स्‍कूल में होनेवाली छुट्टिय

अभी तक आपने पढा .......  हर प्रकार के सुख सुविधायुक्‍त वातावरण होने के कारण हमलोग कुछ ही दिनों में आसानी से बोकारो में और बच्‍चे अपने नए स्‍कूल में एडजस्‍ट करने लगे थे। पर यहां रिश्‍तेदारों या परिचितों की संख्‍या बहुत कम थी , इसलिए कुछ ही दिनों में बोरियत सी महसूस होती। बच्‍चे अभी नीचली कक्षाओं में थे , इसलिए उनपर पढाई लिखाई का दबाब भी अधिक नहीं था , इसलिए समय काटना कुछ अधिक ही मुश्किल होता । खासकर सप्‍ताहांत में तो पुरानी यादें हमारा पीछा न छोडती और कुछ ही दिन व्‍यतीत होने पर ही हमलोग छुट्टियों का इंतजार करने लगते। एक दो वर्षों तक तो हमलोग स्‍कूल में दस बीस दिन की छुट्टियां होने पर भी कहीं न कहीं भागते , स्‍कूल खुलने से एक दिन पहले शाम को यहां पहुंचते।

डी पी एस  बोकारो में होनेवाली स्‍कूल की लंबी लंबी छुट्टियां भी हमारा काफी मदद कर देती थी। चाहे सत्रांत की छुट्टियां हो या गर्मियों की , चाहे दुर्गापूजा की छुट्टियां हो या दीपावली और छठ की या फिर बडे दिन की , डी पी एस में बडे ढंग से दी जाती। इस बात का ख्‍याल रखा जाता कि शुक्रवार को पढाई के बाद छुट्टियां हो और सोमवार को स्‍कूल खुले , इस तरह पांच दिन की छुट्टियों में भी बाहर जाने के लिए नौ दिन मिल जाते। वहां जूनियर से लेकर सीनियरों तक की सप्‍ताह में पांच दिन यानि सोमवार से शुक्रवार तक ही कक्षाएं होती थी और शनिवार रविवार को छुट्टियां हुआ करती थी। पूरे वर्ष के दौरान सप्‍ताह के मध्‍य किसी त्‍यौहार की छुट्टियां हो जाती तो शनिवार को कक्षा रखकर से समायोजित कर लिया जाता था। लेकिन लंबी छुट्टियों में कोई कटौती नहीं की जाती थी , हमें सत्रांत के पचीस दिन , गर्मी की छुट्टियों के चालीस दिन , दुर्गापूजा के नौ दिन और ठंड के चौदह दिनों की छुट्टियां मिल जाती थी।

वैसे तो हर सप्‍ताह में दो दिन छुट्टियों हो ही जाती थी , हालांकि उसका उपयोग शहर के अंदर ही किया जा सकता था। इसके अलावे वर्षभर में उपयोग में आनेवाली कुल 88 दिन की छुट्टियां कम तो नहीं थी। भले ही स्‍कूल के शिक्षकों ने अपनी सुविधा के लिए इस प्रकार की छुट्टी की व्‍यवस्‍था रखी हो , पर इसका हमलोगों ने  जमकर फायदा उठाया। छुट्टियों के पहले ही हमलोग कहीं न कहीं बाहर जाने की तैयारी करते , और बच्‍चों के स्‍कूल से आते ही निकल पडते। पर संयुक्‍त परिवार से तुरंत निकलकर यहां आने के बाद , और खासकर भतीजी के विवाह के बाद हम पर खर्च का इतना दबाब बढ गया था कि दूर दराज की यात्रा का कार्यक्रम नहीं बना पाते थे । पर बच्‍चों को दादी , नानी और अन्‍य रिश्‍तेदारों के घरो में घुमाते हुए हमने आसानी से दो तीन वर्ष बिता दिए।

बोकारो में भयमुक्‍त होकर जीने में मुझे बहुत समय लग गए !!

अभी तक आपने पढा .... वैसे तो बोकारो बहुत ही शांत जगह है और यहां आपराधिक माहौल भी न के बराबर , कभी कभार चोरी वगैरह की घटनाएं अवश्‍य हुआ करती हैं , जिसके लिए आवश्‍यक सावधानी बरतना आवश्‍यक है। यहां किसी क्‍वार्टर को खाली छोडकर छुट्टियां मनाने जाना खतरे से खाली नहीं। जबतक आप लौटेंगे , ताला तोडकर सारा सामान ढोया जा चुका होगा। भले ही ऐसी घटनाएं एक दो के साथ ही घटी हो , पर सावधान सबको रहना आवश्‍यक हो जाता है। इसलिए छुट्टियों में पूरे परिवार एक साथ कहीं जाते हैं , तो क्‍वार्टर में किसी को रखकर जाना आवश्‍यक होता है , खासकर रात्रि में तो घर में किसी का सोना बेहद जरूरी है। स्‍कूल बंद होने पर हम तीनों मां बंटे अक्‍सर कहीं न कहीं चले जाते। वैसे में घर की चाबी अपने सामने रह रहे पडोसी को देकर जाते , उनलोगों ने पूरी जिम्‍मेदारी से अपना दायित्‍व निभाया और कभी भी हमारे घर से कोई वस्‍तु गायब नहीं हुई। इसके अलावे अखबार में कभी कभार कुछ घटनाएं देखने या सुनने को मिलती भी तो उसकी अधिक चिंता नहीं होती।

पर कुछ  घटनाओं का प्रभाव हमारे सामने स्‍पष्‍ट दिखाई पडा , इसलिए वहां रहते हुए जीवन जीने के प्रति हम निश्चिंत नहीं रह सके। खासकर यहां आने के बाद पहले ही वर्ष यानि 1998 के बडे दिन की छुट्टियों में बडे बेटे के कक्षा में साथ साथ बैठनेवाले दोस्‍त के अपहरण और हत्‍या के बाद हमलोग बहुत ही दुखी हो गए थे। बेटे के दिलोदिमाग से ये घटना भूली नहीं जाती , और मैं स्‍कूल से लौटने पर प्रतिदिन उस बच्‍चे के बारे में जानकारी लेती , तो वह और दुखी हो जाता। उस समय तक उसकी हत्‍या के बारे में हमने कल्‍पना भी न की थी । उसके न लौटने की खबर से ही हम मां बेटे थोडी देर अवश्‍य रोते। प्रतिदिन मुझे रोते देख बेटे ने ही एक दिन हिम्‍मत दिखायी और मुझसे झूठमूठ ही कह दिया कि उसका वह दोस्‍त लौट आया है। पुलिस ने अपहरणकर्ताओं को गिरफ्तार कर उसे छुडा लिया है। बाद में मुहल्‍ले के अन्‍य लोगों से मालूम हुआ कि ऐसी बात नहीं है , कल उस लडके की लाश मिली है। मैं समझ गयी , मुझे खुश रखने के लिए बेटे ने अपने दोस्‍त के जाने का गम झेलते हुए मुझसे झूठ बोला था।

कुछ ही दिनों में यानि अप्रैल 1999 में एक बच्‍ची के साथ हुए हादसे ने बोकारो में कर्फ्यू लगाने तक की नौबत ला दी थी।  आजतक समाचार पत्रों और न्‍यूज चैनलों में पढे और सुने शब्‍द 'कर्फ्यू' का पहली बार झेलने का मौका मिला था। ऐसे में डर स्‍वाभाविक तौर पर उत्‍पन्‍न हो गया था , कर्फ्यू में ढील के बावजूद भी मैं भय से कोई भी सामन लेने बाहर न निकलती। जो भी घर में मौजूद होता , उसे बनाकर खिला देती। यहां तक कि इस घटना के बाद मैं बच्‍चों का जरूरत से अधिक ख्‍याल रखने लगी थी। खुद से स्‍कूल बस तक बच्‍चों को पहुंचाना और लाना तो हर अभिभावक का फर्ज ही है , पर मैं शाम को खेलने वक्‍त भी इनके साथ जाती , ये जबतक खेलते , तबतक टहलती और इनके साथ ही दूध लेते हुए वापस आती। दो चार वर्षों तक खेलते वक्‍त , साइकिल सीखते वक्‍त हमेशा मैं इनके साथ होती , इस तरह बोकारो में भयमुक्‍त होकर जीने में मुझे बहुत समय लग गए। हां , सुरक्षा की दृष्टि से कॉपरेटिव कॉलोनी आने के बाद अच्‍छा लगा , यह बहुत ही अच्‍छी जगह है ,यहां मैने बाहर में रखी साइकिल और अन्‍य कपडों को उठाकर ले जाने से आगे बढने की किसी भी चोर को हिम्‍मत करते नहीं देखा।

अपने एकाधिकार का पूरा फायदा उठाती थी उस वक्‍त बी एस एन एल !!

अभी तक आपने पढा .... 20 वीं सदी का अंत संचार के मामलों में बहुत ही प्रगति पर था और भारतवर्ष के शहरों की बात क्‍या ग्रामीण अंचल भी इससे अछूते नहीं थे।  भले ही हम शहरी क्षेत्र में थे , पर पूरे परिवार में सबसे पहले 1990 में हमारे गांव में ही मेरे श्‍वसुर जी ने ही फोन का कनेक्‍शन लिया था। तब वे DVC के सुरक्षा पदाधिकारी के पद से सेवानिवृत्‍त होकर बिहार के दरभंगा जिले के एक गांव जाले में निवास कर रहे थे। इससे पहले वे बिहार मिलिटरी पुलिस में पु‍लिस अफसर भी रह चुके थे , जिसके कारण गांव में होनेवाले महत्‍वपूर्ण आयोजनों में उन्‍हें निमंत्रित किया जाता था। इसी कारण फोन की सुविधा दिए जाने से पूर्व बी एस एन एल द्वारा हुए उद्घाटन समारोह में उन्‍हें भी निमंत्रित किया गया था। उसी मीटिंग में उन्‍होने बात रखी कि‍ जिस परिवार के अधिकांश सदस्‍य दूर रहते हों , उन्‍हें फोन की सुविधा सबसे पहले मिलनी चाहिए। रिटायर होने के बाद 20 वर्षों से वे अपने तीनों बेटों से दूर रहते हुए 80 वर्ष की उम्र में पहुंच चुके थे , इसलिए दूसरे ही दिन उन्‍हें फोन की सुविधा मिल गयी थी , शहरी क्षेत्र में होते हुए भी तबतक हमलोगों को भी कनेक्‍शन नहीं मिल सका था , पर टेलीफोन बूथ से हमलोग समय पर हाल चाल लेने में अवश्‍य समर्थ हो गए थे। दो चार वर्ष के अंदर ही बिहार के छोटे बडे हर गांव में टेलीफोन के जाल ही बिछ गए थे और कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह गया था। उसी फोन ने इन्‍हे अंतिम समय में उनके बडे बेटे से मिला भी दिया था। भले ही 1993 में ही वे हमें छोडकर इस दुनिया से चल दिए हों , पर उससे पहले 1992 से ही रिश्‍तेदारों का हाल चाल लेने के लिए हमलोगों को पूर्ण तौर पर टेलीफोन पर निर्भर कर दिया था।

यही कारण था कि बोकारो में स्‍थायित्‍व की समस्‍या हल होने पर एक टेलीफोन का कनेक्‍शन लेना हमारे लिए जरूरत बन चुका था , पर इसमें बहुत सारी समस्‍याएं थी। क्‍वार्टर किसी और का हो , उसे किराए में लगाने की छूट भी न हो । एक मित्र के तौर पर हम वहां रह सकते थे और इसी आधार पर कनेक्‍शन ले सकते थे। इसके लिए अदालत में भी कुछ फार्मलिटिज की जरूरत थी। छोटे शहरों में लैंडलाइन लेने के लिए अभी तक सिर्फ सरकारी कंपनियां ही हैं ,  जिनके पास उस समय कनेक्‍शन देने की सुविधाएं सीमित थी और फोन कनेक्‍शन लेने के मामलों में मध्‍यमवर्गीय परिवारों में एक होड सी लगी थी। ऐसे में आपका नंबर आने में दो तीन वर्षों तक का इंतजार करना पडता था , अन्‍य लोगों की तरह ही इतना इंतजार करने को हमलोग भी तैयार नहीं थे। इस कारण विभाग में भ्रष्‍टाचार का भी बोलबाला था , नंबर में देर होने के बावजूद पैसे लेकर फोन कनेक्‍शन दिए जा रहे थे। पर हमारे द्वारा फोन के लिए एप्‍लाई किए जाने के दो तीन महीने बाद ही बी एस एन एल में आधिकारिक तौर पर घोषणा की गयी कि इंतजार कर रहे सभी लोगों को अक्‍तूबर तक फोन लगा दिए जाएंगे। भले ही एक वर्ष तक हमने बिना फोन के व्‍यतीत किए हों , पर इस घोषणा के होते ही हमारी यह समस्‍या भी हल हो गयी। तबतक हमलोगों ने सामने वाले पडोसी को बहुत कष्‍ट दिए।

पर फोन का कनेक्‍शन मिलने के बाद भी यहां समस्‍याएं कम न थी। उस समय खुले केबल के माध्‍यम से फोन का कनेक्‍शन किया जाता था , इस कारण हमेशा फोन को लॉक करने का झंझट था। बरसात में अक्‍सर फोन कट जाता , दस बारह दिन बाद ही उसके ठीक होने की उम्‍मीद रहती। हालांकि कुछ ही वर्षों में पूरी कॉलोनी में अंडरग्राउंड केबिल लग गए और असुविधाएं कम हो गयी थी। पर बिल की मनमानी की तो पूछिए ही मत , अपने एकाधिकार का पूरा फायदा उठाती थी उस वक्‍त बी एस एन एल । बिल के डिटेल्‍स निकालने की कोई सुविधा नहीं थी , सिर्फ एस टी डी के बिल निकलते थे , हमने एक दो बार निकलवाया , पर क्‍या फायदा ?? एस टी डी का बिल 160 रूपए , पर कुल बिल 1600।  अब हम उन्‍हें कैसे समझाएं कि लोकल में हमारे इतने परिचित भी नहीं कि इतना बिल आ जाए , चुपचाप बिल भरने को बाध्‍य थे। कितने तो अपनी पत्नियों और बच्‍चों पर शक की निगाह रखते , मजबूरी में फोन कटवा देते। एक बार तो गरमी की छुट्टियों के दो महीने दिल्‍ली में व्‍यतीत करने के बाद भी हमें टेलीफोन बिल के रूप में 1800 रूपए भरने पडे थे।पर धीरे धीरे कई कंपनियों के इस क्षेत्र में आने से उनका एकाधिकार समाप्‍त हुआ और सुविधाओं में बढोत्‍तरी होती गयी। पर आज हर प्रकार के प्‍लान और सुविधाओं के कारण इसी बी एस एन एल से हमें कोई शिकायत नहीं।

क्‍या आपके शहर में भी एक गैस कनेक्‍शन लेने का यही हाल है ??

पिछले पोस्‍टों में आप पढ ही चुके हैं ... बच्‍चों के एडमिशन के बाद हमलोगों को बिना किसी तैयारी के ही एक महीने के अंदर बोकारो में शिफ्ट करना पड गया था। शहर के कई कॉलोनी में दौडते भागते अंत में सेक्‍टर 4 में एक क्‍वार्टर मिलने के बाद हमलोग निश्चिंत हो गए थे। इसके साथ ही स्‍थायित्‍व के लिए आवश्‍यक अन्‍य सुविधाओं पर हमारा ध्‍यान चला गया था।  दो तीन महीने किरासन तेल के स्‍टोव पर खाना बनाते हुए हमने काट दिए थे , इस तरह के स्‍टोव का उपयोग मैं जीवन में पहली बार कर रही थी , इसलिए मुझे किन समस्‍याओं का सामना करना पडा होगा , आप पाठक जन उम्‍मीद कर सकते हैं। इस स्‍टोव की तुलना में खाना बनाने के लिए लकडी या कोयले के चूल्‍हे का उपयोग मेरे लिए अधिक आसान था , पर दोमंजिले के छोटे से क्‍वार्टर में इसका उपयोग नहीं किया जा सकता था , इसलिए  एक गैस कनेक्‍शन तो हमारे लिए बहुत आवश्‍यक था ।

बोकारो के विभिन्‍न सेक्‍टरों में इंडियन ऑयल गैस की जितनी भी एजेंसियां थी , हमलोग सबमें भटकते रहे , पर सबने हमें एक कनेक्‍शन देने से इंकार कर दिया था। उन दिनों गैस कनेक्‍शन की मांग की तुलना में पूर्ति का कम होना एक मुख्‍य वजह हो सकती है , पर हमारे पास बोकारो में कनेक्‍शन लेने के लिए आवश्‍यक कागजात भी नहीं थे कि हम वहां नंबर भी लगा सकते। वैसे आवश्‍यक कागजातों के बाद भी सरकारी दर से किसी को गैस नहीं मिला करता था। एक कनेक्‍शन के लिए दुगुने तीगुने पैसे देने होते। पडोस में पूछती , तो मालूम होता कि उन्‍होने गैस का कनेक्‍शन भी नहीं लिया है। बाजार से ही एक चूल्‍हा , कहीं से एक सिलिंडर और रेगुलेटर और पाइप का इंतजाम करते और ब्‍लैक से सिलिंडर चेंज करते। बिजली की सुविधा मुफ्त थी , इसलिए अधिकांश लोग हीटर का भी उपयोग करते।

प्राइवेट मकानों में तो इसकी सुविधा नहीं थी , पर सरकारी क्‍वार्टर में आने के बाद हमलोगों ने भी एक हीटर रख लिया था , पर हीटर और स्‍टोव में खाना बनाने में समय काफी जाया होता।  हमारी इच्‍छा इंडियन ऑयल के गैस के कनेक्‍शन लेने की थी  , लेकिन बोकारो मे कोई व्‍यवस्‍था नहीं हो रही थी। मरता क्‍या न करता , आखिरकार हमें हार मानकर यहां से 30 किमी दूर के एक शहर फुसरो से एक एच पी का गैस कनेक्‍शन लेना पडा । वो भी आसानी से नहीं , हमें उन्‍हें कमीशन देने के लिए एक गैस चूल्‍हा भी साथ खरीदना पडा , डबल सिलिंडर का कनेक्‍शन और उन्‍हें मनमाने पैसे , तब यानि 1998 में सरकार के द्वारा तय किए गए मात्र 1800 रूपए खर्च करने की जगह हमें 5500 रूपए खर्च करने पडे थे। फिर जबतक उस कनेक्‍शन का बोकारो ट्रांसफर नहीं हुआ , हमें ब्‍लैक में ही गैस भरवाने यानि हर महीने 100 रूपए अधिक देने को बाध्‍य होना पडा। इस मामले में काफी दिनों बाद हम निश्चिंत हो सके थे । आज घर घर तक गैस के पहुंचने के बाद भी यह समस्‍या वैसे ही बनी हुई है , बोकारो में इंडियन ऑयल या एच पी का कनेक्‍शन लेना आज भी मुश्किल कार्य है। क्‍या आपके शहर में भी एक गैस कनेक्‍शन लेने में इतनी समस्‍याओं का सामना करना पडता है ??

10,000 रूपए की बजट में सबसे अच्‍छा डिजिटल कैमरा कौन सा होगा ??

घर में दो कैमरे वाले मोबाइल थे , दोनो बेटे लेकर चले गए। इच्‍छा है  , एक डिजिटल कैमरा ही ले लिया जाए ।  पर उपयुक्‍त जानकारी के अभाव में निर्णय नहीं ले पा रही। मेरा बजट लगभग 10,000 रूपए का है , ज्ञानी पाठक जन सटीक राय देने की कृपा करें , घरेलू उपयोग के लिए कौन सा कैमरा लेना अच्‍छा रहेगा ??