ऐसे संयोग सबके जीवन में आते है क्‍या ??

प्रकृति में जो घटनाएं निरंतर नियमित तौर पर देखी जाती है , उसमें तो हम सहज विश्‍वास कर लेते हैं। चूकि घटनाएं किसी न किसी नियम के हिसाब से होती हैं , इसलिए इन नियमों को ढूंढ पाने की दिशा में हमं सफलता भी मिलती जाती है और इसी के कारण आज विज्ञान इतना विकसित है। पर कभी कभी कुछ घटनाएं बहुत ही विरल होती हैं , पूरे एक जीवन में किसी को एकाधिक बार दिखाई भी देती हैं , तो उसपर किसी का गंभीरता से ध्‍यान ही नहीं जाता। यदि उसका ध्‍यान गया भी तो बाकी लोग जिन्‍होने ऐसा कुछ होते नहीं देखा है , वे सहज विश्‍वास भी नहीं कर पाते हैं। इसलिए ऐसी घटनाओं की चर्चा भी नहीं हो पाती और उसके रहस्‍य का पर्दाफाश भी नहीं हो पाता , वे रहस्‍य रहस्‍य ही बने रह जाते है।


मेरे मम्‍मी , पापा और तीनों भाई काफी दिनों से दिल्‍ली में ही रह रहे हैं , इसलिए आजकल दिल्‍ली ही मायके बन गया है। गांव में कभी कभी किसी शादी विवाह या अन्‍य सिलसिले में जाने की आवश्‍यकता पडती है। तीन वर्ष पूर्व जब एक विवाह के सिलसिले में गांव गयी तो चाचाजी की लडकी गांव में ही थी , ढाई महीने के पुत्र को लेकर वह बाहर आयी , तो उसे देखकर मैं चौंकी। मुझे लगा , मैने पहले भी अपने जीवन में बिल्‍कुल उसी रंग रूप का वैसा ही एक बच्‍चा देख चुकी हूं। बच्‍चे की मां यानि मेरी वो बहन बचपन में बिल्‍कुल वैसी थी , चाची ने इस बात की पुष्टि की। बहुत देर बाद मुझे याद आया कि अगस्‍त में जन्‍म लेने वाली उस बहन को ढाई महीने की उम्र में ऊनी कपडों में लेकर नवंबर में चाची मायके से पहली बार आयी थी , तब मैने खुद से 15 वर्ष छोटी उस बहन को पहली बार देखा था , वह लडके के जैसी दिख रही थी। इस संयोग पर वहां बैठे हम सब लोग थोडी देर हंसे , फिर इस बात को भूल गए।


जब अभी पिछले महीने एक काम के सिलसिले में गांव पहुंच गयी , तो वह बहन फिर गांव में ही मिली। मैं अचानक वहां पहुंची थी , उसे लेने उसके पति भी आए हुए थे और वह शाम के ट्रेन से निकलने वाली थी , मतलब संयोग से ही मेरी उससे भेंट हो गयी। मुझे पता तक नहीं था कि उसने एक बिटिया रानी को जन्‍म दिया है , जो पूरे ढाई महीने की हो गयी है। वह बिटिया को लेकर घर के बरामदे में आयी , तो उसे देखते ही पिछली यादें फिर से ताजी हो गयी। पूरे आंगन और आस पडोस के लोग जमा थे , मैने उन्‍हें याद दिलाया तो फिर सब चौंके। दिन तो नहीं गिने , पर मैं बहन की तरह ही उसके दोनो बच्‍चों को लगभग ढाई महीने के लगभग उम्र में पहली बार देख रही थी। यह मात्र संयोग है या इसके पीछे भी कोई रहस्‍य है , मैं नहीं बता सकती। पर ऐसे संयोग जबतब मेरे जीवन में आते रहते है , आपलोगों के जीवन में आते है या नहीं ??

धर्म का असली लक्ष्‍य मानव धर्म की रक्षा होनी चाहिए !!

indian religion and culture

ब्‍लॉग जगत में सबसे अधिक बहस वाला मुद्दा हमारे धर्मग्रंथ बने हुए हैं। इनके पक्ष और विपक्ष में हमेशा तर्कों का खेल चलता रहता है। ताज्‍जुब तो इस बात का है कि न तो किसी के तर्क काटने योग्‍य होते , और न ही सहज विश्‍वास करने योग्‍य , क्‍यूंकि जो आस्तिक है , उनकी आस्‍था धर्म पर हद से अधिक है , तो जो नास्तिक है उनकी आस्‍था विज्ञान पर हद से अधिक। मेरे हिसाब से धर्म और विज्ञान में जो आधारभूत अंतर है , वो अंतर हमारी संस्‍कृति और पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति में भी है , वह यह कि वह यह कि धर्म की दिलचस्‍पी प्रकृति के नियमों को स्‍वीकार करते हुए , उसकी रक्षा करते हुए उसके सापेक्ष जीवन जीने की खोज में होता है , जबकि विज्ञान हमेशा प्रकृति को पराजित कर लेने का दावा करता है।

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इस विकासशील युग में धर्म पर आश्रित रहकर जीवनयापन करना मुश्किल है , और हम विज्ञान का सहारा लेने को बाध्‍य हैं , पर प्रकृति के सहारे जीने की बाध्‍यता तो आदिम काल से चलती आ रही है और लाख वैज्ञानिक विकास के बावजूद भी समाप्‍त नहीं हो सकती , इसलिए प्रकृति पर विजय पाने का दावा भी बेकार है। । इसके अलावे विज्ञान के अंधाधुंध और बिना सोंचे समझे किए गए विकास के कारण उत्‍पन्‍न संकट भय जरूर उपस्थित करता है और हम यह सोंचने को बाध्‍य हो जाते हैं कि इससे अच्‍छी तो हमारी परंपरागत जीवनशैली थी , जिसमें प्रकृति और मानव धर्म दोनो सुरक्षित था। पर भारतवर्ष का सनातन धर्म , जो न तो हिंदू , न मुस्लिम , न सिक्‍ख और न ईसाई है , में हमेशा स्‍वतंत्र चिंतन और मनन को स्‍थान दिया है। तभी इसमें धर्म का क्षेत्र भी हमेशा परिष्‍कृत होता रहा , इतने धर्मगुरू हुए , सभी ने समाज के हिसाब से मानव धर्म की अपनी अपनी परिभाषाएं रची।

पर जहां आज एक ओर धर्मगुरू सही मार्ग दिखाने में असमर्थ हैं , वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक भी लोगों को एक सही दिशा नहीं दे पा रहें। हमारा मौलिक चिंतन समाप्‍त हो गया है और हम उसे ही सत्‍य समझ बैठते हैं , जो पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिक कहते हैं , जबकि उनका चिंतन न कभी विराट हुआ है और न होगा। पढे लिखे भारतीय उनके विकास को देखकर और अपने को खुद उसी दिशा में जाते देखकर विकास का झूठा भ्रम पाल रहे हैं। यही कारण है कि प्रकृति जोर शोर से उपद्रव मचा रही है और आनेवाले वर्षों में इसके विनाश का विकट स्‍वरूप हमें देखना होगा। मेरा यह नहीं मानना है कि जो धर्मग्रंथों में लिखा है , आज के संदर्भ में उसकी एक एक पंक्तियां सही है , हमने अपने धर्म के अनुसार ही स्‍वतंत्र चिंतन और मनन को स्‍थान देते हुए उनमें से समय के साथ अच्‍छी बातों को चुनचुनकर ग्रहण किया है और बुरी बातों को अस्‍वीकार करते आए हैं। महाकवि कालिदास ने भी कहा था .....

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि नवमित्यवद्यम् |
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ||

न तो पुराना ही पुराना होने के कारण सही है , और न नया ही नया होने के कारण ग्राह्य , साधु बुद्धि के लोग दोनो की परीक्षा करके ही स्‍वीकार या अस्‍वीकार किया करते हैं। उलूल जुलूल तर्क देकर पुरानी हर बात को ही अच्‍छा मान लेना या नई हर बात को ही बुरा मान लेना उचित नहीं। धर्म के अनुसार गंगा को मां मानकर उसकी सुरक्षा करें या फिर विज्ञज्ञन के हिसाब से पर्यावरण की दृष्टि से , पर सुरक्षा के उपाय किए जाने चाहिए । यदि हम इस दृष्टिकोण को लेकर चलें , तो धर्म और विज्ञान में टकराव की कोई बात नहीं होगी। धर्म का असली लक्ष्‍य मानव धर्म की रक्षा होनी चाहिए , इस कारण समय समय पर इसका परिवर्तनशील होना आवश्‍यक है , धर्मगुरूओं को इस दिशा में सोचने की आवश्‍यकता है , न कि लकीर के फकीर बने रहने की।

आज हर स्‍तर पर अधिकारों का दुरूपयोग हो रहा है !!

दुर्गापूजा में शहर से बाहर थी , कई दिनों बाद बोकारो लौटना हुआ , इस वर्ष देशभर में दुर्गापूजा के साथ साथ कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स की भी धूम रही। इस कार्यक्रम की सफलता ने जहां पूरी दुनिया के समक्ष भारत का सर ऊंचा किया , वहीं इस आयोजन की आड में पैसों का बडा हेर फेर मन को सालता रहा। भ्रष्‍टाचार के मामलों में हमारा देश दिन ब दिन आगे बढता जा रहा है और कोई इसे सुधारने की कोशिश न‍हीं कर रहा , बस हर कोई एक दूसरे को गाली ही दे रहे हैं। किसी की समस्‍या से दूसरे को कोई मतलब नहीं , क्‍या छोटे और क्‍या बडे , सब अपने अधिकारों का दुरूपयोग ही कर रहे हैं।

अभी हाल में ही एक काम के सिलसिले में अचानक रांची हजारीबाग जानेवाले एन एच पर ही बोकारो से 30 किमी दूर के गांव में जाने की आवश्‍कता पड गयी । परेशानी की कोई बात नहीं थी , मेरे निवासस्‍थान से आधे किमी से भी कम दूरी पर बस स्‍टॉप है , धनबाद और अन्‍य स्‍थानों से आधे आधे घंटे में अच्‍छी आरामदेह बसें रांची की ओर जाया करती हैं , मैं बिना किसी को कहे सुने आराम से तैयार होकर घर से निकल पडी। संयोग से एक बस हजारीबाग के लिए बोकारो से ही खुल रही थी , मैने कंडक्‍टर से एक टिकट बुक करने को कहा , पर जगह का नाम सुनते ही उसने कहा कि आपको सीट नहीं मिलेगी , केबिन में बैठकर जाओ, जबकि‍ उस समय बस पूरी खाली थी।

बसवाले पहले पूरी दूरी तक के यात्री को ही सीट देना चाहते थे और छोटे छोटे दूरी तक के यात्री को इधर उधर बैठाकर, खडे करके भी किराया ले लेते हैं। क्‍यूंकि यदि पूरी दूरी के यात्री न मिले , तो इनसे लाभ कमाया जा सके। मतलब दोनो हाथ में लड्डू , जबकि मालिक को सिर्फ सीट के पैसेंजर के ही किराये दिए जाते हैं , वो भी पूरे नहीं। मैने कहा,'ये क्‍या बात हुई , या तो आप वहां स्‍टॉपेज ही न रखें या फिर यात्रियों को सीट दें। यदि आपको नुकसान पहुंच रहा हो , तो स्‍पष्‍ट कहें कि अगले स्‍टॉपेज तक का किराया देने पर सीट दी जाएगी। आज के आरामपसंद युग में थोडा अधिक किराया देना मुश्किल भी नहीं।' पर उन्‍हें मेरी बात सुनने में कोई दिलचस्‍पी नहीं थी। उन्‍होने न मुझसे अधिक किराया लिया और न ही मुझे मेरा पसंदीदा आगे का सीट मिला, यह कहते हुए कि वह सीट बुक है और आपका तो मैडम बस आधे घंटे का सवाल है। उनके कहने के स्‍टाइल से लगा कि वे मजबूर हैं , पर यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि मेरे उतरने उतरने तक उस सीट पर कोई भी पैसेंजर नहीं बैठा।

वहां पहुंचने पर जिस सरकारी ऑफिस में मेरा काम था , वहां मुझे कुछ पुराने कागजात निकलवाने थे। मैने एक सज्‍जन से पहले ही इस बात से ऑफिसवालों को आगाह करवा चुकी थी , इसलिए वे तैयार थे। मेरे पहुंचते ही उन्‍होने पुराने फाइलों को खंगाला और बीस से पच्‍चीस मिनट के अंदर मेरे कागजात मुझे सौंप दिए। मेरे लिए कोई दो नंबर का कार्य उन्‍होने नहीं किया था , इस काम को करना उनका कर्तब्‍य था , क्‍यूंकि इसके लिए सरकार उन्‍हें हमारे ही द्वारा दिए गए कर से वेतन दिया करती है। पर मुझे यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि काम के होते ही वे स्‍टाफों को मिठाई खिलाने के बहाने से इशारे से कुछ पैसों की मांग करने लगें। 

मेरे मन को जो बात कचोटती रही , वह यह कि जिन्‍हें भी जो अधिकार मिल रहे हैं , वह उसी का दुरूपयोग कर रहा है और ऊपरवाले को गाली दे रहा है। मगर यदि वो ऊपर होता , तो वो भी ऐसा ही करता। वे सरकारी कर्मचारी हैं , हर महीने मासिक तनख्‍वाह मिलती है , पर जो उनके सामने होते हैं , वे कभी कभी लाचार भी होते होंगे। क्‍या ही अच्‍छा होता कि हम सामनेवाले की समस्‍याओं को भी समझते , ईमानदारी हममें कूट कूट कर भरी होती, हर स्‍तर पर जिम्‍मेदारियों का सही ढंग से पालन किया जाता। आज हम किसी को गाली देने से नहीं चूकते  , पर जब मुझे कोई अधिकार मिलता है , उसका दुरूपयोग करने लगते हैं।

ईश्वर की सत्ता में यकीन

कल आनंद सिंह जी के एक नए ब्‍लॉग क्रांतिकारी विचार में एक कविता पढने को मिली , जिसमें उन्‍होने ईश्‍वर की सत्‍ता में यकीन रखनेवाले मित्रों से एक अपील की थी ......


उनसे पूछना कि जब हीरोशिमा और नागासाकी पर
शैतान अमेरिका गिरा रहा था परमाणु बम,
तो मानवता का कलेजा तो हो गया था छलनी छलनी ,
लेकिन महाशय के कानों में क्यों नहीं रेंगी जूँ तक?

फिर उनसे पूछना कि जब दिल्ली की सड़कों पर
कोंग्रेसी राक्षस मासूम सिखों का कर रहे थे कत्लेआम,
तब यह धरती तो काँप उठी थी 
लेकिन बैकुंठ में क्यों नहीं हुई ज़रा सी भी हलचल?

उनसे यह भी पूछना कि जब गुजरात में
संघ परिवार के ख़ूनी दरिंदों द्वारा
मुस्लिम महिलाओं का हो रहा था सामूहिक बलात्कार,
तब इंसानियत तो हो गयी थी शर्मसार
पर जनाब के रूह में क्यों नहीं हुई थोड़ी भी हरकत?



मैने कल ब्‍लॉग4वार्ता में भी इस पोस्‍ट की चर्चा की थी , ताकि उन्‍हें जबाब मिल पाए। पर इतने पाठकों में से किसी से भी उन्‍हें संतुष्टि होने सा जबाब नहीं मिला। मैं ईश्‍वर की सत्‍ता में विश्‍वास रखती हूं , पर यह मानते हुए कि वह भी मनमानी नहीं कर सकता। वह भी प्रकृति के नियमों से ही बंधा है , इसलिए अधिक पूजा पाठ या कर्मकांड के कारण उसे खुश करके सांसारिक या अन्‍य प्रकार की सफलता प्राप्‍त की जा सकती है , यह हमारा भ्रम है। ऐसे कर्मकांडों को मैं महत्‍वपूर्ण मानती हूं , जब उससे समाज का या पर्यावरण का भला हो रहा हो। सामाजिक सौहार्द बिगाडने वाला , चारित्रिक रूप से कमजोर बनाने वाला और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला कर्मकांड मुझे बिल्‍कुल पसंद नहीं। इसलिए मेरे द्वारा दिया जाने वाला जबाब लेखक को संतुष्टि नहीं भी दे सकता, पर फिर भी अपने तर्क के हिसाब से इसका जबाब देना आवश्‍यक समझूंगी। 

एक पिता के लिए अपना संतान बहुत प्‍यारा होता है , पर उसके सही विकास के लिए डांट फटकार और मार पीट करने को भी बाध्‍य होता है। वर्ष में एक या दो दिन की डांट मार से वह या आंख दिखाने से वह पूरे वर्षभर पिता के भय से भयभीत रहता है और किसी भी गलत काम की हिम्‍मत नहीं कर पाता। उसी प्रकार समय समय पर प्रकृति को भी कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था रखनी पडती है , ताकि इतने बडे संसार का काम सुचारू ढंग से चल सके। प्रकृति को ही कुछ लोग ईश्‍वर माना करते हैं । एक बच्‍चे के पालन पोषण में बहुत देखभाल की आवश्‍यकता होती है , यदि देखभाल के अभाव में एक दो बच्‍चे मौत के मुंह में न जाएं या अविकसित न रहें , तो बच्‍चों को ढंग से पालने की झमेले में कौन फंसना चाहेगा ??

प्रतिदिन करोडों व्‍यक्ति कहीं न कहीं आ जा रहे हैं , खतरे का काम कर रहे हैं , छिटपुट एक दो दुर्घटनाएं घटती हैं , सैकडों के जान चले जाते हैं। यदि समय समय पर ये दुर्घटनाएं नहीं हो , तो सोंचिए क्‍या होगा ?? न कोई यातायात के नियमों का पालन करे , न खुद पर नियंत्रण और न ही वाहन को सुरक्षित रखने का प्रयास। पिछले वर्ष जयपुर के पेट्रोल पंप में आग लगी थी , उस वक्‍त भी किसी नास्तिक ने ऐसा ही सवाल उठाया था। ईश्‍वर जब किसी को बुरा नहीं चाहता , तो ऐसी घटनाएं किसके अच्‍छाई के लिए घटा करती है ?? पर एक स्‍थान पर लीकेज की इस बडी घटना में भले ही अरबों का नुकसान हुआ हो , पर उसके बारे में सुनकर ही दुनियाभर के पेट्रोलवाले सावधान हो गए होंगे और उससे सौगुणे की देख रेख सही ढंग से होने लगती है।

भले ही कभी कभी निर्दोष के कष्‍ट को देखकर हम परेशान हो जाते है , पर प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के नहीं होते ,  उसमें से कुछ को हम समझ चुके हैं और कुछ की खोज निरेतर जारी है। । पर यदि खतरे की कोई संभावना ही न रहे , तो दुनिया में कोई भी सावधानी नहीं बरत सकेगा। इसलिए ईश्‍वर या प्रकृति जो भी करती है , उसका उद्देश्‍य शुभ हुआ करता है।  यदि प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के होते , तो आज विज्ञान का विकास न हो पाता। विज्ञान इन नियमों को ही तो प्रकृति के नियमों का सहारा लेकर मानव जीवन को सरल बनता है। सभी जीवों में मनुष्‍य ही ऐसा है , जो प्रकृति के रहस्‍यों को ढूंढने में समर्थ है , क्‍यूंकि उसके मस्तिष्‍क की खास बनावट है , जो उसने प्रकृति से ही पायी है।

कोई गलत काम करने से पूर्व प्रकृति की ओर से हमारे दिमाग में बार बार संदेश जाता है , 'हम गलत कर रहे हैं' , पर मनुष्‍य गलत काम करने के वक्‍त उसे दबाने की पूरी कोशिश करता है। कोई भी जीव अपनी प्रकृति के विरूद्ध काम नहीं करता , पर प्रकृति ने मनुष्‍य को अच्‍छे उद्देश्‍य के लिए जो दिमाग दिया है , उसका वही दुरूपयोग कर रहा है। जहां गल्‍ती बडी करनी होती है , वहां आत्‍मा के इस शोर को दबाने के लिए वह मदिरा का सेवन करना है , होश खोकर गलत काम किया करता है , और सारी जबाबदेही ईश्‍वर के मत्‍थे । प्रकृति या ईश्‍वर से कोई प्रश्‍न पूछने की आवश्‍यकता नहीं , आज वहीं हमसे दस प्रश्‍न पूछ सकती है।  वह उसने जितना दिया वह कम नहीं। उसे जिम्‍मेदारी पूर्वक चलाना नहीं आता , ईश्‍वर पर दोषारोपण करना तो बहुत आसान है।  

आज की सरस्‍वती बिना लक्ष्‍मी के क्‍यूं नहीं रह पाती ??

लक्ष्मी और सरस्वती में श्रेष्ठ कौन है

प्राचीन कहावत है कि लक्ष्‍मी और सरस्‍वती एक स्‍थान पर नहीं रह सकती, यानि कि एक ही व्‍यक्ति का ध्‍यान कला और ज्ञान के साथ साथ भौतिक तत्‍वों की ओर नहीं जा सकता , इसलिए प्राचीन काल में पैसे से किसी का स्‍तर नहीं देखा जाता था, बल्कि भौतिक सुखों का नकारकर किसी प्रकार की साधना करने वालों को , ज्ञान प्राप्‍त करने वालों को धनवानों से ऊंचा स्‍थान प्राप्‍त होता था। यहां तक कि उस वक्‍त राजा भी ऋषि महर्षियों के पांव पखारा करते थे और अपने पुत्रों को ज्ञान प्राप्ति के लिए उनके पास भेजा करते थे। उच्‍च पद में रहनेवाले लोगों की संताने हर प्रकार के ज्ञान के साथ साथ नैतिक और आध्‍यात्मिक ज्ञान भी अर्जित करते थे। पर क्रमश: भौतिकवादी युग के विकास के साथ ही संपन्‍न लोग कला और साधना में रत लोगों का शोषण करने लगे ।

लक्ष्मी और सरस्वती में श्रेष्ठ कौन है

आज पूर्ण रूप से जड जमा चुके भौतिकवादी युग में बिना डिग्री के या बिना व्‍यवसायिक बुद्धि के कला और ज्ञान की साधना का कोई मूल्‍य नहीं , सच्‍चे साधक तो कहीं छुपे पडे होते हैं , व्‍यावसायिक तौर पर सफल ज्ञानी और धनवान के मध्‍य अपने को महत्‍वपूर्ण समझने की प्रतिस्‍पर्धा है। हमारे परिचय के एक व्‍यक्ति ने बोकारो में एक बडा नर्सिंग होम खोला था , इसी शहर के एक ख्‍यातिप्राप्‍त सर्जन उनके यहां काम करने के इच्‍छुक थे। नर्सिंग होम के संचालक की भी इच्‍छा थी कि वे उनके यहां काम करे। चूंकि दोनो ही मेरे परिचित थे , मैने दोनो से बातचीत भी की और उन्‍हें एक दूसरे का फोन नं भी दिया। पर पहल कौन करे , लक्ष्‍मी और सरस्‍वती में ऐसी टकराहट हो गयी थी कि दोनो 'पहले आप' 'पहले आप' कहते रह गए।

ऊपर के उदाहरण में सरस्‍वती ने लक्ष्‍मी से टक्‍कर लेने की हिम्‍मत इसलिए की , क्‍यूंकि उनके पास डिग्री है। आर्थिक रूप से संपन्‍न परिवारों के या व्‍यावसायिक बुद्धि रखनेवाले कुछ कलाकार भी समृद्ध लोगों से टक्‍कर ले सकते हैं , पर बाकी कलाकारों को तो धनवानों की कृपादृष्टि पर बने रहने को बाध्‍य होना पडता है। उन कलाकारो , अन्‍य प्रकार के साधकों और ज्ञानियों की सामाजिक प्रतिष्‍ठा का अभी तक लगातार ह्रास होता जा रहा है , जो समाज के लिए बहुत लाभदायक हो सकते थे। अपनी प्रतिष्‍ठा को बनाए रखने के लिए उन्‍हें साधना में कमी कर अपनी पारिवारिक जिम्‍मेदारियों के निर्वाह के लिए अलग काम करने को बाध्‍य होना पडता है।

आज के व्‍यावसायिक युग में सांसारिक सफलता प्राप्‍त करनेवालों का गुमान देखते ही बनता है , कलाकारो , बुद्धिजीवियों का उनके लिए कोई महत्‍व नहीं होता। सांसारिक सफलताओं की अनदेखी कर जो व्‍यक्ति साधना के क्षेत्र में रह जाते हैं , उनकी मानसिकता एक गुलाम की हो जाती है। जो अपने परिवार की जबाबदेहियों को हल करने में असमर्थ हों , उसका आत्‍मविश्‍वास समाज का कल्‍याण करने में नहीं हो पता। इसके परिणामरूवरूप उन नीम हकीम खतरे जान कलाकारों और दिखावटी गुरूओं की बन आती है , जो व्‍यावसायिक बुद्धि रखते हैं और अपने दिखावटीपन से समाज को लूटने में कामयाब तो होते ही हैं , धर्म , ज्ञान और साधना के प्रति समाज के विश्‍वास तो तोडने में भी सक्षम होते हैं। ऐसे लोग समाज के विश्‍वास का तबतक लगातार फायदा उठाते हैं , जबतक समाज का एक एक वर्ग उनके चंगुल में न फंस जाए। 

आज जिसके पास लक्ष्‍मी नहीं , वह ज्ञानार्जन तक के योग्‍य ही नहीं। और जिसने ज्ञानार्जन नहीं किया , वह मेहनत मजदूरी करने को बाध्‍य है। सारे कोर्स प्रोफेशनल हो गए हैं , जिन्‍हें पढने के लिए पैसे चाहिए और ज्ञानार्जन के बाद पैसों का ढेर लग सकता है। आज की सरस्‍वती बिना लक्ष्‍मी के नहीं रह सकती , इसलिए तो गुण और ज्ञान प्राप्‍त करनेवाले भी गुणहीन और ज्ञानहीन हैं।  लाखों में पढाई कर करोडों में कमाई करनेवाले व्‍यक्ति से उनकी खुद की और उनके कंपनी के विकास की उम्‍मीद रखी जा सकती है , पर समाज या देश की नहीं। और जो अपने ज्ञान के बल बूते देश का कल्‍याण कर सकते हैं , वे कोने में पडे कराह रहे होते हैं।