क्‍या प्रकृति में लेने और देने का परस्‍पर संबंध होता है ??

February 08, 2010
जीवन में बहुत सारे लोग , खासकर आध्‍यात्मिक ज्ञान और रूचि वाले लोग इस बात को मानते हैं कि प्रकृति में लेने और देने का परस्‍पर संबंध है। एक बार पिता पुत्र की देखभाल करता है , तो दूसरी बार पुत्र को पिता के कमजोर होते शरीर को सहारा देना पडता है। इसी प्रकार हर रिश्‍ते में लेने और देने की पुष्टि तो हो जाती है। रिश्‍तो से इतर दोस्‍ती वगैरह में भी लेने देने का क्रम दोतरफा संबंध ही होता है , कभी हम किसी के काम आते हें , तो कभी कोई दूसरा हमारे काम आता है। जहां ऐसा कोई संबंध नहीं दिखता , वहां लोग पूर्वजन्‍म आदि का लेन देन तक मान लेते हैं , चाहे वो अंधविश्‍वास हो या सत्‍य। पर कभी कभी ऐसे ऐसे सुयोग दुर्योग होते हैं कि प्रकृति के रहस्‍य को सोंचने को मजबूर हो जाना पडता है।

मेरे पिताजी के एक मित्र के बेटे बहू हमारे कॉलोनी में ही रहते हैं। उनके एक पडोसी के बच्‍चे की तबियत खराब हो गयी थी , जिसके इलाज के लिए  अपने पडोसिन के साथ मेरी वह परिचिता हमारे घर के बगल में एक डॉक्‍टर के यहां आई। डॉक्‍टर के यहां नंबर मिलने में थोडी देर थी , इसलिए बीमार बेटे को साथ लेकर आधे घंटे इंतजार करने की अपेक्षा वे दोनो महिलाएं मेरे यहां आ गईं। परिचिता की उस पडोसिन से मैं पहली बार मिल रही थी , कभी कोई बात चीत नहीं हुई थी , आधे घंटे बात चीत के क्रम में हल्‍का फुल्‍का जलपान और चाय पीना ही था। वह मुझे अपने यहां आने का निमंत्रण दे गयी। पर मुझसे उम्र में काफी छोटी होने के कारण मुझे उसके यहां जाने का कभी ध्‍यान ही नहीं गया। मैं उस बात को यूं ही भूल गयी।

करीब सालभर बाद एक दिन मैं अपनी आंखों का चेकअप करवाने अपने परिचित डॉक्‍टर के यहां गयी , तो संयोग से बाहर एक नया स्‍टाफ बैठा था। उसने मुझे नहीं पहचाना , तो जबरदस्‍ती परिचय देकर अपना पहचान जताने की मेरी इच्‍छा नहीं हुई। मैने फी चुकाकर नंबर ले लिया , आधे घंटे बाद का एप्‍वाइंटमेंट मिला। इसी नर्सिंग होम के बगल में वो परिचित परिवार रहते थे , इसलिए मै उसी के यहां समय काटने चल पडी। हमेशा किसी न किसी प्रकार के चिंतन में रहने की मेरी बुरी आदत है ही , सडक पर टहलते हुए जा ही रही थी कि उस परिचित की दो वर्ष की छोटी बच्‍ची को मैने एक गेट के अंदर बाहर आते जाते हुए खेलते देखा । मैं बिना किसी बात पर ध्‍यान दिए उसके पीछे पीछे मैं गेट के अंदर चली गयी , तो आगे वह बच्‍ची मकान के अंदर गयी। जब मैने लॉन पर नजर डाला , मुझे अपनी गल्‍ती का अहसास हुआ। ये घर तो वह नहीं , जिसमें मै जानेवाली थी, पर वह बच्‍ची ??

पर थोडी ही देर में मेरे सामने मेरी परिचिता की वह पडोसन दिखाई पडी , 'दीदी , आइए'
मैं तो चौंक ही गयी , ये मैं कहां आ गयी, मैने बच्‍ची के बारे में पूछा। उस महिला ने बताया कि कभी कभी बच्‍ची उसके यहां खेला करती है। मैने बताया कि मैं गलतफहमी में यहां आ गयी , तब भी उसने मुझे जाने नहीं दिया , अपने यहां बैठाया। ठीक बगल वाला मकान मेरी परिचिता का था , उसे भी आवाज देकर बुलाया , आधे घंटे उसी प्रकार हम तीनो की बात चीत हुई , जैसा मेरे घर पर हुआ था , चाय नाश्‍ता हुआ। डॉक्‍टर के यहां एप्‍वाइंटमेंट का समय होने पर मैं निकल पडी। रास्‍ते में मैं यही सोंच रही थी कि ठीक एक वर्ष बाद वही परिस्थिति , लगभग उतना ही समय , उतना ही जलपान और एक कप चाय। मानो मेरा उसके यहां बाकी रह गया हो , जिसे चुकाने के लिए मैं उस बच्‍ची के पीछे पीछे वहां तक चली गयी थी या हो सकता है यह एक महज संयोग था , जिसे मैं बडा रूप दे रही हूं , पर यह वाकया अभी भी बहुत कुछ सोंचने को मजबूर करता है।

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6 Komentar
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संगीता जी, मेरी दादी माँ मुझे बचपन अकसर एक कहानी सुनाया करती थी ! (शायद आपने भी सुन राखी हो ) सार यह था उस कहानी का कि एक महिला बहुत दानी थी! गरीबी के बावजूद भी अगर उसने अपने लिए सिर्फ दो रोटी बनाई है तो एक रोटी उसमे से भी दान कर देती ! उसका पति सेना में था और एक दिन लड़ाई में प्रस्थान कर गया ! लड़ाई ख़त्म होने के बाद जब घर लौटा तो उसने अपनी पत्नी से कहा कि तुझे इस लड़ाई की एक आश्चर्यजनक बात सुनाता हूँ ! मोर्चे पर जब भी कोई दुश्मन की गोली मेरी तरफ आती थी तो पता नहीं अचानक कहाँ से एक रोटी हमेशा गोली और मेरे बीच में आ जाती थी. और मैं बच जाता था................... !

Balas
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संगीता जी, यह संयोग भी हो सकता है लेकिन प्रकृति लेन-देन बराबर करती है। मैं तो इसलिए किसी दुष्‍ट आदमी से प्रतिक्रिया ही नहीं करती क्‍योंकि डरती हूँ कि उससे कर्म नहीं बंध जाए। यदि बंध गए तो न जाने कितने जन्‍म तक पीछा करेगा?

Balas
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क्या पता संयोग हो किन्तु ऐसा होता तो है.

Balas
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हाँ जी!
लेने और देने का परस्‍पर संबंध
प्रकृति से ही मानव से सीखा है!
जो समाज मे सर्वत्र देखने को मिलता है!

Balas
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सच है, ऐसा होता तो है।

Balas