परिकल्‍पना समूह का बहुत बहुत आभार !!

३० अप्रैल को हिंदी भवन, विष्णु दिगंबर मार्ग, नयी दिल्ली में हिंदी ब्लॉग जगत के बहु प्रतीक्षित परिकल्पना सम्मान-२०१० में भाग लेकर बहुत सारे ब्‍लॉगर बंधुओं से मिलना जुलना हुआ।




इस सफल आयोजन के लिए रविन्‍द्र प्रभात जी और अविनाश वाचस्‍पति जी को बधाई !!


इस आयोजन में मुख्यमंत्री उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री डा0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी के कर कमलों द्वारा देश विदेश के जिन 51 चर्चित ब्‍लॉगरों को हिंदी साहित्‍य निकेतन परिकल्‍पना पुरस्‍कार और हिंदी ब्‍लॉगिंग में विशिष्‍टता हासिल करने वाले 13 ब्‍लॉगरों को सारस्‍वत सम्‍मान पुरस्‍कार मिला है , उन्‍हें भी बहुत बहुत बधाई !!




इस सम्‍मान के लिए परिकल्‍पना समूह और खासकर रविन्‍द्र प्रभात जी का बहुत बहुत आभार !! 


जिनका सबकुछ उजड गया

दो महीने हिंदी ब्‍लॉग जगत से दूर रहने के बाद आज आपलोगों से मुखातिब होने का मौका मिला है। इस दौरान सारे ब्‍लॉगों पर मेरा क्रियाकलाप बंद ही रहा। समाचार के माध्‍यम से देश दुनिया की हर खबर तो मिलती रही , पर अपने ब्‍लॉग के माध्‍यम से न तो जापान में सुनामी के रूप में आए आए भीषण त्रासदी से परेशान लोगों के प्रति संवेदना व्‍यक्‍त कर सकी , न ही भारत के वर्ल्‍ड कप जीतने पर कोई खुशी जाहिर कर सकी और न ही भ्रष्‍टाचार के विरूद्ध अन्‍ना हजारे के आंदोलन में उनका साथ दे सकी। इस मध्‍य कितने ही त्‍यौहार आते और जाते रहें , न तो आप सबों के साथ होली का लुत्‍फ उठा सकी , न रामनवमी की यादें ही शेयर कर सकी।  ध्‍यान था तो सिर्फ इस बात पर कि शिफ्ट करने से पहले अपने क्‍वार्टर को मनमुताबिक ढाल देना ताकि बाद में हर कार्य सुविधापूर्ण ढंग से हो सके और बाद में किसी भी परिस्थिति में मेरे अध्‍ययन मनन में कोई रूकावट न आए।

आनेवाले आठ वर्ष तक की सुख सुविधा के लिए हमलोगों ने बिना कंपनी के सहयोग के क्‍वार्टर पर अच्‍छा खासा खर्च कर डाला।  राजमिस्‍त्री , डिस्‍टेंपर पेण्‍ट वाले मिस्‍त्री , पाइपलाइन मिस्‍त्री और बिजली मिस्‍त्री सारे मिलकर 80 प्रतिशत काम पूरा कर चुके , 20 प्रतिशत बाकी है , जो धीरे धीरे हो जाएगा। कल से यहां कंप्‍यूटर भी इंस्‍टॉल हो चुका , ब्राडबैंड को यूजरनेम और पासवर्ड तो बहुत पहले ही मिल गया था। वैसे तो कैफे में जाकर कभी कभी हिंदी ब्‍लॉग जगत के हाल चाल लेती ही रही , पर नेट चलाने के बाद कल से ब्‍लॉग जगत में भ्रमण कुछ अधिक ही हो रहा है और आज मैं अपने पहले पोस्‍ट के साथ उपस्थित हूं। हालांकि घर अभी पूरा अस्‍त व्‍यस्‍त है , 28 को दिल्‍ली के लिए निकलना भी है , इसलिए समय की अभी भी काफी कमी दिख रही है।

हाई कोर्ट , रांची के आदेश के पश्‍चात् एक महीने तक लगातार होने वाले  अतिक्रमण के विरूद्ध क्रिए जा रहे सरकारी कार्रवाई की आग में पूरा झारखंड जल रहा है। राजपथ को चौडा करने के लिए सरकारी जमीनों पर बनाए गए मकानों को तोडने का जो सिलसिला शुरू हुआ , वो बढता हुआ पूरे पूरे मुहल्‍ले और गांव तक को लीलता नजर आया। सरकारी जमीनों के बाद विभिनन कंपनियों के जमीनों में किए गए अतिक्रमण पर भी सरकार की निगाह है , जिसपर लोगों ने अपनी अपनी स्थिति के हिसाब से हर प्रकार के मकान बना लिए हैं। वर्षों से निवास कर रहे जनता की जो प्रतिक्रिया दिख रही है , वो स्‍वाभाविक है। आखिर वो जाएं तो जाएं कहां ?? करें तो करे क्‍या ??

बोकारो के कापरेटिव कॉलोनी , जहां मैं रहा करती थी , उसके बगल में झु‍ग्‍गी झोपडियों की उससे भी बडी कॉलोनी थी। वहां रहनेवाले परिवारों के मर्द रिक्‍शा या ऑटो चलाते , चाट पकौडे के ठेले लगाते , या दूसरों की दुकानों में काम किया करते। महिलाएं पूरी कॉलोनी के फ्लैटों में चौका बरतन का काम करती थी। कुछ परिवार गाय या भैंस पालने का काम या छोटे मोटे व्‍यवसाय में भी लगे थे। सिर्फ महत्‍वाकांक्षी लोगों को ही नहीं , बंगाल या बिहार के विभिनन क्षेत्रों में भुखमरी से मर रहे लोगों को जीवन जीने के लिए एक जगह मिल गयी थी। अपनी सुविधा के लिए अपने अपने घरों में लोग कुछ न कुछ खर्च कर ही लिया करते थे। एक महीने पूर्व ही मेरी कामवाली ने आठ हजार रूपए खर्च कर नलकूप लगवाया था। उसके लिए आठ हजार रूपए उतने ही है , जितना किसी के लिए अस्‍सी हजार और किसी के लिए आठ लाख। किसी कारखाने के कारण कोई कॉलोनी बसती है , तो उन परिवारों के जीवनयापन में मदद करने के लिए बहुत सारे लोगों की आवश्‍यकता पडती है।  वैसे लोगों का सहयोग तो सब लेते हैं , उनके रहने के लिए कंपनी कोई व्‍यवस्‍था नहीं करती।

हमारे बगल में ही सरकारी जमीन पर एक पूरा गांव ही बसा है , जिसमे छोटे मोटे मकान से लेकर आलीशान भवन भी मौजूद हैं। सबको नोटिस मिलने लगी है , यदि उसे तोडा गया तो अन्‍य शहरों जैसा ही पुरजोर विरोध किया जाएगा , इसमें संशय नहीं। आसपास कमाई के साधन को देखते हुए अच्‍छी अच्‍छी कॉलोनियां भी सरकारी या विभिनन कंपनियों की जमीन पर बनी हुई हैं।  लोगों की मांग है कि जिस जमीन पर जो बसे हुए हैं , उन्‍हे तबतक नहीं उजाडा जाना चाहिए , जबतक सरकार या किसी कंपनी को उस जमीन की आवश्‍यकता नहीं है। यदि इसी तरह सारे मकानों को ध्‍वस्‍त करना था , तो उन्‍हें बनने के वकत ही रोका जाना चाहिए था। कुछ नेता भी अब इसका विरोध करने लगे हैं , अब सरकारी कार्रवाई रोकी भी जा सकती है , पर जिनका सबकुछ उजड गया , वे अपने दुभार्ग्‍य पर सर पीटने के सिवा और क्‍या कर सकते हैं ??


ईश्‍वर से प्रार्थना है ,... सबकुछ शांतिपूर्वक संपन्‍न हो जाए !!!

एक महीने से नेट से दूर हूं , पंद्रह दिनों तक भतीजे के ब्‍याह की व्‍यस्‍तता बनी रही , उसके बाद खुद के अपने क्‍वार्टर में शिफ्ट होने की तैयारी में व्‍यस्‍त हूं। इस दौरान होली की शुभकामना भरा  एक पोस्ट प्रकाशित ही नहीं हुआ . पिछले वर्ष ही मैने अपने लेख में लिखा था कि दोनो बेटों की बारहवीं की परीक्षा समाप्‍त होने के बाद मैं पुन: एक मोड पर खडी हूं , निर्णय लेने में और निर्णय के बाद की समस्‍याओं से निबटने में मुझे पूरे एक वर्ष लग गए। इस निर्णय का आनेवाले जीवन में क्‍या परिणाम निकलेगा , यह तो वक्‍त ही बताएगा , फिलहाल सोंचने की भी फुर्सत नहीं। ब्‍लॉग जगत की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट तो होता है , पर पिछले एक महीने से बहुत कम पढ पायी हूं।

प्राइवेट मकानों की हर सुख सुविधा में जीवनयापन करने की अभ्‍यस्‍तता के बाद किसी कंपनी के क्‍वार्टर में जीना मुश्किल होता है। वैसे बाद में बननेवाले क्‍वार्टर्स भी सारे सुख सुविधायुक्‍त होते हैं , पर पंद्रह वर्ष पहले हमें जो अलॉट किया गया है , वह मुहल्‍ला छोडना भी मुश्किल लगता है। आनेवाले दस वर्षों तक लगातार यही रहना है , इसलिए बेहतर यही लगा कि अपने खर्च पर इसी क्‍वार्टर को ही सुख सुविधायुक्‍त बना दिया जाए , इस सिलसिले में पंद्रह दिनों से काम शरू करवाया गया , जो अभी तक समाप्‍त होने का नाम नहीं ले रहा , यदि कंपनी की ओर से करवाया जाता तो शायद छह महीनों में भी नहीं हो पाता।

अभी से अप्रैल के पूर्वार्द्ध तक कुछ ग्रहों की स्थिति खराब चलेगी , इसलिए किसी भी कार्य में प्रकृति का सहयोग मिलना मुश्किल दिखता है। इस दौरान कई प्रकार की समस्‍याएं आएंगी। आम जन के लिए बेहतर होगा कि किसी काम को हडबडी में न कर आराम से करें। काम न बनने पर निराश न हों, समय में सुधार होते ही काम में प्रगति दिखाई पडेगी। मेरे समक्ष तो छोटी मोटी बाधाएं आनी शुरू हो गयी है , बोकारो का माहौल भी ठीक नहीं है , हाई कोर्ट के ऑर्डर के बाद की जानेवाली कार्रवाई में जनता के द्वार किए जानेवाले विरोध के कारण होली के पूर्व से ही माहौल गडबड चल रहा है। आज एक ऑफिस में कुछ काम के सिलसिले में मैं निकली , लौटते वक्‍त पुन: अतिक्रमण कर लगाये गए गुमटियों में तोड फोड शुरू हो गया था। अतिक्रमण हटाओ अभियान के विरोध से बचने के लिए पुरे शहर में सुरक्षा बल की तनती है . कल यहां से मेरा सामान ढोया जाना है , ईश्‍वर से प्रार्थना है , सबकुछ शांतिपूर्वक संपन्‍न हो जाए।

सरस्‍वती पूजा पर आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं !!

सरस्‍वती पूजा को लेकर सबसे पहली याद मेरी तब की है , जब मैं मुश्किल से पांच या छह वर्ष की रही होऊंगी और सरस्‍वती पूजा के उपलक्ष्‍य में शाम को स्‍टेज में हो रहे कार्यक्रम में बोलने के लिए मुझे यह कविता रटायी गयी थी ...

शाला से जब शीला आयी ,
पूछा मां से कहां मिठाई ।
मां धोती थी कपडे मैले ,
बोली आले में है ले ले।
मन की आशा मीठी थी ,
पर आले में केवल चींटी थी।
खूब मचाया उसने हल्‍ला ,
चींटी ने खाया रसगुल्‍ला।

गांव में रहने के कारण अपनी पढाई न पूरी कर पाने का मलाल दादाजी को इतना रहा कि उन्‍होने पांचों बेटों को अधिक से अधिक पढाने की पूरी कोशिश की। एक मामूली खेतिहर और छोटा मोटा व्‍यवसाय करनेवाले मेरे दादाजी अपने पांचो बेटे को कक्षा में टॉपर पाकर और उनके ग्रेज्‍युएट हो जाने मात्र से ही काफी खुश रहते और मानते कि हमारे परिवार पर मां सरस्‍वती की विशेष कृपा है , इसलिए अच्‍छा खासा खर्च कर अपने घर  पर ही वसंत पंचमी के दिन सरस्‍वती जी की विशेष पूजा करवाया करते थे। सुबह पूजा होने के बाद शाम को लोगों की भीड जुटाने के लिए एक माइक और लाउस्‍पीकर आ जाता , वहां के सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में हमारे परिवार के लोगों का तो शरीक रहना आवश्‍यक होता। घर के छोटे बच्‍चे भी स्‍टेज पर जाकर अपना नाम ही जोर से चिल्‍लाकर बोल आते।

थोडी बडी होने पर स्‍कूल में भी हमारा उपस्थित र‍हना आवश्‍यक होता , चूंकि स्‍कूलों के कार्यक्रम में थोडी देरी हो जाया करती थी , इसलिए हमारे घर की पूजा सुबह सवेरे ही हो जाती और माता सरस्‍वती को पुष्‍पांजलि देने के बाद ही हमलोग तब स्‍कूल पहुंचते , जब वहां का कार्यक्रम शुरू हो जाता था। सभी शिक्षकों को मालूम था कि हमारे घर में भी पूजा होती है , इसलिए हमें कभी भी देर से पहुंचने को लेकर डांट नहीं पडी। बचपन से ही हम भूखे प्‍यासे स्‍कूल जाते और स्‍कूल की पूजा के बाद ही प्रसाद खाते हुए सारा गांव घूमते , प्रत्‍येक गली में एक सरस्‍वती जी की स्‍थापना होती थी , हमलोग किसी भी मूर्ति के दर्शन किए बिना नहीं रह सकते थे।

ऊंची कक्षाओं के बच्‍चों को स्‍कूल के सरस्‍वती पूजा की सारी व्‍यवस्‍था खुद करनी होती थी , इस तरह वे एक कार्यक्रम का संचालन भी सीख लेते थे। चंदा एकत्रित करने से लेकर सारा बाजार और अन्‍य कार्यक्रम उन्‍हीं के जिम्‍मे होता। सहशिक्षा वाले स्‍कूल में पढ रही हम छात्राओं को सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम में चंदा इकट्ठा करने और पंडाल की सजावट के लिए घर से साडियां लाने से अधिक काम नहीं मिलता था , इसलिए सबका खाली दिमाग अपने पहनावे की तैयारी करता मिलता।

तब लहंगे का फैशन तो था नहीं , बहुत कम उम्र से ही सरस्‍वती पूजा में हम सभी छात्राएं साडी पहनने के लिए परेशान रहते। आज की  तरह तब महिलाओं के पास भी साडियों के ढेर नहीं हुआ करते थे , इसलिए अच्‍छी साडियां देने को किसी की मम्‍मी या चाची तैयार नहीं होती और पूजा के मौके पर साधारण साडियां पहनना हम पसंद नहीं करते थे। साडियों के लिए तो हमें जो मशक्‍कत करनी पडती , उससे कम ब्‍लाउज के लिए नहीं करनी पडती। किसी भी छात्रा को अपनी मम्‍मी और चाचियों का ब्‍लाउज नहीं आ सकता था, ब्‍लाउज के लिए हम पूरे गांव में दुबली पतली नई ब्‍याहता भाभियों को ढूंढते। तब रंगो के इतने शेड तो होते नहीं थे , हमारी साडी के रंग का ब्‍लाउज कहीं न कहीं मिल ही जाता , तो हमें चैन आता।

हमारे गांव में वसंतपंचमी के दूसरे दिन से ही मेला भी लगता है , हमारे घर में तो सबका संबंध शुरू से शहरों से रा है , इसलिए मेले को लेकर बडों को कभी उत्‍साह नहीं रहा , पर दूर दराज से पूरे गांव में सबके घर मेहमान मेला देखने के लिए पहुंच जाते हैं। अनजान लोगों से भरे भीड वाले वातावरण में हमलोगों को लेकर अभिभावक कुछ सशंकित भी रहते , पर एक सप्‍ताह तक हमलोगों का उत्‍साह बना रहता। ग्रुप बनाकर ही सही , पर मेले में आए सर्कस से लेकर झूलों तक और मिठाइयों से लेकर चाट पकौडों तक का आनंद हमलोग अवश्‍य लेते।

वर्ष 1982 में के बी वूमेन्‍स कॉलेज , हजारीबाग में ग्रेज्‍युएशन करते हुए चतुर्थ वर्ष में पहली बार सरस्‍वती पूजा के आयोजन का भार हमारे कंधे पर पडा था। इस जिम्‍मेदारी को पाकर हम दस बीस लडकियां अचानक बडे हो गए थे और पंद्रह दिनों तक काफी तैयारी के बाद हमलोगों ने सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम को बहुत अच्‍छे ढंग से संपन्‍न किया था। वो उत्‍साह भी आजतक नहीं भूला जाता। आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं , सबों को सरस्‍वती पूजा की शुभकामनाएं !!

मिथ्‍या भ्रम (कहानी) ... संगीता पुरी

hamari kahani

‘क्‍या हुआ, ट्रेन क्‍यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए पूछा। ’अरे, तुम सो गयी क्‍या ? देखती नहीं , बोकारो आ गया।‘ बोकारो का नाम सुनते ही वह चौंककर उठी। तीन दिनों तक बैठे बैठे कमर में दर्द सा हो रहा था। कब से इंतजार कर रही थी वह , अपने गांव पहुंचने का , इंतजार करते करते तुरंत ही आंख लग गयी थी। अब मंजिल काफी नजदीक आ गयी थी। उसने अपने कपडे समेटे , मोनू को संभाला और सीट पर एक नजर डालती हुई ट्रेन से उतरने के लिए क्‍यू में खडी हो गयी।


दस वर्षों बाद वह मद्रास से वापस आ रही थी। गांव आने का कोई बहाना इतने दिनों तक नहीं मिल रहा था। गांव का मकान भी इतने दिनों से सूना पडा था। अपने अपने रोजगार के सिलसिले में सब बाहर ही जम गए थे। पर इस बार चाचाजी की जिद ने उन सबके लिए गांव का रास्‍ता खोल ही दिया था। वे अपने लडके की शादी गांव से ही करेंगे। सबके पीछे वह सामानों को लेकर ट्रेन से उतर पडी। एक टैक्‍सी ली और गांव के रास्‍ते पर बढ चली।

टैक्‍सी जितनी ही तेजी से अपने मंजिल की ओर जा रही थी , उतनी ही तेजी से वह अतीत की ओर। मद्रास के महानगरीय जीवन को जीती हुई वह अबतक जिस गांव को लगभग भूल ही चली थी , वह अचानक उसकी आंखों के सामने सजीव हो उठा था। घटनाएं चलचित्र के समान चलती जा रही थी। उछलते कूदते , उधम मचाते उनके कदम .. कभी बाग बगीचे में तो कभी खेल के मैदानों में। अपना लम्‍बा चौडा आंगन भी उन्‍हें धमाचौकडी में मदद ही कर देता था।

खेलने का कोई साधन नहीं , फिर भी खेल में इतनी विविधता। जो मन में आया, वही खेल लिया। खेल के लिए कार्यक्रम बनाने में उसकी बडी भूमिका रहती। वास्‍तविक जीवन में जो भी होते देखती , खेल के स्‍थान पर उतार लेती थी। घर के कुर्सी , बेंच , खाट और चौकी को गाडी बनाकर यात्रा का आनंद लेने का खेल बच्‍चों को खूब भाता था। कोई टिकट बेचता , कोई ड्राइवर बनता , तो कोई यात्री। रूट की तो कोई चिंता ही नहीं थी , उनकी मनमौजी गाडी कहीं से कहीं पहुंच सकती थी।

तब सरकार की ओर से परिवार नियोजन का कार्यक्रम जोरों पर था। भला उनके खेल में यह कैसे शामिल न होता। कुर्सी पर डाक्‍टर , बेंच पर उसके सहायक और खाट चौकी पर लेटे हुए मरीज । चाकू की जगह चम्‍मच , पेट काटा , आपरेशन किया , फटाफट घाव ठीक , एक के बाद एक मरीज का आपरेशन। भले ही अस्‍पताल के डाक्‍टर साहब का लक्ष्‍य पूरा न हुआ हो , पर उन्‍होने तो लक्ष्‍य से अधिक काम कर डाला था।

इसी तरह गांव में एक महायज्ञ का आयोजन हुआ। यज्ञ के कार्यक्रम को एक दिन ही देख लेना उनके लिए काफी था। अपने आंगन में यज्ञ का मंडप तैयार बीच में हवन कुंड और चारो ओर परिक्रमा के लिए जगह । मुहल्‍ले के सारे बच्‍चे हाथ जोडे हवनकुंड की परिक्रमा कर रहे थे और ‘श्रीराम , जयराम , जय जय राम, जय जय विघ्‍न हरण हनुमान’ के जयघोष से आंगन गूंज रहा था। कितना स्‍वस्‍थ माहौल था , बच्‍चे भी खुश रहते थे और अभिभावक भी।

लेकिन इसी क्रम में उसे एक बच्‍चे दीपू की याद अचानक आ गयी। जब सारे बच्‍चे खेल रहे होते , वह एक किनारे खडा उनका मुंह तक रहा होता। ‘दीपू , तुम भी आ जाओ’ उसे बुलाती , तो धीरे धीरे चलकर उनके खेल में शामिल होता। पर दीपू को शामिल करके खेलना शुरू करते ही तुरंत रानी को कुछ याद आ जाता और वह दौडकर घर के एक खास कमरे में जाती। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही होता। दीपू की मम्‍मी उस कमरे में फरही बना रही होती। अपनी कला में पारंगत वह छोटे छोटे चावल को मिट्टी के बरतन में रखे गरम रेत में तल तलकर निकाल रही होती।

उसकी दिलचस्‍पी चावल के फरही में कम होती , इसलिए वह अंदर जाकर चने निकाल लाती। ’काकी, इन चनों को तल दो ना’ वह उनसे आग्रह करती। ’इतनी जल्‍दी तलने से ये कठोर हो जाएंगे और इन्‍हे खाने में तुम्‍हारे दांत टूट जाएंगे, थोडी देर सब्र करो।‘ वह चने में थोडे नमक , हल्‍दी और पानी डालकर उसे भीगने को रख देती। अब भला उसका खेल में मन लग सकता था। हर एक दो मिनट में अंदर आती और फिर निराश होकर बाहर आती , लेकिन कुछ ही देर में उसे सब्र का सोंधा नमकीन फल मिल जाता और चने के भुंजे को सारे बच्‍चे मिलकर खाते। इस तरह शायद ही कभी दीपू को उनके साथ खेलने का मौका मिल पाया हो।

टैक्‍सी अब उसके गांव के काफी करीब आ चुकी थी। रबी के फसल खेतों में लहलहा रहे थे। बहुत कुछ पहले जैसा ही दिखाई पड रहा था। शीघ्र ही गांव का ब्‍लाक , मिड्ल स्‍कूल , बस स्‍टैंड , गांव का बाजार , सब क्रम से आते और देखते ही देखते आंखो से ओझल भी होते जा रहे थे। थोडी ही देर में उसका मुहल्‍ला भी शुरू हो गया था। बडे पापा का मकान , रमेश की दुकान, हरिमंदिर , शिवमंदिर , सबको देखकर खुशी का ठिकाना न था।

पर एक स्‍थान पर अचानक तीनमंजिला इमारत को देखकर उसके तो होश उड गए। यह मकान पहले तो नहीं था। फिर उसे दीपू की याद आ गयी। इसी जगह तो दीपू का छोटा सा दो कमरों का खपरैल घर था , जिसके बाहरवाले छोटे से कमरे को ड्राइंग , डाइनिंग या किचन कुछ भी कहा जा सकता था तथा उसी प्रकार अंदरवाले को बेडरूम , ड्रेसिंग रूम या स्‍टोर। यहां पर इस मकान के बनने का अर्थ यही था कि दीपू के पापा ने अपनी जमीन किसी और को बेच दी, क्‍यूंकि वे लोग काफी गरीब थे और इतनी जल्‍दी उनकी सामर्थ्‍य तीनमंजिला मकान बनाने की नहीं हो सकती थी।

घर पहुंचने से ठीक पहले उसका मन बहुत चिंतित हो गया था। पता नहीं वे लोग अब किस हालत में होंगे । दीपू के पापा तो बेरोजगार थे , उसकी मम्‍मी ही दिनभर भूखी , प्‍यासी , अपने भूख को तीन चार कप चाय पीकर शांत करती हुई लोगों के घरों में फरही बनाती अपने परिवार की गाडी को खींच रही थी। बृहस्‍पतिवार को वे भी बैठ जाती थी , क्‍यूंकि गांव में इस दिन चूल्‍हे पर मिट्टी के बरतन चढाना अशुभ माना जाता है। कहते हैं , ऐसा करने से लक्ष्‍मी घर से दूर हो जाती है , धन संपत्ति की हानि होती है।

एक दिन बैठ जाना दीपू की मम्‍मी के लिए बडी हानि थी। कुछ दिनों तक उन्‍होने इसे झेला , पर बाद में एक रास्‍ता निकाल लिया। अब वे बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाती मिलती , जो उनके घर से सप्‍ताहभर की बिक्री के लिए काफी होता। ’काकी , तुम अपने घर में बृहस्‍पतिवार को मिट्टी के बर्तन क्‍यू चढाती हो ? ‘ वह अक्‍सर उनसे पूछती। उनके पास जबाब होता ‘ बेटे , मुझे घरवालों के पेट भरने की चिंता है , मेरे पास कौन सी धन संपत्ति है , जिसे बचाने के लिए मुझे नियम का पालन करना पडे’ तब उसका बाल मस्तिष्‍क उनकी इन बातों को समझने में असमर्थ था।

पर अभी उसका वयस्‍क वैज्ञानिक मस्तिष्‍क दुविधा में पड गया था। ’क्‍या जरूरत थी , दीपू के मम्‍मी को बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाने की , लक्ष्‍मी सदा के लिए रूठ गयी , जमीन भी बेचना पड गया , अपनी जमीन बेचने के बाद न जाने वे किस हाल में होंगी , दीपू भी न जाने कहां भटक रहा होगा’ सोंचसोंचकर उसका मन परेशान हो गया था। टैक्‍सी के रूकते ही वे लोग घर के अंदर गए , परसों ही शादी थी , लगभग सारे रिश्‍तेदार आ चुके थे , इसलिए काफी चहल पहल थी। मिलने जुलने और बातचीत के सिलसिले में तीन चार घंटे कैसे व्‍यतीत हो गए , पता भी न चला।

अब थोडी ही देर में रस्‍मों की शुरूआत होने वाली थी। चूंकि घर में रानी ही सबसे बडी लडकी थी , उसे ही गांव के सभी घरों में औरतों को रस्‍म में सम्मिलित होने के लिए न्‍योता दे आने की जबाबदेही मिली। वह दाई के साथ इस काम को करने के लिए निकली। सबों के घर तो जाने पहचाने थे , पर सारे लोगों में से कुछ आसानी से पहचान में आ रहे थे , तो कुछ को पहचानने के लिए उसके दिमाग को खासी मशक्‍कत करनी पड रही थी।

एक मकान से दूसरे मकान में घूमती हुई वह आखिर उस मकान में पहुच ही गयी, जिसने चार छह घंटे से उसे भ्रम में डाल रखा था। इस मकान के बारे में उसने दाई से पूछा तो वह भाव विभोर होकर कहने लगी ‘अरे , दीपू जैसा होनहार बेटा भगवान सबको दे। उसने व्‍यापार में काफी तरक्‍की की और शोहरत भी कमाया। उसने ही यह मकान बनवाया है। इस बीच पिताजी तो चल बसे , पर अपनी मां का यह काफी ख्‍याल रखता है। अभी तीन चार महीने पूर्व इसका ब्‍याह हुआ है।

पत्‍नी भी बहुत अच्‍छे घर से है‘ दाई उसकी प्रशंसा में अपनी धुन में कुछ कुछ बोले जा रही थी और वह आश्‍चर्यचकित उसकी बातों को सुन रही थी। हां, उसके वैज्ञानिक मस्तिष्‍क को चुनौती देनेवाला एक मिथ्‍याभ्रम टूटकर जरूर चकनाचूर हो चुका था।