आस्‍ट्रेलियाई विश्‍वविद्यालय की वेबसाइट

आशीष जी , अनिल कांत जी , पाबला जी और कासिफ जी चर्चा कर चुके हैं कि उनके ब्‍लाग आस्‍ट्रेलियन विश्‍वविद्यालय की ईलर्निंग स्‍टाफ में शामिल है , इस बात पर सबों ने उनको बधाइयां दी। जब मैने गूगल में 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' सर्च किया , तो यह भी मुझे आस्‍ट्रेलियन विश्‍वविद्यालय की ईलर्निंग स्‍टाफ में शामिल मिला , पर मै इसका अर्थ नहीं समझ पायी। यह किस प्रकार की उपलब्धि है , कृपया मुझे समझाने का कष्‍ट करें ।





हेड या टेल : यह ज्‍योतिष का नहीं आंकडों का खेल है

कल ज्‍योतिष को चुनौती दिए जाने से पहले मैने अपनी ओर से कुछ सुझावों का जिक्र किया था ,जिसे आप मेरी शर्तें भी मान सकते हैं । पर फिर भी पाठकों ने इसका स्‍वागत किया ,इसके लिए उनका बहुत बहुत शुक्रिया। वैसे इतनी सावधानी बरतने के पीछे जो कारण है ,उसके बारे में आप अनजान हो सकते हैं ,पर मैं नहीं। वैसे मैने अभी तक किसी ऐसी प्रतियोगिता मे भाग नहीं लिया ,पर प्रतियोगिता के फैसले के बाद उसकी जो रिपोर्ट पढी थी ,उससे वैज्ञानिकों के ज्‍योतिष के प्रति निष्‍पक्ष व्‍यवहार की तो उम्‍मीद नहीं की जा सकती है।आज फिरयह समाचारअभिषेक जी लेकर आए हैं।

इस आलेख को पढने के बाद पुन: मेरे दिमाग में बहुत बातें आयी , पर मुझे इसमें उलझना उचित न लगा और मैने यह टिप्‍पणी कर दी ....

“अब इस प्रकार की बहस में मुझे नहीं उलझना.. ज्‍योतिष के खेल को हेड और टेल साबित कर लिया गया .. इसके लिए वैज्ञानिकों को बहुत बहुत बधाई !!”

पर कह देना जितना आसान होता , करना उतना नहीं , सही को सही और गलत को गलत कहना अपने संस्‍कार में शामिल जो है। आप पाठकों से मैं तीन प्रश्‍नों के उत्‍तर चाहती हूं ....

1. ज्‍योतिष के क्षेत्र में आजतक सरकारी ,अर्द्धसरकारी या गैरसरकारी संगठनों द्वारा कितना खर्च किया गया है ?
2. ज्‍योतिष के क्षेत्र में कितना आई क्‍यू रखने वाले लोग मौजूद हैं ?
3. हमें पढने के लिए कौन सी पुस्‍तकें मिलती हैं ?

निश्चित रूप से आपका जवाब निराशाजनक होगा , कभी भी इस क्षेत्र में नाममात्र का भी खर्च नहीं किया गया है । साथ ही इस क्षेत्र में अधिक आई क्‍यू वाले लोग भी अधिक संख्‍या में पूर्ण तौर पर समर्पित नहीं हैं , क्‍यूंकि अधिक आई क्‍यू वाले लोग तो विभिन्‍न क्षेत्रों में सरकारी सेवाओं में चले जाते हें। अपने जीवन में असफल रहे लोग ही अधिकांशत: ज्‍योतिष के अध्‍ययन में देखे जाते हैं , या फिर अधिक पैसे कमाने के लालच में पडे कुछ लोग । ज्‍योतिष में रूचि रखनेवाले और प्रतिभाशाली इस क्षेत्र में अपवादस्‍वरूप ही होंगे , उन्‍हें भी जीवन निर्वाह के लिए किसी और धंधे से जुडा रहना पडता है । ज्‍योतिष में मजबूरीवश आए हो या शौकवश , पर ज्‍योतिष के क्षेत्र में आने के बाद हमलोगों को पढने के लिए जो मिल पाता है , उसमें एकमात्र ज्‍योतिष का सही आधार है , जो कि सर्वमान्‍य है । पर जैसे जैसे फलित के क्षेत्र में हम आगे बढते हैं , सूत्रों का ढेर , जो कि अनावश्‍यक रूप से ज्‍योतिष को विवादास्‍पद बनाता है । इतने सारे सूत्रों में कौन सही है कौन गलत , इसका फैसला भी आज तक ज्‍योतिषी नहीं कर सके हैं। बिना किसी प्रकार की सरकारी सहायता से या एकजुट हुए किस पद्धति को गलत ठहराएं , किसे सही , समझ में नहीं आता। इसी कारण ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणियों में विविधता भी आती है , और गलती के भी चांसेज रहते हैं , पर इसके बावजूद एक सच्‍चा ज्‍योतिषी भविष्‍यवाणियों को एक सीमा तक सही ले जाने में समर्थ होता है , जो उसकी औसत आई क्‍यू और समाज की ओर से ज्‍योतिष के क्षेत्र में मिली उसकी कुल परिस्थितियों के हिसाब से वह बहुत अधिक होता है।

आप इसी प्रतियोगिता को लें । “एक ही ज्योतिषी ऐसे थे जिन्होंने 40 में 24 हल निकालने का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (!) किया” मतलब 60 प्रतिशत नंबर उसको मिलने चाहिए थे । हमारे देश में 60 प्रतिशत नंबर लानेवाले लोगों को प्रथम श्रेणी दी जाती है। वैसे आप आज के युग में प्रथम श्रेणी का कोई महत्‍व नहीं देंगे , क्‍यूंकि आज तो 95 प्रतिशत लानेवाले ढेर सारे बच्‍चे हैं , पर उन बच्‍चों के पीछे होने वाले खर्च को भी ध्‍यान में रखिए । वैसे आज भी ग्रामीण क्षेत्र के किसी सरकारी स्‍कूल से 60 प्रतिशत लानेवाले बच्‍चे को पूरे गांव में प्रतिष्‍ठा मिलती है , क्‍यूंकि उन्‍होने बहुत कम सुविधा के बावजूद यह सफलता हासिल की है। यही कारण है कि मेरे मन में उक्‍त ज्‍योतिषी के लिए बहुत श्रद्धा है , और मैं उनसे अवश्‍य मिलना चाहूंगी , यदि कोई मुझे उनका नाम पता बताए , क्‍यूंकि उन्‍होने अपने दम पर इतना कुछ कहा तो।

पर पूरे समूह के ज्‍योतिषियो के द्वारा सटीक विश्‍लेषण न किए जाने का उन्‍हें फल किस प्रकार मिला , उसे आयोजकों के द्वारा किए गए आंकडों के उलट फेर के खेल से देखा जा सकता है , “सभी प्रतिभागियों की औसत सफलता 17.25 थी जो कि एक सिक्के के इतने ही हेड -टेल की संभावित से भी कम थी।“ यह तो वही बात हो गयी नकि गांव के किसी स्‍कूल के सारे बच्‍चों केऔसत परिणाम को गडबड देखकर स्‍कूल की व्‍यवस्‍था के दोष को न देखते हुए उक्‍त प्रथम श्रेणी से पास करनेवाले बच्‍चे की प्रतिभा को नकारा जाए। आश्‍चर्य है कि वैज्ञानिकों को और इतने सारे पाठकों को इतनी छोटी सी बात समझ में नहीं आती या फिर वास्‍तव में वे ज्‍योतिष के प्रति पूर्वाग्रह से ही ग्रस्‍त हैं ? मतलब यही है कि विज्ञान को सब सुविधा दो , फिर भी शत प्रतिशत सफलता की उम्‍मीद न करो , पर ज्‍योतिष को सुविधा तो कुछ भी नहीं दी जाएगी , पर 100 प्रतिशत सटीक करो , यदि नहीं तो ज्‍योतिष अंधविश्‍वास है। इस तरह की प्रतियोगिता में भाग लेने से तो हर कोई बचना चाहेगा । खासकर वैसी स्थिति में , जब ज्‍योतिषियों के पक्ष में कोई न हो (क्‍यूंकि दुनिया तो छुपछुपकर ज्‍योतिषियों के पास आती है) , ज्‍योतिषी हार मानने को बाध्‍य होंगे ही। चलिए , कुल मिलाकर बात यहीं पर आ जाती है कि ज्‍योतिष के क्षेत्र में प्रतिभागी चाहे जितना भी अच्‍छा प्रदर्शन कर ले , यानि सिक्‍का हेड गिरे या टेल ,आयोजकों के द्वारा किए गए आंकडों के हेर फेर से उनकी जीत तो निश्चित ही है।

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ज्‍योतिषियों को चुनौती देने से पहले मेरे सुझावों पर भी ध्‍यान दें

परसों से ही ज्योतिषियों के लिए 10,000.00 आस्ट्रेलियन डालर की एक और चुनौती आलेख में ज्‍योतिष पर लंबी चौडी बहस चल रही है। ‘साइंस ब्‍लागर एशोसिएशन’ ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता को चैलेंज करते हुए हम ज्‍योतिषियों के लिए एक प्रतियोगिता रखने की तैयारी में है। इस लेख के नीचे टिप्‍पणी में रजनीश जी ने लिखा है ...

“मैं सभी ज्‍योतिषी भाइयों एवं बहनों से यह जानना चहता हूं कि ज्‍योतिष से क्‍या क्‍या जाना जा सकता है। कृपया यह बताने का कष्‍ट करें। संगीता जी, आप स्‍वयं स्‍पष्‍ट करने की कृपा करें कि आप किस आधार पर और किन किन विषयों पर कितनी प्रामाणिक जानकारी दे सकती हैं।

साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन के पदाधिकारी इस बात पर विचार विमर्श कर रहे हैं कि वे स्‍वयं इस तरह की कोई चुनौती सभी लोगों के सामने रखे, जिससे दूध का दूध और पानी का पानी किया जा सके।“

इसके जवाब में सबसे पहले तो मै बताना चाहूंगी कि ज्‍योतिष के द्वारा किसी के जीवन के हर संदर्भ के बारे में सांकेतिक रूप से बात की जा सकती है , पर उनका सिर्फ गुणात्‍मक पहलू ही बताया जा सकता है , परिमाणात्‍मक पहलू बताना संभव नहीं । जातक के चारित्रिक विशेषताओं के साथ साथ हर पक्ष के सुख , दुख , महत्‍वाकांक्षा , कार्यक्षमता , आई क्‍यू के बारे मे साल , महीने और दिन तक की चर्चा करते हुए जातक की आगे बढती जीवनयात्रा को साफ साफ बताया जा सकता है। निम्‍न तरीके से ज्‍योतिषियों को सही चुनौती देते हुए ज्‍योतिष को सही साबित किया जा सकता है ...

1. सबसे पहले तो पुरस्‍कार की राशि सोंच समझकर रखी जाए , ताकि पुरस्‍कार न दे पाने की स्थिति में ज्‍योतिषी पर दोषारोपण करते हुए मामले को रफा दफा कर दिया जाए।
2. निर्णायक मंडल में सात सदस्‍य मौजूद रहें । ‘साइंस ब्‍लागर एशोसिएशन’ द्वारा उनका चुनाव किया जा सकता है ।
3. सभी ब्‍लागर हों , ज्‍योतिष पर अबतक उनको विश्‍वास नहीं हो , पर कम से कम प्रतियोगिता के दौरान ज्‍योतिष के प्रति किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से वे मुक्‍त रहें। वैसे वे रहेंगे ही , क्‍यूंकि हमारे देश में पंच परमेश्‍वर होते हैं।
4. सभी प्रभावशाली हों , जो सही कहने की हिम्‍मत रखते हों और सभी उनकी बातों पर भरोसा करते हों। वैसे पंचों पर तो भरोसा किया ही जाना चाहिए।
5. सबको अपना अपना जन्‍म विवरण यानि जन्‍म तिथि , जन्‍म समय और जन्‍म स्‍थान मालूम हो , ताकि उनको जो भविष्‍यवाणी दी जाए उसका वे खुद विश्‍लेषण कर सकें। किसी दूसरे का जन्‍म विवरण ज्‍योतिषियों को नहीं दिया जाना चाहिए।
6. सबकी उम्र 50 वर्ष के आसपास या अधिक की हो , ताकि वे जीवन के उतार चढाव को महसूस कर चुके हों। इससे भविष्‍यवाणियों के विश्‍लेषण में उन्‍हें सुविधा रहेगी।
7. सभी सदस्‍य अपना जन्‍म विवरण ज्‍योतिषियों को ईमेल कर दें और स्‍वतंत्र रूप से उन्‍हें उनके स्‍वभाव , व्‍यवहार एवं चरित्र के बारे में तथा उनकी जीवनयात्रा के बारे में लिखने को दें ।
8. सभी सदस्‍य अपना जन्‍म विवरण ज्‍योतिषियों के अलावे उन ब्‍लागरों को भी ईमेल कर दें , जिन्‍हें ज्‍योतिष की जानकारी नहीं , पर मानते हैं कि तुक्‍का लगाने से भी बहुत बातें सही हो जाती हैं । उन्‍हें भी स्‍वतंत्र रूप से उनके स्‍वभाव , व्‍यवहार एवं चरित्र के बारे में तथा उनकी जीवनयात्रा के बारे में लिखने को दें । यह इसलिए कि उन्‍हें समझ में आए कि तुक्‍का लगाना इतना आसान नहीं होता।
9. ज्‍योतिषियों को सातो जन्‍मकुंडली की चर्चा के लिए 15-20 दिनों का समय दिया जाए ।
10. पंद्रह-बीस दिनों के बाद ज्‍योतिषियों द्वारा सभी जन्‍म विवरण की संभावित बातें उससे संबंधित ब्‍लागर को ईमेल के द्वारा ही भेज दी जाए , ताकि वे अपने जीवन की घटनाओं से उसका मेल कर सकें। इससे एक फायदा होगा कि किसी की निजी जिंदगी सार्वजनिक भी नहीं होगी। कभी कभी सार्वजनिक रूप में भी लोग कई बातें स्‍वीकार नहीं कर पाते हैं। इससे भी ज्‍योतिषियों के सामने समस्‍या आती है।
11. फिर सभी सदस्‍य अपने अपने घर में ज्‍योतिषियों के द्वारा की गयी संभावित बातें और तुक्‍का लगानेवालों के द्वारा प्राप्‍त विवरण का तुलनात्‍मक अध्‍ययन करते हुए अपने ब्‍लाग में अपना अनुभव लिखें कि भविष्‍य की जानकारी की इस विधा का यानि ज्‍योतिष विज्ञान का कोई भविष्‍य होना चाहिए या नहीं ?
सातो सदस्‍यों के द्वारा दिए जानेवाले निर्णय के अनुसार ही अंतिम फैसला किया जाए । इस तरह ज्‍योतिष पर चलनेवाले विवाद को हमेशा के लिए मिटाया जा सकता है । बताइए , आपका क्‍या कहना है ?


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मेरे ब्‍लाग में देवनागरी शब्‍द


इस ब्‍लागिंग के कारण भी रोज एक न एक समस्‍या से उलझना ही पडता है । जितने दिनों तक वर्डप्रेस पर बने अपने ब्‍लाग पर पोस्‍ट करती रही , कोई बडी समस्‍या तो नहीं आयी , पर जैसे ही मैने ब्‍लागस्‍पाट पर अपना ब्‍लाग बनाया , उसे न पढ पाने की शिकायत लेकर पाठकों के मेल आने लगे । कुछ पाठको की ज्‍योतिष की रू‍चि के कारण उनके द्वारा मेरे आलेखों को रोमन में पढने की बाध्‍यता को देखते हुए मैने कई बार अपने टेम्‍प्‍लेट भी बदलें , उसके कुछ पाठकों की ओर से सकारात्‍मक जवाब आने से मैं निश्चिंत भी हो गयी । 


पर कल मैने जब वर्डप्रेस पर एक पोस्‍ट किया तो संदीप जी और राजकुमार ग्‍वालानी जी की टिप्‍पणी मिली कि मेरे ब्‍लाग को वे अब पढ पा रहे हें , अभी तक नहीं पढ पाते थे। इसका अर्थ यह है कि मेरे ब्‍लागस्‍पाट वाले ब्‍लाग में अभी तक देवनागरी न दिखने की समस्‍या बनी हुई है । इस समस्‍या का कारण क्‍या है और इसके निदान के लिए मैं क्‍या करूं , यह समझ में नहीं आ रहा है । जिन ब्‍लागर भाइयों को इस बारे में जानकारी हो , बताने की कृपा करें। नहीं तो डेढ वर्षों बाद पुन: वर्डप्रेस पर ही लिखना आरंभ करना होगा।

आखिर बृहस्‍पति के प्रभाव से पंजाब में भडक गयी न आग ???????

13 मई को अपने एक आलेख में मैने 17 मई को बृहस्‍पति और चंद्र की खास स्थिति के फलस्‍वरूप एक महीने तक बृहस्‍पति के अधिक प्रभावी होने की चर्चा करते हुए लेख के आरंभ में लिखा था.....

"16 से 19 मई 2009 को बृहस्पति ग्रह की सूर्य , पथ्वी और चंद्र से एक खास स्थिति बनेगी। 17 और 18 मई को पूर्वी क्षितिज पर 1 बजे रात्रि के आसपास बृहस्‍पति और चंद्र का लगभग साथ साथ उदय होगा , इसे आसमान में भोर होने तक कभी भी देखा जा सकता है। जहां 3 बजे भोर तक इन्‍हें पूर्वी क्षितिज पर 30 डिग्री उपर देखा जा सकता है , वहीं 5 बजे सुबह 60 डिग्री उपर। वैसे तो इस प्रकार का संयोग हर महीने होता है , पर 'गत्यात्मक ज्योतिष' के हिसाब अर्द्धचंद्र के साथ बननेवाली बृहस्‍पति की यह युति खास है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के अनुसार इस दिन से 19 जून 2009 तक जहां बृहस्पति ग्रह की गत्यात्मक उर्जा में कमी आएगी , वहीं इसकी स्थैतिक उर्जा में दिन प्रतिदिन वृद्धि होती चली जाएगी। 16 मई से 19 जून 2009 तक बृहस्पति ग्रह की यह स्थिति जनसामान्य के सम्मुख विभिन्न प्रकार के कार्य उपस्थित करेगी। "

पुन: आलेख के अंत को देखें .....

"इसके अलावे गुरू बृहस्‍पति धर्म और ज्ञान से भी जुडा है , इसलिए धार्मिक क्रियाकलाप भी इस एक महीनों में जमकर होते हैं। पर जैसा कि आज के युग में धर्म का रूप भी वीभत्‍स हो गया है , इसलिए युग के अनुरूप ही दो चार वर्षों से बृहस्‍पति चंद्र की इस युति के फलस्‍वरूप यत्र तत्र धार्मिक और सांप्रदायिक माहौल को भडकते हुए भी पाया गया है । आइए ,'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'के साथ गुरू बृहस्‍पति से प्रार्थना करें कि वे अपने शुभत्‍व को ही बनाए रखें और लोगों के समक्ष कल्‍याणकारी वातावरण ही बनाए रखें। "

और इसी मध्‍य हुए पंजाब का माहौल देखिए , इससे आगे कुछ कहकर मुझे झंझट नहीं बढाना , पर आपकी अवश्‍य सुनना चाहूंगी।