जहां चाह वहां राह .. आखिरकार मुझे एक क्‍वार्टर प्राप्‍त करने में सफलता मिल ही गयी !!

बोकारो स्‍टील सिटी के मेरे अपने अनुभव की पिछली तीनों कडियां पढने के लिए आप यहां यहां और यहां चटका लगाएं , अब आगे बढते हैं। कॉपरेटिव कॉलोनी के प्‍लाट नं 420 में अभी साफ सफाई और सेटिंग में व्‍यस्‍त ही थे कि बोकारो के निकट के एक गांव बालीडीह में रहनेवाले मेरे पापाजी के एक मित्र ठाकुर साहब को संदेश मिल गया कि हमलोग दो तीन माह से एक क्‍वार्टर के लिए परेशान हैं। सुनते ही उन्‍होने पापाजी से संपर्क किया , बोकारो में स्‍टील प्‍लांट के निर्माण के वक्‍त बी एस एल को उन्‍होने सैकडो एकड जमीन दी थी , पर मुआवजे की रकम उन्‍हें 30 वर्ष बाद भी नहीं मिल पायी थे। इतने जमीन देने के बाद बोकारो स्‍टील सिटी में वे एक इंच जमीन के भी हकदार नहीं थे। अपनी बाकी जमा पूंजी से वे केस लड रहे थे , तबतक उनका केस चल ही रहा था। अपने परिवार की गरिमा को देखते हुए वे कंपनी की ओर से दिए जानेवाले चतुर्थ श्रेणी की नौकरी को अस्‍वीकार कर चुके थे, परिवार की कमजोर होती स्थिति को देखते हुए उनके एक छोटे भाई ने अवश्‍य बोकारो में नौकरी करना स्‍वीकार कर लिया था। उनको सेक्‍टर 4 में क्‍वार्टर एलॉट किया गया था , जो तबतक खाली ही पडा था , क्‍यूंकि नौकरी के लिए वे बोकारो से 10 कि मी दूर अपने गांव बालीडीह से ही आना जाना करते थे।

शहर में क्‍वार्टर की इतनी दिक्‍कत के बावजूद उस समय तक बोकारो के विस्‍थापित कर्मचारी इस शर्त पर अपने क्‍वार्टर दूसरों को आराम से दे दिया करते थे कि किरायेदार उसे वह पैसे दे दे , जो क्‍वार्टर के एवज में कंपनी उससे काटती है। हां , विस्‍थापितों को एक सुविधा अवश्‍य होती थी कि उसे सालभर या दो साल के पैसे एडवांस में मिल जाते थे। आज तो सब लोग व्‍यवसायिक बुद्धि के होते जा रहे हैं , इतने कम में शायद न सौदा न हो। हां , तो दोनो मित्रों में तय हुआ कि कंपनी से क्‍वार्टर के लिए जो पैसे काटे जाएंगे , वो हमें उनके भाई को दे देना होगा। उन्‍हें भी सुविधा हो , इसके लिए हमलोगों ने एडवांस में ही उन्‍हें 25,000 रूपए दे दिए और 2 जुलाई को हमें क्‍वार्टर की चाबी मिल गयी। कॉलोनी में इतने सस्‍ते दर पर बिजली और पानी की मुफ्त सुविधा के साथ एक क्‍वार्टर मिल जाना हमारे लिए बहुत बडी उपलब्धि थी। तीन महीनों से चल रहा सर से एक बडा बोझ हट गया था , पर कॉपरेटिव कॉलोनी के मकान मालिक हमारे दो महीने के एडवांस लौटाने को तैयार न थे।

लगातार खर्चे बढते देख हम भी कम परेशान न थे , पैसे को वसूल करने के लिए हम यदि दो महीने यहां रहते , तो एक महीने का पानी और डेढ महीने के बिजली के भी अतिरिक्‍त पैसे लगते। सेक्‍टर 4 का क्‍वार्टर तो हम ले ही चुके थे , इसलिए अब यहां मन भी नहीं लग रहा था , हमने पांच जुलाई को वहीं शिफ्ट करने का निश्‍चय किया। बहुत ही छोटे छोटे दो कमरो का सरकारी क्‍वार्टर , पर हम तीन मां बेटे तो रह ही सकते थे। मेरी आवश्‍यकता के अनुरूप रसोई अपेक्षाकृत बडी थी , क्‍यूंकि मैं एक साथ सबकुछ बनाने के फेर में सारा सामान फैला देती हूं , फिर खाना बन जाने के बाद ही सबको एक साथ समेटती हूं। दिक्‍कत इतनी ही दिखी कि स्‍लैब नहीं था , कुछ दिनों तक बैठकर खाना बनाना पडा। शिफ्ट करने के बाद बारिश का मौसम शुरू हुआ , रसोईघर के सीपेज वाले दीवाल में से , नालियों में से रंग बिरंगे कीडे निकलने का दौर शुरू हुआ , तो हमने स्‍वयं से ही इस रसोई की दीवालों पर प्‍लास्‍टर करने का मन बनाया। लेकिन यह काम बारिश के बाद ही हो सकता था , तबतक मैं इस छोटी सी समस्‍या को झेलने को मजबूर थी।

कुछ दिनों तक पानी के लाइन में काम होने की वजह से पानी भी 4 बजे से 7 बजे सुबह तक चला करता था। इतनी सुबह क्‍या काम हो , जब काम के लिए तैयार होते , नल में पानी ही नहीं होती। तब हमलोगों ने स्‍टोर करने के लिए एक बडा ड्रम रख लिया और सुबह सुबह ही कपडे धुल जाएं , इसलिए वाशिंग मशीन भी ले ली थी , भले ही तबतक घर में टी वी और फ्रिज तक नहीं थे। घर में वाशिंग मशीन रखने के लिए भी जगह नहीं थी , पर बडा किचन इस काम आया और उसके एक किनारे मैने इसे रख दिया। बरसात के बाद कंपनी का खुद ही टेंडर निकला , दीवाल के प्‍लास्‍टर के लिए कुछ मिस्‍त्री काम करने आए , लगे हाथ हमलोगों ने अलग से एक स्‍लैब बनवाया, सिंक खरीदा , रसोई में ये सब भी लगवा दिए। कंपनी की ओर से ऊपर की टंकी को भी ठीक किया गया , जिससे 24 घंटे पानी की सप्‍लाई होने लगी। कुछ ही दिनों में चूना भी हो गया और अक्‍तूबर 1998 से घर बिल्‍कुल मेरे रहने लायक था , बस कमी थी तो एक कि वह बहुत छोटा था , पर उस वक्‍त आदमी और सामान कम थे , सो दिक्‍कत नहीं हुई।

कुछ ही दिनों में सेक्‍टर 4 का यह छोटा सा क्‍वार्टर हमारे लिए पूरा सुविधाजनक बन गया था। यहां से मात्र 500 मीटर की दूरी पर एक ओर बोकारो का मुख्‍य बाजार , जिसमें हर प्रकार का बाजार किया जा सकता था , डॉक्‍टर भी बैठा करते , छोटे मोटे कई नर्सिंग होम भी थे। और इतनी ही दूरी पर दूसरी ओर बडा हॉस्पिटल भी , जहां किसी इमरजेंसी में जाया जा सकता था , वहीं बगल में छोटा सा हाट भी था , जहां से फल सब्जियां खरीदा जा सकता था। बच्‍चों के जूनियर स्‍कूल भले ही थोडी दूरी पर थे , वे बस से जाते। पर सीनियर स्‍कूल बगल में होने और उसी में सारा ऑफिशियल काम होने से मुझे बहुत सुविधा होती। आधे किलोमीटर के अंदर मेरा हर काम हो सकता था। कुल मिलाकर यह क्‍वार्टर बहुत ही अच्‍छी जगह था , जहां परिवार को छोडकर ये निश्चिंत रह सकते थे। इतने दिनों के झंझट में सारी छुट्टियां जो समाप्‍त हो गयी थी। धीरे धीरे कुछ परिचितों का भी पता चलने लगा था और हमलोग संडे वगैरह को वहां घूम भी लेते। अभी चलती ही रहेगी ये बोकारो गाथा !!
संगीता पुरी

Specialist in Gatyatmak Jyotish, I write blogs on various topics particularly Astrology. My several books published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ organized by the newspaper ‘Prabhat Khabar’. गत्यात्मक ज्योतिष विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723

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