क्या ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास? इस ब्लॉग में आप ज्योतिष के आधुनिक सूत्रों से सम्बद्ध नवीन ज्योतिषीय सिद्धांत के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे, जो ज्योतिष की सटीकता पर शोध, ज्योतिष में नए शोध और निष्कर्ष के उपरांत विकसित किया गया है, नए ज्योतिष सूत्रों के माध्यम से कुंडली विश्लेषण, इन ज्योतिष के नए नियमों से भविष्यवाणी कैसे करें, 'ज्योतिष सीखने के लिए नए सूत्र और विधियाँ बताई गयी हैं।
समस्या का समाधान कैसे करें ? -1
आज जब हमें सभी जीव-जंतुओं की विशेषताओं का ज्ञान हो चुका है , हम उनकी बनावट को बिल्कुल सहज ढंग से लेते हैं । कौए या चिड़ियां को उड़ते हुए देखकर हम बकरी या गाय को उड़ाने की भूल नहीं करतें। बकरी या गाय को दूध देते देखकर अन्य जीवों से यही आशा नहीं करते। बकरे से कुत्ते जैसी स्वामिभक्ति की उम्मीद नहीं करतें। घोड़े की तेज गति को देखकर बैल को तेज नहीं दौड़ाते। जलीय जीवों को तैरते देखकर अन्य जीवों को पानी में नहीं डालते। हाथी ,गधे और उंट की तरह अन्य जीवों का उपयोग बोझ ढोने के लिए नहीं करते।
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
समस्या का समाधान कैसे करें ? -2
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जीव-जंतुओं के अतिरिक्त हमारे पूर्वजों ने पेड-पौधों का बारीकी से निरिक्षण किया। पेड़-पौधे की बनावट , उनके जीवनकाल और उसके विभिन्न अंगों की विशेषताओं का जैसे ही उसे अहसास हुआ, उन्होने जंगलो का उपयोग आरंभ किया। हर युग में वनस्पति-शास्त्र वनस्पति से जुड़े तथ्यो का खुलासा करता रहा ,जिसके अनुसार ही हमारे पूर्वजों ने उनका उपयोग करना सीखा। फल देनेवाले बड़े वृक्षों के लिए बगीचे लगाए जाने लगे। सब्जी देनेवाले पौधों को मौसम के अनुसार बारी-बारी से खाली जमीन पर लगाया जाने लगा। इमली जैसे खट्टे फलों का स्वाद बढ़ानेवाले व्यंजनों में इस्तेमाल होने लगा। मजबूत तने वाली लकड़ी फर्नीचर बनाने में उपयोगी रही। पुष्पों का प्रयोग इत्र बनाने में किया जाने लगा। कॉटेदार पौधें का उपयोग बाड़ लगाने में होने लगा। ईख के मीठे तनों से मीठास पायी जाने लगी। कडवे फलों का उपयोग बीमारी के इलाज में किया जाने लगा।
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इसी तरह भूगर्भ में बिखरी धातुएं भी मानव की नजर से छुपी नहीं रहीं। प्रारंभ में लौह-अयस्क, ताम्र-अयस्क और सोने-चॉदी जैसे अयस्को को गलाकर शुद्ध रुप प्राप्त कर उनका उपयोग किया गया । भिन्न भिन्न धातुओं की प्रकृति के अनुरूप उनका उपयोग भिन्न भिन्न प्रकार के गहने और बर्तनों को बनाने में किया गया। फिर क्रमश: कई धातुओं को मिलाकर या कृत्रिम धातुओं को बनाकर उनका उपयोग भी किया जाने लगा। भूगर्भ के रहस्यों का खुलासा करने के लिए वैज्ञानिकों के द्वारा कितने साधन भी बनाए जा चुके , ध्येय भूगर्भ के आंतरिक संरचना की पहचान करना है, उसमें किसी प्रकार के बदलाव की कल्पना भी वैज्ञानिकों द्वारा नहीं की जा सकती ।
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इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति में तरह-तरह के जीव-जंतु , पेड़-पौधे और खनिज-भंडार भरे पड़े हैं। गुण और स्वभाव की दृष्टि से देखा जाए , तो कुदरत की हर वस्तु का अलग-अलग महत्व है। बड़े फलदार वृक्ष दस-बीस वर्षों तक अच्छी तरह देखभाल करने के बाद ही फल देने लायक होते हैं। कुछ फलदार वृक्ष दो-तीन वर्षों में ही फल देना आरंभ कर देते हैं। सब्जियों के पौधे दो-चार माह में ही पूंजी और मेहनत दोनों को वापस लौटा देते हैं। फर्नीचर बनाने वाले पौधों में फल नहीं होता , इनकी लकड़ी ही काम लायक होती है। वर्षों बाद ही इन वृक्षों से लाभ हो पाता है। यदि हमें समुचित जानकारी नहीं हो और टमाटर के पौधों को चार-पॉच महीने बाद ही फल देते देखकर उपेक्षित दृष्टि से आम के पेड़ को देखें या आम के सुंदर पेड को देखकर बबूल को खरी-खोटी सुनाएं , तो यह हमारी भूल होगी।
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आर्थिक दृष्टि से देखा जाए , तो कभी लोहे का महत्व अधिक होता है , तो कभी सोने का , कभी पेट्रोलियम का महत्व अधिक होता है , तो कभी अभ्रख का। कभी घोड़े-हाथी राजा-महाराजाओं द्वारा पाले जाते थे , जबकि आज घोडे हाथी दर दर की ठोकरें खा रहे हैं और चुने हुए नस्लों के कुत्तों का प्रचलन अच्छे घरानों में है। कभी आम के पेड़ से अधिक पैसे मिलते थे , कभी शीशम से और आज टीक के पेड़ विशेष महत्व पा रहे हैं। युग की दृष्टि से किसी वस्तु का विशेष महत्व हो जाने से हम पाय: उसी वस्तु की आकांक्षा कर बैठते हैं , तो क्या अन्य वस्तुओं को लुप्त होने दिया जाए। आज टीक सर्वाधिक पैसे देनेवाला पेड़ बन गया है , तो क्या आम का महत्व कम है ? आखिर आम का स्वाद तो आम का पेड़ ही तो दे सकता है। वर्षों से उपेक्षित पड़े देश पेट्रोलियम के निर्यात करने के क्रम में आज भले ही विश्व के अमीर देशों में शामिल हो गए हों , पर अन्य वस्तुओं के लिए उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना ही पड़ता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !
गत्यात्मक ज्योतिष में ग्रहों के प्रभाव को दूर करने से सम्बंधित उपायों के बारे में प्रकाशित पुस्तक को पढ़ने के लिए अमेज़ॉन के किंडल में इस लिंक पर क्लिक करें !
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समस्या का समाधान कैसे करें ? -3
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फिर हमारे पूर्वजों की नजरें आसमान तक भी पहुंच ही गयी। अगणित तारें, चंद्रमा, सूर्य , राशि ,नक्षत्र ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,भला इनके शोध क्षेत्र में कैसे शामिल न होते। ब्रह्मांड के रहस्यों का खुलासा करने में मानव को असाधारण सफलता भी मिली और इन प्राकृतिक नियमों के अनुसार उन्होने अपने कार्यक्रमों को निर्धारित भी किया। पृथ्वी अपनी घूर्णन 24 घंटे में पूरी करती है इस कारण 24 घंटे की घड़ी बनायी गयी। चंद्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करने में 28 दिन लगते हैं इसलिए चंद्रमास 28 दिनों का निश्चित किया गया। 365 दिनों में पृथ्वी अपने परिभ्रमण-पथ पर पूरी घूम जाती है , इसलिए 365 दिनों के एक वर्ष का कैलेण्डर बनाया गया। 6 घंटे के अंतर को हर चौथे वर्ष लीप ईयर मनाकर समायोजित किया गया।
दिन और रात , पूर्णिमा और अमावस्या , मौसम परिवर्तन ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सब प्रकृति के नियमों के अनुसार होते हैं इसकी जानकारी से न सिर्फ समय पर फसलों के उत्पादन में ही , वरन् हमें अपना बचाव करने में भी काफी सुविधा होती है। अधिक गर्मी पड़नेवाले स्थानों में ग्रीष्मऋतु में प्रात: विद्यालय चलाकर या गर्मियों की लम्बी छुटि्टयॉ देकर चिलचिलाती लू से बच्चों का बचाव किया जाता है। बरसात के दिनों में बाढ की वजह से रास्ता बंद हो जानेवाले स्थानों में बरसात में छुटि्टयॉ दे दी जाती हैं ।
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ग्रह-नक्षत्रों की किसी खास स्थिति में पृथ्वी के जड़-चेतनों पर पड़नेवाले खास प्रभाव को महसूस करने के बाद ही `फलित ज्योतिष´ जैसे विषय का विकास किया गया होगा। परंतु शायद कुछ प्रामाणिक नियमों के न बन पाने से , भविष्यवाणियों के सटीक न हो पाने से या वैज्ञानिक सोंच रखनेवालों का ज्योतिष के प्रति दुराग्रह के कारण ही आधुनिक वैज्ञानिक युग में ज्योतिष का अच्छा विकास नहीं हो पाया। किन्तु वर्षों की साधना के बाद हम `गत्यात्मक ज्योतिष´ द्वारा सटीक भविष्यवाणियॉ करने में सफल हो रहे हैं। हमने पाया है कि विभिन्न जंतुओं और पेड़-पौधों में यह बात होती है कि उनके बीज से ही उन्हीं के गुण और स्वभाव वाले पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं का जन्म होता है , पर मनुष्य के बच्चे शारीरिक और आंतरिक संरचना में भले ही अपने माता-पिता से मिलते जुलते हों , परंतु उनकी मन और बुद्धि के काम करने के ढंग में विभिन्नता होती है।
जन्म के समय ही हर बच्चे में समानता नहीं देखी जाती है। कोई शरीर से मजबूत होता है , तो कोई कमजोर। किसी में रोग-प्रतिरोधक-क्षमता की प्रचुरता होती है , तो किसी में इसकी अल्पता। कोई दिमाग से तेज होते हैं , तो कोई कमजोर। पालन-पोषण के समय में भी बच्चे का वातावरण भिन्न-भिन्न होता है। बहुत बच्चों को भरपूर प्यार मिल पाता है ,जिससे उनका मनोवैज्ञानिक विकास अच्छी तरह हो पाता है। पूरे जीवन वे मनमौजी और चंचल हो जाते है , अपनी इच्छा पूरी करने में बेसब्री का परिचय देते है। अपनी बातें बेबाक ढंग से रख पाने में सफल होते है।
बहुत बच्चे प्यार की कमी महसूस करते हैं , जिससे इनका मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है। पूरी जिंदगी वे अपनी इच्छाओं को दबाने की प्रवृत्ति रखते हैं। उनके जन्मकालीन ग्रहों के प्रभाव से ही पूरी जिंदगी उनके सामने अलग-अलग तरह की परिस्थितियॉ आती हैं। जन्मकालीन ग्रहों के प्रभाव से ही किसी की रुचि व्यवसाय में , किसी की पढ़ाई में , किसी की कला में और किसी की राजनीति में होती है। किसी का ध्यान अपने शरीर को मजबूती प्रदान करने का होता है , तो किसी का कोष को बढ़ाने का , किसी का ध्यान संपत्ति की स्थिति को मजबूत बनाने का होता है , तो किसी का ध्यान अपनी घर गृहस्थी और संतान को मजबूती देने का।
ग्रहों के कारण आनेवाली कई समस्याओं के निराकरण कर पाने की दिशा में भी हमने काफी प्रयास किया है , हालॉकि विपरीत परिस्थितियों को पूर्ण रुप से सुधार न पाने का हमें अफसोस भी बना रहता है। लेकिन हम यह सोंचकर संतुष्ट हो जाते हैं कि प्रकृति के नियमों को बदल पाना इतना आसान नहीं । हो सकता है कुछ वर्षों में प्रकृति के किसी अन्य रहस्य को समझने के बाद हम बुरे ग्रहों के प्रभाव से पूर्णतया मुक्त हो सकें। पर अभी भी इस रहस्य का खुलासा कि अमुक ग्रह स्थिति में जन्म लेनेवालों की जीवन-यात्रा अमुक ढंग की होगी , निस्संदेह आज की बहुत बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है।
जिन्होनें भी इस धरती पर जन्म ले लिया है या लेनेवाले हैं ,उन्हें तो गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार उपस्थित होनेवाली परिस्थितियों के अनुसार जीवन जीना ही होगा ,परंतु यदि उन्हें अपने जीवन में आनेवाले सुखों और दुखों का पहले से ही अनुमान हो जाए तो वे तदनुरुप अपने कार्यक्रम बना सकते हैं । आनेवाले हर वर्ष या महीने के ग्रह स्थिति को जानकर अपने कार्य को अंजाम दे सकते हैं। यदि ग्रहो की स्थिति उनके पक्ष में हो तो वे हर प्रकार के कार्य को अंजाम देंगे।
यदि ग्रहों की स्थिति उनके पक्ष में नहीं हो तो वे किसी प्रकार का रिस्क नहीं लेंगे। इस प्रकार वे अपने जीवनग्राफ के अच्छे समय के समुचित उपयोग द्वारा विशेष सफलता हासिल कर सकते हैं , जबकि बुरे समय में वे प्रतिरोधात्मक ढंग से जीवन व्यतीत कर सकते हैं । भविष्य में उत्पन्न होनेवाले बच्चों के लिए गत्यात्मक ज्योतिष वरदान हो सकता है। क्यूंकि विशेष मुहूर्तों में बच्चे को जन्म देकर उसकी जीवन-यात्रा को काफी महत्वपूर्ण तो बनाया ही जा सकता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!
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समस्या का समाधान कैसे करें ? - 4
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युगों-युगों से मनुष्य अपने समक्ष उपस्थित होनेवाली समस्याओं के कारणों की जानकारी और उसके समाधान के लिए चिंतन-मनन करता रहा है। मानव-मन के चिंतन मनन के फलस्वरुप ही नाना प्रकार के उपचारों के विवरण हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राकृतिक वनस्पतियों से ही सब प्रकार के रोगों का उपचार संभव है , उनकी पद्धति नेचरोपैथी कहलाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि जल ही जीवन है और इसके द्वारा ही सब प्रकार के रोगों का निदान संभव है। एक अलग वर्ग का मानना है कि विभिन्न प्रकार के योग और व्यायाम का भी मानव स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
कुछ ऋषि-मुनियों का मानना है कि वातावरण को स्वास्थ्यवर्द्धक बनाने में समय-समय पर होनेवाले यज्ञ हवन की भी बड़ी भूमिका होती है। सतत् विकास के क्रम में इसी प्रकार आयुर्वेद , होम्योपैथी , एक्यूपंक्चर , एक्यूप्रेशर , एलोपैथी की भी खोज हुई। फलित ज्योतिष मानता है कि मनुष्य के समक्ष उपस्थित होनेवाली शरीरिक , मानसिक या अन्य प्रकार की कमजोरी का मुख्य कारण उसके जन्मकाल के किसी कमजोर ग्रह का प्रभाव है और उस ग्रह के प्रभाव को मानव पर पड़ने से रोककर ही उस समस्या को दूर किया जा सकता है। इसी क्रम में विभिन्न धातुओं और रत्नों द्वारा या तरह तरह के पूजा पाठ के द्वारा ग्रहों के प्रभाव को कम कर रोगों का इलाज करने की परंपरा की शुरुआत हुई।
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पर इन सबसे अलग पिछले बीस वर्षों से `गत्यात्मक ज्योतिष` भी कमजोर ग्रहों से जातकों को बचाने के लिए प्रयत्नशील रहा है। `गत्यात्मक ज्योतिष` के अनुसार ग्रहों की तीन मुख्य स्थितियॉ होती हैं , जिसके कारण जातक के सामने शारीरिक , मानसिक , आर्थिक , पारिवारिक या अन्य किसी भी असामान्य परिस्थितियां उपस्थित होती हैं और उससे वह अच्छे या बुरे तौर पर प्रभावित हो सकता है ----
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1 जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह शीघ्री होते हैं , उन्हें लगभग जीवनभर सारे संदर्भों की सुख-सुविधा आसानी से प्राप्त होती है , जिसके कारण वे थोड़े लापरवाह स्वभाव के हो जाते हैं , अपनी पहचान बनाने की इच्छा नहीं रखते हैं , इस कारण मेहनत से दूर भागते हैं। इस स्वभाव को कम करने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी पहननी चाहिए , जो उस दिन बनी हो , जब अधिकांश ग्रह सामान्य या मंद गति के हो।
2 जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह सामान्य होते हैं , वे लगभग जीवनभर काफी महत्वाकांक्षी होते हैं , उन्हें अपनी पहचान बननने की दृढ़ इच्छा होती है , जिसके कारण ये सतत् प्रयत्नशील होते हैं , वैसे तो वर्तमान युग में ऐसे व्यक्तित्व का काफी महत्व है , किन्तु यदि ग्रह ऋणात्मक हो और फल प्राप्ति में कुछ विलम्ब की संभावना हो तो वे ऐसी अंगूठी पहनकर कुछ आराम कर सकते हैं , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।
3 जिन जातकों के अधिकांश ग्रह वक्री हों , उन्हें लगभग जीवनभर काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है , निरंतर निराशाजनक परिस्थितियों में जीने के कारण वे काफी कुंठित हो जाते हैं। इन परिस्थितियों को कुछ सहज बनाने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी दी जा सकती है , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।
ये अंगूठियॉ उस मुहूर्त्त में बनवायी जा सकती हैं , जब उन ग्रहों का शुभ प्रभाव पृथ्वी के उस स्थान पर पड़ रहा हो , जिस स्थान पर वह अंगूठी बनवायी जा रही हो। दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!
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समस्या का समाधान कैसे करें ? - 5
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हम संगति के महत्व के बारे में हमेशा ही कुछ न कुछ पढ़ते आ रहें हैं। यहॉ तक कहा गया है -----` संगत से गुण होत हैं , संगत से गुण जात ´। गत्यात्मक ज्योतिष्ा भी संगति के महत्व को स्वीकार करता है। एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो।
इस बात को एक उदाहरण की सहायता से अच्छी तरह समझाया जा सकता है। यदि एक बालक का जन्म अमावस्या के दिन हुआ हो , तो उन कमजोरियों के कारण , जिनका चंद्रमा स्वामी है ,बचपन में बालक का मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है और बच्चे का स्वभाव कुछ दब्बू किस्म का हो जाता है , उसकी इस स्थिति को ठीक करने के लिए बालक की संगति पर ध्यान देना होगा।
उसे उन बच्चों के साथ अधिकांश समय व्यतीत करना चाहिए , जिन बच्चों का जन्म पूर्णिमा के आसपास हुआ हो। उन बच्चों की उच्छृंखलता को देखकर उनके बाल मन का मनोवैज्ञानिक विकास भी कुछ अच्छा हो जाएगा। इसके विपरीत यदि उन्हें अमावस्या के निकट जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ ही रखा जाए तो बालक अधिक दब्बू किस्म का हो जाएगा।
इसी प्रकार अधिक उच्छृंखल बच्चों को अष्टमी के आसपास जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ रखकर उनके स्वभाव को संतुलित बनाया जा सकता है। इसी प्रकार व्यवसाय , विवाह या अन्य मामलों में अपने कमजोर ग्रहों के प्रभाव को कम करने या अपने कमजोर भावों की समस्याओं को कम करने के लिए सामनेवाले के यानि मित्रों या जीवनसाथी की जन्मकुंडली में उन ग्रहों या मुद्दों का मजबूत रहना अच्छा होता है।
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इसके अलावे ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए हमारे धर्मशास्त्रों में हर तिथि पर्व पर स्नानादि के पश्चात् दान करने के बारे में बताया गया है।प्राचीनकाल से ही दान का अपना महत्व रहा है , परंतु दान किस प्रकार का किया जाना चाहिए , इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। दान के लिए शुद्ध द्रब्य का होना अनिवार्य है । दान के लिए सुपात्र वह व्यक्ति है , जो अनवरत किसी क्रियाकलाप में संलग्न होते हुए भी अभावग्रस्त है।
दुष्कर्म या पापकर्म करनेवाले या आलसी व्यक्ति को दान देना बहुत बड़ा पाप होता है । यदि दान के नाम पर आप ठगे जाते हैं , तो इसका पुण्य आपको नहीं मिलेगा। इसलिए दान का उचित फल प्राप्त करने के लिए आप दान करते या देते समय ध्यान रखें कि दान उस सुपात्र तक पहुंच सके , जहॉ इसका उचित उपयोग हो सके।ऐसे में आपको सर्वाधिक फल की प्राप्ति होगी।
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साथ ही अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो , उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए। जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो अनाथाश्रम को दान करना चाहिए , खासकर 12 वर्ष से कम उम्र के अभावग्रस्त और जरुरतमंद बच्चों को दिए जानेवाले दान से उनका काफी भला होगा। जातक का बुध कमजोर हो तो उन्हें विद्यार्थियों को या किसी प्रकार के रिसर्च कार्य में लगे व्यक्ति को सहयोग देना चाहिए। जातक का मंगल कमजोर हो , तो उन्हें युवाओं की मदद और कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए।
जातक का शुक्र कमजोर हो तो उनके लिए कन्याओं के विवाह में सहयोग करना अच्छा रहेगा। सूर्य कमजोर हो तो प्राकृतिक आपदाओं में पड़नेवालों की मदद की जा सकती है। बृहस्पति कमजोर हो तो अपने माता पिता और गुरुजनों की सेवा से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शनि कमजोर हो तो वृद्धाश्रम को दान करें या अपने आसपास के जरुरतमंद अतिवृद्ध की जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करें। अगले लेख में पुन: इसके आगे का भाग पढें !!
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