जय हनुमान ज्ञान गुण सागर

पिछले तीन आलेखों में आपने पढा कि किन परिस्थितियों में हमें तीन चार महीनों में तीन घर बदलने पडे थे , सेक्‍टर 4 के छोटे से क्‍वार्टर में पहुंच चुके थे। यहां आने के बाद हमलोग यहां के माहौल के अनुरूप धीरे धीरे ढलते जा रहे थ। यहां आने से पूर्व के दो वर्षों में भी हमलोग तीन क्‍वार्टर बदल चुके थे , उसकी चर्चा भी कभी अवश्‍य करूंगी। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी हमलोग तनिक भी विचलित नहीं थे। अपने जेठ के उस क्‍वार्टर को जहां मैं विवाह के बाद पहुंची थी और अपने जीवन के आरंभिक 8 वर्ष व्‍यतीत किए थे , दोनो बच्‍चों ने जन्‍म लिया था और अपना बचपन जीया था , भी जोडा जाए तो हमारे  बच्‍चे 8 और 6 वर्ष की उम्र में ही अभी तक सात मकान देख चुके थे।

कहा जाता है कि बिल्‍ली जबतक अपने अपने बच्‍चों को सात घर में न घुमाए , तबतक उसके आंख नहीं खुलते। हमारे बच्‍चों के साथ भी ऐसा ही हो रहा था , ये सातवां घर था , इसलिए हम कुछ निश्चिंत थे कि अब शायद इन्‍हें लेकर कहीं और न जाना पडे। पर मनुष्‍य के जीवन के अनुरूप आंख खुलने तक , आज की सरकार के अनुसार बालिग होने तक इन्‍होने पूरे 10 मकान देख लिया। इनके 12वीं पास होने तक बोकारो स्‍टील सिटी में हमें और तीन मकान बदलने पडे, जिनके बारे में कुछ दिन बाद चर्चा करूंगी । अभी आनेवाले कुछ आलेखों में अन्‍य पहलुओं की चर्चा , क्‍यूंकि सेक्‍टर 4 के उस छोटे से आरामदायक क्‍वार्टर में हमने 4 वर्ष आराम से व्‍यतीत किए थे ।

वैसे तो हमारे यहां प्रथा है कि हम जब भी नए घर में रहने को जाएं , तो वहां मौजूद बुरे शक्तियों से बचने के लिए एक हवन अवश्‍य कराएं। मकान पुराना हो , तो इसकी आवश्‍यकता नहीं पडती है , पर नए में तो यह आवश्‍यक है। अधिकांश लोग स्‍वामी सत्‍य नारायण भगवान की ही कथा करवाते हैं, पर हम पुराने मकानों में शिफ्ट करते थे , इतनी जल्‍दबाजी में हर जगह अस्‍थायी तौर पर क्‍वार्टर बदलते थे कि हर वक्‍त इतना खर्च कर पाना आवश्‍यक नहीं लगा। और इसी क्रम में जब स्‍थायी तौर पर किसी क्‍वार्टर में निवास करने की बारी आयी तो भी पूजा करवाने का ध्‍यान न रहा। इस बात की वजह ये भी हो सकती है कि ईश्‍वर को मानते हुए भी विभिन्‍न प्रकार के कर्मकांडों पर हमारा कम विश्‍वास है।

पहली बार क्‍वार्टर बदलते समय हमलोगों ने स्‍वामी बजरंग बली की एक फोटो रख ली थी , बस जिस नए मकान में शिफ्ट करते ,  एक दो किलो लड्डू से ही उनका भोग लगाते और पडोसियों में प्रसाद के बहाने बांटकर सबके परिचय भी ले लिया करते। वास्‍तव में , बचपन से मेरी प्रवृत्ति रही है कि किसी भी प्रकार के घबराहट में मैं प्रार्थना अवश्‍य ईश्‍वर से किया करती हूं , पर जब भी पूजा , पाठ ,कर्मकांड , व्रत , मन्‍नत की बारी आती है , मुझे बजरंग बली ही याद आ जाते हैं और हमेशा हमें संकट से मुक्ति भी मिल जाती है। भले ही समाज मं चलती आ रही प्रथा केअनुरूप मैं संकट में घबडाकर कभी कोई मन्‍नत मान लिया करती हूं , पर वास्‍तव में मेरी सोंच है कि पूजा के तरीके से ईश्‍वर को कोई मतलब नहीं , दिल में भक्ति होनी चाहिए। ऐसी मानसिकता विकसित किए जाने में मेरे पिताजी का मुझपर प्रभाव रहा ,  मेरे पति की मानसिकता भी लगभग ऐसी ही है , यही कारण है कि जीवन में हर मौके पर हमलोग समाज और पंडितों के हिसाब से नहीं , अपनी मानसिकता के अनुसार काम करते रहें।

एक क्‍वार्टर प्राप्‍त करने में सफलता

बोकारो स्‍टील सिटी के मेरे अपने अनुभव की पिछली तीनों कडियां पढने के लिए आप यहां यहां और यहां चटका लगाएं , अब आगे बढते हैं। कॉपरेटिव कॉलोनी के प्‍लाट नं 420 में अभी साफ सफाई और सेटिंग में व्‍यस्‍त ही थे कि बोकारो के निकट के एक गांव बालीडीह में रहनेवाले मेरे पापाजी के एक मित्र ठाकुर साहब को संदेश मिल गया कि हमलोग दो तीन माह से एक क्‍वार्टर के लिए परेशान हैं। सुनते ही उन्‍होने पापाजी से संपर्क किया , बोकारो में स्‍टील प्‍लांट के निर्माण के वक्‍त बी एस एल को उन्‍होने सैकडो एकड जमीन दी थी , पर मुआवजे की रकम उन्‍हें 30 वर्ष बाद भी नहीं मिल पायी थे। इतने जमीन देने के बाद बोकारो स्‍टील सिटी में वे एक इंच जमीन के भी हकदार नहीं थे। अपनी बाकी जमा पूंजी से वे केस लड रहे थे , तबतक उनका केस चल ही रहा था। अपने परिवार की गरिमा को देखते हुए वे कंपनी की ओर से दिए जानेवाले चतुर्थ श्रेणी की नौकरी को अस्‍वीकार कर चुके थे, परिवार की कमजोर होती स्थिति को देखते हुए उनके एक छोटे भाई ने अवश्‍य बोकारो में नौकरी करना स्‍वीकार कर लिया था। उनको सेक्‍टर 4 में क्‍वार्टर एलॉट किया गया था , जो तबतक खाली ही पडा था , क्‍यूंकि नौकरी के लिए वे बोकारो से 10 कि मी दूर अपने गांव बालीडीह से ही आना जाना करते थे।

शहर में क्‍वार्टर की इतनी दिक्‍कत के बावजूद उस समय तक बोकारो के विस्‍थापित कर्मचारी इस शर्त पर अपने क्‍वार्टर दूसरों को आराम से दे दिया करते थे कि किरायेदार उसे वह पैसे दे दे , जो क्‍वार्टर के एवज में कंपनी उससे काटती है। हां , विस्‍थापितों को एक सुविधा अवश्‍य होती थी कि उसे सालभर या दो साल के पैसे एडवांस में मिल जाते थे। आज तो सब लोग व्‍यवसायिक बुद्धि के होते जा रहे हैं , इतने कम में शायद न सौदा न हो। हां , तो दोनो मित्रों में तय हुआ कि कंपनी से क्‍वार्टर के लिए जो पैसे काटे जाएंगे , वो हमें उनके भाई को दे देना होगा। उन्‍हें भी सुविधा हो , इसके लिए हमलोगों ने एडवांस में ही उन्‍हें 25,000 रूपए दे दिए और 2 जुलाई को हमें क्‍वार्टर की चाबी मिल गयी। कॉलोनी में इतने सस्‍ते दर पर बिजली और पानी की मुफ्त सुविधा के साथ एक क्‍वार्टर मिल जाना हमारे लिए बहुत बडी उपलब्धि थी। तीन महीनों से चल रहा सर से एक बडा बोझ हट गया था , पर कॉपरेटिव कॉलोनी के मकान मालिक हमारे दो महीने के एडवांस लौटाने को तैयार न थे।

लगातार खर्चे बढते देख हम भी कम परेशान न थे , पैसे को वसूल करने के लिए हम यदि दो महीने यहां रहते , तो एक महीने का पानी और डेढ महीने के बिजली के भी अतिरिक्‍त पैसे लगते। सेक्‍टर 4 का क्‍वार्टर तो हम ले ही चुके थे , इसलिए अब यहां मन भी नहीं लग रहा था , हमने पांच जुलाई को वहीं शिफ्ट करने का निश्‍चय किया। बहुत ही छोटे छोटे दो कमरो का सरकारी क्‍वार्टर , पर हम तीन मां बेटे तो रह ही सकते थे। मेरी आवश्‍यकता के अनुरूप रसोई अपेक्षाकृत बडी थी , क्‍यूंकि मैं एक साथ सबकुछ बनाने के फेर में सारा सामान फैला देती हूं , फिर खाना बन जाने के बाद ही सबको एक साथ समेटती हूं। दिक्‍कत इतनी ही दिखी कि स्‍लैब नहीं था , कुछ दिनों तक बैठकर खाना बनाना पडा। शिफ्ट करने के बाद बारिश का मौसम शुरू हुआ , रसोईघर के सीपेज वाले दीवाल में से , नालियों में से रंग बिरंगे कीडे निकलने का दौर शुरू हुआ , तो हमने स्‍वयं से ही इस रसोई की दीवालों पर प्‍लास्‍टर करने का मन बनाया। लेकिन यह काम बारिश के बाद ही हो सकता था , तबतक मैं इस छोटी सी समस्‍या को झेलने को मजबूर थी।

कुछ दिनों तक पानी के लाइन में काम होने की वजह से पानी भी 4 बजे से 7 बजे सुबह तक चला करता था। इतनी सुबह क्‍या काम हो , जब काम के लिए तैयार होते , नल में पानी ही नहीं होती। तब हमलोगों ने स्‍टोर करने के लिए एक बडा ड्रम रख लिया और सुबह सुबह ही कपडे धुल जाएं , इसलिए वाशिंग मशीन भी ले ली थी , भले ही तबतक घर में टी वी और फ्रिज तक नहीं थे। घर में वाशिंग मशीन रखने के लिए भी जगह नहीं थी , पर बडा किचन इस काम आया और उसके एक किनारे मैने इसे रख दिया। बरसात के बाद कंपनी का खुद ही टेंडर निकला , दीवाल के प्‍लास्‍टर के लिए कुछ मिस्‍त्री काम करने आए , लगे हाथ हमलोगों ने अलग से एक स्‍लैब बनवाया, सिंक खरीदा , रसोई में ये सब भी लगवा दिए। कंपनी की ओर से ऊपर की टंकी को भी ठीक किया गया , जिससे 24 घंटे पानी की सप्‍लाई होने लगी। कुछ ही दिनों में चूना भी हो गया और अक्‍तूबर 1998 से घर बिल्‍कुल मेरे रहने लायक था , बस कमी थी तो एक कि वह बहुत छोटा था , पर उस वक्‍त आदमी और सामान कम थे , सो दिक्‍कत नहीं हुई।

कुछ ही दिनों में सेक्‍टर 4 का यह छोटा सा क्‍वार्टर हमारे लिए पूरा सुविधाजनक बन गया था। यहां से मात्र 500 मीटर की दूरी पर एक ओर बोकारो का मुख्‍य बाजार , जिसमें हर प्रकार का बाजार किया जा सकता था , डॉक्‍टर भी बैठा करते , छोटे मोटे कई नर्सिंग होम भी थे। और इतनी ही दूरी पर दूसरी ओर बडा हॉस्पिटल भी , जहां किसी इमरजेंसी में जाया जा सकता था , वहीं बगल में छोटा सा हाट भी था , जहां से फल सब्जियां खरीदा जा सकता था। बच्‍चों के जूनियर स्‍कूल भले ही थोडी दूरी पर थे , वे बस से जाते। पर सीनियर स्‍कूल बगल में होने और उसी में सारा ऑफिशियल काम होने से मुझे बहुत सुविधा होती। आधे किलोमीटर के अंदर मेरा हर काम हो सकता था। कुल मिलाकर यह क्‍वार्टर बहुत ही अच्‍छी जगह था , जहां परिवार को छोडकर ये निश्चिंत रह सकते थे। इतने दिनों के झंझट में सारी छुट्टियां जो समाप्‍त हो गयी थी। धीरे धीरे कुछ परिचितों का भी पता चलने लगा था और हमलोग संडे वगैरह को वहां घूम भी लेते। अभी चलती ही रहेगी ये बोकारो गाथा !!

कुछ दिनों तक तो हमें चार सौ बीस में रहने को बाध्‍य होना पडा !!

पिछले इस और इस आलेख के माध्‍यम से क्रमश: आपको जानकारी हुई कि किन परिस्थितियों में हमने अपने बच्‍चों का बोकारो के स्‍कूल में एडमिशन कराया और हमें एक महीने तक चास में विपरीत परिस्थितियों में रहने को बाध्‍य होना पडा। घर लौटने पर गर्मी की छुट्टियों के 45 दिनों में से एक महीने हमने पूरी निश्चिंति से गुजारे , पर 31 वें दिन से पुन: तनाव ने घेरना शुरू कर दिया था , क्‍यूंकि कहीं भी बात बनती नहीं दिख रही थी। लेकिन उसके बाद काफी गंभीरता से पुन: मकान के लिए दौड धूप करने की शुरूआत की। पर देखते ही देखते 42वां दिन भी पहुंच गया और हमारी बात कहीं भी न बनी।

दो तीन दिन बाद स्‍कूल खुलने थे और इतनी जल्‍दी तो हम हार नहीं मान सकते थे , पर चास के गुजरात कॉलोनी जाने के लिए हम बिल्‍कुल तैयार न थे। ऐसी हालत में हमने मजबूरी में बी एस एल कॉलोनी में किसी मकान का जुगाड होने तक अपने बजट के बाहर कॉपरेटिव कॉलोनी में घर लेना चाहा, जहां बी एस एल की ओर से नियमित पानी और बिजली की सप्‍लाई की जाती है। पर यहां भी मकान खाली हो तब तो मिले।  घूमते घूमते सिर्फ एक जगह 'TO LET' का बोर्ड टंगा मिला , हमने उस फ्लैट की किसी खामी पर ध्‍यान न देते हुए हां कर दी। बिजली और पानी की सुविधा के बाद बाकी असुविधाएं गौण होती हैं, इसका हमें पता चल गया था। हां , 1998 में 2500 रूपए का किराया , पानी के लिए दो सौ रूपए और 4 रू प्रति यूनिट की दर से बिजली का भुगतान हमारे बजट से बाहर था और इसे लंबे समय तक चलाने के लिए कुछ अतिरिक्‍त आय की व्‍यवस्‍था करनी पडती। हमने अपने पुराने मकान मालिक को एक महीने रहने का तीन महीने का किराया सौंपा और वहां से सामान यहां ले आए।  

18 जून से हमलोगों ने उस फ्लैट में रहना और 20 जून से बच्‍चों ने स्‍कूल जाना शुरू कर दिया। दो कमरे बडे बडे थे , पर डाइनिंग रूम को सभी कमरो , रसोई और बाथरूम को जोडनेवाला गलियारा मात्र कहा जा सकता था। गंदगी हद से अधिक , खासकर किचन की खिडकियों का तो पूछे ही मत। नए किरायेदार के आने से पूर्व मकानमालिक दीवालों पर तो रंगरोगन करवाते हैं , पर खिडकियों को यूंही छोड देते हैं , जिसका फल हमें भुगतना पड रहा था। पूरे घर की साफ सफाई में हमें 10 दिन लग गए , इस बार हमलोग कुछ और सामान लेकर आए थे , घर धीरे धीरे व्‍यवस्थित होने लगा था। बाथरूम का पानी कभी कभी डाइनिंग में अवश्‍य चला जाता था , पर इसे अनदेखा करके हम चैन की सांस लेने लगे थे।

हमें बाद में मालूम हुआ कि यह फ्लैट मुझे इतनी जल्‍दी सामान्‍य परिस्थितियों में नहीं मिला था , वो इसलिए मिला था , क्‍यूंकि लोग इसमें रहना पसंद नहीं करते थे ,  इसका नंबर 420 जो था। मकानमालिक ने बाद में स्‍पष्‍ट किया कि प्‍लॉट एलॉट होने के वक्‍त भी कम प्‍वाइंट होने के बाद भी उन्‍हें यह प्‍लॉट आसानी से मिल गया था , क्‍यूंकि अधिक प्‍वाइंटवाले लोग प्‍लॉट नं 420 को लेकर अपनी छवि को खराब नहीं करना चाहते थे। भला हो उन कुछ नंबरों का , जिसे आमतौर पर लोग प्रयोग नहीं करना चाहते और वह नंबर मुसीबत में पडे लोगों की मदद कर देता है। ऐसी परिस्थिति में ही मुझे भी 420 में रहने का मौका मिल गया , पर मात्र 18 दिनों तक ही वहां रह पायी , आखिर क्‍या हुआ आगे ?? इसे जानने के लिए अगली कडी को पढना न भूलें।

बोकारो में मकान की किल्‍लत

पिछले अंक में आपने पढा कि कितनी माथापच्‍ची के बाद हमने आखिरकार बच्‍चों का बोकारो में एडमिशन करवा ही लिया। 1998 के फरवरी के अंत में बच्‍चों के दाखिले से लेकर स्‍कूल के लिए अन्‍य आवश्‍यक सामानों की खरीदारी , जो आजकल आमतौर पर स्‍कूलों के द्वारा ही दी जाती है , सब हो गयी थी और 2 अप्रैल से क्‍लासेज शुरू होने थे , जिससे पहले हमें मार्च के अंत में बोकारो में किराये का मकान लेकर शिफ्ट कर जाना था। हमने अपने सारे परिचितों को बोकारो में एक किराए के मकान के लिए कह दिया था , पर पूरा बोकारो शहर SAIL के अंदर आता है , वहां उनके अपने कर्मचारियों के लिए क्‍वार्टर्स बने हैं , जिसमें वो रहते हैं। शहर के एक किनारे बी एस एल के द्वारा ही एकमात्र प्राइवेट कॉलोनी 'कॉपरेटिव कॉलोनी' बनायी गयी है , जिसमें बिजली और पानी की सप्‍लाई बी एस एल के द्वारा की जाती है , पर मांग की तुलना में मकान की कमी होने से ये भी सर्वसुलभ नहीं। बैंक , एल आई सी या अन्‍य छोटी बडी कंपनियों के कर्मचारी वहां रहा करते है। बडे बडे व्‍यवसायियों के रहने के लिए मार्केट कांप्‍लेक्‍स में उनके अपने मकान हैं।

यहां के छोटे व्‍यवसायी या बाहरी लोग विस्‍थापित चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को एलॉट किए गए छोटे छोटे क्‍वार्टर्स को किराये में ले लेते हैं , जरूरत हो तो उसी कैम्‍पस में एक दो कमरे बना लेते हैं , क्‍यूंकि ऐसे कर्मचारी अपने गांव में रहते हैं और उनके क्‍वार्टर्स खाली पडे होते हें। BSL के अनुसार यह गैरकानूनी तो है , पर आम जनों के लिए इसके सिवा कोई विकल्‍प नहीं। मुझे अकेले ही दोनो बच्‍चों को लेकर रहना था , इसलिए मैने वैसे ही किसी कर्मचारी की खोज आरंभ कर दी। जान पहचान के लोगों को फोन करने पर जबाब मिलता ... बोकारो में जीने खाने के लिए नौकरी मिल जाती है , विवाह करने के लिए छोकरी भी मिल जाती है , पर घर बसाने के लिए कोठरी क्‍या , झोपडी भी नहीं मिलती , सुनकर मन परेशान हो जाया करता था। देखते देखते मार्च का अंतिम सप्‍ताह आ गया , दो चार दिनों में क्‍लासेज शुरू होने थे और रहने के लिए मकान का अता पता भी नहीं था।  वास्‍तव में बोकारो के इर्द गिर्द के शहर या अन्‍य कॉलोनी में पानी की व्‍यवस्‍था मकानमालिकों को खुद करनी पडती है , जबकि बिजली के लिए वे राज्‍य सरकार पर निर्भर रहते हैं , दोनो असुविधाजनक है , किराएदार वहां रहना पसंद नहीं करते , इसलिए बोकारो के सभी सेक्‍टरों की मुख्‍य कॉलोनी पर पूरा दबाब बना होता है।

हारकर हमने बोकारो से बिल्‍कुल सटे शहर चास में डेरा लेने का निश्‍चय किया । बोकारो और चास के मध्‍य एक छोटी सी नदी बहती है और दोनो के मध्‍य दो चार सौ मीटर की एक पुल का ही फासला है। स्‍कूल की बस वहां तक आती थी , इसलिए अधिक चिंता नहीं थी , कुछ लोगों ने वहां के पीने के पानी की शिकायत कर हमें भयभीत जरूर कर दिया था। चास में डेरा मिलने में देर नहीं लगी और 1 अप्रैल को हमलोग कामचलाऊ सामान के साथ इसके गुजरात कॉलोनी के एक मकान में शिफ्ट कर गए। पता नहीं , किसने घर का नक्‍शा तैयार किया था , इस घर के एक कमरे में एक भी खिडकी नहीं थी , जबकि दूसरे में चारो ओर खिडकियां ही खिडकियां , वो भी बिना ग्रिल या रॉड की अनफिट दरवाजे वाली। कम सामान के कारण दो चार घंटे में ही घर व्‍यवस्थित हो गया , पर पहले ही दिन खाना खाने से भी पहले हुई बारिश ने न सिर्फ इस घर का पूरा पोल खोलकर रख दिया , वरन् हमें अप्रैलफूल भी बना दिया। थोडी ही देर में पूरा कमरा बारिश के पानी से भरा था और भीगने से बचाने के क्रम में सारा सामान कमरे के बीचोबीच। 'मैं इस घर में नहीं रह सकती , बरसात से पहले पहले दूसरा घर देखना होगा' मैने निश्‍चय कर लिया था , पर बाद में अन्‍य कठिनाइयों को देखते हुए महसूस हुआ कि इस कॉलोनी मे मकान बदलने से भी कोई फायदा नहीं होनेवाला।

दूसरे दिन से बच्‍चों ने स्‍कूल जाना शुरू कर दिया था , पर शाम को चार घंटे बिजली गुल , न तो होमवर्क करना संभव था और न ही खाना बनाना। कई दिन तो बच्‍चे बिना होमवर्क के भूखे सो गए , सुबह जल्‍दी उठाकर उन्‍हें होमवर्क कराने पडते। फिर मैने एक उपाय निकाला , उन्‍हे दिन में सुलाना बंद कर दिया , स्‍कूल से आने के बाद खिलाकर होमवर्क करवाती , शाम को फिर से नाश्‍ता और नींद आने के वक्‍त हॉर्लिक्‍स पिलाकर सुला देती , दूध तो तब लेना भी नहीं शुरू किया था।  पर समस्‍या एक नहीं थी , शाम बिजली के जाते ही जेनरेटरों की आवाज से जीना  मुश्किल लगने लगता। कुछ दिनों तक एक छोटा भाई मेरे साथ था ,  छोटी सी बालकनी में मुश्किल से दो कुर्सियां डालकर हम दोनो बैठे रहते , कुर्सियों के हत्‍थे पर थोडी देर बच्‍चे बैठते , फिर थककर सो जाते।10 बजे रात में लाइट आने से पहले तक हमलोग दोनो सोए बच्‍चों को पंखा झलते , लाइट आने के बाद खाना बनाते , तब खाते। अंधेरे , गर्मी और होहल्‍ले की वजह से मेरे सर मे दर्द रहने लगा था।

परेशान हो गए थे हमलोग इस रूटीन से , हमलोग समझ चुके थे कि चास में रहकर बच्‍चों को पढा पाना मुश्किल है , इसलिए प्रतिदिन बोकारो आकर अपने परिचितों के माध्‍यम से क्‍वार्टर्स के बारे में पता करते। इतने आसपास में बसे दो शहर और दोनो में इतना फर्क , हमें ऐसा महसूस होता , मानो दोनो शहरों के मध्‍य बहती नदी पर बना वह पुल स्‍वर्ग और नरक को जोडता हो। ऐसे ही तनावपूर्ण वातावरण में एक महीने व्‍यतीत हो गए और 4 मई का दिन आ गया , जहां से 45 दिनों की गर्मियों की छुट्टियां थी , हमलोग वापस अपने घर आ गए। हमें 45 दिन पुन: मकान ढूंढने के लिए मिल गए थे , जिससे काफी राहत हो गयी थी। तबतक हमने फर्नीचर भले ही यहां छोड दिए हों , पर मन ही मन तैयार थी कि यदि बोकारो मे घर नहीं मिला तो यहां दुबारा नहीं आऊंगी , क्‍यूंकि मुझे बच्‍चों को पढाने के लिए ही यहां रहना था और ऐसे वातावरण्‍ा में जब बच्‍चे पढ ही नहीं पाएंगे , तो फिर यहां रहने का क्‍या फायदा ?? बोकारो के खट्टे मीठे अनुभवों से संबंधित पोस्‍ट आगे भी चलती ही रहेगी।

घर लौटने के लिए तो रास्‍ता खुला

बेटे के एडमिशन के सिलसिले में एक सप्‍ताह से नेट से , ब्‍लॉग जगत से दूर थी , कुछ भी लिखना पढना नहीं हो पाया। दो वर्ष पहले जब बडे बेटे ने अपनी पढाई के लिए घर से बाहर कदम बढाया था , छोटे की घर में मौजूदगी के कारण बनी व्‍यस्‍तता ने इसका अहसास भी नहीं होने दिया था। पर इस बार छोटे का कॉलेज में दाखिले के बाद घर लौटना हुआ तो घर इतना खाली लग रहा है कि यहां रहने की इच्‍छा नहीं हो रही। वैसे रहने की बाध्‍यता भी इस घर में , इस शहर में नहीं है , क्‍यूंकि ये शहर तो मैने बच्‍चों की 12वीं तक की पढाई लिखाई के लिए ही चुना था , जो पूरा हो चुका। पर जहां की मिट्टी में एक बार घुलना मिलना हो जाता है , तुरंत पीछा छुडा पाना इतना आसान भी तो नहीं होता। 12 वर्षों का समय कम भी तो नहीं होता , शहर के एक एक गली से ,घर के एक एक कोने से ऐसा जुडाव हो जाता है कि उससे दूर होने का जी भी नहीं करता। किसी नई जगह जाना हो , तो एक उत्‍सुकता भी मन में होती है , पर उसी पुरानी छोटी सी जगह में लौटना , जिसे 12 वर्षों पहले छोडकर आयी थी , मन में कोई उत्‍साह नहीं पैदा करता है। वैसे तो उस छोटी सी कॉलोनी के अंदर भी सुख सुविधा की तो कोई कमी नहीं , पर जो बात इस शहर में है , वो भला कहीं और कहां ??

12 वर्ष पहले की एक एक बात हमें याद है , सभी जागरूक अभिभावकों की तरह ही हमें भी यह अ‍हसास होने लगा था कि बच्‍चों को पढाई लिखाई का अच्‍छा माहौल दिया जाए , तो उनके कैरियर को मजबूती दी जा सकती है। बच्‍चों को लकर हमारी महत्‍वाकांक्षा बढती जा रही थी और हमारी कॉलोनी के जिस स्‍कूल में बच्‍चे पढ रहे थे , उसमें पढाई लिखाई के वातावरण का ह्रास होता जा रहा था। राज्‍य सरकार के विद्यालयों को तो छोड ही दें , बिहार और झारखंड के केन्‍द्रीय विद्यालय का तो हाल भी किसी से छुपा न होगा। पढाई के ऐसे वातावरण से ऊबकर हमलोग अच्‍छे अच्‍छे अवासीय स्‍कूलों का पता करने लगें। पर उनमें दो बच्‍चों की पढाई का बजट हमारी क्षमता से अधिक था। कुछ दिनों तक दौड धूप करने के बाद हम निराश बैठे थे कि अचानक बोकारो के 'दिल्‍ली पब्लिक स्‍कूल' में हर कक्षा में एक नए सेक्‍शन के शुरूआत की घोषणा की खबर हमें मिली। हमने स्‍कूल से दो फार्म मंगवा तो लिए , पर स्‍कूल में होस्‍टल की व्‍यवस्‍था नहीं थी , बच्‍चे छोटे थे , इसलिए कोई वैकल्पिक व्‍यवस्‍था भी नहीं की जा सकती थी , यह सोंचकर हमलोग दाखिले के लिए अधिक गंभीर नहीं थे।

पर बोकारो के इस स्‍कूल की सबने इतनी प्रशंसा सुनी थी कि फॉर्म जमा करने के ठीक एक दिन पहले परिवार के अन्‍य सदस्‍यों के बातचीत के बाद निर्णय हुआ कि फार्म भर ही दिया जाए , रिजल्‍ट से ये तो पता चलेगा कि बच्‍चे कितने पानी में हैं। जहां तक एडमिशन कराने की बात है , कोई बाध्‍यता तो नहीं है , रिजल्‍ट के बाद ही कुछ सोंचा समझा जाएगा। पर दूसरे दिन दिसंबर का अंतिम दिन था , कंपकंपाती ठंड महीने में लगातार बारिश , मौसम के बारे में सब अंदाजा लगा सकते हैं, फार्म जमा करने की हमलोगों की इच्‍छा समाप्‍त हो गयी थी ,  पर अपने भांजे के बेहतर भविष्‍य के लिए वैसे मौसम में भी बस से लंबी सफर करते हुए दिनभर क्‍यू मे खडा रहकर मेरा भाई फॉर्म जमा करके आ ही गया , साथ में परीक्षा की तिथि लेकर भी। बच्‍चों को हमने एक सप्‍ताह तक परीक्षा की तैयारी करायी , परीक्षाभवन में भीड की तो पूछिए मत , बोकारो के अभिभावकों के लिए डी पी एस पहला विकल्‍प हुआ करता है । पर दोनो भाइयों ने लिखित के साथ साथ मौखिक परीक्षा और इंटरव्‍यू तक में अच्‍छा प्रदर्शन किया और क्रमश: तीसरी और पहली कक्षा में एडमिशन के लिए दोनो का चयन कर लिया गया।

दोनो में से किसी एक के चयन न होने से हमारे सामने बोकारो न जाने का अच्‍छा बहाना हो जाता , पर दोनो के चयन के बाद हमारी मुश्किल और भी बढ गयी। एडमिशन तक के दस दिनों का समय हमलोगों ने किंकर्तब्‍यविमूढता में गुजारे। ये नौकरी छोडकर बोकारो आ नहीं सकते थे , बच्‍चों को दूसरी जगह छोडा नहीं जा सकता था , एकमात्र विकल्‍प था , मैं उनको लेकर यहां रहूं , एक दो वर्ष नहीं , लगातार 12 वर्षों तक । पर बडे होने पर बच्‍चे मेरी आज्ञा की अवहेलना करें , पिता के घर में नहीं होने से पढाई न करें , बिगड जाएं तो सारी जबाब देही मेरे माथे पर ही आएगी , सोंचकर मैं परेशान थी। लेकिन एडमिशन के डेट के ठीक दो दिन पहले यहां भी निर्णय हुआ।

इनके एक मित्र के भाई बोकारो में रहते थे , डी पी एस की पढाई और व्‍यवस्‍था के बारे में उन्‍हें जानकारी थी। वो संयोग से हमारे यहां आए , जब सारी बातों की उन्‍हें जानकारी हुई , तो उन्‍होने तुरंत एडमिशन कराने को कहा। भविष्‍य के प्रति हमारी आशंका को देखते हुए उन्‍होने कहा .. 'अपने घर लौटने के लिए तो आपका रास्‍ता हमेशा खुला होता है , किसी प्रकार के रिस्‍क लेने में भय कैसा ?? दूसरी जगह जाने के लिए मौका कभी कभार ही मिलता है , वहां कोई परेशानी हो , उसी दिन वापस लौट जाइए।  हां , इसमें कुछ पैसे भले ही बर्वाद होंगे , पर इसे अनदेखा किया जाना चाहिए।' उनका इतना कहना हमें बहुत कुछ समझा गया । पुरानी व्‍यवस्‍था को बिना डगमग किए सफलता की ओर जाने का कोई चांस मिले तो वैसे रिस्‍क लेने में भला क्‍या गडबडी ?? हमलोगों ने तुरंत एडमिशन का मन बना लिया और दूसरे ही दिन बोकारो आ गए। आगे की पोस्‍टों में भी चलता ही रहेगा .. बोकारो के 12 वर्षों के सफर के खट्टे मीठे अनुभव !!