अफसोस है .. नहीं रहा अब हमारे मुहल्‍ले का पीपल का पेड !!

peepal ka ped 

28 अप्रैल को दिल्‍ली के लिए निकलने से पहले अखबार में एक खबर पढते हुए मैं चौंक ही गयी। हमारे मुहल्‍ले का पीपल का विशालकाय पेड हल्‍की सी आंधी पानी में ही जड से उखड चुका था , खैरियत यही थी कि जानमाल की कोई क्षति नहीं हुई थी , बस एक दो गुमटियां टूट गयी थी। इसकी उम्र के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है , क्‍यूंकि गांव के सारे बडे बुजुर्ग कहते आ रहे हैं कि उन्‍होने बचपन से ही इस पीपल के पेड को उसी रूप में देखा है। हमारे घर से दो सौ मीटर की दूरी पर स्थित मुहल्‍ले के छोटे से चौक  पर स्थित इस पीपल के पेड से हमारी कितनी यादें जुडी थी। किसी को पता बताना हो तो यही पीपल का पेड , बच्‍चों को कोई खेल खेलना हो , तो यही पीपल का पेड , मुहल्‍ले का कोई कार्यक्रम हो तो यहीं , बडे बुजुर्गों के बैठक से लेकर ताश पतते खेलने की जगह भी यही , मेले लगाने की भी जगह यही। कुछ खाना पीना हो तो बस पीपल के पेड के पास चले जाइए !


peepal ka ped

चित्र में जिस छोटे से चौक में मेन रोड पेटरवार कसमार लिखा है , वहीं तरह तरह की पंक्षियों का बसेरा वह विशालकाय पीपल का पेड हुआ करता था । चारो ओर के लोगों का यहां जुटना आसान था ,  दो दो मंदिर भी आसपास थे , उसके सामने की जमीन खाली पडी थी , जगह काफी हो जाती , इसलिए पर्व त्‍यौहार की भीड भी यहीं जुटती। हमारे गांव की एक नई बहू ने जब इस पीपल के पेड के प्रति पूरे मुहल्‍लेवालों की दीवानगी देखी तो पूछ ही बैठी , 'इस मुहल्‍ले वालों के जन्‍म के बाद उनके  गर्भनाल वहीं गाडे जाते हैं क्‍या ?'
peepal ka ped


कुछ दिन पहले तक गूगल मैप में इस पेड को साफ तौर पर देखा जा सकता था , मै दिल्‍ली जाने की हडबडी में इसे सेव भी न कर सकी। काफी दिनों तक यह पेड गिरा पडा रहा , अभी भी गूगल के चित्र में यह गिरा पडा है। मेरे चाचाजी के घर जानेवाला रास्‍ता बंद हो गया था , 11 मई को मेरी बहन का विवाह होना था , इसलिए सप्‍ताह भर के अंदर रास्‍ता साफ करना पडा। हमलोग विवाह के लिए 11 को वहां पहुंचे तो काफी सूनापन का अहसास हुआ। वहां पीपल के पेड की निर्जीव लकडियां पडी थी , हमने उसकी ही फोटो खींच ली।

peepal ka ped

अफसोस है ... नहीं रहा अब हमारे मुहल्‍ले का पीपल का पेड !!

नए वर्ष की अनंत शुभकामनायें .. जल्द ही हमारा एप्प आने वाला है !!

भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है। गणना की सुविधा को देखते हुए आज अंतर्राष्ट्रीय मानकों में अंग्रेजी केलेन्डर ने मान्यता पायी है ।पर ग्रंथों की मान्यता है कि सृष्टि की शुरुआत चैत्र शुदी १ को हुई थी, इसलिए इस दिन को नवसंवत्सर यानी साल का पहला दिन माना जाता है। नव वर्ष की प्रणाली ब्रह्माण्ड पर आधारित होती है, यह तब शुरु होता है जब सूर्य या चंद्रमा मेष के पहले बिंदु में प्रवेश करते हैं। पर प्रत्येक वर्ष सूर्य और चंद्रमा दोनों का उस विन्दु पर प्रवेश एक साथ नहीं होता, इसलिए भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इस तरह के कई संवत्सरों को मान्यता प्राप्त है। लगभग सभी प्रदेशों में अलग-अलग नामों से मार्च-अप्रैल के महीने में नया वर्ष मनाया जाता है। बंगाल में १४ या १५ अप्रैल को मनाया जाने वाला त्यौहार के साथ ही नए वर्ष मानाने का सिसिला समाप्त हो जाता है। यदि हम अंग्रेजी के केलिन्डर के नामों को देखें तो सितम्बर-अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर अंक ७-८-९-१० का प्रतिनिधित्व करता दिखता है। ऐसा भी तभी संभव है, जब साल की शुरुआत मार्च से हो। भारतवर्ष में मार्च-अप्रैल में वसंत का मौसम होता है, पेड़-पोधों मे फूल-मंजर-कली की शुरुआत होती है, कोयल की कूक वातावरण को खुशनुमा बनाती है। घर फसलों से भरे होते हैं, शायद इसलिए भी यह त्यौहार मानाने का समय माना जाता है।

हमारे क्लाइंट्स को हमारे अनुभव का लाभ अच्छे से पहुँच पाए, इसके लिए पिछले पांच साल से एक एप्प को लांच करने की आवश्यकता थी। पर परिवार में किसी न किसी की अस्वस्थता और पारिवारिक उलझनों की वजह से बात नहीं बन पा रही थी। पिछले साल से ही कठिन श्रम के बाद 'गत्यात्मक ज्योतिष' के एप्प को नए साल में लांच करने की पूरी तैयारी चल रही थी, पर नए साल से पहले ही २३ दिसम्बर २०१८ को मेरी मम्मी हमारा साथ छोड़कर ब्रह्माण्ड में विलीन हो गयी। आज नए वर्ष पर इसे लांच करने के लिए मैं दिल्ली आयी हूँ, पर 'गत्यात्मक ज्योतिष' के जनक हमारे पापाजी जरूरी कार्य से झारखण्ड में हैं। उनका आशीर्वाद के बिना कोई कार्य नहीं किया जा सकता, अतः पापाजी का इंतज़ार कर रही हूँ। अभी पुरे देश में नए वर्ष मानाने का सिलसिला चल ही रहा है, किसी प्रदेश के नए वर्ष पर हमारा एप्प प्लेस्टोर में आ जायेगा। यह भी हो सकता है कि १५ अप्रैल के बाद हम इसे प्लेस्टोर में डाल पाएं। यदि ऐसा हुआ तो 'गत्यात्मक ज्योतिष' के कारण भारतवर्ष में नया वर्ष मनाने का विस्तार १४ अप्रैल से भी आगे आगे बढ़ सकता है। जल्द ही आ रहा है हमारा एप्प , आप सबों को नए वर्ष की अनंत शुभकामनायें !!

एस्ट्रोलॉजर बनने के लिए क्या करें ?



Q- एस्ट्रोलॉजर बनने के लिए क्या करें ?

Ans- एस्ट्रोलॉजर बनने के लिए एस्ट्रोलॉजी की पढ़ाई करनी होगी , देश के कई विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में इसकी पढ़ाई करवाई जाती है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' भी शीघ्र ज्योतिषियों को ट्रेनिंग देने की व्यवस्था में है। 

Q- astrology ke liye kya padhai kare

Ans - ग्रहों के जड़ चेतन पर प्रभाव को समझना ज्योतिष का मुख्या विषय है , जिसे राशिचक्र , लग्न , भाव और सभी ग्रहों के माध्यम से आपको सिखाया  जाता है। 

Q - astrologer ka contact no.

Ans - गत्यात्मक ज्योतिष से जुड़े एस्ट्रोलॉजर का नंबर 8292466723  है 

Q - astrologer ka mobile no.

Ans - गत्यात्मक ज्योतिष से जुड़े एस्ट्रोलॉजर का नंबर 8292466723  है 

Q - astrology me kiska adhyayan kiya jata

Ans - ग्रहों के जड़ चेतन पर प्रभाव को समझना ज्योतिष का मुख्य विषय है , जिसे राशिचक्र , लग्न , भाव और सभी ग्रहों के माध्यम से आपको सिखाया  जाता है। 

Q - computer astrology kya hai

Ans - एस्ट्रोलॉजी के नियमों , सिद्धांतों को जब कंप्यूटर में कोडन के माध्यम से डाला जाता है तो इसे कंप्यूटर एस्ट्रोलॉजी।  इसके उपयोग करने से ज्योतिषियों को कम मेहनत करनी होती है।     

Q - astrology kiska adhyan h
 
Ans - एस्ट्रोलॉजी में आसमान , उसमे स्थित गृह नक्षत्र और उसके पृथ्वी पर प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। 

Q - astro match kya hai kise kehte h

Ans - विवाह से पहले वर वधू की की कुंडली को मिलाकर देखा जाता है , ताकि विवाह के बाद उनमे मतभेद न उभरे , इसी प्रक्रिया को ास्त्रो मैच कहते हैं। 

Q - graho ke upay ka scientific reason or astrology kya kaam karta hai

Ans - 'गत्यात्मक ज्योतिष' के द्वारा ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए कई प्रकार के अचूक उपाय किये जाते हैं,  जिसमे संगति  कलर-थेरेपी , दान-पुण्य , मुहूर्त की अंगूठी , पेड़-पौधों , । वैज्ञानिक ढंग से इसे प्रूफ कर  पाना बहुत कठिन है। 

 मै शीघ्र ही इस चैनल पर निःशुल्क ज्योतिष सिखलाने का कोर्स शुरू करनेवाली हूँ , चैनल को सब्सक्राइब करें ,  वीडियोज को देखक्रर ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त करें , उन्हें लाइक और शेयर करें , ताकि चैनल की रफ़्तार तेज हो और आपको नयी नयी जानकारिया मिलती रहें। 





मेरी पुस्तक का कौन सा संस्करण आपके पास है ?

पाठकों से अनुरोध है कि यदि उनके पास मेरी पुस्तक है तो यह जानकारी दें कि उसमे कौन सा एडिशन लिखा गया है। हमारे पाठकों में प्रकाशक भी हैं, लेखक भी। वकील भी हैं और पाठक भी।  मुझे एक और विचार देने का कष्ट करें कि इस परिस्थिति में मुझे क्या कदम उठाना चाहिए ? पूरी कहानी इस प्रकार है ....

20 वीं सदी के अंत में हमारे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष के क्षेत्र में गंभीर शोधकार्य चला। 21 वीं सदी के आरम्भ से पिताजी के साथ हम सभी बच्चे भी इस शोध का आगे ले जाने के लिए नियमित कार्य कर रहे हैं। ज्योतिष के विद्वानों को इस शोध-कार्य से परिचित करवाया जाये , मैंने एक पुस्तक लिखी , जो ज्योतिष की प्रचलित पुस्तकों से बिलकुल भिन्न हमारे खुद के अनुभव पर आधारित थी। वर्ष 1996 में ही एक प्रकाशक ने पुस्तक की 400 प्रति छापने और बेचने के लिए मुझसे सहमति ली । उस वक्त कितने छापे और बेचे, मुझे पता नहीं।

पुनः 1999 में दूसरे संस्करण के 400 पुस्तकें छपने के लिए उन्होंने मुझसे संपर्क किया और मैंने फिर उन्हें अनुमति दे दी। दोनों संस्करण में लगभग 8000 रुपये मुझे मिलने की बात हुई थी, पर काफी तकाजे के बाद उन्होंने मुझे पैसे न देकर उतने मूल्य की पुस्तकें ही भेजीं। दो-चार वर्ष बाद फिर से उनका पत्र मिला कि वे तीसरा संस्करण छापना चाहते हैं, मैंने अनुमति नहीं दी। ज्योतिष के क्षेत्र में मुझ जैसी पहली लेखिका की हिंदी किताब की इतनी अच्छी बिक्री से आप पुस्तक में मौजूद विषय की मजबूती का आकलन कर सकते हैं। तीसरी बार अनुमति न देने से मैं निश्चिन्त हो गयी कि अब मेरी पुस्तक नहीं छप रही है।

आश्चर्य तो तब हुआ, जब कुछ दिनों पूर्व हमारे ब्लॉग के एक-दो पाठकों ने जिक्र किया कि उन्होंने मेरी पुस्तक मंगवाकर पढ़ी। मैंने नेट पर देखा तो कई जगहों पर उपलब्ध थी, आमेजन पर भी। मुझे लगा कि 20 साल पुरानी पुस्तक में से ही बची हुई उपलब्ध होगी। मैं प्रकाशक के कार्यालय में गयी और बची पुस्तकों के बारे में जानकारी मांगी। मैंने कहा कि उनके पास पुस्तक हो तो मुझे दें। उन्होंने कई फटी हुई पुरानी किताबें मुझे दिखाईं और बोलै कि बस इतनी ही बची है।

मैंने अमेजन को ऑर्डर किया तो तीन दिन बाद पुस्तक मेरे घर पर आयी। बिलकुल नई पुस्तक में कॉपीराइट लेखिका के पास और एडिशन 2018 का लिखा गया था। मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि मेरी सहमति के बिना यह पुस्तक छापी और बेची जाती रही है। क्या इसमें 'गत्यात्मक ज्योतिष' को जन्म देनेवाले मेरे गुरु और पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी और मेरा हिस्सा नहीं होना चाहिए ?




काश अबतक इलाज की अन्य पद्धतियों को भी विकसित किया गया होता !!

2009 की बात है , शनिवार और रविवार को बच्‍चों की छुट्टियों की वजह से नींद देर से ही खुलती है । हां , कभी कभार फोन की घंटी नींद अवश्‍य तोड दिया करती है। ऐसे ही एक शनिवार भोर की अलसायी हुई नींद के आगोश में थी कि अचानक फोन की घंटी बजी। फोन उठाकर जैसे ही मैने ‘हलो’ कहा , वैसे छोटी बहन की दर्दनाक आवाज कानों में पडी , ‘दीदी , मुझे बचा लो , ये लोग मेरी जान ले लेंगे।’ मेरे तो होश ही उड गए , विवाह के दस वर्षों तक सबकुछ सामान्‍य रहने के बाद ससुराल में इसके जीवन में कौन सा खतरा आ गया। अपने को बहुत संभालते हुए पूछा , ‘क्‍या हुआ , पूरी बात बताओ ’ तब उसने जो बताया , वह लगभग शून्‍य हुए दिमाग को काफी राहत देनेवाली थी। दरअसल गर्मी की वजह या अन्‍य किसी वजह से कई दिनों से उसके शरीर के कई जगहों पर फोडे निकल गए थे , कुछ काफी बडे भी हो गए थे। शाम को डाक्‍टर ने बडे फोडों को जल्‍द आपरेशन करा लेने की सलाह दी थी। रात में इनलोगों में लंबी बहस चली थी , बहन के पति और श्‍वसुर डाक्‍टर की सलाह मान लेने को कह रहे थे और बहन एक दो दिन इंतजार करना चाह रही थी । सुबह सुबह अपनी हार को नजदीक पाकर उसने घबडाकर मुझे फोन लगा दिया था। अपनों का कष्‍ट देखना बहुत मुश्किल होता है , उसकी समस्‍या को हल करने के लिए मैने जैसे ही अपना दिमाग खपाया , एक उपाय नजर आ ही गया।

किसी भी फोडे के लिए आयुर्वेद की एक दवा है ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ , मैने बहुत दिन पूर्व उसका प्रयोग किया था और उसके चार छह घंटे के अंदर उसके प्रभाव से प्रभावित होकर कई बार दूसरों को भी उसके उपयोग की सलाह दी थी , जिसमें से किसी को भी उस दवा पर संदेह नहीं रह गया था। अगर फोडा शुरूआती दौर में हो तो , यह दवा उसे दबा देती है और यदि फोडा पक चुका हो , तो यह दवा उसके मवाद को बहा देती है , यानि फोडा किसी भी हालत में हो , उसका मुंह हो या नहीं , इसका उपयोग किया जा सकता है। बाद में घाव भी इसी दवा से ठीक हो जाता है , इसलिए मैने उसके पति से एक दिन का समय मांगा और बहन को उसी दवा के प्रयोग की सलाह दी। और मेरी आशा के अनुरूप ही रात में उसकी खनकती हुई आवाज कानों में पडी। फोडा बह चुका था , पाठक कभी भी बहुत कम कीमत की इस दवा की परीक्षा ले सकते हैं। एलोपैथी की कडी दवाओं या आपरेशन से बचने के लिए इस प्रकार के बहुत उपाय आयुर्वेद में हैं , जिनके बारे में या तो लोगों को जानकारी नहीं है या फिर वे विश्‍वास नहीं कर पाते।

कई बार छोटे बच्‍चों के कब्‍ज को लेकर अभिभावक की पारेशानी को देखकर डाक्‍टर लगातार एलोपैथी की दवा चलाते हैं । मैने ऐसे कई बच्‍चों को छोटी हर्रे घिसकर पिलाने की सलाह दी है और उससे बच्‍चों को फिर एलोपैथी की दवा की जरूरत नहीं रह गयी है। तुलसी , अदरक का रस और मधु को साथ मिलाकर बच्‍चों को पिलाने से सर्दी ठीक हो जाती है , बडे भी इसका काढा पीकर सर्दी ठीक कर सकते हैं। बडे पत्‍ते वाली तुलसी , जो कि घर में नहीं लगायी जाती , वह कुछ बीमारियों में बहुत कारगर होती है। मेरी एक भांजी के पैर में घुटने के नीचे कुछ दाने हो गए , कभी कभी नोचने भी लगे , देखते ही देखते बढने भी लगे। हमने एलोपैथी के चर्मरोग विशेषज्ञ को दिखाया , उसकी कई दवाएं चली , पर कम अधिक होता रहा , जड से नहीं मिटा। हारकर हमने होम्‍योपैथी के डाक्‍टर से दिखाया। पहले सप्‍ताह की दवा से उसने बीमारी बढने की उम्‍मीद की , वह सही रहा , पर दूसरे सप्‍ताह से बीमारी में जो कमी होनी चाहिए थी , वह नहीं हुई और पहले से बडी समस्‍या देखकर हमलोग और घबडा गए। 

कुछ दिन बाद हमारे गांव से एक व्‍यक्ति आए , उन्‍होने देखा और अपनी दवाई सुझा दी , और उनकी दवाई से पूरा इन्‍फेक्‍शन समाप्‍त । दवाई का नाम सुनेंगे , तो आप चौंक ही जाएंगे , दवा थी , गाय के ताजे दूध का फेन। एक महीने में बीमारी समाप्‍त हो गयी। बचपन से बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ रहे मेरे बडे बेटे को 12 वर्ष की उम्र के बाद सालोभर सर्दी खांसी रहने लगी , पांच छह वर्षों तक एलोपैथी की दवा चलाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ , डाक्‍टर कहा करते थे कि ध्‍यान दें , इसे किस चीज से एलर्जी है , उससे दूर रखें , पर इतने दिनों तक हमें कुछ भी समझ में न आया , जितनी सावधानी बरतते , सर्दी खांसी उतनी ही अधिक परेशान करती थी। अंत में हारकर हमलोगों ने होम्‍योपैथी की दवा चलायी , और छह महीने में एलर्जी जड से दूर। हर वक्‍त टोपी , मफलर , मोजे में अपने को पैक रखने वाले और हर ठंडा खाना से वंचित रहनेवाले उसी बेटे को आज कहीं भी किसी परहेज की जरूरत नहीं होती है। ऐसी अन्‍य बहुत सारी घटनाएं हैं , जिसके कारण एलोपैथी से इतर पद्धतियों पर भी मेरा भरोसा बना हुआ है।

एलोपैथी के साइड इफेक्‍ट के कारण उत्‍पन्‍न होने वाली बहुत सी सारी शारीरिक समस्‍याओं के बावजूद भी इलाज की सर्वोत्‍तम पद्धति के रूप में अभी एलोपैथी का नाम ही लिया जा सकता है । एलोपैथी की सफलता को देखते हुए मै भी इसे स्‍वीकारती हूं , वैसे इसका सबसे बडा कारण इस मद में किया जानेवाला खर्च है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता । पर छोटी छोटी बीमारियों के लिए ही सही , जहां पर हमारी ये देशी दवाएं कारगर है , वहां एलोपैथी का प्रयोग किया जाना क्‍या उचित है ? लोग ये जानते हैं कि सरदर्द हो , तो दर्दनिवारक गोली लेनी है , पर ये क्‍यूं नहीं जानते कि फोडा होने पर ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ का प्रयोग करना है। ताज्‍जुब की बात है कि यहां की इतनी सटीक देशी दवाइयों की जानकारी यहीं के ही लोगों को मालूम नहीं है। शिक्षा का मतलब अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति और ज्ञान को भूल जाना नहीं होता , पर आजतक ऐसा ही होता आया है , जो हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को दोषपूर्ण तो ठहरा ही देता है। युग बदलने के साथ ही साथ हर पद्धति का विकास किया जाना अधिक आवश्‍यक है , जब तक हर क्षेत्र का समानुपातिक विकास न हो , एक क्षेत्र की अंधी दौड में हमें शामिल नहीं होना चाहिए।