काश हम बच्‍चे ही होते .. धर्म के नाम पर तो न लडते !!

religion in indian society

बात पिछले नवरात्र की है , मेरी छोटी बहन को कंजिका पूजन के लिए कुछ बच्चियों की जरूरत थी। इन दिनों में कंजिका ओं की संख्या कम होने के कारण मांग काफी बढ़ जाती है। मुहल्‍ले के सारे घरों में घूमने से तो अच्‍छा है , किसी स्‍कूल से बच्चियां मंगवा ली जाएं। यही सोंचकर मेरी बहन ने मुहल्‍ले के ही नर्सरी स्‍कूल की शिक्षिका से लंच ब्रेक में कक्षा की सात बच्चियों को उसके यहां भेज देने को कहा। उस वक्‍त मेरी बहन की बच्‍ची बब्‍बी भी उसी स्‍कूल में नर्सरी की छात्रा थी। शिक्षिका को कहकर वह घर आकर वह अष्‍टमी की पूजा की तैयारी में व्‍यस्‍त हो गयी।

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अभी वह पूजा में व्‍यस्‍त ही थी कि दोपहर में छह बच्चियों के साथ बब्‍बी खूब रोती हुई घर पहुंची। मेरी बहन घबडायी हुई बाहर आकर उसे चुप कराते हुए रोने का कारण पूछा। उसने बतलाया कि उसकी मैडम ने उसकी एक खास दोस्‍त हेमा को यहां नहीं आने दिया। वह सुबक सुबक कर रो रही थी और कहे जा रही थी, 'मेरे ही घर की पार्टी , मैने घर लाने के लिए हेमा का हाथ भी पकडा , पर मैडम ने मेरे हाथ से उसे छुडाते हुए कहा ,'हेमा नहीं जाएगी'। वो इतना रो रही थी कि बाकी का कार्यक्रम पूरा करना मेरी बहन के लिए संभव नहीं था।

वह सब काम छोडकर बगल में ही स्थित उस स्‍कूल में प‍हूंची। उसके पूछने पर शिक्षिका ने बताया कि हेमा मुस्लिम है , हिंदू धर्म से जुडे कार्यक्रम की वजह से आपके या हेमा के परिवार वालों को आपत्ति होती , इसलिए मैने उसे नहीं भेजा। मेरी बहन भी किंकर्तब्‍यविमूढ ही थी कि उसके पति कह उठे, 'पूजा करने और प्रसाद खिलाने का किसी धर्म से क्‍या लेना देना, उसे बुला लो।' मेरी बहन भी इससे सहमत थी , पर हेमा के मम्‍मी पापा को कहीं बुरा न लग जाए , इसलिए उनकी स्‍वीकृति लेना आवश्‍यक था। संयोग था कि हेमा के माता पिता भी खुले दिमाग के थे और उसे इस कार्यक्रम में हिस्‍सा लेने की स्‍वीकृति मिल गयी।

बहन जब हेमा को साथ लेकर आयी , तो बब्‍बी की खुशी का ठिकाना न था। उसने फिर से अपनी सहेली का हाथ पकडा , उसे बैठाया और पूजा होने से लेकर खिलाने पिलाने तक के पूरे कार्यक्रम के दौरान उसके साथ ही साथ रही। इस पूरे वाकये को सुनने के बाद मैं यही सोंच रही थी कि रोकर ही सही , एक 4 वर्ष की बच्‍ची अपने दोस्‍त के लिए , उसे अधिकार दिलाने के लिए प्रयत्‍नशील रही। छोटी सी बच्‍ची के जीवन में धर्म का कोई स्‍थान न होते हुए भी उसने अपने दोस्‍ती के धर्म का पालन किया। बडों को भी सही रास्‍ते पर चलने को मजबूर कर दिया। और हम धर्म को मानते हुए भी मानवता के धर्म का पालन नहीं कर पाते। ऐसी घटनाओं को सुनने के बाद हम तो यही कह सकते हैं कि काश हम भी बच्‍चे ही होते !! 
काश हम बच्‍चे ही होते .. धर्म के नाम पर तो न लडते !! काश हम बच्‍चे ही होते .. धर्म के नाम पर तो न लडते !! Reviewed by संगीता पुरी on अगस्त 27, 2010 Rating: 5

16 टिप्‍पणियां:

Mithilesh dubey ने कहा…

काश की ये हो सकता ???????

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) ने कहा…

सच में काश ............हम बच्चे ही होते.... बाहर होने की वजह से बाकी पोस्टों पर नहीं आ पाया.... अभी सब पोस्ट देखता हूँ....

समयचक्र ने कहा…

आपके विचार बहुत सुन्दर लगे... काश ये हो सकता और सभी इस विचारधारा के हों .... आभार

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

Majhab kee deeware bade hee khadee karte hai Sangeeta ji, prerak sansmaran.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हम यहां ६०% लोग आपस मै मिलते है एक दुसरे के त्योहारो को भी मनाते है पुजा पाठ तक मै जाते है.

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…


उम्दा पोस्ट-सार्थक लेखन के लिए आभार

प्रिय तेरी याद आई
आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

काश की ये हो सकता और हम बच्चे ही होते....
बहुत सुन्दर विचार....... आभार

Vinashaay sharma ने कहा…

बहुत अच्छे विचार ।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

आज के बच्चे तो मज़हब और धर्म के बीच का अंतर समझने लग गए हैं जो सारे समाज के लिए एक खतरे की घंटी है॥

उपेन्द्र नाथ ने कहा…

bilkul sahi sandesh aap ne diya hai is blog ke jarire...........bahoot bahoot aabhar

Aadarsh Rathore ने कहा…

बकवास...
आज के बच्चे सबसे ज्यादा धर्मान्ध हैं...
फुटबाल खेलते देख रहा था पिछले हफ्ते... कितनी गालियां बकी उन्होंने एक दूसरे को धर्म के नाम पर

मनोज कुमार ने कहा…

हम भी तो यही कह रहे हैं हैं कि काश हम भी बच्‍चे ही होते !!

Unknown ने कहा…

संगीता जी

बचपन कौन नहीं चाहता एक बचपन ही है जहा दुनिया की कोई हद कोई रुकावट नहीं होती जिससे बच्चे की भावनाओ को रोका जा सके पर अपना समाज कहे या सीधे तौर पे हर किसी के अभिभावक ही इन धर्म कर्म जैसी पहेलियो में उनका बचपन उलझा देते है और इन कर्मकांडो से न ही आज तक मानवता सुखी हुई है न ही वो मानव जिसने इसे करने का बिज बचपन में ही फूंक दिया | पूजा , अर्चना तो इस जीवन बेहद सौभाग्य पूर्ण समय है पर इस दुनिया ने तो भगवन को भी बाँट दिया | जिसे प्रार्थना करनी हो उसे न मंदिर न मस्जिद उसे अगर कुछ चाहिए तो बस सम्पूर्ण समर्पण भाव ....

पर यहाँ पर तो हर धर्म के मंदिर है और जो मंदिर हिन्दू का हो , मुस्लिम का हो वह भगवान् का नहीं हो सकता जो इन सीमओं में बंध जाये |

संगीता जी बुजुर्ग लोग कहते है की बचपन के दिन काफी सुन्दर थे बड़े सुहावने थे | इस बात का क्या अर्थ होता है ?

आसान शब्दों में "जिंदगी अधोगति बन गई " बचपन में ख़ुशी की सहरावत हुई और जवानी आई और फिर जीवन की साँझ .. तो जिंदगी धीरे धीरे दुःख पूर्ण होनी लगी |

मै इन बातों को निराशा वादी मानता हु | जिस भगवन की हम पूजा कर रहे है उन्ही महोदय ने सुन्दर सी जवानी दी है और जीवन को पूर्णता देने वाले बुढ़ापे भी देंगे | शुक्रिया अदा करूँगा की उन्होंने हमें इस जीवन में शुरुवात दी पूर्णता देंगे और सम्पूर्णता भी ,

अगर कोई चीज लडवाती है तो वो है "सोच" | मासूम बचे सोचते नहीं न ही सोच पते है . सिर्फ महसूस करते है आप भी सोचना छोड़े और सिर्फ महसूस करे , पूरा अस्तित्व आपको बचपन की आबो हवा से रूबरू करा देगा |

इंसानी दिल ऐसा है की जहा है वहा पछताता है और जहा नहीं है वहा के सपने संजोता है की काश वहा होता |

आशा है आप मेरा आशय यथावत स्वीकार करेंगी |

आप का स्पष्ट और सौहार्द पूर्ण लेखन बहोत पसंद आया |

Unknown ने कहा…

संगीता जी

बचपन कौन नहीं चाहता एक बचपन ही है जहा दुनिया की कोई हद कोई रुकावट नहीं होती जिससे बच्चे की भावनाओ को रोका जा सके पर अपना समाज कहे या सीधे तौर पे हर किसी के अभिभावक ही इन धर्म कर्म जैसी पहेलियो में उनका बचपन उलझा देते है और इन कर्मकांडो से न ही आज तक मानवता सुखी हुई है न ही वो मानव जिसने इसे करने का बिज बचपन में ही फूंक दिया | पूजा , अर्चना तो इस जीवन बेहद सौभाग्य पूर्ण समय है पर इस दुनिया ने तो भगवन को भी बाँट दिया | जिसे प्रार्थना करनी हो उसे न मंदिर न मस्जिद उसे अगर कुछ चाहिए तो बस सम्पूर्ण समर्पण भाव ....

पर यहाँ पर तो हर धर्म के मंदिर है और जो मंदिर हिन्दू का हो , मुस्लिम का हो वह भगवान् का नहीं हो सकता जो इन सीमओं में बंध जाये |

संगीता जी बुजुर्ग लोग कहते है की बचपन के दिन काफी सुन्दर थे बड़े सुहावने थे | इस बात का क्या अर्थ होता है ?

आसान शब्दों में "जिंदगी अधोगति बन गई " बचपन में ख़ुशी की सहरावत हुई और जवानी आई और फिर जीवन की साँझ .. तो जिंदगी धीरे धीरे दुःख पूर्ण होनी लगी |

मै इन बातों को निराशा वादी मानता हु | जिस भगवन की हम पूजा कर रहे है उन्ही महोदय ने सुन्दर सी जवानी दी है और जीवन को पूर्णता देने वाले बुढ़ापे भी देंगे | शुक्रिया अदा करूँगा की उन्होंने हमें इस जीवन में शुरुवात दी पूर्णता देंगे और सम्पूर्णता भी ,

अगर कोई चीज लडवाती है तो वो है "सोच" | मासूम बचे सोचते नहीं न ही सोच पते है . सिर्फ महसूस करते है आप भी सोचना छोड़े और सिर्फ महसूस करे , पूरा अस्तित्व आपको बचपन की आबो हवा से रूबरू करा देगा |

इंसानी दिल ऐसा है की जहा है वहा पछताता है और जहा नहीं है वहा के सपने संजोता है की काश वहा होता |

आशा है आप मेरा आशय यथावत स्वीकार करेंगी |

आप का स्पष्ट और सौहार्द पूर्ण लेखन बहोत पसंद आया |

Unknown ने कहा…

संगीता जी
अगर कोई चीज लडवाती है तो वो है "सोच" | मासूम बचे सोचते नहीं न ही सोच पते है . सिर्फ महसूस करते है आप भी सोचना छोड़े और सिर्फ महसूस करे , पूरा अस्तित्व आपको बचपन की आबो हवा से रूबरू करा देगा |

इंसानी दिल ऐसा है की जहा है वहा पछताता है और जहा नहीं है वहा के सपने संजोता है की काश वहा होता |
आप का स्पष्ट और सौहार्द पूर्ण लेखन बहोत पसंद आया |

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी लगाई जा रही है!
सूचनार्थ!

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