फलित ज्योतिषः सांकेतिक विज्ञान

 Jyotish learning in Hindi

How to Learn jyotish in hindi

फलित ज्योतिष ग्रहों का मानवजीवन पर पड़नेवाले प्रभाव का अध्ययन करता है। भारत ऋषियों, मुनियों, विचारकों, गणितज्ञों और वैज्ञानिकों का देश रहा है। ज्योतिष के साथ ही साथ यहां अनेक विद्याओं का जन्म हुआ। उसके बाद पूरे विश्व में इसका प्रचार और प्रसार हुआ। पाश्चात्य देश अभी भी कई प्रकार की विद्या का जनक भारत को ही मानते हैं। ज्योतिष और गणित के क्षेत्र में विश्व को भारत का बड़ा योगदान मिला है। प्राचीन भारत में जब हर प्रकार के वैज्ञानिक साधनों का अभाव था , ज्योतिष का जितना भी विकास हुआ , हम भारतवासियों के लिए गर्व की बात है।

गणित के क्षेत्र में ब्रह्मांड का 12 भागों में विभाजन, सभी राशियों का नामकरण, नवों ग्रहों का अधिकार क्षेत्र के साथ ही साथ सौर वर्ष , चंद्रवर्ष , सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण जैसी घटनाओं का घटीपल तक ज्ञात कर लेना निस्संदेह उस युग के लिए बहुत बड़ी बात थी। फलित ज्योतिष के क्षेत्र में जन्मपत्री का निर्माण तथा अन्य ज्योतिषीय भविष्यवाणियां होती थी , जिसमें शतप्रतिशत न सही , लेकिन कुछ हद तक सत्यता अवश्य होती थी, यही कारण था कि प्राचीन राजा महाराजाओं के पास एक ज्योतिषी अवश्य रखे जाते थे , जो राजघराने में उत्पन्न बच्चों की जन्मपत्रियों का निर्माण ,अन्य भविष्यवाणियों की गणना तथा अनेक राजकार्यों के लिए मुहूर्त्त का निर्धारण करते थे।

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भारतवर्ष में आज भी कुंडली बनाने , मुहूर्त्त निकालने तथा वरवधू की कुंडली मिलाने के लिए ज्योतिषियों की जरूरत पड़ती है , लेकिन आज यह विडम्बना ही है कि फलित ज्योतिष महलों से निकलकर सड़कों पर आ पड़ा है। आज अनेक ज्योतिषियों को सड़कों पर कुछ ज्योतिषीय पुस्तकों के साथ देखा जा सकता है , जो उसी के सहारे आतेजाते राहगीरों का कुछ पैसे ऐंठ लेते हैं।यही कारण है कि इतने वर्षों बाद भी इस क्षेत्र में कोई विकास नहीं हुआ। फलित ज्योतिष जैसे विषय से आज जनता का विश्वास ही उठ गया है। इसका मुख्य कारण ज्योतिष का परंपरागत व्यवसाय के रूप में सिमटकर रह जाना है। वे लम्बेलम्बे खर्चवाले अनुष्ठानों और पूजापाठ के द्वारा बिगड़े ग्रहों को तो शांत करने में असफल रहते हैं, पर इससे परेशान लोग और परेशान होते हैं।ज्योतिषी ज्योतिष की आड़ में अपने पैसे की हवस को पूरा करना चाहते हैं , इस कारण समझदार लोग अपने को ज्योतिषियों के चंगुल में फंसने से बचाना चाहते हैं।

चिन्तनशील विचारक पाठकों, आपके मन में ज्योतिष से सम्बंधित कोई भी प्रश्न उपस्थित हो , सकारात्मक तार्किक बहस के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप (jyotish whatsapp group link) में आपका स्वागत है , क्लिक करें !

मनुष्य का जीवन दुख और सुख से मिलकर बना है। प्राचीनकाल की अनेक कहानियों और आधुनिक जीवन के अनेक उदाहरणों से स्पष्ट है कि मनुष्य का जीवन सुख और दुख दोनों का अनुभव करने के लिए है। इसमें ग्रहों का विशेष प्रभाव पड़ता है। हमने अपने अध्ययन में पाया है कि ग्रहों के अनुसार ही मनुष्य के सामने विशेष काल में विशेष परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं , जिसका सामना उसे करना पड़ता है। किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि मनुष्य की मेहनत का कोई मूल्य नहीं है। ग्रह वास्तव में मनुष्य के स्वभाव , बनावट और परिस्थितियों को नियंत्रित करता है , पर वह व्यक्ति की मेहनत , बदलते युग , बढ़ते स्तर और माहौल को नहीं नियंत्रित कर सकता , उसमें भले ही कमी और बेशी ले आवे।

लग्नकुंडली

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विश्व में प्रति सेकण्ड एक बच्चा जन्म लेता है , इस प्रकार प्रति मिनट 60 , प्रति घंटे 3600 और एक दिन में 86400 बच्चे जन्म लेते हैं। इनमें से 7200 बच्चों की कुंडली बिल्कुल एक जैसी होती है , लेकिन उनमें से सभी बच्चे एक सी उंचाई हासिल नहीं करते। उंचाई हासिल करने के लिए मेहनत और परिस्थिति दोनो ही बड़ी चीज होती है। बहुत से ज्योतिषी किसी जन्मकुंडली में गौतम बुद्ध , राजा रामचंद्र , कृष्णजी , इंदिरा गांधी और महात्मा गांधी या किसी अन्य महान पुरूष का कोई एक योग देखकर ही कह उठते हैं-----.'अरे , तुम्हें तो राजा बनना है' या 'तुम्हारी तो 50 लाख की लाटरी लगनेवाली है' इस प्रकार की भविष्यवाणी ग्राहकों को खुश करनेवाली एक चाल है। एक योग में पैदा होनेवाले सभी बच्चों में कोई मजदूर , तो कोई कलर्क , कोई आफिसर तो कोई व्यवसायी और कोई मंत्री के घर जन्म लेता है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में आर्थिक , शैक्षणिक और अन्य वातावरण ग्रह से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

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बदलते युग के साथ भी ग्रहों के प्रभाव में परिवर्तन होता है। यदि किसी जन्मकुंडली में मजबूत संतान पक्ष है , तो वह मातृप्रधान युग में सामान्य व्यक्ति के लिए या किसी भी युग में एक वेश्या के लिए लड़की की अधिकता का संकेत देती है , पर पितृप्रधान युग में वही योग लड़के की अधिकता देगी। यदि किसी जन्मकुंडली में मजबूत वाहन का योग है , तो वह प्राचीनकाल में घोड़े , हाथी आदि का संकेतक था , पर आज स्कूटर मोटरसाइकिल और कार का संकेत देता है। किसी जन्मकुंडली मे असाध्य रोग से ग्रसित होने का योग हो तो वह किसी युग में व्यक्ति को टीबी का मरीज बनाती थी , उसके बाद कैंसर का और अभी वही योग उसे एड्स का मरीज बना देती है। यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में उत्तम विद्या का योग है , तो वह प्राचीनकाल मे किसी प्रकार के विद्या की जानकारी देता था , बाद में बी ए ,एम ए की और अब वह विद्यार्थियों को प्रोफेशनल कोर्स करवा रहा है।

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वातावरण में परिवर्तन भी ग्रह के प्रभाव को परिवर्तित करता है। किसी किसान या व्यवसायी का उत्तम संतान पक्ष लड़के की संख्या में बढ़ोत्तरी कर सकता है, ताकि बड़े होकर वे परिवार की आमदनी बढ़ाएं। किन्तु एक आफिसर के लिए उत्तम संतान का योग संतान के गुणात्मक पहलू की बढ़ोत्तरी करेगा। किसी जन्मपत्री में कमजोर संतान का योग एक किसान के लिए आलसी , बड़े व्यवसायी के लिए ऐय्याश और एक आफिसर के बेटे के लिए बेरोजगार बेटे का कारण बनेगा। किसी किसान के पुत्र की जन्मकुंडली में उत्तम विद्या का योग होने से वह ग्रेज्युएट हो सकता है , पर एक आफिसर के पुत्र का वही उत्तम योग उसे आई ए एस बना सकता है। किसी किसान के लिए उत्तम मकान का योग उसे पक्के का दो मंजिला मकान ही दे सकता है , पर एक बड़े व्यवसायी का वही योग उसे एक शानदार बंगला देगा। किसी कुंडली में बाहरी स्थान से संपर्क का योग किसी ग्रामीण को शहरी क्षेत्र का , शहरी व्यक्ति के लिए महानगर का , तथा महानगर के व्यक्ति के लिए विदेश का भ्रमण करवा सकता है। किसी कुंडली में ऋणग्रस्तता का योग एक साधारण व्यक्ति को 500-1000 का तथा बड़े व्यवसायी को करोड़ो का ऋणी बना सकता है।

अलग अलग देश और प्रदेश के अनुसार भी ग्रहों के प्रभाव में परिवर्तन आता है। किसी विकसित देश में किसी महिला का प्रतिष्ठा का योग उसे प्रतिष्ठित नौकरी देगा , किन्तु भारत में वही योग उस महिला को अच्छा घर वर ही प्रदान कर सकता है। इसी प्रकार किसी महिला की जन्मकुंडली में दृष्ट हल्का कमजोर पति पक्ष भारत में सिर्फ परेशानी उपस्थित करेगा , जबकि अमेरिका जैसे देश में वह तलाक देने या दिलानेवाला होगा।

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इसके अतिरिक्त ग्रह मौसम से संबंधित वातावरण को भी प्रभावित करते हैं। बादल , वर्षा , बाढ़ ,तूफान या भूकम्प का आना भी ग्रह के अनुसार ही होता है। किसी दो ग्रह के विशेष संबंध के अनुसार ही किसी प्रकार के मौसमीय परिवर्तन की संभावना बनती है। ग्रह बाजार और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है। कीमतों में वृद्धि तथा मुद्रास्फिति पर भी ग्रहो का पूरा प्रभाव पड़ता है।

इस प्रकार देखा जाए , तो ग्रह सभी क्षेत्रो में अपना प्रभाव डालते हैं।आज भले ही हम अपने को विज्ञान के युग का समझकर ज्यैतिष पर हंसे या उसे नकारें , पर सत्य तो यह है कि यह पूर्ण तौर पर एक सांकेतिक विज्ञान है और यह मनुष्य के स्वभाव , बनावट और परिस्थितियों तक को बताता है।यहां तक कि ग्रह मानव मन और मस्तिष्क तक का नियंत्रक है। यह मानव मस्तिष्क को वैसा व्यवसाय , वैसी नौकरी या वैसा ही घर वर चुनने को प्ररित करता है , जैसा उसे अपनी जन्मपत्री के अनुसार मिलना चाहिए।

योगकारक ग्रह

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लेकिन यह विज्ञान 90 प्रतिशत परंपरागत और अवैज्ञानिक सिद्धांतों के जाल में फंसा हुआ है। ज्योतिषी पुराने पुराने नियमो के अनुसार ही अभी भी चल रहे हैं। उनके पास कोई नया खोज नहीं है , इसलिए इतने वर्षों बाद भी इसमें कोई नयापन नहीं आ सका है। वे एक नियम की स्थापना कर भी लें , तो उसमें अपवाद पर अपवाद जोड़ते चले जाते हैं। यह सत्य है कि फलित ज्योतिष का विकास अभी पूर्ण तौर पर नही हुआ है , इसमें शत.प्रतिशत भविष्यवाणी करना असंभव है , पर 90 प्रतिशत तो सही भविष्यवाणी की ही जा सकती है। लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि हम अपने को फलित ज्योतिष का जानकार बताने में शर्म का अनुभव करते हैं , क्योंकि समाज के विद्वान वर्ग इसे हेय दृष्टि से देखते है।

इस क्षेत्र का विकास तब ही होगा , जब पढ़े लिखे लोगों का ध्यान इस क्षेत्र में आएगा तथा वे अपना कुछ समय इस प्राचीन गौरवपूर्ण विज्ञान को समर्पित कर पाएंगे। विश्वविद्यालय को भी इस क्षेत्र में शोधकार्य करनेवालों को सम्मानित करना होगा , जिस दिन ऐसा हुआ, ज्योतिष विज्ञान की दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति शुरू हो जाएगी। इसके बिना हमारा इतने दिनों का प्रयास अधूरा है।

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    संभाब्‍यता के नियम से ग्रहयोगों की पुष्टि

     

    Jyotish yogas

    Janam kundli yog

    पुस्‍तकें पढने की परंपरा कितनी भी कम होती क्‍यूं न दिखाई पडे , पढनेवाले लोगों के हाथ में कभी कभी फुर्सत के क्षणों में पुस्‍तकें आ ही जाती हैं। बहुत दिनों बाद इधर काफी दिनों पहले खरीदी गयी एक पुस्‍तक 'ज्‍योतिष के विभिन्‍न योग' को पढने का मौका मिला। कुंडली में दिखाई देनेवाले कुल 125 योगों की इसमें चर्चा है। गजकेशरी योग से लेकर दरिद्र योग तक , दत्‍तक पुत्र योग से लेकर मातृत्‍यक्‍त योग तक , पूर्णायु या शताधिक आयुर्योग से लेकर अमितमायु योग तक , सर्पदंशयोग से दुर्मरण योग तक , महालक्ष्‍मी और सरस्‍वती योग से लेकर दरिद्र योग तक तथा सुरपति योग से लेकर भिक्षुक योग तक। एक नजर देखने पर पुस्‍तक बडी ही रोचक लगी , मुझे लगा कि इसके अध्‍ययन कर लेने से मेरी भविष्‍यवाणियों में एक नया आयाम जुड जाएगा, पर ज्‍यों ज्‍यों मैं गंभीरता से आगे बढती गयी, निराशा ही हाथ आयी। 

    Bhagya yog in kundli

    तब मुझे उन दिनों की याद आ गयी , जब पिताजी के द्वारा ज्‍योतिष की जानकारी के बाद इसमें मेरी रूचि इतनी बढ गयी थी कि इस विषय पर दिन रात कुछ न कुछ पढने का मन होता , लेकिन मेरे लिए घर पर ज्‍योतिष के ढेर सारी पुस्‍तकों में से एक का चयन कर पाना कठिन होता। इस विषय में पिताजी से राय लेना चाहती , तो वे कहते कि ज्‍योतिष की किसी भी पुस्‍तक में कुछ बातें तो ज्ञानवर्द्धक होती है , पर कुछ बातें बिल्‍कुल गुमराह करनेवाली होती हैं।

    उनका कहना था कि ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में वर्णित योगों को ढूंढने के लिए मैने बडे बडे महापुरूषों की कितनी कुंडलियों को देखने में दिन रात एक कर डाला , पर वे योग वहां नहीं मिले , जबकि हमारे मुहल्‍ले में जीवन भर एक छोटी सी दुकान चलाने वाले हिसाब किताब भर पढाई करने वाले व्‍यक्ति की कुंडली में एक बडा राजयोग दिखाई पड गया। उनका कहना था कि उन्‍होने पंद्रह वर्षों तक मेहनत करके किसी फसलवाले खेत से एक एक घास को चुनकर अलग कर दिया है और वे ज्‍योतिष की बिल्‍कुल स्‍वच्‍छ फसल मुझे प्रदान कर रहे हैं , फिर मुझे पुन: फसल और घास के मध्‍य भटकने की क्‍या आवश्‍यकता ?

    Jyotish yogas

    Gajkesari yog

    योग वाली जिस पुस्‍तक की आज मैं बात कर रही हूं , उसमें पहले ही स्‍थान पर गजकेशरी योग के बारे में लिखा है। चंद्रमा से केन्‍द्र में बृहस्‍पति स्थित हो , तो गजकेशरी योग होता है। वैसे यह ज्‍योतिष का एक बहुत ही महत्‍वपूर्ण येग माना जाता है , पर हम जैसे गणित को जाननेवालों की यही दिक्‍कत है , किसी बात को ज्‍यों का त्‍यों स्‍वीकार नहीं कर पाते। किसी भी कुंडली में किसी भी ग्रह को बैठने के लिए चंद्रमा से आगे ग्‍यारह भाव होते हैं , ऐसा ही बृहस्‍पति के लिए भी है। केन्‍द्र में होने का मतलब है कि उसमें से चार स्‍थानों में बैठकर यह जातक के लिए गजकेशरी योग उपस्थित कर सकता है। संभाब्‍यता के नियम के अनुसार किसी कुडली में इस योग के बनने की संभावना 4/11 हो जाती है। अब इस योग पर मेरा विश्‍वास करना नामुमकिन है , क्‍यूंकि कुल जनसंख्‍या का 4/11 भाग इस योग में कैसे आ सकता है , जैसा कि इस पुस्‍तक में इस योग के फल के बारे में लिखा है ......

    Raj yog

    इस योग में जन्‍म लेनेवाला जातक अनेक मित्रों , प्रशंसकों और संबंधियों से घिरा रहता है और उनके द्वारा सराहा जाता है। स्‍वभाव से नम्र , विवेकवाण और सद्गुणी होता है। कृषि कार्यों से इसे विशेष लाभ होता है तथा वह नगरपालिकाध्‍यक्ष या मेयर बन जाता है। तेजस्‍वी, मेधावी, गुणज्ञ तथा राज्‍य पक्ष में यह प्रबल उन्‍नति करने वाला होता है। स्‍पष्‍टत: गजकेशरी योग में जन्‍म लेनेवाला जातक जीवन में उच्‍च स्थिति प्राप्‍त कर पूर्ण सुख भोगता है तथा मृत्‍यु के बाद भी उसकी यशगाथा अक्षुण्‍ण रहती है।

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      समस्या का समाधान कैसे करें ? -1

       

      How to improve luck astrology in hindi

      हजारो वर्षों से विद्वानों द्वारा अध्ययन-मनन और चिंतन के फलस्वरुप मानव-मन-मस्तिष्‍क एवं अन्य जड़-चेतनों पर ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव के रहस्यों का खुलासा होता जा रहा है , किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने हेतु किए गए लगभग हर आयामों के उपाय में पूरी सफलता न मिल पाने से अक्सरहा मन में एक प्रश्न उपस्थित होता है,क्या भविष्‍य को बदला नहीं जा सकता ?  

      किसी व्‍यक्ति का भाग्यफल या आनेवाला समय अच्छा हो तो ज्योतिषियों के समक्ष उनका संतुष्‍ट होना स्वाभाविक है, परंतु आनेवाले समय में कुछ बुरा होने का संकेत हो तो उसे सुनते ही वे उसके निदान के लिए इच्छुक हो जाते हैं। हम ज्योतिषी अक्सर इसके लिए कुछ न कुछ उपाय सुझा ही देते हैं लेकिन हर वक्त बुरे समय को सुधारने में हमें सफलता नहीं मिल पाती है। उस समय हमारी स्थिति कैंसर या एड्स से पीड़ित किसी रोगी का इलाज कर रहे डॉक्टर की तरह होती है ,जिसने बीमारी के लक्षणों एवं कारणों का पता लगाना तो जान गया है परंतु बीमारी को ठीक करने का कोई उपाय न होने से विवश होकर आखिर प्रकृति की इच्छा के आगे नतमस्तक हो जाता है ।

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      ऐसी ही परिस्थितियों में हम यह मानने को मजबूर हो जाते हैं कि वास्तव में प्रकृति के नियम ही सर्वोपरि हैं। हमलोग पाषाण-युग, चक्र-युग, लौह-युग, कांस्य-युग, ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, से बढ़ते हुए आज आई टी युग में प्रवेश कर चुकें हैं, पर अभी भी हम कई दृष्टि से लाचार हैं। नई-नई असाध्य बीमारियॉ ,जनसंख्या-वृद्धि का संकट, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा ,कहीं भूकम्प तो कहीं ज्वालामुखी-विस्फोट--प्रकृति की कई गंभीर चुनौतियों से जूझ पाने में विश्व के अव्वल दर्जे के वैज्ञानिक भी असमर्थ होकर हार मान बैठे हैं। 

      यह सच है कि प्रकृति के इन रहस्यों को खुलासा कर हमारे सम्मुख लाने में इन वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिससे हमें अपना बचाव कर पाने में सुविधा होती है। प्रकृति के ही नियमो का सहारा लेकर कई उपयोगी औजारों को बनाकर भी हमने अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों का झंडा गाडा है , किन्तु वैज्ञानिकों ने किसी भी प्रकार प्रकृति के नियमों को बदलने में सफलता नहीं पायी है।

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      पृथ्वी पर मानव-जाति का अवतरण भी अन्य जीव-जंतुओं की तरह ही हुआ। प्रकृति ने जहॉ अन्य जीव-जंतुओं को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कुछ न कुछ शारिरिक विशेषताएं प्रदान की वहीं मनुष्‍य को मिली बौद्धिक विशेषताएं , जिसने इसे अन्य जीवों से बिल्कुल अलग कर दिया। बुद्धिमान मानव ने सभी जीव जंतुओं का निरिक्षण किया, उनकी कमजोरियों से फायदा उठाकर उन्हें वश में करना तथा खूबियों से लाभ लेना सीखा। जीव-जंतुओं के अध्ययन के क्रम में जीव-विज्ञान का विकास हुआ। प्राचीनकाल से अब तक के अनुभवों और प्रयोगों के आधार पर विभिन्न प्रकार के जीवों ,उनके कार्यकाल ,उनकी शरिरीक बनावट आदि का अध्ययन होता आ रहा है। 

      आज जब हमें सभी जीव-जंतुओं की विशेषताओं का ज्ञान हो चुका है , हम उनकी बनावट को बिल्कुल सहज ढंग से लेते हैं । कौए या चिड़ियां को उड़ते हुए देखकर हम बकरी या गाय को उड़ाने की भूल नहीं करतें। बकरी या गाय को दूध देते देखकर अन्य जीवों से यही आशा नहीं करते। बकरे से कुत्ते जैसी स्वामिभक्ति की उम्मीद नहीं करतें। घोड़े की तेज गति को देखकर बैल को तेज नहीं दौड़ाते। जलीय जीवों को तैरते देखकर अन्य जीवों को पानी में नहीं डालते। हाथी ,गधे और उंट की तरह अन्य जीवों का उपयोग बोझ ढोने के लिए नहीं करते।

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       इस वैज्ञानिक युग में पदार्पण के बावजूद अभी तक हमने प्रकृति के नियमों को नहीं बदला । न तो बाघ-शेर-चीता-तेदुआ-हाथी-भालू जैसे जंगली जानवरों का बल कम कर सकें , न भयंकर सर्पों के विष को खत्म करने में सफलता मिली , और न ही बीमारी पैदा करनेवाले किटाणुओं को जड़ से समाप्त किया। पर  अब जीन के अध्‍ययन में मिलती जा रही सफलता के बाद यह भी संभव हो सकता है कि किसी एक ही प्राणी को विकसित कर उससे हर प्रकार के काम लिया जा सके। पर इस प्रकार की सफलता के लिए हमें काफी समय तक विकास का नियमित क्रम तो रखना ही होगा। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!

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        समस्या का समाधान कैसे करें ? -2

         

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        जीव-जंतुओं के अतिरिक्त हमारे पूर्वजों ने पेड-पौधों का बारीकी से निरिक्षण किया। पेड़-पौधे की बनावट , उनके जीवनकाल और उसके विभिन्न अंगों की विशेषताओं का जैसे ही उसे अहसास हुआ, उन्होने जंगलो का उपयोग आरंभ किया। हर युग में वनस्पति-शास्त्र वनस्पति से जुड़े तथ्यो का खुलासा करता रहा ,जिसके अनुसार ही हमारे पूर्वजों ने उनका उपयोग करना सीखा। फल देनेवाले बड़े वृक्षों के लिए बगीचे लगाए जाने लगे। सब्जी देनेवाले पौधों को मौसम के अनुसार बारी-बारी से खाली जमीन पर लगाया जाने लगा। इमली जैसे खट्टे फलों का स्वाद बढ़ानेवाले व्यंजनों में इस्तेमाल होने लगा। मजबूत तने वाली लकड़ी फर्नीचर बनाने में उपयोगी रही। पुष्‍पों का प्रयोग इत्र बनाने में किया जाने लगा। कॉटेदार पौधें का उपयोग बाड़ लगाने में होने लगा। ईख के मीठे तनों से मीठास पायी जाने लगी। कडवे फलों का उपयोग बीमारी के इलाज में किया जाने लगा।

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        इसी तरह भूगर्भ में बिखरी धातुएं भी मानव की नजर से छुपी नहीं रहीं। प्रारंभ में लौह-अयस्क, ताम्र-अयस्क और सोने-चॉदी जैसे अयस्को को गलाकर शुद्ध रुप प्राप्त कर उनका उपयोग किया गया । भिन्‍न भिन्‍न धातुओं की प्रकृति के अनुरूप उनका उपयोग भिन्‍न भिन्‍न प्रकार के गहने और बर्तनों को बनाने में किया गया। फिर क्रमश: कई धातुओं को मिलाकर या कृत्रिम धातुओं को बनाकर उनका उपयोग भी किया जाने लगा। भूगर्भ के रहस्यों का खुलासा करने के लिए वैज्ञानिकों के द्वारा कितने साधन भी बनाए जा चुके , ध्येय भूगर्भ के आंतरिक संरचना की पहचान करना है, उसमें किसी प्रकार के बदलाव की कल्पना भी वैज्ञानिकों द्वारा नहीं की जा सकती ।

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        इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति में तरह-तरह के जीव-जंतु , पेड़-पौधे और खनिज-भंडार भरे पड़े हैं। गुण और स्वभाव की दृष्टि से देखा जाए , तो कुदरत की हर वस्तु का अलग-अलग महत्व है। बड़े फलदार वृक्ष दस-बीस वर्षों तक अच्छी तरह देखभाल करने के बाद ही फल देने लायक होते हैं। कुछ फलदार वृक्ष दो-तीन वर्षों में ही फल देना आरंभ कर देते हैं। सब्जियों के पौधे दो-चार माह में ही पूंजी और मेहनत दोनों को वापस लौटा देते हैं। फर्नीचर बनाने वाले पौधों में फल नहीं होता , इनकी लकड़ी ही काम लायक होती है। वर्षों बाद ही इन वृक्षों से लाभ हो पाता है। यदि हमें समुचित जानकारी नहीं हो और टमाटर के पौधों को चार-पॉच महीने बाद ही फल देते देखकर उपेक्षित दृष्टि से आम के पेड़ को देखें या आम के सुंदर पेड को देखकर बबूल को खरी-खोटी सुनाएं , तो यह हमारी भूल होगी।

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        आर्थिक दृष्टि से देखा जाए , तो कभी लोहे का महत्व अधिक होता है , तो कभी सोने का , कभी पेट्रोलियम का महत्व अधिक होता है , तो कभी अभ्रख का। कभी घोड़े-हाथी राजा-महाराजाओं द्वारा पाले जाते थे , जबकि आज घोडे हाथी दर दर की ठोकरें खा रहे हैं और चुने हुए नस्लों के कुत्तों का प्रचलन अच्‍छे घरानों में है। कभी आम के पेड़ से अधिक पैसे मिलते थे , कभी शीशम से और आज टीक के पेड़ विशेष महत्व पा रहे हैं। युग की दृष्टि से किसी वस्तु का विशेष महत्व हो जाने से हम पाय: उसी वस्तु की आकांक्षा कर बैठते हैं , तो क्या अन्य वस्तुओं को लुप्त होने दिया जाए। आज टीक सर्वाधिक पैसे देनेवाला पेड़ बन गया है , तो क्या आम का महत्व कम है ? आखिर आम का स्वाद तो आम का पेड़ ही तो दे सकता है। वर्षों से उपेक्षित पड़े देश पेट्रोलियम के निर्यात करने के क्रम में आज भले ही विश्व के अमीर देशों में शामिल हो गए हों , पर अन्य वस्तुओं के लिए उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना ही पड़ता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !

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          समस्या का समाधान कैसे करें ? -3

           

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          फिर हमारे पूर्वजों की नजरें आसमान तक भी पहुंच ही गयी। अगणित तारें, चंद्रमा, सूर्य , राशि ,नक्षत्र ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,भला इनके शोध क्षेत्र में कैसे शामिल न होते। ब्रह्मांड के रहस्यों का खुलासा करने में मानव को असाधारण सफलता भी मिली और इन प्राकृतिक नियमों के अनुसार उन्होने अपने कार्यक्रमों को निर्धारित भी किया। पृथ्वी अपनी घूर्णन 24 घंटे में पूरी करती है इस कारण 24 घंटे की घड़ी बनायी गयी। चंद्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करने में 28 दिन लगते हैं इसलिए चंद्रमास 28 दिनों का निश्चित किया गया। 365 दिनों में पृथ्वी अपने परिभ्रमण-पथ पर पूरी घूम जाती है , इसलिए 365 दिनों के एक वर्ष का कैलेण्डर बनाया गया। 6 घंटे के अंतर को हर चौथे वर्ष लीप ईयर मनाकर समायोजित किया गया। 

          दिन और रात , पूर्णिमा और अमावस्या , मौसम परिवर्तन ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सब प्रकृति के नियमों के अनुसार होते हैं इसकी जानकारी से न सिर्फ समय पर फसलों के उत्‍पादन में ही , वरन् हमें अपना बचाव करने में भी काफी सुविधा होती है। अधिक गर्मी पड़नेवाले स्थानों में ग्रीष्‍मऋतु में प्रात: विद्यालय चलाकर या गर्मियों की लम्बी छुटि्टयॉ देकर चिलचिलाती लू से बच्चों का बचाव किया जाता है। बरसात के दिनों में बाढ की वजह से रास्ता बंद हो जानेवाले स्थानों में बरसात में छुटि्टयॉ दे दी जाती हैं ।

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          ग्रह-नक्षत्रों की किसी खास स्थिति में पृथ्वी के जड़-चेतनों पर पड़नेवाले खास प्रभाव को महसूस करने के बाद ही `फलित ज्योतिष´ जैसे विषय का विकास किया गया होगा। परंतु शायद कुछ प्रामाणिक नियमों के न बन पाने से , भविष्‍यवाणियों के सटीक न हो पाने से या वैज्ञानिक सोंच रखनेवालों का ज्योतिष के प्रति दुराग्रह के कारण ही आधुनिक वैज्ञानिक युग में ज्योतिष का अच्छा विकास नहीं हो पाया। किन्तु वर्षों की साधना के बाद हम `गत्यात्मक ज्योतिष´ द्वारा सटीक भविष्‍यवाणियॉ करने में सफल हो रहे हैं। हमने पाया है कि विभिन्न जंतुओं और पेड़-पौधों में यह बात होती है कि उनके बीज से ही उन्हीं के गुण और स्वभाव वाले पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं का जन्म होता है , पर मनुष्‍य के बच्चे शारीरिक और आंतरिक संरचना में भले ही अपने माता-पिता से मिलते जुलते हों , परंतु उनकी मन और बुद्धि के काम करने के ढंग में विभिन्नता होती है। 

          जन्म के समय ही हर बच्चे में समानता नहीं देखी जाती है। कोई शरीर से मजबूत होता है , तो कोई कमजोर। किसी में रोग-प्रतिरोधक-क्षमता की प्रचुरता होती है , तो किसी में इसकी अल्पता। कोई दिमाग से तेज होते हैं , तो कोई कमजोर। पालन-पोषण के समय में भी बच्चे का वातावरण भिन्न-भिन्न होता है। बहुत बच्चों को भरपूर प्यार मिल पाता है ,जिससे उनका मनोवैज्ञानिक विकास अच्छी तरह हो पाता है। पूरे जीवन वे मनमौजी और चंचल हो जाते है , अपनी इच्छा पूरी करने में बेसब्री का परिचय देते है। अपनी बातें बेबाक ढंग से रख पाने में सफल होते है। 

          बहुत बच्चे प्यार की कमी महसूस करते हैं , जिससे इनका मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है। पूरी जिंदगी वे अपनी इच्छाओं को दबाने की प्रवृत्ति रखते हैं। उनके जन्मकालीन ग्रहों के प्रभाव से ही पूरी जिंदगी उनके सामने अलग-अलग तरह की परिस्थितियॉ आती हैं। जन्मकालीन ग्रहों के प्रभाव से ही किसी की रुचि व्यवसाय में , किसी की पढ़ाई में , किसी की कला में और किसी की राजनीति में होती है। किसी का ध्यान अपने शरीर को मजबूती प्रदान करने का होता है , तो किसी का कोष को बढ़ाने का , किसी का ध्यान संपत्ति की स्थिति को मजबूत बनाने का होता है , तो किसी का ध्यान अपनी घर गृहस्थी और संतान को मजबूती देने का।

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          ग्रहों के कारण आनेवाली कई समस्‍याओं के निराकरण कर पाने की दिशा में भी हमने काफी प्रयास किया है , हालॉकि विपरीत परिस्थितियों को पूर्ण रुप से सुधार न पाने का हमें अफसोस भी बना रहता है। लेकिन हम यह सोंचकर संतुष्‍ट हो जाते हैं कि प्रकृति के नियमों को बदल पाना इतना आसान नहीं । हो सकता है कुछ वर्षों में प्रकृति के किसी अन्य रहस्य को समझने के बाद हम बुरे ग्रहों के प्रभाव से पूर्णतया मुक्त हो सकें। पर अभी भी इस रहस्य का खुलासा कि अमुक ग्रह स्थिति में जन्म लेनेवालों की जीवन-यात्रा अमुक ढंग की होगी , निस्संदेह आज की बहुत बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है। 

          जिन्होनें भी इस धरती पर जन्म ले लिया है या लेनेवाले हैं ,उन्हें तो गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार उपस्थित होनेवाली परिस्थितियों के अनुसार जीवन जीना ही होगा ,परंतु यदि उन्हें अपने जीवन में आनेवाले सुखों और दुखों का पहले से ही अनुमान हो जाए तो वे तदनुरुप अपने कार्यक्रम बना सकते हैं । आनेवाले हर वर्ष या महीने के ग्रह स्थिति को जानकर अपने कार्य को अंजाम दे सकते हैं। यदि ग्रहो की स्थिति उनके पक्ष में हो तो वे हर प्रकार के कार्य को अंजाम देंगे।

          यदि ग्रहों की स्थिति उनके पक्ष में नहीं हो तो वे किसी प्रकार का रिस्क नहीं लेंगे। इस प्रकार वे अपने जीवनग्राफ के अच्छे समय के समुचित उपयोग द्वारा विशेष सफलता हासिल कर सकते हैं , जबकि बुरे समय में वे प्रतिरोधात्मक ढंग से जीवन व्यतीत कर सकते हैं । भविष्‍य में उत्पन्न होनेवाले बच्चों के लिए गत्यात्मक ज्योतिष वरदान हो सकता है। क्‍यूंकि विशेष मुहूर्तों में बच्चे को जन्म देकर उसकी जीवन-यात्रा को काफी महत्वपूर्ण तो बनाया ही जा सकता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!

          गत्यात्मक ज्योतिष में ग्रहों के प्रभाव को दूर करने से सम्बंधित उपायों के बारे में प्रकाशित पुस्तक को पढ़ने के लिए अमेज़ॉन के किंडल में  इस लिंक पर क्लिक करें !

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