'ज्‍योतिषीय योग' की पुस्‍तकों में स्थित 'पंच महापुरूष योग'

Panch mahapurush yog in Hindi
'ज्‍योतिषीय योग' की पुस्‍तकों में स्थित 'पंच महापुरूष योग'


ज्‍योतिष शास्‍त्र की 'ज्‍योतिषीय योग' की पुस्‍तकों में 'पंच महापुरूष योग' का वर्णन है , जिनके नाम रूचक , भद्र , हंस , मालब्‍य और शश हैं। इन पांचों में कोई एक योग होने पर भी जातक महापुरूष होता है एवं देश विदेश में कीर्ति लाभ कर पाता है। मंगल अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हों , तो रूचक योग , बुध अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में  अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो तो भद्र योग , बृहस्‍पति अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो , तो हंस योग , शुक्र अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण में अथवा उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो , तो मालब्‍य योग तथा शनि अपनी राशि का होकर मूल त्रिकोण या उच्‍च राशि का होकर केन्‍द्र में स्थित हो , तो जन्‍मकुंडली में शश योग बनता है।
panch mahapurush yoga



'ज्‍योतिषीय योग' की पुस्‍तकों में लिखा होता है कि रूचक योग में जन्‍म लेनेवाला व्‍यक्ति स्‍वयं राजा या सेना या मिलिटरी में उच्‍चाधिकारी , आर्थिक दृष्टि से पूर्ण संपन्‍न अपने देश की सभ्‍यता और संस्‍कृति के प्रति पूर्ण जागरूक उसके विकास के लिए काम करता है। भद्र योग में जन्‍म लेनेवाला मनुष्‍य सिंह के समान पराक्रमी , प्रभावोत्‍पादक , विलक्षण बुद्धि वाला होता है , यह जीवन में धीरे धीरे प्रगति करते हुए सर्वोच्‍च स्‍थान प्राप्‍त करता है। हंस योग में जन्‍म लेनेवाला व्‍यक्ति सुंदर व्‍यक्तित्‍व वाला मधुरभाषी होता है। यह सफल वकील या जज बनकर निष्‍पक्ष न्‍याय करता है। मालब्‍य योग वाला व्‍यक्ति मजबूत दिमाग रखनेवाला , सफल कवि , चित्रकार , कलाकार या नृत्‍यकार होते हैं और देश विदेश में ख्‍याति प्राप्‍त करते हैं। शश योग वाले व्‍यक्ति साधारण कुल में जन्‍म लेकर भी राजनीति विशारद होते हैं , वे गांव का मुखिया , नगरपालिकाध्‍यक्ष , या प्रसिद्ध नेता होते हैं। 

अब चूंकि पूरी दुनिया में कुछ खास अंतरालों में जन्‍म न लेकर हर वक्‍त बच्‍चे जन्‍म लेते ही रहते हैं  , इसलिए उनकी जन्‍मकुंडलियों में विभिन योगों का बनना सामान्‍य ढंग से होगा। यदि गणित के संभावनावाद के नियम के हिसाब से जन्‍मकुंडली में इन योगों की संभाब्‍यता पर ध्‍यान दें , तो हमें कुछ भी खास नहीं प्राप्‍त हो पाएगा, क्‍यूंकि ये पांचो ग्रह 12 में से दो राशियों में स्‍वक्षेत्री होंगे , इस कारण इनके अपने राशि में होने की संभावना  2/12 यानि 1/6 तथा उसके मूल त्रिकोण में होने की संभावना 3/12 यानि 1/4 । इसी प्रकार इनके उच्‍च राशि में होने की संभावना 1/12 तथा केन्‍द्र में स्थित होने की संभावना 4/12 यानि 1/3 होती है। इस तरह जन्‍मकुंडली में इन पांचों में से किसी भी एक योग के उपस्थित होने की संभावना (1/6*1/4)+(1/12*1/3) = (1/24+1/36)यानि 5/72 होगी। यानि 72 लोगों में से किसी एक कुंडली में इनमें से कोई योग देखा जा सकता है। पर इन पांचों में से किसी एक योग के होने की संभावना 5/72 * 5 यानि 25 /72 होगी। इसका अर्थ है कि 72 व्‍यक्तियों में से 25 व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली में इन पांचों में से कोई एक योग हो सकता है।

जब पांचों में से किसी एक योग के होने की संभावना इतनी सामान्‍य हो , वहां इस योग के फल से जातक के महापुरूष बनने की संभावना के बारे में सोचना भी गलत होगी। हालांकि पुस्‍तकों में यह भी लिखा है हक संबंधित ग्रह निर्मल , अवेध , अवक्री और 10 से 25 डिग्री के मध्‍य में होना चाहिए , पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ग्रहों के मात्र स्‍वक्षेत्री होने , उच्‍च स्‍थान पर स्थित होने , केन्‍द्रगत होने या तिक्रोण में होने से इतने बडे फल प्राप्ति पर विश्‍वास नहीं रखता , जबतक कि ग्रह गत्‍यात्‍मक या स्‍थैतिक दृष्टि से काफी मजबूत न हों । इसलिए किसी प्रकार के ज्‍योतिषीय योग के अध्‍ययन से पहले यह ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की जानकारी आवश्‍यक समझता है। सिर्फ रटे रटाए विधि से की गयी भविष्‍यवाणी सटीक नहीं हो पाती , जबकि समय समय पर प्रायोगिक जांच से भविष्‍यवाणियों की सटीकता बढती है।

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    असफल व्‍यक्ति अधिक अनुभवी होते हैं !!

    Ek kadam safalta ki or

    Safalta quotes in Hindi

    कल एक सुप्रभात मेसेज मिला, लिखा था कि सफलता ऐसा शिक्षक है, जो हमारे अंदर एक भ्रम पैदा करता है कि हम असफल हो ही नहीं सकते।  मुझे इस वाक्य ने प्रभावित किया। जिन्होंने पूरे जीवन संघर्ष के साथ निरंतर सफलता हासिल की है, उसके लिए तो यह बात नहीं कही जा सकती , पर एक बार की सफलता से जीवनभर शानोशौकत और प्रभाव प्राप्त करने वाले भ्रम क्या, झूठे अभिमान में जीया करते हैं। 

    Ek kadam safalta ki or


    प्रकृति के अधिकांश नियम निश्चित ही होते हैं , हां यदा कदा कुछ अपवाद अवश्‍य उपस्थित होते रहते है। ऐसा नहीं है कि अपवाद यूं ही उपस्थित हो जाते हैं , दरअसल अपवादों का भी एक अलग नियम होता है। जब हम कई बार लगातार एक तरह की घटना के कार्य करण संबंध को देखते हुए कोई नियम बनाते हैं , तो उस समय तक हमें अपवाद की जानकारी नहीं होती है , पर जब जब नियमों को काम करते नहीं देखते हैं , विश्‍लेषण करने पर हमें वो अपवाद दिखाई पडते हैं। सैकडों हजारो प्रयोंगो में से एक दो बार वैसे अपवाद दिखाई पडते हैं , पर उसे इग्‍नोर करते हुए अधिकांश जगहों पर हम नियम के अनुसार ही काम करते हैं।

    Safalta pane ka mantra

    मेहनत करने से सफलता मिलती ही है , जो जैसा करेगा वो वैसा ही भरेगा इस यथार्थ भरे वाक्‍य में भी हमें बहुत अपवाद देखने को मिलते हैं। हमारे नजर के सामने हर सुख सुविधा से संपन्‍न आलसी और कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे पुरूषार्थी देखने को मिलेंगे। कोई भी मनुष्‍य पूर्ण नहीं हो सकता है , कर्तब्‍य पथ पर चलते हुए कोई न कोई गल्‍ती कर ही बैठता है , पर प्रकृति से मिलने वाले सहयोग के कारण उस गल्‍ती का कोई दुष्‍परिणाम सफल लोगों के जीवन में देखने को नहीं मिलता। इसलिए जीवन में अनायास सफलता प्राप्‍त करनेवाले व्‍यक्ति भले ही सफल लोगों की श्रेणी में आ जाते हों , पर वास्‍तव में वे अनुभवी नहीं होते। असफल होते हुए भी अनुभवी तो वे होते हैं , जिनकी छोटी छोटी चूक से बडा बडा नुकसान होता आया है। इसलिए वे हर काम में हुए अपनी या व्‍यवस्‍था की खामियों को उजागर कर सकते हैं , उससे बचने के लिए पहले ही तैयार रहने के लिए लोगों को सलाह दे सकते हैं।

    इतने लंबे जीवन में कहीं भी कोई मोड आ सकता है , जिससे आगे बढने पर या तो फूलों से भरी या कांटों से भरी सडक हमारा इंतजार कर रही होती है । सभी स्‍वीकार करते हैं कि सुख भरे दिन में कुछ सीखने का मौका नहीं मिलता। लेकिन जब भी हम कठिनाइयों के दौर से गुजरते हैं , दिन ब दिन कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। बडों की बाते छोड दें , विपत्ति झेल रहे लोगों के बच्‍चे बालपन में ही समझदारी भरी बात किया करते हैं। इस तरह उबड खाबड रास्‍तों पर चलकर , विपत्ति को झेलकर देर से ही सही , पुरूषार्थी को मंजिल मिलती है। इसलिए जरूरत है असफल पुरूषार्थियों से कुछ सीख लेने की , न कि अनायास सफलता पानेवालों से , क्‍यूंकि मेरा मानना है कि अपने निर्णयों के सही होने से वे सफलता के झंडे तो गाड सकते हैं , पर जीवन में किसी प्रकार की अनहोनी नहीं आने से वे अनुभवी नहीं बन सकते , इसलिए दूसरों को सलाह देने में असफल व्‍यक्ति ही अधिक सक्षम होते हैं।

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      Adhyatmik meaning in Hindi

      आध्‍यात्मिक सुख की ओर बढने का पहला कदम

      Adhyatmik meaning in Hindi

      adhyatmik story in hindi


      मित्रता जैसा पवित्र शब्‍द कुछ नहीं। सच्‍चे मित्र एक दूसरे के लिए जान देने को तैयार होते हैं। पर मित्रता को इस स्‍तर तक ले जाने के लिए वर्षों तक एक दूसरे के प्रति विश्‍वास की आवश्‍यकता होती है। जहां एक के मन दूसरे के प्रति विश्‍वास डगमग हुआ कि दोनो के मन में क्रमश: अविश्‍वास हावी होता चला जाएगा और मित्र की भावना को सही सही समझना मुश्किल होगा। वैसे तो बहुत से स्‍थान में ऐसी मित्रता कुछ दिनों बाद शत्रुता में भी बदल जाती है , पर यदि ऐसा न भी हो , तब भी अविश्‍वास के स्‍तर तक पहुंचने के बाद मित्र का भला क्‍या मतलब ??

      इसी प्रकार एक डॉक्‍टर के प्रति मरीज का विश्‍वास दवा के प्रभाव में बढोत्‍तरी लाता है। अपने पसंदीदा डॉक्‍टर के पास जाकर छोटे मोटे मरीजों के बिना दवा के भी ठीक हो जाने की खबर बहुतों ने सुनी होगी , पर कभी कभी गंभीर बीमारियों के मरीजों का भी उल्‍लेखनीय प्रगति डॉक्‍टरों को आश्चिर्यत करने पर मजबूर कर देती है। वास्‍तव में अपने जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण और खुद पर भरोसा भी हमारी बीमारी को ठीक करने में बहुत मदद करता है। 

      यहां तक कि जहां समाज में शेयर बाजार के चक्‍कर में अपना घर बार पूंजी समाप्‍त कर देने की कितनी घटनाएं देखने को मिलती हैं , वहीं शेयर बाजार में लाभ कमाते हुए आनंद प्राप्‍त करनेवालों की भी दनिया में कमी नहीं। आखिर विश्‍वासियों के बल पर ही तो दुनिया में एक एक चीज का अस्तित्‍व है। गुरू के प्रति विश्‍वास न हो तो क्‍या उसके द्वारा दिए जा रहे ज्ञान को हम ग्रहण करने की योग्‍यता रख सकते हैं ??

      ठीक इसी प्रकार की बात पति पत्‍नी के मध्‍य उपस्थित होती है। एक दूसरे के लिए अपने जीवन का तन , मन और धन को समर्पित कर अपनी आने वाली पीढी के शारिरीक, मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए बनाए गए कार्यक्रमों को अंजाम देने में चाहे कितने भी क्‍यूं न थक जाएं , पर इसके बाद भी उनका जीवन स्‍वर्ग बना होता है। पर जहां दोनो के विचारों में टकराव हुआ या उनके मध्‍य संदेह का जन्‍म हुआ , तो फिर उनके जीवन के नरक बनते भी देर नहीं लगती। हम की जगी मैं और तुम के हावी होने से ऐसा होने से वैवाहिक जीवन का अर्थ ही बदल जाता है। इस प्रकार पारिवारिक जीवन के सुख को प्राप्‍त करने में भी विश्‍वास एक बडी शक्ति होती है। क्‍या अहं के हावी होने के बाद पति पत्‍नी का रिश्‍ता सुदृढ हो सकता है ??

      चाहे ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडने वाले प्रभाव की वास्‍तविकता की चर्चा की जाए या खुद को ईश्‍वर में आत्‍मसात करने की , संदेह बडा हानिकारक होता है। आध्‍यात्मिक तौर पर मजबूती प्राप्‍त करने के लिए प्रकृति के नियमों और ईश्‍वर पर भरोसा करना बहुत आवश्‍यक है। इतने बडे ब्रह्मांड में जहां इतने विशालकाय पिंड एक निश्चित नियम के हिसाब से गति कर रहे हो , किसी व्‍यक्ति द्वारा अपने कर्म और अपनी सफलता पर खुद का गुमान करना अच्‍छी बात नहीं। किसी व्‍यक्ति ने अपनी जिन विशेषताओं के बल पर उपलब्धि हासिल की , वह प्रकृति की ओर से उसे वरदानस्‍वरूप प्राप्‍त थी ,  इसे स्‍वीकार किया जाना चाहिए।  

      यदि प्रकृति का सहयोग न मिले, तो सारा कार्यक्रम निबटने के बाद अंतिम क्षण में परिणाम के वक्‍त भी गडबडी आ सकती है,बस इन दोनो बातों को स्‍वीकारना ही आध्‍यात्‍म की ओर जाने का पहला कदम है। हम अपने अहं का त्‍याग किए बिना प्रकृति का निर्माण करने वाले पर शक करते रहे , तो क्‍या हमें आध्‍यात्मिक सुख मिल सकता है ??  

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      'वेद अमृत' जैसी स्‍वच्‍छ धार्मिक पत्रिकाएं

       हमारे यहाँ 'वेद अमृत' जैसी स्‍वच्‍छ धार्मिक पत्रिकाएं नहीं अन्धविश्वास चलता है !

      वर्ष 2002 तक या उसके बाद भी मैं कुछ घरेलू पत्रिकाएं पढा करती थी। 2002 के दिसंबर माह में एक पत्रिका 'मेरी सहेली' के साथ 'वेद अमृत' नाम की पत्रिका का लघु संस्‍करण प्राप्‍त किया था। उस छोटे संस्‍करण में नाम मात्र के कई लेख और कहानियां होने के बावजूद मैं इस पत्रिका के लक्ष्‍य को समझ गयी थी और अगले ही महीने इसक‍ा प्रवेशांक बाजार से मंगवा लिया था। प्रवेशांक पढने के बाद मेरी प्रतिक्रिया इन शब्‍दों में संपादक जी के पास पहुंची थी , जिसे उन्‍होने 'वेद अमृत' के फरवरी माह के अंक में 'आपके विचार' में प्रकाशित भी किया था ..... 

      'वेद अमृत' जैसी स्‍वच्‍छ धार्मिक पत्रिकाएं


      पिछले महीने मेरी सहेली के साथ वेद अमृत का लघु संस्‍करण प्राप्‍त किया उसे पढने के बाद वेद अमृत के प्रवेशांक को खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर पायी। आज बाजार में फैली अधिकांश पत्रिकाएं धर्म , ज्ञान , ज्‍योतिष और वास्‍तु के नाम पर कुछ भी छापती जा रही है और कुछ पत्रिकाएं तो पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त होकर धर्म की टांग ही तोड देने को उद्दत हैं। ऐसी परिस्थितियों में आपके संपादकीय के समन्‍वयवादी दृष्टिकोण ने मुझे बहुत प्रभावित किया है।

       शायद आपकी पत्रिका का लक्ष्‍य उन पुराने मोतियों को चुनकर पिरोकर वह माला तैयार करनी है , जो नयी पीढी के नए दृष्टिकोण के अनुरूप हों। सभी लेख संपादकीय में कहे गए लक्ष्‍य को पूरा करने में समर्थ हैं। शास्‍त्र को शस्‍त्र न बनाओ , सत्‍य की रक्षा , अभिशाप या वरदान जैसी कहानियां जहां कम उम्र के पाठकों तक को प्राचीन कथाओं के माध्‍यम से संदश देने में समर्थ हैं , वहीं जीवन पथ जैसी कहानी आज के युग की जरूरत। अन्‍य लेख भी जितने सहज ढंग से ज्ञान का भंडार मस्तिष्‍क में उंडेलते हैं , उसे देखकर आपकी पूरी टीम के लेखन और संपादन पर गर्व होता है। 

      सृष्टि निर्माता ,प्रकृति , अल्‍लाह या भगवान ... जो भी कह दिया जाए , पर एक नियम या व्‍यवस्‍था के आगे हम सब नतमस्‍तक हैं। कितने ही तरह की प्राकृतिक आपदाओं को हम आज के युग में भी नहीं रोक पाए हैं और जब भी किसी घटना पर हमारा वश नहीं चलता , उसे प्रकृति की इच्‍छा मान लेते हैं। आखिर यह कमजोरी हर मनुष्‍य के पास कभी कभी क्‍यूं उपस्थित होती हैं , जब किसी संयोग की कमी से उसका काम नहीं होता और कभी वहीं संयोग दूसरों को काम कर डालता है। 

      धर्म की उत्‍पत्ति कभी भी सार्वदेशिक और सार्वकालिक नहीं हुई। इसलिए दूसरे देश या काल में भले ही वह अनुपयोगी हो , पर जिस युग और देश में इसकी संहिताएं तैयार की जाती हैं , यह काफी लोकप्रिय होता है। यह बात अलग है कि धर्म हमेशा मध्‍यमवर्गीय लोगों की जरूरतों को घ्‍यान में रखकर बनाया जाता है , क्‍यूंकि उच्‍चवर्गीय लोगों की संख्‍या और निम्‍नवर्गीय लोगों की भी समस्‍याएं नाममात्र की होती हैं। सभ्‍यता और संस्‍कृति मध्‍यमवर्गीय लोगों से अधिक प्रभावित होती हैं, इसी कारण मध्‍यम वर्ग ही हमेशा दबाब में होता है और इस दबाब से बचाने के लिए कोई भी विकल्‍प तैयार किया जाए , तो उसे अपनाने के लिए पूर्ण तौर पर तैयार होता है। कालांतर में इसे ही उनका धर्म मान लिया जाता है। 

      धर्माचरण का नकल करनेवाले कुछ पाखंडियों , धोखेबाजों और कपटी लोगों की पोल कुछ ही दिनों में खुल जाती है , जबकि महात्‍मा गांधी , मदर टेरेसा , ईसा मसीह , दयानंद सरस्‍वती , स्‍वामी विवेकानंद , गौतम बुद्ध , महावीर , गुरू नानक , चैतन्‍य महाप्रभु आदि अनेकानेक लोग धर्माचरण द्वारा युगों युगो तक पूजे जाते हैं। यदि उनके विचारों में अच्‍छाई नहीं होती , समाज के लिए सोंचने का संदेश नहीं होता , तो ऐसा क्‍यूं होता ??

      आज कुछ पुस्‍तको को व्‍यवस्थित करने के क्रम में मुझे वेद अमृत के सभी पुराने अंक मिले। फरवरी 2006 तक का अंक मेरे पास मौजूद है , जिसमें से प्रत्‍येक की कीमत मात्र 15 रूपए लिखी गयी है। उसके बाद के अंक भी कहीं पर छुपे हो सकते हैं , जो बाद में मिल जाए। पर इसके कुछ ही दिनों बाद वेद अमृत का प्रकाशन बंद हो गया, जाहिर सी बात है कि पत्रिकाएं बिक नहीं पा रही होंगी। इतने कम कीमत में बडों के लिए यह पत्रिका तो लाभप्रद थी ही , इसमें बाल जगत के अंतर्गत आनेवाली कहानी को मैं बच्‍चों को अवश्‍य पढाया करती थी , प्रत्‍येक में कुछ न कुछ संदेश छुपा होता था। समाज में कोई अच्‍छी शुरूआत हो और विद्वान लोगों द्वारा उसका यही हश्र हो , तो हमारे समाज के लोग तो भटकेंगे ही ।

      आज के आर्थिक युग में लोगों की सोंच बिल्‍कुल बदल गयी है , विज्ञान के बडे बडे आविष्‍कारों का उपयोग करना मात्र उनका लक्ष्‍य हो गया है , साधन ही साध्‍य बन गया है। वे न तो खुद अच्‍छा साहित्‍य पढना चाहते हैं और न ही बच्‍चों को पढाना चाहते हैं।बाद में आनेवाली पीढी को दोष देते हम नहीं थकते। बस प्रोफेशनल सफलता ही हर बात का मापदंड बन गया है , लोगों ने अपने को इतना सिमटा लिया है कि जीवन के अंतिम चरणों में भी बिल्‍कुल अनुभवहीन दिखते हैं। आज धर्म को भले ही गलत मान लिया जाए और इसकी आवश्‍यकता को नकारा जाए , पर आज के युग में भी एक धर्मगुरू की आवश्‍यकता है ही , जो लोगों के भटकते दिलोदिमाग को शांत करने की कोशिश करे , ताकि पूरी दुनिया चैन से जी सके। सही कहा गया है , गुरू के बिना ज्ञान मुश्किल ही होता है।

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        वैदिक गणितः चुटकियों में बड़ी-बड़ी गणनाएँ

        Vaidik ganit ke bare mein

        आज शाम एक आलेख पर नजर पडी वैदिक गणितः चुटकियों में बड़ी-बड़ी गणनाएँ , जिसमें दिया गया है कि भारत में कम ही लोग जानते हैं, पर विदेशों में लोग मानने लगे हैं कि वैदिक विधि से गणित के हिसाब लगाने में न केवल मजा आता है, उससे आत्मविश्वास मिलता है और स्मरणशक्ति भी बढ़ती है। भारत के स्कूलों में वह शायद ही पढ़ाई जाती है। भारत के शिक्षाशास्त्रियों का भी यही विश्वास है कि असली ज्ञान-विज्ञान वही है जो इंग्लैंड-अमेरिका से आता है। घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध। 

        vaidik ganit ke bare mein


        लेकिन आन गाँव वाले अब भारत की वैदिक अंकगणित पर चकित हो रहे हैं और उसे सीख रहे हैं। बिना कागज-पेंसिल या कैल्क्युलेटर के मन ही मन हिसाब लगाने का उससे सरल और तेज तरीका शायद ही कोई है। भारत का गणित-ज्ञान यूनान और मिस्र से भी पुराना बताया जाता है। शून्य और दशमलव तो भारत की देन हैं ही, कहते हैं कि यूनानी गणितज्ञ पिथागोरस का प्रमेय भी भारत में पहले से ज्ञात था। ऑस्ट्रेलिया के कॉलिन निकोलस साद वैदिक गणित के रसिया हैं। 

        उन्होंने अपना उपनाम 'जैन' रख लिया है और ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स प्रांत में बच्चों को वैदिक गणित सिखाते हैं। उनका दावा है- 'अमेरिकी अंतरिक्ष अधिकरण नासा गोपनीय तरीके से वैदिक गणित का कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले रोबेट बनाने में उपयोग कर रहा है। साद अपने बारे में कहते हैं, 'मेरा काम अंकों की इस चमकदार प्राचीन विद्या के प्रति बच्चों में प्रेम जगाना है। 

        मेरा मानना है कि बच्चों को सचमुच वैदिक गणित सीखना चाहिए। भारतीय योगियों ने उसे हजारों साल पहले विकसित किया था। आप उन से गणित का कोई भी प्रश्न पूछ सकते थे और वे मन की कल्पनाशक्ति से देख कर फट से जवाब दे सकते थे। उन्होंने तीन हजार साल पहले शून्य की अवधारणा प्रस्तुत की और दशमलव वाला बिंदु सुझाया। उनके बिना आज हमारे पास कंप्यूटर नहीं होता।

        इस आलेख को पढने के बाद मुझे अपने गांव की एक अनपढ ग्रामीण महिला याद आ गयी। वो महाजनों के घर से धान खरीदा करती थी और उससे ग्रामीण प्रक्रियाओं के अनुसार चावल तैयार किया करती थी। फिर उसे बाजार में बेच दिया करती थी , इसी कार्य के द्वारा कमाया गया मुनाफा उसके परिवार की जरूरतें पूरा करता था।  हमें हिसाब में कठिनाई होती थी , इसलिए हमलोग उसे किलो और क्विंटल के हिसाब से धान खरीदने को कहते थे , पर वह मेरे यहां पूराने तौल के अनुसार ( 40 सेर का मन ) धान खरीदती। 

        इतने रूपए मन के हिसाब से इतने मन और इतने किलो , हमें इस हिसाब किताब में काफी दिक्‍कत महसूस होती थी , इस दशमलव के हिसाब को हमलोग बिना कॉपी किताब और केलकुलेटर के नहीं कर सकते थे , वो मन ही मन जोडकर रूपए और पैसे तक का सही आकलन कर लेती थी। बिना किसी तरह की पढाई लिखाई के यह ज्ञान निश्चित तौर पर उसके पास मौखिक रूप में अपने माता पिता या किसी अन्‍य पूर्वजों से ही आया होगा और अभी तक वह उसे धरोहर के तौर पर संभाले हुई है। 

        बिना किताबों और कॉपियों या पढाई के ही परंपरागत रूप से ही अपनी आनेवाली पीढी तक यह ज्ञान खेल खेल में ही चलता आ रहा है। हमलोग उसके इस ज्ञान पर चकित रह जाते थे , पर हमें कभी भी उस हिसाब को समझने का मौका नहीं मिल पाया था। शायद अब भी हमलोगों का नजरिया अपने परंपरागत ज्ञान के प्रति बदलेगा , मैं ऐसी आशा रखती हूं , क्‍यूं‍कि उस वक्‍त मैं अपने परंपरागत ज्ञान को लेकर इतनी गंभीर नहीं थी , इसलिए शायद सोंच लिया हो कि जब हमारे पास दशमलव की उन्‍नत पद्धति है , तो इस बेकार के ज्ञान को सीखने का क्‍या फायदा ?

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