रहा है , मैं ज्‍योतिष का अध्‍ययन नहीं छोड सकती। 


एक व्‍यक्ति हर विषय में रूचि नहीं रख सकता , हर कार्य करने के लायक नहीं होता। मेरे पिताजी ने मात्र 27 वर्ष की उम्र में एम्‍बेसेडर कार ली थी। उस वक्‍त अधिकांश लोग खुद गाडी नहीं चलाया करते थे, ड्राइवर रखते थे , मेरे पिताजी ने भी रखा। बिजनेस के काम से अपनी गाडी से ही रांची , बोकारो जाया करते। ड्राइवर पर उन्‍हे पूरा विश्‍वास था , उसके भरोसे गाडी रहती । ड्राइवर ने इस विश्‍वास का नाजायज फायदा उठाया और पांच सात वर्ष के अंदर गाडी की हालत इतनी खराब कर दी कि गाडी उनके लिए एक बोझ हो गयी। बाद में घर मकान बनाने और बचचों की जबाबदेही में पैसों की आवश्‍यकता पडती तो वे सोंचते कि गाडी न लेकर उस वक्‍त कुछ पैसे बैंक में रख दिए होते तो अधिक काम आता। वे अपने मित्रों , बच्‍चों और अन्‍य लोगों को जल्‍द गाडी लेने की सलाह जल्‍द नहीं दिया करते हैं। इसी प्रकार हमारे एक रिश्‍तेदार हैं , जिन्‍होने अपनी दस बीस वर्ष की कमाई एक संपत्ति खरीदने में लगा दी , बाद में मालूम हुआ कि उस संपत्ति में बडा झंझट है , मानसिक शांति खोते हुए पांच वर्षों तक की कमाई से केस लडने के बाद भी जमीन का कुछ ही हिस्‍सा उन्‍हे मिल सका। उनका मानना है कि बैंक में पैसे जमा कर लो , पर अनजान जगह पर जमीन वगैरह मत खरीदो। कोई किसी खास व्‍यवसाय को गलत बताएगा , तो कोई किसी खास प्रोफेशन को , अपनी उन गल्तियों की चर्चा नहीं करते , जिससे उन्‍हें असफलता मिली है।


 वास्‍तविकता तो यह है कि कोई भी विषय बिना नींव का नहीं होता , उसमें गहराई तक जाने की आवश्‍यकता है। तैरना न जानने से छिछले पानी में लोग डूबकर मर जाते हैं , जबकि समुद्र में गहराई तक उतरनेवाले मोती प्राप्‍त करते हैं। कितने विषय और कितने प्रोफेशन को लोग छोड दिया करते हैं , जबकि उसमें मौजूद लाखो लोग ज्ञानार्जन और अच्‍छी कमाई कर रहे होते हैं। बहुत सारे लोग शेयर बाजार को जुआ का घर कहते हैं , जब‍कि दुनियाभर में सम्मान के साथ आज वारेन बफेट का नाम लिया जाता है. वे अकूत धन-संपदा के मालिक है और ये कमाई उन्होंने शुद्ध शेयर बाज़ार से की है. वे अब कई कम्पनियों के मालिक जरूर है किंतु पेशा अब भी निवेशक का ही है। इसलिए कोई भी विषय या प्रोफेशन बुरा नहीं होता , बस उसमें ईमानदारी से चलने की आवश्‍यकता होती है। इसलिए फिलहाल ज्‍योतिष का अध्‍ययन छोडने का मेरा कोई इरादा नहीं।