क्या ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास? इस ब्लॉग में आप ज्योतिष के आधुनिक सूत्रों से सम्बद्ध नवीन ज्योतिषीय सिद्धांत के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे, जो ज्योतिष की सटीकता पर शोध, ज्योतिष में नए शोध और निष्कर्ष के उपरांत विकसित किया गया है, नए ज्योतिष सूत्रों के माध्यम से कुंडली विश्लेषण, इन ज्योतिष के नए नियमों से भविष्यवाणी कैसे करें, 'ज्योतिष सीखने के लिए नए सूत्र और विधियाँ बताई गयी हैं।
सच्चा जीवनसाथी [कहानी] - संगीता पुरी
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
अपने हिस्से का सुख (कहानी) .... संगीता पुरी
hamari kahani
मात्र एक खबर से पूरे घर में सन्नाटा पसर गया था। सुबह एक्सीडेंट के बाद से ही सबके कान समय समय पर फोन पर होनेवाले बातचीत में ही लगे थे , इसलिए फोन रखते हुए 'मामाजी नहीं रहें' कहनेवाले पुलकित के धीमे से स्वर को सुनने में मां को तनिक भी देर न लगी और वह तुरंत बेहोश होकर गिर पडी। हमारे बहुत कोशिश करने पर ही वह होश में आ सकी , अपने इकलौते भाई की मौत का सदमा झेल पाना आसान तो न था। अभी उम्र ही क्या हुई थी , अभी नौकरी के भी दस साल बचे ही थे यानि मात्र 50 के ही थे वे। मेरे हाथ भले ही मम्मी को पंखा झल रहें हो , पर मन में विचारों का द्वन्द्व चल ही रहा था।
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नगों वाला सेट ...(कहानी)
hamari kahani
बाजार जाने के लिए ज्योंहि मैं तैयार होकर बाहर निकली, बारिश शुरू हो चुकी थी। लौटकर बरामदे में एक कुर्सी डालकर एक पत्रिका हाथ में लेकर बारिश थमने का इंतजार करने लगी। बाजार के कई काम थे, बैंक से पैसे निकालने थे, राशन और सब्जियां भी लानी थी। कभी कभी बाजार निकल जाना मन लगाने के लिए तो अच्छा होता ही है, सेहत के लिए भी अच्छा रहता है। वास्तव में वक्त काटने के लिए घर में कोई काम भी तो नहीं , एक पत्रिका को इतनी बार पढ लेती हूं कि उसके एक एक शब्द रटे से लगते हैं। मैगजीन को एक ओर रखती हुई सामने नजर डाला , तो बारिश और तेज हो चुकी थी। पिछले तीन दिनों की तरह ही आज भी घर से निकल पाने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। वो तो भला हुआ कि कुछ जरूरी सामान कई दिन पहले ही नौकर से मंगवा लिया था , नहीं तो आज खाने पीने की भी आफत हो जाती। कई दिनों से झमाझम बारिश जो हो रही है।
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मिथ्या भ्रम (कहानी) ... संगीता पुरी
hamari kahani
‘क्या हुआ, ट्रेन क्यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए पूछा। ’अरे, तुम सो गयी क्या ? देखती नहीं , बोकारो आ गया।‘ बोकारो का नाम सुनते ही वह चौंककर उठी। तीन दिनों तक बैठे बैठे कमर में दर्द सा हो रहा था। कब से इंतजार कर रही थी वह , अपने गांव पहुंचने का , इंतजार करते करते तुरंत ही आंख लग गयी थी। अब मंजिल काफी नजदीक आ गयी थी। उसने अपने कपडे समेटे , मोनू को संभाला और सीट पर एक नजर डालती हुई ट्रेन से उतरने के लिए क्यू में खडी हो गयी।
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सिक्के का दूसरा पहलू
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एक झूठ के बाद पढें मेरी अगली कहानी ... सिक्के का दूसरा पहलू
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एक झूठ ( कहानी ) ..... संगीता पुरी
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जब ब्लॉग जगत में आयी थी तो मैने सिर्फ 'गत्यात्मक ज्योतिष' नाम का अपना ब्लॉग बनाया था और उसमें ज्योतिषीय लेख ही पोस्ट किया करती थी। डायरी में कुछ पुरानी कहानियां लिखी पडी थी , ज्योतिषीय ब्लॉग में उसे पोस्ट करना अच्छा नहीं लगा। एक दिन साहित्य शिल्पी पर निगाह पडी तो उन्हें ही अपनी सारी कहानियां प्रकाशित होने के लिए भेजती गयी। 'गत्यात्मक चिंतन' बनाने के बाद कई बार इच्छा हुई कि मैं अपनी कहानियों को इसमें पोस्ट कर दूं , पर किसी न किसी कारणवश टालती रही। आज मेरे जीवन की पहली कहानी ' एक झूठ' आप सबों के समक्ष प्रस्तुत है .....
रोशनी की ओर जैसे ही उसके कदम बढे , उसने अपने आपको एक खूबसूरत सजे धजे बाजार में पाया। बाजार में फैला प्रकाश इस बेला मे भी लोगों को काम करने का संदेश दे रहा था। हर ओर ग्राहको की भीड थी। कई राशन खरीद रहे थे , तो कई सब्जियां , कई बरतन तो कई खिलौने , कई कपडे तो कई गहनें। कुछ औरतें सौंदर्य प्रसाधन खरीदनें में व्यस्त थी। लेकिन इस भीड भरे वातावरण में उसे सिर्फ अपनी ही चिंता थी। वह करे तो करे क्या? जाए तो जाए कहां? कुछ न सोच पाने के बावजूद वह चलती ही जा रही थी। उसके कदम एक पल को भी रूके न थे। उसने अनुमान किया, मेले से बस स्टैंड और बस स्टैंड से इस बाजार तक आने में उसने चार पांच किमी की दूरी तय कर ली थी। उसके कदम बोझिल हो गए थे, पर एक आध घंटे विश्राम के लिए वह कोई भी जगह निश्चित नहीं कर पा रही थी। ऐसी वैसी जगह बैठ जाए, तो लोगों की संदेहात्मक दृष्टि का सामना करना पड सकता है। इसी से बचने के लिए वह चेहरे पर भय की भी रेखा आने नहीं देना चाहती थी, पर परेशानी के भाव चेहरे पर बार बार उपस्थित होकर उसके आत्मविश्वास को कम करने का पूरा प्रयास कर रहे थे।
उसके साथ पिताजी के इस व्यवहार का कारण भी स्पष्ट था। पिताजी और माँ के विवाह के तुरंत बाद ही माँ के गर्भ में आए उसे तीन माह भी नहीं हुए थे कि माँ की तबियत असामान्य हो गयी थी। बहुत मुश्किल से दवाइयों, टानिको, फल मेवों और छह महीने के उचित देखभाल के बाद ही मां की जान बची थी और बडे आपरेशन से ही उसका जन्म हो पाया था। जन्म के बाद भी कई तरह की उलझनें उपस्थित हो गयी थी, जिसके कारण डाक्टर ने दूसरा बच्चा न होने के लिए मां और पिताजी को सख्त हिदायत दे दी थी। उसके जन्म के पांच छ: महीनें बाद ही मां सामान्य हो सकी थी। उस समय तक पिताजी ने उसकी देख रेख में कोई कसर नहीं छोडी थी। यूं तो उसके लिए बाई की भी व्यवस्था की गयी थी पर अपने को संतुष्ट करने के लिए पिताजी बहुत से काम खुद ही किया करते थे। इसके लिए उन्हें आफिस से भी इतनी छुटिटयां लेनी पडी थी कि उनकी नौकरी पर भी संकट आ गया था, पर शीघ्र ही न सिर्फ नौकरी ही बची, वरन बहुत जल्द प्रोमोशन के साथ अपने गांव में ही स्थानांतरण भी हो गया। इस दैवी कृपा का सारा श्रेय उसे ही दिया गया और एक वर्ष तक इतने कष्ट देने के बावजूद उसे ’लक्ष्मी’ संबोधन से संयुक्त किया गया। लेकिन पुत्र न हो पाने की कसक ने भरतीय मानसिकता से संयुक्त मां पिताजी को उसे बेटे की तरह पालने को मजबूर कर दिया और वह बेटी होते हुए भी बेटा बन गयी।
सचिन तेंदुलकर की वह फैन थी। पिछले ही वर्ष उसके इस शहर में आने की सूचना उसकी कक्षा के अन्य छात्रों को मिली। जिस गेस्ट हाउस में उसके ठहरने का इंतजाम हुआ था, उसके एक कर्मचारी उसकी दोस्त के नजदीकी रिश्तेदार थे। कक्षा की कई छात्राओं ने सचिन से मिलने का प्रोग्राम बनाया। वह कहां पीछे रहनेवाली थी, झट उसमें शामिल हो गयी। 10 बजे उसके स्कूल की घंटी बजती थी। उसी समय गांव से शहर जाने के लिए एक बस खुलती थी। शाम 4 बजे उसका स्कू्ल बंद होता था, उसी समय शहर से बस गांव पहुंच जाती थी। गांव का सरकारी स्कूल था, बच्चों के लिए एक दो दिनों तक अनुपस्थित रहना आम बात थी। उस दिन नियत समय पर सभी जमा हुई, गांव से शहर पहुंची, बस स्टैंड से गेस्ट हाउस। कल्पना तो थी कि सचिन से ढेर सारी बातें करेंगी, पर सिर्फ आटोग्राफ से ही संतुष्ट होना पडा। वापस बस में पहुंची, फिर गांव, घर बस्ता लेकर इस प्रकार आयी मानो स्कू्ल से ही वापस आयी हो। पर मां को पता नहीं कैसे खबर लग चुकी थी, उन्होने समझाना शुरू किया और वह आदतन एक कान से सुनती और दूसरे कान से निकालती चली गयी। आज जब उसे शहर से गांव वापस जाने के लिए बस नहीं मिली , तब उसे पता चला कि उसने गांव से शहर वापस आकर कितनी बडी गलती की है। और कुछ सहेलियां रहती, तो कोई उपाय भी हो सकता था, पर अकेले एक लडकी………………।
आज लडकी होने के अहसास मात्र से मन में उपजा भय सारे वातावरण को डरावना बना रहा था। हुआ यूं कि कल उसकी दो तीन सहेलियां शहर में लगे मेले को देखने आयी थी। उन्होने मेले की इतनी तारीफ की कि उसका मन भी मेले को देखने के लिए उत्कंठित हो उठा। उसने कई सहेलियों को पूछा, पर उसका साथ देने को कोई भी तैयार नहीं हुई। शहर जाना और वहां से लौटना तो बिल्कुल ही आसान है, पिछली बार उसने यह महसूस किया था, इसलिए आज सुबह स्कूल में अपना बस्ता सहेलियों को सौंपकर वह झट से शहर जाने वाली बस में बैठ गयी थी। लडकियों ने उसे अकेले शहर जाने से मना भी किया, पर उसके दिमाग में जो बातें आ गयी, उसे पूरा करने की जिद ने उसे शहर जानेवाली बस में अकेले ही बैठा दिया। पाकेट खर्च के दो सौ रूपए उसके पास थे, जो मेले देखने के लिए काफी थे। लौटती बस में वापस आने के लिए जब वह स्टैंरड पहुंची, तो मालूम हुआ, बस बारात के लिए बुकिंग में चली गयी है। गांव के लिए और कोई दूसरी गाडी नहीं थी, यह जानकर उसके पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गयी।
उसे अब चिंता थी तो सिर्फ अपने मां पिताजी की। जब उसकी सहेलियां उसका बस्ता ले जाकर उन्हें देंगी और कहेंगी कि वह मेला देखने अकेले ही गयी है, मां पिताजी को मालूम होगा कि बस आज लौटकर वापस नहीं आएगी, तो वे कहां ढूढेंगे उसे? मां पिताजी के बारे में सोंचते ही वह परेशान हो गयी। गांव में फोन की सुविधा होती तो फोन ही कर देती उन्हें। मां पिताजी रात कैसे व्यतीत कर पाएंगे, वह तो उनके यहां जाकर आराम से खा पीकर सो जाएगी। मन ही मन माफी मांगकर उसने अपने आप को शांत किया। पश्चाताप के आंसू गालों पर लुढक पडें।
छोटे शहरों में भी आजकल जगह की कमी के कारण मकान मालिकों ने पैसे कमाने का एक अच्छा तरीका ढूंढ निकाला है। वे एक बडी इमारत में एक एक कमरे रसोई और बाथरूम को अलग अलग करते हुए फलैट बनाकर किराए पर लगा देते हैं। इससे उन्हें एक अच्छी रकम किराए के रूप में मिल जाती है। तीनमंजिला तीस फलैटों वाली इमारत थी ये। सबसे उपरी मंजिल पर सीढियां खत्म होते ही जायसवाल जी का दरवाजा आ गया। उन्होने जेब से चाबी निकाला और दरवाजा खोलने लगे। देखते ही उसके होश उड गए। ‘घर पर और कोई नहीं है क्या’ उसके मुंह से अनायास ही ये शब्द निकले। अंदर आने के बाद उन्होने कहा ‘पांच वर्ष पहले ही मेरी शादी हुई थी, पर तीन चार महीने बाद ही पत्नी मायके चली गयी। कुछ ही दिनों में मेरा उससे तलाक हो गया।‘ कारण पूछने पर उन्होने स्पष्ट कहा ‘उसे मेरे चरित्र पर संदेह था’ उसकी नजर घडी पर पडी। 8 बज रहे थे। वे बाजार से लाए सामानों को लेकर रसोई में चले गए। चाय बनाया और एक प्याला उसे भी थमा दी। शाम से ही वह इतनी परेशान थी कि चाय उसे अमृत की तरह लग रहा था, पर जायसवाल जी के घर में किसी और को न देखकर उसका मन पुन: अशांत हो गया। ये क्या, 'आकाश से गिरे खजूर पर अटके' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। उसका मन हुआ, जाकर कुछ मदद करे उनकी, पर हिम्मत रसोई में जाने की न हुई। अकेले उनके साथ रात कैसे व्यतीत करेगी, सोच सोचकर मन परेशान था।
वैसे तो उसकी उम्र काफी कम थी, अभी अभी उसने अपना तेरहवाँ जन्मदिन मनाया था, पर मां पिताजी और परिवार जनों के प्यार दुलार और खिलाने पिलाने की विशेष व्यवस्था से उसके स्वस्थ शरीर में इतना निखार आ गया था कि देखनेवालों को उसकी उम्र का सही अंदाजा भी नहीं लग सकता था। अपनी सारी सहेलियों की तुलना में वह काफी बडी दिखाई देती थी। इधर एक दो वर्षों में शरीर की बढोत्तरी के साथ साथ दिमाग में भी बहुत सारी बातें आ गयीं थीं। कुछ पिक्चर, कुछ घटनाएं, कुछ सखी-सहेलियो और कुछ कहानियों से युवावस्था, सेक्स, स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में काफी कुछ समझ में आ गया था। हालांकि जायसवाल जी उसके सामने काफी बुजुर्ग थे और उसने उनकी आंखो में ऐसा कुछ भी नहीं देखा था कि उन पर शक किया जाए, पर उनकी पत्नी, उसने इनके चरित्र पर शक क्यो किया, फिर इतने दिनो से ये क्वारें क्यो बैठे हैं, मन में ऊल-जुलूल बाते घूम रही थी। कई घटनाओं में एकांत मिलने पर मर्दों को सीमाओं का उल्लंघन करते उसने पाया था। मर्दों की उम्र के बारे में भी कहना बहुत मुश्किल है, क्योंकि गांव के एक अंकल, जिनकी उम्र किसी भी हालत में 35 से कम की नहीं होगी, उसके साथ पढनेवाली लडकियों को इस निगाह से देखते हें कि उन लोगों ने उस रास्ते से गुजरना ही छोड दिया है। दिन तो फिर भी किसी के साथ व्यतीत किया जा सकता है, पर रात इस एक कमरेवाले स्थान में एक अजनबी पुरूष के साथ………..उसे मां की समझायी हुई बातें याद आने लगीं। लडकियों की सबसे कीमती चीज का अर्थ अब समझ में आ गया था। इज्जत खोने के बाद सही में जिंदगी नर्क ही हो जाती होगी, वह क्या करे अब? कैसे बचाए अपने आपको?
इवनिंग शो तुरंत ही छूटा था और नाइट शो की शुरूआत होने ही वाली थी। इसलिए उतनी रात गए भी सडक पर अच्छी चहल पहल थी और इसलिए उसे किंचित मात्र को भी भय नहीं हुआ। हाल के मेन गेट पर पहुंच जाने के बाद उसे चाचाजी के यहां जाने का रास्ता भी आसानी से मिल गया। गेट पर पहुंचते ही वह खुशी से पिंकी पिंकी चिल्लाने का दुस्साहस कर बैठी। पर यह क्या? एक मोटे और नाटे व्यक्ति ने दरवाजा खोला। ‘क्या है रे!‘ उस मोटे व्यक्ति ने पूछा। उसकी तो जबान ही नहीं खुल रही थी, पर हिम्मत जुटाकर पूछा ‘पिंकी है’ ‘यहां कोई पिंकी नहीं रहती। मै यहां छह महीनों से रह रहा हूं।‘ उसने जवाब दिया। बगल में चंदा आंटी रहती थी, उसे याद आया, उसने घंटी बजायी, अंकल आण्टी बाहर निकले। ‘आण्टी मै किरण, कल्याणपुर से आयी हूं। पिंकी की बहन’ आण्टीं ने दिमाग पर जोर डाला, पर दो वर्षों का अंतराल, मात्र एकाध घंटे की भेंट और उसके कद काठी में आया परिवर्तन , वह पहचान न सकी। ‘मै अकेली हूं। कृपया रात गुजारने की जगह दे दो’ उसने फिर विनती की। अंकल ने कहा ‘अरे चलो! घर बंद करो। शरीफ घर की लडकियां इतनी रात गए बाहर रहती हैं क्या? आजकल बदमाश लडकियों का गिरोह शहर आया हुआ है। शरीफ बनकर घरों में घुसकर चोरियां, डकैतियां करवाती हैं’ खट के साथ दरवाजा बंद हुआ, जिसकी चोट दिल और दिमाग दोनो को ही लगी। थकहारकर उसने वापस अपने कदम जायसवाल जी के फलैट की ओर बढाए। रात्रि के साढे नौ बज चुके थे। रास्ता अब सुनसान हो चुका था। सन्नाटा ही सन्नाटा नजर आ रहा था। अभी के हालात में सबसे सुरक्षित स्थान जायसवालजी का फलैट ही था, पर वहां भी तो………………….
हां पिताजी, आजतक छोटी मोटी समस्या्ओं से ही उन्होने ही मुक्ति दिलायी है। ‘पिताजी तो पहुंच ही सकते हैं’, उसने सोंचा और उसके चेहरे पर चमक आ गयी। उसके कदम तेजी से जायसवाल जी के फलैट की ओर बढे। हाथों ने घंटी बजायी। दरवाजा खुला। जायसवालजी के आंखों में कई प्रश्न तैर रहे थे। ‘मेरे रिश्तेदार ने डेरा बदल लिया है। पर मैने वहां जाकर बहुत अच्छा किया। मुझे ढूंढते हुए पिताजी वहां पहुंच गए हैं। मुझे देखकर काफी खुश हुए। उनके पडोस में पिताजी का खाना बन रहा है। पिताजी जब पिछली बार यहां आए थे, तब उन्होने पिताजी की कविताएं सुनी थी। आज भी वहां ऐसी ही चर्चा चल रही है। पिताजी को मैने आपके फलैट के बारे में बता दिया है। उन्होनें मुझे यहां भेज दिया । वे यह जानकर बहुत खुश हुए कि मै आपके पास सुरक्षित पहुंच गयी।‘ इतना सारा झूठ एक सांस में अच्छी तरह बोलने के बाद उसके चेहरे का सारा तनाव दूर हो गया। उसने इतनी सफाई से झूठ बोला था कि जायसवाल जी भी अविश्वास न कर सके। उन्होंनें दो प्लेट में खाना निकाला। खुद भी खाए, उसे भी खिलाया। खाना खाने के बाद उसने एक लिहाफ मांगा और सोफे पर ही निश्चिंति से लुढक गयी।
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क्या लालू , बालू और कालू की मजेदार कहानी आपको याद है ??
amari kahani
अचानक बचपन में किसी पत्रिका में पढी एक मजेदार कहानी की आज मुझे याद आ गयी। किसी गांव में तीन भाई रहा करते थे .. लालू , बालू और कालू । लालू और बालू खेतों में काम करते , जबकि कालू का काम उस गांव के दारोगा जी के लिए खाना बनाना होता था। खेतों की फसल और कालू की तनख्वाह से तीनो भाइयों का जीवनयापन खुशी खुशी हो रहा था। पर कुछ ही दिनों बाद लालू और बालू को अहसास हुआ कि उन्हें खेत में बहुत अधिक मेहनत करनी पडती है और लालू सिर्फ दो समय का खाना बनाकर अच्छा अच्छा खाना खाकर आराम का जीवन जी रहा है। इस बात का अहसास होते ही दोनो भाई कालू से झगडा करने लगे।
कालू ने बहुत देर तक उन्हे समझाने की कोशिश की कि दारोगा जी का खाना बनाना बहुत आसान काम नहीं है , वे दोनो नहीं कर सकते। पर दोनो भाई इसे समझने को तैयार ही नहीं थे। दोनो भाइयों के विरोध को देखते हुए कालू ने उन्हें शांत करने के लिए दो चार दिनों तक उन्हें दारोगा जी के यहां खाना बनाने के लिए भेजने का निश्चय किया। दूसरे ही दिन लालू को इस कार्य के लिए भेजा गया , लालू थाने के अहाते में बने दारोगा जी के निवास पर पहुंचा। दारोगा जी ने उसका परिचय पूछा। उसने बताया कि वह कालू का भाई लालू है और उनका खाना बनाने के लिए यहां आया है।
दो दिन पहले गांव से लौटे दारोगा जी अपने चाचाजी की मृत्यु के क्रियाकर्म में अपना सर मुंडवा चुके थे और लॉन में बैठे पेपर पढ रहे थे। लालू की निगाह जब उनके सर पर पडी , तो वह जोर जोर से हंसने लगा। दारोगा जी ने उससे हंसने का कारण पूछा तो उसने बताया कि आपका सर तकला है , उसमें बिल्कुल भी बाल नहीं है , यदि किन्ही कारणों से आपका सर कट जाए तो उसे ढोया कैसे जाएगा ?
'तुम्हें बात करने की बिल्कुल भी तमीज नहीं , तुम्हें यहां किसने भेजा ?' अपने चाचाजी की मृत्यु से दुखी दारोगा जी को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आयी और नाराज होकर उन्होने लालू को थाने में बंद कर दिया। शाम को खेत से लौटने के बाद बालू और कालू काफी देर तक लालू का इंतजार करते रहें । जब वह नहीं आया तो शाम के अंधेरे में ही कालू उसे ढंढने थाने की ओर चला।
वहां जाकर गुस्से से भरे दारोगा जी से सारी बातें मालूम हुई। उसने दारोगा जी से कहा ' क्या बताऊं दारोगा जी , इसको थोडी भी अकल नहीं , इसे माफ कर दीजिए , अरे इतना तो दिमाग लगाना ही चाहिए था कि यदि आपका सर कट भी जाए , तो मुंह तो खुला होगा न , उसमें डंडा डालकर उससे आपके सर को उठाते हुए आराम से कहीं भी ले जाया जा सकता है।
दारोगा जी का गुस्सा और बढना ही था। उन्होने नाराज होकर बालू को भी थाने में बंद कर दिया। दोनो भाइयों का इंतजार करते हुए जब कालू थक गया , तो देर रात वह भी दारोगा जी के यहां पहुंचा। दारोगा जी ने उसका स्वागत किया और कहा कि तुमने किन बेवकूफ भाइयों को मेरे यहां भेज दिया था। उसके बाद उसे पूरी कहानी सुनायी। 'क्या कहूं सर, मैं तो इतने दिनों से इन्हें झेल रहा था, यह सोंचकर उन्हें यहां भेजा कि आप इनकी दो दिनों में अवश्य छुट्टी कर देंगे , तब मैं काम पर लग ही जाऊंगा, पर ये तो एक घंटे भी नहीं टिक सकें।'
'सर ये इतने बेवकूफ हैं , इन्हें इतना भी नहीं पता कि यदि किसी तरह आपका सर कट ही जाए , तो एक कान से धागा डालकर दूसरे कान से निकालकर आराम से आपके सर को ढुलकाते हुए ले जाया जा सकता है।'
उसके बाद कालू का भी क्या हाल हुआ होगा , इसका अनुमान आप लगा ही सकते हैं !!
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
लाइए हमारा इनाम .. हमने आपको झूठी कहानी सुना दी !!
Nai Kahani
एक राजा को झूठी कहानियां सुनने का बहुत शौक था , मतलब कि ऐसी कहानी जो सच हो ही नहीं सकती। उन्होने पूरे राज्य में घोषणा कर दी थी कि उनको जो भी झूठी कहानी सुना दे , जो कभी सत्य हो ही नहीं सकती , तो राजा की ओर से इनाम के रूप में बडी राशि दी जाएगी। पूरे राज्य से राजा को ऐसी कहानियां सुनाने के लिए लोग आते , पर राजा को संतुष्टि नहीं होती। वे हर कहानी को सच्ची मान लेते , कहते 'ऐसा तो हो ही सकता है , कुछ ऐसी कहानी सुनाओं , जो हो ही नहीं सके'। लोग अपने सामर्थ्यभर पूरी कोशिश करते , पर इनाम किसी को नहीं मिल पाता था , क्यूंकि राजा स्वीकार ही नहीं करना चाहते थे कि ऐसी घटना नहीं हो सकती है। कई लोगों को निराश लौटते देख एक नागरिक ने राजा को सबक सिखाने का निश्चय किया। वह राजा के दरबार में पहुंचा और कहानी सुनाना आरंभ किया, साथ साथ राजा का जबाब भी सुनते जाइए .....
'एक व्यक्ति दो बैलों की सहायता से अपने खेत में हल चला रहा था, एक बैल ने अपनी पीठ पर ही गोबर कर दिया'
'इसमें कोई झूठ नहीं, गोबर पीठ मे जा सकता है'
'उस गोबर में पीपल का एक बीज गिरा , जिससे पीठ पर पीपल का एक पेड निकल आया , वह पेड बडा होकर आसमान को छूने लगा'
'इसमें भी कोई झूठी बात नहीं, ये भी हो सकता है'
'किसान पेड पर चढता हुआ बिल्कुल ऊपर की टहनी तक जा पहुंचा , उसका सर आसमान से टकरा रहा था'
'आगे कहो , यहां तक तो कोई झूठ बात नहीं लगती'
'ओह , ये तो बहुत दुख की बात है , फिर किसान उतरा कैसे ?'
'ऊपर की टहनी थी न , नीचे से किसी ने रस्सी फेकी , उसने उस रस्सी को ऊपरवाले टहनी पर बांधा , फिर रस्सी के सहारे नीचे उतरने लगा।'
'ईश्वर की कृपा है , उसे सहारा मिल गया , अब आगे कहो , कुछ झूठ सुनाओ।'
'आधी दूरी तक ही वह उतरा था कि रस्सी छोटी पड गयी , बडी मुश्किल से उसने ऊपर की रस्सी खोली , फिर उसी रस्सी को नीचे बची एक टहनी में बांधा , फिर उसके सहारे नीचे आने लगा। पर जमीन से 20 फीट ऊपर ही था कि रस्सी एक बार फिर कम गयी। वह वहां से कूद पडा'
'किसान नीचे तो सही सलामत आ गया न, अब आगे क्या हुआ , मजा ही नहीं आ रहा , क्यूंकि अभी तक तो तुमने कुछ झूठ कहा ही नहीं'
'सही सलामत तो नहीं कहा जा सकता , क्यूंकि एक तो वह कीचड में गिर कर उसमें फंस गया , दूसरी मुसीबत कि उसके दोनो पैरों की हड्डी टूट गयी'
'ओह , किसी किसी व्यक्ति पर तो बडी मुसीबत आ जाती है.. आगे क्या हुआ ?'
'सबसे पहले तो उसे पैरो का इलाज कराने की आवश्यकता थी , पर इलाज तो वह तब कराता , जब कीचड से बाहर निकलता , कीचड से निकलने का कोई उपाय नहीं था , वह थोडी दूर पर बने एक झोपडी में गया , वहां से एक कुदाल लाया , फिर कीचड साफ की , तब बाहर निकला , अब अपने पैर के इलाज के लिए उसे डॉक्टर के यहां जाना था'
'यहां तक तो तुम झूठी कहानी न सुना सके , इलाज के बाद तो कहानी समाप्त ही हो जाएगी, तुम भी हारे , ऐसा लग रहा है।'
राजा के कहीं भी 'हां' न कहने से वह व्यक्ति बिल्कुल परेशान हो चुका था , उसने राजा को मजा चखाना चाहा। उसने कहा ..
'नहीं , इलाज से पहले ही तो एक महत्वपूर्ण बात हो गयी, किसान कीचड से निकला ही था कि एक गधे को सामने से आते देखा , उसने गधे से कहा, 'ऐ गधे , मुझे डॉक्टर के पास ले चलोगे ? तो गधे ने कहा कि वह साधारण गधा नहीं , यहां के राजा का बाप है , किसान ने कहा , तुम झूठ बोल रहे हो , राजा गधा नहीं , तो उसका बाप गधा कैसे हो सकता है ? इसपर उसने कहा कि जाकर राजा से पूछ लो, उसका बाप गधा है या नहीं ? अब मैं तो नहीं जानता , आप ही बता सकते हैं सरकार , गधे ने सच कहा या झूठ'
'यह कैसे हो सकता है ? गधा मेरा बाप नहीं हो सकता'
'इसका अर्थ यह हुआ कि ये कहानी गलत है'
'हां हां , बिल्कुल गलत'
'तो फिर लाइए हमारा इनाम, हमने आपको झूठी कहानी सुना दी'
'किसान चढ तो आराम से गया , उस पीपल के पेड पर आम के फल लगे थे, उसे तोडकर उसने अपने झोले को पूरा भर लिया , पर उतरने वक्त उसे काफी दिक्कत हो रही थी , क्यूंकि जिन जिन टहनियों से वह गुजरता गया , उसके पैरों के भार से सारी टहनियां पेड से टूटकर जमीन पर गिरती चली गयी थी'
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आज आपलोग मेरी कहानी 'थम गया तूफान' पढिए !!
hamari kahani
आज साहित्य शिल्पी में मेरी एक कहानी 'थम गया तूफान' प्रकाशित की गयी है , कृपया उसे पढकर अपनी प्रतिक्रिया देने का कष्ट करें !
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आज आपलोग मेरी कहानिया पढें ...
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