दृढसंकल्‍प के आगे भूत भी हार मान जाता है !!

July 15, 2010
दुनिया में भूत प्रेत के किस्‍सों की कमी नहीं , पहले चारो ओर जंगल थे , शाम होते ही अंधेरा फैल जाता था , सन्‍नाटे को चीरती कोई भी आवाज भयावहता उत्‍पन्‍न करती थी , वैसे में भय का बनना स्‍वाभाविक था। पर जैसे जैसे जंगल कटकर गांव बनते गए , भय समाप्‍त होता गया , इससे माना जाने लगा कि घर में होनेवाले पूजा पाठ और यज्ञ हवन के कारण भूत प्रेत भी जगह छोडकर पीछे होते गए। पर अभी तक की घटना में इतना तो अवश्‍य पाया है कि किसी के घर द्वार आंगन खलिहान में भूतों वाली कोई घटना घटी हो , तो उसमें भय का ही समावेश देखा गया है। इन सबसे दूर जंगल में या श्‍मशान में भूतों ने अपने होने का कभी दावा नहीं किया , कभी आमने सामने नहीं आए । वरना इतनी सडकें बनी , इतने रेलवे की पटरियां बिछी , कभी भी बडे स्‍तर पर बाधा नहीं उपस्थित किया , जबकि वहां न तो पूजा पाठ होता है और न ही यज्ञ हवन।

मेरे दादाजी के जीवन की एक घटना का उल्‍लेख करना चाहूंगी , बात सन् 1944 की होगी , तबतक उनके परिवार में दादीजी के अलावे चार पुत्र और एक पुत्री थी। उस समय वे अपने पिताजी के एक पुराने मकान में थे , जिसके आंगन में और कमरा बनाने की जगह नहीं थी। उन्‍होने दूसरी जगह एक मकान बनाने का मन बनाया , थोडे शौकीन मिजाज होने के कारण उन्‍हें बडे अहाते की जरूरत थी और उसमें मकान भी बनाना था , जिसके लिए उन्‍हें अधिक पैसों की आवश्‍यकता थी , जो तब उनके पास नहीं थे। तब उन्‍होने सस्‍ते में गांव के किनारे की उस जमीन को खरीदने का मन बनाया जो भूतों के डेरा के रूप में प्रसिद्ध था और उस खेत में रोपा और कटनी के लिए भी मजदूर दिन रहते ही भाग जाया करते थे।

जमीन के मालिक ने खुशी खुशी रजिस्‍ट्री कर दी , दादाजी ने एक कुंआ बनवाया , उसी से निकली मिट्टी से मजबूत दीवाल बनवाया । हमारे यहां कच्‍चे मकान में पहले छत को बनाने के लिए लकडी और मिट्टी का उपयोग किया जाता है और दोमंजिले पर बांस और खपडे का, जिससे वातानुकूलित घर बनकर तैयार हो जाता है। बिल्‍कुल सामन्‍य ढंग से बने दो बेडरूम , एक बैठक , एक बरामदे , चार गौशाले और एक रसोई वाले इस घर को आज भी ज्‍यों का त्‍यों देखा जा सकता है। इसमें हर वर्ष बरसात से पूर्व टूटे खपडों को हटाकर फिर से नये खपडे लगाने पडते हैं। इसी प्रकार बरसात के बाद थोडी लिपाई पुताई करवानी पडती है ।

घर बनने के बाद बडे धूमधाम से गृहप्रवेश किया गया , पूजा पाठ , हवन , प्रसाद वितरण पूरे गांव को खिलाने पिलाने के बाद पूरा परिवार वहां शिफ्ट कर गया। गांव के बिल्‍कुल एकांत में बने उस मकान में रात के वक्‍त सीधा श्‍मशान ही दिखाई देता था , दादाजी अक्‍सर काम के सिलसिले में बाहर होते , पर शायद दादीजी भी दिल की मजबूत थी , कुछ दिनो तक कोई बात नहीं हुई । कुछ दिन बाद दादीजी पुन: गर्भवती हुईं , गर्भ के छह महीने तक तो कोई दिक्‍कत नहीं , उसके बाद दादीजी की तबियत अचानक खराब हो गयी। बच्‍चे ने हरकत करना बंद कर दिया था , गांव में महिला चिकित्‍सक भी नहीं थी , दादीजी को सीधा हजारीबाग ले जाया गया। वहां हालत हद से अधिक खराब हो गयी , दादीजी को शवगृह के निकट हॉल में रखा गया था , यह सोंचकर कि अब वो मरने ही वाली हैं। नर्स यदा कदा आकर दवाइयां पिला देती थी , पर उसी देखरेख में दादी जी को होश आ गया और कुछ दिनों में वे सामान्‍य होकर घर वापस आयी। ऐसा किस्‍सा एक बार नहीं , छह वर्षों के दौरान तीन तीन बार हुआ।

पूरे गांव को शक था कि भूत ही उन्‍हें परेशान कर रहा है , उनके माता पिता तो तब थे नहीं , भाई और भाभी दादाजी को अपने घर में वापस लौटने को कहते , पर दादाजी इसके लिए तैयार नहीं थे , उनका मानना था कि यदि भूत है तो वह बहुत कमजोर है। सिर्फ गर्भ के कमजोर बच्‍चों को ही नुकसान पहुंचा सकता है , देखता हूं , कबतक वह हमारा पीछा करता है। अगली बार दादीजी फिर गर्भवती हुईं , सबलोग उन्‍हें अपने अपने घर में बुलाते रहें , पर दादीजी का कहना था कि आज वे किसी के घर में रह सकती हैं , पर कल को बेटी बहू आएंगी और वे गर्भवती होंगी , तो उन्‍हें लेकर कहां कहां भटका जाएगा , अच्‍छा है , मेरा ही पीछा करे , कितने दिनों तक करता है ?

पर अगली बार कुछ भी नहीं हुआ , अंतिम क्षणों तक सबकुछ ठीक रहा और दादीजी ने एक स्‍वस्‍थ पुत्र को जन्‍म दिया। उसके बाद सभी बच्‍चों के हर प्रकार के विकास , उनकी पढाई लिखाई , सबके कैरियर , दादाजी को व्‍यवसाय में बडी सफलताएं , नौकर चाकर  , कई घर मकान और गाडी तक हर प्रकार की सफलता उसी घर में मिली। फिर पांचों बेटों की पांच बहूएं आयी , सबके चार पांच बच्‍चे हुए , पूरे आंगन का माहौल हर समय उत्‍सवी बना रहा। कभी भी कोई अनहोनी होते नहीं देखी गयी। इसलिए मेरे परिवार में कोई भी नहीं मानते कि भूत होते हैं , उनमें अपरिमित शक्ति होती है और वे अनिष्‍ट करते हैं। यदि सचमुच ऐसा मान भी लें तो यह कहा जा सकता है कि दृढ इच्‍छाशक्ति के आगे भूतों को भी हारना पडता है।

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11 Komentar
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बहुत ही सटीक बात कहीं है आपने....आभार

Balas
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देखिये एक तार्किक फैसले ने पीढ़ियों को गुलजार कर दिया ...

Balas
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अच्छी व उम्दा जागरूकता से भरी पोस्ट | वास्तव में दृढ संकल्प से हर कठिन से कठिन अच्छे व ईमानदारी भरे कार्य को भी अंजाम तक पहुँचाया जा सकता है |

Balas
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आपका आलेख गहरे विचारों से परिपूर्ण होता है।

Balas
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पता नहीं लगता है भूत भी आइडेंटिटी क्राइसिस का शिकार हैं...

उन्‍हें सही मीडिया मैनेजमेंट की जरूरत लग रही है...


मजाक कर रहा हूं... बुरा मत मानिएगा...

एक निर्भीक और सटीक निर्णय ने पूरे परिवार को हमेशा के लिए एक डर से निजात दिला दी...

आपकी दादीजी को मन से नमन्

Balas
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बिलकुल सत्य है,दृड़संकल्प के आगे भूत क्या,बड़ी,बड़ी बाधायें हार जाती हैं ।

Balas
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रोचक और प्रेरणादायक संस्मरण

Balas
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आपकी बात सही है। रोचक संस्मरण । धन्यवाद।

Balas
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संगीता जी, आप ने तो मेरे गाँव के पुराने घर की याद दिला दी.........अब वैसे आरामदेह घर कहाँ हैं..........भूत तो भय से ही होते हैं........अच्छी प्रस्तुति....

Balas