दृढसंकल्‍प के आगे भूत भी हार मान जाता है !!

दुनिया में भूत प्रेत के किस्‍सों की कमी नहीं , पहले चारो ओर जंगल थे , शाम होते ही अंधेरा फैल जाता था , सन्‍नाटे को चीरती कोई भी आवाज भयावहता उत्‍पन्‍न करती थी , वैसे में भय का बनना स्‍वाभाविक था। पर जैसे जैसे जंगल कटकर गांव बनते गए , भय समाप्‍त होता गया , इससे माना जाने लगा कि घर में होनेवाले पूजा पाठ और यज्ञ हवन के कारण भूत प्रेत भी जगह छोडकर पीछे होते गए। पर अभी तक की घटना में इतना तो अवश्‍य पाया है कि किसी के घर द्वार आंगन खलिहान में भूतों वाली कोई घटना घटी हो , तो उसमें भय का ही समावेश देखा गया है। इन सबसे दूर जंगल में या श्‍मशान में भूतों ने अपने होने का कभी दावा नहीं किया , कभी आमने सामने नहीं आए । वरना इतनी सडकें बनी , इतने रेलवे की पटरियां बिछी , कभी भी बडे स्‍तर पर बाधा नहीं उपस्थित किया , जबकि वहां न तो पूजा पाठ होता है और न ही यज्ञ हवन।

मेरे दादाजी के जीवन की एक घटना का उल्‍लेख करना चाहूंगी , बात सन् 1944 की होगी , तबतक उनके परिवार में दादीजी के अलावे चार पुत्र और एक पुत्री थी। उस समय वे अपने पिताजी के एक पुराने मकान में थे , जिसके आंगन में और कमरा बनाने की जगह नहीं थी। उन्‍होने दूसरी जगह एक मकान बनाने का मन बनाया , थोडे शौकीन मिजाज होने के कारण उन्‍हें बडे अहाते की जरूरत थी और उसमें मकान भी बनाना था , जिसके लिए उन्‍हें अधिक पैसों की आवश्‍यकता थी , जो तब उनके पास नहीं थे। तब उन्‍होने सस्‍ते में गांव के किनारे की उस जमीन को खरीदने का मन बनाया जो भूतों के डेरा के रूप में प्रसिद्ध था और उस खेत में रोपा और कटनी के लिए भी मजदूर दिन रहते ही भाग जाया करते थे।

जमीन के मालिक ने खुशी खुशी रजिस्‍ट्री कर दी , दादाजी ने एक कुंआ बनवाया , उसी से निकली मिट्टी से मजबूत दीवाल बनवाया । हमारे यहां कच्‍चे मकान में पहले छत को बनाने के लिए लकडी और मिट्टी का उपयोग किया जाता है और दोमंजिले पर बांस और खपडे का, जिससे वातानुकूलित घर बनकर तैयार हो जाता है। बिल्‍कुल सामन्‍य ढंग से बने दो बेडरूम , एक बैठक , एक बरामदे , चार गौशाले और एक रसोई वाले इस घर को आज भी ज्‍यों का त्‍यों देखा जा सकता है। इसमें हर वर्ष बरसात से पूर्व टूटे खपडों को हटाकर फिर से नये खपडे लगाने पडते हैं। इसी प्रकार बरसात के बाद थोडी लिपाई पुताई करवानी पडती है ।

घर बनने के बाद बडे धूमधाम से गृहप्रवेश किया गया , पूजा पाठ , हवन , प्रसाद वितरण पूरे गांव को खिलाने पिलाने के बाद पूरा परिवार वहां शिफ्ट कर गया। गांव के बिल्‍कुल एकांत में बने उस मकान में रात के वक्‍त सीधा श्‍मशान ही दिखाई देता था , दादाजी अक्‍सर काम के सिलसिले में बाहर होते , पर शायद दादीजी भी दिल की मजबूत थी , कुछ दिनो तक कोई बात नहीं हुई । कुछ दिन बाद दादीजी पुन: गर्भवती हुईं , गर्भ के छह महीने तक तो कोई दिक्‍कत नहीं , उसके बाद दादीजी की तबियत अचानक खराब हो गयी। बच्‍चे ने हरकत करना बंद कर दिया था , गांव में महिला चिकित्‍सक भी नहीं थी , दादीजी को सीधा हजारीबाग ले जाया गया। वहां हालत हद से अधिक खराब हो गयी , दादीजी को शवगृह के निकट हॉल में रखा गया था , यह सोंचकर कि अब वो मरने ही वाली हैं। नर्स यदा कदा आकर दवाइयां पिला देती थी , पर उसी देखरेख में दादी जी को होश आ गया और कुछ दिनों में वे सामान्‍य होकर घर वापस आयी। ऐसा किस्‍सा एक बार नहीं , छह वर्षों के दौरान तीन तीन बार हुआ।

पूरे गांव को शक था कि भूत ही उन्‍हें परेशान कर रहा है , उनके माता पिता तो तब थे नहीं , भाई और भाभी दादाजी को अपने घर में वापस लौटने को कहते , पर दादाजी इसके लिए तैयार नहीं थे , उनका मानना था कि यदि भूत है तो वह बहुत कमजोर है। सिर्फ गर्भ के कमजोर बच्‍चों को ही नुकसान पहुंचा सकता है , देखता हूं , कबतक वह हमारा पीछा करता है। अगली बार दादीजी फिर गर्भवती हुईं , सबलोग उन्‍हें अपने अपने घर में बुलाते रहें , पर दादीजी का कहना था कि आज वे किसी के घर में रह सकती हैं , पर कल को बेटी बहू आएंगी और वे गर्भवती होंगी , तो उन्‍हें लेकर कहां कहां भटका जाएगा , अच्‍छा है , मेरा ही पीछा करे , कितने दिनों तक करता है ?

पर अगली बार कुछ भी नहीं हुआ , अंतिम क्षणों तक सबकुछ ठीक रहा और दादीजी ने एक स्‍वस्‍थ पुत्र को जन्‍म दिया। उसके बाद सभी बच्‍चों के हर प्रकार के विकास , उनकी पढाई लिखाई , सबके कैरियर , दादाजी को व्‍यवसाय में बडी सफलताएं , नौकर चाकर  , कई घर मकान और गाडी तक हर प्रकार की सफलता उसी घर में मिली। फिर पांचों बेटों की पांच बहूएं आयी , सबके चार पांच बच्‍चे हुए , पूरे आंगन का माहौल हर समय उत्‍सवी बना रहा। कभी भी कोई अनहोनी होते नहीं देखी गयी। इसलिए मेरे परिवार में कोई भी नहीं मानते कि भूत होते हैं , उनमें अपरिमित शक्ति होती है और वे अनिष्‍ट करते हैं। यदि सचमुच ऐसा मान भी लें तो यह कहा जा सकता है कि दृढ इच्‍छाशक्ति के आगे भूतों को भी हारना पडता है।

भाग्‍यशालियों को बधाई

मेरे पिछले आलेख के अंतिम वाक्‍य "वैसे जो भी हो , जिन भविष्‍यवाणियों को करने के लिए हमें गणनाओं का ओर छोर भी न मिल रहा हो , उसे आसानी से बता देने के लिए ऑक्‍टोपस और उनके मालिक को बधाई तो दी ही जा सकती है" पर हमारे कुछ मित्रों को गंभीर आपत्ति हुई है । उनका कहना है कि जब ऑक्‍टोपस द्वारा की गयी भविष्‍यवाणी मात्र तुक्‍का है तो उसे बधाई देने का क्‍या तुक है। हमारे वो मित्र नहीं जानतें कि बधाई हमेशा भाग्‍यशालियों को ही दी जाती है , अभागों को नहीं। समाज में सफल लोगों का गुणगान किया जाता है , मेहनतकशों का नहीं।

सारे प्रतिभाशाली विद्यार्थी नियमित तौर पर पढाई कर रहे हैं , सबके एक से बढकर एक परीक्षा परिणाम , युवा होते ही प्रतियोगिता की बारी आती है , कोई दो चार प्रश्‍नों के तुक्‍का सवालों का जबाब देकर आता है , उसके अधिक तुक्‍के सही हो जाते हैं , प्रतियोगिता में टॉप पर आने से उसे कोई नहीं रोक पाता। उसे बधाई देने वालों का तांता लग जाता है , पर उस मेहनती बच्‍चे को लोग कहां याद रख पाते हैं , ऐन परीक्षा के वक्‍त जिसकी तबियत खराब हो जाती है , जिसकी गाडी खराब हो जाती है या फिर बहुत सोंचसमझकर भी दो विकल्‍पों में से एक को चुनता है और वो भी गलत हो जाने से उसके प्राप्‍तांक का भी नुकसान हो जाता है और एक नंबर से वह प्रतियोगिता में चुने जाने से चूक जाता है।

सारे माता पिता अपने बच्‍चों के विवाह के लिए परेशान हैं , कुछ का संयोग काम करता है , उन्‍हें उपयुक्‍त पात्र मिल जाते हैं , वे वैवाहिक बंधन में बंध जाते हैं , उन्‍हें और उनके माता पिता को बधाई देनेवालों का तांता लग जाता है। पर कुछ बच्‍चों को , उनके माता पिता का दुर्योग उनसे बहुत दिनों तकं इतजार ही करवाता है , वे इतने वर्षों तक दौड धूप करते रह जाते हैं , कहीं उपयुक्‍त पात्र नजर नहीं आता , अब भला उन्‍हें किस बात की बधाई दी जाए।

जितने दंपत्ति विवाह बंधन में बंधते हैं , सबके घरों में बच्‍चों की किलकारियां गूंजने लगती है , उनके घर पर बधाइयों की झडी लगने लगती हैं , पर उन दंपत्तियों की मेहनत का कोई मूल्‍य नहीं , जो प्रतिदिन चेकअप के लिए डॉक्‍टर के पास जा रहे हैं , कडवी दवाइयां खा रहे हैं और शारिरीक रूप से कई कष्‍टों को झेलने के लिए बाध्‍य हैं या फिर उन दंपत्तियों के कष्‍टों का , जिनके बच्‍चे शारीरिक या मानसिक तौर पर  बीमार हैं।

आपने कभी जमीन या मकान के बारे में सोचा भी नहीं और अचानक आपको ऐसे मकान के बारे में पता चल जाता है , जिसका मालिक किसी विपत्ति में पडने के कारण उसे जल्‍द से जल्‍द बेचने को बाध्‍य है। आपके पास पैसे नहीं होते , पर कुछ मित्र या रिश्‍तेदार आपका साथ देने को तैयार होते हैं।  पैसों का प्रबंध हो जाता है और जमीन या मकान की रजिस्‍ट्री हो जाती है , आपको चारो ओर से बधाइयां मिलने लगती हैं , जबकि मकान या जमीन खरीदने को इच्‍छुक कितने ही व्‍यक्ति के पैसे बैंक में वर्षों तक पडे रह जाते हैं , उनको सही दर में भी मनमुताबिक जमीन नहीं मिल पाती , इसलिए वे बधाई के हकदार नहीं।

विश्‍वकप के बारे में ऑक्‍टोपस

मैने जब से ब्‍लॉग लिखना शुरू किया है , हर चर्चित मुद्दे पर , चाहे वो मौसम हो या राजनीति , खेल हो या कोई बीमारी , कुछ न कुछ भविष्‍यवाणियां करती आ रही हूं । आकलन में कितनी सत्‍यता होती है , वो तो हमारे पाठक ही बता सकते हैं , पर मैं तुक्‍का नहीं लगाती , एक निश्चित आधार होने पर ही भविष्‍यवाणियां करती हूं। यदि ऐसा नहीं होता तो विश्‍वकप फुटबॉल के बारे में मैं भविष्‍यवाणियां कर चुकी होती। अनिश्चितता के माहौल में इस प्रकार के आकलन का कुछ तो महत्‍व है ही ,  शायद यही कारण हो कि कल के पोस्‍ट पर शिक्षामित्र ने टिप्‍पणी कर पूछा कि क्या आप विश्वकप फुटबाल के बारे में कोई भविष्यवाणी करना चाहेंगी?

पहले भी कुछ पाठकों के मेल आने पर मैने विश्‍वकप फुटबॉल के बारे में जानकारी के लिए गणना करनी शुरू की थी। पर उस गणना से कुछ साफ तस्‍वीर नजर नहीं आ सकी और इसलिए मैने इसके बारे में कुछ भी नहीं लिखा। लेकिन मेरी या अन्‍य ज्‍योतिषियों की कमी ऑक्‍टोपस ने कर दी और अपनी सटीक हो रही भविष्‍यवाणियों के कारण वह दुनियाभर का हीरो बना हुआ है। जहां ज्‍योतिष के इतने सारे तथ्‍यों को ध्‍यान में रखते हुए एक एक भविष्‍यवाणियां करने में इतनी मुश्किलें आती है , खेलते कूदते ऑक्‍टोपस बाबा एक डब्‍बे पर बैठकर आसानी से भविष्‍यवाणी कर रहे हैं। 

इस घटना को सुनने के बाद मेरा ध्‍यान बहुत पुरानी कुछ घटनाओं पर गया, जहां किसी दुविधा की स्थिति में हाथ की दो उंगलियों में दो परिणामों को रखते हुए उन्‍हें आगे कर किसी बच्‍चे को उनमें से एक पकडने को कहा जाता था। मान्‍यता है कि बच्‍चे दिल के सच्‍चे होते हैं , इस कारण वे जो भी उंगली पकडेंगे , आनेवाला निर्णय वास्‍तव में वैसा ही आएगा। यह संयोग ही है कि अधिकांश समय बच्‍चे के द्वारा पकडी गयी उंगली वाला परिणाम ही देखने को मिलता था। जिस बच्‍चे के द्वारा पकडी गयी उंगली का अनुमान अधिक सही होगा , परिवार य समाज में उसे भाग्‍यशाली माना जाएगा ही। आखिर ईश्‍वर की विशेष कृपा होने से ही तो वह सही उंगली को पकड पाता था।

एक बार मेरे छोटे बेटे की तबियत बहुत गडबड थी , अस्‍पताल में मेरे बेटे का इलाज चल रहा था और मैं मायके में थी। मेरा भतीजा तब बहुत छोटा था , लेकिन उसकी मम्‍मी ने कहा कि उसकी ओर दो उंगलियां बढाएं , वह बिल्‍कुल सही उंगली पकडेगा। मैं इन सब बातों को नहीं मानती हूं , ग्रहों के हिसाब से मैने जो गणना की थी , उसके हिसाब से 18 तारीख तक का डेट सेंसिटीव था , कोई बुरी खबर भी मिल सकती थी , पर यदि जांच पडताल के क्रम में ही वो डेट टल जाए , तो स्थिति बिगडने वाली नहीं होगी। पर 19 तारीख में दस दिन की देर थी , इसलिए सबका मन घबडाया हुआ था। बच्‍चे की मम्‍मी ने ही अपने हाथ की दोनो उंगलियां उसकी ओर बढाया , जिसमें से उसने एक को पकडा। उसने बहुत खुश होते हुए मुझे बताया कि बेटा दवा से ही ठीक हो जाएगा , ऑपरेशन की आवश्‍यकता नहीं पडेगी। दस दिनों तक चेकअप चलता रहा और कई डॉक्‍टरों ने संयुक्‍त रूप से मिलकर फैसला किया कि ऑपरेशन की आवश्‍यकता नहीं है , दवा से ही ठीक हो जाएगा। आप सबों को जानकर ताज्‍जुब होगा कि यह परिणाम 19 तारीख को आया।

दो ऑप्‍शनों में से एक को चुनने के बाद उसका सही होने का सबसे बडा कारण लोगों का विश्‍वास होता है। प्रकृति के नियमों को समझना सरल नहीं , पर किसी बात पर आप पूरा विश्‍वास रखो , तो उस घटना के सही होने के चांसेज बढ जाते हैं। यही कारण है कि किसी के जीवन में एक बार सफलता की शुरूआत होती है , तो आत्‍मविश्‍वास बढता है और उसके साथ ही साथ सफलताओं का इतिहास बनता जाता है। इसके विपरीत यदि किसी के जीवन में असफलता की शुरूआत होती है , तो आत्‍मविश्‍वास घटता है और वह कई असफलताओं को जन्‍म देता है। आत्‍मविश्‍वास के कारण ही कभी कभी मनुष्‍य में एक छठी इंद्रिय भी काम करती है और आनेवाली घटनाओं को वह पहले से देखने लगता है।

मेरे ख्‍याल से ऑक्‍टोपस के द्वारा इस प्रकार की भविष्‍यवाणियों के सटीक होने में एक ओर उसके और उसके मालिकों के भाग्‍य का खेल है , तो दूसरी ओर लोगों का विश्‍वास भी काम कर रहा है।लेकिन इस प्रकार संकेत में प्राप्‍त की गयी भविष्‍यवाणियों का कोई आधार नहीं होता , भाग्‍य के साथ देने से कभी लगातार भी कई भविष्‍यवाणियां सही हो सकती है , जबकि भाग्‍य न साथ दे तो एक भी सही न हो। वास्‍तव में इस प्रकार की भविष्‍यवाणियां एक प्रकार का तुक्‍का है , इसलिए इसके बारे में दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता। अल्‍पावधि भविष्‍यवाणियों के मामलों में इस प्रकार की घटना कितनी भी लोकलुभावन क्‍यूं न हों , पर दीर्घावधि भविष्‍यवाणियों के लिए इनका कोई महत्‍व नहीं , क्‍यूंकि किसी का भाग्‍य हर वक्‍त तो साथ नहीं दे सकता। वैसे जो भी हो , जिन भविष्‍यवाणियों को करने के लिए हमें गणनाओं का ओर छोर भी न मिल रहा हो , उसे आसानी से बता देने के लिए ऑक्‍टोपस और उनके मालिक को बधाई तो दी ही जा सकती है।

मान गए मम्‍मी की एस्‍ट्रोलोजी को !!

बात मेरे बेटे के बचपन की है , हमने कभी इस बात पर ध्‍यान नहीं दिया था कि अक्‍सर भविष्‍य की घटनाओं के बारे में लोगों और मेरी बातचीत को वह गौर से सुना करता है। उसे समझ में नहीं आता कि मैं होनेवाली घटनाओं की चर्चा किस प्रकार करती हूं। लोगों से सुना करता कि मम्‍मी ने 'एस्‍ट्रोलोजी' पढा है , इसलिए उसे बाद में घटनेवाली घटनाओं का पता चल जाता है। यह सुनकर उसके बाल मस्तिष्‍क में क्‍या प्रतिक्रिया होती थी , वो तो वही जान सकता है , क्‍यूंकि उसने कभी भी इस बारे में हमसे कुछ नहीं कहा। पर एक दिन वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर सका , जब उसे अहसास हुआ कि मेरी मम्‍मी वास्‍तव में बाद में होने वाली घटनाओं को पहले देख पाती है। जबकि वो बात सामान्‍य से अनुमान के आधार पर कही गयी थी और उसका ज्‍योतिष से दूर दूर तक कोई लेना देना न था।

उसकी उम्र तब छह वर्ष की थी , हमें एक रिश्‍तेदार के यहां विवाह में सम्मिलित होना था। एक्‍सप्रेस ट्रेन का रिजर्वेशन था ,पर वहां तक जाने के लिए लगभग 10 किमी पैसेंजर ट्रेन पर चलना आवश्‍यक था। जुलाई की शुरूआत थी और चारो ओर शादी विवाह की धूम मची हुई थी। मुझे मालूम था कि पैसेंजर ट्रेन में काफी भीड होगी। इस कारण मैं सूटकेस और बैग अरेंज करने के क्रम में सामान कम रखना चाह रही थी , रखे हुए सामान को हटाकर मैं कहती कि लगन का समय है , इसलिए पैसेंजर ट्रेन में काफी भीड होगी। ज्‍योतिष की चर्चा के क्रम में लग्‍न , राशि , ग्रह वगैरह बेटे के कान में अक्‍सर जाते थे , इसलिए उसने समझा कि किसी ज्‍योतिषीय योग की वजह से ट्रेन में भीड होगी। फिर भी उसने कुछ नहीं कहा , और बडों को तो कभी समझ में नहीं आता कि बच्‍चे भी उनकी बात ध्‍यान से सुन रहे हैं।

स्‍टेशन पर गाडी आई तो भीड होनी ही थी , इतनी भीड में अपनी चुस्‍ती फुर्ती के कारण दोनो बच्‍चों और सामान सहित काफी मुश्किल से हम चढ तो गए , पर अंदर जाने की थोडी भी जगह नहीं थी। दोनो बच्‍चों और दो सामान को बडी मुश्किल से संभालते हुए हम दोनो पति पत्‍नी ने ट्रेन के दरवाजे पर खडे होकर 15 किमी का सफर तय किया। जब हमारा यह पहला अनुभव था , तो बेटे का तो पहला होगा ही। खैर दरवाजे पर होने से मंजिल आने पर उतरने में हमें काफी आसानी हुई , स्‍टेशन पर उतरकर जब एक्‍सप्रेस ट्रेन का इंतजार कर रहे थे , तो बेटे के मुंह से निकला पहला वाक्‍य था , 'मान गए मम्‍मी की एस्‍ट्रोलोजी को'  हमलोग तो समझ ही नहीं पाए कि बात क्‍या है , तब पूछने पर उसने बताया कि 'मम्‍मी ने कहा था , लगन का समय है , गाडी में भीड रहेगी।' बेटे के बचपन का यह भ्रम तब दूर हुआ , जब वह यह समझने लायक हुआ कि विवाह के समय को 'लगन का समय ' कहा जाता है और उस दिन मैने कोई भविष्‍यवाणी नहीं की थी। 

कल है ग्रहों का खास गत्‍यात्‍मक योग .. क्‍या पडेगा आपपर प्रभाव ??

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय दृष्टि से कल यानि 3 जुलाई का दिन खास है, क्‍यूंकि बृ‍हस्‍पति और चंद्र को केन्‍द्रगत करते हुए आसमान में बाकी ग्रहों की स्थिति के संयोग से एक खास प्रकार का योग तैयार हो रहा है। यह योग 3 जुलाई को 11 बजे से 12 बजे के लगभग मध्‍य रात्रि को उपस्थित होगा। इस योग के फलस्‍वरूप 24 घंटे पूर्व और 24 घंटे पश्‍चात तक का समय कुछ खास माना जा सकता है।  प्राचीन ढंग से गणना किए जानेवाले पंचांग पर विश्‍वास करें , तो लांगिच्‍यूड के हिसाब से इस योग का सर्वाधिक प्रभाव भारतवर्ष से ठीक पश्चिम में सटे  हुए देशों में होना चाहिए। भारत के पश्चिमी भागों में भी इसके प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता।

चूंकि बृहस्‍पति और चंद्र को केन्‍द्र में रखने से इस योग की उत्‍पत्ति हो रही है , इस कारण इस योग का प्रभाव विश्‍व के अधिकांश हिस्‍सों में सुखद ही रहना चाहिए , इस कारण भीषण गर्मी वाले क्षेत्रों में दो दिनों तक घने बादल बने रहने और यत्र तत्र बारिश होते रहने की संभावना है , इस प्रकार यहां मौसम सामान्‍य बना रहेगा। ठंड वाले क्षेत्रों में उतनी बारिश नहीं भी हो सकती है , पर बारिश के मौसम वाले जगहों पर अति बारिश हो सकती है। पृथ्‍वी के जिस क्षेत्र में यह योग अधिक प्रभावी होगा , वहां कुछ अनिष्‍ट की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता, खासकर बाढ , तूफान या भूकम्‍प की। लेकिन फिर भी बृहस्‍पति चंद्र जैसे शुभ ग्रहों के कारण विकरालता कुछ कम रहेगी।

वैसे तो इस ग्रहयोग का सर्वाधिक अच्‍छा प्रभाव 1934 , 1946 , 1958 , 1970 , 1982 ,1993 और 2005  के सितंबर माह तक जन्‍म लेने वाले पर पडेगा, जबकि 1932 , 1944 , 1956 , 1968 , 1980 ,1992 और 2004 में सितंबर तक जन्‍म लेनेवाले इसके बुरे प्रभाव में आ सकते हैं। इसी प्रकार तुला राशिवालों पर इस ग्रहयोग का अच्‍छा तथा सिंह राशिवालों पर इस ग्रहयोग का बुरा प्रभाव देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्‍त अक्‍तूबर और नवंबर माह में जन्‍म लेनेवालों पर कुछ अच्‍छा और अगस्‍त तथा सितंबर माह में जन्‍म लेने वालों पर कुछ बुरा प्रभाव पडेगा। बाकी लोगों के जीवन में इस ग्रह का प्रभाव प्रत्‍येक व्‍यक्ति के जीवन में बिल्‍कुल हल्‍के रूप में दिख सकता है। लग्‍न में विभिन्‍नता के कारण ग्रहों के प्रभाव के संदर्भो में अंतर पड सकता है , बृहस्‍पति जिन भावों का स्‍वामी होगा , इस योग के कारण उससे संबंधित संदर्भों की खुशी या कष्‍ट मिलनी चाहिए।

यहां भारतवर्ष में 3 जुलाई को सूर्योदय 5 बजकर 13 मिनट में होगा , जबकि सूर्यास्‍त 6 बजकर 30 मिनट पर। इलाहाबाद से पूर्व या पश्चिम होने से आपके शहर में सूर्योदय और सूर्यास्‍त के समय में थोडा अंतर हो सकता है। इस योग के फलाफल को समझने के लिए आप अपने शहर के सूर्योदय और सूर्यास्‍त के समय की जानकारी रखें। इस ग्रह का सर्वाधिक अच्‍छा प्रभाव सूर्यास्‍त से 6 घंटे पहले से साढे तीन घंटे पहले तक होगा , इसलिए यह  समय आपके लिए आनंददायक बना रहेगा, इस तरह के किसी न किसी कार्यक्रम से आप संयुक्‍त हो जाएंगे। जबकि सूर्यास्‍त से 4 घंटे बाद से 5 घंटे 32 मिनट बाद तक का समय इस योग के कारण बहुत ही महत्‍वपूर्ण बना रहेगा , इस कारण इस समय महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम में व्‍यस्‍तता बनी रह सकती है। इस ग्रहयोग का सर्वाधिक बुरा प्रभाव सूर्योदय के 3 घंटे 19 मिनट बाद से लेकर 5 घंटे 33 मिनट बाद तक बनने की आशंका है , इस कारण आप कुछ तनावपूर्ण वातावरण से गुजर सकते हैं।