बाबा नागेश्वर नाथ का दर्शन और पूजन

baba Nageshwar dham 

बाबा नागेश्वर नाथ के दर्शन और पूजन से भक्‍तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं !!


पिछली बार गांव गयी तो सीतामढी जिले के एक प्रखंड पुपरी में स्थित बाबा नागेश्‍वर नाथ धाम जाने का मौका मिला। शहर के बाजार के बीचोबीच एक छोटे से प्रांगन में स्थित इस मंदिर की महत्‍ता दूर दूर तक फैली हुई है। कहते हैं कि लगभग 40 वर्ष पूर्व यहां एक खेल का मैदान था। कुछ बच्‍चे मैदान में खेल रहे थे कि छोटा सा कंचा पेड के नीचे एक दरार में फंस गया। बच्‍चे ज्‍यों ज्‍यों इस कंचे को निकालने की कोशिश करते , यह और नीचे गहरे चला जाता। बच्‍चों ने खुरपी लाकर वहां से कंचा निकालना चाहा तो अंदर से पत्‍थर टकराने की आवाज आयी। उस आवाज की दिशा में खोदते हुए बच्‍चों ने जब अच्‍छी खासी मिट्टी निकाल ली , तो वहां एक शिवलिंग मिला । इसे संयोग ही कह सकते हैं कि जिस बच्‍चे को यह मिला , उसका नाम नागेश्‍वर था । खबर पूरे कस्‍बे तक आग की तरह फैली , सबने इनके लिए एक मंदिर का निर्माण किया। इस तरह यह माना जाने लगा कि इस स्‍थान पर बाबा नागेश्वर नाथ के रूप में शंकर भगवान ने स्‍वयं को यहां स्‍थापित किया है , तो इसकी महत्‍ता निर्विवाद होनी ही थी। माना जाता है कि बाबा नागेश्वर नाथ के दर्शन और पूजन से भक्‍तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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सावन के महीने में शिव शंकर की भक्ति में रमे शिव भक्तों की भक्ति यहां देखते ही बनती है। लाल पीले परिधान में कहीं कांवर लेकर जाते, तो कहीं बोल बम की जयकार लगाते ओम नम: शिवाय का जाप के साथ जलाभिषेक करते पूरे दिन विभिन्न नदी घाटों से जल लेकर पहुंचते है और बाबा नागेश्वर नाथ महादेव का जलाभिषेक करते हैं।

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    हमारी काल गणना अधिक सटीक है !!

     

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    प्राचीन काल से ही लोगों को यह समझ में आ गया था कि आसमान के ग्रह नक्षत्रों की चाल एक समान है , इसलिए ‘समय’ की जानकारी के लिए इसे सटीक आधार के रूप में मान्‍यता दी गयी। आसमान में सूर्य की स्थिति के आधार पर ग्रामीण दिन के प्रहर के और नक्षत्रों और तारों की स्थिति के आधार पर रात के प्रहर का आकलन करते थे। इसी प्रकार चंद्रमा के आकार को देखकर महीने के दिनों की गिनती करते थे। वसंत के महीने से ही चन्द्रमा के पूर्ण स्वरुप को देखते हुए एक एक माह का अंत करते गए, इस तरह वसंत के शुरुआत से दूसरे साल तक चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन, भाद्रपद (भादो) , आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन), पौष, माघ , फाल्गुन जैसे 12 महीने बने। इस विषय पर पिछले दिन मैने पोस्‍ट लिखा था और अधिकमास की गणनाका कारण बतलाया था , तो कुछ पाठकों को ऐसा महसूस हुआ कि अंग्रेजी कैलेण्‍डर अधिक वैज्ञानिक हैं और इसी कारण हमें अपने पंचांग को उसके अनुरूप बनाने के लिए 13 महीने का एक कैलेण्‍डर बनाना पडता है।

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    उन पाठकों को मैं जानकारी देना चाहूंगी कि अंग्रेजी कैलेण्‍डर का यह 2009 वां वर्ष चल रहा है , जबकि हमारे भारतीय विक्रमी संवत् का 2066 वां वर्ष चल रहा है । यानि कैलेण्‍डर के रूप में भी देखा जाए तो हम अंग्रेजी कैलेण्‍डर से 57 वर्ष आगे चल रहे हैं और गणना के ख्‍याल से देखा जाए तो हम और भी कितने आगे रहे होंगे , इसका अनुमान भी करना मुश्किल है । वैसे जो भी हो , सभी ग्रहों की चाल को देखते हुए इस प्रकार के कैलेण्‍डर को भले ही आमजनों के मध्‍य लोकप्रियता न मिल पायी हो , पर हमारे ऋषि महर्षियों के विलक्षण प्रतिभा को तो सिद्ध कर ही देती है । हमारे ऋषि मुनियों को सौर वर्ष और चंद्र वर्ष दोनो की जानकारी थी , तभी तो वे इस प्रकार का समायोजन कर सके थे।


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    अंग्रेजी कैलेण्‍डरों का सौरवर्ष सूर्य की परिक्रमा करती पृथ्‍वी पर आधारित है , 1 जनवरी को इस पथ पर पृथ्‍वी जहां पर स्थित होती है , वहां से वर्ष की शुरूआत की जाती है , जबकि 31 दिसम्‍बर को अंत। इसके विपरीत, हमारा सौर वर्ष का आकलन पृथ्‍वी को स्थिर मानते हुए आसमान के 360 डिग्री में चलते हुए सूर्य पर आधारित था। इस 360 डिग्री को 12 भागों में यानि 30-30 डिग्री में विभाजित कर उसमें सूर्य की स्थिति के आधार पर एक सौर मास का आकलन होता था। इसका आरंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश यानि 14 अप्रैल से शुरू होकर 13 अप्रैल को समाप्‍त होता है । हमारे देश में अनेक त्‍यौहार लोहडी , बैशाखी , मकर संक्रांति आदि सूर्य के खास राशि प्रवेश के आधार पर भी मनाए जाते रहे हैं।

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    इस प्रकार हमारे पंचांग के अनुसार की गयी यह गणना जटिल होने के बावजूद अधिक वैज्ञानिक मानी जा सकती है। यदि किसी व्‍यक्ति का अपना जन्‍म अंग्रेजी तिथि और जन्‍म समय बताए तो उससे आप सिर्फ उसके जन्‍म के समय के ऋतु को जान सकते हैं , पर वह हमारे पंचांगों के अनुसार अपनी जन्‍म तिथि और जन्‍मसमय बतलाए , तो आप न सिर्फ मौसम , वरन रात के अंधेरे-उजाले का भी अनुमान लगा सकते हैं , इसी प्रकार अंग्रेजी त्‍यौहारों की चर्चा हो , तो हमें सिर्फ उस मौसम की ही जानकारी मिल सकती है , पर हिन्‍दी त्‍यौहारों की चर्चा हो रही है तो सूर्य के साथ ही साथ चंद्रमा की भी स्थिति हमारी समझ में आ जाती है।

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      'गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता' तैयार करने में देर

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      गत्यात्मक ज्योतिष के रिसर्च के बाद ज्योतिष के हर क्षेत्र में गत्यात्मकता आ सकती है।  पिछले कई आलेखों में मैने भृगु ज्योतिष के बारे में आपको जानकारी देने का प्रयास किया है , पिछली कडी में मैने बताया था कि किस प्रकार मेरे द्वारा तैयार की गयी 'गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता' नष्‍ट हो गयी। पर 144 शीटोंवाले एक्‍सेल प्रोग्राम का बच जाना मेरे लिए काफी राहत भरा था , जिसके द्वारा किसी भी 'गत्‍यात्‍मक समय भृगुसंहिता' तैयार की जा सकती थी। पर पहले की तुलना में कुछ अच्‍छा तैयार करने की सोंच के कारण ही चार पांच वर्ष व्‍यतीत हो जाने पर भी मैं उस दिशा में काम न कर सकी।

      Bhrigu Samhita

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      एक्‍सेल में बने प्रोग्राम से मेरे मनोनुकूल काम होते न देख मैने प्रोग्रामिंग सीखने का निश्‍चय किया। सी++ सीखने के लिए मुझे जितना समय देना पडता या जितना ध्‍यान लगाना पडता , शायद मैं नहीं दे सकती थी। उसकी तुलना में विज्‍युअल बेसिक काफी आसान था , इसलिए मैने विज्‍युअल बेसिक सीखने के लिए इंस्‍टीच्‍यूट में एडमिशन ले लिया। इसे सीखते सीखते ही घर पर ज्‍योतिष के 'गत्‍यात्‍मक सिद्धांतों' के आधार पर एक साफ्टवेयर भी तैयार करने लगी , ताकि इसे बनाने में कोई समस्‍या हो , तो कंप्‍यूटर के जानकारों से पूछा जा सके। 
      पर ज्‍योतिष के सिद्धांत इतने आसान भी नहीं कि वे समस्‍याओं को तुरंत हल कर पाते , मुझे ही स्‍वयं दिन रात जगकर इस काम को अंजाम देना पडा और कामभर प्रोग्रामिंग किया हुआ मेरा साफ्टवेयर कुछ ही दिनों में तैयार हो गया , जो अभी भी सिर्फ जन्‍मतिथि , जन्‍मसमय और जन्‍मस्‍थान के आधार पर जातक के जीवनभर के उतार चढाव का ग्राफ के साथ ही साथ कई तरह की भविष्‍यवाणी करने में भी समर्थ है।
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      विज्‍युअल बेसिक सीखने के बाद मुझे महसूस हुआ कि एम एस वर्ड के मेल मर्ज की तुलना में विज्‍युअल बेसिक द्वारा और अच्‍छे ढंग से 'गत्‍यात्‍मक भृगु संहिता' को तैयार किया जा सकता है। इस कारण मेल मर्ज द्वारा फिर से बनाए जानेवाले भृगुसंहिता के काम में रूकावट आ गयी और नए तरह की भृगुसंहिता को बनाने की दिशा में सोंच बनीं। 
      पर कोई काम अनायास जितनी तेजी से हो जाता है , अधिक तैयारी के क्रम में उतनी ही देर लगती है। पहले से बने हुए उस एक्‍सेल शीट को भी पापाजी के द्वारा संपादित कराने की इच्‍छा थी , पर न तो उनका मेरे यहां लम्‍बी अवधि के लिए आना हो पा रहा है और न ही मैं उनके यहां जा पा रही हूं, जो कि देर होने का मुख्‍य कारण है।
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      पुस्‍तक के रूप में जो 'गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता' तैयार हुई थी , उसमें व्‍यक्ति के ग्राफ के अनुसार किसी एक ग्रह के हिसाब से उसकी उम्र के आधार पर भविष्‍यवाणी की जाती थी। पर मेरे मनोनुकूल अब जो भृगुसंहिता बनेगी , उसे साफ्टवेयर ही समझा जाए और इसमें अपना जन्‍मविवरण डालने के बाद यह उम्र के साथ नहीं , वरन् ईस्‍वी के साथ भविष्‍यवाणी कर सकेगी। वैसे मेरे अभी बने प्रोग्राम में भी इसकी सुविधा है , पर वह विस्‍तृत में न होकर संक्षेप में है। 

      हमारे केंद्र से जन्मकुंडली बनवाने पर पुरे जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ साथ इस प्रोग्राम की भविष्यवाणियाँ भी आपको दी जाती हैं। आगे मेरा जो कार्यक्रम है , उसमें भाषा ऐसी सरल रहेगी कि लोगों का अपनी जीवनयात्रा के बारे में , आनेवाली परिस्थितियों के बारे में पहले से ही सबकुछ समझ में आ जाएगा और इस आधार पर अपने समय से तालमेल बिठाते हुए वे अपनी आगे की योजना बना पाएंगे।

      'गत्यात्मक ज्योतिष' आधारित धारणा पर संगीता पुरी की ई-पुस्तकों को प्राप्त करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें!

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        मेरे द्वारा रची गयी गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता नष्‍ट

         

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        गत्यात्मक ज्योतिष ने आज के आधुनिक युग के अनुरूप गत्यात्मक भृगु संहिता के लेखन की दिशा में बड़ा काम किया है। पिछले दो कडी में मैने भृगुसंहिता के बारे में कुछ जानकारियां दी थी , पर दूसरे सामयिक मुद्दों में व्‍यस्‍तता बन जाने से उसकी आगे की कडी में रूकावट आ गयी थी। जहां पहली कडी में मैने इस कालजयी रचना के आधार को बताया था , वहीं दूसरी कडी में मैने अपने पिताजी के द्वारा लिखी जा रही गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता के अधूरे ही रह जाने की जानकारी दी थी। 

        अपनी जबाबदेही के समाप्‍त होने के बावजूद प्रकाशकों के किसी प्रकार की दिलचस्‍पी न लेने से मेरे पिताजी गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता का आधा भाग लिखने के बाद उसे और आगे न बढा सके तथा उनके द्वारा लिखा गया गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता का आधा भाग मेरे पास ज्‍यों का त्‍यों सुरक्षित रहा। उनके अधूरे सपने को पूरा करने की दृढ इच्‍छा होने के कारण इस गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता को भी पूरा करने की लालसा मेरे भीतर उमडती तो अवश्‍य थी , पर मुझमें इतनी योग्‍यता भी नहीं थी कि उनकी भाषा से सामंजस्‍य बनाकर इसका आधा भाग लिख सकूं और पिताजी आगे बढने को तैयार ही नहीं थे, इस कारण मैं मायूस थी।

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        पर जीवन में नित्‍य नए नए प्रयोग करते रहने के शौक ने मुझे शांत बैठने नहीं दिया और मैने ’गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सूत्रों को कंप्‍यूटर में डालकर उसके द्वारा किसी व्‍यक्ति के जीवन के उतार चढाव और अन्‍य प्रकार के सुख दुख से संबंधित ग्राफों को प्राप्‍त करने के लिए 2002 में कंप्‍यूटर इंस्‍टीच्‍यूट में दाखिला ले लिया। 2003 में मैने एम एस आफिस सीखने के क्रम में ही ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सूत्रों पर आधारित मैने पहला प्रोग्राम एम एस एक्‍सेल की शीट पर बनाया , जिसमें जन्‍मविवरण डालने के बाद कुछ मेहनत भी करनी पडती थी , पर वह हमारे सिद्धांतों के अनुरूप ही हर प्रकार के ग्राफ देने में सफल था। पर मुख्‍य मुद्दा तो उसके लिए भविष्‍यवाणियां दे पाना था , जिसके लिए एक्‍सेल ही पर्याप्‍त नहीं था।

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        जब मै एम एस वर्ड के 'मेल मर्ज' प्रोग्राम को समझने में समर्थ हुई , भृगुसंहिता तैयार करने के लिए एक शार्टकट रास्‍ता नजर आ ही गया। पिताजी के द्वारा छह लग्‍न तक के तैयार किए गए वाक्‍यों को चुन चुनकर 'मेल मर्ज' का उपयोग करके बारहों लग्‍न तक की भविष्‍यवाणियां तैयार की जा सकती थी। 

        पर भले ही यह शार्टकट था , पर इसमें भी कम मेहनत नहीं लगनी थी , क्‍यूंकि जहां भृगुसंहिता के ओरिजिनल में 1296 प्रकार के फलादेश और पिताजी के लिखे गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता में 2016 अनुच्‍छेद होते , वहीं मेरे द्वारा कंप्‍यूटर में तैयार होनेवाले इस गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता में 40,320 अनुच्‍छेद या इसे पृष्‍ठ ही कहें , क्‍यूंकि तबतक ग्रहों की अन्‍य कई प्रकार की शक्तियों की खोज की जा चुकी थी।

         पिताजी के लिखे भाग से मुख्‍य वाक्‍यों को श्रेणी बनाकर अलग करना , उसे एम एस एक्‍सेल में ग्रहों की शक्ति के आधार पर 40 तरह के शीट बनाकर 12 ग्रहों * 12 राशियों = 144 सेल तक लिखना , फिर सभी ग्रहों की 7 ग्रहों के बारे में अगले पन्‍नों पर भिन्‍न भिन्‍न बातों को लिखकर उससे उन 144 शीटों का मेल मर्ज करना आसान तो नहीं था, मुझे इसमें एक वर्ष से उपर ही लगे। पर इससे 12 * 12 * 7 * 40 = 40,320 पन्‍नों की एक भृगुसंहिता तैयार हो गयी , अपने सपने को पूरा हुआ देखकर मुझे खुशी तो बहुत हुई ,मुझे लगा की इस प्रकार मैं गत्यात्मक भृगु संहिता को ऑनलाइन एक एक तक पहुंचा सकती हूँ।

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        पर इसे पढने पर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इसे बनाने में मुझे थोडा समय और देना चाहिए था, लेकिन मैं आत्म विश्वास में थी कि ऐसा करना संभव है। खुद की लिखी भाषा और कंप्‍यूटर के द्वारा तैयार की जानेवाली भाषा में कुछ तो अंतर होता ही है , भविष्‍यवाणियां बहुत स्‍वाभाविक ढंग से लिखी गयी नहीं लग रही थी , पर प्रयोग के समय एक एक अनुच्‍छेद को एडिट करते हुए इसे सामान्‍य बनाना कठिन भी नहीं था। कुछ दिनों तक एडिट कर और प्रिंट निकालकर मैने इसकी भविष्‍यवाणियां लोगों को वितरित भी की , खासकर भविष्‍यवाणियों का उम्र के साथ तालमेल काफी अच्‍छा था , जो इसे लोकप्रिय बनाने के लिए काफी था। लोग ऑनलाइन इसे पढ़ सकते थे।

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        ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार एक्‍सेल प्रोग्राम में किसी व्‍यक्ति का जीवन ग्राफ जो भी दर्शाता था , उसे यह प्रोग्राम शब्‍दों में बखूबी अभिव्‍यक्‍त कर देता था। यह प्रोग्राम अंदर किसी फोल्‍डर में पडा था , बार बार प्रयोग के क्रम में दिक्‍कत होने से मैने डेस्‍कटाप पर ही इसका शार्टकट बना लिया था। पहली बार कंप्‍यूटर को फारमैट करने की नौबत आयी , सारे फाइलों को सीडी में राइट करके रखा गया , पर अनुभवहीनता के कारण इस प्रोग्राम को कापी करने की जगह इसकेशार्टकट को ही कापी कर लिया गया और कंप्‍यूटर फारमैट हो गया और इसके साथ ही सारी मेहनत फिर से बेकार। 

        पर 40 शीटों के एक्‍सेल के उस फाइल का सीडी में बच जाना बहुत राहत देनेवाला था, क्‍यूंकि उसके सहारे कभी भी नई गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता तैयार की जा सकती थी। लेकिन अधिक तैयारी करने में अधिक देर हो जाती है , पर अभी तक उसपर काम करना संभव न हो सका। अगली कडी में इस बात की चर्चा करूंगी कि गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता के निर्माण के लिए मेरा अगला कदम क्‍या होगा ??

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          आधी-अधूरी गत्‍यात्‍मक भृगु संहिता

           Bhrigu Samhita kundli in Hindi

          मेरे पिछले पोस्‍ट में आपलोगों ने महर्षि भृगु द्वारा उस युग के अनुरूप लिखी गयी ‘भृगुसंहिता’ ग्रंथ के बारे में जानकारी प्राप्‍त की , भविष्‍यवाणियों के लिए यह एक बहुत ही अच्‍छी पांडुलिपी रही होगी । पर इसे आधुनिक युग की जीवनशैली के सापेक्ष देखा जाए , तो उसमें बहुत सारी खूबियों के साथ ही साथ कुछ कमियां भी दिखाई पडने लगी। इसका मुख्‍य कारण यही था कि इस ग्रंथ में ग्रहों की स्थिति के आधार पर ही फलाफल की चर्चा की गयी थी , जिसकी चर्चा मैं पिछले पोस्‍ट में कर चुकी हूं । वैसे षष्‍ठ , अष्‍टम और द्वादश भाव की नयी व्‍याख्‍या करते हुए मैने एक और लेख लिखा है , जिसे अवश्‍य पढ लें , क्‍यूंकि इसे पढ लेने पर यह बात और स्‍पष्‍ट हो जाएगी कि ज्‍योतिष के प्राचीन सिद्धांतों को आज की कसौटी पर कसना क्‍यूं आवश्‍यक है। गत्यात्मक ज्योतिष यह काम बखूबी क्र रहा है। 

          Grah sthiti in kundali

          ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार भृगु संहिता कुंडली को पढ़ने के लिए ग्रहों की शक्ति के आकलन और खासकर ग्रह जिस राशि में स्थित हों , उसके राशिश के सापेक्षिक शक्ति के आकलन के सूत्र की खोज के बाद 1990 में ही यह स्‍पष्‍ट हो गया था कि एक ही स्थिति में होने के बावजूद सारे ग्रह कब धनात्‍मक प्रभाव दे सकते हैं और कब ऋणात्‍मक। इसलिए इस आधार पर भविष्‍यवाणी किया जाना अधिक उपयुक्‍त हो सकता है , इसे ध्‍यान में रखते हुए श्री विद्यासागर महथा जी के द्वारा एक नई गत्यात्मक भृगुसंहिता कुंडली रचने की दिशा में लेखन शुरू कर दिया गया। 1996 में जब मेरी पुस्‍तक प्रकाशित हुई, तो उसके प्रस्‍तावना में उन्‍होने बहुत जल्‍द निकट भविष्‍य में ही ‘गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता’ को बाजार में उपलब्‍ध कराने का पाठकों से वादा भी किया था।

          Bhrigu Samhita kundli in Hindi


          Bhrigu samhita in hindi

          चूंकि राहू और केतु के प्रभाव को ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ अभी तक स्‍पष्‍टत: नहीं समझ सका है , इसलिए इसकी चर्चा इस पुस्‍तक में नहीं की जा रही थी। पर अन्‍य सातों ग्रहों के बारह राशियों और बारह लग्‍नानुसार ग्रहों के धनात्‍मक और ऋणात्‍मक फलाफल को देखते हुए 7*12*12*2 = 2016 अनुच्‍छेद लिखकर ही इस ग्रंथ को पूरा किया जा सकता था। अपने पूरे जुनून और दृढ इच्‍छा शक्ति के बावजूद बहुत ही सटीक ढंग से वे इसे आधा (कन्‍या लग्‍न तक) यानि 1000 अनुच्‍देद ही पूरा कर सके थे कि कुछ पारिवारिक जबाबदेहियां पुन: उनका रास्‍ता रोककर खडी हो गयी । वैसे इस हालत में भी उस भृगुसंहिता का एक भाग तो प्रकाशित किया ही जा सकता था , पर उसे पूर्ण तौर पर समझने के लिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के मूल नियमों को समझना आवश्‍यक था , जिसके लिए एक अन्‍य पुस्‍तक को प्रकाशित करना आवश्‍यक था , जो पहले से ही लिखी जा चुकी थी।

          Grah sthiti in kundali

          पर आश्‍चर्य की बात है कि बोकारो से भेजी गयी मुझ जैसी अनुभवहीन लेखिका की पहली पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति : ग्रहों का प्रभाव’ को पहली बार में ही एक प्रकाशक ने प्रकाशित कर दिया , पर 1975 में अपने पांच लेखों के आधार पर पूरे भारतवर्ष के ज्‍योतिषियों के मध्‍य प्रथम पुरस्‍कार जीतनेवाले और 80 के दशक में ही अपनी मौलिकता के लिए सभी वरिष्‍ठ ज्‍योतिषियों के मध्‍य चर्चित रहे श्री विद्यासागर महथा जी की पुस्‍तकों को बिना किसी शर्त के भी प्रकाशित करने में दिल्‍ली के इतने सारे प्रकाशकों में से किसी ने कोई दिलचस्‍पी नहीं ली , जबकि वे उन दिनों दिल्‍ली में ही निवास कर रहे थे। इस पुस्‍तक को प्रकाशित करने में प्रकाशकों के सामने जो समस्‍या आ रही थी , उसका उन्‍होने खुलकर जिक्र किया था , जिसकी चर्चा करना उचित नहीं ।

          Bhrigu samhita kundli in hindi

          प्रकाशकों की उपेक्षा को देखते हुए उनके कई मित्रों ने इस पुस्‍तक को स्‍वयं प्रकाशित करने की सलाह दी , पर जहां एक ओर उस पुस्‍तक को समझने के लिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सिद्धांतों को समझना आवश्‍यक था , वहीं इस नई पद्धति के लिए प्रचुर प्रचार प्रसार की भी आवश्‍यकता थी। इतनी मेहनत कर पाने में जहां एक ओर दिन ब दिन उनकी उम्र का बढोत्‍तरी और व्‍यावहारिक मामलों की कमी जबाब देता जा रहा था , वहां मैं भी अपनी पारिवारिक जिम्‍मेदारियों यानि दोनो बेटों के पालन पोषण में फंसते चले जाने से समय की कमी महसूस कर रही थी। पुस्‍तकों के प्रकाशित नहीं हो पाने के कारण उनके उत्‍साह में थोडी कमी का आना स्‍वाभाविक था , इस कारण उनके प्रशंसकों के लगातार पत्र आने और मेरे लाख अनुरोध के बावजूद भी वे उस भृगुसंहिता को आगे नहीं बढा सके और उनके हाथो से लिखी आधी-अधूरी भृगुसंहिता ही अभी तक वैसी ही स्थिति में डायरी में सुरक्षित पडी है । इससे आगे क्‍या हुआ , इसकी चर्चा पुन: अगली कडी में हो पाएगी।

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