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Wednesday, 28 October 2009

कुछ दूर से लौटकर दरवाजे का लॉक क्‍या आप भी चेक करते हैं ??

जब आप अपने घर का ताला लगाकर कहीं बाहर जाते हैं , थोडी ही देर में आपको इस बात का संशय होता है कि आपने दरवाजे का ताला अच्‍छी तरह बंद नहीं किया है। थोडी दूर जाने के बाद भी आप इस बात के प्रति आश्‍वस्‍त होने के लिए घर लौटते हैं और जब चेक करते हैं , तो पता चलता है कि यह बेवजह का संशय था। कभी भी आपसे गलती नहीं हुई होती है , फिर भी आप कभी निश्चिंत नहीं रह पाते हैं , बार बार इसी तरह का मौका आता रहता है। मनोचिकित्‍सक बताते हैं कि यहीं से आपका मानसिक तौर पर अस्‍वस्‍थ होने की शुरूआत हो जाती है। पर क्‍या यह सच है ?

 वैसे तो हमारे शरीर के सारे अंग मस्तिष्‍क के निर्देशानुसार काम करते हैं , पर मैने अपने अनुभव में पाया है कि यदि शरीर का कोई अंग लगातार एक काम के बाद दूसरा काम करते जाए तो उसका अंग वैसा करने को अभ्‍यस्‍त हो जाता है। ऐसी हालत में कुछ दिनों में बिना दिमाग की सहायता के स्‍वयमेव वह एक काम के बाद दूसरा काम करने लगता है , जब मस्तिष्‍क की जरूरत हो तभी उसे पुकारता है , जिस प्रकार एक नौकर मेहनत का हर काम क्रम से कर सकता है , पर जहां दिमाग लगाने की बारी आती है , तो मालिक को पुकार लिया करता है।

इस बात को मैं एक उदाहरण की सहायता से स्‍पष्‍ट कर रही हूं। मैं अक्‍सर रसोई घर में काम करते करते अपने चिंतन में खो जाया करती हूं। पर इसके कारण आजतक कभी दिक्‍कत आते मैने नहीं महसूस किया जैसे कि चाय में नमक हल्‍दी पड गयी या सब्‍जी में चीनी पत्‍ती। सब्‍जी , दाल या चाय बनाने के वक्‍त मैं कहीं भी खोयी रहूं , हाथ में अपने आप तद्नुसार नमक , हल्‍दी , चीनी या चायपत्‍ती का डब्‍बा आ जाता है , पर इन्‍हें डालने के वक्‍त मेरा मस्तिष्‍क वापस आता है , क्‍यूंकि सबकुछ अंदाज से डालना आवश्‍यक है। यहां तक कि जिस बर्तन में मैं अक्‍सर चाय बनाती हूं , उसमें यदि किसी दूसरे उद्देश्‍य के लिए पानी गरम करने का विचार आ जाए तो उसे गैस पर रखने के बाद चाय बनाने के क्रम में पानी मापने के लिए रखा एक गिलास स्‍वयं हाथ में आ जाता है। तब ध्‍यान जाता है कि आज पानी मापना थोडे ही है , अंदाज से डालना है।

मैने एक अविकसित मस्तिष्‍क की लडकी को भी देखा है , जो घर का सारा काम कर लेती है। चूंकि वह स्‍कूल नहीं जाती थी , उसकी मम्‍मी उससे एक के बाद दूसरा काम करवाती रहीं और वह बिना दिमाग के भी उन कामों को करने की अभ्‍यस्‍त हो गयी है। झाडू लगाने , पोछा करने , बरतन धोने और कपडे धोने में उसे कोई दिक्‍कत नहीं , लेकिन जब किसी चीज का अंदाज करना हो तो वह नहीं कर पाती और उसके लिए अपनी मम्‍मी पर आश्रित रहती है। मुझे उसके काम को देखकर अक्‍सर ताज्‍जुब होता रहता है ।

जब हमलोग बाहर निकलते हैं , तो हमारा मुख्‍य ध्‍यान हमारे बाहर के कार्यक्रम पर होता है । कमरे का ताला बंद करते करते हमारा हाथ उसका अभ्‍यस्‍त हो चुका है , इसलिए बिना मस्तिष्‍क की सहायता से वह ताला बंद कर लेता है और हम आगे बढ जाते हैं। थोडी दूर जाने के बाद जब हम अपने चिंतन से बाहर निकलते हैं तो हम घर के दरवाजे पर ताले के बंद होने के प्रति आश्‍वस्‍त नहीं रह पाते , क्‍यूंकि हमारे मस्तिष्‍क को यह बात बिल्‍कुल याद नहीं। हम पुन: लौटकर आश्‍वस्‍त होना चाहते हैं कि ताला अच्‍छी तरह बंद है या नहीं ? इसलिए मेरे ख्‍याल से एक बार ऐसा करना एक मानसिक बीमारी नहीं , बिल्‍कुल सामान्‍य बात है। अब बार बार भी लोग ऐसा करते हों तो इसके बारे में मनोवैज्ञानिकों का कहना माना जा सकता है ।

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25 comments:

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

एक रोचक मुद्दा उठाया संगीता जी आपने ! मेरे हिसाब से इसमें तीन बाते है :
१. इंसान की सजगता (अगर वह पहले से ही सजग है तो उसे दोबारा चेक करने आने की जरुरत ही नहीं )
२.मन की एकाग्रता ( ध्यान कही और हो तो ....)
३.मानसिक बीमारी ( बहुत से ऐसे भी लोग है जो ताला लगाने के बाद उसे खींच कर देखते है और फिर दोबारा लौट कर भी आते है चेक करने )

M VERMA said...

अच्छा विश्लेषण किया है आपने.
अवचेतन मष्तिष्क की परते खोलती

अनिल कान्त said...

शुक्रिया इस लेख को लिखने का...मेरा थोडा बहुत संशय दूर हुआ :)
आपका आभारी हूँ

mehek said...

rozmarra ki baat magar bahut sahi mdda uthaya hai,aksar tho nahi magar kabhi kabar hum bhi lautke aate hai tala chack karne:).bahut badhiya lekh aur vishleshan raha.

ab inconvenienti said...

ओब्सेसिव कम्पल्सिव डिसआर्डर

http://familydoctor.org/online/famdocen/home/common/mentalhealth/anxiety/133.html

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर बात बताई आप ने, वेसे हमारे साथ कभी ऎसा हुआ नही, लेकिन आप की पोस्ट से बहुत कुछ ग्याण मिला.धन्यवाद

योगेन्द्र मौदगिल said...

शुक्र है.............

Murari Pareek said...

बहुत ही सही बात बतायी पर मैं ताला मरने के बाद भूल ही जाता हूँ की ताला चेक भी करना है !

P.N. Subramanian said...

विवेचना अच्छी लगी.आभार.

Gyan Dutt Pandey said...

यह तो एक प्रकार का फोबिया है!

निर्मला कपिला said...

ांसल मे हम जाने की जल्दी मे या किसी और समस्या मे उलझे होते हैं ताला बंद करने के कुछ देर बाद याद आता है तो फिर से उसे देख लेने मे बिमारी कैसी। ये तो आम सी बात है बहुत अच्छा विश्लेशन किया है आभार्

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

Bahut hi achcha topic uthaya hai aapne.......... mere saath aisa bahut hota hai... shayad isey Obsessive Compulsive Disorder (O.C.D.) kahte hain....

एक स्वतन्त्र नागरिक said...

there are some person who have so many engagements in their mind and execute them simultaneously and they do'nt as well as cant be sure about their actions such as locking the door, switching off the fan, closing the water tap etc. and this is not any disorder but just there being over cautios.

but there are many persons who suffer from a mental disorder called OCD or obcessive compulsive disorder who always check there actions many times and everytime they feel insecure about their action such as weather they have locked the door, switched off the gas, closed the letter before despatch etc or not.

the difference can be known by judging the other actions, personality and the behaviour of the person concerned.

Arvind Mishra said...

ओब्सेसिव कम्पल्सिव डिसआर्डर
अरे हाँ संगीता जी मेरे साथ तो ऐसा होता है !

विवेक रस्तोगी said...

वाकई ये एक ऐसा मुद्दा है जिसे सभी लोग बहुत हल्के में लेते हैं, जैसे कई बार मेरे साथ होता है कि मैं ऑफ़िस जाते वक्त गीजर को जरुर चेक करता हूँ कि कहीं स्विच ऑन तो नहीं है, भ्रम हो सकता है परंतु नहाने के बाद कई बार स्विच ऑन रह जाता है। इसलिये सावधानीवश मैं बिल्कुल चेक करता हूँ। अब पता नहीं कि ये भी किसी बीमारी में शामिल होता है या सावधानी में।

विनोद कुमार पांडेय said...

बहुत से लोग ऐसा करते है की कहीं भूल से खुला तो नही छोड़ा आया...हो सकता है यह एक बीमारी हो..बढ़िया चर्चा

मनोज कुमार said...

यथार्थ लेखन।

दीपक 'मशाल' said...

Bahut hi achchchi post likhi aapne aaj...
Sadhuvaad aapko

Jai Hind

Unknown said...

संगीता जी,आपकी यह पोस्ट अच्छी लगी,जिस बात का आपने वर्णण किया है,यह एक अनेइछिक,रिफलेक्स क्रिया है,जब कोइ भी इन्सान किसी भी,कार्य को बार बार दोहराता है,तो उसका नर्वस सिसटम उसको वह कार्य करने का आदेश देता है,और इन्सान की सभी नर्ब्स का संचालन होता है,सपाईनल कोर्ड से,जो कि अनेछिक कार्य करने का आदेश देती है,हाँ,अगर यह अनेछिक क्रिया बहम का स्थान ले ले तो इसको कम्पलसिअव डिसओरडर कहते हैं, अगर कम्पलसिव डिसओरडर हो जाये तो मनोरोग चिकत्सक और मानसिक चिकत्सक को दिखाने की आवश्यकता पड़ती है,मेरे विचार से यह विवेहरियल थेरेपी और मानसिक चिकत्सक से यह रोग ठीक हो सकता है,अगर यह वहम नहीं है,तो इस प्रकार की अनेछिक रिफलेक्सिव क्रिया स्वाभिक है,खैर आपने अच्छी पोस्ट लिखी है,और मुझे पंरापगत लेखों के साथ मनोविज्ञान में भी,बहुत रुचि है,आजकल मनोविज्ञानिक विषयों पर भी लिखने का प्रयत्न कर रहा हँ ।

Unknown said...

आपको बधाई देता हूँ,आपकी भविष्यवाणी क्रिकेट के बारे में सही निकली,कल का मैच भारत जीत गया ।

रंजू भाटिया said...

रोचक है यह पोस्ट अक्सर ज़िन्दगी में सब इस से कभी न कभी गुजरते हैं ..

Chandan Kumar Jha said...

बहुत हीं ज्ञानवर्धक आलेख । पढ़कर अच्छा लगा ।

Avinash said...

har khyaal ka jawaab hai humare paas.... just visit http://yourquestionanswer.blogspot.com/

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढिया पोस्ट।आभार।

वाणी गीत said...

इस प्रकार का आंशिक सनकीपन लगभग सबमे ही होता है ...जब तक यह आदत तकलीफ ना देने लग जाये ...तब तक फिक्र की कोई बात नहीं ...