ईश्वर की सत्ता में यकीन रखने वाले मित्रों से एक अपील!!! .... का जबाब

October 12, 2010
कल आनंद सिंह जी के एक नए ब्‍लॉग क्रांतिकारी विचार में एक कविता पढने को मिली , जिसमें उन्‍होने ईश्‍वर की सत्‍ता में यकीन रखनेवाले मित्रों से एक अपील की थी ......


उनसे पूछना कि जब हीरोशिमा और नागासाकी पर
शैतान अमेरिका गिरा रहा था परमाणु बम,
तो मानवता का कलेजा तो हो गया था छलनी छलनी ,
लेकिन महाशय के कानों में क्यों नहीं रेंगी जूँ तक?

फिर उनसे पूछना कि जब दिल्ली की सड़कों पर
कोंग्रेसी राक्षस मासूम सिखों का कर रहे थे कत्लेआम,
तब यह धरती तो काँप उठी थी 
लेकिन बैकुंठ में क्यों नहीं हुई ज़रा सी भी हलचल?

उनसे यह भी पूछना कि जब गुजरात में
संघ परिवार के ख़ूनी दरिंदों द्वारा
मुस्लिम महिलाओं का हो रहा था सामूहिक बलात्कार,
तब इंसानियत तो हो गयी थी शर्मसार
पर जनाब के रूह में क्यों नहीं हुई थोड़ी भी हरकत?



मैने कल ब्‍लॉग4वार्ता में भी इस पोस्‍ट की चर्चा की थी , ताकि उन्‍हें जबाब मिल पाए। पर इतने पाठकों में से किसी से भी उन्‍हें संतुष्टि होने सा जबाब नहीं मिला। मैं ईश्‍वर की सत्‍ता में विश्‍वास रखती हूं , पर यह मानते हुए कि वह भी मनमानी नहीं कर सकता। वह भी प्रकृति के नियमों से ही बंधा है , इसलिए अधिक पूजा पाठ या कर्मकांड के कारण उसे खुश करके सांसारिक या अन्‍य प्रकार की सफलता प्राप्‍त की जा सकती है , यह हमारा भ्रम है। ऐसे कर्मकांडों को मैं महत्‍वपूर्ण मानती हूं , जब उससे समाज का या पर्यावरण का भला हो रहा हो। सामाजिक सौहार्द बिगाडने वाला , चारित्रिक रूप से कमजोर बनाने वाला और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला कर्मकांड मुझे बिल्‍कुल पसंद नहीं। इसलिए मेरे द्वारा दिया जाने वाला जबाब लेखक को संतुष्टि नहीं भी दे सकता, पर फिर भी अपने तर्क के हिसाब से इसका जबाब देना आवश्‍यक समझूंगी। 

एक पिता के लिए अपना संतान बहुत प्‍यारा होता है , पर उसके सही विकास के लिए डांट फटकार और मार पीट करने को भी बाध्‍य होता है। वर्ष में एक या दो दिन की डांट मार से वह या आंख दिखाने से वह पूरे वर्षभर पिता के भय से भयभीत रहता है और किसी भी गलत काम की हिम्‍मत नहीं कर पाता। उसी प्रकार समय समय पर प्रकृति को भी कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था रखनी पडती है , ताकि इतने बडे संसार का काम सुचारू ढंग से चल सके। प्रकृति को ही कुछ लोग ईश्‍वर माना करते हैं । एक बच्‍चे के पालन पोषण में बहुत देखभाल की आवश्‍यकता होती है , यदि देखभाल के अभाव में एक दो बच्‍चे मौत के मुंह में न जाएं या अविकसित न रहें , तो बच्‍चों को ढंग से पालने की झमेले में कौन फंसना चाहेगा ??

प्रतिदिन करोडों व्‍यक्ति कहीं न कहीं आ जा रहे हैं , खतरे का काम कर रहे हैं , छिटपुट एक दो दुर्घटनाएं घटती हैं , सैकडों के जान चले जाते हैं। यदि समय समय पर ये दुर्घटनाएं नहीं हो , तो सोंचिए क्‍या होगा ?? न कोई यातायात के नियमों का पालन करे , न खुद पर नियंत्रण और न ही वाहन को सुरक्षित रखने का प्रयास। पिछले वर्ष जयपुर के पेट्रोल पंप में आग लगी थी , उस वक्‍त भी किसी नास्तिक ने ऐसा ही सवाल उठाया था। ईश्‍वर जब किसी को बुरा नहीं चाहता , तो ऐसी घटनाएं किसके अच्‍छाई के लिए घटा करती है ?? पर एक स्‍थान पर लीकेज की इस बडी घटना में भले ही अरबों का नुकसान हुआ हो , पर उसके बारे में सुनकर ही दुनियाभर के पेट्रोलवाले सावधान हो गए होंगे और उससे सौगुणे की देख रेख सही ढंग से होने लगती है।

भले ही कभी कभी निर्दोष के कष्‍ट को देखकर हम परेशान हो जाते है , पर प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के नहीं होते ,  उसमें से कुछ को हम समझ चुके हैं और कुछ की खोज निरेतर जारी है। । पर यदि खतरे की कोई संभावना ही न रहे , तो दुनिया में कोई भी सावधानी नहीं बरत सकेगा। इसलिए ईश्‍वर या प्रकृति जो भी करती है , उसका उद्देश्‍य शुभ हुआ करता है।  यदि प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के होते , तो आज विज्ञान का विकास न हो पाता। विज्ञान इन नियमों को ही तो प्रकृति के नियमों का सहारा लेकर मानव जीवन को सरल बनता है। सभी जीवों में मनुष्‍य ही ऐसा है , जो प्रकृति के रहस्‍यों को ढूंढने में समर्थ है , क्‍यूंकि उसके मस्तिष्‍क की खास बनावट है , जो उसने प्रकृति से ही पायी है।

कोई गलत काम करने से पूर्व प्रकृति की ओर से हमारे दिमाग में बार बार संदेश जाता है , 'हम गलत कर रहे हैं' , पर मनुष्‍य गलत काम करने के वक्‍त उसे दबाने की पूरी कोशिश करता है। कोई भी जीव अपनी प्रकृति के विरूद्ध काम नहीं करता , पर प्रकृति ने मनुष्‍य को अच्‍छे उद्देश्‍य के लिए जो दिमाग दिया है , उसका वही दुरूपयोग कर रहा है। जहां गल्‍ती बडी करनी होती है , वहां आत्‍मा के इस शोर को दबाने के लिए वह मदिरा का सेवन करना है , होश खोकर गलत काम किया करता है , और सारी जबाबदेही ईश्‍वर के मत्‍थे । प्रकृति या ईश्‍वर से कोई प्रश्‍न पूछने की आवश्‍यकता नहीं , आज वहीं हमसे दस प्रश्‍न पूछ सकती है।  वह उसने जितना दिया वह कम नहीं। उसे जिम्‍मेदारी पूर्वक चलाना नहीं आता , ईश्‍वर पर दोषारोपण करना तो बहुत आसान है।  

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21 Komentar
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नाम ही क्रांतिकारी है... बाकी..

Balas
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एक शक्ति में विश्वास है हमारा ...
प्रकृति कहो या ईश्वर..
अच्छी पोस्ट...!

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अपनी करनी के लिये ईश्वर को उत्तरदायी ठहराना तो न्याय्य नही है ।

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ईश्वर के अस्तित्व को नकाराजाना सर्वथा अनुचित है

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बहुत सही लिखा है आपने संगीता जी , उस सत्ता को अगर नहीं मानते तो हम अन्दर से हमेशा हलचल में रहेंगे , यानि भटकते ही रहेंगे .

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दोष ना दीजै काहू को दोष है कर्मा आपनड़ियां।(गुरु बाणी)

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अपनी करनी के लिये ईश्वर को उत्तरदायी ठहराना तो न्याय् नही है । सार्थक लेख समाज को दिशा देता हुआ।

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ईश्वर ने हमे दिमाग दिया हे,तो हमे कर्म भी अपने दिमाग से ही सोच कर करने हे, ओर अब ईश्वर हर किसी के पीछे डंडा ले कर तो नही खडा हो सकता? शेतान कोई दुसरी दुनिया से नही आता, वो हम आप मे ही बसता हे, ओर इसी दिमाग से हम जो चाहे बने

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jahan tk main samajhta hun abhi insaan ishwr ke itney karib nahi pahunch paya hai ki jahan se wh ishwr ki satta ko chunoti de sakey,ya fir uskey honey n honey pr hi ungli utha sakey...bhrhaal apney- apney vichaar hain jinhen vyakt krney hetu hr koi swatantr hai,
abhaarrrrrrrrrrrrr.

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बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है!
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

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बहुत ही तार्किक अंदाज में अपनी बात रखी है आपने। सहमत हूँ आपसे।

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संगीता जी,
मेरे सवालों को पढने के लिए और उनके जवाब देने के प्रयास के लिए धन्यवाद!
वैसे मैंने तो ये सवाल सर्वशक्तिमान परमेश्वर से पूछने की गुजारिश की थी, चलिए अच्छा ही हुआ की आपने ख़ुद ही इनका जवाब दे दिया.
लेकिन जैसा कि आपको अंदेशा था, आपके जवाब मेरे बेचैन, जिज्ञासु और तूफ़ानी मन को संतुष्ट करने में असफल रहे, उल्टे मेरा मन पहले से
भी उद्वेलित हो उठा. मेरे जिज्ञासु मन को सिर्फ वही बातें संतुष्ट कर पाती हैं जिनके पीछे वैज्ञानिक आधार हो. हालांकि आपने ईश्वर को प्रकृति
से जोड़कर अपनी बातों में वैज्ञानिकता का पुट भरने की कोशिश की है, परन्तु विज्ञान का छात्र होने के नाते मुझे विज्ञान और आस्था दोनों
परस्पर विरोधी विचार लगते हैं. जैसा कि आपने सही लिखा है की विज्ञान मानव द्वारा प्रकृति के नियमों की की खोज का एक निरंतर प्रयास है,
लेकिन मेरी जानकारी में ईश्वर की अवधारणा को पुष्ट करने का वैज्ञानिक प्रयोग आज तक नहीं हो पाया है.
आपने ईश्वर के प्रति अपनी आस्था और अपने ईश्वर के बचाव में जो तर्क दिए हैं वो एक ओर तो मुझे विसंगतियों से भरे लगते हैं, वहीँ दूसरी ओर उनकी तार्किक परिणति हमें एक ख़तरनाक दिशा में में ले जाती है. आपने पिता और पुत्र का तथा पेट्रोल पम्प का जो उदहारण दिया है उससे तो यही लगता है की आप मानती हैं कि इस दुनिया में भीषण युद्ध, ईश्वर के नाम पर दंगे-फसाद व आतंकवाद, गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, महिला उत्पीड़न, वेश्यावृति इत्यादि ईश्वर की मर्ज़ी से होता है और इन परिघटनाओं के माध्यम से ईश्वर इंसानों को सबक सिखाता है.अगर ऐसा है तो मेरे जैसे इंसाफपसंद युवा निश्चित रूप से ईश्वर की इस अमानवीय सत्ता के खिलाफ़ आवाज़ उठायेंगे ही. लेकिन इन सवालों के आते ही आप बहुत ही चतुराई से उपरोक्त सारी परिघटनाओं के लिए ईश्वर को नहीं बल्कि इंसान को जिम्मेदार ठहराने लगती हैं और फिर कभी इनको प्रकृति के नियम भी बताने लगाती हैं . आपके तर्कों की यही विसंगति मेरे वैज्ञानिक मन को संतुष्ट नहीं कर पायी.
एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन सारे सवालों पर सोचने पर मुझे लगता है कि युद्ध, आतंकवाद, दंगे, गरीबी, भुखमरी इत्यादि ये सभी परिघटनाएं कोई दैवीय प्रकोप नहीं बल्कि मनुष्य की आर्थिक,सामजिक और राजनीतिक संरचना की उपज है. ये संरचनाएं स्थिर नहीं हैं बल्कि मानव सभ्यता और उत्पादन शक्तियों के विकास के साथ साथ निरंतर बदलती रहती हैं. इन परिघटनाओं को ईश्वर ने नहीं रचा बल्कि इन नाइंसाफियों और अत्याचारों को सही साबित करने के लिए अलग अलग समाजों के शासक वर्गों ने ईश्वर की अवधारणा को रचा. सारी अच्छाईयां एक अनजाने अनदेखे वाह्य ईश्वर में डाल दी गयीं और बहुत ही शातिराना ढंग से मनुष्य को बुराइयों का पुतला बना दिया गया. मनुष्य की नैसर्गिक चाहतों को इस दुनिया में नहीं बल्कि किसी दूसरी दुनिया में पूरा होने का भरोसा दिलाया गया ताकि इस दुनिया के अन्याय के खिलाफ़ विद्रोह न हों. लेकिन शासक वर्गों की इच्छा से स्वतंत्र, मानव सभ्यता का इतिहास शासक और शोषक वर्गों के खिलाफ़ विद्रोहों का इतिहास रहा हैं.
२१ वीं सदी में विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि बिना शोषण के हर इंसान की बुनियादी ज़रूरतों - रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि को पूरा किया जा सकता है, लेकिन मुनाफ़े के बेतुके आधार पर टिकी पूंजीवादी व्यवस्था के दायरे में यह हरगिज़ संभव नहीं है. इसी वजह से हम जैसे इंसाफपसंद और तरक्कीपसंद लोग एक ऐसी सामजिक संरचना की नींव रखने की बात करते हैं और उसके लिए संघर्ष करते हैं जो शोषण पर नहीं बल्कि मानवीय ज़रूरतों के आधार पर टिकी हो. जिस स्वर्ग की तलाश आप आस्तिक लोग दूसरी दुनिया में करते हैं, हम क्रांतिकारी उसको इसी दुनिया में लाने के लिए संघर्षरत हैं. हो सकता है इसमें कई दशक या कई सदियाँ लग जाएँ लेकिन एक बात तो तय है की जब तक इस पृथ्वी पर शोषण और अत्याचार रहेगा, ये संघर्ष जारी रहेगा और शोषण व अत्याचार को दैवीय प्रकोप और प्राकृतिक नियम बताने वाले अवैज्ञानिक और घोर अमानवीय विचारों के खिलाफ़ भी, जिसकी एक अभिव्यक्ति मेरे और आपके ब्लॉग है पर जारी संघर्ष है.

इंक़लाब ज़िन्दाबाद!!!

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संगीता जी,
मेरे सवालों को पढने के लिए और उनके जवाब देने के प्रयास के लिए धन्यवाद!
वैसे मैंने तो ये सवाल सर्वशक्तिमान परमेश्वर से पूछने की गुजारिश की थी, चलिए अच्छा ही हुआ की आपने ख़ुद ही इनका जवाब दे दिया.लेकिन जैसा कि आपको अंदेशा था, आपके जवाब मेरे बेचैन, जिज्ञासु और तूफ़ानी मन को संतुष्ट करने में असफल रहे, उल्टे मेरा मन पहले से भी उद्वेलित हो उठा. मेरे जिज्ञासु मन को सिर्फ वही बातें संतुष्ट कर पाती हैं जिनके पीछे वैज्ञानिक आधार हो. हालांकि आपने ईश्वर को प्रकृति से जोड़कर अपनी बातों में वैज्ञानिकता का पुट भरने की कोशिश की है, परन्तु विज्ञान का छात्र होने के नाते मुझे विज्ञान और आस्था दोनों परस्पर विरोधी विचार लगते हैं. जैसा कि आपने सही लिखा है की विज्ञान मानव द्वारा प्रकृति के नियमों की की खोज का एक निरंतर प्रयास है,लेकिन मेरी जानकारी में ईश्वर की अवधारणा को पुष्ट करने का वैज्ञानिक प्रयोग आज तक नहीं हो पाया है.
आपने ईश्वर के प्रति अपनी आस्था और अपने ईश्वर के बचाव में जो तर्क दिए हैं वो एक ओर तो मुझे विसंगतियों से भरे लगते हैं, वहीँ दूसरी ओर उनकी तार्किक परिणति हमें एक ख़तरनाक दिशा में में ले जाती है. आपने पिता और पुत्र का तथा पेट्रोल पम्प का जो उदहारण दिया है उससे तो यही लगता है की आप मानती हैं कि इस दुनिया में भीषण युद्ध, ईश्वर के नाम पर दंगे-फसाद व आतंकवाद, गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, महिला उत्पीड़न, वेश्यावृति इत्यादि ईश्वर की मर्ज़ी से होता है और इन परिघटनाओं के माध्यम से ईश्वर इंसानों को सबक सिखाता है.अगर ऐसा है तो मेरे जैसे इंसाफपसंद युवा निश्चित रूप से ईश्वर की इस नाइंसाफ सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायेंगे ही. लेकिन इन सवालों के आते ही आप बहुत ही चतुराई से उपरोक्त सारी परिघटनाओं के लिए ईश्वर को नहीं बल्कि इंसान को जिम्मेदार ठहराने लगती हैं और फिर कभी इनको प्रकृति के नियम भी बताने लगाती हैं . आपके तर्कों की यही विसंगति मेरे वैज्ञानिक मन को संतुष्ट नहीं कर पायी.
एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन सारे सवालों पर सोचने पर मुझे लगता है कि युद्ध, आतंकवाद, दंगे, गरीबी, भुखमरी इत्यादि ये सभी परिघटनाएं कोई दैवीय प्रकोप नहीं बल्कि मनुष्य की आर्थिक,सामजिक और राजनीतिक संरचना की उपज है. ये संरचनाएं स्थिर नहीं हैं बल्कि मानव सभ्यता और उत्पादन शक्तियों के विकास के साथ साथ निरंतर बदलती रहती हैं. इन परिघटनाओं को ईश्वर ने नहीं रचा बल्कि इन नाइंसाफियों और अत्याचारों को सही साबित करने के लिए अलग अलग समाजों के शासक वर्गों ने ईश्वर की अवधारणा को रचा. सारी अच्छाईयां एक अनजाने अनदेखे वाह्य ईश्वर में डाल दी गयीं और बहुत ही शातिराना ढंग से मनुष्य को बुराइयों का पुतला बना दिया गया. मनुष्य की नैसर्गिक चाहतों को इस दुनिया में नहीं बल्कि किसी दूसरी दुनिया में पूरा होने का भरोसा दिलाया गया ताकि इस दुनिया के अन्याय के खिलाफ़ विद्रोह न हों. लेकिन शासक वर्गों की इच्छा से स्वतंत्र, मानव सभ्यता का इतिहास शासक और शोषक वर्गों के खिलाफ़ विद्रोहों का इतिहास रहा हैं.
२१ वीं सदी में विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि बिना शोषण के हर इंसान की बुनियादी ज़रूरतों - रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि को पूरा किया जा सकता है, लेकिन मुनाफ़े के बेतुके आधार पर टिकी पूंजीवादी व्यवस्था के दायरे में यह हरगिज़ संभव नहीं है. इसी वजह से हम जैसे इंसाफपसंद और तरक्कीपसंद लोग एक ऐसी सामजिक संरचना की नींव रखने की बात करते हैं और उसके लिए संघर्ष करते हैं जो शोषण पर नहीं बल्कि मानवीय ज़रूरतों के आधार पर टिकी हो. जिस स्वर्ग की तलाश आप आस्तिक लोग दूसरी दुनिया में करते हैं, हम क्रांतिकारी उसको इसी दुनिया में लाने के लिए संघर्षरत हैं. हो सकता है इसमें कई दशक या कई सदियाँ लग जाएँ लेकिन एक बात तो तय है की जब तक इस पृथ्वी पर शोषण और अत्याचार रहेगा, ये संघर्ष जारी रहेगा और शोषण व अत्याचार को दैवीय प्रकोप और प्राकृतिक नियम बताने वाले अवैज्ञानिक और घोर अमानवीय विचारों के खिलाफ़ भी, जिसकी एक अभिव्यक्ति मेरे और आपके ब्लॉग है पर जारी संघर्ष है.

इंक़लाब ज़िन्दाबाद!!!

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संगीता जी मुझे तो कुछ यूँ लगा उनका लेख कहीं मैंने कुछ गलत जवाब तो नहीं दे दिया???
"भाई साहेब, शुरुआत के लिए बहुत बधाई. लेकिन आपने समस्या तो गिनवा दीं... पर समाधान भी तो प्रस्तुत करिए... कांग्रेस और संघ परिवार पर तीर चला दिया सीधे. बंधू ये जो भी प्रतिक्रियात्मक घटनाएँ आपने गिनवाई हैं दरअसल वो खुद मैं कोई समस्या नहीं हैं. वरन सिर्फ मुखौटे हैं . वास्तविक जड़ें तो कहीं और ही हैं और उसका दोषी सारा समाज है. और समाज के अंग होने के नाते आप भी दोषी हैं. इश्वर कुछ नहीं करता. उसने हमको कर्म करने कि आज़ादी दे रखी है. हम जैसा बोएँगे वैसा ही तो फल मिलेगा भाई. तो जितने भी बीज मानव जाती ने बोये तो उसका फल भी मानव को ही तो भोगना होगा.....

आप के लिए एक सलाह:- सामाजिक समस्या को रेखांकित करिए साथ ही साथ आपकी नज़र मैं उसका क्या समाधान होना चाहिए वो भी दो रखिये.... शायद आपका वही विचार किसी क्रांति को जन्म दे जाये. "
शुभकामनाएं,
मनुदीप

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सबकी अपनी-अपनी मान्‍यताऍं और आस्‍थाऍं हैं। हमें उन्‍हीं पर कायम रहना चाहिए। दूसरों की मान्‍यता/आस्‍था पर प्रहार कर हम अपनी लकीर बडी कभी नहीं कर सकते। तर्कों से हम वहीं पहुँचते हैं जहॉं पहुँचना चाहते हैं। भगतसिंह और गॉंधी दोनों इसी देश में हुए और धर्मिक सन्‍दर्भों में दोनों 'पूरब-पश्चिम' थेा एक पूरी तरह अनीश्‍वरवादी/नास्तिक और दूसरा पूरी तरह कट्टर धार्मिक। किन्‍तु दोनों ही एक दूसरे का सम्‍मान करते थे। ऐसी बहसों का कभी कोई परिणाम नहीं निकलता। ये अन्‍तहीन ही नहीं, परिणामन भी होती हैं।

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आनंद जी ने लिखा है: मेरी जानकारी में ईश्वर की अवधारणा को पुष्ट करने का वैज्ञानिक प्रयोग आज तक नहीं हो पाया है.
इस प्रकार कहकर आनंद जी ईश्वर के सत्ता पर प्रश्न करते हैं. इनके पास ईश्वर को मानने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. पर ये सभी जानते हैं कि एक जीव से दुसरे जीव की जो उत्पत्ति होती है यानी सजीवों में जो प्रजनन की क्षमता है यह ईश्वर की ही देन है. ईश्वर द्वारा दिए गए प्रजनन के क्षमता के बिना (यानी ईश्वर द्वारा प्रदत्त अंडाणु व शुक्राणु के बिना) नए जीव के उत्पादन में अभी तक विज्ञान सफलता प्राप्त नहीं की है. और विज्ञान के सामने यह बात यही साबित करता है कि ईश्वर का अस्तित्व है.

आपका
महेश
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यह सारा भ्रम इसलिए पैदा होता है क्योंकि लोग ईश्वर को एक व्यक्ति के रूप में देखकर उसको संकुचित करने का प्रयास करते हैं। ईश्वर कोई दारोगा नहीं है जो सबके कर्मो का दंड देता फिरे। उसने सबको एक स्वतंत्र सत्ता दी है जो स्वयं के गुण दोष के आधार पर नियति निर्धारित करती है ।
विज्ञान भी इस व्यवस्था का एक अंग ही है। विज्ञान कोई नयी बात नहीं पैदा करता है, वह केवल पहले से विद्यमान शक्तियों की खोज करता है । हर शक्ति के अच्छे और बुरे प्रभाव दोनों हैं । बिजली से आप कई सुख भी उठा सकते हैं और संपर्क में आने पर नुकसान भी । अच्छे गुण के लिए विज्ञान की वाहवाही और बुरे के लिए ईश्वर जिम्मेदार !!

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समय काल (यानी निरंतर प्रवाहशील समय) सूर्य रूपी अग्नि और रात्रि-दिन रूपी इंधन से तपाये जा रहे भवसागर रूपी महा मोहयुक्त कढ़ाई में महीने तथा ऋतुओं के कलछे से उलटते-पलटते हुए जीवधारियों को पका रहा है । यही प्रमुख वार्ता (खबर) है । इस कथन में जीवन के गंभीर दर्शन का उल्लेख दिखता है । रात-दिन तथा मास-ऋतुओं के साथ प्राणीवृंद के जीवन में उथल-पुथल का दौर निरंतर चलता रहता है । प्राणीगण काल के हाथ उसके द्वारा पकाये जा रहे भोजन की भांति हैं, जिन्हें एक न एक दिन काल के गाल में समा जाना है । यही हर दिन का ताजा समाचार है |
जीवन जीने के असली मार्ग के निर्धारण के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं है, श्रुतियां (शास्त्रों तथा अन्य स्रोत) भी भांति-भांति की बातें करती हैं, ऐसा कोई ऋषि/चिंतक/विचारक नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें । वास्तव में धर्म का मर्म तो गुहा (गुफा) में छिपा है, यानी बहुत गूढ़ है । ऐसे में समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति जिस मार्ग को अपनाता है वही अनुकरणीय है । ‘बड़े’ लोगों के बताये रास्ते पर चलने की बातें अक्सर की जाती हैं । यहां प्रतिष्ठित या बड़े व्यक्ति से मतलब उससे नहीं है जिसने धन-संपदा अर्जित की हो, या जो व्यावसायिक रूप से काफी आगे बढ़ चुका हो, या जो प्रशासनिक अथवा अन्य अधिकारों से संपन्न हो, इत्यादि । प्रतिष्ठित वह है जो चरित्रवान् हो, कर्तव्यों की अवहेलना न करता हो, दूसरों के प्रति संवेदनशील हो, समाज के हितों के प्रति समर्पित हो, आदि-आदि ।
यहां इस लोक से जीवधारी प्रतिदिन यमलोक को प्रस्थान करते हैं, यानी एक-एक कर सभी की मृत्यु देखी जाती है । फिर भी जो यहां बचे रह जाते हैं वे सदा के लिए यहीं टिके रहने की आशा करते हैं । इससे बड़ा आश्चर्य भला क्या हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि जिसका भी जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है और उस मृत्यु के साक्षात्कार के लिए सभी को प्रस्तुत रहना चाहिए । किंतु हर व्यक्ति इस प्रकार जीवन-व्यापार में खोया रहता है जैसे कि उसे मृत्यु अपना ग्रास नहीं बनाएगी |
arganikbhagyoday.blogspot.com

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समय काल (यानी निरंतर प्रवाहशील समय) सूर्य रूपी अग्नि और रात्रि-दिन रूपी इंधन से तपाये जा रहे भवसागर रूपी महा मोहयुक्त कढ़ाई में महीने तथा ऋतुओं के कलछे से उलटते-पलटते हुए जीवधारियों को पका रहा है । यही प्रमुख वार्ता (खबर) है । इस कथन में जीवन के गंभीर दर्शन का उल्लेख दिखता है । रात-दिन तथा मास-ऋतुओं के साथ प्राणीवृंद के जीवन में उथल-पुथल का दौर निरंतर चलता रहता है । प्राणीगण काल के हाथ उसके द्वारा पकाये जा रहे भोजन की भांति हैं, जिन्हें एक न एक दिन काल के गाल में समा जाना है । यही हर दिन का ताजा समाचार है |
arganikbhagyoday.blogspot.com

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बहुत सुन्दर विचार है | ईश्वर जो भी करे भले के लिये ही करता है मेरा तो यही मानना है |

Balas
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dosto, mujhe to ANAND ki bat hi jiada tarkik lagi.baki meri padhai bhi ek gurukul type school me hi hui he, mane bhi kafi "yog sadhana" se lekar "jap dhian" kiya he.apne anubhav ke bad mujhe to lagta he ki ASTIK do tarah ke hi hote hen ek to bhole-bhale.. jinhe sahi or tarkik tor par chijo ke bare me pata nahi hota, dusre hote he dhurt makkar log jo ishwar adi ke nam par aam logo ki agianta ka fayda uthate hen..baki rahi bat ishwar ke hone ya na hone ki to iske liye adhian jaruri he or iss se pahle yah tay hona chahiye ke hame karna kya he...ki vastav me hi samaj ke liye kuch karna he ya "jindgi jeete hue" time pass....baki aap RAHUL SANKRTAYAN, RADHA MONAN GOKUL JI,DAVI PARSAD CHATOPADHAYE,D.D.KOSHAMBHI,BHAGAT SINGH...adi ko padh sakte ho...mane bhi inhe hi padhkar apne fande clear kiye the...

Balas