आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा ........!!

अभी तक आपने पढा .... बच्‍चे अपनी पढाई में व्‍यस्‍त हो गए थे और धीरे धीरे बोकारो में हमारा मन लगता जा रहा था , पर स्‍कूल के कारण सुबह जल्‍दी उठना पडता , इसलिए दस बजे तक प्रतिदिन के सारे कामों से निवृत्‍त हो जाती तथा उसके बाद दो बजे बच्‍चों के आने तक यूं ही अकेले बैठी रहती। आरंभ से ही टी वी देखने की मेरी आदत नहीं , इसलिए मेरे सामने एक बडी समस्‍या उपस्थित हो गयी थी , प्रतिदिन दिन के दस बजे से लेकर दो बजे तक का समय काटने को दौडता। ये तो सप्‍ताहांत में एक दो दिन ही यहां आ पाते , और यहां हमारे पर‍िचित अधिक नहीं। जिस मुहल्‍ले में मैं रह रही थी , वहां की महिलाओं की बातचीत भी टेलीवीजन के सीरियलों या दूसरों के घरों की झांक ताक तक ही सीमित थी , जिसमें बचपन से आज तक मेरा मन बिल्‍कुल ही नहीं लगा।

वैसे तो ज्‍योतिषीय पत्र पत्रिकाओं में मेरे लेख काफी दिनों से प्रकाशित हो रहे थे और 1996 के अंत में मेरी पुस्‍तक भी प्रकाशित होकर बाजार में  आ गयी थी। पर मुझे यही महसूस होता रहा कि ज्‍योतिष में विषय वस्‍तु की अधिकता के कारण ही मैं भले ही लिख लेती हूं , पर बाकी मामलों में मुझमें लेखन क्षमता नहीं है। कुछ पत्र पत्रिकाएं मंगवाया करती थी मैं , उन्‍हें पढने के बाद प्रतिक्रियास्‍वरूप कुछ न कुछ मन में आता , जिसे पन्‍नों पर उतारने की कोशिश करती। कभी कादंबिनी की किसी समस्‍या को हल करते हुए कुछ पंक्तियां लिख लेती .....


सख्‍ती कठोरता , वरदान प्रकृति का ,
हर्षित हो अंगीकार कर।
दृढ अचल चरित्र देगी तुम्‍हें,
क्रमबद्ध ढंग से वो सजकर।।
जैसे बनती है भव्‍य अट्टालिकाएं,
जुडकर पत्‍थरों में पत्‍थर ।। 


तो कभी किसी बहस में भी भाग लेते हुए क्‍या भारतीय नेता अंधविश्‍वासी हैं ?? जैसे एक आलेख तैयार कर लेती। कभी कभी जीवन के कुछ अनुभवों को चंद पंक्तियों में सहेजने की कोशिश भी करती । बच्‍चों के स्‍कूल के कार्यक्रम के लिए लिखने के क्रम मे उत्‍पादकता से प्रकृति महत्‍वपूर्ण  जैसी कविताएं लिखती तो कभी चिंतन में आकर कैसा हो कलियुग का धर्म ?? पर भी दो चार पंक्तियां लिख लेती। इसके अतिरिक्‍त न चाहते हुए भी स्‍वयमेव कुछ गीत कुछ भजन , अक्‍सर मेरे द्वारा लिखे जाते। यहां तक कि इसी दौरान मैने कई कहानियां भी लिख ली थी , जो साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक दिन यूं ही बैठे बिठाए सीता जी के स्‍वयंवर की घोषणा के बाद राजा जनक , रानी और सीताजी के शंकाग्रस्‍त मनस्थिति  का चित्रण करने बैठी तो एक कविता बन पडी थी , कल डायरी में मिली , आज प्रस्‍तुत है ......

आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा।
जनकजी के वचन को दुहराया जाएगा।।

राजा , राजकुमार या हो प्रधान।
बूढा , बुजुर्ग या हो जवान।।
देशी , परदेशी या हो भगवान।
दैत्‍य , दानव या हो शैतान।

शिव के धनुष को जो तोडेगा उसी से ,
सीता का ब्‍याह रचाया जाएगा।।

आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा  ........

आज राजा का मन बडा घबडाएगा।
अपने वचन पे पछतावा आएगा।।

राजा , राजुकमार या होगा प्रधान ?
बूढा बुजुर्ग या होगा जवान ??
देशी , परदेशी या भगवान ?
दैत्‍य , दानव या फिर शैतान ??

शिव के धनुष को कौन तोडेगा किससे ,
सीता का ब्‍याह रचाया जाएगा ??

आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा  ......

आज रानी का मन बडा घबडाएगा।
आज देवता पितृ मनाया जाएगा।।

चाहे हों राजा, राजकुमार या प्रधान।
ना हो वो बूढा, बुजुर्ग , हो जवान।।
चाहे हो देशी , परदेशी या भगवान।
ना हो वो दैत्‍य , दानव ना शैतान !!

शिव के धनुष को जो तोडे , जिससे,
सीता का ब्‍याह रचाया जाएगा।।

आज जनकपुर में डंका बजाया जाएगा ........

आज सीता को मंदिर ले जाया जाएगा।
वहां राम जी के दर्शन पाया जाएगा।।

ना होंगे राजा , राजकुमार ना प्रधान।
ना होंगे बूढे , बुजुर्ग  ना जवान।।
ना होंगे दैत्‍य , दानव ना शैतान।
ना देशी , परदेशी , होंगे भगवान।।

शिव के धनुष को वही तोडेंगे उन्‍हीं से ,
मेरा  ब्‍याह रचाया जाएगा।।

फिर तो राम जी को वरमाला पहनाया जाएगा।
फिर तो सखियों द्वारा मंगलगान गाया जाएगा।।
फिर तो जनकपुर में उत्‍सव मनाया जाएगा।
फिर तो  'राम संग सीता ब्‍याह' रचाया जाएगा।।

काश हम बच्‍चे ही होते .. धर्म के नाम पर तो न लडते !!

religion in indian society

बात पिछले नवरात्र की है , मेरी छोटी बहन को कंजिका पूजन के लिए कुछ बच्चियों की जरूरत थी। इन दिनों में कंजिका ओं की संख्या कम होने के कारण मांग काफी बढ़ जाती है। मुहल्‍ले के सारे घरों में घूमने से तो अच्‍छा है , किसी स्‍कूल से बच्चियां मंगवा ली जाएं। यही सोंचकर मेरी बहन ने मुहल्‍ले के ही नर्सरी स्‍कूल की शिक्षिका से लंच ब्रेक में कक्षा की सात बच्चियों को उसके यहां भेज देने को कहा। उस वक्‍त मेरी बहन की बच्‍ची बब्‍बी भी उसी स्‍कूल में नर्सरी की छात्रा थी। शिक्षिका को कहकर वह घर आकर वह अष्‍टमी की पूजा की तैयारी में व्‍यस्‍त हो गयी।

religion in indian society

अभी वह पूजा में व्‍यस्‍त ही थी कि दोपहर में छह बच्चियों के साथ बब्‍बी खूब रोती हुई घर पहुंची। मेरी बहन घबडायी हुई बाहर आकर उसे चुप कराते हुए रोने का कारण पूछा। उसने बतलाया कि उसकी मैडम ने उसकी एक खास दोस्‍त हेमा को यहां नहीं आने दिया। वह सुबक सुबक कर रो रही थी और कहे जा रही थी, 'मेरे ही घर की पार्टी , मैने घर लाने के लिए हेमा का हाथ भी पकडा , पर मैडम ने मेरे हाथ से उसे छुडाते हुए कहा ,'हेमा नहीं जाएगी'। वो इतना रो रही थी कि बाकी का कार्यक्रम पूरा करना मेरी बहन के लिए संभव नहीं था।

वह सब काम छोडकर बगल में ही स्थित उस स्‍कूल में प‍हूंची। उसके पूछने पर शिक्षिका ने बताया कि हेमा मुस्लिम है , हिंदू धर्म से जुडे कार्यक्रम की वजह से आपके या हेमा के परिवार वालों को आपत्ति होती , इसलिए मैने उसे नहीं भेजा। मेरी बहन भी किंकर्तब्‍यविमूढ ही थी कि उसके पति कह उठे, 'पूजा करने और प्रसाद खिलाने का किसी धर्म से क्‍या लेना देना, उसे बुला लो।' मेरी बहन भी इससे सहमत थी , पर हेमा के मम्‍मी पापा को कहीं बुरा न लग जाए , इसलिए उनकी स्‍वीकृति लेना आवश्‍यक था। संयोग था कि हेमा के माता पिता भी खुले दिमाग के थे और उसे इस कार्यक्रम में हिस्‍सा लेने की स्‍वीकृति मिल गयी।

बहन जब हेमा को साथ लेकर आयी , तो बब्‍बी की खुशी का ठिकाना न था। उसने फिर से अपनी सहेली का हाथ पकडा , उसे बैठाया और पूजा होने से लेकर खिलाने पिलाने तक के पूरे कार्यक्रम के दौरान उसके साथ ही साथ रही। इस पूरे वाकये को सुनने के बाद मैं यही सोंच रही थी कि रोकर ही सही , एक 4 वर्ष की बच्‍ची अपने दोस्‍त के लिए , उसे अधिकार दिलाने के लिए प्रयत्‍नशील रही। छोटी सी बच्‍ची के जीवन में धर्म का कोई स्‍थान न होते हुए भी उसने अपने दोस्‍ती के धर्म का पालन किया। बडों को भी सही रास्‍ते पर चलने को मजबूर कर दिया। और हम धर्म को मानते हुए भी मानवता के धर्म का पालन नहीं कर पाते। ऐसी घटनाओं को सुनने के बाद हम तो यही कह सकते हैं कि काश हम भी बच्‍चे ही होते !! 

आज थोडी जानकारी बच्‍चों की पढाई के बारे में भी .......

अभी तक आपने पढा .... खासकर बच्‍चों के पढाई के लिए ही तो हमलोग अपना नया जीवन बोकारो में शुरू करने आए थे , इसलिए बच्‍चों के पढाई के बारे में चर्चा करना सबसे आवश्‍यक था , जिसमें ही देर हो गयी। बचपन से जिन बच्‍चों की कॉपी में कभी गल्‍ती से एक दो भूल रह जाती हो , स्‍कूल के पहले ही दिन उन बच्‍चों की कॉपी के पहले ही पन्‍ने पर चार छह गल्तियां देखकर हमें तो झटका ही लग गया था , वो भी जब उन्‍हें मात्र स्‍वर और व्‍यंजन के सारे वर्ण लिखने को दिया गया हो। पर जब ध्‍यान से कॉपी देखने को मिला , तो राहत मिली कि यहां पे मैं भी होती तो हमारी भी चार छह गलतियां अवश्‍य निकलती। हमने तो सरकारी विद्यालय में पढाई की थी और हमें ये तो कभी नहीं बताया गया था कि वर्णों को वैसे लिखते हैं , जैसा टाइपिंग मशीनें टाइप करती हैं। और जैसा हमने सीखा था , वैसा ही बच्‍चों को सिखाया था और उनके पुराने स्‍कूल में भी इसमें काट छांट नहीं की गयी थी। इसका ही फल ही था कि पहली और तीसरी कक्षा के इन बच्‍चों के द्वारा लिखे स्‍वर और व्‍यंजन वर्ण में भी इतनी गल्तियां निकल गयी थी। पर बहुत जल्‍द स्‍कूल के नए वातावरण में दोनो प्रतिदिन कुछ न कुछ सीखते चले गए और पहले ही वर्ष दोनो कक्षा में स्‍थान बनाने में कामयाब रहे। खासकर छोटे ने तो  पांच विषयों में मात्र एक नंबर खोकर 99.8 प्रतिशत नंबर प्राप्‍त कर न सिर्फ अपनी कक्षा में , वरन् पूरी कक्षा में यानि सभी सेक्‍शन में टॉप किया था।

धीरे धीरे नए नए बच्‍चों से दोस्‍ती और उनके मध्‍य स्‍वस्‍थ प्रतिस्‍पर्धा के जन्‍म लेने से  बच्‍चे अपने विद्यालय के वातावरण में आराम से एडजस्‍ट करने लगे थे। विद्यालय में पढाई की व्‍यवस्‍था तो बहुत अच्‍छी थी , अच्‍छी पढाई के लिए उन्‍हें प्रोत्‍साहित भी बहुत किया जाता था। हर सप्‍ताह पढाए गए पाठ के अंदर से किसी एक विषय का टेस्‍ट सोमवार को होता , इसके अलावे अर्द्धवार्षिक और वार्षिक परीक्षाएं होती , तीनों को मिलाकर रिजल्‍ट तैयार किए जाते। पांचवी कक्षा से ही कुल प्राप्‍तांक को देखकर नहीं , हर विषय में विद्यार्थियों को मजबूत बनाने के लिए प्रत्‍येक विषय में 80 प्रतिशत नंबर लानेवाले को स्‍कोलर माना जाता और उन्‍हें स्‍कोलर बैज दिए जाते। तीन वर्षों तक नियमित तौर पर स्‍कोलर बैज लानेवाले बच्‍चों को स्‍कूल से ही नीले कलर की स्‍कोलर ब्‍लेजर के साथ स्‍कोलर बैज मिलती और छह वर्षों तक नियमित तौर पर स्‍कोलर बैज पाने वाले बच्‍चों को फिर से एक नीले स्‍कोलर ब्‍लेजर और नीली स्‍कोलर टाई के साथ स्‍कोलर बैज , इसके लिए बच्‍चे पूरी लगन से प्रत्‍येक वर्ष मेहनत करते।

डी पी एस , बोकारो के स्‍कूल की पढाई ही बच्‍चें के लिए पर्याप्‍त थी , उन्‍हें मेरी कभी भी जरूरत नहीं पडी , मैं सिर्फ उनके रिविजन के लिए प्रतिदिन कुछ प्रश्‍न दे दिया करती थी। कभी कभी किसी विषय में समस्‍या होने पर कॉपी लेकर मेरे पास आते भी , तो मेरे द्वारा हल किए जानेवाले पहले ही स्‍टेप के बाद उन्‍हें सबकुछ समझ में आ जाता। तुरंत वे कॉपी छीनकर भागते , तो मुझे खीझ भी हो जाती , अरे पूरा देख तो लो । स्‍कूल में स्‍कोलर बैज , ब्‍लेजर तो प्रत्‍येक विषय में 80 प्रतिशत मार्क्‍स में ही मिल जाते थे , पर ईश्‍वर की कृपा है कि दोनो बच्‍चों को कभी भी किसी विषय में 90 प्रतिशत से नीचे जाने का मौका नहीं मिला , इसलिए स्‍कोलर बैज कभी भी अनिश्चित नहीं रहा , लगातार तीसरे वर्ष स्‍कोलर बैज लेने के कारण 8 वीं कक्षा में उन्‍हें नीला स्‍कोलर ब्‍लेजर भी मिल चुका था। दोनो न सिर्फ पढाई में , वरन् कुछ खेल और क्विज से संबंधित क्रियाकलापों में भी अपनी अपनी कक्षाओं में अच्‍छे स्‍थान में बनें रहें। स्‍कूली मामलों में तो इनकी सफलता से हमलोग संतुष्‍ट थे ही , 8 वीं कक्षा में भारत सरकार द्वारा राष्‍ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा में भी दोनो के चयन होने पर उन्‍हें  प्रमाण पत्र दिया गया और उन्‍हें प्रतिवर्ष छात्रवृत्ति भी मिलने लगी।

पर हमारे देश की स्‍कूली व्‍यवस्‍था का प्रकोप ऐसा कि इन सब उपलब्धियों के बावजूद हमारा ध्‍यान इस ओर था कि वे दसवीं के बोर्ड की रिजल्‍ट अच्‍छा करें , ताकि इनके अपने स्‍कूल में इन्‍हें अपनी पसंद का विषय मिल सके। हालांकि डी पी एस बोकारो में ग्‍यारहवीं में दाखिला मिलने में अपने स्‍कूल के विद्यार्थियों को थोडी प्राथमिकता दी जाती है , फिर भी दाखिला नए सिरे से दसवीं बोर्ड के रिजल्‍ट से होता है। यदि इनका रिजल्‍ट गडबड हो जाता , तो इन्‍हें अपनी पसंद के विषय यानि गणित और विज्ञान पढने को नहीं मिलेंगे , जिसका कैरियर पर बुरा असर पडेगा। ग्‍यारहवीं में दूसरे स्‍कूल में पढने का अर्थ है , सारे माहौल के साथ एक बार फिर से समायोजन करना , जिसका भी पढाई पर कुछ बुरा असर पडेगा। और डी पी एस की पढाई खासकर 12वीं के साथ साथ अन्‍य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अच्‍छी मानी जाती है , उसी के लिए हमलोग यहां आए थे , और ग्‍यारहवीं में ही यहां से निकलना पडे , तो क्‍या फायदा ?? इसलिए हमलोग 10वीं बोर्ड में बढिया रिजल्‍ट के लिए ही बच्‍चें को प्रेरित करते। आगे की यात्रा अगली कडी में ....

टेलीविजन के माध्‍यम

how to stop superstition in hindi


कई दिन पूर्व एक खास कार्यक्रम के लिए दूसरे शहर में जाना हुआ , पर जाने के बाद ही कार्यक्रम के रद्द होने की सूचना मिली। वैसे सामान्‍य तौर पर टी वी देखने की मेरी आदत नहीं, कितने दिन पहले मैं टी वी के सामने बैठी होऊंगी , वो भी मुझे याद नहीं , पर वहां मुझे टी वी देखकर ही दिनभर का समय काटना पडा। टी वी के इतने सारे चैनल , दिन भर बदलती रही , पर शायद ही आधे घंटे कहीं मन लग सका हो । पर दिनभर में ये तो पता चल गया कि आज टी वी चैनल किस कदर अंधविश्‍वास परोस रहे हैं। मेरी समझ में आ गया कि शायद यही वजह है कि आज आम आदमी धर्म और ज्‍योतिष के नाम से चिढ जाता है।

how to stop superstition in hindi

एक से एक जंत्र और मंत्र , आम जन के कल्‍याण के लिए बने हुए हैं , इतना ही नहीं , सारे सब्सिडी मूल्‍य के साथ उपलब्‍ध भी हैं , और इसके प्रचार के लिए एक से बढकर एक स्‍टार तक लगे हुए हैं। इनका उपयोग करने से आपके यहां सरस्‍वती और लक्ष्‍मी दोनो की कृपा शुरू हो जाएगी  , यदि आप प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे हैं , तो निश्चित तौर पर सफलता मिलेगी , नौकरी कर रहें हो , तो प्रोमोशन निश्चित और व्‍यवसाय कर रहे हों तो इसमें भी बडी सफलता। इन यंत्रों का उपयोग करके एक भी व्‍यक्ति हानि में नहीं रह सकता , जितने पहन लें , सबको लाभ ही लाभ। छोटी छोटी संस्‍था को इतनी मेहनत करनी पड रही है , फिर भी लक्ष्‍य को नहीं प्राप्‍त कर पा रहें हैं। इसकी जिम्‍मेदारी को सरकार ले ले और एक एक व्‍यक्ति तक इस यंत्र को पहुंचा दे , तो भारत को तरक्‍की में देर नहीं हो , पूरे विश्‍व में भारत का राज होगा।


प्रकृति ने अंधकार के साथ प्रकाश बनाया , मीठा के साथ कडवा , फूल के साथ कांटे और दोस्‍ती के साथ दुश्‍मनी। इनमें से एक को भी समाप्‍त कर दिया जाए , तो दूसरे का कोई महत्‍व नहीं रह जाएगा। भले ही हम अपनी सोंच से ऋणात्‍मक पहलुओं को अलग कर दें , पर जबतक दुनिया है , वास्‍तविक तौर पर सारी ऋणात्‍मक बाते हमारे समक्ष मौजूद रहेंगी। हम हारेंगे भी , गिरेंगे भी , मरेंगे भी , असफलता को जीवन से दूर करना चाहें , तो हमें प्रकृति से ही जीतना होगा , जो किसी भी युग में संभव नहीं। पर टेलीवीजन में अपनी सामग्रियों का प्रचार करनेवालों ने तो मानों प्रकृति को ही जीत लिया है , उनका एक यंत्र हर कष्‍ट को दूर कर सकता है , इसका कितने लुभावने ढंग से ये प्रचार कर रहे हैं। आज पैसों के लिए लोग क्‍या न कर बैठें ??


शायद यही कारण है कि आज धर्म और ज्‍योतिष के नाम से ही लोगों को चिढ है। पर आज सिर्फ इन्‍हीं के कारण अंधविश्‍वास नहीं फैल रहा है , आज का व्‍यावसायिक युग इसके लिए जिम्‍मेदार है। ये अंधविश्‍वास फैलाकर भी समाज का कितना बडा नुकसान कर रहे हें , यदि इनके अंधविश्‍वास फैलाने पर दो से पांच हजार खर्च करके कोई इनके यंत्र खरीदता है , तो कुछ नहीं पाकर भी एक पूरा परिवार अपनी श्रद्धा की वजह से मानसिक शांति प्राप्‍त करता है। निरंतर हार के पश्‍चात थकी हुई आपनी शक्ति के बावजूद एक बार रिस्‍क लेने की उसकी हिम्‍मत और बढ जाती है। और कभी कभी इसका फल सकारात्‍मक भी दिख सकता है। यदि उसके मन में विश्‍वास हो , तो इस यंत्र के फल का इंतजार करता हुआ एक सकारात्‍मक शक्ति के सहारे वह आगे बढने लगता है।


पर हमारे स्‍टार कलाकार करोडों अरबों की लालच में पडकर रोग उत्‍पन्‍न करने वाले पेय पदार्थों का , हानिकारक प्रोडक्‍टों का , बिगडी जीवनशैली का जो संदेश देते नजर आते हैं , वो अधिक अंधविश्‍वास फैला रहे हैं। छोटे छोटे बच्‍चे जिन महापुरूषों की नकल करना चाहते हैं , वो ही समाज में गलत संदेश दे रहे हैं । जिन नेताओं से , जिन डॉक्‍टरों से , जिन प्रोफेसरों से , जिन वकीलों से , जिन शिक्षकों से , जिन व्‍यवसायियों से हमारे आनेवाली पीढी को अच्‍छा संदेश मिलना चाहिए था , वो ही आज कडवाहट का बीज बो रहे हैं। आज हमें हर क्षेत्र में बढती व्‍यावसायिकता को समाप्‍त करने की आवश्‍यकता है , हर क्षेत्र में नैतिक मूल्‍यों को पुनरस्‍थापित करने की आवश्‍यकता है , टेलीविजन के माध्‍यम से सिर्फ धर्म और ज्‍योतिष ही अंधविश्‍वास नहीं फैला रहे , सबको जागरूक होने की आवश्‍यकता है।

स्‍कूल में होनेवाली छुट्टिय

अभी तक आपने पढा .......  हर प्रकार के सुख सुविधायुक्‍त वातावरण होने के कारण हमलोग कुछ ही दिनों में आसानी से बोकारो में और बच्‍चे अपने नए स्‍कूल में एडजस्‍ट करने लगे थे। पर यहां रिश्‍तेदारों या परिचितों की संख्‍या बहुत कम थी , इसलिए कुछ ही दिनों में बोरियत सी महसूस होती। बच्‍चे अभी नीचली कक्षाओं में थे , इसलिए उनपर पढाई लिखाई का दबाब भी अधिक नहीं था , इसलिए समय काटना कुछ अधिक ही मुश्किल होता । खासकर सप्‍ताहांत में तो पुरानी यादें हमारा पीछा न छोडती और कुछ ही दिन व्‍यतीत होने पर ही हमलोग छुट्टियों का इंतजार करने लगते। एक दो वर्षों तक तो हमलोग स्‍कूल में दस बीस दिन की छुट्टियां होने पर भी कहीं न कहीं भागते , स्‍कूल खुलने से एक दिन पहले शाम को यहां पहुंचते।

डी पी एस  बोकारो में होनेवाली स्‍कूल की लंबी लंबी छुट्टियां भी हमारा काफी मदद कर देती थी। चाहे सत्रांत की छुट्टियां हो या गर्मियों की , चाहे दुर्गापूजा की छुट्टियां हो या दीपावली और छठ की या फिर बडे दिन की , डी पी एस में बडे ढंग से दी जाती। इस बात का ख्‍याल रखा जाता कि शुक्रवार को पढाई के बाद छुट्टियां हो और सोमवार को स्‍कूल खुले , इस तरह पांच दिन की छुट्टियों में भी बाहर जाने के लिए नौ दिन मिल जाते। वहां जूनियर से लेकर सीनियरों तक की सप्‍ताह में पांच दिन यानि सोमवार से शुक्रवार तक ही कक्षाएं होती थी और शनिवार रविवार को छुट्टियां हुआ करती थी। पूरे वर्ष के दौरान सप्‍ताह के मध्‍य किसी त्‍यौहार की छुट्टियां हो जाती तो शनिवार को कक्षा रखकर से समायोजित कर लिया जाता था। लेकिन लंबी छुट्टियों में कोई कटौती नहीं की जाती थी , हमें सत्रांत के पचीस दिन , गर्मी की छुट्टियों के चालीस दिन , दुर्गापूजा के नौ दिन और ठंड के चौदह दिनों की छुट्टियां मिल जाती थी।

वैसे तो हर सप्‍ताह में दो दिन छुट्टियों हो ही जाती थी , हालांकि उसका उपयोग शहर के अंदर ही किया जा सकता था। इसके अलावे वर्षभर में उपयोग में आनेवाली कुल 88 दिन की छुट्टियां कम तो नहीं थी। भले ही स्‍कूल के शिक्षकों ने अपनी सुविधा के लिए इस प्रकार की छुट्टी की व्‍यवस्‍था रखी हो , पर इसका हमलोगों ने  जमकर फायदा उठाया। छुट्टियों के पहले ही हमलोग कहीं न कहीं बाहर जाने की तैयारी करते , और बच्‍चों के स्‍कूल से आते ही निकल पडते। पर संयुक्‍त परिवार से तुरंत निकलकर यहां आने के बाद , और खासकर भतीजी के विवाह के बाद हम पर खर्च का इतना दबाब बढ गया था कि दूर दराज की यात्रा का कार्यक्रम नहीं बना पाते थे । पर बच्‍चों को दादी , नानी और अन्‍य रिश्‍तेदारों के घरो में घुमाते हुए हमने आसानी से दो तीन वर्ष बिता दिए।