समस्या का समाधान कैसे करें ? - 4

 

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युगों-युगों से मनुष्‍य अपने समक्ष उपस्थित होनेवाली समस्याओं के कारणों की जानकारी और उसके समाधान के लिए चिंतन-मनन करता रहा है। मानव-मन के चिंतन मनन के फलस्वरुप ही नाना प्रकार के उपचारों के विवरण हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राकृतिक वनस्पतियों से ही सब प्रकार के रोगों का उपचार संभव है , उनकी पद्धति नेचरोपैथी कहलाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि जल ही जीवन है और इसके द्वारा ही सब प्रकार के रोगों का निदान संभव है। एक अलग वर्ग का मानना है कि विभिन्न प्रकार के योग और व्यायाम का भी मानव स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। 

कुछ ऋषि-मुनियों का मानना है कि वातावरण को स्वास्थ्यवर्द्धक बनाने में समय-समय पर होनेवाले यज्ञ हवन की भी बड़ी भूमिका होती है। सतत् विकास के क्रम में इसी प्रकार आयुर्वेद , होम्योपैथी , एक्यूपंक्चर , एक्यूप्रेशर , एलोपैथी की भी खोज हुई। फलित ज्योतिष मानता है कि मनुष्‍य के समक्ष उपस्थित होनेवाली शरीरिक , मानसिक या अन्य प्रकार की कमजोरी का मुख्य कारण उसके जन्मकाल के किसी कमजोर ग्रह का प्रभाव है और उस ग्रह के प्रभाव को मानव पर पड़ने से रोककर ही उस समस्या को दूर किया जा सकता है। इसी क्रम में विभिन्न धातुओं और रत्नों द्वारा या तरह तरह के पूजा पाठ के द्वारा ग्रहों के प्रभाव को कम कर रोगों का इलाज करने की परंपरा की शुरुआत हुई।

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पर इन सबसे अलग पिछले बीस वर्षों से `गत्यात्मक ज्योतिष` भी कमजोर ग्रहों से जातकों को बचाने के लिए प्रयत्नशील रहा है। `गत्यात्मक ज्योतिष` के अनुसार ग्रहों की तीन मुख्य स्थितियॉ होती हैं , जिसके कारण जातक के सामने शारीरिक , मानसिक , आर्थिक , पारिवारिक या अन्य किसी भी असामान्य परिस्थितियां उपस्थित होती हैं और उससे वह अच्‍छे या बुरे तौर पर प्रभावित हो सकता है ----

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सभी वक्री ग्रह कमजोर होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित कमजोर तथा निराशाजनक वातावरण प्रदान करते हैं , दुखद फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

2  सभी शीघ्री ग्रह मजबूत होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित मजबूती तथा उत्साहजनक वातावरण प्रदान करते हैं , सुखद फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

3  सभी सामान्य ग्रह महत्वपूर्ण होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित स्तर तथा कार्य करने का वातावरण प्रदान करते हैं , स्तरीय फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

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गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार ग्रहों के बुरे प्रभाव को परिवर्तित कर पाना यानि बुरे को अच्छे में तथा अच्छे को बुरे में बदल पाना कठिन ही नहीं असंभव है , किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए या अच्छे प्रभाव को और बढ़ा पाने के लिए निम्न सलाह दी जाती है --------------

1   जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह शीघ्री होते हैं , उन्हें लगभग जीवनभर सारे संदर्भों की सुख-सुविधा आसानी से प्राप्त होती है , जिसके कारण वे थोड़े लापरवाह स्वभाव के हो जाते हैं , अपनी पहचान बनाने की इच्छा नहीं रखते हैं , इस कारण मेहनत से दूर भागते हैं। इस स्वभाव को कम करने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी पहननी चाहिए , जो उस दिन बनी हो , जब अधिकांश ग्रह सामान्य या मंद गति के हो।

2  जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह सामान्य होते हैं , वे लगभग जीवनभर काफी महत्वाकांक्षी होते हैं , उन्हें अपनी पहचान बननने की दृढ़ इच्छा होती है , जिसके कारण ये सतत् प्रयत्नशील होते हैं , वैसे तो वर्तमान युग में ऐसे व्यक्तित्व का काफी महत्व है , किन्तु यदि ग्रह ऋणात्मक हो और फल प्राप्ति में कुछ विलम्ब की संभावना हो तो वे ऐसी अंगूठी पहनकर कुछ आराम कर सकते हैं , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।

3  जिन जातकों के अधिकांश ग्रह वक्री हों , उन्हें लगभग जीवनभर काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है , निरंतर निराशाजनक परिस्थितियों में जीने के कारण वे काफी कुंठित हो जाते हैं। इन परिस्थितियों को कुछ सहज बनाने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी दी जा सकती है , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।

ये अंगूठियॉ उस मुहूर्त्‍त में बनवायी जा सकती हैं , जब उन ग्रहों का शुभ प्रभाव पृथ्वी के उस स्थान पर पड़ रहा हो , जिस स्थान पर वह अंगूठी बनवायी जा रही हो। दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!

गत्यात्मक ज्योतिष में ग्रहों के प्रभाव को दूर करने से सम्बंधित उपायों के बारे में प्रकाशित पुस्तक को पढ़ने के लिए अमेज़ॉन के किंडल में  इस लिंक पर क्लिक करें !

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    समस्या का समाधान कैसे करें ? - 5

     

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    हम संगति के महत्व के बारे में हमेशा ही कुछ न कुछ पढ़ते आ रहें हैं। यहॉ तक कहा गया है -----` संगत से गुण होत हैं , संगत से गुण जात ´। गत्यात्मक ज्योतिष्‍ा भी संगति के महत्व को स्वीकार करता है। एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। 

    इस बात को एक उदाहरण की सहायता से अच्छी तरह समझाया जा सकता है। यदि एक बालक का जन्म अमावस्या के दिन हुआ हो , तो उन कमजोरियों के कारण , जिनका चंद्रमा स्वामी है ,बचपन में बालक का मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है और बच्चे का स्वभाव कुछ दब्बू किस्म का हो जाता है , उसकी इस स्थिति को ठीक करने के लिए बालक की संगति पर ध्यान देना होगा। 

    उसे उन बच्चों के साथ अधिकांश समय व्यतीत करना चाहिए , जिन बच्चों का जन्म पूर्णिमा के आसपास हुआ हो। उन बच्चों की उच्छृंखलता को देखकर उनके बाल मन का मनोवैज्ञानिक विकास भी कुछ अच्छा हो जाएगा। इसके विपरीत यदि उन्हें अमावस्या के निकट जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ ही रखा जाए तो बालक अधिक दब्बू किस्म का हो जाएगा। 

    इसी प्रकार अधिक उच्छृंखल बच्चों को अष्‍टमी के आसपास जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ रखकर उनके स्वभाव को संतुलित बनाया जा सकता है। इसी प्रकार व्‍यवसाय , विवाह या अन्‍य मामलों में अपने कमजोर ग्रहों के प्रभाव को कम करने या अपने कमजोर भावों की समस्‍याओं को कम करने के लिए सामनेवाले के यानि मित्रों या जीवनसाथी की जन्‍मकुंडली में उन ग्रहों या मुद्दों का मजबूत रहना अच्‍छा होता है।

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    इसके अलावे ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए हमारे धर्मशास्त्रों में हर तिथि पर्व पर स्नानादि के पश्चात् दान करने के बारे में बताया गया है।प्राचीनकाल से ही दान का अपना महत्व रहा है , परंतु दान किस प्रकार का किया जाना चाहिए , इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। दान के लिए शुद्ध द्रब्य का होना अनिवार्य है । दान के लिए सुपात्र वह व्यक्ति है , जो अनवरत किसी क्रियाकलाप में संलग्न होते हुए भी अभावग्रस्त है। 

    दुष्‍कर्म या पापकर्म करनेवाले या आलसी व्यक्ति को दान देना बहुत बड़ा पाप होता है । यदि दान के नाम पर आप ठगे जाते हैं , तो इसका पुण्य आपको नहीं मिलेगा। इसलिए दान का उचित फल प्राप्त करने के लिए आप दान करते या देते समय ध्यान रखें कि दान उस सुपात्र तक पहुंच सके , जहॉ इसका उचित उपयोग हो सके।ऐसे में आपको सर्वाधिक फल की प्राप्ति होगी।

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    साथ ही अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो , उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए। जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो अनाथाश्रम को दान करना चाहिए , खासकर 12 वर्ष से कम उम्र के अभावग्रस्त और जरुरतमंद बच्चों को दिए जानेवाले दान से उनका काफी भला होगा। जातक का बुध कमजोर हो तो उन्हें विद्यार्थियों को या किसी प्रकार के रिसर्च कार्य में लगे व्‍यक्ति को सहयोग देना चाहिए। जातक का मंगल कमजोर हो , तो उन्हें युवाओं की मदद और कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए। 

    जातक का शुक्र कमजोर हो तो उनके लिए कन्याओं के विवाह में सहयोग करना अच्छा रहेगा। सूर्य कमजोर हो तो प्राकृतिक आपदाओं में पड़नेवालों की मदद की जा सकती है। बृहस्पति कमजोर हो तो अपने माता पिता और गुरुजनों की सेवा से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शनि कमजोर हो तो वृद्धाश्रम को दान करें या अपने आसपास के जरुरतमंद अतिवृद्ध की जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करें। अगले लेख में पुन: इसके आगे का भाग पढें !! 

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    समस्या का समाधान कैसे करें ? - 6

     

    Colour astrology in hindi

    ज्योतिष में रंगों का महत्व - यह तथ्‍य सर्वविदित ही है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। जिन रंगों को वे अवशोषित करती हैं , वे हमें दिखाई नहीं देती , परंतु जिन रंगों को वे परावर्तित करती हैं , वे हमें दिखाई देती हैं। यदि ये नियम सही हैं तो चंद्र के द्वारा दूधिया सफेद , बुध के द्वारा हरे , मंगल के द्वारा लाल , शुक्र के द्वारा चमकीले सफेद , सूर्य के द्वारा तप्‍त लाल , बृहस्पति के द्वारा पीले और शनि के द्वारा काले रंग का परावर्तन भी एक सच्‍चाई होनी चाहिए।

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    पृथ्‍वी में हर वस्‍तु का अलग अलग रंग है , यानि ये भी अलग अलग रंगों को परावर्तित करती है । इस आधार पर सफेद रंग की वस्‍तुओं का चंद्र , हरे रंग की वस्‍तुओं का बुध , लाल रंग की वस्‍तुओं का मंगल , चमकीले सफेद रंग की वस्‍तुओं का शुक्र , तप्‍त लाल रंग की वस्‍तुओं का सूर्य , पीले रंग की वस्‍तुओं का बृहस्‍पति और काले रंग की वस्‍तुओं का श‍नि के साथ संबंध होने से इंकार नहीं किया जा सकता। शायद यही कारण है कि नवविवाहिता स्त्रियों को मंगल ग्रह के दुष्‍प्रभावों से बचाने के लिए लाल रंग को परावर्तित करने के लिए प्राय: लाल वस्त्र से सुशोभित करने तथा मॉग में लाल सिंदूर लगे की प्रथा है।

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    इसी कारण चंद्रमा के बुरे प्रभाव से बचने के लिए मोती , बुध के लिए पन्ना , मंगल के लिए मूंगा , शुक्र के लिए हीरा , सूर्य के लिए माणिक , बृहस्पति के लिए पुखराज और शनि के लिए नीलम पहनने की परंपरा समाज में बनायी गयी है। ये रत्न संबंधित ग्रहों की किरणों को उत्सर्जित कर देते हैं , जिसके कारण ये किरणें इन रत्नों के लिए तो प्रभावहीन होती ही हैं , साथ ही साथ इसको धारण करनेवालों के लिए भी प्रभावहीन बन जाती हैं। इसलिए रत्नों का प्रयोग सिर्फ बुरे ग्रहों के लिए ही किया जाना चाहिए , अच्छे ग्रहों के लिए नहीं। कभी-कभी पंडितों की समुचित जानकारी के अभाव के कारण ये रत्न जातक को अच्छे फल से भी वंचित कर देती है।

    ज्योतिष में रंगों का महत्व

    रंगों में अद्भूत प्रभाव होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि विभिन्न रंगों की बोतलों में रखा पानी सूर्य के प्रकाश में औषधि बन जाता है , जिसका उपयोग विभिन्न रोगों की चिकित्सा में किया जाता है। 'गत्यात्मक ज्योतिष' भी कमजोर ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए उससे संबंधित रंगों का अधिकाधिक प्रयोग करने की सलाह देता है। रत्न धारण के साथ साथ आप उसी रंग की प्रधानता के वस्त्र धारण कर सकते हैं । मकान के बाहरी दीवारों की पुताई करवा सकते हैं।

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    यदि व्यक्ति का जन्मकालीनचंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग का अधिक प्रयोग कर उन ग्रहों के प्रभाव को परावर्तित किया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे , मजबूत ग्रहों की किरणों का अधिकाधिक प्रभाव आपपर पड़े , इसके लिए उससे संबंधित रंगों का कम से कम प्रयोग होना चाहिए। इन रंगों की वस्तुओं का प्रयोग न कर आप दान करें , तो काफी फायदा हो सकता है। अगले लेख में पुन: इसके आगे का भाग पढें !!  

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      समस्या का समाधान कैसे करें ? - 7

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      ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के उपायों की जो श्रृंखला चल रही है , उसे अंधविश्‍वास न समझा जाए , क्‍यूंकि हमलोग ग्रंथों को सिर्फ पढते ही नहीं , उसके सिद्धांतों की पूर्ण तौर पर परख करके गलत को गलत और सही को सही साबित करने के बाद लिखा करते हैं। अब यह हमारी विवशता ही है कि बंदूक की गोली की तरह न तो ग्रहों के प्रभाव को देखा और दिखाया जा सकता है , फिर उसके प्रभाव को रोकने के लिए किए गए उपायों को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास कोई साधन कैसे हो सकता हैं ? पहले के छह भागों को पढने के लिए यहां क्लिक करें , अब उसका आगे का यानि सातवां भाग पढे ...

       Vanaspati Vigyan

      प्राचीनकाल से ही पेड़-पौधें का मानव विकास के साथ गहरा संबंध रहा है। भारतीय ज्योतिष में रत्नधारण की ही तरह विभिन्न वनस्पतियों की जड़ों को भी धारण करने की भी परंपरा है। सूर्य की शांति के लिए बेल की जड़ , चंद्र के लिए खिन्नी की जड़ , मंगल के लिए अनंतमूल की जड़ , बुध के लिए विधारा की जड़ , गुरु के लिए संतरे या केले की जड़ , शुक्र के लिए सरफाकों की जड़ तथा शनि की शांति के लिए बिच्छुए की जड़ धारण करने की बात ज्‍योतिष के प्राचीन ग्रंथों में लिखी है। साथ ही रंगों के अनुसार ही विभिन्न पेड़-पौधें की पूजा या विभिन्न देवी देवताओं पर पुष्‍प अर्पण करने का भी विधान है। इससे साबित होता है कि हमारे ऋषि मुनियों को ग्रहों के दुष्‍प्रभाव को दूर करने के लिए पेड़-पौधों की भूमिका का भी पता था। अन्‍य बातों की तरह ही जब गंभीरतापूर्वक काफी दिनों तक ग्रहों के प्रभाव को दूर करने में पेड पौधों की भूमिका का भी परीक्षण किया गया तो निम्न बातें दृष्टिगोचर हुई --------------

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      1. यदि जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो उन्हें तुलसी या अन्‍य छोटे-छोटे औषधीय पौधे अपने अहाते में लगाकर उसमें प्रतिदिन पानी देना चाहिए।

      2. यदि जातक का बुध कमजोर हो तो उसे बिना फल फूलवाले या छोटे छोटे हरे फलवाले पौधे लगाने से लाभ पहुंच सकता है।

      3. इसी प्रकार जातक का मंगल कमजोर हो तो उन्हें लाल फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने  से लाभ होगा।

      4. इसी प्रकार जातक का शुक्र कमजोर हो तो उन्हें सफेद फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

      5. इसी प्रकार जातक का सूर्य कमजोर हो तो उन्हें तप्‍त लाल रंग के फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

      6. इसी प्रकार जातक का बृहस्पति कमजोर हो तो उन्हें पीले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

      7. इसी प्रकार जातक का शनि कमजोर हो तो उन्हें बिना फल-फूल वाले या काले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

      ध्यान रहे , ये सभी छोटे-बड़े पेड़-पौधे पूरब की दिशा में लगे हुए हों , इसके अतिरिक्‍त ग्रह के बुरे प्रभाव से बचने के लिए पश्चिमोत्‍तर दिशा में भी कुछ बड़े पेड़ लगाए जा सकते हैं , किन्तु अन्य सभी दिशाओं में आप शौकिया तौर पर कोई भी पेड़ पौधे लगा सकते हैं।

      उपरोक्त समाधानों के द्वारा जहॉ ग्रहों के बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है , वहीं अच्छे प्रभावों को बढा़ पाने में भी सफलता मिल सकती है।

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        समस्या का समाधान कैसे करें ? - 8

          

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        एक सप्‍ताह से मैं अपनी अप्रकाशित पुस्‍तक 'गत्‍यात्‍मक झरोखे से ज्‍योतिष' के एक लेख 'ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है' के हिस्‍से को प्रतिदिन पोस्‍ट करती जा रही थी। आपलोगों के द्वारा समय समय पर किए जानेवाले प्रश्‍न के जबाब में यह लेख लिखा गया था, पर आलोचना के भय से मैं इसे प्रकाशित करना नहीं चाहती थी। पर एक सप्‍ताह से पिताजी की बोकारो में उपस्थिति से मैं उनके साथ ज्‍योतिष से ही जुडे कई प्रकार के विमर्श में व्‍यस्‍त थी , नया कुछ न लिख पाने के कारण मैने इस पुराने आलेख को ही प्रतिदिन ठेलती गयी। 

        आज वे रांची के लिए निकल चुके हैं , तो मैं यह सफाई देना चाहती हूं कि इन आलेखों में लिखे गए सारे तथ्‍य सटीक हैं और ये सारे परीक्षण हमारे द्वारा किए जा चुके हैं, इसलिए किसी के द्वारा कहे जाने पर आपलोगों को गुमराह होने की आवश्‍यकता नहीं। मैं ऐसा एक भी वाक्‍य नहीं लिखती , जिसे उस समय तार्किक ढंग से समझाया नहीं जा सके , जब सभी लोगों को 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की जानकारी हो जाए , जो कि हमारा लक्ष्‍य है। इस आठवीं कडी को मैं आज लिख रही हूं , जिसे अपनी पुस्‍तक में जोडना होगा।

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        आलेखों की इस शृंखला को पढने के बाद एक पाठक का प्रश्‍न है कि पुराने जमाने में तो हमलोगों के लिए ये कोई उपाय नहीं किए गए , फिर हमलोगों पर ग्रहों का बुरा प्रभाव नहीं पडा , आज इसकी जरूरत क्‍यूं पड गयी। अभी हाल फिलहाल में मेरे यहां आए एक डॉक्‍टर ने भी मुझसे यही प्रश्‍न पूछा था। मैने डॉक्‍टर से पूछा कि क्‍या कारण है कि आपलोग गर्भवती स्‍त्री को इतने विटामीन लिखा करते हैं , कल तक गांव में अत्‍यंत निर्धन महिलाओं को छोडकर शायद किसी को भी ऐसी आवश्‍यकता नहीं पडती थी। 

        उन्‍होने कहा कि हमारे रहन सहन में आए फर्क के कारण ऐसा हो रहा है। गांव में औरतें पर्याप्‍त मात्रा में साग सब्जियां खाया करती थी , परंपरागत खाने की थालियों के बाद शरीर में किसी और चीज की जरूरत नहीं रह जाती है। पर आज कुछ व्‍यस्‍तता की वजह से , तो कुछ ताजी सब्जियों की अनुप्‍लब्‍धता के कारण महिलाओं में इसकी कमी हो जाया करती है। अर्थ यही है कि प्रकृति से आप जितनी ही दूरी बनाए रखेंगे , आपको कृत्रिम उपायों की आवश्‍यकता उतनी ही पडेगी।

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        मैने उन्‍हें समझाया कि ऐसी ही बात हर क्षेत्र में हैं , मेरी पूरी शृंखला को पढनेवाले ने पाया होगा कि सबसे पहले मैने शुभ मुहूर्त्‍त में बननेवाले अंगूठी यानि गहने की चर्चा की है। मुरारी पारीक जी ने पूछा भी कि हम यह कैसे पता करें कि अंगूठी शुभ मुहूर्त्‍त में बनी है। सचमुच हर बात में ज्‍योतिषीयों से राय लेना काफी कठिन है। इसी के लिए परंपरा बनायी गयी थी। जब आपके घर में कोई शुभ कार्य आराम से हो रहा हो , तो समझ जाएं कि आपके लिए ग्रहों की शुभ स्थिति बनी है। 

        संतान का जन्‍म खुशी खुशी हुआ , बच्‍च पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ है यानि ग्रह मनोनुकूल हैं , आप जन्‍मोत्‍सव की तैयारी करते हैं। इस समय सुनार को बुलाया गया , उसे ऑर्डर दिया गया , आपके शुभ समय में सोने या चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक वस्‍तु बनायी गयी , जिसे आपके गले , हाथ या पैर में धारण करवा दिया गया।यही नहीं अन्‍य लोगों के द्वारा उपहार में मिले सामान भी इसी समय के बने होते हैं , बाद में ग्रह अच्‍छा हो या बुरा , बच्‍चे की मानसिक स्थिति पर अधिक प्रभाव नहीं पडता है।

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        इसी तरह बेटे या बेटी के विवाह के लिए योग्‍य पार्टनर नहीं मिल रहा है , कितने दिनों से ढूंढ ढूंढकर लोग परेशान हैं , अचानक एक उपयुक्‍त पार्टनर मिल जाता है। वैज्ञानिकों की भाषा में इसे संयोग कहते हैं , पर इसमें भी शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है। इस समय फिर से सुनार को बुलाया गया , उसे ऑर्डर दिया गया , आपके शुभ समय में सोने या चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक वस्‍तु बनायी गयी , जिसे वर और वधू दोनो के गले , हाथ या पैर में धारण करवा दिया जाता है। 

        अब यदि इनके ग्रह बुरे भी हों तो मानसिक शांति देने के लिए ये जेवर काफी होते थे। सुख और दुख तो जीवन के नियम हैं , लडकी की शादी हो गयी , पति नहीं कमाता है , कोई बात नहीं , पापाजी बेटी जैसा प्‍यार कर रहे हैं , नौकरी नहीं हो रही है , चलो कोई बात नहीं , पापा की दुकान पर ही बैठ जाया जाए , कुछ और काम कर लिया जाए। मतलब संतोष ही संतोष। और फिर समय हमेशा एक जैसा तो हो ही नहीं सकता , कल सबकुछ मन मुताबिक होना ही है।

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        पर आजकल आपका शुभ मुहूर्त्‍त चल रहा होता है तो आप गहने नहीं बनवाते , गहने खरीदकर ले आते हैं , वह गहना उस समय का बना हो सकता है , जब आपके ग्रह कमजोर चल रहे थे। उसे पहनकर बच्‍चा या वर वधू शांति से तभी तक रह पाते हैं , जबतक उनके ग्रह मजबूत चल रहे हों , जैसे ही उनका ग्रह कमजोर होता है , उनपर दुगुना बुरा प्रभाव पडता है , वे परेशान हो जाते हैं , दुख से लडने की उनकी शक्ति नहीं होती। 

        छोटी छोटी समस्‍याओं से जूझना नहीं चाहते , असंतोष उनपर हावी हो जाता है। पति कमा रहा है तो सास ससुर के साथ क्‍यूं रहना पड रहा है , ट्रांसफर करवा लो , ट्रांसफर हो गया , तो मुझे नौकरी नहीं करने दे रहा , नौकरी भी करने दी , तो हमारे घूमने फिरने के दिन हैं , ये फ्लैट खरीद रहा है यानि हर बात में परेशानी। कैरियर में युवकों को ऐसी ही परेशानी है , इस तरह पति को वैसा ही असंतोष , किसी को किसी से संतुष्टि नहीं। 

        इसी प्रकार जब आपका बुरा समय चल रहा होता है और आप एक ज्‍योतिषी के कहने पर अंगूठी बनवाकर पहनते हैं , तो आप अपने कष्‍ट को दुगुनी कर लेते हैं, इसलिए कभी भी बुरे वक्‍त में नई अंगूठी बनवाने की कोशिश न करें। कल से दूसरे उपायों यानि संगति , दान , रंगों और पेड पौधों की वैज्ञानिकता पर बात की जाएगी !! 

        अपने अशुभ ग्रहों के प्रभाव को घटाने और शुभ ग्रहों के प्रभाव को बढ़ाने के उपाय के लिए 8292466723 ,  gatyatmakjytishapp@gmail.com पर संपर्क करें !
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