धर्म का पालन अंधविश्‍वास नहीं !!

एक लेख में मैंने बताया है कि किस तरह आध्‍यात्‍म , धर्म , अंधविश्‍वास और जादू टोना एक दूसरे से अलग हैं। युग के परिवर्तन के साथ ही साथ धर्म की परिभाषा बदलने लगती है। आज के विकसित समाज में भी परिवार में हर सुख या दुख के मौके की वर्षगांठ मनायी जाती है , इसके माध्‍यम से हम खुशी या दुखी होकर आपनी भावनाओं का इजहार कर पाते हैं , जिन माध्‍यमों से हमे या हमारे परिवार को सुख या दुख मिल रहा हो , उसे याद कर पाते हैं , उनके प्रति नतमस्‍तक हो पाते हैं। 

एक पूरे समाज में मनाए जानेवाले किसी त्‍यौहार का ही संकुचित रूप है ये , पर जब किसी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पूरे समाज पर प्रभाव डाल रही हो , तो वैसे महान व्‍यक्ति का जन्‍मदिन या पुण्‍य तिथि पूरा समाज एक साथ मनाता है। यह हमारा कर्तब्‍य है , हमें  मनाना चाहिए , पर इसे मनाने न मनाने से उन महान आत्‍माओं के धर्म में कोई परिवर्तन नहीं होगा। उनका काम कल्‍याण करना है , तो वे अपने धर्म के अनुरूप कल्‍याण ही करते रहेंगे। पर उन्‍हें याद कर हमें उनके गुणों से सीख लेने की प्रेरणा अवश्‍य मिल जाती है।

प्राचीन काल के संदर्भ में हम इसी बात को देखे तो आग , जल , वायु , सूर्य से लेकर प्रकृति की अन्‍य वस्‍तुओं में एक मनुष्‍य की तुलना में कितनी गुणी अधिक शक्ति है , इसकी कल्‍पना करना भी नामुमकिन है। आग हमें जला भी सकती है , पर ऐसा विरले करती , वह हमें गर्म रखने से लेकर हमारे लिए स्‍वादिष्‍ट खाना बनाने की शक्ति रखती है। जल हमें अपने आगोश में ले सकते हैं , पर वे ऐसा नहीं करते और हमारे जीवन यापन के हर पल में सहयोग करते हैं। 

वायु हमें कहां से उडाकर कहां तक ले जा सकती है , पर वो ऐसा नहीं करती , हमारे प्राण को बचाए रखने के लिए ऑक्‍सीजन का इंतजाम करती है। सूर्य हमें जलाकर खाक कर सकता है , पर हमारी दिनचर्या को बनाए रखने के लिए प्रतिदिन उदय और अस्‍त होता है। ये सब इसलिए होता है , क्‍यूंकि कल्‍याण करना उनका स्‍वभाव है।

हम प्रकृति की वस्‍तुओं के इसी स्‍वरूप की पूजा करते हैं । पूजा करने के क्रम में हम इनको सम्‍मान तो देते ही हैं , उनसे सीख भी लेते हैं कि हम अपने गुणों से संसार का कल्‍याण करेंगे। प्रकृति के एक एक कण में कुछ न कुछ खास विशेषताएं हैं , जो हमारी सेवा में तत्‍पर रहती हैं। यदि हम ढंग से प्रयोग करें , तो फूल से लेकर कांटे तक और अमृत से लेकर विष तक , सबमें किसी न किसी प्रकार का फायदा है।

 हर वर्ष का एक एक दिन हमने इनकी पूजा के लिए निर्धारित किया है , ताकि हम इनके गुणों को याद कर सके और इनसे सीख ले सकें। इसलिए इसे हमारे धर्म से जोडा गया है। यदि इस ढंग से सोंचा जाए कि हम इनकी पूजा नहीं करेंगे यानि इसका दुरूपयोग करेंगे , तो इनके सारे गुण अवगुण में बदल जाएंगे यानि तरह तरह की प्राकृतिक आपदाएं आएंगी , तो यह अंधविश्‍वास नहीं हकीकत ही है।


धर्म और ज्‍योतिष को यूं बदनाम न करो

दुनिया भर के खासकर भारत में गली गली , मुहल्‍ले मुहल्‍ले विचरण करने वाले बाबाओं , तुम अपने शहर में न जाने कितने अपराध करते हो , पर काफी दिनों तक पुलिस की लापरवाही या उनसे मिलीभगत से तुम पकडे नहीं जाते , इस उत्‍साह से बडी बडी गलतियां करने लगते हो , फिर जब तुमपर शिकंजे कसे जाने लगते हैं , तो शहर से भागना और पुलिस से बचना ही तुम्‍हारा एक लक्ष्‍य हो जाता है , बचने का सबसे बडा रास्‍ता तुम्‍हें बाबाजी बनने में दिखाई देता है , बडी मूंछ और दाढी के कारण लोगों के लिए तुम्‍हारे चेहरे को पहचानना काफी मुश्किल हो जाता है , बाबा का रूप धारण कर लेने से जनता की आस्‍था का भी तुम नाजायज फायदा उठा लेते हो , यदि किसी की आस्‍था तुमपर नहीं बन रही होती , तो डराना और धमकाना तो तुम्‍हारा स्‍वभाव है, इसलिए इस राह में चलकर आराम से अपनी महत्‍वाकांक्षा के अनुरूप पैसे का इंतजाम तो तुम कर लेते हो !

बाबा बनने के बाद तो तुम्‍हारा जीवन और रंगीन बन जाता है , श्‍मशान सिद्ध कर चुके हो तुम , यह कहकर भक्‍तों के सम्‍मुख भी शराब पीने से तुम कोई परहेज नहीं करते , कमाख्‍या मंदिर में सिद्धि प्राप्‍त कर चुके हो , इसलिए मांस से भी कोई परहेज की आवश्‍यकता नहीं , महिलाओं को मां मानते हो , इसलिए उनसे घिरे होने में भी तुम्‍हें दिक्‍कत नहीं ,  कन्‍याओं से सेवा करवाकर तुम उनकी मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दे देते हो , हत्‍या और लूटपाट के पाप के साथ तुम लोगों के कल्‍याण का दावा कर लेते हो , महात्‍मा होने के बावजूद भविष्‍यवाणी करने का रिस्‍क नहीं लेते , उपाय की पूरी व्‍यवस्‍था कर देते हो , एक शहर में तुम्‍हें रहना नहीं , इसलिए साख बनाए रखने की कोई चिंता नहीं , लोगों से पैसों की बरसात करवा लेते हो तुम , इस तरह अपराधी के नाम से भी जो सुख सुविधा नहीं मिलती , वो बाबा बनकर तुम्‍हें मिल जाती है !

तुमसे नाम पूछा जाता है तो अपने को हिंदुस्‍तानी बताते हो , गांव , जिला या प्रदेश पूछा जाता है तो हिंदुस्‍तान कहते हो , मानो हम सब देशद्रोही हैं और तुम सच्‍चे देशभक्‍त , महान आत्‍माओं के जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक की हर घटना इतिहास में दर्ज होती है , अपना नाम , अपना गांव , अपना प्रदेश क्‍यूं छिपाते हो , वहीं से तो स्‍पष्‍ट हो जाता है कि तुम अपने जीवन का कोई भाग छुपा रहे हो , तुम इतिहास की किताबों में अपना नाम क्‍यूं नहीं दर्ज करवाना चाहते ,  अपने भयानक सच को सामने न लाकर अपने बाबा के स्‍वरूप को सामने रखकर तुम जनता के आस्‍था के साथ खिलवाड करते हो , उनके मनोवैज्ञानिक कमजोरी का नाजायज फायदा उठाते हो , अपने स्‍वार्थ में अंधे होकर कुछ भी करो तुम , पर धर्म और ज्‍योतिष को यूं बदनाम न करो बाबा , मेरी प्रार्थना है तुमसे !


2012 में दुनिया के अंत की संभावना 1

जिस तरह जन्‍म और मृत्‍यु जीवन का सत्‍य है , उसी प्रकार आशा और आशंका हमारे मन मस्तिष्‍क के सत्‍य हैं। जिस तरह गर्भ में एक नन्‍हीं सी जान के आते ही नौ महीने हमारे अंदर आशा का संचार होता रहता है , वैसे ही किसी बीमारी या अन्‍य किसी परिस्थिति में बुरी आशंका भी हमारा पीछा नहीं छोडती। मन मस्तिष्‍क में आशा के संचार के लिए हमारे सामने उतने बहाने नहीं होते , पर आशंका के लिए हम पुख्‍ता सबूत तक जुटा लेते हैं। कुछ दिनों से लगातार 2012 दिसम्‍बर के बारे में विभिन्‍न स्रोतो से भयावह प्रस्‍तुतियां की जा रही हैं। इससे भयभीत या फिर जिज्ञासु पाठक एक माह से मुझसे इस विषय पर लिखने को कह रहे हैं , पर दूसरे कार्यो में व्‍यस्‍तता की वजह से इतने दिन बाद आज मौका मिला है।

आखिर इस विषय पर विभिन्‍न विचारकों की क्‍या दलील है , इसे जानने के लिए मैने 25 नवम्‍बर को गूगलिंग की , इस विषय पर आठ दस विंडो खुले हुए थे और 12 बजकर पांच मिनट रात्रि मैं इसके अध्‍ययन में तल्‍लीन थी कि अचानक हमारे यहां भूकम्‍प का एक तेज झटका आया , दूसरी मंजिल पर होने के बावजूद मैं हिल गयी। पर झारखंड भूकम्‍प का क्षेत्र नहीं , पच्‍चीस पच्‍चास वर्षों बाद यहां कभी भूकम्‍प आता हो। मैं तो सोंच में पड गयी , इस प्रकार के लेखों को पढने के कारण शायद मुझे ऐसा भ्रम हुआ हो , पर जब अपने कमरे में पढ रहे मेरे बेटे ने आकर कहा कि वह बेड पर बिल्‍कुल डोल रहा था , तब ही मुझे तसल्‍ली हुई। फिर कुछ ही देर में इससे संबंधित जानकारी लेने के बाद मैंने कंप्‍यूटर बंद कर दिया। किसी समाचार से कोई जानकारी नहीं मिली , पर सुबह बोकारो के सारे लोगों ने पुष्टि की कि वास्‍तव में रात में भूकम्‍प आया था।

21 दिसम्‍बर 2012 ... यही वह दिन है , जिसके बारे में भयानक प्राकृतिक आपदा के उपस्थि‍त होने की आशंका बन रही है । आखिर क्‍या कह रहे हैं , उस दिन के ग्रह नक्षत्र । यह जानने के लिए मैने अपने सॉफ्टवेयर में विवरण डाला , पर परिणाम देखकर चौंक पडी , जिन ग्रहों को आसमान के 360 डिग्री में रहना चाहिए था , वे 500 डिग्री तक में दिख रहे थे। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार जिन ग्रहों की जिन शक्तियों के पूर्ण मार्क्‍स 100 दिए जाने थे , वे 200 यहां तक कि 400 दिखा रहे थे। यह किस चक्‍कर में पड गयी मैं , मैं तो एक बार फिर से भयभीत हो गयी , क्‍या उस दिन सचमुच कुछ उल्‍टा होनेवाला तो नहीं । पर जब प्रोग्राम के अंदर देखने की चेष्‍टा की , तो समझ में आया कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सिद्धांतों पर आधारित इस सॉफ्टवेयर की प्रोग्रामिंग मैने 2010 तक के लिए ही की थी और 2012 के दिसम्‍बर की गणना की वजह से यह परेशानी आ रही थी।

अब इतनी जल्‍दी सॉफ्टवेयर को ठीक कर पाना संभव न था , आलेख को लिखने की हडबडी भी थी , मैन्‍युली काम करना ही पडेगा , फार्मूले को किसी डायरी से ढूंढकर उतना गणना करना आसान तो न था , पर संयोग अच्‍छा था कि पिताजी बोकारो आए हुए थे , उनकी अपनी शोध , अपना फार्मूला , अपने नियम , उन्‍होने फटाफट सारे ग्रहों की सब गणना कर डाली। बस उसके बाद उन्‍हें कुछ करने की आवश्‍यकता नहीं थी। उनके सिद्धांतों के आधार पर हर क्षेत्र का रिसर्च और उससे संबंधित भविष्‍यवाणियां करने की जबाबदेही मुझ पर ही है। पूरे जीवन की मेहनत के बाद उत्‍साह बढाने वाली भी कोई बात हो , तभी तो इतनी उम्र में वे पुन: मेहनत कर सकते थे। लेकिन सारी गणना करने के बाद क्‍या निकला परिणाम , इसे जानने के लिए आपको अगली कडी का इंतजार करते हुए एक बार आप सभी पाठकों को और तकलीफ करनी पडेगी।

जेली के बहाने फायदेमंद अमृतफल आंवला अपने बच्‍चों को खिलाएं !!

अमृतफल आंवले से भला कौन परिचित न होगा , फिर भी इसके बारे में वैज्ञानिक जानकारी के लिए विकिपीडीया का यह पृष्‍ठ पढें। एशिया और यूरोप में बड़े पैमाने पर आंवला की खेती होती है. आंवला के फल औषधीय गुणों से युक्त होते हैं, इसलिए इसकी व्यवसायिक खेती किसानों के लिए भी फायदेमंद होता है। डॉ. इशी खोसला , लीडिंग न्यूट्रीशिनिस्ट, डॉ. रुपाली तलवार , फोर्टिस हॉस्पिटल, डॉ. सोनिया कक्कड़ , सीताराम भरतिया हॉस्पिटल जैसे विशेषज्ञों द्वारा बैलेंस्‍ड डाइट तैयार करने में भी आंवले को महत्‍व दिया गया है , जिसे आप इस पृष्‍ठमें पढ सकते हैं। मीडिया डॉक्‍टर प्रवीण चोपडा जी ने भी अपने ब्‍लॉग में आंवले की  काफी प्रशंसा की है।

इसके धार्मिक महत्‍व को जानना हो तो आप इस पृष्‍ठ पर  क्लिक कर सकते हैं , जिसमें कहा गया है कि जो भगवान् विष्णु को आंवले का बना मुरब्बा एवं नैवेध्य अर्पण करता है, उस पर वे बहुत संतुष्ट होते हैं। यह भी कहा जाता है कि नवमी को आंवला पूजन स्त्री जाति के लिए अखं ड सौभाग्य और पेठा पूजन से घर में शांति, आयु एवं संतान वृद्धि होती है। पुराणाचार्य कहते हैं कि आंवला त्यौहारों पर खाये गरिष्ठ भोजन को पचाने और पति-पत्नी के मधुर सबंध बनाने वाली औषधि है।

आंवले में इतना विटामिन सी होता है कि इसे सुखाने , पकाने या अचार बनाने के बावजूद भी पूरा नष्‍ट नहीं किया जा सकता। स्‍वास्‍थ्‍यवर्द्धक होने के कारण ही प्राचीन काल से ही भारतीय रसोई में आंवले का काफी प्रयोग किया जाता है। सालभर के लिए न सिर्फ आंवले का अचार , चटनी , मुरब्‍बा वगैरह ही बनाए जाते हैं , सुखाकर इसका चुर्ण भी रखा जाता है। अचार बनाने की विधि आप निम्‍न लिंको पर प्राप्‍त कर सकते हैं। मुरब्‍बा बनाने की विधि के लिए आप यहां पर क्लिक कर सकते हैं।

पर ये सारे व्‍यंजन बडे लोग तो आराम से खा लेते हैं , पर बच्‍चे नहीं खा पाते,  इस कारण बच्‍चे आंवले के लाभ से वंचित रह जाते हैं। पर यदि आंवले की जेली बना ली जाए तो आंवले का कडुआपन या खट्टापन समाप्‍त हो जाता है और यह मीठा हो जाता है , इसलिए बच्‍चे इसे पसंद करते हैं। इस जेली को ब्रेड में लगाकर या फिर रोटी के साथ ही या यूं ही बच्‍चों को चम्‍मच में निकालकर खाने को दे सकते हैं। इस जेली को बनाने की विधि नीचे दे रही हूं।

एक किलो आंवले को अच्‍छी तरह धोकर थोडे पानी के साथ कुकर में एक सीटी लगा कर छानकर रख लें। फिर बीज निकालकर उसे अच्‍छी तरह मैश कर लें। अब एक कडाही में कम से कम सौ ग्राम घी, थोडा अधिक भी डाला जा सकता है, डालकर उसे गर्म कर उसमें मैश किए आंवले को डालें। दस पंद्रह मिनट तेज आंच पर भूनने के बाद उसमें 750 ग्राम चीनी डाल दें । चीनी काफी पानी छोड देता है , इसलिए पानी डालने की आवश्‍यकता नहीं , जो पानी है , उसे ही सुखाना पडेगा और थोडी ही देर में जेली तैयार हो जाएगी। बहुत अधिक सुखाने पर वह कडी हो जाती है , इसलिए थोडी गीली रहने पर ही उसे उतार दें। तब यह ठंडा होने पर सामान्‍य रहता है।

इसी विधि से घर में ही आंवले का च्‍यवनप्राश भी बनाया जा सकता है। पर अभी मुझे वह डायरी नहीं मिल रही ,‍ जिसमें उन मसालों के नाम और उसकी मात्रा लिखी हुई है , जिसे कूटकर इस जेली में डालना पडता है , जिससे कि यह च्‍यवनप्राश बन सके। सस्‍ती और अपेक्षाकृत कम स्‍वादिष्‍ट होते होते हुए भी बाजार में मिलनेवाले च्‍यवनप्राश की तुलना में यह अधिक फायदेमंद होती है। जबतक वह डायरी नहीं मिलती है, तबतक मैं भी इस जेली का ही उपयोग कर रही हूं और पूरे जाडे आप भी इस जेली को ही प्रतिदिन एक चम्‍मच खाइए।


ये रहा मेरा पहला प्रयोग .. यह त्रिवेणी ही है या कुछ और ??

अपने ब्‍लॉग के लिए इतने लंबे लंबे आलेख और 'साहित्‍य शिल्‍पी' में लंबी लंबी कहानियां लिखकर प्रकाशित करते हुए मैं अपना जितना समय जाया करती हूं , उससे कम पाठकों  का भी नहीं होता , जबकि कुछ ब्‍लागर एक छोटी सी त्रिवेणी लिखकर अपना संदेश पाठकों तक पहुंचाकर प्रशंसा भरी ढेर सारी टिप्‍पणियां प्राप्‍त कर लेते हैं। ब्‍लॉग जगत में इतने दिनों में डॉ अनुराग जी के ढेर सारी त्रिवेणियॉं पढने के बाद यत्र तत्र प्रकाशित कुछ अन्‍य त्रिवेणियों को भी समझने की कोशिश करती रही । इस प्रकार मुझे अभिव्‍यक्ति की एक नई शैली की जानकारी मिली, किसी भी तरह का प्रयोग करने में मैं पीछे नहीं रहा करती , ये रहा मेरा पहला प्रयोग। ये भी पता नहीं कि यह त्रिवेणी है या कुछ और  ... इसलिए आप सबों की आलोचनाओं के लिए तैयार हूं .....


धुंधला आईना, चेहरे की सारी कमियों को छुपा देता है ,
अखबार के गीले टुकडे से इसे चमकाने की जल्‍दबाजी क्‍यूं,
थोडी देर ही सही, भ्रम में रहकर खुश तो हो लें !