क्या ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास? इस ब्लॉग में आप ज्योतिष के आधुनिक सूत्रों से सम्बद्ध नवीन ज्योतिषीय सिद्धांत के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे, जो ज्योतिष की सटीकता पर शोध, ज्योतिष में नए शोध और निष्कर्ष के उपरांत विकसित किया गया है, नए ज्योतिष सूत्रों के माध्यम से कुंडली विश्लेषण, इन ज्योतिष के नए नियमों से भविष्यवाणी कैसे करें, 'ज्योतिष सीखने के लिए नए सूत्र और विधियाँ बताई गयी हैं।
सभी पाठकों को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं !!
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
तभी तो धूम होती है ... मेहंदी लगाके रखना !!
मेहंदी लिथेसिई कुल का काँटेदार आठ दस फुट तक ऊंचा झाडीनुमा पौधा होता है , जिसका वैज्ञानिक नाम लॉसोनिया इनर्मिस है। इसे त्वचा, बाल, नाखून, चमड़ा और ऊन रंगने के काम में प्रयोग किया जाता है। जंगली रूप से यह ताल तलैयों के किनारे उगता है , पर इसकी टहनियों को काटकर भूमि में गाड़ देने से भी बाग बगीचे में नए पौधे लगाए जाते हैं। हमारे यहां मेहंदी के बिना श्रृंगार अधूरा माना जाता है, विवाह के अवसर पर भी मेहंदी की रस्म होती है। इसे प्रेम व सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. मेहंदी के महत्व को ध्यान में रखते हुए हल्के हरे रंग का नाम ही मेहंदी रंग दिया गया है। यहां तक कि एक जलप्रपात को इसलिए मेहंदी कुंड के नाम से बुलाया जाता है , क्यूंकि जल प्रपात (झरने) के आसपास की पहाडियां हरी-भरी होने से उनकी परछाई के कारण कुंड का रंग हरा दिखाई देता है।
मेहंदी को शरीर को सजाने का एक साधन के रूप में दक्षिण एशिया में उपयोग किया जाता रहा है। यह परंपरा ग्यारहवीं सदी से पहले से भारतीय समाज में चली आ रही है. १९९० के दशक से ये पश्चिमी देशों में भी चलन में आया है। इसकी छोटी चिकनी पत्तियों को पीसकर एक प्रकार का लेप बनाते हैं, जिसे स्त्रियाँ नाखून, हाथ, पैर तथा उँगलियों पर लगा लेती हैं। कुछ घंटों के बाद धो देने पर लगाया हुआ स्थान मैरून लाल रंग में रंग जाता है जो तीन चार सप्ताह तक नहीं छूटता। पत्तियों को पीसकर रखने से भी रंग देने वाला लेप तैयार किया जा सकता है। 16 श्रंगार में मेहंदी का विशेष महत्व है.
सावन का महीना तो मेहंदी के लिए खास है , चूंकि श्रावण माह को मधुमास भी कहा जाता है, इसलिए इस माह में महिलाएं विशेषकर मेहंदी लगाती हैं. इसका धार्मिक, सामाजिक महत्व के साथ-साथ आयुर्वेद से भी संबंध है. आध्यात्मिक आख्यान के अनुसार पार्वती ने इसी माह में शंकर को प्रसन्न कर उन्हें पति रूप में प्राप्त किया था. करीब एक दशक पूर्व गांवों में मेहंदी की पत्तियां तोड़ कर जमा कर इसे सिलौटी-लोढ़ी से पीसा जाता था , अधिक रंग आने के लिए इसमें कत्था, चाय का पानी , नींबू का रस आदि मिलाया जाता था, मेहंदी लगाने के दौरान मेहंदी के गीत गाये जाते थे. सावन में बरसात के कारण उत्पन्न होने वाली कई प्रकार की बीमारियों में मेहंदी का उपयोग काफी लाभदायक होता है. बरसात के दिनों में पैर-हाथ में पानी लग जाने पर अभी भी गांव में जानकार किसान व मजदूर मेहंदी लगाते हैं.
मेहंदी लगाना एक कला है। इस कला ने राजस्थान और उत्तर भारत में काफी उन्नति की है। लगभग हर शहर में मेहंदी लगाने की प्रतियोगिता होती है। आजकल इस क्षेत्र में भी रोजगार उपलब्ध हो गए हैं। पहले यह सिर्फ महिलाओं का काम हुआ करता था , अब पुरूष भी इस क्षेत्र में आ गए हैं। आजकल मेहंदी पार्लरों में विशेषज्ञों की फी बहुत अधिक होती है। पहले बारीक पिसी हुई गीली मेहंदी में सीक डुबोकर हाथों में सुंदर डिजाइन बनाए जाते थे , कुछ दिन बाजार में प्लास्टिक के सॉचे मिलने लगे , जिसमें मेहंदी को लगाने से डिजाइन अपने आप उग आती थी। उसके बाद कुप्पियां बनाकर मेहंदी लगाने की परंपरा चली। अब बाजार में बनी बनायी कुप्पियां मिलती हैं , जिससे मेहंदी लगाना काफी आसान हो गया है। बाजार में डिजाइन की पुस्तकों के भी भंडार हैं।
आयुर्वेद के हिसाब से मेहंदी कफ-पित्त शामक होती है. मसूड़े के ऐसे असाध्य रोग, जो दूसरी औषधियों से न मिटते हों, मेहंदी के पत्तों के उबले हुए पानी से कुल्ला करने से मिट जाते हैं। मेहंदी को उबालकर उसके पानी से कुल्ले करने से जहां मुंह के छाले मिटते हैं , वहीं धोने से फोड़े-फुन्सी में लाभ होता है। गर्मी और बरसात के उमस भरे मौसम में पीठ और गले पर व शरीर की नरम त्वचा पर घुमौरियां होने लगती हैं। मेहंदी के लेप से एकदम उनकी जलन मिटकर लाभ हो जाता है। मेहंदी के पत्ते, आंवला, जरा-सी नील दूध में पीसकर बालों पर लगाने से लाभ होता है। इसके फूलों को सुखाकर सुगंधित तेल भी निकाला जाता है। इसपौधे की छाल तथा पत्तियाँ दवा में प्रयुक्त होती हैं।
पिछले कुछ वर्षो में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तैयार रेडीमेड मेहंदी ने बाजार पर कब्जा कर लिया है। दुकानों में उपलब्ध मेहंदी केमिकल का बना होता है. इसका शरीर को कोई लाभ नहीं मिलता. रंग भी बनावटी होता है. अर्थात गाढ़ा लाल, जो काले रंग के करीब होता है.पीसी हुई मेहंदी लगाने का जो शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता था, वह आज की मेहंदी में नहीं है।.प्राकृतिक मेहंदी की ललाई में जो नजर को खींचने की ताकत थी, वह रेडीमेड मेहंदी की कालिमायुक्त लाली में कहां से होगी , पर आसान उपलब्धता तथा लगाने में सुगमता रेडीमेड मेहंदी को सर्वप्रिय बना रहा है.
आजकल रेग्युलर मेहंदी की जगह ज्वेलरी मेहंदी भी प्रचलन में हैं , जिसे ज्वेलरी और मेहंदी से मिलाकर बनाया गया है। इसमें आर्टिस्ट आपकी ड्रेस के डिजाइन का खास हिस्सा कॉपी करके हूबहू आपके हाथों पर बना सकता है। इसके लिए मेहंदी, स्पार्कल, कलर्स, सितारे, मोती, चांदी व सोना वगैरह यूज किया जाता है। अगर आपकी ड्रेस पर सितारे व मोती हैं, तो इन्हें भी मेहंदी में लगवा सकती हैं। इसे किसी विशेष पार्टी या शादी के मौके पर बनवाया जा सकता है। इसे लगाने के लिए हाथों पर स्किन से मैच करता हुआ बेस कोट लगाया जाता है। फिर इसे सीलर से सील कर दिया जाता है, ताकि आपका डिजाइन देर तक टिका रहे। तभी तो धूम होती है ... मेहंदी लगाके रखना !!
मेहंदी को शरीर को सजाने का एक साधन के रूप में दक्षिण एशिया में उपयोग किया जाता रहा है। यह परंपरा ग्यारहवीं सदी से पहले से भारतीय समाज में चली आ रही है. १९९० के दशक से ये पश्चिमी देशों में भी चलन में आया है। इसकी छोटी चिकनी पत्तियों को पीसकर एक प्रकार का लेप बनाते हैं, जिसे स्त्रियाँ नाखून, हाथ, पैर तथा उँगलियों पर लगा लेती हैं। कुछ घंटों के बाद धो देने पर लगाया हुआ स्थान मैरून लाल रंग में रंग जाता है जो तीन चार सप्ताह तक नहीं छूटता। पत्तियों को पीसकर रखने से भी रंग देने वाला लेप तैयार किया जा सकता है। 16 श्रंगार में मेहंदी का विशेष महत्व है.
सावन का महीना तो मेहंदी के लिए खास है , चूंकि श्रावण माह को मधुमास भी कहा जाता है, इसलिए इस माह में महिलाएं विशेषकर मेहंदी लगाती हैं. इसका धार्मिक, सामाजिक महत्व के साथ-साथ आयुर्वेद से भी संबंध है. आध्यात्मिक आख्यान के अनुसार पार्वती ने इसी माह में शंकर को प्रसन्न कर उन्हें पति रूप में प्राप्त किया था. करीब एक दशक पूर्व गांवों में मेहंदी की पत्तियां तोड़ कर जमा कर इसे सिलौटी-लोढ़ी से पीसा जाता था , अधिक रंग आने के लिए इसमें कत्था, चाय का पानी , नींबू का रस आदि मिलाया जाता था, मेहंदी लगाने के दौरान मेहंदी के गीत गाये जाते थे. सावन में बरसात के कारण उत्पन्न होने वाली कई प्रकार की बीमारियों में मेहंदी का उपयोग काफी लाभदायक होता है. बरसात के दिनों में पैर-हाथ में पानी लग जाने पर अभी भी गांव में जानकार किसान व मजदूर मेहंदी लगाते हैं.
मेहंदी लगाना एक कला है। इस कला ने राजस्थान और उत्तर भारत में काफी उन्नति की है। लगभग हर शहर में मेहंदी लगाने की प्रतियोगिता होती है। आजकल इस क्षेत्र में भी रोजगार उपलब्ध हो गए हैं। पहले यह सिर्फ महिलाओं का काम हुआ करता था , अब पुरूष भी इस क्षेत्र में आ गए हैं। आजकल मेहंदी पार्लरों में विशेषज्ञों की फी बहुत अधिक होती है। पहले बारीक पिसी हुई गीली मेहंदी में सीक डुबोकर हाथों में सुंदर डिजाइन बनाए जाते थे , कुछ दिन बाजार में प्लास्टिक के सॉचे मिलने लगे , जिसमें मेहंदी को लगाने से डिजाइन अपने आप उग आती थी। उसके बाद कुप्पियां बनाकर मेहंदी लगाने की परंपरा चली। अब बाजार में बनी बनायी कुप्पियां मिलती हैं , जिससे मेहंदी लगाना काफी आसान हो गया है। बाजार में डिजाइन की पुस्तकों के भी भंडार हैं।
आयुर्वेद के हिसाब से मेहंदी कफ-पित्त शामक होती है. मसूड़े के ऐसे असाध्य रोग, जो दूसरी औषधियों से न मिटते हों, मेहंदी के पत्तों के उबले हुए पानी से कुल्ला करने से मिट जाते हैं। मेहंदी को उबालकर उसके पानी से कुल्ले करने से जहां मुंह के छाले मिटते हैं , वहीं धोने से फोड़े-फुन्सी में लाभ होता है। गर्मी और बरसात के उमस भरे मौसम में पीठ और गले पर व शरीर की नरम त्वचा पर घुमौरियां होने लगती हैं। मेहंदी के लेप से एकदम उनकी जलन मिटकर लाभ हो जाता है। मेहंदी के पत्ते, आंवला, जरा-सी नील दूध में पीसकर बालों पर लगाने से लाभ होता है। इसके फूलों को सुखाकर सुगंधित तेल भी निकाला जाता है। इसपौधे की छाल तथा पत्तियाँ दवा में प्रयुक्त होती हैं।
पिछले कुछ वर्षो में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तैयार रेडीमेड मेहंदी ने बाजार पर कब्जा कर लिया है। दुकानों में उपलब्ध मेहंदी केमिकल का बना होता है. इसका शरीर को कोई लाभ नहीं मिलता. रंग भी बनावटी होता है. अर्थात गाढ़ा लाल, जो काले रंग के करीब होता है.पीसी हुई मेहंदी लगाने का जो शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता था, वह आज की मेहंदी में नहीं है।.प्राकृतिक मेहंदी की ललाई में जो नजर को खींचने की ताकत थी, वह रेडीमेड मेहंदी की कालिमायुक्त लाली में कहां से होगी , पर आसान उपलब्धता तथा लगाने में सुगमता रेडीमेड मेहंदी को सर्वप्रिय बना रहा है.
आजकल रेग्युलर मेहंदी की जगह ज्वेलरी मेहंदी भी प्रचलन में हैं , जिसे ज्वेलरी और मेहंदी से मिलाकर बनाया गया है। इसमें आर्टिस्ट आपकी ड्रेस के डिजाइन का खास हिस्सा कॉपी करके हूबहू आपके हाथों पर बना सकता है। इसके लिए मेहंदी, स्पार्कल, कलर्स, सितारे, मोती, चांदी व सोना वगैरह यूज किया जाता है। अगर आपकी ड्रेस पर सितारे व मोती हैं, तो इन्हें भी मेहंदी में लगवा सकती हैं। इसे किसी विशेष पार्टी या शादी के मौके पर बनवाया जा सकता है। इसे लगाने के लिए हाथों पर स्किन से मैच करता हुआ बेस कोट लगाया जाता है। फिर इसे सीलर से सील कर दिया जाता है, ताकि आपका डिजाइन देर तक टिका रहे। तभी तो धूम होती है ... मेहंदी लगाके रखना !!
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
इतने दिनो बाद भी दिलों के मध्य फासला न बना ..यही क्या कम है ??
हमने तो बहुत दिनों तक अपने हाथो से भाइयों को राखी बांधी , आजकल की बहनें तो शुरू से ही पोस्ट से राखी भेजने या ग्रीटींग्स कार्ड के द्वारा राखी मनाने को मजबूर हैं, भाई साथ रहते ही कितने दिन हैं ?? बहनों के लिए वो दिन तो अब लौट नहीं सकते , जब संयुक्त परिवार हुआ करते थे और राखी बंधवाने के लिए भाई क्यू में खडे रहते थे। जहां एक ओर सुबह से स्नान कर पूजा कर भूखी प्यासी बहने राखी की तैयारी में लगी होती , वहीं दूसरी ओर भाई भी स्नान कर बिना खाए पीए ही राखी के इंतजार में बैठे होते। एक एक कर सभी बहनें सभी भाइयों को , चाहे वो संख्या में कितने भी क्यूं न हों , टीके लगाती , राखी बांधती और मिठाईयां खिलाती। बदले में भाई बहनों को वो नोट थमाते , जो एक एक भाइयों के लिए उनकी माताओं ने उन्हें दिए होते। आज के दिन मिठाइयों की खपत की तो पूछिए मत , एक एक भाई के हिस्से दस , बारह , पंद्रह मिठाइयां तो होनी ही चाहिए। यहां तक कि पडोसी के बच्चे भी राखी बंधवाने आ जाया करते , इसलिए आज घर में भरपूर मिठाई रखनी पडती थी। भाइयों को इतनी मिठाइयां खाते देख बहनें और बहनों को नोट गिनते देख भाई ललचते रहते।
गांव में तो बढे हुए ऑर्डर को पूरा करने के लिए खोए की कमी हो जाती और हलवाई इस खास त्यौहार पर मिठाइयों के साइज और क्वालिटी में काफी कटौती करते। इसलिए महिलाएं कई दिनों से ही घर मे खपत होनेवाले दूध के खोए बनाकर हल्की फुल्की मिठाइयां या पेडा बना लिया करती थी। चूंकि घर में पेडे का सांचा नहीं होता , गोल पेडे बनाकर उसे गुल के डब्बे के ढक्कन से दबा दिया जाता , जिससे उसके ऊपर कलात्मक डिजाइन बन जाता। उस जमाने में मंजन के रूप में गुल का प्रयोग लगभग हर घर के मर्द करते थे । मिठाई की कमी के कारण ही बाजार का कम से कम सामान प्रयोग करनेवाले हमारे परिवार में गुलाबजामुन बनाने वाली गिट्स की पैकेट का उसी जमाने से उपयोग आरंभ कर दिया गया था। इसके साथ ही मिठाइयों के लिए हलवाई पर निर्भर रहने की बाध्यता कम हो गयी थी।
शादी के बाद शायद एकाध बार राखी में मायके में रहना हो सका हो , पर कई वर्षों तक ससुराल में कोई न कोई भाई आकर राखी बंधवा ही लेता था , दूरी भी तो अधिक नहीं थी , 30 कि मी होते ही कितने हैं ?? पर अब हमारे शहरों के मध्य का फासला जितना है , उससे अधिक दूरी रोजगार के क्षेत्र में चलने वाली प्रतिस्पर्धा ने बना रखी है। पिछले कई वर्षों से राखी का त्यौहार यूं ही आता और चला जाता है , डाक विभाग या कूरियर सर्विस के द्वारा राखी भाइयों तक पहुंचाकर जहां एक ओर मै , वहीं दूसरी ओर सभी भाई भी राखी वाले दिन एक फोन कर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। राखी के दस दिन पहले मैं खुद भाइयों के पास से चली आयी , उन्हें क्या कहूं ?? शादी विवाह और घर गृहस्थी के बाद अपनी अपनी जबाबदेही में व्यस्त रहना ही पडेगा । कोई जरूरत आ पडी तो हम एक दूसरे को समय दे देते हैं , यही बहुत है। इतने दिनो बाद भी दिलों के मध्य फासला न बना , यही क्या कम है ??
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अखबार में नाम ..... बधाई तो बनती ही है !!!!!!
अखबार में अपना भी नाम आए , इसकी इच्छा भला किसे न होगी ?? जनसामान्य की इस मानसिकता को लेखक यशपाल जी ने अच्छे से समझा था और एक सफल कहानी 'अखबार में नाम' लिख डाला था। इस कहानी के नायक गुरदास को बचपन से ही अखबार में अपना नाम देखने का शौक था। वह समाज में अपने-आप को किसी अनाज की बोरी के करोड़ों एक ही से दानों में से एक साधारण दाने से अधिक अनुभव न कर पाता था। ऐसा दाना कि बोरी को उठाते समय वह गिर जाये तो कोई ध्यान नहीं देता। उम्र के साथ ही साथ अखबार में अपना नाम देखने की इच्छा बढती जा रही थी। अंत में उस बेचारे के साथ क्या हुआ , यह तो आप यशपाल जी की इस कहानी को पढकर जान ही लेंगे , पर यह तो निश्चित है कि lनाम कमाने की इच्छा मनुष्य के मन में हमेशा हावी रहती है।
विद्यार्थी जीवन में तो किसी पत्र पत्रिकाओं में अपना नाम आने की बहुत कम गुंजाइश थी ,क्यूंकि हमारी पढाई लिखाई सरकारी स्कूलो कॉलेजों में हुई थी और उन्हें आज के प्राइवेट स्कूलों कॉलेजों की तरह विद्यार्थियों की छोटी मोटी उपलब्धियों की चर्चा करके उसके सहारे अपना विज्ञापन करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। हां , कभी कभी कुछ हमारे स्कूल के कुछ सांसकृतिक कार्यक्रमों की चर्चा समाचार पत्रों में अवश्य होती थी , पर मैं न तो खेल कूद में अच्छी थी और ही अपने नाम के अनुरूप संगीत और नृत्य मे। विद्यार्थी जीवन से भी मेरे भाषण वक्ताओं पर अच्छा छाप छोडते थे , पर अखबारों में इसकी चर्चा शायद ही कभी होती हो। हर शहर से तो तब अखबार निकलते नहीं थे कि छोटे मोटे कार्यक्रमों की इतने विस्तार से चर्चा हो।
'गत्यात्मक ज्योतिष' की जानकारी के बाद 1990 से ही मै विभिन्न ज्योतिषीय पत्र पत्रिकाओं में लिखने लगी थी , पर इससे सिर्फ ज्योतिषियों के मध्य ही अपनी पहचान बन सकती थी। 'गत्यात्मक ज्योतिष' के सहारे समाज में फैली ज्योतिषीय भ्रांतियों और अंधविश्वास को दूर करने के उद्देश्य से आम जन के मध्य अपनी पहचान बनाना आवश्यक था। इसके लिए विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अपने लेख प्रकाशित करवाना आवश्यक था। कई बार अखबारों को अपने लेख भेजें , पर शायद वो वहां की रद्दी की टोकरी में ही डाल दिए गए होंगे। फिर मुझे दिल्ली में चलनेवाले एक फीचर्स के बारे में पता चला। जब मैने अपने लेख वहां भेजने शुरू किए , तो उन्होने उसे देशभर के अखबारों में छपवाना शुरू किया , जो तीन चार वर्षों तक चला। बाद में मैं अपने सॉफ्टवेयर बनाने में व्यस्त हुई और लिखने का सिलसिला ही कम हो गया।
जब से ब्लॉग लिखना आरंभ किया है , यत्र तत्र समाचार पत्रों में मेरे लेख प्रकाशित होते रहते हैं। हालांकि अभी तक शायद ही किसी ब्लॉगर को आर्थिक तौर पर फायदा हुआ हो, फिर भी अपनी पहचान बनते देख काफी खुशी होती है। कल जब इत्ते बडे समाचार पत्र पर अपना नाम प्रकाशित देखा , तो मेरी खुशी का अंदाजा आप लगा सकते हैं। सबसे पहले पाबला जी ने मुझे बताया कि न्यूयार्क टाइम्स में Indian Women Bloggers Find Their Voice, in Their Own Language नामक शीर्षक के अंतर्गत घुघूती बासूती, अर्चना चावजी, रश्मि स्वरूप, निर्मला कपिला जी के साथ मेरा नाम भी आया है। सबों को बधाई और शुभकामनाएं । उसके बाद मेरे पास भी कई बधाई संदेश आए , बधाई तो बनती ही है !!
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अपने हिस्से का सुख (कहानी) .... संगीता पुरी
hamari kahani
मात्र एक खबर से पूरे घर में सन्नाटा पसर गया था। सुबह एक्सीडेंट के बाद से ही सबके कान समय समय पर फोन पर होनेवाले बातचीत में ही लगे थे , इसलिए फोन रखते हुए 'मामाजी नहीं रहें' कहनेवाले पुलकित के धीमे से स्वर को सुनने में मां को तनिक भी देर न लगी और वह तुरंत बेहोश होकर गिर पडी। हमारे बहुत कोशिश करने पर ही वह होश में आ सकी , अपने इकलौते भाई की मौत का सदमा झेल पाना आसान तो न था। अभी उम्र ही क्या हुई थी , अभी नौकरी के भी दस साल बचे ही थे यानि मात्र 50 के ही थे वे। मेरे हाथ भले ही मम्मी को पंखा झल रहें हो , पर मन में विचारों का द्वन्द्व चल ही रहा था।
चार वर्ष पूर्व बोर्ड की परीक्षा पास करने के बाद मेरे समक्ष आगे की पढाई जारी रखने का कोई उपाय न था। ऐसे में मामाजी ने मुझे अपने पास शहर में बुलवाकर एक कॉलेज में मेरा नामांकन करवा दिया था। इस तरह अपनी पढाई के सिलसिले में मामाजी के परिवार से पिछले चार वर्षों से जुडी हुई थी मैं। उस घर की एक एक परेशानी से वाकिफ। वे शहर में रहते थे , बस इस बात को लेकर गांव वालों को भले ही उनसे प्रतिस्पर्धा रहती हो , पर वास्तव में उनकी स्थिति उतनी मजबूत भी नहीं थी। सरकारी नौकरी करने वाले सामान्य कर्मचारियों को तनख्वाह ही कितनी मिलती है ??
उतने में ही मामाजी तीन बच्चों के अपने पांच सदस्यीय परिवार को ही नहीं , साथ साथ नाना जी और नानी जी की जबाबदेही हमेशा संभालते आए थे। मेरे सामने ही चार वर्ष पहले नाना जी और दो वर्ष पहले नानी जी गुजर चुके थे , परिवार कुछ छोटा तो हो गया था , पर मामाजी के स्वास्थ्य की गडबडी तथा बच्चों की पढाई लिखाई के बढते भार से जीवन की गाडी खींचने में खासी परेशानी हो रही थी। महीने के अंत तक इतनी देनदारी हो जाती कि महीने का तनख्वाह शुरूआत के चार दिन में ही समाप्त हो जाता। अन्य आवश्यकताओं के लिए पूरे महीने खिचखिच होती रहती। अभी एक महीने पहले ही तो परीक्षा देकर मैं उनके यहां से वापस आयी थी।
ग्रेज्युएशन करने के बाद दो तीन वर्षों से बडे भैया नौकरी के लिए दिए जानेवाली परीक्षाओं में जुटे हुए थे। छह महीने के कोचिंग के फी के लिए घर में कितने दिनों तक हंगामा मचा रहा । भैया हर महीने कितने फार्म भरते और परीक्षा देने के लिए हमेशा शहर शहर भटकते , फिर अखबार में परीक्षाफल देखते और निराश सर झुका लेते। मामाजी इतने खर्च के व्यर्थ होने पर झुंझलाते। कर्मचारियों की छंटनी और रिक्तियों की कमी के इस दौर में सामान्य विद्यार्थियों को भला नौकरी मिल सकती है ?? व्यवसाय में रूचि रखनेवाले भैया को नौकरी करने की इच्छा भी न थी , पर व्यवसाय के लिए पूंजी कहां से लाते ?? मामाजी की मजबूरी वे समझते थे , दीदी की शादी भी तो करनी थी । दिन ब दिन तिलक दहेज की बढती मांग के कारण कहीं बात बढ भी नहीं पाती थी।
दो वर्षों से ग्रेज्युएशन करके बैठी दीदी अपने खाली दिमाग का शैतानी उपयोग ही कर रही थी। बात बात में भाइयों से झगड पडती। छोटा भाई इंटर करने के बाद इंजीनियरिंग में एडमिशन लेना चाहता था , ताकि उसे भविष्य में कैरियर को लेकर इतना चिंतित न रहना पडे। पर आर्थिक समस्या यहां भी आडे आ रही थी। मामाजी की पहली प्राथमिकता दीदी की शादी थी , इस कारण इससे पहले वे कहीं भी बडा खर्च करने को तैयार न थे। छोटे भाई का भी एक वर्ष बर्वाद हो गया था , ऐसे दबाबपूर्ण वातावरण में मामाजी और बीमार रहने लगे थे , जिससे हर महीने दवाई का बोझ और बढता जा रहा था।
बढती महंगाई , मामाजी की बीमारी , दोनो भाइयों की महत्वाकांक्षा और दीदी की चिडचिडाहट ... ये सब घर के माहौल को बिगाडने के लिए काफी थे। अब तो किसी प्रकार घर को संभालनेवाले परिवार के एकमात्र कमानेवाले मामाजी ही नहीं रहें , तो अब घर का क्या हाल होगा ?? सोंचकर ही मैं परेशान थी। ऊपर नजर उठाया तो पापा खडे थे , उन्हें भी यह दुखद सूचना मिल चुकी थी। हमने तुरंत मामाजी के यहां निकलने का कार्यक्रम बनाया , उसके लिए पूरी तैयारी शुरू की। मां के बाद इस दुर्घटना का सर्वाधिक बुरा प्रभाव मुझपर ही पडा था , पर मां को लाचार देखते हुए मैने हिम्मत बनाए रखा। तीन चार घंटे का ही तो सफर था , हमें देखते ही मामीजी दहाड मारकर रो पडी। हमलोगों के पहुचने के बाद ही उनका दाह संस्कार हुआ। सारे क्रिया कर्म समाप्त होने तक लगभग सभी नजदीकी मेहमानों की मौजूदगी बनी रही , फिर धीरे धीरे सारे लोग चले गए। वहां की स्थिति को संभाले रहने की जिम्मेदारी मुझपर छोडकर मां भी चली गयी।
वहां रहने पर बातचीत से मालूम हुआ कि प्लांट में डृयूटी के दौरान ही एक एक्सीडेंट में मामाजी की मौत हुई थी , इसलिए कंपनी की ओर से उन्हें कुछ सुविधाएं मिलने की संभावना थी। कंपनी की ओर से एक बेटे को नौकरी देने के लिए ट्रेनिंग की वयवस्था की जानी थी , कंपनी की लापरवाही से हुए मौत के कारण परिवार को क्षतिपूर्ति के चेक भी मिलने थे। बीमा कंपनियों द्वारा भी एकमुश्त राशि मिलनेवाली थी और साथ में मामी जी को कुछ पेंशन भी। इसके लिए महीने दो महीने सबकी दौडधूप चलती रही , फिर धीरे धीरे सारा काम हो गया , छोटे भैया ने दो महीने की ट्रेनिंग के बाद आकर नौकरी ज्वाइन भी कर ली। दीदी के दहेज के लिए रूपए रख मामीजी ने बाकी रूपए बडे भैया को दे दिए। वे तो व्यवसाय करना ही चाहते थे , उनके मन की मुराद पूरी हो गयी। घर का माहौल सामान्य तौर पर ठीक ठाक देखकर मैं वापस लौट गयी।
समय समय पर मामा जी के यहां की खबर मिलती रहती थी , एक भाई व्यवसाय और एक नौकरी में सेट हो ही चुके थे , दहेज की वयवस्था हो जाने से दीदी के विवाह तय होने में देर नहीं लगी थी। हालांकि विवाह होने में अभी देर थी , पर विवाह का नाम सुनते ही मैं खुद को एक बार फिर से वहां जाने से नहीं रोक पायी। भैया का व्यवसाय चल पडा था , भैया की कमाई और दीदी की कुशलता से पूरे घर ही बदला बदला नजर आ रहा था। पूरे घर में हंसीखुशी का माहौल था , मामाजी सबके हिस्से का कष्ट लेकर इस दुनिया से चले गए थे। परिवार के एक एक सदस्य के पास पैसे थे , अभी से विवाह की तैयारी जोर शोर से हो रही थी। सबके चेहरे पर रौनक थी , सब अपने अपने हिस्से का सुख प्राप्त कर रहे थे।
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hamari kahani
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
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