प्राण प्रतिष्‍ठा के बाद मूर्तियां

यह जानते हुए कि पैरों के बिना सही ढंग से जीवन जीया नहीं जा सकता , हम अपने शरीर में पैरों का स्‍थान सबसे निकृष्‍ट मानते हैं। शायद शरीर के सबसे निम्‍न भाग में होने की वजह से गंदा रहने और किटाणुओं को ढोने में इसकी मुख्‍य भूमिका होने के कारण ही पैरो को अछूत माना गया हो। इसी वजह से लात मारना शिष्‍टाचार की दृष्टि से बिल्‍कुल गलत माना जाता है। हमारा पैर गल्‍ती से भी किसी को छू जाए , तो इसके लिए हम अफसोस करते हैं या माफी मांगते हैं। हमारी संस्‍कृति सिर्फ व्‍यक्ति को ही नहीं , किसी वस्‍तु को भी पैरों से छूने की इजाजत नहीं देती। चाहे वह घर के सामान हों , बर्तन हो या खाने पीने की वस्‍तु। यहां तक कि अन्‍न की सफाई करने वाले सूप , अनाज को रखी जानेवाली टोकरियां या फिर घर की सफाई के लिए प्रयुक्‍त होने वाली झाडू , सबमें लक्ष्‍मी है।

एक प्रसंग याद है , जब तुरंत होश संभालने के बाद एक बच्‍ची को गांव जाने का मौका मिला। घर में , बरामदे में किसी को पैर नहीं लगाना , बच्‍चे को पैर नहीं लगाना , बरतन को पैर नहीं लगाना, परेशान हो रही थी वो। खेती बारी का समय था , खलिहान में फसल थे , कुछ सामान वगैरह भी थे , जो बच्‍ची को खेल के लिए भाते थे। पर वह जिधर भी खेलने जाती , कोई न कोई टोक ही देता , उसपर मत चढों , उसे पैरो से मत कुचलो या फिर उसमें पैर मत लगाओ। हार कर वह पुआल में खेलने को गयी , वहां भी किसी ने टोक दिया तो बच्‍ची से रहा नहीं गया , उसने कहा, 'और सब तो अन्‍नपूर्णा है, नहीं छू सकती , अब पुआल में भी लक्ष्‍मी'  इतना ख्‍याल रखे जाने की परंपरा थी हमारी। 

लेकिन हमारी संस्‍कृति में दूसरों को इज्‍जत देने के लिए उनके पैरों को छूने की प्रथा है। इसका अर्थ यह माना जाना चाहिए कि हम सामने वाले के निकृष्‍ट पैरों को भी अपने सर से अधिक इज्‍जत दे रहे हें। बहुत सारे कर्मकांड में पैर पूजने का अर्थ है कि हम बडों के पैरों की धूलि को भी चरण से लगाते हैं। इसी तरह मूर्तियों की प्राण प्रतिष्‍ठा करने के बाद उसके चरणों की ही वंदना की जाती है , उनके चरणों की ही पूजा की जाती है, उनके चरणों में ही सबकुछ अर्पित किया जाता है। पर जहां कला की इज्‍जत करते हुए छोटे छोटे पेण्‍टिंग्‍स , छोटी छोटी कलाकृतियों आम लोगों की बैठकों में  स्‍थान पाते हैं , बिना प्राण प्रतिष्‍ठा के मूर्तियों को निकृष्‍ट मानना उचित नहीं। 

जिस देश की संस्‍कृति में एक एक जीव , एक एक कण को भगवान माना जाए , किसी को पैर लगाने की मना‍ही हो , वहां मूतिर्यों की पूजा करने के क्रम में विभिन्‍न देवियों की प्राण प्रतिष्‍ठा एक बहाना भी हो सकता है। मूर्तियों की पूजा करते समय हम अपने देश की मिट्टी की पूजा कर सकते हैं , मिट्टी के लचीलेपन की पूजा कर सकते हैं, विभिन्‍न देवी देवताओं की कल्‍पना को साकार रूप देने की सफलता की पूजा कर सकते हैं , और उस सब से ऊपर है कि उस मूर्ति का निर्माण करनेवाले सारे कलाकारों की कला की पूजा कर सकते हैं। हां , प्राण प्रतिष्‍ठा हो जाने के बाद आस्‍था से परिपूर्ण लोगों के मन में मौजूद ईश्‍वर के एक रूप की एक काल्‍पनिक और धुंधली छवि बिल्‍कुल सामने दृष्टिगोचर होती है , इसलिए पूजा के वक्‍त पूर्ण समर्पित हो जाना स्‍वाभाविक है। पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि प्राण प्रतिष्‍ठा करने के बाद या भगवान के रूप में माने जाने के बाद ही मूर्तियां पूजा करने योग्‍य होती हैं , उसके पहले उसका कोई महत्‍व नहीं।

खुशदीप सहगल जी का मक्‍खन .. आज मेरे ब्‍लॉग पे

मक्‍खन पहली बार शहर जा रहा था , मक्‍खनी को भय था कि वहां मक्‍खन बेवकूफ न बन जाए, क्‍यूंकि उसने सुना था कि वहां के लोग गांववालों को बहुत बेवकूफ बनाते हैं'
'शहर से लौटकर मक्‍खन ने बताया कि वो खामख्‍वाह ही उसे बेवकूफ समझ रही थी , उसने तो शहर वालों को ही बेवकूफ बना दिया है।
'वो , कैसे'
'मैं स्‍टेशन से उतरकर थोडी दूर ही गया होगा कि मुझे ऊंचे ऊंचे मकान दिखे। वहां जो सबसे ऊंची मकान थी , वो कितने मंजिले की होगी , इसका अनुमान करने में मैं असमर्थ था , सोंचा गिन ही लिया जाए।'
'मैं उसकी मंजिलें गिन ही रहा था , कि एक शहरी वहां आ पहुंचा , पूछा 'क्‍या कर रहे हो ?'
मैने बताया कि गिन रहा हूं कि यह मकान कितने मंजिले की हैं।
शहरी ने कहा, ' यहां तो मकान की मजिले गिनने पर 100 रूपए के हिसाब से बिल चुकाने पडतें हैं , तुमने अभी तक कितनी मंजिले गिनी है'
'मैने तो बीस मंजिले गिन ली हैं'
'तो तुम्‍हें दो हजार रूपए देने होंगे।'
मैने उसे दो हजार रूपए दे दिए।
'ओह , मेरे समझाने के बावजूद तुम बेवकूफ बन ही गए, हमारे दो हजार रूपए गए पानी में' मक्‍खनी चिल्‍लायी।
'तुम गलत समझ रही हो , मैं बेवकूफ नहीं बना, मैने उसे बेवकूफ बनाया , घर के दो हजार रूपए बचा लिए , मै तो उस समय तक 40 मंजिले गिन चुका था' मक्खन ने बताया।

दहेज और कन्‍या देकर भी लडकी वाले जीतते थे

एक कथा  में कहा गया है कि पूरी धरती को जीतने वाला एक महत्‍वाकांक्षी राजा अधिक दिन तक खुश न रह सका , क्‍यूंकि वह चिंति‍त था कि आपनी बेटी की शादी कहां करे , क्‍यूंकि इस दुनिया का प्रत्‍येक व्‍यक्ति न सिर्फ अपनी बेटियों का विवाह अपने से योग्‍य लडका ढूंढकर किया करता है , वरन् अपने बेटों को खुद से बेहतर स्थिति में भी देखना चाहता है। यही कारण है कि समय के साथ बेटे बेटियों को अधिक गुणवान बनाने के लिए हर कार्य को करने और सीखने की जबाबदेही दी जाती थी , वहीं बेटियों के विवाह के लिए गुणवान लडके के लिए अधिक से अधिक खर्च करने , यहां तक कि दहेज देने की प्रथा भी चली। इस हिसाब से दहेज एक बेटी के पिता के लिए भार नही , वरन् खुशी देने वाली राशि मानी जा सकती थी। यह क्रम आज भी बदस्‍तूर जारी है।

इस सिलसिले में अपने गांव की उस समय की घटना का उल्‍लेख कर रही हूं , जब व्‍यवहारिक तौर पर मेरा ज्ञान न के बराबर था और पुस्‍तकों में पढे गए लेख या मुद्दे ही मस्तिष्‍क में भरे होते थे। तब मैं दहेज प्रथा को समाज के लिए एक कलंक के रूप में देखा करती थी। पर विवाह तय किए जाने के वक्‍त कन्‍या पक्ष को कभी परेशान नहीं देखा। अपने सब सुखों को छोडकर पाई पाई जोडकर जमा किए गए पैसों से कन्‍या के विवाह करने के बाद माता पिता को अधिकांशत: संतुष्‍ट ही देखा करती थी , जिसे मैं उनकी मजबूरी भी समझती थी। पर एक प्रसंग याद है , जब एक चालीस हजार रूपए में अपनी लडकी का विवाह तय करने के बाद मैने उसके माता पिता को बहुत ही खुश पाया। उनके खुश होने की वजह तो मुझे बाद में उनकी पापाजी से हुई बात चीत से मालूम हुई। उन्‍होने पापाजी को बताया कि जिस लडके से उन्‍होने विवाह तय किया है , उसके हिस्‍से आनेवाली जमीन का मूल्‍य चार लाख होगा। वे चालीस हजार खर्च करके चार लाख का फायदा ले रहे हैं , क्‍यूंकि समय के साथ तो सारी संपत्ति उसकी बेटी की ही होगी न। शायद इसी हिसाब के अनुसार लडके की जीवनभर की कमाई को देखते हुए आज भी दहेज की रकम तय की जाती है।

और लडके की मम्‍मी की बात सुनकर तो मैं चौंक ही गयी। जैसा कि हमारे समाज में किसी भी शुभ कार्य को करने के पहले और बाद में ईश्‍वर के साथ गुरूजन और बुजुर्गों के पैर छूने की प्रथा है , लडके की मां अपने बेटे के विवाह तय करने के बाद मेरे दादाजी और दादीजी के पैर छूने आयी। पैर छूने के क्रम में उन्‍होने बताया ... ' आज मैं लडके को हार गयी हूं।' यह सुनकर मैं तो घबडा गयी , परेशान थी कि ये हार गयी हैं तो इतनी खुश होकर लडकी की प्रशंसा क्‍यूं कर रही हैं , आधे घंटे तक मैं उनकी बात गौर से सुनती गयी कि इन्‍हे किस बात की हार मिली है , पर मेरे पल्‍ले कुछ भी न पडा। उनके जाने के बाद भी मैं अपनी भावनाओं को रोक न सकी और उनके हार की वजह पूछा , दादीजी ने जो बताया , वह और भी रोचक था , 'लडके का विवाह तय करने को इस क्षेत्र में हारना कहा जाता है' मेरे पूछने पर उन्‍होने स्‍पष्‍ट किया कि कन्‍या की सुंदरता , गुण , परिवार और साथ में दहेज की रकम मिलकर इन्‍हें हारने को मजबूर कर दिया। इस तरह दहेज और कन्‍या देकर भी लडकी वाले जीत और सबकुछ लेकर भी लडकेवाले हार जाया करते थे ।

मिलिए आज की मॉडर्न राधा से !!

दिल्‍ली यात्रा के दौरान सबसे अधिक मौका भतीजे भतीजियों के साथ रहने का मिला। ये है साढे चार वर्षीय यूरी सेठी , तीन वर्ष की उम्र तक खाना ही नहीं जानती थी , सिर्फ दूध पीकर या दूध में कोई खाद्य पदार्थ पीसकर गटकती रही। आजकल किसी तरह एक घंटे में एक छोटी रोटी खा लेती है , बाकी खाना अभी भी गटकना ही पडता है।  प्‍ले स्‍कूल में पढ रही है , पर कविताएं रटने में बिल्‍कुल तेज , पुस्‍तक के पृष्‍ठों को उलट उलटकर उसके चित्र देखकर इस प्रकार कविता बोलती जाएगी , कि आपको इसके द्वारा पढे जाने का भ्रम हो जाएगा  ....
उस वक्‍त अपने प्‍ले स्‍कूल 'नटखट' में होनेवाले समर कैम्‍प में शामिल , पेपर से प्रतिदिन कुछ न कुछ बनाकर लाती ...

उसके स्‍कूल में जन्‍माष्‍टमी के दिन सभी लडके कृष्‍ण और लडकियां राधा के गेट अप में आते हैं , पिछले दोनो ही वर्ष उसने सर्वश्रेष्‍ठ राधा का पुरस्‍कार पाया है , उसके दोनो वर्ष के राधा के चित्र देखिए ,ये है पहले वर्ष में .....
और ये है दूसरे वर्ष में .......
 कितनी जल्‍दी जल्‍दी बडी हो रही है हमारी राधा !!

विरोधी समूह के द्वारा प्रशंसा

अपने तो हमेशा प्रशंसक होते हैं , इसलिए उसकी प्रशंसा आपको उतना सुख नहीं दे सकती , जितना एक विरोधी के द्वारा आपकी प्रशंसा किए जाने पर होता है। एक विरोधी के द्वारा प्रशंसा किए जाने का अर्थ है कि आप सही राह चल रहे हैं , जो आपका आत्‍मविश्‍वास बढाने में कामयाब होती है।  यूं तो विभिन्‍न श्रेणियों के अंतर्गत 'संवाद सम्‍मान' काफी दिन पहले से ही घोषित किया जा रहा है , पर जब संवाद समूह ने मुझे 'लोकप्रिय ब्लॉगर-नामित' श्रेणी के अन्तर्गत सम्मानित किया तो मैं दिल्‍ली में थी , इंटरनेट से दूर रहने के कारण मैं इसका शुक्रिया भी न अदा कर सकी।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' मेरा मुख्‍य ब्‍लॉग है और मैं अधिकांशत: ज्‍योतिष विषय पर ही लिखा करती हूं , इस कारण संवाद समूह से मेरा खासा वैचारिक विरोध बना होता है , पर तीन वर्ष के ब्‍लॉगिंग के जीवन में इस विरोध ने कभी भी मर्यादा का उल्‍लंघन नहीं किया। वो तर्क से ज्‍योतिष की खामियों की चर्चा किया करते हैं और मैं तर्क से उन खामियों के ज्‍योतिष में बने रहने के कारण का उल्‍लेख करती हूं। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' खुद ही ज्‍योतिष में व्‍याप्‍त खामियों को दूर करने के लिए प्रयत्‍नशील है , इसलिए उसकी सहायता से मैं खुद उन खामियों की तह में जाती हूं , ताकि ज्‍योतिष को प्रामाणिक शास्‍त्र बनाया जा सके। पर मैं यह भी मानती हूं कि जबतक ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता को साबित न कर दूं , तबतक बुद्धिजीवी वर्ग को इसे मानने को मजबूर नहीं कर सकती। संवाद समूह ने मेरी मानसिकता को समझते हुए बिल्‍कुल सही वक्‍तब्‍य दिया है .......

एक हिसाब से देखा जाए, तो सकारात्मक लेखन के नजरिये से संगीता पुरी जी सर्वाधिक चर्चित महिला ब्लॉगर हैं। वे हालांकि मुख्य रूप से अपने ज्योतिष सम्बंधी ब्लॉग 'गत्यात्मक ज्योतिष' के लिए जानी जाती हैं। देखने में यह एक विरोधाभास के समान है कि संवाद समूह जोकि अंधविश्वास का प्रबल विरोध है, उसके द्वारा गत्यात्मक ज्योतिष की प्रवक्ता का सम्मान किया जा रहा है। पर अगर गहराई से देखें, तो संगीता जी ने ज्योतिष में प्रचलित अनेकअंधविश्वासों को तोड़ने का काम भी किया है। साथ ही संगीता जी ज्योतिष को तर्कपूर्ण बनाने और उसे वैज्ञानिक स्वरूप देने के लिए भी लगातार प्रयत्नशीन रहती हैं। वैसे संगीता जी का हमारा खत्री समाजब्लॉग भी काफी चर्चा में रहा है और 'हिन्दी शब्दकोश' सम्बंधी कार्य भी उन्होंने काफी मेहनत से सम्पन्न किया है। संगीता जी की इन तमाम योग्यताओं  को दृष्टिगत रखते हुए संवाद समूह ने उन्हें 'लोकप्रिय ब्लॉगर-नामित' श्रेणी के अन्तर्गत सम्मानित करने का निर्णय लिया है। 


मैं संवाद समूह का शुक्रिया अदा करती हूं कि उसने मुझे इस काबिल समझा , उम्‍मीद रखती हूं कि यह आनेवाले दिनों में भी मुझपर भरोसा करेगा । इसके अलावे सभी टिप्‍पणीकर्ताओं का भी आभार !!