हमारी काल गणना अधिक सटीक है !!

 

Which panchangam is best

प्राचीन काल से ही लोगों को यह समझ में आ गया था कि आसमान के ग्रह नक्षत्रों की चाल एक समान है , इसलिए ‘समय’ की जानकारी के लिए इसे सटीक आधार के रूप में मान्‍यता दी गयी। आसमान में सूर्य की स्थिति के आधार पर ग्रामीण दिन के प्रहर के और नक्षत्रों और तारों की स्थिति के आधार पर रात के प्रहर का आकलन करते थे। इसी प्रकार चंद्रमा के आकार को देखकर महीने के दिनों की गिनती करते थे। वसंत के महीने से ही चन्द्रमा के पूर्ण स्वरुप को देखते हुए एक एक माह का अंत करते गए, इस तरह वसंत के शुरुआत से दूसरे साल तक चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन, भाद्रपद (भादो) , आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन), पौष, माघ , फाल्गुन जैसे 12 महीने बने। इस विषय पर पिछले दिन मैने पोस्‍ट लिखा था और अधिकमास की गणनाका कारण बतलाया था , तो कुछ पाठकों को ऐसा महसूस हुआ कि अंग्रेजी कैलेण्‍डर अधिक वैज्ञानिक हैं और इसी कारण हमें अपने पंचांग को उसके अनुरूप बनाने के लिए 13 महीने का एक कैलेण्‍डर बनाना पडता है।

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उन पाठकों को मैं जानकारी देना चाहूंगी कि अंग्रेजी कैलेण्‍डर का यह 2009 वां वर्ष चल रहा है , जबकि हमारे भारतीय विक्रमी संवत् का 2066 वां वर्ष चल रहा है । यानि कैलेण्‍डर के रूप में भी देखा जाए तो हम अंग्रेजी कैलेण्‍डर से 57 वर्ष आगे चल रहे हैं और गणना के ख्‍याल से देखा जाए तो हम और भी कितने आगे रहे होंगे , इसका अनुमान भी करना मुश्किल है । वैसे जो भी हो , सभी ग्रहों की चाल को देखते हुए इस प्रकार के कैलेण्‍डर को भले ही आमजनों के मध्‍य लोकप्रियता न मिल पायी हो , पर हमारे ऋषि महर्षियों के विलक्षण प्रतिभा को तो सिद्ध कर ही देती है । हमारे ऋषि मुनियों को सौर वर्ष और चंद्र वर्ष दोनो की जानकारी थी , तभी तो वे इस प्रकार का समायोजन कर सके थे।


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अंग्रेजी कैलेण्‍डरों का सौरवर्ष सूर्य की परिक्रमा करती पृथ्‍वी पर आधारित है , 1 जनवरी को इस पथ पर पृथ्‍वी जहां पर स्थित होती है , वहां से वर्ष की शुरूआत की जाती है , जबकि 31 दिसम्‍बर को अंत। इसके विपरीत, हमारा सौर वर्ष का आकलन पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए आसमान के 360 डिग्री में चलते हुए सूर्य पर आधारित था। इस 360 डिग्री को 12 भागों में यानि 30-30 डिग्री में विभाजित कर उसमें सूर्य की स्थिति के आधार पर एक सौर मास का आकलन होता था। इसका आरंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश यानि 14 अप्रैल से शुरू होकर 13 अप्रैल को समाप्‍त होता है । हमारे देश में अनेक त्‍यौहार लोहडी , बैशाखी , मकर संक्रांति आदि सूर्य के खास राशि प्रवेश के आधार पर भी मनाए जाते रहे हैं।

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इस प्रकार हमारे पंचांग के अनुसार की गयी यह गणना जटिल होने के बावजूद अधिक वैज्ञानिक मानी जा सकती है। यदि किसी व्‍यक्ति का अपना जन्‍म अंग्रेजी तिथि और जन्‍म समय बताए तो उससे आप सिर्फ उसके जन्‍म के समय के ऋतु को जान सकते हैं , पर वह हमारे पंचांगों के अनुसार अपनी जन्‍म तिथि और जन्‍मसमय बतलाए , तो आप न सिर्फ मौसम , वरन रात के अंधेरे-उजाले का भी अनुमान लगा सकते हैं , इसी प्रकार अंग्रेजी त्‍यौहारों की चर्चा हो , तो हमें सिर्फ उस मौसम की ही जानकारी मिल सकती है , पर हिन्‍दी त्‍यौहारों की चर्चा हो रही है तो सूर्य के साथ ही साथ चंद्रमा की भी स्थिति हमारी समझ में आ जाती है।

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