ग्रहों का प्रभावी वर्ष ( भाग . 2 ) .....

लगभग 24 वर्ष की उम्र के बाद अक्‍सरहा लोग पूरे उत्‍साह के साथ जीविकोपार्जन के लिए संघर्ष शुरू कर देते हैं। वे शादी कर पति पत्‍नी भी बन जाते हैं। परंपरागत ज्‍योतिष में मंगल को शक्ति और साहस का प्रतीक ग्रह माना जाता है और यदि मानव जीवन पर ध्‍यान दिया जाए , तो 24 वर्ष की उम्र के बाद शक्ति और साहस की प्रचुरता बनती है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने अपने अध्‍ययन में पाया कि जन्‍मकुंडली में मंगल प्रतिकूल हो , तो जातक का प्रारंभिक दाम्‍पत्‍य जीवन या तो कलहपूर्ण होता है या वे 24 वर्ष की उम्र से 36 वर्ष की उम्र तक बेरोजगार की स्थिति में भटकते रहते हैं। इस अंतराल इनके जीवन में किसी तरह भी स्‍थायित्‍व नहीं आ पाता। जबकि मंगल मजबूत हो तो लोगों को कैरियर में अच्‍छी सफलता मिलती है। इनका दाम्‍पत्‍य जीवन भी सुखद होता है।  परंपरागत ज्‍योतिष शास्‍त्र में भी इस ग्रह को वयस में युवा सेनापति कहा गया है , अत: इस वय में मंगल के काल की पुष्टि हो जाती है।

36 वर्ष की उम्र तक शरीर की सारी ग्रंथियां बनकर तैयार हो जाती है , मनुष्‍य का नैतिक दृष्टिकोण निश्चित हो जाता है। इसलिए भारत के राष्‍ट्रपति बनने के लिए आवश्‍यक शर्त की उम्र 35 वर्ष है। इस उम्र में आते आते व्‍यक्ति को परिवार के प्रति लगाव बढने लगता है , इस वक्‍त जिम्‍मेदारियां भी भरपूर होती हैं। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने अपने अध्‍ययन में पाया कि यदि जन्‍मकालीन शुक्र मजबूत हो , तो जातक 36 वर्ष से 48 वर्ष तक का समय बहुत अच्‍छे एंग से गुजारते हैं , बच्‍चों के प्रति अपनी जिम्‍मेदारियों का निर्वाह आसानी से करने में सफलीभूत होते हैं/ रोजगार में रहनेवालों को अधिक मुनाफा होता है और नौकरी करनेवालों को प्रोन्‍नति मिलती है। यदि शुक्र कमजोर होता है तो जातक इस अवधि में पगतिकूल परिस्थितियों से गुजरना पडता है।

जिन कुंडलियों मे सूर्य बलवान होता है , उनके उत्‍कर्ष का समय 48 से 60 वर्ष तक की अवस्‍था होती है। सूर्य बलवान होने के कारण ही इंदिरा गांधी 48 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बनी और 1977 तक यानि 60 वर्ष की उम्र तक बिना परिवर्तन के डटी रही। इसके विपरीत सूर्य कमजारे हो , तो 48 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र तक जातकों को कई प्रकार की मुसीबत से जूझना पडता है। फलित ज्‍योतिष के प्राचीन ग्रंथो में मंगल को राजकुमार और सूर्य को राजा कहा गया है। मंगल के दशाकाल 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र में पिता बनने की उम्र 24 वर्ष जोड दी जाए , तो वह 48 वर्ष से 60 वर्ष हो जाता है। अत: इसे सूर्य का दशाकाल माना जा सकता है।

प्राचीन ज्‍योतिष में बृहस्‍पति को सृजनशील वृद्ध ब्राह्मण माना जाता है। इसलिए हंस योग के फलीभूत होने की उम्र 60 वर्ष से 72 वर्ष की अवस्‍था  मानी जाती है। सचमुच मानव जीवन में इस उम्र को अत्‍यंत ही बडप्‍पन युक्‍त और प्रभावपूर्ण देखा गया है। जिसकी जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति मजबूत होता है , सेवावनवृत्ति के बाद निश्चिंति से जीवन निर्वाह करते हैं। बृहस्‍पति कमजोर होने पर उनकी जबाबदेहियां सेवानिवृत्ति के पश्‍चात् भी बनी रहती हैं। पं जवाहर लाल नेहरू जी की जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति बहुत मजबूत स्थिति में था नेहरू जी 60 वर्ष की उम्र से 72 वर्ष की उम्र तक लागातार भारत के प्रधानमंत्री बने रहें। इसलिए इस उम्र में बृहस्‍पति के दशाकाल की पुष्टि हो जाती है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने 72 वर्ष की उम्र के बाद मानव जीवन पर शनि का प्रभाव महससू किया है , क्‍यूंकि यदि महात्‍मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की कुंडली पर ध्‍यान दिया जाए , तो यही मिलेगा कि दोनो के ही मारक भाव द्वितीय भाव में शनि स्थित है। इन दोनो महापुरूषों की मृत्‍यु 72 वर्ष की उम्र के बाद हुई। परंपरागत ज्‍योतिष भी शनि को अतिवृद्ध के रूप में स्‍वीकार करता है। शनि बली सभी मनुष्‍य इस उम्र में सुखी होते हैं , जबकि जन्‍मकालीन शनि कमजोर हो तो इस उम्र में वे प्रतिकूल स्थिति में जीने को बाध्‍य होते हैं।

84 वर्ष के बाद 120 वर्ष तक की आयु , जो मनुष्‍य की परमायु बतायी गयी है , का समय तीन ग्रहों यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटों को दिया जा सकता है। इनमें से प्रत्‍येक ग्रह को बारी बारी से 12 - 12 वर्षों का समय दिया जा सकता है। इस प्रकार किसी जातक के उम्र विशेष पर विभिन्‍न ग्रहों का प्रभाव इस प्रकार देखा जा सकता है .........
जन्‍म से 12 वर्षों तक का समय .... बाल्‍यावस्‍था ..... चंद्रमा,
12 से 24 वर्षों तक का समय .... किशोरावस्‍था ...... बुध ,
24 से 36 वर्षों तक का समय ..... युवावस्‍था ...... मंगल,
36 से 48 वर्षों तक का समय .... पूर्व प्रौढावस्‍था ... शुक्र,
48 से 60 वर्षों तक का समय ..... उत्‍तर प्रौढावस्‍था .... सूर्य,
60 से 72 वर्ष तक का समय ..... पूर्व वृद्धावस्‍था .... बृहस्‍पति,
72 से 84 वर्ष तक का समय ..... उत्‍तर वृद्धावस्‍था ..... शनि,

इस प्रकार सभी ग्रह कुंडली में प्राप्‍त बल और स्थिति के अनुसार मानव जीवन में अपनी अवस्‍था विशेष में प्रभाव डालते रहते हैं। लेकिन इन 12 वर्षों में भी प्रथम छह वर्ष और बाद के छह वर्ष में अलग अलग प्रभाव दिखाई देता है। इसके अलावे इन 12 वर्षों में भी बीच बीच में उतार चढाव का आना या छोटे छोटे अंतरालों में खास परिस्थितियों का उपस्थित होने का ज्ञान इस पद्धति से संभव नहीं है। 12 वर्ष के अंतर्गत होनेवाले उलटफेर का निर्णय हम 'लग्‍न सापेक्ष गत्‍यात्‍मक गोचर प्रणाली' से करें , तो दशाकाल से संबंधित सारी कठिनाइयां समाप्‍त हो जाएंगी।

ढेरो शुभकामनाएं !!!!

सभी ग्रहों का दशा काल यानि ग्रहों का प्रभावी वर्ष .....

अबतक की प्रचलित दशा पद्धति , चाहे कितनी भी लोकप्रिय क्‍यूं न हो , लेकिन अबतक ज्‍योतिषियों के सरदर्द का सबसे बडा कारण दशाकाल का निर्णय यानि ग्रहों के प्रभावी वर्ष का निर्णय ही रहा है। भले ही उसकी गणना का आधार स्‍थूल नक्षत्र प्रणाली ही हो। यदि इस तरह की बात न होती , तो शनि महादशा और इसकी ही अंतर्दशा के अंतर्गत शत प्रतिशत ज्‍योतिषियो की आशा के विपरीत 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी पुन: प्रधानमंत्री का पद सुशोभित नहीं करती। इस लेख का उद्देश्‍य पुराने विंशोत्‍तरी या अन्‍य दशा पद्धतियों की आलोचना नहीं , लेकिन इतना निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि एक निश्चित उद्देश्‍य के लिए जब एक नियम पूर्णत: काम नहीं करते , तो उस नियम के पूरक के रूप में दूसरे , तीसरे चौथे .... अनेक नियम बनते चले जाते हैं या बनते चले जाने चाहिए। अभी भी सामान्‍य या उच्‍च कोटि के जितने भी ज्‍योतिषी हैं , चाहे वो जिस दशा पद्धति के अनुयायी हों , अपने तथ्‍य की पुष्टि अन्‍तत: लग्‍न सापेक्ष गोचर प्रणाली (यानि आज के आसमान की स्थिति को देखकर ) से करते हैं।

दशा काल निर्णय के संदर्भ में इस लग्‍न सापेक्ष गोचर प्रणाली को भी अमोघ शस्‍त्र के रूप में स्‍वीकार करने में दिक्‍कतें आती हैं , जैसे एक ग्रह गोचर में अनेक बार अच्‍छे र‍ाशि और भाव में आता है , पर एक राशि और भाव में रहने के बावजूद हर बार मात्रा या गुण के ख्‍याल से समान नहीं होता। जैसे किसी व्‍यक्ति का लग्‍न और राशि मेष हो , तो गोचर काल में जब जब वृष राशि में बलवान चद्रमा आएगा , नियमत: जातक को मात्रा और गुण के संदर्भ में द्वितीय भाव से संबंधित तत्‍वों अर्थात् धन , कोष कुटुम्‍ब आदि के संदर्भ में सुख की अनुभूति होगी। पर जीवन के विस्‍तृत अंतराल में फलित एक जैसा नही होता है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि फलित में यह परिवर्तन ग्रहों की अवस्‍था के अनुसार मनुष्‍य की अवस्‍था पर पडनेवाला प्रभाव है। हम सभी जानते हैं कि लडकपन भोलेपन की जिंदगी होती है। परंतु लडकपन में भोलेपन का कारण किसी भी दशापद्धति के अनुसार दशा और महादशा के हिसाब से भोले ग्रहों का काल नहीं होता। इसी प्रकार विश्‍व के सभी व्‍यक्ति किशोरावस्‍था में ही ज्ञानार्जन करते हैं , चाहे विद्या जिस प्रकार की भी हो , पर दशाकाल के हिसाब से सबकी जन्‍मकुंडली में विद्यार्जन करानेवाले ग्रहों का ही काल नहीं होता है। एक विशेष उम्र में ही लडके और लडकियों में परस्‍पर आकर्षण होता है , वे नियिचत उम्र में ही प्रणय सूत्र में बंधते हैं। दशा अंतर्दशा के हिसाब से कोई औरत वृद्धावस्‍था में प्रजनन नहीं कर पाती है। शारीरिक शक्ति के ह्रास के साथ वृद्धावस्‍था में सभी स्‍त्री पुरूष नीति आचरण की संहिता बन जाते हैं। दशा अंतर्दशा की प्रतिक्षा किए वगैर उपर्युक्‍त घटनाएं स्‍वाभाविक ढंग से प्रत्‍येक व्‍यक्ति के जीवन में घटती रहती है।

इसका अर्थ यह है कि बचपन में भोलेपन के ग्रह यानि चंद्रमा का प्रभाव पडना चाहिए। कुंभ लग्‍न की उन कुंडलियों में , जिसमें चंद्रमा कमजोर हो , बच्‍चे 12 वर्ष की उम्र तक बहुत बीमार होते हैं और शरीर से कमजोर रहते हैं। उनका जन्‍म किस नक्षत्र में हुआ , यह मायने नहीं रखता। इसके विपरीत कर्क लग्‍न के चंद्रबली बच्‍चे शरीर से निरोग रहते हुए अपने बाल साथियों के नेता रहते हैं। वृश्चिक लग्‍न के जातकों में बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कमजोर चंद्र के कारण बालपन में कोई समस्‍या चल रही हो , तो 12 वर्ष की उम्र के पश्‍चात् वे समाप्‍त हो जाती हैं। परंपरागत ज्‍योतिष में चंद्रमा को बाल ग्रह माना गया है , शास्‍त्रों में भी बालारिष्‍ट योग की चर्चा चंद्रमा के प्रतिकूल प्रभाव से ही की जाती है , इसलिए जीवन के प्रारंभिक भाग को चंद्र की ही दशा समझनी चाहिए।

इसी तरह वास्‍तविक अर्थ में विद्यार्जन का समय 12 वर्ष से 24 वर्ष की उम्र तक का होता है। 12 वर्ष के पहले बालक की तर्कशक्ति न के बराबर होती है। ज्ञानार्जन से संबंधित ग्रंथियां 24 वर्ष की उम्र तक पूर्ण तौर पर बन जाती हैं। इसलिए अधिकांश देशों में इस उम्र तक पहुंचते पहुंचते लोगों को बालिग घोषित कर दिया जाता है। इसलिए विद्या के कारक ग्रह बुध का दशाकाल 12 वर्ष से 24 वर्ष तक माना जाना चाहिए। बुध बली इस उम्र में विद्यार्जन के लिए अनुकूल वातावरण प्राप्‍त करते हैं , जबकि जिनका बुध निर्बल होता है , उन्‍हें विद्यार्थी जीवन में मुसीबतें झेलनी पडती हैं।

(24 वर्ष की उम्र के बाद क्रम से किन ग्रहों का दशाकाल आता है, इसे जानने के लिए इस लेख का दूसरा भाग पढें)


..... बस यादें ही तो शेष रह जाती हैं हमारे पास !!!!

परसों शाम जैसे ही ब्‍लॉगर का डैशबोर्ड रिफ्रेश किया , अलबेला खत्री जी की एक पोस्‍ट के शीर्षक पर नजर गयी। भगवान करे यह सच न हो , झूठ हो , डॉ अमर कुमार जी जीवित ही हों , पढने के बाद इसे खोलने की हिम्‍मत ही नहीं हो रही थी। कांपते हाथो से इसपर क्लिक किया  , एक दूसरी पोस्‍ट भी पढी। घटना सच्‍ची ही है , भला कोई ऐसा मजाक करता है ??  न कभी मिलना जुलना , न कभी फोन या पत्र , बस एक दूसरे की पोस्‍ट और टिप्‍पणियों को पढते हुए ब्‍लोगरों के विचारों से रूबरू होने के कारण ऐसा लगता है , मानो हम एक कितने दिनों से एक दूसरे के परिचित हों। इस दौरान हमारे मध्‍य गलतफहमियां भी जन्‍म लेती हैं , पर उसका असर कितने दिन रह पाता है ?? वैसे शायद डॉ अमर कुमार जी को ज्‍योतिष में रूचि न हो , और ज्‍योतिष के सिवा दूसरे मुद्दों पर मैं अधिक लिखती नहीं , इसलिए किसी मुद्दे पर मेरा प्रत्‍यक्ष वाद विवाद उनसे नहीं रहा। पर उनके व्‍यक्तित्‍व से काफी प्रभावित रही , हालांकि उनसे मेरे परिचय की शुरूआत एक टिप्‍पणी को लेकर गलतफहमी से ही हुई।

तब ब्‍लॉग जगत में आए बहुत दिन नहीं हुए होंगे , समाज में फैले ज्‍योतिषीय और धार्मिक भ्रांतियों को दूर करने की दिशा में छोटे मोटे लेख लिखने लगी थी। 16 फरवरी को प्रकाशित मेरे एक लेख नजर कब लगती है ?? को पढकर मसीजीवी जी के द्वारा की गई टिपपणी  क्‍या इस पोस्‍ट के आने का अर्थ माना जाया कि हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत पर नकारात्‍मक ग्रहों का प्रभाव हो गया है :) से मैं आहत हुई , अपने मनोभाव को व्‍यक्‍त करने के लिए मैने मसीजीवी जी की टिप्‍पणी के जबाब में एक पोस्‍ट लिख डाली। शीर्षक में ही मसीजीवी जी का नाम देखकर डा अमर कुमार जी मेरे ब्‍लॉग पर आए , पर उनकी नजर मेरे ब्‍लॉग के नीचे कोने पर रखे तिरंगे पर गयी और उन्‍होने पोस्‍ट पर ऐसी टिप्‍पणी की ....


बड़े हौसले से आया हूँ कि,
कुछ सार्थक बहस की ग़ुंज़ाईश हो..
पर, एक खेद व्यक्त करके लौट जा रहा हूँ
[ क्योंकि इससे अधिक और कर ही क्या सकता हूँ :) ]
इतने बुरे दिन भी नहीं आयें है, बहना 
कृपया अपने राष्ट्रीय तिरंगे को नीचे कोने से उठा कर कहीं ऊपर सम्मानजनक स्थान दें ।आप देशभक्त हैं, यह तो ज़ाहिर हो गया ।


उनके द्वारा दिया गया सुझाव तो मुझे पसंद आया , पर अंतिम पंक्तियों में छुपा व्‍यंग्‍य मुझे बहुत चुभा , पर मैने इसे सार्वजनिक नहीं किया और उन्‍हे ईमेल से ही जबाब भेजा ....

मुझे जो कोड मिला था.......वह मैने ज्‍यों का त्‍यों पेस्‍ट कर दिया....आप सही तरीके से भी हमें इस बात से आगाह कर सकते थे.........इसपर इतना व्‍यंग्‍य करने की आवश्‍यकता नहीं थी........झंडे को उपर डालने के बारे में मुझे जानकारी नहीं.......इसे हटा ही देती हूं.।

मैं तो इस बात को कुछ दिन बाद भूल गयी , पर वो इसे नहीं भूल सकें। कुश जी के टोस्‍ट विद टू होस्‍ट  में इंटरव्‍यू देते वक्‍त उन्‍होने इस बात की चर्चा कर ही दी .....

एक बार संगीता पुरी और मसिजीवी जी के बीच के कुछ कुछ हो गया .. देखने मैं भी पहुँच गया, टिप्पणी कर दी कि ब्लाग के निचले दायें कोने में पड़े तिरंगे को उचित सम्मान तो दीजिये, बहन जी..फिर, क्या हुआ होगा ? झुमका तो गिरना ही था । ज़ायज़ है भई, मैं देश के सम्मान का ठेकेदार न सही, पर भी तो नहीं ?भला बताओ, मैं कोई अमेरीकन हूँ क्या ? जो अपने झंडे का कच्छा बना लें, या ट्रेंडी नाइट गाऊन, उन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता !

जब डॉ अमर कुमार जी सार्वजनिक कर ही चुके थे , तो मैं अपनी सफाई क्‍यूं न देती??  पर हमारे मध्‍य संवादहीनता नहीं रही , इस पोस्‍ट को पढकर उन्‍होने भी टिप्‍पणी की .....


व्यंग्य और तंज़ मेरे लेखन के स्तंभ हैं, इनको घुसने से कैसे रोका जा सकता है ?
जिस किसी ने भी यह कोड बनाया है, उसे position: no-repeat fixed right bottom; का विकल्प रखना ही नहीं था ।
position: no-repeat fixed top right ; करने में मुझे कोई बुराई नहीं दिखती !
अपने ’ देश ’ का मैंने ऎसा अपमान देखा है, कि अपने झंडॆ के प्रति सदिव ही संवेदी रहूँगा !
मुझे कोई खेद नहीं है !
क्योंकि वाकई यह बतंगड़ बनाने वाली बात ही नहीं है !
और मेरी मंशा ऎसी थी भी नहीं..


सचमुच उनकी मंशा ऐसी न थी , दो चार महीने बाद ही जब टिप्‍पणी करने वाली आदत को लेकर प्रवीण जाखड जी ने मुझपर व्‍यंग्‍य करता हुआ लेख लिखा , उन्‍होने आकर मेरे पक्ष में टिप्‍पणी की ....


आप क्यों आपना समय और मानसिक ऊर्ज़ा ज़ाखड़ पर बरबाद कर रही हैं ।
उनकी टैगलाइन ही उनके व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करती है ।
अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना उनकी आदत में है, या नहीं..
यह वह बेहतर बता सकते हैं । पर, जहाँ कोई न पहुँच रहा हो, वहाँ नवाँगतुकों का ऎसा रस्मी स्वागत कोई बुरी बात तो नहीं ?

उसके बाद नए वर्ष की पूर्व संध्‍या पर मैने उन्‍हें नववर्ष की शुभकामनाएं दी , 50 मिनट तक  तो मैं यही समझती रही कि वे मुझे जबाब नहीं देंगे , पर न सिर्फ उनका जबाब आया , उन्‍होने बीते वर्ष हुई गलतफहमी के लिए क्षमा भी मांगी ....


१०:३७ अपराह्न मुझे: आपके और आपके पूरे परिवार के लिए नया वर्ष मंगलमय हो !!

50 मिनट
११:२८ अपराह्न 
अमर: धन्यवाद.. मेरी यही शुभेच्छायें आपके लिये भी है ।
बीते वर्ष में जो कुछ भूल चूक हुई हो क्षमा करेंगी !

११:२९ अपराह्न 
मुझे: जी
धन्‍यवाद

... और मैं इतना भी नहीं समझ पायी थी कि मैं उन्‍हे क्षमा करने लायक हूं भी नहीं !!!

अभी कुछ दिन पूर्व ही तो फेसबुक में उनका प्रोफाइल देखा था , जो उनकी खुशमिजाजी को बयान करता है।

नियोक्ता

महाविद्यालय

उच्च माध्यमिक

दर्शनशास्त्र

धार्मिक विचारमतलब परस्ती

राजनैतिक विचारयह क्यों पिट रहा है, भाई ?

पसन्दीदा वाक्यमुझे पढ़ लो, हज़ार कोटेशन पर भारी पडूँगा !


उन्‍होने ऑरकुट में मित्रता का अनुरोध भेजा , मैने उसे स्‍वीकार कर लिया । पर अभी कुछ दिन पूर्व फेसबुक में भेजा गया मेरा मित्र अनुरोध उनके पास लंबित ही रह गया। इस कारण उनके वॉल में मैं श्रद्धांजलि के दो शब्‍द भी नहीं लिख सकती।








'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में तो नहीं , यदा कदा 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' में टिपपणी करते रहें। टिप्‍पणी में मॉडरेशन के विरूद्ध थे वे , मेरी एक पोस्‍ट एक लोकोक्ति का अर्थ स्‍पष्‍ट करें !!! पर लिखा था ......


comments must be approved by the blog author

फिर भी..
इसका भावार्थ यह होगा ।

माघ की आर्द्रा और इस समय की हथिया ( हस्तिका ) सबके लिये बराबर है, चाहे मेहमान हों या गृहस्थ सभी अपनी जगह ठप्प पड़ जाते हैं ।


उनके कडे शब्‍दों की वजह से अक्‍सर उन्‍हें लोग गलत समझ लेते थे , पर उनके कहने का वो मकसद नहीं होता था। ब्‍लॉग जगत के नए पन्‍ने पर तो अब हम उनकी टिप्‍पणियों का इंतजार ही करते रह जाएंगे। उन्‍हें याद रखने के लिए अब सिर्फ पुराने पन्‍ने ही तो उल्‍टे जा सकते हैं , क्‍यूंकि किसी के जाने के बाद बस यादें ही तो शेष रह जाती हैं हमारे पास !!!!

उन्‍हें हार्दिक नमन !!!!!

एक अच्‍छी खबर

काफी दिनों से ब्‍लॉग लेखन में अनियिमितता बनी हुई है , कई तरह के पूर्वानुमान मन में ही रह जाते हैं , जिसके कारण पाठक जानकारी से वं‍चित रह रहे हैं। पहले मैं मौसम के क्षेत्र की भवष्यिवाणियां हमेशा किया करती थी , जिससे आम जन को मौसम के बारे में अच्‍छी जानकारी बनी रहती थी , पर काफी दिनों से कुछ लिख न सकी। अभी कई दिनों से समाचार पत्रों में लगातार बाढ से जुडी घटनाएं पढने के बाद एक ग्रहस्थिति की ओर मेरा ध्‍यान गया और मैने मौसम के अंतर्गत अपने पुराने लेख ढूंढे। 28 अप्रैल को प्रकाशित किए गए इस लेख के अंतिम अनुच्‍छेद में साफ साफ लिखा है कि 17 अगस्‍त के आसपास भी बहुत सारे क्षेत्रों में अत्‍यधिक बारिश के कारण बाढ जैसी परेशानियों का भी सामना करना पड सकता है। गूगल की 24 घंटों की खबरों में भी आज 18 अगस्‍त को बाढ से जुडी खबरे काफी दिखाई पड रही हैं। ये रहीं अलग अलग स्‍थान पर अलग अलग नदियों से जुडी अलग अलग खबरें.......

हथिनीकुंड बैराज से भारी मात्रा में पानी छोड़े जाने के कारण बुधवार को यमुना नदी खतरे के निशान को पार कर गई। नदी के लेवल में लगातार इजाफा हो रहा है। बाढ़ के संभावित खतरे से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने व्यापक इंतजाम किए हैं।        पहाड़ों पर बरसात और बिजनौर बैराज से तीन लाख 76 हजार क्यूसेक पानी छोड़े जाने से गंगा नदी के तटवर्ती गांवों में खलबली मची है। गुरूवार को नदी खतरनाक रूप धारण कर सकती है। सूख चुकी सोत नदी उफना गयी है।              भारी बारिश के चलते पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाद अब पश्चिमी हिस्से में बाढ़ की तबाही शुरू हो गई है। बाढ़ से जहां दर्जनों गांव प्रभावित हुए हैं वहीं राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या -24 के पानी में डूब जाने से इस पर यातायात ठप्प पड़ गया है। भारी बारिश से मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा, शाहजहांपुर और बरेली जिलों में रामगंगा, मालन और कोसी नदियां उफान पर हैं, जिससे इन जिलों के कई निचले इलाकों में बाढ़ का पानी घुस गया है।              शारदा सागर बांध से लगभग चार लाख क्यूसेक पानी रिलीज करने के कारण क्षेत्र के कई दर्जन गांव बाढ़ की चपेट में हैं। प्रशासन द्वारा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की चेतावनी दी गई है, परंतु नागरिकों की सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किये गये हैं और न ही बाढ़ राहत चौकी पर किसी अधिकारी या कर्मचारी का ही पता है। दो दिनों से लगातार हो रही मूसलधार बारिश से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।                सांकरा क्षेत्र में फिर बाढ़ के आसार नजर आने लगे हैं। यहां से गुजर रही गंगा पहले से ही लबालब थी, अब उसमें हरिद्वार से चार लाख क्सूसिक पानी छोड़ दिया गया है। इसे लेकर आसपास के ग्रामीणों में भय व्याप्त है। सांकरा में गंगा खतरे के निशान के आसपास ही बह रही है। अब जानकारी मिली है कि हरिद्वार से गंगा में चार लाख क्यूसिक पानी बुधवार को छोड़ दिया गया। 
सतलुज दरिया में बढ़ रहे जलस्तर से क्षेत्र में बाढ़ जैसी स्थिति बनी हुई है। पानी कम न होने से लोगों की परेशानी बढ़ गई है। दूसरी ओर प्रशासन की ओर से कोई सुविधा न मिलने से लोगों में खासा रोष है। हिमाचल प्रदेश में हो रही बारिश से भाखड़ा डैम में पानी का स्तर बढ़ रहा है। यहां से बार-बार पानी छोड़ने से फतेहगढ़ पंजतूर क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति बन गई है। लोगों के मकान, खेत और रास्ते बाढ़ की चपेट में आ गए हैं।            पाकिस्तान के दक्षिण हिस्से में मॉनसूनी बारिश से विशाल क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आ गया है और कम से कम 30 लोगों की मौत हो गई एवं 10 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। दक्षिण सिंध प्रांत के मुख्यमंत्री कैयम अली शाह ने कहा कि बारिश और नहरों के तटबंध में दरार से छह जिलों में 10 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कराची में बताया कि 30 लोग बाढ़ के कारण मारे गए हैं।

पुराने लेख की चर्चा करते हुए मैं यह जानकारी देना चाह रही हूं कि जब अभी तक की बारिश प्रकृति के किसी किसी नियम के हिसाब से हो रही है , तो आनेवाले दिनों में बारिश भी उसी नियम के आधार पर होगी। 17 अगस्‍त तक की घनघोर बारिश के बाद बारिश में कुछ कमी आएगी , हालांकि अभी 6 सितंबर तक अच्‍छी बारिश के योग हैं ही , खासकर ग्रहों की दृष्टि से अभी निकट की तीन तिथियां 19 , 20 और 21 अगस्‍त भी अच्‍छी खासी बारिश वाली हैं , अब दो चार दिनों में लोगों को बाढ के पानी से राहत मिलनी आरंभ हो जाएगी और यह बाढ से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के लिए बहुत अच्‍छी खबर है।