ज्‍योतिष के व्‍यावहारिक पक्ष

अभी तक आपने पढा ... इस तरह घर गृहस्‍थी में उलझने के बाद अपने कैरियर की ओर मेरा ध्‍यान नहीं रह गया था। भले ही स्‍वयं की संतुष्टि के लिए मै कुछ रचनाएं लिख लिया करती थी , पर मुझे अपनी इस योग्‍यता पर इतना विश्‍वास नहीं था कि इसकी बदौलत मैं अपनी पहचान बना सकती हूं। जबकि ज्‍योतिष में पापाजी के पूरे जीवन का रिसर्च आमजन के लिए बिल्‍कुल नया और बहुत उपयोगी था , जिसपर लिखने के ज्‍योतिष के क्षेत्र में इतनी जल्‍द मैने पहचान बना ली थी। इधर पापाजी की उम्र भी बढती जा रही थी और उनके वृद्धावस्‍था में प्रवेश करते देख उनके मित्र , चेले , जो कि उनसे धार्मिक , ज्‍योतिषीय और अन्‍य प्रकार के वैचारिक सहयोग लिया करते थे , अक्‍सर उनसे पूछा करते कि वे अपने जीवनभर के अनुभवों से जुटाए गए ज्ञान को किसके पास छोडकर जाएंगे ??

आरंभ में तो मुझे ज्‍योतिष सिखलाने की पापाजी की बिल्‍कुल भी इच्‍छा नहीं थी , पर मनुष्‍य के सोंचने से होता ही क्‍या है ?? पढाई के बाद के कुछ दिन और विवाह के बाद के कुछ दिनों में ही मैने ज्‍योतिष का सामान्‍य ज्ञान प्राप्‍त कर लिया था। इसके बाद हर वक्‍त पापाजी से कुछ न कुछ प्रश्‍न करती , जबाब देने के बाद पापाजी चौंकते कि अनजाने ही एक और रहस्‍य मैने जान लिया है। 1980 के बाद पापाजी ने पत्र पत्रिकाओं में लिखना बंद कर दिया था , इसलिए ज्‍योतिष के क्षेत्र में आ रही नई पीढी पापाजी से परिचित नहीं थी , इसलिए 1992 से मैने उनके खोज को 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के नाम से पत्र पत्रिकाओं में भेजना शुरू किया। 1996 में मेरी पुस्‍तक भी छपकर आ गयी थी।

पर उस समय तक पापाजी को इतना विश्‍वास नहीं था कि अपने उत्‍तराधिकारी के तौर पर वे उनलोगों से मेरा परिचय करवाते। पर मेरे तर्क वितर्क को देखकर तथा कुछ रचनाओं को खासकर ज्‍योतिष का समयानुसार बदलाव पढने के बाद उन्‍हें मुझपर भरोसा हो गया था । फिर तो वे धीरे धीरे मुझे सबसे मिलवाना शुरू किया। लोगों से मिलने के बाद , उनके प्रश्‍नों को सुनने के बाद मुझे महसूस होने लगा कि ज्‍योतिष की मात्र सैद्धांतिक जानकारी से लोगों का कल्‍याण नहीं किया जा सकता है। इसके लिए ज्‍योतिष के व्‍यावहारिक पक्ष को मजबूत बनाए जाने की आवश्‍यकता है। महीने में एक दो व्‍यक्ति या परिवार की समस्‍या को सुनकर ज्‍योतिष को पूरा गत्‍यात्‍मक नहीं बनाया जा सकता , जैसा कि पापाजी का लक्ष्‍य है। मुझे महीने भर लोगों से मिलते जुलते रहना चाहिए। पर नए जगह में , जहां एक ज्‍योतिषी के तौर पर मुझे कोई नहीं जानता , लोगों से मिलना जुलना संभव नहीं था।

10 बजे से 1 बजे तक खाली समय में एक दिन टी वी खोलने पर मैने उसमें एक नई फिल्‍म को चलता पाया । बोकारो में उस समय कोई स्‍थानीय चैनल तो था नहीं , केबल वाले तीन घंटे किसी खास चैनल का प्रसारण रोककर उसमें नई पिक्‍चर दिखलाया करते थे , चूंकि उस वक्‍त आज की तरह घर घर सीडी या डीवीडी प्‍लेयर नहीं होते थे , इसलिए पूरी कॉलोनी के दर्शकों का इसपर ध्‍यान बना होता था। दर्शकों की भीड को देखते हुए उन्‍हें स्‍थानीय विज्ञापन मिलते , जिसकी उन तीन घंटे में स्‍क्रालिंग की जाती थी , महीनेभर पिक्‍चर के नीचे चलनेवाली स्‍क्रालिंग के लिए केबलवाले 800 रूपए चार्ज करते थे। मैने उनको फोन लगाया और अपना पहला विज्ञापन स्‍क्रॉलिंग में चलवाया , जो निम्‍न था .....

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दूसरे दिन से ही टी वी पर स्‍क्रालिंग शुरू हो गयी थी , पर आलेख लंबा होता जा रहा है , इसलिए इसके परिणाम की बातें अगले पोस्‍ट में  ........

सबकी उम्र जानने के लिए हम आज एक मजेदार ट्रिक लेकर आए हैं !!

वैसे तो उम्र छुपाने के मामलों में सिर्फ महिलाएं ही बदनाम हैं , पर आजकल कई दफे पुरूषों को भी उम्र छुपाते देखा गया है। भले ही किसी मुसीबत में आते ही या अन्‍य ज्‍योतिषीय जिज्ञासा से हम ज्‍योतिषियों के सामने लोग सही जन्‍मतिथि प्रदान कर देते हों , पर वैसे कोई भी नहीं चाहता कि वो अपनी उम्र सबके समक्ष जाहिर करे। ऐसे में किसी की उम्र को जानने के लिए ये सात कार्ड बडे मददगार हैं। आपको सिर्फ इतना करना है कि इन सातों कार्डों में से जिसमें जिसमें आपकी उम्र लिखी गयी हो , उसे अलग कर लेना है। ये सात कार्ड हैं ........

कार्ड नं 1 

कार्ड नं 2



कार्ड नं 3



कार्ड नं 4



कार्ड नं 5


कार्ड नं 6

कार्ड नं 7 



बस आपको इतना ही करना है कि टिप्‍पणी में उन कार्डों के नाम लिख भेजिए , जिसमें आपकी उम्र मौजूद है। आपको ईमेल के माध्‍यम से आपकी सही उम्र बतला दी जाएगी। वैसे तो इसमें अधिक से अधिक दस सेकण्‍ड ही लगते हैं और मैं इंटरनेट में मौजूद नहीं रही , तभी आपको इसका जबाब मिलने में देर होगी। यदि आप इस ट्रिक के माध्‍यम से दूसरे लोगों की उम्र जानना चाहते हैं , तो इन सारे कार्डों की प्रिंट निकालकर इसे किसी बोर्ड पर चिपकाकर रखें। अपने मित्र और रिश्‍तेदारों से उन कार्डों को चुनने को कहें और वे जो भी कार्ड चुनें , उन सभी कार्डों के पहले नंबर का योगफल उनकी उम्र होगी। वैसे बच्‍चों के लिए यह एक मजेदार खेल है , इसलिए भी इसका महत्‍व है ।

( जादूरत्‍न प्रो बी वी पट्टाभि राम की पुस्‍तक के सौजन्‍य से)

आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा ........!!

अभी तक आपने पढा .... बच्‍चे अपनी पढाई में व्‍यस्‍त हो गए थे और धीरे धीरे बोकारो में हमारा मन लगता जा रहा था , पर स्‍कूल के कारण सुबह जल्‍दी उठना पडता , इसलिए दस बजे तक प्रतिदिन के सारे कामों से निवृत्‍त हो जाती तथा उसके बाद दो बजे बच्‍चों के आने तक यूं ही अकेले बैठी रहती। आरंभ से ही टी वी देखने की मेरी आदत नहीं , इसलिए मेरे सामने एक बडी समस्‍या उपस्थित हो गयी थी , प्रतिदिन दिन के दस बजे से लेकर दो बजे तक का समय काटने को दौडता। ये तो सप्‍ताहांत में एक दो दिन ही यहां आ पाते , और यहां हमारे पर‍िचित अधिक नहीं। जिस मुहल्‍ले में मैं रह रही थी , वहां की महिलाओं की बातचीत भी टेलीवीजन के सीरियलों या दूसरों के घरों की झांक ताक तक ही सीमित थी , जिसमें बचपन से आज तक मेरा मन बिल्‍कुल ही नहीं लगा।

वैसे तो ज्‍योतिषीय पत्र पत्रिकाओं में मेरे लेख काफी दिनों से प्रकाशित हो रहे थे और 1996 के अंत में मेरी पुस्‍तक भी प्रकाशित होकर बाजार में  आ गयी थी। पर मुझे यही महसूस होता रहा कि ज्‍योतिष में विषय वस्‍तु की अधिकता के कारण ही मैं भले ही लिख लेती हूं , पर बाकी मामलों में मुझमें लेखन क्षमता नहीं है। कुछ पत्र पत्रिकाएं मंगवाया करती थी मैं , उन्‍हें पढने के बाद प्रतिक्रियास्‍वरूप कुछ न कुछ मन में आता , जिसे पन्‍नों पर उतारने की कोशिश करती। कभी कादंबिनी की किसी समस्‍या को हल करते हुए कुछ पंक्तियां लिख लेती .....


सख्‍ती कठोरता , वरदान प्रकृति का ,
हर्षित हो अंगीकार कर।
दृढ अचल चरित्र देगी तुम्‍हें,
क्रमबद्ध ढंग से वो सजकर।।
जैसे बनती है भव्‍य अट्टालिकाएं,
जुडकर पत्‍थरों में पत्‍थर ।। 


तो कभी किसी बहस में भी भाग लेते हुए क्‍या भारतीय नेता अंधविश्‍वासी हैं ?? जैसे एक आलेख तैयार कर लेती। कभी कभी जीवन के कुछ अनुभवों को चंद पंक्तियों में सहेजने की कोशिश भी करती । बच्‍चों के स्‍कूल के कार्यक्रम के लिए लिखने के क्रम मे उत्‍पादकता से प्रकृति महत्‍वपूर्ण  जैसी कविताएं लिखती तो कभी चिंतन में आकर कैसा हो कलियुग का धर्म ?? पर भी दो चार पंक्तियां लिख लेती। इसके अतिरिक्‍त न चाहते हुए भी स्‍वयमेव कुछ गीत कुछ भजन , अक्‍सर मेरे द्वारा लिखे जाते। यहां तक कि इसी दौरान मैने कई कहानियां भी लिख ली थी , जो साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक दिन यूं ही बैठे बिठाए सीता जी के स्‍वयंवर की घोषणा के बाद राजा जनक , रानी और सीताजी के शंकाग्रस्‍त मनस्थिति  का चित्रण करने बैठी तो एक कविता बन पडी थी , कल डायरी में मिली , आज प्रस्‍तुत है ......

आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा।
जनकजी के वचन को दुहराया जाएगा।।

राजा , राजकुमार या हो प्रधान।
बूढा , बुजुर्ग या हो जवान।।
देशी , परदेशी या हो भगवान।
दैत्‍य , दानव या हो शैतान।

शिव के धनुष को जो तोडेगा उसी से ,
सीता का ब्‍याह रचाया जाएगा।।

आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा  ........

आज राजा का मन बडा घबडाएगा।
अपने वचन पे पछतावा आएगा।।

राजा , राजुकमार या होगा प्रधान ?
बूढा बुजुर्ग या होगा जवान ??
देशी , परदेशी या भगवान ?
दैत्‍य , दानव या फिर शैतान ??

शिव के धनुष को कौन तोडेगा किससे ,
सीता का ब्‍याह रचाया जाएगा ??

आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा  ......

आज रानी का मन बडा घबडाएगा।
आज देवता पितृ मनाया जाएगा।।

चाहे हों राजा, राजकुमार या प्रधान।
ना हो वो बूढा, बुजुर्ग , हो जवान।।
चाहे हो देशी , परदेशी या भगवान।
ना हो वो दैत्‍य , दानव ना शैतान !!

शिव के धनुष को जो तोडे , जिससे,
सीता का ब्‍याह रचाया जाएगा।।

आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा ........

आज सीता को मंदिर ले जाया जाएगा।
वहां राम जी के दर्शन पाया जाएगा।।

ना होंगे राजा , राजकुमार ना प्रधान।
ना होंगे बूढे , बुजुर्ग  ना जवान।।
ना होंगे दैत्‍य , दानव ना शैतान।
ना देशी , परदेशी , होंगे भगवान।।

शिव के धनुष को वही तोडेंगे उन्‍हीं से ,
मेरा  ब्‍याह रचाया जाएगा।।

फिर तो राम जी को वरमाला पहनाया जाएगा।
फिर तो सखियों द्वारा मंगलगान गाया जाएगा।।
फिर तो जनकपुर में उत्‍सव मनाया जाएगा।
फिर तो  'राम संग सीता ब्‍याह' रचाया जाएगा।।

काश हम बच्‍चे ही होते .. धर्म के नाम पर तो न लडते !!

religion in indian society

बात पिछले नवरात्र की है , मेरी छोटी बहन को कंजिका पूजन के लिए कुछ बच्चियों की जरूरत थी। इन दिनों में कंजिका ओं की संख्या कम होने के कारण मांग काफी बढ़ जाती है। मुहल्‍ले के सारे घरों में घूमने से तो अच्‍छा है , किसी स्‍कूल से बच्चियां मंगवा ली जाएं। यही सोंचकर मेरी बहन ने मुहल्‍ले के ही नर्सरी स्‍कूल की शिक्षिका से लंच ब्रेक में कक्षा की सात बच्चियों को उसके यहां भेज देने को कहा। उस वक्‍त मेरी बहन की बच्‍ची बब्‍बी भी उसी स्‍कूल में नर्सरी की छात्रा थी। शिक्षिका को कहकर वह घर आकर वह अष्‍टमी की पूजा की तैयारी में व्‍यस्‍त हो गयी।

religion in indian society

अभी वह पूजा में व्‍यस्‍त ही थी कि दोपहर में छह बच्चियों के साथ बब्‍बी खूब रोती हुई घर पहुंची। मेरी बहन घबडायी हुई बाहर आकर उसे चुप कराते हुए रोने का कारण पूछा। उसने बतलाया कि उसकी मैडम ने उसकी एक खास दोस्‍त हेमा को यहां नहीं आने दिया। वह सुबक सुबक कर रो रही थी और कहे जा रही थी, 'मेरे ही घर की पार्टी , मैने घर लाने के लिए हेमा का हाथ भी पकडा , पर मैडम ने मेरे हाथ से उसे छुडाते हुए कहा ,'हेमा नहीं जाएगी'। वो इतना रो रही थी कि बाकी का कार्यक्रम पूरा करना मेरी बहन के लिए संभव नहीं था।

वह सब काम छोडकर बगल में ही स्थित उस स्‍कूल में प‍हूंची। उसके पूछने पर शिक्षिका ने बताया कि हेमा मुस्लिम है , हिंदू धर्म से जुडे कार्यक्रम की वजह से आपके या हेमा के परिवार वालों को आपत्ति होती , इसलिए मैने उसे नहीं भेजा। मेरी बहन भी किंकर्तब्‍यविमूढ ही थी कि उसके पति कह उठे, 'पूजा करने और प्रसाद खिलाने का किसी धर्म से क्‍या लेना देना, उसे बुला लो।' मेरी बहन भी इससे सहमत थी , पर हेमा के मम्‍मी पापा को कहीं बुरा न लग जाए , इसलिए उनकी स्‍वीकृति लेना आवश्‍यक था। संयोग था कि हेमा के माता पिता भी खुले दिमाग के थे और उसे इस कार्यक्रम में हिस्‍सा लेने की स्‍वीकृति मिल गयी।

बहन जब हेमा को साथ लेकर आयी , तो बब्‍बी की खुशी का ठिकाना न था। उसने फिर से अपनी सहेली का हाथ पकडा , उसे बैठाया और पूजा होने से लेकर खिलाने पिलाने तक के पूरे कार्यक्रम के दौरान उसके साथ ही साथ रही। इस पूरे वाकये को सुनने के बाद मैं यही सोंच रही थी कि रोकर ही सही , एक 4 वर्ष की बच्‍ची अपने दोस्‍त के लिए , उसे अधिकार दिलाने के लिए प्रयत्‍नशील रही। छोटी सी बच्‍ची के जीवन में धर्म का कोई स्‍थान न होते हुए भी उसने अपने दोस्‍ती के धर्म का पालन किया। बडों को भी सही रास्‍ते पर चलने को मजबूर कर दिया। और हम धर्म को मानते हुए भी मानवता के धर्म का पालन नहीं कर पाते। ऐसी घटनाओं को सुनने के बाद हम तो यही कह सकते हैं कि काश हम भी बच्‍चे ही होते !! 

आज थोडी जानकारी बच्‍चों की पढाई के बारे में भी .......

अभी तक आपने पढा .... खासकर बच्‍चों के पढाई के लिए ही तो हमलोग अपना नया जीवन बोकारो में शुरू करने आए थे , इसलिए बच्‍चों के पढाई के बारे में चर्चा करना सबसे आवश्‍यक था , जिसमें ही देर हो गयी। बचपन से जिन बच्‍चों की कॉपी में कभी गल्‍ती से एक दो भूल रह जाती हो , स्‍कूल के पहले ही दिन उन बच्‍चों की कॉपी के पहले ही पन्‍ने पर चार छह गल्तियां देखकर हमें तो झटका ही लग गया था , वो भी जब उन्‍हें मात्र स्‍वर और व्‍यंजन के सारे वर्ण लिखने को दिया गया हो। पर जब ध्‍यान से कॉपी देखने को मिला , तो राहत मिली कि यहां पे मैं भी होती तो हमारी भी चार छह गलतियां अवश्‍य निकलती। हमने तो सरकारी विद्यालय में पढाई की थी और हमें ये तो कभी नहीं बताया गया था कि वर्णों को वैसे लिखते हैं , जैसा टाइपिंग मशीनें टाइप करती हैं। और जैसा हमने सीखा था , वैसा ही बच्‍चों को सिखाया था और उनके पुराने स्‍कूल में भी इसमें काट छांट नहीं की गयी थी। इसका ही फल ही था कि पहली और तीसरी कक्षा के इन बच्‍चों के द्वारा लिखे स्‍वर और व्‍यंजन वर्ण में भी इतनी गल्तियां निकल गयी थी। पर बहुत जल्‍द स्‍कूल के नए वातावरण में दोनो प्रतिदिन कुछ न कुछ सीखते चले गए और पहले ही वर्ष दोनो कक्षा में स्‍थान बनाने में कामयाब रहे। खासकर छोटे ने तो  पांच विषयों में मात्र एक नंबर खोकर 99.8 प्रतिशत नंबर प्राप्‍त कर न सिर्फ अपनी कक्षा में , वरन् पूरी कक्षा में यानि सभी सेक्‍शन में टॉप किया था।

धीरे धीरे नए नए बच्‍चों से दोस्‍ती और उनके मध्‍य स्‍वस्‍थ प्रतिस्‍पर्धा के जन्‍म लेने से  बच्‍चे अपने विद्यालय के वातावरण में आराम से एडजस्‍ट करने लगे थे। विद्यालय में पढाई की व्‍यवस्‍था तो बहुत अच्‍छी थी , अच्‍छी पढाई के लिए उन्‍हें प्रोत्‍साहित भी बहुत किया जाता था। हर सप्‍ताह पढाए गए पाठ के अंदर से किसी एक विषय का टेस्‍ट सोमवार को होता , इसके अलावे अर्द्धवार्षिक और वार्षिक परीक्षाएं होती , तीनों को मिलाकर रिजल्‍ट तैयार किए जाते। पांचवी कक्षा से ही कुल प्राप्‍तांक को देखकर नहीं , हर विषय में विद्यार्थियों को मजबूत बनाने के लिए प्रत्‍येक विषय में 80 प्रतिशत नंबर लानेवाले को स्‍कोलर माना जाता और उन्‍हें स्‍कोलर बैज दिए जाते। तीन वर्षों तक नियमित तौर पर स्‍कोलर बैज लानेवाले बच्‍चों को स्‍कूल से ही नीले कलर की स्‍कोलर ब्‍लेजर के साथ स्‍कोलर बैज मिलती और छह वर्षों तक नियमित तौर पर स्‍कोलर बैज पाने वाले बच्‍चों को फिर से एक नीले स्‍कोलर ब्‍लेजर और नीली स्‍कोलर टाई के साथ स्‍कोलर बैज , इसके लिए बच्‍चे पूरी लगन से प्रत्‍येक वर्ष मेहनत करते।

डी पी एस , बोकारो के स्‍कूल की पढाई ही बच्‍चें के लिए पर्याप्‍त थी , उन्‍हें मेरी कभी भी जरूरत नहीं पडी , मैं सिर्फ उनके रिविजन के लिए प्रतिदिन कुछ प्रश्‍न दे दिया करती थी। कभी कभी किसी विषय में समस्‍या होने पर कॉपी लेकर मेरे पास आते भी , तो मेरे द्वारा हल किए जानेवाले पहले ही स्‍टेप के बाद उन्‍हें सबकुछ समझ में आ जाता। तुरंत वे कॉपी छीनकर भागते , तो मुझे खीझ भी हो जाती , अरे पूरा देख तो लो । स्‍कूल में स्‍कोलर बैज , ब्‍लेजर तो प्रत्‍येक विषय में 80 प्रतिशत मार्क्‍स में ही मिल जाते थे , पर ईश्‍वर की कृपा है कि दोनो बच्‍चों को कभी भी किसी विषय में 90 प्रतिशत से नीचे जाने का मौका नहीं मिला , इसलिए स्‍कोलर बैज कभी भी अनिश्चित नहीं रहा , लगातार तीसरे वर्ष स्‍कोलर बैज लेने के कारण 8 वीं कक्षा में उन्‍हें नीला स्‍कोलर ब्‍लेजर भी मिल चुका था। दोनो न सिर्फ पढाई में , वरन् कुछ खेल और क्विज से संबंधित क्रियाकलापों में भी अपनी अपनी कक्षाओं में अच्‍छे स्‍थान में बनें रहें। स्‍कूली मामलों में तो इनकी सफलता से हमलोग संतुष्‍ट थे ही , 8 वीं कक्षा में भारत सरकार द्वारा राष्‍ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा में भी दोनो के चयन होने पर उन्‍हें  प्रमाण पत्र दिया गया और उन्‍हें प्रतिवर्ष छात्रवृत्ति भी मिलने लगी।

पर हमारे देश की स्‍कूली व्‍यवस्‍था का प्रकोप ऐसा कि इन सब उपलब्धियों के बावजूद हमारा ध्‍यान इस ओर था कि वे दसवीं के बोर्ड की रिजल्‍ट अच्‍छा करें , ताकि इनके अपने स्‍कूल में इन्‍हें अपनी पसंद का विषय मिल सके। हालांकि डी पी एस बोकारो में ग्‍यारहवीं में दाखिला मिलने में अपने स्‍कूल के विद्यार्थियों को थोडी प्राथमिकता दी जाती है , फिर भी दाखिला नए सिरे से दसवीं बोर्ड के रिजल्‍ट से होता है। यदि इनका रिजल्‍ट गडबड हो जाता , तो इन्‍हें अपनी पसंद के विषय यानि गणित और विज्ञान पढने को नहीं मिलेंगे , जिसका कैरियर पर बुरा असर पडेगा। ग्‍यारहवीं में दूसरे स्‍कूल में पढने का अर्थ है , सारे माहौल के साथ एक बार फिर से समायोजन करना , जिसका भी पढाई पर कुछ बुरा असर पडेगा। और डी पी एस की पढाई खासकर 12वीं के साथ साथ अन्‍य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अच्‍छी मानी जाती है , उसी के लिए हमलोग यहां आए थे , और ग्‍यारहवीं में ही यहां से निकलना पडे , तो क्‍या फायदा ?? इसलिए हमलोग 10वीं बोर्ड में बढिया रिजल्‍ट के लिए ही बच्‍चें को प्रेरित करते। आगे की यात्रा अगली कडी में ....