हमारा गांव पेटरवार आर्सेलर-मित्‍तल को भी पसंद आया !!

रांची बोकारो मुख्‍य मार्ग पर बोकारो जिले में स्थित हमारा पैतृक गांव पेटरवार सिर्फ इस क्षेत्र के लोगों का ही नहीं ,दूर दराज के बहुत सारे लोगों का भी पसंदीदा रहा है। काफी दिनों से जहां मारवाडियों को व्‍यावसायिक दृष्टि से यह क्षेत्र पसंद आया है, वहीं हमारे गांव से रिटायरमेंट लेनेवाले अनेको सरकारी अधिकारी भी शांतिपूर्वक अवकाशप्राप्‍त जीवन जीने के लिए इसे चुना करते आए हैं। 

यही कारण है कि गांव फैलता जा रहा है और यहां के जमीन का भाव आसमान छूता जा रहा है। अब इसमें एक नया आयाम जुडनेवाला है , पेटरवार ब्‍लॉक का कुछ क्षेत्र आर्सेलर-मित्तल कम्पनी को 12 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का इस्पात संयंत्र लगाने के लिए पसंद आ गया है , ग्रामीणों में भी उन्‍हें सहयोग करने के लिए हरी झंडी दे दी है और वह दिन दूर नहीं, जब यहां कंपनी के द्वारा प्‍लांट का निर्माण कार्य भी शुरू हो जाए। विस्‍तार में यह खबर रांची एक्‍सप्रेस के सौजन्‍य से दी जा रही है ......

झारखंड प्रदेश का बोकारो जिला वास्तव में विकास की नयी बुलंदियों को ओर अग्रसर होता दिख रहा है। इस विकासयात्रा में जल्द ही एक और नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। आर्सेलर-मित्तल कम्पनी जिले के पेटरवार और कसमार में 12 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का इस्पात संयंत्र लगाने जा रही है। इस प्लांट के निर्माण के साथ ही पेटरवार, कसमार और आसपास के क्षेत्रों की दशा-दिशा बदल जायेगी।

 एक ओर जहां क्षेत्र का चतुर्दिक विकास होगा, वहीं मजदूरों के पलायन पर काफी हद तक विराम लग जायेगा। वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रदेश सरकार के साथ हुए एक समझौते के तहत आर्सेलर-मित्तल पेटरवार व कसमार में उक्त परियोजना को मूर्त रूप देने जा रही है। इसके क्रियान्वित होने से पेटरवार एवं कसमार प्रखंड के लुकैया, कोजरम, जरुवाटांड़, पोड़दाग, हसलता, ओरमो, बेमरोटांड़, बेदोटांड़, फुटलाही व आसपास बसे गांवों की तस्वीर बदल जायेगी। 

ग्रामीण भी विकास की इस नयी आस से काफी उत्साहित है। मालूम हो कि आर्सेलर-मित्तल कम्पनी के महाप्रबंधक पीएस प्रसाद ने हाल ही में क्षेत्र के रैयतों के साथ वार्ता की थी, जिसमें उन्होंने रैयतों की शर्तों को मानते हुए प्लांट निर्माण हेतु तत्परता दिखायी थी। इसके अलावा कम्पनी के अधिकारीगण कई बार इलाके का दौरा कर चुके हैं और रैयतों के बीच विस्थापन नीति की पुस्तिका भी वितरित की जा चुकी है। रैयतों ने भी कम्पनी द्वारा जारी प्रपत्रों पर अपनी स्वीकृति कम्पनी को दे दी है। 

अब अगर बिना किसी अड़ंगे के यह परियोजना धरातल पर उतरती है, तो क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी सहित तमाम सुविधाओं की पूर्ण व्यवस्था होगी और विकास की गंगा बहती दिखेगी। क्षेत्र के कुछ रैयतों ने ‘रांची एक्सप्रेस’ से बातचीत के दौरान अपनी सहमति जतायी है। पेटरवार प्रखंड के जरुवाटांड़ निवासी एजाजुल हक, अजहर हुसैन, पेटरवार के पवन महथा, कसमार के बेमरोटांड़ निवासी मुकेश कुमार प्रसाद, लुकैया के हारुण रसीद, बरई ग्राम के महानंद महतो, फुटलाही ग्राम निवासी सदानंद महतो आदि ने खुले दिल से आर्सेलर-मित्तल की उक्त पहल का स्वागत किया है। 

रैयतों ने प्लांट निर्माण के बहुआयामी फायदों की चर्चा करते हुए कहा कि जैसे बोकारो स्टील प्लांट से वहां बसे आसपास के गांवों में विकास हुए, वैसे ही यहां की भी रौनक बदल जायेगी। क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं का विकास तो होगा ही, बेरोजगारी और मजदूरों के पलायन पर भी अंकुश लगेगा। रैयतों का स्पष्ट कहना है कि कम्पनी उन्हें विस्थापित बनाकर सुव्यवस्थित तरीके से बसाये, नियोजन दे और अन्य शर्तों का पालन करे, तो निश्चय ही वह संयंत्रनिर्माण में हरसम्भव सहयोग करेंगे। 

प्लांट लगने से रैयतों को जो क्षति होगी, उसकी समुचित भरपाई जरूरी है। यकीनन रैयतों और प्रबंधन के बीच का मामला किसी दलाली हस्तक्षेप के बिना ही अगर सुलझ जाता है, तो इस क्षेत्र को विकास के मुकाम पर ले जाने से कोई नहीं रोक सकता। प्लांट निर्माण से न केवल पेटरवार, कसमार व बोकारो जिले का, बल्कि राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फलक पर झारखंड का नाम गौरवान्वित होगा।

बुरा न मानो होली है !!

होली का त्‍यौहार शक संवत के नए वर्ष के शुरू होने की खुशी में मनाया जाता है, इसलिए इस दिन के ग्रह नक्षत्रों का वर्षभर प्रभाव रहना स्‍वाभाविक है। इस वर्ष ग्रह नक्षत्र बिल्‍कुल उल्‍टी पुल्‍टी स्थिति में हैं , इसलिए सभी लोगों का यह वर्ष बिल्‍‍कुल विपरीत प्रभाव डालने वाला होगा।  ब्‍लॉगरों पर यह प्रभाव सर्वाधिक रहेगा , आइए देखते हैं , किन किन ब्‍लॉगरों पर इस ग्रह नक्षत्र की स्थिति का क्‍या प्रभाव पडेगा ......

लंबी लंबी पोस्‍ट पढनेवालों को झटका लगेगा,क्‍यूंकि फुरसतियाजी की फुर्सत में अब कमी आएगी।
महफूज अली जी ब्‍लॉग जगत में सबके प्‍यारे नहीं रहेंगे।
श्‍यामल सुमन जी के सारे दोहे चौपाई में बदल जाएंगे।
महत्‍वपूर्ण कार्रवाई के वक्‍त लोकेश जी का गवाह फरार हो जाया करेगा।
ताऊ रामपुरिया जी की पहेलियां कोई भी न बूझ पाएंगे।
मनीषा  जी की अच्‍छी बातों का ब्‍लॉग बुरी बातों का ब्‍लॉग बन जाएगा।
उन्‍मुक्‍त जी ज्‍योतिष का प्रचार प्रसार करना शुरू करेंगे।
चंदन जी की नई बातें पुरानी हो जाएगी।
प्रभात गोपाल जी गप शप करना छोड देंगे।
सुरेश चिपलूनकर जी अब से इस्‍लाम का प्रचार प्रसार करेंगे।
हिमांशु जी की रचना सबों को समझ में आ जाया करेगी।
महेन्‍द्र मिश्र जी संयमित और मर्यादित हिंदी लिखना छोड देंगे।
जाकिर अली रजनीश जी तंत्र मंत्र का प्रचार करने लगेंगे।

हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडे सभी लेखकों और पाठकों को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं !!

लाइए हमारा इनाम .. हमने आपको झूठी कहानी सुना दी !!

 Nai Kahani


एक राजा को झूठी कहानियां सुनने का बहुत शौक था , मतलब कि ऐसी कहानी जो सच हो ही नहीं सकती। उन्‍होने पूरे राज्‍य में घोषणा कर दी थी कि उनको जो भी झूठी कहानी सुना दे , जो कभी सत्‍य हो ही नहीं सकती , तो राजा की ओर से इनाम के रूप में बडी राशि दी जाएगी। पूरे राज्‍य से राजा को ऐसी कहानियां सुनाने के लिए लोग आते , पर राजा को संतुष्टि नहीं होती। वे हर कहानी को सच्‍ची मान लेते , कहते 'ऐसा तो हो ही सकता है , कुछ ऐसी कहानी सुनाओं , जो हो ही नहीं सके'। लोग अपने सामर्थ्‍यभर पूरी कोशिश करते , पर इनाम किसी को नहीं मिल पाता था , क्‍यूंकि राजा स्‍वीकार ही नहीं करना चाहते थे कि ऐसी घटना नहीं हो सकती है। कई लोगों को निराश लौटते देख एक नागरिक ने राजा को सबक सिखाने का निश्‍चय किया। वह राजा के दरबार में पहुंचा और कहानी सुनाना आरंभ किया, साथ साथ राजा का जबाब भी सुनते जाइए .....

'एक व्‍यक्ति दो बैलों की सहायता से अपने खेत में हल चला रहा था, एक बैल ने अपनी पीठ पर ही गोबर कर दिया'
'इसमें कोई झूठ नहीं, गोबर पीठ मे जा सकता है'

'उस गोबर में पीपल का एक बीज गिरा , जिससे पीठ पर पीपल का एक पेड निकल आया , वह पेड बडा होकर आसमान को छूने लगा'
'इसमें भी कोई झूठी बात नहीं, ये भी हो सकता है'

'किसान पेड पर चढता हुआ बिल्‍कुल ऊपर की टहनी तक जा पहुंचा , उसका सर आसमान से टकरा रहा था'

'आगे कहो , यहां तक तो कोई झूठ बात नहीं लगती'

'ओह , ये तो बहुत दुख की बात है , फिर किसान उतरा कैसे ?'

'ऊपर की टहनी थी न , नीचे से किसी ने रस्‍सी फेकी , उसने उस रस्‍सी को ऊपरवाले टहनी पर बांधा , फिर रस्‍सी के सहारे नीचे उतरने लगा।'
'ईश्‍वर की कृपा है , उसे सहारा मिल गया , अब आगे कहो , कुछ झूठ सुनाओ।'
'आधी दूरी तक ही वह उतरा था कि रस्‍सी छोटी पड गयी , बडी मुश्किल से उसने ऊपर की रस्‍सी खोली , फिर उसी रस्‍सी को नीचे बची एक टहनी में बांधा , फिर उसके सहारे नीचे आने लगा। पर जमीन से 20 फीट ऊपर ही था कि रस्‍सी एक बार फिर कम गयी। वह वहां से कूद पडा'
'किसान नीचे तो सही सलामत आ गया न, अब आगे क्‍या हुआ , मजा ही नहीं आ रहा , क्‍यूंकि अभी तक तो तुमने कुछ झूठ कहा ही नहीं'
'सही सलामत तो नहीं कहा जा सकता , क्‍यूंकि एक तो वह कीचड में गिर कर उसमें फंस गया , दूसरी मुसीबत कि उसके दोनो पैरों की हड्डी टूट गयी'
'ओह , किसी किसी व्‍यक्ति पर तो बडी मुसीबत आ जाती है.. आगे क्‍या हुआ ?'
'सबसे पहले तो उसे पैरो का इलाज कराने की आवश्‍यकता थी , पर इलाज तो वह तब कराता , जब कीचड से बाहर निकलता , कीचड से निकलने का कोई उपाय नहीं था , वह थोडी दूर पर बने एक झोपडी में गया , वहां से एक कुदाल लाया , फिर कीचड साफ की , तब बाहर निकला , अब अपने पैर के इलाज के लिए उसे डॉक्‍टर के यहां जाना था'
'यहां तक तो तुम झूठी कहानी न सुना सके , इलाज के बाद तो कहानी समाप्‍त ही हो जाएगी, तुम भी हारे , ऐसा लग रहा है।'
राजा के कहीं भी 'हां' न कहने से वह व्‍यक्ति बिल्‍कुल परेशान हो चुका था , उसने राजा को मजा चखाना चाहा। उसने कहा ..
'नहीं , इलाज से पहले ही तो एक महत्‍वपूर्ण बात हो गयी, किसान कीचड से निकला ही था कि एक गधे को सामने से आते देखा , उसने गधे से कहा,  'ऐ गधे , मुझे डॉक्‍टर के पास ले चलोगे ? तो गधे ने कहा कि वह साधारण गधा नहीं , यहां के राजा का बाप है , किसान ने कहा , तुम झूठ बोल रहे हो , राजा गधा नहीं , तो उसका बाप गधा कैसे हो सकता है ? इसपर उसने कहा कि जाकर राजा से पूछ लो, उसका बाप गधा है या नहीं ? अब मैं तो नहीं जानता , आप ही बता सकते हैं सरकार , गधे ने सच कहा या झूठ'
'यह कैसे हो सकता है ? गधा मेरा बाप नहीं हो सकता'
 
'इसका अर्थ यह हुआ कि ये कहानी गलत है'
'हां हां , बिल्‍कुल गलत'
'तो फिर लाइए हमारा इनाम, हमने आपको झूठी कहानी सुना दी'

'किसान चढ तो आराम से गया , उस पीपल के पेड पर आम के फल लगे थे, उसे तोडकर उसने अपने झोले को पूरा भर लिया , पर उतरने वक्‍त उसे काफी दिक्‍कत हो रही थी , क्‍यूंकि जिन जिन टहनियों से वह गुजरता गया , उसके पैरों के भार से सारी टहनियां पेड से टूटकर जमीन पर गिरती चली गयी थी'

प्रवीण शाह जी को दिया गया जबाब

मेरी पिछली पोस्‍ट में प्रवीण शाह जी की बहुत ही महत्‍वपूर्ण टिप्‍पणी मिली ,प्रवीण शाह ने कहा…


आदरणीय संगीता जी,

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की दृष्टि से मनुष्‍य के मन को विकास देने में जन्‍मकालीन चंद्रमा की भूमिका होती है। इसके कारण जन्‍मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत हो , तो बच्‍चे की देख रेख बहुत ही अच्‍छे तरीके से होती है, विपरीत स्थिति में बच्‍चे के देखरेख में कुछ कमी आती है।

एक प्रयोग कीजिये कभी, अगस्त-सितम्बर-अक्टूबर यानी बेबी-बूम के महीनों में ऐसा वक्त छांट लीजिये जब आकाश में चंद्रमा की स्थिति मौजूद हो...इस दौरान सरकारी अस्पताल में हुऐ किसी गरीब-भिखारी के बच्चों और प्राईवेट महंगे अस्पताल में पैदा हुऐ उच्चवर्ग के बच्चों को फालो करें...आपको खुद ही समय आ जायेगा कि आपके निष्कर्ष कितने गलत हैं।

एक काम और कर सकती है २४ साल पहले का सबसे कमजोर ग्रहयोग निकालिये... ब्लॉग पर भी पूछिये इस दौरान पैदा बच्चों के जीवन के बारे में... और पता कीजिये अपने शहर के सबसे पॉश अस्पताल में जाकर कि उस दौरान वहां पैदा हुऐ बच्चों क्या बने जीवन में...आपकी धारणाये बदल जायेंगी, यह निश्चित है।


प्रवीण शाह जी को दिया गया मेरा जबाब  ..... 


मुझे अपनी धारणाओं पर पूरा विश्‍वास है .. क्‍यूंकि मैं चालीस वर्षों से इसे सटीक होता देख रही हूं। वैसे मैं अभी भी प्रयोग करने में पीछे नहीं हटती, मैंने ये आलेख अपने नियमों की सच्‍चाई को जानने के लिए ही लिखा था .....
http://sangeetapuri.blogspot.com/2009/07/5-6.html
http://sangeetapuri.blogspot.com/2009/01/blog-post.html
http://sangeetapuri.blogspot.com/2009/01/blog-post_14.html
http://sangeetapuri.blogspot.com/2009/01/blog-post_19.html
पर कितने जबाब आए , वो आप भी देख सकते हैं , यदि हम भारतवासी एक दूसरे के विचारों को गंभीरता से लेते , तो भारत न तो इतने दिनों तक गुलाम होता और न ही स्‍वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और संघर्ष के बावजूद मात्र 50 वर्षों की आजादी के बाद एक बार फिर से हम गुलामी की तरफ कदम बढा रहे होते। हमें तो हर शोध के लिए विदेशों के मुंह तकने की आदत पडी हुई है।
जब भी मैं सुख या दुख की चर्चा कर रही होती हूं , आपलोग आर्थिक स्‍तर पर क्‍यूं आ जाते हैं , जिसका आंतरिक सुख और दुख से कोई संबंध ही नहीं। भला बच्‍चों को प्‍यार प्राप्‍त करने के लिए और उनके मनोवैज्ञानिक विकास के लिए धन की क्‍या आवश्‍यकता ? गरीबों के घर में भी मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे भी शरीर से मजबूत हो सकते हैं, परिवारवालों का भरपूर प्‍यार प्राप्‍त कर सकते हैं , जबकि कमजोर चंद में जन्‍म लेनेवाले अमीर घरों के बच्‍चे भी स्‍वास्‍थ्‍य की कमजोरी के कारण परेशानी महसूस कर सकते हैं , नौकरों चाकरों के भरोसे पलते हुए मां बाप के प्‍यार के लिए तरस सकते हैं।
वैसे एक प्रयोग आप भी कर सकते हैं , गरीब परिवार के पूर्णिमा के दिन जन्‍म लेनेवाले पांच वर्ष की उम्र के पांच बच्‍चों और अमीर परिवार के अमावस्‍या के दिन जन्‍म लेनेवाले पांच वर्ष की उम्र के पांच बच्‍चों को नहला धुलाकर नए कपडे पहनाकर उन्‍हें कुछ खिलौने और खाने पीने की वस्‍तुएं देकर एक स्‍थान पर दो घंटे रखकर उनके क्रियाकलापों को छंपकर देखें और परिणाम ब्‍लॉग पर पोस्‍ट करें !!

प्रवीण शाह जी,

'उत्‍पादकता' से 'प्रकृति' महत्‍वपूर्ण,

डायरी के एक पन्‍ने में मुझे यह कविता दिखाई पडी। पढने पर मुझे याद आया कि पर्यावरण दिवस पर आयोजित किसी कार्यक्रम में बोलने के लिए बेटे को कविता लिखना सिखलाते हुए मैने यह तुकबंदी की थी । यह पन्‍ना इधर उधर खो न जाए , इस ख्‍याल से इस यादगार कविता को यहां प्रेषित कर रही हूं, उम्‍मीद है आपको अच्‍छा लगेगा......


विकास की अंधी दौड में हमने ,
ओजोन परत को नष्‍ट किया है।
सिर्फ 'उत्‍पादकता' पर ध्‍यान देकर ,
वायु को प्रदूषित कर दिया है।

कारखानो से निकले सारे कचरे,
नदी में जाकर मिल जाते हैं।
खेतों से बहकर गए रसायन,
जलजीवों को कष्‍ट बढाते हैं।

रसायनों का प्रयोग करके हमने,
भू की उर्वरता को कम किया है।
स्‍वार्थों की पूर्ति हेतु हमने,
सारे जंगलों को काट दिया है।

अपनी गलतियों का परिणाम,
हमें तो भुगतना ही होगा।
नाना बीमारियों से जल थल के ,
जीवों को तो मरना ही होगा।

तापमान बढने के कारण,
बर्फ तो पिघलते ही जाएंगे।
समस्‍याएं बाढ अकाल की आएंगी,
समुद्र सतह बढते ही जाएंगे।

वायु जल भू की रक्षा करो,
ताकि जलप्रलय न हो कभी।
'उत्‍पादकता' से 'प्रकृति' महत्‍वपूर्ण,
ये बात गांठ बांध लो सभी।