दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि कैसे मिले ??

Mahila sashaktikaran par nibandh


पुराने वर्ष को विदा करने और नए वर्ष का स्‍वागत करने के , व्‍यतीत किए गए वर्ष का मूल्‍यांकण करने और नए वर्ष के लिए अपने कार्यक्रम बनाने यानि हर व्‍यक्ति के लिए महत्‍वपूर्ण दिसंबर के उत्‍तरार्द्ध और जनवरी के पूवार्द्ध में पड रही कडाके की ठंड के मध्‍य देश एक अलग ही आग में जल रहा है । एक दुष्‍कर्म के एवज में अपराधियों को फांसी मिलने की मांग पर जनता अटल है , और सरकार अपनी जिद पर । पर सारी घटनाओं को देखने सुनने और चिंतन करने के बाद चाहकर भी इतने दिनों तक अपने विचारों को सुनियोजित ढंग से लिख पाने में सफल न हो सकी। क्‍यो‍कि मेरा सारा ध्‍यान संकेन्‍द्रण अपने सॉफ्टवेयर में एक एक्‍सटेंशन करने में बना हुआ था , जिसकी जानकारी ज्‍योतिषप्रेमियों को मेरे ज्‍योतिष वाले ब्‍लॉग से मिल जाएगी , मुझे यहां चर्चा करने की जरूरत नहीं है , क्‍योंकि इससे मुख्‍य मुद्दे से भटकने का भय है। 

वैसे बहुत खुशी की बात है कि 23 वर्षीया बच्‍ची दामिनी को इंसाफ दिलाने के लिए सारा देश एक साथ उठ खडा हुआ है। वैसे ऐसी घटना कोई पहली बार हमारे देश में नहीं हुर्इ है , प्रतिदिन अखबारों में ऐसी घटनाएं नजर में आ ही जाती हैं , शारिरीक और भावनात्‍मक तौर पर कमजोर होने का फायदा कभी कोई उठा ही लेता है। पुराने जमाने में तो बच्चियां अभिभावकों के आसपास उनकी देख रेख में रहा करती थी । पर आज युग बदल चुका है , बचे भी तो वे कैसे ? शिक्षा दीक्षा काम काज सब उनके लिए भी आवश्‍यक है , पहले की महिलाओं की तरह चादर बुरके में घर आंगन में कैद तो नहीं रह सकती। हजारों महिलाएं अपने साथ हो रहे अन्‍याय को आज भी बेबसी से देख रही हैं। 

इसका मुख्‍य कारण यह है कि हमारे समाज में आजतक ऐसी व्‍यवस्‍था है कि इस मामले में शिकारी को नहीं शिकार को ही सजा दी जाती है। यही कारण है कि आजतक लडकियों की जीवनशैली को इस कदर बनाया जाता रहा कि वे किसी के शिकार होने से बचे। यदि कभी किसी खास परिस्थिति में उनके साथ कोई हादसा हो भी गया तो इस बात को पचाना लडकियों या उसके परिवार वालों की मजबूरी होती है। दुनिया भर में प्रत्‍येक समाज और राष्‍ट्र में अपराध के हिसाब से दिया दोषी को दंड दिए जाने का नियम है। पर हमारे यहां आजतक ऐसे अपराध करने वाले समाज में सर उठाकर घूमते हैं। पर तरह तरह के सवालों , तानों से मासूम लडकियों का जीवन बेकार हो जाता है । इसलिए आजतक प्रत्‍येक गांव शहरों में ऐसे मुद्दों को अभिभावकों द्वारा ढंककर ही रखा जाता है। यहां तक कि ऐसी अपराधों की जानकारी बच्चियों या घर की महिलाओं तक ही सीमित रह जाती है , घर के पुरूषों तक को ऐसे अपराधों का पता नहीं चल पाता। बच्चियों , उनके अभिभावकों की चुप्पियों का बलात्‍कारी नाजायज फायदा उठा रहे हैं।

गिने चुने मामलों में ही ऐसी बातें सार्वजनिक होती है , जब घरवालों के नहीं, बाहरवालों के नजर में ऐसी घटनाएं आ जाती हैं। इस वक्‍त भी घरवालों के द्वारा नहीं , बाहरी लोगों के नजर में आ जाने से ही बलात्‍कारियों के विरूद्ध ऐसी आवाज उठी है , लाखों दामिनियां अभी भी सबकुछ झेलती जा रही हैं। खैर दामिनी अब नहीं रही , इसलिए उसकी जिंदगी के बेकार होने का खतरा तो नहीं है । पर समाज को अपनी सोंच बदलने की आवश्‍यकता है , किसी निर्दोष को दोषी ठहराना कदापि उचित नहीं , यही अपराधियों की संख्‍या के बढने की मुख्‍य वजह है। यदि महिलाओं को यह विश्‍वास होता कि उनके साथ हुए हादसे के प्रति समाज संवेदनशील रहेगा , उसकी मदद करेगा , तो ऐसे अपराध नहीं बढते , इसलिए किसी तरह के आंदोलन से पहले समाज के लोगों को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्‍यकता है। समाज में ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि अपराधी को अपना चेहरा छुपाना पडे , न कि उनके द्वारा सतायी गयी शारीरिक मानसिक तौर पर परेशान युवतियों को। उन्‍हें ससम्‍मान जीने का हक चाहिए , बिना भेदभाव के नौकरी और शादी विवाह के अवसर मिले। तभी ऐसे अपराधों में कमी हो पाएगी और दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि यही होगी।

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष: परिचय एवं उपयोगिता


समाज से ज्‍योतिषीय एवं धार्मिक भ्रांतियों को दूर करने के उद्देश्‍य से पेटरवार के वन एवं पर्यावरण विभाग के सभागार में अविभाजित बिहार के वित्‍त राज्‍य मंत्री रह चुके श्री छत्रु राम महतो की अध्‍यक्षता में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान केन्‍द्र द्वारा ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष: परिचय एवं उपयोगिता’ का एक प्रजेंटेशन और कार्यक्रम आयोजित किया गया। 

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श्रीमती शालिनी खन्‍ना ने बीस वर्षों में गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की यत्र तत्र पत्र पत्रिकाओं में होने वाले चर्चा के बारे में बताया। गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के जनक श्री विद्या सागर महथा जी ने जीवनभर चलने वाले अपने ज्‍योतिषीय यात्रा के बारे में बताने के क्रम में कहा कि प्रकृति के नियम हर क्षेत्र में काम करते हैं , कहीं वे दिखाई पडते हैं और कहीं नहीं दिखाई देते। इन्‍होने इस नियम को समझने में सफलता पायी है और इसका फायदा उठाया जाना चाहिए। 

श्रीमती संगीता पुरी ने प्रजेंटेशन के माध्‍यम से आसमान के ग्रह नक्षत्रों की चाल दिखाते हुए बताया कि उनके पिताजी ने क्‍या ढूंढा है और गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष में नया क्‍या है। स्‍लाइड शो के माध्‍यम से ही इसकी उपयोगिता के बारे में बताया कि जो लाभ या निश्चिंति हमें घडी , टॉर्च और कैलेण्‍डर से मिलती है , वैसी ही गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के आधार पर अपने जन्‍मकालीन ग्रहों के स्‍वभाव को समझ जाने से मिलती है

कार्यक्रम में उपस्थित रांची विश्‍व विद्यालय के स्‍नातकोत्‍तर विभाग ‘इतिहास’ के पूर्व विभागाध्‍यक्ष डॉ एच एस पांडेय ने महथा जी के दीर्घायु होने की कामना की ताकि इस वैज्ञानिक खोज को विश्‍व के जन जन तक पहुंचाया जा सके। 

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झारखंड विद्युत बोर्ड के अवकाश प्राप्‍त उप प्रबंधक श्री उमेश सिंह ने कहा कि महथा जी के सिद्धांत वर्षों से अभी तक उनका मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। धनबाद जिला खनन पदाधिकारी श्री रामेश्‍वर राणा ने कहा कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष जैसे वैज्ञानिक खोज को प्रचारित प्रसारित करना आवश्‍यक है। वरिष्‍ठ चिकित्‍सक डॉ अमर कुमार श्रीवास्‍तव ने बताया कि‍ हमारे परिवार के मामले में महथा जी की भविष्‍यवाणी शत प्रतिशत सही रही है। 

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वरिष्‍ठ पत्रकार श्री अशोक वर्मा ने निकट भविष्‍य में चार शहरों में इस तरह के आयोजन करने की घोषणा की , ताकि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के सिद्धांत जन जन तक पहुंच सके। इस कार्यक्रम में पेटरवार में मौजूद अधिकारियों और बुद्धिजीवियों के अलावे रांची , रामगढ , धनबाद , बोकारो से बडी संख्‍या में लोग पहुंचे थे। सभा के अंत में ‘प्रश्‍न मंच’ के माध्‍यम से श्रोताओं की जिज्ञासा को शांत किया गया। 

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लीला जानकी विद्यालय , पेटरवार के संस्‍थापक श्री सुधीर कुमार सिन्‍हा जी ने मंच संचालन करते हुए खुशी जतायी कि पेटरवार कि धरती में इतनी बडी प्रतिभा का होना गांव वालों का सौभाग्‍य है। अध्‍यक्ष महोदय ने भी गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर अपना विश्‍वास जताया और इसके संदेश को जन जन तक पहुचने की शुभकामनाएं दी।



नजर का असर ..... अतिथि पोस्‍ट .... श्री विद्या सागर महथा

कुणाल की आंखों पर उसकी सौतेली मां की नजर थी , कारण यह था कि उसकी आंखें बहुत ही खूबसूरत थी और उसकी तथाकथित मां उन आंखों पर मोहित थी। लाख कोशिश के बाद भी जब वह उन आंखों को हासिल न कर सकी तो अपने पति से उसकी शिकायत कर , उसपर छेड़खानी का इलजाम लगाकर उन आंखों को निकलवा लेने से भी बाज नहीं आयी। खड्गसिंह डाकू की नजर बाबा भारती के घोड़े पर थी , किसी भी तरह वह उस घोड़े को प्राप्त करना चाहता था। इसी क्रम में वह अपंग और असहाय बनने का ढोंग कर गन्तव्य तक जाने के लिए सहारा मांगकर बाबा भारती के घोड़े पर बैठा और उन्हें धक्का देकर गिराकर घोड़े को लेकर चंपत हो गया।

चोर उचक्के की नजर उस धन पर होती है , जिसे आसानी से झपटा जा सके। डाकू की नजर वैसे धन पर होती है , जिसे बंदूक के बल पर या शक्ति प्रदर्शन के साथ जबर्दस्ती हासिल किया जा सके। नेताओं की नजर हमेशा कुर्सी पर होती है , कुर्सी पर बैठे नेताओं को हराया जाए तथा खुद उसपर बैठा जाए , इसी तिकड़म में वे लगे होते हैं। पुलिस की नजर क्रिमिनल पर तथा इनकम टैक्सवालों की नजर टैक्स की चोरी करनेवालों पर होती है। मनचलों की नजर सुंदर युवतियो पर होती है। इन्द्र की नजर तप करनेवालों पर होती थी , किसी भी हालत में उनकी तपस्या पूरी न हो , ताकि उनकी गद्दी सुरक्षित रहे । इतना ही नहीं ग्रहों की भी दृष्टि की चर्चा शास्त्रों में की गयी है। मान्यता है कि शनि की दृष्टि बुरी होती है , जबकि बृहस्पति की दृष्टि को शुभ कहा गया है। अब प्रश्न यह उठता है कि यह दृष्टि या नजर वास्तव में अच्छी होती है या बुरी ?

चोर , डकैत या अपराधी पुलिस की नजर से बचना चाहते हैं। रिश्वतखोर बड़े अफसर , नौकरशाह या नेता सी बी आई या मिडिया की नजरों से बचना चाहते हैं। कर्जदार साहूकार या महाजन की नजरों से बचना चाहते हैं। लेकिन अपने से बड़े , शक्तिशाली और सक्षम व्यक्ति से कोई काम निकालना हो , तो सभी अपने ऊपर कृपादृष्टि बनाए रखने के लिए गिड़गिड़ाकर अनुरोध करते हुए देखे जाते हैं। ‘ महाशय , आपके ऑफिस में मेरा लड़का काम करता है , कृपया उसपर नजर रखिएगा। ’ इस तरह लोग कभी किसी की नजर के मुहॅताज होते हैं , तो कभी किसी की नजर से बचना चाहते हैं। स्पष्ट है , उन नजरों से हम बचना चाहते हैं , जिनसे हमारे बुरे होने की आशंका बनी होती है। इसके विपरीत , जिन कृपादृष्टि में हमारा कल्याण छुपा होता है , उनके हम आकांक्षी होते हैं।

अशिक्षित लोगों के बीच , गांवों या देहातों में नजर का मतलब केवल बुरी नजरों से ही होता है , जिससे किसी के सिर्फ अहित होने की ही संभावना है , किन्तु अज्ञानतावश उन नजरों को ही कसूरवार समझा जाता है , जिनमें किसी प्रकार की शक्ति नहीं होती , उनकी नीयत भी बुरी नहीं होती। वास्तव में वे शक्तिहीन होते हैं तथा अनेक प्रकार की शक्तियों से निरंतर घिरे होने के कारण उनका आत्मविश्वास मरा होता है। वे दूसरों से नजर मिलाने की हिम्मत भी नहीं कर पाते , फिर भी उनके किसी काम को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है , इससे उनमें घबराहट पैदा होती है , उनसे संबंधित किसी प्रश्न को भी पूछे जाने पर वे उसका उत्तर अनाप-शनाप ढंग से ही देते हैं तथा अधिक छानबीन करने होने पर मैदान छोड़कर भाग भी जाते हैं। ऐसी हालत में समाज उनके किसी भी कार्यवाही को गलत मान लेता है तथा उन्हें कसूरवार समझ बैठता है।

समाज में इस मानसिकता की औरतें डायन कहलाती हैं , जिनके चेहरे पर असमय ही पहाड़ जैसी पीड़ा को झेलने की छाया टपकती रहती है। वे शक्तिहीन , असहाय और निरीह होती है। किसी शुभ अवसर पर लोग उसकी उपस्थिति को बुरा समझने लगते हैं। छोटे सुंदर बच्चों को भी उनकी नजर से बचाने का प्रयास किया जाता है। लेकिन इन बातों में कोई दम नहीं है , असहाय शक्तिहीन की नजर घातक नहीं होती , वास्तव में लोगों को किसी शक्तिशाली की बुरी नजर से बचना चाहिए।

जब मैं ढाई वर्ष का था , भयंकर रुप से चेचक के प्रकोप से ग्रस्त होने के कारण लगभग मरनासन्न स्थिति में पड़ा हुआ था । उन्हीं दिनों मेरी माताजी भी लम्बे समय तक टायफायड से ग्रस्त होने के कारण बुरी तरह कमजोर हो चुकी थी , अपने को सॅभालना ही मुश्किल था , मेरी देख-रेख कर पाने का कोई प्रश्न ही नहीं था । इस हालत में मेरे पिताजी ने मेरी देखभाल के लिए ऐसी औरत को नियुक्त किया , जो समाज की नजरों में उपेक्षिता एक डायन थी , उसी की सतत् सेवा से मुझे पुनर्जन्म मिला। बड़े होने के बाद भी तथाकथित कई डायनों से मिला , सबकी नजरों में मुझे शक्तिहीनता , बदनामी और विवशता से संश्लिष्ट गहरी पीड़ा के सिवा कुछ भी देखने को नहीं मिली ।

सुंदर ताजमहल पर करोड़ों की नजर पड़ चुकी है , किन्तु सैकड़ों वर्षों बाद भी वह वही सुंदरता बिखेर रहा है। फिल्मी हीरो-हीरोइनों की सुंदरता और नाज-नखरों पर करोड़ों की नजरें पड़ती हैं। क्रिकेट के मैदान में खिलाडि़यों के खेल पर करोड़ो की अच्छी और बुरी निगाहे पड़ती हैं। इन नजरों में जहां एक ओर अपने देश के खिलाडि़यो के लिए शुभकामनाएं व्यकत होती हें , तो दूसरी ओर प्रतिद्वंदी देश के खिलाडि़यों के लिए बुरी नजर का इस्तेमाल होता है , परंतु होता वही है , जो मंजूरे खुदा होता है। जिन हीरो-हीरोइनों , क्रिकेटखिलाड़ी या जड़-चेतन पर उनकी विशेषताओं की वजह से अधिक से अधिक नजरें पड़ती हैं , वह उतना ही लोकप्रिय हो जाता है। कश्मीर की वादियों पर देशी-विदेशी करोड़ो पर्यटकों की नजरें टिकी होती हैं , परंतु उसका कुछ नहीं बिगड़ता , उसकी सुंदरता तो अक्षुण्ण है। यदि नजरों से ही बिगड़ने की बात होती , तो देश-रक्षा के लिए सीमा में सैनिको की जगह डायनों की नियुक्ति न की जाती।

व्यक्ति की विशेषता के साथ उसकी विनम्रता करोड़ो लोगों की दुआ हासिल करने में समर्थ होती है। उसकी लोकप्रियता को दिन दूनी रात चैगुनी गति से बढ़ा पाने में समर्थ होती है , विपरीत स्थिति में यानि अहंकारयुक्त विशेषता उतना लोकप्रिय नहीं हो पाता , क्योंकि अहंकार से उसकी कार्यक्षमता बाधित होती है। सुंदरता या विशेषता पर नजर स्वाभाविक आकर्षण की वजह से होता है , उसे प्राप्त करने की इच्छा या लोलुपता , ईर्ष्‍या आदि उसके नुकसान का कारण बनती हैं। इस प्रकार जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूं , शक्तिशाली व्यक्ति की नजर से बचने की चेष्टा करनी चाहिए , किन्तु कमजोर , सामर्थ्‍यहीन और निरीह व्यक्ति की नजरों से नुकसान नहीं होता। उन्हें मनहूस या डायन समझकर प्रताडि़त करना या उन्हें कसूरवार समझना गलत है। उनकी उपेक्षा करना बड़प्पन और मानवता के खिलाफ तथा अंधविश्वास है।

मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा 

महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन

महाकालेश्‍वर के उद्भव के बारे में मान्‍यता है कि भगवान शिव के परम भक्त उज्‍जयिनी के राजा चंद्रसेन को एक बार उनके शिवगणों में प्रमुख मणिभद्र ने तेजोमय 'चिंतामणि' प्रदान की, जिसे गले में धारण देखकर दूसरे राजाओं ने उसे पाने के प्रयास में आक्रमण कर दिया। शिवभक्त चंद्रसेन भगवान महाकाल की शरण में जाकर ध्यानमग्न हो गया। जब चंद्रसेन समाधिस्थ था तब वहाँ कोई गोपी अपने पांच वर्ष के छोटे बालक को साथ लेकर दर्शन हेतु आई। राजा चंद्रसेन को ध्यानमग्न देखकर बालक भी शिव की पूजा हेतु प्रेरित हुआ। कुछ देर पश्चात क्रुद्ध हो माता ने उस बालक को पीटना शुरू कर दिया और समस्त पूजन-सामग्री उठाकर फेंक दी। ध्यान से मुक्त होकर बालक चेतना में आया तो उसे अपनी पूजा को नष्ट देखकर बहुत दुःख हुआ। अचानक उसकी व्यथा की गहराई से चमत्कार हुआ। भगवान शिव की कृपा से वहाँ एक सुंदर मंदिर निर्मित हो गया। मंदिर के मध्य में दिव्य शिवलिंग विराजमान था एवं बालक द्वारा सज्जित पूजा यथावत थी। उसकी माता की तंद्रा भंग हुई तो वह भी आश्चर्यचकित हो गई। राजा चंद्रसेन को जब शिवजी की अनन्य कृपा से घटित इस घटना की जानकारी मिली तो वह भी उस शिवभक्त बालक से मिलने पहुँचा। अन्य राजा जो मणि हेतु युद्ध पर उतारू थे, वे भी पहुँचे। सभी ने राजा चंद्रसेन से अपने अपराध की क्षमा माँगी और सब मिलकर भगवान महाकाल का पूजन-अर्चन करने लगे। तभी वहाँ रामभक्त श्री हनुमानजी अवतरित हुए और उन्होंने गोप-बालक को गोद में बैठाकर सभी राजाओं और उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित किया। दैनिक भास्‍कर में छपे इन तस्‍वीरों और वर्णन को आपसे शेयर करने से नहीं रोक पायी .........

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार सावन के महीने में भगवान शिव के दर्शन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। सावन के महीने में 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने का भी विशेष महत्व है। इन सभी ज्योतिर्लिंगों का अपनी एक अलग विशेषता है। इन सभी में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर की महिमा देखते ही बनती है।

यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कहे जाने वाले उज्जैन शहर में स्थित है। यहां के लोग भगवान महाकाल को अपना राजा मानते हैं। हर साल भगवान महाकाल सावन व भादौ के महीने में पालकी में सवार होकर जनता का हाल-चाल जानने के लिए निकलते हैं। ऐसी कई अनोखी परंपराएं यहां प्रचलित हैं। भगवान महाकाल के अद्भुत श्रृंगार भक्तों का मन मोह लेते हैं। आप भी देखिए भगवान महाकाल के विभिन्न श्रृंगारों की तस्वीरें-
1- ये है भगवान महाकाल के अद्र्धनारीश्वर रूप का श्रृंगार।






Source: धर्म डेस्क. उज्जैन
 2- ये है भगवान महाकाल के भांग श्रृंगार का अनोखी रूप।







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 3- इस तस्वीर में बाबा महाकाल घटाटोप श्रृंगार में दिखाई दे रहे हैं।







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4- भगवान महाकाल का शिव तांडव श्रृंगार भक्तों का मन मोह लेता है।





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5- केसर-चंदन श्रृंगार में भगवान महाकाल का अद्भुत रूप दिखाई देता है।





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 6- ये है भगवान महाकाल का रुद्र श्रृंगार।






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 7- इस फोटो में भगवान महाकाल सेहरा श्रृंगार में दिखाई दे रहे हैं। बाबा महाकाल का ये श्रृंगार साल में सिर्फ एक बार महाशिवरात्रि के दिन किया जाता है।

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बौद्ध धर्म की शिक्षा और सिद्धांत

बौद्ध धर्म की शिक्षा और सिद्धांत

बौद्ध धर्म एक अनीश्‍वरवादी धर्म है, इसके अनुसार कर्म ही जीवन में सुख और दुख लाता है। भारत ही एक ऐसा अद्भूत देश है जहां ईश्वर के बिना भी धर्म चल जाता है। ईश्वर के बिना भी बौद्ध धर्म को सद्धर्म माना गया है। दुनिया के प्रत्येक धर्मों का आधार विश्वास और श्रद्धा है जबकि बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है, यह इस धर्म और गौतम बुद्ध के प्रति आकर्षित करता है। सभी धर्म अपना दर्शन सुख से आरम्भ करते हैं जो कि सर्वसाधारण की समझ से कोसों दूर होता है। महात्मा बुद्ध अपना दर्शन दुःख की खोज से आरम्भ तो करते हैं पर परिणति सुख पर ही होती है। बौद्ध धर्म का आधार वाक्य है ‘सोचो, विचारो, अनुभव करो जब परम श्रेयस् तुम्हारे अनुभव में आ जाये तो श्रद्धा या विश्वास करना नहीं होगा स्वतः हो जाएगा।’


बौद्ध धर्म के चार तीर्थ स्थल हैं- लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर। लुम्बिनी  नेपाल में , बोधगया बिहार में , सारनाथ काशी के पास और कुशीनगर गोरखपुर के पास है। बौद्ध धर्म एक धर्म ही नहीं पूरा दर्शन है। महात्मा बुद्ध ने इसकी स्‍थापना की, इन्‍हें गौतम बुद्ध, सिद्धार्थ, तथागत और बोधिसत्व भी कहा जाता है। उनके गुज़रने के अगले पाँच शताब्दियों में यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला और बाद में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फ़ैल गया। बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा बडा धर्म माना गया है , क्‍योंकि इसे पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं। "अज्ञानता की नींद"से जागने वाले ,  जिन्होने सालों के ध्यान के बाद यथार्थता का सत्य भाव पहचाना हो , वे "बुद्ध" कहलाते हैं ।
बौद्ध धर्म की शिक्षा और सिद्धांत


बौद्ध धर्म के हिसाब से पहला आर्य सत्य दुःख है। जन्म दुःख है, जरा दुःख है, व्याधि दुःख है, मृत्यु दुःख है, अप्रिय का मिलना दुःख है, प्रिय का बिछुड़ना दुःख है, इच्छित वस्तु का न मिलना दुःख है। दुःख समुदय नाम का दूसरा आर्य सत्य तृष्णा है, सांसारिक उपभोगों की तृष्णा, स्वर्गलोक में जाने की तृष्णा और आत्महत्या करके संसार से लुप्त हो जाने की तृष्णा, इन तीन तृष्णाओं से मनुष्य अनेक तरह का पापाचरण करता है और दुःख भोगता है। तीसरा आर्य सत्य दुःखनिरोध है। तृष्णा का निरोध करने से निर्वाण की प्राप्ति होती है, देहदंड या कामोपभोग से मोक्षलाभ होने का नहीं। चौथा आर्य सत्य दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् है। यह दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् नामक आर्य सत्य भावना करने योग्य है। इसी आर्य सत्य को अष्टांगिक मार्ग कहते हैं। वे अष्टांग ये हैं :- 1. सम्यक्‌ दृष्टि, 2. सम्यक्‌ संकल्प, 3. सम्यक्‌ वचन, 4. सम्यक्‌ कर्मांत, 5. सम्यक्‌ आजीव, 6. सम्यक्‌ व्यायाम, 7. सम्यक्‌ स्मृति, 8. सम्यक्‌ समाधि। दुःख का निरोध इसी अष्टांगिक मार्ग पर चलने से होता है। पहला अंत अत्यंतहीन, ग्राम्य, निकृष्टजनों के योग्य, अनार्य्य और अनर्थकारी है। दूसरा अंत है शरीर को दंड देकर दुःख उठाना। इन दोनों को त्याग कर मध्यमा प्रतिपदा का मार्ग ग्रहण करना चाहिए। यह मध्यमा प्रतिपदा चक्षुदायिनी और ज्ञानप्रदायिनी है।

कलिंग के युद्ध के बाद अशोक ने व्यक्ति गत रूप से बौद्ध धर्म अपना लिया था , अशोक के शासनकाल में ही बौद्ध भिक्षु विभिन्नी देशों में भेजे गये, जिनमें अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा गया । अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धर्मयात्राओं का प्रारम्भ किया , राजकीय पदाधिकारियों और धर्म महापात्रों की नियुक्ति की, दिव्य रूपों का प्रदर्शन तथा धर्म श्रावण एवं धर्मोपदेश की व्यवस्था की लोकाचारिता के कार्य, धर्मलिपियों का खुदवाना तथा विदेशों में धर्म प्रचार को प्रचारक भेजने आदि काम किए। इस तरह विभिन्न् धार्मिक सम्प्रदायों के बीच द्वेषभाव को मिटाकर धर्म की एकता स्थापित करने में अशोक ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायी।