बुरा न मानो होली है !!

होली का त्‍यौहार शक संवत के नए वर्ष के शुरू होने की खुशी में मनाया जाता है, इसलिए इस दिन के ग्रह नक्षत्रों का वर्षभर प्रभाव रहना स्‍वाभाविक है। इस वर्ष ग्रह नक्षत्र बिल्‍कुल उल्‍टी पुल्‍टी स्थिति में हैं , इसलिए सभी लोगों का यह वर्ष बिल्‍‍कुल विपरीत प्रभाव डालने वाला होगा।  ब्‍लॉगरों पर यह प्रभाव सर्वाधिक रहेगा , आइए देखते हैं , किन किन ब्‍लॉगरों पर इस ग्रह नक्षत्र की स्थिति का क्‍या प्रभाव पडेगा ......

लंबी लंबी पोस्‍ट पढनेवालों को झटका लगेगा,क्‍यूंकि फुरसतियाजी की फुर्सत में अब कमी आएगी।
महफूज अली जी ब्‍लॉग जगत में सबके प्‍यारे नहीं रहेंगे।
श्‍यामल सुमन जी के सारे दोहे चौपाई में बदल जाएंगे।
महत्‍वपूर्ण कार्रवाई के वक्‍त लोकेश जी का गवाह फरार हो जाया करेगा।
ताऊ रामपुरिया जी की पहेलियां कोई भी न बूझ पाएंगे।
मनीषा  जी की अच्‍छी बातों का ब्‍लॉग बुरी बातों का ब्‍लॉग बन जाएगा।
उन्‍मुक्‍त जी ज्‍योतिष का प्रचार प्रसार करना शुरू करेंगे।
चंदन जी की नई बातें पुरानी हो जाएगी।
प्रभात गोपाल जी गप शप करना छोड देंगे।
सुरेश चिपलूनकर जी अब से इस्‍लाम का प्रचार प्रसार करेंगे।
हिमांशु जी की रचना सबों को समझ में आ जाया करेगी।
महेन्‍द्र मिश्र जी संयमित और मर्यादित हिंदी लिखना छोड देंगे।
जाकिर अली रजनीश जी तंत्र मंत्र का प्रचार करने लगेंगे।

हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडे सभी लेखकों और पाठकों को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं !!

लाइए हमारा इनाम .. हमने आपको झूठी कहानी सुना दी !!

 Nai Kahani


एक राजा को झूठी कहानियां सुनने का बहुत शौक था , मतलब कि ऐसी कहानी जो सच हो ही नहीं सकती। उन्‍होने पूरे राज्‍य में घोषणा कर दी थी कि उनको जो भी झूठी कहानी सुना दे , जो कभी सत्‍य हो ही नहीं सकती , तो राजा की ओर से इनाम के रूप में बडी राशि दी जाएगी। पूरे राज्‍य से राजा को ऐसी कहानियां सुनाने के लिए लोग आते , पर राजा को संतुष्टि नहीं होती। वे हर कहानी को सच्‍ची मान लेते , कहते 'ऐसा तो हो ही सकता है , कुछ ऐसी कहानी सुनाओं , जो हो ही नहीं सके'। लोग अपने सामर्थ्‍यभर पूरी कोशिश करते , पर इनाम किसी को नहीं मिल पाता था , क्‍यूंकि राजा स्‍वीकार ही नहीं करना चाहते थे कि ऐसी घटना नहीं हो सकती है। कई लोगों को निराश लौटते देख एक नागरिक ने राजा को सबक सिखाने का निश्‍चय किया। वह राजा के दरबार में पहुंचा और कहानी सुनाना आरंभ किया, साथ साथ राजा का जबाब भी सुनते जाइए .....

'एक व्‍यक्ति दो बैलों की सहायता से अपने खेत में हल चला रहा था, एक बैल ने अपनी पीठ पर ही गोबर कर दिया'
'इसमें कोई झूठ नहीं, गोबर पीठ मे जा सकता है'

'उस गोबर में पीपल का एक बीज गिरा , जिससे पीठ पर पीपल का एक पेड निकल आया , वह पेड बडा होकर आसमान को छूने लगा'
'इसमें भी कोई झूठी बात नहीं, ये भी हो सकता है'

'किसान पेड पर चढता हुआ बिल्‍कुल ऊपर की टहनी तक जा पहुंचा , उसका सर आसमान से टकरा रहा था'

'आगे कहो , यहां तक तो कोई झूठ बात नहीं लगती'

'ओह , ये तो बहुत दुख की बात है , फिर किसान उतरा कैसे ?'

'ऊपर की टहनी थी न , नीचे से किसी ने रस्‍सी फेकी , उसने उस रस्‍सी को ऊपरवाले टहनी पर बांधा , फिर रस्‍सी के सहारे नीचे उतरने लगा।'
'ईश्‍वर की कृपा है , उसे सहारा मिल गया , अब आगे कहो , कुछ झूठ सुनाओ।'
'आधी दूरी तक ही वह उतरा था कि रस्‍सी छोटी पड गयी , बडी मुश्किल से उसने ऊपर की रस्‍सी खोली , फिर उसी रस्‍सी को नीचे बची एक टहनी में बांधा , फिर उसके सहारे नीचे आने लगा। पर जमीन से 20 फीट ऊपर ही था कि रस्‍सी एक बार फिर कम गयी। वह वहां से कूद पडा'
'किसान नीचे तो सही सलामत आ गया न, अब आगे क्‍या हुआ , मजा ही नहीं आ रहा , क्‍यूंकि अभी तक तो तुमने कुछ झूठ कहा ही नहीं'
'सही सलामत तो नहीं कहा जा सकता , क्‍यूंकि एक तो वह कीचड में गिर कर उसमें फंस गया , दूसरी मुसीबत कि उसके दोनो पैरों की हड्डी टूट गयी'
'ओह , किसी किसी व्‍यक्ति पर तो बडी मुसीबत आ जाती है.. आगे क्‍या हुआ ?'
'सबसे पहले तो उसे पैरो का इलाज कराने की आवश्‍यकता थी , पर इलाज तो वह तब कराता , जब कीचड से बाहर निकलता , कीचड से निकलने का कोई उपाय नहीं था , वह थोडी दूर पर बने एक झोपडी में गया , वहां से एक कुदाल लाया , फिर कीचड साफ की , तब बाहर निकला , अब अपने पैर के इलाज के लिए उसे डॉक्‍टर के यहां जाना था'
'यहां तक तो तुम झूठी कहानी न सुना सके , इलाज के बाद तो कहानी समाप्‍त ही हो जाएगी, तुम भी हारे , ऐसा लग रहा है।'
राजा के कहीं भी 'हां' न कहने से वह व्‍यक्ति बिल्‍कुल परेशान हो चुका था , उसने राजा को मजा चखाना चाहा। उसने कहा ..
'नहीं , इलाज से पहले ही तो एक महत्‍वपूर्ण बात हो गयी, किसान कीचड से निकला ही था कि एक गधे को सामने से आते देखा , उसने गधे से कहा,  'ऐ गधे , मुझे डॉक्‍टर के पास ले चलोगे ? तो गधे ने कहा कि वह साधारण गधा नहीं , यहां के राजा का बाप है , किसान ने कहा , तुम झूठ बोल रहे हो , राजा गधा नहीं , तो उसका बाप गधा कैसे हो सकता है ? इसपर उसने कहा कि जाकर राजा से पूछ लो, उसका बाप गधा है या नहीं ? अब मैं तो नहीं जानता , आप ही बता सकते हैं सरकार , गधे ने सच कहा या झूठ'
'यह कैसे हो सकता है ? गधा मेरा बाप नहीं हो सकता'
 
'इसका अर्थ यह हुआ कि ये कहानी गलत है'
'हां हां , बिल्‍कुल गलत'
'तो फिर लाइए हमारा इनाम, हमने आपको झूठी कहानी सुना दी'

'किसान चढ तो आराम से गया , उस पीपल के पेड पर आम के फल लगे थे, उसे तोडकर उसने अपने झोले को पूरा भर लिया , पर उतरने वक्‍त उसे काफी दिक्‍कत हो रही थी , क्‍यूंकि जिन जिन टहनियों से वह गुजरता गया , उसके पैरों के भार से सारी टहनियां पेड से टूटकर जमीन पर गिरती चली गयी थी'

प्रवीण शाह जी को दिया गया जबाब

मेरी पिछली पोस्‍ट में प्रवीण शाह जी की बहुत ही महत्‍वपूर्ण टिप्‍पणी मिली ,प्रवीण शाह ने कहा…


आदरणीय संगीता जी,

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की दृष्टि से मनुष्‍य के मन को विकास देने में जन्‍मकालीन चंद्रमा की भूमिका होती है। इसके कारण जन्‍मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत हो , तो बच्‍चे की देख रेख बहुत ही अच्‍छे तरीके से होती है, विपरीत स्थिति में बच्‍चे के देखरेख में कुछ कमी आती है।

एक प्रयोग कीजिये कभी, अगस्त-सितम्बर-अक्टूबर यानी बेबी-बूम के महीनों में ऐसा वक्त छांट लीजिये जब आकाश में चंद्रमा की स्थिति मौजूद हो...इस दौरान सरकारी अस्पताल में हुऐ किसी गरीब-भिखारी के बच्चों और प्राईवेट महंगे अस्पताल में पैदा हुऐ उच्चवर्ग के बच्चों को फालो करें...आपको खुद ही समय आ जायेगा कि आपके निष्कर्ष कितने गलत हैं।

एक काम और कर सकती है २४ साल पहले का सबसे कमजोर ग्रहयोग निकालिये... ब्लॉग पर भी पूछिये इस दौरान पैदा बच्चों के जीवन के बारे में... और पता कीजिये अपने शहर के सबसे पॉश अस्पताल में जाकर कि उस दौरान वहां पैदा हुऐ बच्चों क्या बने जीवन में...आपकी धारणाये बदल जायेंगी, यह निश्चित है।


प्रवीण शाह जी को दिया गया मेरा जबाब  ..... 


मुझे अपनी धारणाओं पर पूरा विश्‍वास है .. क्‍यूंकि मैं चालीस वर्षों से इसे सटीक होता देख रही हूं। वैसे मैं अभी भी प्रयोग करने में पीछे नहीं हटती, मैंने ये आलेख अपने नियमों की सच्‍चाई को जानने के लिए ही लिखा था .....
http://sangeetapuri.blogspot.com/2009/07/5-6.html
http://sangeetapuri.blogspot.com/2009/01/blog-post.html
http://sangeetapuri.blogspot.com/2009/01/blog-post_14.html
http://sangeetapuri.blogspot.com/2009/01/blog-post_19.html
पर कितने जबाब आए , वो आप भी देख सकते हैं , यदि हम भारतवासी एक दूसरे के विचारों को गंभीरता से लेते , तो भारत न तो इतने दिनों तक गुलाम होता और न ही स्‍वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और संघर्ष के बावजूद मात्र 50 वर्षों की आजादी के बाद एक बार फिर से हम गुलामी की तरफ कदम बढा रहे होते। हमें तो हर शोध के लिए विदेशों के मुंह तकने की आदत पडी हुई है।
जब भी मैं सुख या दुख की चर्चा कर रही होती हूं , आपलोग आर्थिक स्‍तर पर क्‍यूं आ जाते हैं , जिसका आंतरिक सुख और दुख से कोई संबंध ही नहीं। भला बच्‍चों को प्‍यार प्राप्‍त करने के लिए और उनके मनोवैज्ञानिक विकास के लिए धन की क्‍या आवश्‍यकता ? गरीबों के घर में भी मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे भी शरीर से मजबूत हो सकते हैं, परिवारवालों का भरपूर प्‍यार प्राप्‍त कर सकते हैं , जबकि कमजोर चंद में जन्‍म लेनेवाले अमीर घरों के बच्‍चे भी स्‍वास्‍थ्‍य की कमजोरी के कारण परेशानी महसूस कर सकते हैं , नौकरों चाकरों के भरोसे पलते हुए मां बाप के प्‍यार के लिए तरस सकते हैं।
वैसे एक प्रयोग आप भी कर सकते हैं , गरीब परिवार के पूर्णिमा के दिन जन्‍म लेनेवाले पांच वर्ष की उम्र के पांच बच्‍चों और अमीर परिवार के अमावस्‍या के दिन जन्‍म लेनेवाले पांच वर्ष की उम्र के पांच बच्‍चों को नहला धुलाकर नए कपडे पहनाकर उन्‍हें कुछ खिलौने और खाने पीने की वस्‍तुएं देकर एक स्‍थान पर दो घंटे रखकर उनके क्रियाकलापों को छंपकर देखें और परिणाम ब्‍लॉग पर पोस्‍ट करें !!

प्रवीण शाह जी,

'उत्‍पादकता' से 'प्रकृति' महत्‍वपूर्ण,

डायरी के एक पन्‍ने में मुझे यह कविता दिखाई पडी। पढने पर मुझे याद आया कि पर्यावरण दिवस पर आयोजित किसी कार्यक्रम में बोलने के लिए बेटे को कविता लिखना सिखलाते हुए मैने यह तुकबंदी की थी । यह पन्‍ना इधर उधर खो न जाए , इस ख्‍याल से इस यादगार कविता को यहां प्रेषित कर रही हूं, उम्‍मीद है आपको अच्‍छा लगेगा......


विकास की अंधी दौड में हमने ,
ओजोन परत को नष्‍ट किया है।
सिर्फ 'उत्‍पादकता' पर ध्‍यान देकर ,
वायु को प्रदूषित कर दिया है।

कारखानो से निकले सारे कचरे,
नदी में जाकर मिल जाते हैं।
खेतों से बहकर गए रसायन,
जलजीवों को कष्‍ट बढाते हैं।

रसायनों का प्रयोग करके हमने,
भू की उर्वरता को कम किया है।
स्‍वार्थों की पूर्ति हेतु हमने,
सारे जंगलों को काट दिया है।

अपनी गलतियों का परिणाम,
हमें तो भुगतना ही होगा।
नाना बीमारियों से जल थल के ,
जीवों को तो मरना ही होगा।

तापमान बढने के कारण,
बर्फ तो पिघलते ही जाएंगे।
समस्‍याएं बाढ अकाल की आएंगी,
समुद्र सतह बढते ही जाएंगे।

वायु जल भू की रक्षा करो,
ताकि जलप्रलय न हो कभी।
'उत्‍पादकता' से 'प्रकृति' महत्‍वपूर्ण,
ये बात गांठ बांध लो सभी।

ये कैसे कैसे अंधविश्‍वास 3

पहली और दूसरी कडी के बाद आते हैं , तीसरी कडी पर  हमारे अंधविश्‍वास का फल सदा से निरीह जानवारों को भी भुगतना पडता रहा है , सरिता झाजी लिखती हैं गाधीमाई के पुजारियों और आयोजकों का कहना है कि इस साल मेले में भी कम से कम 5 लाख पक्षियों और जानवरों सहित तक़रीबन 25,000 भैंसों की बलि दी जाएगी. नेपाल में हर साल धर्म के नाम पर इतनी बड़ी संख्या में जानवरों और पक्षियों को बलि दी जाती है और मरने के बाद उनकी लाशों को या तो जला दिया जाता है या फिर महीनों तक मरे हुए पक्षी और जानवर खुले में पड़े रहते हैं. नेपाल में जानवरों की हत्या के ख़िलाफ़ एक अभियान भी छेड़ा गया है और नेपाल के प्रधानमंत्री को याचिका भी सौंपी गई है जिसमें दो सौ लोगों ने हस्ताक्षर कर इन हत्याओं को बंद करने का निवेदन किया है. इस अभियान में जानवरों के अधिकारों की हिमायती भारतीय सांसद मेनका गांधी भी शामिल हैं.

मनुष्य की अज्ञानता और अंधविश्वास ने उसमें कुछ ऐसे शौक पैदा कर दिये हैं, जोकि बरबादी का रास्ता दिखाते हैं। ऐसे ही शौक में एक शौक है-प्रकृति की सुन्दर पैदावार जंगली जानवरों का शिकार। कई जंगली जानवरों के अंग ही मनुष्य के आकर्षण है, जो उनकी मृत्यु का कारण बनते हैं। ऐसे ही एक जंगली जीव है-गैंडा, जिसके नाक पर लगा सख्त सींग ही उसकी मृत्यु है। सदियों से अज्ञानता वश मनुष्य गैंडे का शिकार कर रहा है, क्योंकि उसका अंधविश्वास है कि गैंडे के इस शक्तिशाली सींग में कोई जादुई ताकत है।

गांव में फैले एक अंधविश्‍वास पर डॉ मनोज मिश्रा जी बहुत चिंतित हैं या तो लोग झूठ बोल रहें हैं या फिर भयवश मर रहें है या चाहे जो भी हो इससे पर्दा उठाना जरूरी है नहीं तो इस नन्हे जीव को लोग बेमौत मर डालेंगे .गाँव में इसको लेकर कई भ्रांतियां हैं,कईकिस्से कहानियाँ हैं ,तरह -तरह की चर्चाएँ है .लोग-बाग़ इसको देखते ही भयवश इसको मार डाल रहें है जल्द ही यदि इसके बारे में लोंगों के भय का निवारण  किया गया तो मुझे भय है कि लोग कहीं इस प्रजाति को विलुप्त ही नकर दें .इस बारे में आपके उत्तर की हमें प्रतीक्षा है .

गुजरात में उल्लू के आँख का प्रयोग लोग भोजन के रूप में करते हैं। ऐसी मान्यता है कि उल्लू की आँखें खाने से आँखों की रौशनी बढ़ती है। इसकी गुर्दा भी ऊँचे दाम पर बिकती है। वहीं उनके पैर और माँस का प्रयोग भोजन के साथ दवा के रूप में किया जाता है। विदेशों में उल्लू के पैर और पंख की काफी माँग है। विशेषज्ञों की राय में उल्लू के माँस और पैर से कोई दवा नहीं बनता बल्कि ये अल्प जानकारी एवं सुनी-सुनाई रूढ़ीवादी बातें हैं, जिससे अल्पसंख्यक उल्लू प्रजाति के पक्षियों के जीवन पर खतरा मंडरा रहा है। मध्य प्रदेश में कई जानवरों के चमड़े एवं चर्वी से दवा बनायी जाती है लेकिन इसके विश्लेशण की अभी आवश्यकता है। इन सब भ्रांतियों की वजह से गुजरात एवं मध्यप्रदेश उल्लू के अंगो का बाजार बन गया है, जबकि झारखण्ड और बिहार से उल्लूओं का सफाया हो रहा है। ये वेजुबान एवं संकटापन्न प्राणी, विलुप्प्ति के कगार पर इन अन्धविश्वासों के चलते पहुँच गये हैं।

संताल परगना में अब भी अंधविश्वास की जड़ें गहरी हैं. विवार को पालोजोरी प्रखंड के पथरघटिया गांव में ऐसा ही कुछ देखने को मिला. आश्चर्य यह कि महिलाएं ही महिलाओं के उत्पीड़न का कारण बनीं. डायन होने के संदेह में गांव की पांच महिलाओं को  केवल बर्बरता से पीटा गया, बल्कि तीन हजार लोगों की भीड़ के सामने खुले मैदान में निर्वस्त्र कर नचाया गया. इन महिलाओं को मैला भी पिलाया गया. भीड़ तमाशबीन रही. हालांकि आगे कुछ और अनर्थ होता, इससे पहले पुलिस और प्रशासनिक पदाधिकारियों ने पीड़ित महिलाओं को बचाया.महिलाएं ढोती हैं मौकिल साहब की सवारी : प्रत्यक्षदर्शियों  पुलिस सूत्रों के अनुसार, गांव की छह महिलाएं सकीना बीबी, सबीना बीबी, समिना बीबी, मैमूल बीबी, अझोला बीबी  खूतेजा बीबी पर कोई मौकिल साहब सवार होते हैं. वही गांव में डायन की पहचान कराते हैं. रविवार को भी यही हुआ.शेष पेज नौ परडायन बता कर .मौकिल साहब की सवारी ढोनेवाली महिलाओं ने गांव की ही विधवा ससीना बीबी, सगिरन बीबी  गुलेनार बीबी और सुशीला पंडित  ससूजन बीबी को डायन बताया. इसके बाद क्या था. अंधविश्वासी लोगों की दरिंदगी जाग उठी. लोगों ने इन महिलाओं को पहले टोले में ही बुरी तरह पीटा.मैदान में नचायाइस बात का प्रचार आसपास के गांवों में भी किया गया.

सूर्यग्रहण खत्म हो गयालेकिन समाज पर अंधविश्वास का ग्रहण अब भी लगा है. कर्नाटक में गुलबर्गा के इलाकों में 108 बच्चों को ग्रहण के दौरान जमीन में गाड़े रखा गयामासूमों का कसूर बस इतना था कि ये मानसिक रूप से कमजोर हैं और इन पर जुल्मोसितम इलाज के नाम पर किया गया.
बीमारी दूर करने के लिए बच्चों को गाड़ा
गुलबर्गा के इस इलाके में ऐसी मान्यता है कि सूर्यग्रहण के दौरान अगर ऐसे बच्चों को तालाब के पास जमीन में गले तक गाड़ दिया जाए तो उनकी बीमारी ठीक हो जाती हैऐसा करने से बच्चों में ताकत और बुद्धि आती हैइसे अंधविश्वास या अक्ल पर ग्रहण नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगेदुनिया जब सदी के सबसे बड़ा सूर्यग्रहण का नजारा ले रही थीगुलबर्गा में कुछ लोग गड्ढा खोदने में लगे थे.
एक भारत आसमान के रहस्यों को खंगाल रहा थातो दूसरा भारत ज्ञान की जमीन खोदने में लगा थानगड्ढा खोदा जाता हैबच्चों को उसमें डालकर मिट्टी भरा जाता हैबच्चे रोते-बिलखतेहैंलेकिन किसी को इन पर रहम नहीं आतारहम आता भी कैसेलोगों की आंखों पर अंधविश्वास की चर्बी जो चढ़ी थी.

अरविंद चतुर्वेदी जी कहते हैं कि गये वे ज़माने जब पुरोहित,पंडित ,पुजारी अपने अपने यजमानों को ढूंढने के लिये या तो मन्दिर मे जाकर ठीया जमाते थे या अपने पुश्तैनी यजमानों के घर के चक्कर लगाते थे. अब ज़माना हाई फाई हो गया है तो पंडित-पुरोहित भी कैसे पीछे रहते.अब तो टेलीविज़न चैनल घर बैठे ईश्वर के दर्शन कराने को तैयार हैं और आपके नाम के संकल्प के माध्यम से ओनलाइन पूजा- थाली भी अर्पित कर रहे हैं . अब हवन करते हाथ जलाने की आवश्यकता नहीं और  ही चिंता कि आम की लकडी कहां से लायेंगे और पुरोहित कहां ढूंढेंगे. सब कुछ ओनलाइन उपलब्ध है.
मन्दिरों ,विशेषकर बडे मन्दिरों ,की अपनी अपनी वेबसाइट हैं ,जहां  केवल आप दर्शन कर सकते हैं बल्कि चढ़ावा भी आपके नाम से पंजीकृत हो कर लगाया जा सकता है.

दीपाली पांडे लिखती हैं कि मौनसून की बेरुखी से बिहार-यूपी में किसानों की शामत आई हुई है । बारिश न हुई तो खेती -बाड़ी चौपट ,खाने को अन्न मिलना मुश्किल हो जाएगा । फसल के मौके पर बादलों के देव की नाराजगी से खौफजदा इन किसानों की आंखों में विदर्भ और बुंदेलखंड के दृश्य तैरते रहते हैं । जब इन्सान डरा हुआ हो तो अंधविश्वास की डोर और भी पक्की हो जाती है ।यूपी- बिहार के विभिन्न इलाकों में आए दिन देवराज इन्द्र को मनाने के लिए तरह -तरह के टोटके कर रहे हैं । कहीं मेढक-मेढकी की शादी करवाई जा रही है तो कहीं बैलों की जगह लोग ख़ुद जुए में लग खेत जोत रहे हैं । ऐसे में इस घटना को अंधविश्वास कहें या कुछ भी पर इन ग्रामीण किसानों को पूरा भरोसा है कि इन्द्र को भी शर्म आएगी और वो जलवृष्टि अवश्य करेंगे 

पड़ोसी देश नेपाल में किसी कमउम्र बच्ची को जीवित देवी के रूप में पूजने की परंपरा शताब्दियों से चली  रही है। स्थानीय शाक्य समुदाय से चुनी जाने वाली इस लड़की को अपना बचपन एक छोटे महलनुमा मंदिर में बिताना पड़ता है। पुजारियों के अनुसार कुमारी बनने के लिए लड़की का शरीर विशिष्ट गुणसंपन्न होना चाहिए। इसके साथ ही उसको अपनी बहादुरी साबित करने के लिए एक कमरे में अकेले बैठकर भैंसे की बलि का दृश्य बिना रोये देखना पड़ता है। सिर्फ त्योहारों के अवसर पर ही कुमारी को राजधानी काठमांडू में भक्तों के दर्शनार्थ बाहर घुमाया जाता है। 

अंधविश्‍वास से न जाने कितने ठगे जा रहे हैं , धर्म रिपोर्टर की ये खबर  ठगी का शिकार हुए सांसी समाज के मुताबिक खुद को मां शकोतरा माता का भक्त बता कर अशोक जाडेजा नें सांसी समाज के लोगों को पहले तो धर्म और आस्था के नाम पर विश्वास मे लिया फिर उसने अपनी पत्नी के साथ मिलकर इस महाघोटाले को अंजाम दिया।
पाखंडी बाबा अशोक जाडेजा ने इस ठग विद्या की शुरुआत अपने ससुराल जोधपुर से की जहां उसने पहले तो लोगों के बीच में खुद को बाबा के रूप में प्रसिद्ध किया। फिर जनता का विश्वास इस कदर उसने जीता कि लोग उस देखते ही उसके पैरों पर पैसों की बरसात करने लगते थे। इसी अंधविश्वास का सहारा लेकर आखिर कार उसने एक लंबी प्लानिंग कर डाली, ऐसी प्लानिंग की जिसमें उसने आम भोली भाली जनता को अपना शिकार बनाया खास तौर पर उसके चंगुल में सांसी समाज के लोग ज्यादा फंसे। जाडेजा ने लोगों को तीन महींनें में अपनी रकम तिगुना करने का लालच देकर तकरीबन 1800 करोंड़ ऐंठ लिए।
यह तो मान्यताएँ हैं, लेकिन यहाँ के पानी की तासीर कुछ अलग है। अभी इसकी पूरी वैज्ञानिक जाँच होनी बाकी है, क्योंकि यहाँ की बावड़ी ही नहीं, बल्कि आसपास के कुओं के पानी में भी कुछ खास है। गर्मियों में जब बावड़ी का पानी सूख जाता है, तब आसपास के कुओं से बावड़ी में पानी डाला जाता है। इस पानी का भी रोगियों पर सकारात्मक असर होता है।

पर इस न्‍यूज को हम आस्‍था भी कह सकते हैंइससे पता चलता है कि यहाँ के पानी में ही कुछ खास है। हमने अपनी खोजबीन में महसूस किया कि यहाँ आने वाले कई लोग दावा कर रहे थे कि यहाँ आने के बाद उनका लकवा ठीक हुआ है, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ता है। यहाँ के लोगों का कहना है, हम सभी माँ की औलाद हैं। यदि हम उन पर जननी की तरह विश्वास रखकर तकलीफ दूर करने की विनती करेंगे तो वे हमारी मुराद जरूर पूरी करेंगी। अब आप इसे आस्था कहें या अंधविश्वास, लेकिन यह सच है कि यहाँ स्नान करने वाले कई लकवा रोगी ठीक हो जाने का दावा करते हैं। 

अंधविश्वास को बढावा देकर माल अंटी करना क्या उचित है ??
दोपहर, देर रात और सुबह सवेरे अगर आपने अपना बुद्धू बाक्स खोलें तो आपको स्वयंभू भविष्य वक्ता अंक ज्योतिषी और ना ना प्रकार के रत्न, गण्डे, तावीज बेचने वाले विज्ञापनों की दुकानें साफ दिख जाएंगी। यह सच है कि हर कोई अनिष्ट से घबराता है। मानव स्वभाव है कि वह किसी अनहोनी के  घटने के लिए हर जतन करने को तत्पर रहता है। इसी का फायदा अंधविश्वास का व्यापार करने वाले बडे ही करीने से उठाते हैं। विडम्बना यह है कि इस अंधविश्वास की मार्केटिंग में ``न्यूज चेनल्स`` द्वारा अपने आदशोZ पर लालच को भारी पडने दिया जा रहा है।

डॉक्‍टरी के कॉलेज में दाखिले के लिए कोचिंग देने वाली संस्‍थाएं भी अंधविश्‍वास से नहीं बच पा रही हैं ... कमाल कानपुर की रिपोर्ट देखिए न्यू का बड़ा नाम है काकादेव की कोचिंग मंडी में न्यू की तलाश में दिखे कुछ कोचिंग्स के बोर्ड खुद कह देते हैं पूरी कहानी
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विदेशों की ओर मुंह ताकते रहनेवाले भी अब निराश हो सकते हैं , क्‍यूंकि वैज्ञानिक शोध भी अब अंधविश्वास फैला रहे हैं , ये देखिए ...
Detriot( America ) के Wayne state university मनोवैज्ञानिको ने दावा किया है कि बच्चो का नाम यदि अंग्रेजी के अक्षर "A" से शुरू हो तो उनकी आयु दस साल तक बढ़ सकती है, जबकि "D" से नाम शुरू होने पर बच्चो का जीवनकाल घट जाता है। नाम के "E" से "Z" के बीच किसी भी अक्षर से शुरू होने पर आयु में कोई विशेष अंतर नहीं आता है। शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष १०,००० हज़ार से अधिक खिलाडियो, चिकित्सकों  वकीलों के जीवनकाल का अध्ययन करने के बाद निकाला। A से नाम शुरू होने वाले लोगो कि औसत आयु ७३. वर्ष, "D" से नाम शुरू होने वाले लोगो कि ६९. वर्ष  "E" से "Z" के बीच किसी भी अक्षर से नाम शुरू होने वाले लोगो की ७१. वर्ष होती है, ऐसा इस शोध का कहना है। शोधकर्ताओ ने कहा की "D" grade पढ़ाई में पिछड़ने की निशानी है, इसी कारण "D" अक्षर से नाम शुरू होने वाले लोगो का आत्मविश्वास कम होता है, जिसका असर उनकी प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है।

रविकांत प्रसाद लिखते हैं‍ कि अंधविश्‍वास के कारण मृत्‍यु के बाद भी चैन नहीं मुर्दों को भी चाहिए पैसे कहते हैं कि मरने के बाद व्यक्ति खाली हाथ ही जाता है। सत्य है, पर शास्त्र बताते हैं कि मरनेवाले की आत्मा को तबतक शांति नहीं मिलती, जबतक उसका क्रियाक्रम ठीक ढंग से  किया जाए। बस, इसी का फायदा उठाते हैं डोम और पंडित। पंडित जी मरनेवाले परिवार से हजारों तो डोम भी सैकड़ों रुपए वसूल लेते हैं। अपनों के मरने के गम में सराबोर अनगिनत लोगों को इस आडम्बर को पूरा करने में जेवर  जमीन तक बेच देनी पड़ती है। 21वीं सदी में भी डोम श्मशान घाट का राजा बना हुआ है। बिहार की बात करें तो यहां कोई ऐसा श्मशान घाट नहीं है, जहां डोम मनमानी और रंगदारी  करते हों। यदि जेबें भरी  हों तो मृतक का शव जलाना मुश्किल नहीं असंभव है। अर्थात, मरने के बाद भी चाहिए हजारों-हजार रुपए, यानी शव...श्मशान...डोम...रुपए भी सत्य है। 
मनुष्य जीवन भर किसी व्यक्ति को चाहे कितना कष्ट क्यों  पहुंचाए परंतु उसके मरने के बाद धूमधाम से दाह संस्कार जरूर करता है। उसे डर रहता है कि कहीं उसकी आत्मा उसे तंग करना  शुरू कर दे। इस अंधविश्वास में लगभग सभी मनुष्य रहते हैं, जीते हैं। इसी का फायदा उठाते हैं डोम और पंडित। दाह-संस्कार के क्रम में पंडित जी बार-बार यह कहना नहीं भूलते कि दान में कमी होने पर मृतक की आत्मा भटकती रहेगी।