एजुकेशन केटेगरी में मेरा चुनाव



हमारे सभी पाठकों को मालूम होगा कि 15 जुलाई 2015 को भारत सरकार के महिला बाल विकास मंत्रालय ने फेसबुक के माध्यम से देशभर से 100 वैसी महिलाओं के चुनाव करने और उन्हें पहचान दिलाने की दिशा में कदम बढ़ाये , जिन्होंने समाज को बदलने की दिशा में कोई सकारात्मक पहल की हो । पुरे देश से फेसबुक उपयोगकर्ताओं ने अपने अपने क्षेत्र की उन महिलाओं का नामांकन करना आरम्भ किया , लगभग डेढ़ महीने तक नामांकन की प्रक्रिया चली। फिर मंत्रालय द्वारा सभी नोमिनेटेड महिलाओं से प्रोफाइल मांगे गए , उन प्रोफाइल्स के आधार पर जजों ने 20 केटेगरी बनाकर 200 महिलाओ की लिस्ट तैयार की और मंत्रालय के फेसबुक पेज पर वोटिंग के लिए रखा । 3 दिसंबर से 20 दिसंबर तक वोटिंग चली , सर्वाधिक वोट पाने वाली महिलाओं में से 100 को #100महिला पहल के लिए चुना गया। सबको ईमेल से 22 जनवरी 2016 के राष्ट्रपति भवन के कार्यक्रम और लंच के लिए निमंत्रण की मेल भेजी गयी है। एजुकेशन केटेगरी में मेरा भी चयन हुआ है (one of 100 Women Achievers) मुझे भी निमंत्रण का एक ईमेल मिल चूका है।


जिन पाठको और मित्रों ने वोटिंग करके मुझे सहयोग दिया उनका बहुत बहुत आभार !!

मुझे विश्‍वास है कि आगे भी यूं ही आप सबों का सहयोग बना रहेगा !!

नदी संरक्षण के लिए दिल्ली में होगा मीडिया जुटान

नद्द: रक्षति रक्षितः

Best Slogan in Hindi on save water

नई दिल्ली। 'नद्द: रक्षति रक्षितः' विषय के साथ इस बार का आयोजन दिल्ली में भारतीय जनसंचार संस्थान संस्थान (आईआईएमसी) के सभागार में 11 और 12 अक्टूबर को होगा। इसमें देशभर के मीडिया, नदी और जल से जुड़े संगठनों के 250 से अधिक प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे।

जन सरोकार से जुड़े तमाम मुद्दों पर जागरूकता के लिए प्रयासरत संस्था स्पंदन और मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् द्वारा संयुक्त रूप से यह आयोजन किया जा रहा है। का आयोजन गत तीन वर्षों से किया जा रहा है। पिछले दो आयोजन भोपाल में हुए थे। इसमें देश भर के प्रमुख जन संचारक हिस्सा लेते रहे हैं। पिछले आयोजनों में विकास और विज्ञान मुख्य विषय थे। इस वर्ष चौपाल का मुख्य विषय है। 
गौरतलब है कि इस बार के चौपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, विज्ञान भारती, भारतीय जनसंचार संस्थान, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र, इंडिया वाटर पोर्टल और भारतीय विज्ञान लेखक संघ का भी सहयोग मिल रहा है।
इस चौपाल में विचारक केएन गोविन्दाचार्य, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश प्रभु, सांसद और पत्रकार प्रभात झा, राज्यसभा सांसद और नर्मदा समग्र के अध्यक्ष अनिल माधव दवे, वरिष्ठ पत्रकार जवाहरलाल कौल, जल विशेषज्ञ अनुपम मिश्र, विज्ञान संचारक डॉ. मनोज पटेरिया, विज्ञान भारती के संगठक जयकुमार, मध्यप्रदेश सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. प्रमोद कुमार वर्मा, बाढ़ के विशेषज्ञ दिनेश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय, वेबदुनिया के संपादक जयदीप कर्णिक, रामेन्द्र सिन्हा, हितेश शंकर, केजी सुरेश, पर्यावरण स्तंभकार देवेन्द्र शर्मा, पंकज चतुर्वेदी, भाषाविद हेमंत जोशी, प्रमोद दूबे सहित देशभर के लगभग 250 से अधिक संचारक और जल के जानकार जुट रहे हैं। ये सभी संचारक और विषय विशेषज्ञ लोकहित में प्रभावी और उद्देश्य आधारित संचार के लिए रणनीतिक ज्ञान भी साझा करेंगे। इस मौके पर स्वतंत्र रूप से कार्यरत वेब और अन्य संचारकों की समस्याओं पर भी विमर्श होगा। बेहतर संचार के तरीके भी ढूंढे जाएंगे।
  
भारत हो या दुनिया का कोई अन्य देश, नदियों का महत्व सर्वविदित है। लगभग सभी संस्कृतियों में नदियों को जीवनदायिनी माना गया है और सम्मान दिया गया है। अलबत्ता भारत में बमुश्किल दशक भर पहले जिन नदियों को लेकर सभी बेफिक्र रहते थे, आज वही नदियां चिंता का सबसे बड़ा सबब बन रही हैं। कहीं सूखती नदियां, कहीं असमय उफनती नदियां, कहीं कचरे के ढेर में तब्दील होती नदियां आम आदमी ही नहीं, सरकार के भी माथे पर बल डाल रही हैं। गंगा को पुनर्जीवन देने की केंद्र की परियोजना ही साबित कर रही है कि नदियों को बचाने का मुद्दा कितना बड़ा है।
नदियों को बचाने के लिए मौजूदा सरकार ही कोशिश नहीं कर रही, नदी जल के समुचित इस्तेमाल के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने भी नदी जोड़ने की परियोजना बनाई थी। हालांकि यह परियोजना नदी और जल पर काम करने वालों के बीच तीखी चर्चा का विषय रही है। इस पर कई सवाल भी उठे हैं। नदियों की स्थिति बिगाड़ने में सबसे बड़ा हाथ किसका है और इसे सुधारने के लिए किस तरह की पहल की जानी चाहिए? आम आदमी को नदियों के प्रति संवेदनशील कैसे बनाया जाए? 

इन्हीं मुद्दों पर चर्चा के लिए देश के प्रमुख जल कार्यकर्ता, इस क्षेत्र के विशेषज्ञ और जन-संचारक 11 और 12 अक्टूबर को ‘मीडिया चौपाल’ में जुट रहे हैं। मीडिया चौपाल का आयोजन नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान में किया जा रहा है। इस दो दिनी चौपाल में मीडिया और नदी के विशेषज्ञ न सिर्फ एक-दूसरे को जानने-समझने की कोशिश करेंगे, बल्कि अपने-अपने ज्ञान के आधार पर परस्पर सीखने-सिखाने का काम भी करेंगे।

Slogan in save water in Hindi

पानी की रक्षा, देश की सुरक्षा !

पानी की बचत आज की जरूरत !

जल की बर्वादी, जीवन की बर्बादी  !

जल तो है सोना, इसे कभी न खोना !

तुम मुझे जल दो, मैं तुझे जीवन दूंगा !

तुम पानी बचाओ और ये तुम्हे बचाएगा !

जल है तो जीवन है, इसके बिना निर्जन है !

हम सबने यह थाना है, पानी को बचाना है !

जल संरक्षण जरूरत भी है और कर्त्तव्य भी !

बच्चे, बूढ़े या जवान, जल बचाकर बने महान !

जो पानी को बचाएगा, समझदार वो कहायेगा !

पानी अगर न बचाओगे, खुद प्यासे रह जाओगे !

जबतक जल सुरक्षित है, तबतक कल सुरक्षित है !

जो न जाएगा जल के लिए, वो न बचेगा कल के लिए !

पानी की बर्वादी रोकिए, पानी बिन क्या होगा सोचिए !

जल जीवन का अनमोल रतन, इसे बचाने का करो जतन  !

आओ मिलकर कदम बढ़ाएँ, जल संरक्षण की आदत बनाएँ !

कल को प्यासे ही रह जाओगे, यदि आज जल नहीं बचाओगे !

हर कोई जल बचा सकता है, बून्द बून्द से सागर बना सकता है !

जिसे अबतक न समझे वो कहानी हूँ मैं, बर्वाद न करो पानी हूँ मैं !



एक ब्‍लॉगर्स मीट में मेरा विचार

कलकत्‍ता के पार्क स्‍ट्रीट में 'द गोल्‍डेन पार्क' होटल में पिछले रविवार यानि 9 मार्च 2014 को 'अ बिलियन आइडियाज' की ओर से आयोजित एक ब्‍लॉगर्स मीट में भाग लेने का मौका मिला , इसमें विचार विमर्श के लिए निम्‍न मुद्दे थे .....

How to retain the inclusiveness and secular fabric of the nation
How to harness the potential of youth for innovation
How to empower women to have a greater say in the household decision making
How to increase transparency in the governance at all levels.

दो पीढियों से चली आ रही महिलाओं की समस्‍याओं के समाधान का एक उपाय नजर आ रहा था , इसलिए मैं इसी पर अपने विचार प्रस्‍तुत करने गयी थी, जो इस प्रकार हैं .... 

आज से पंद्रह साल पहले तक की मध्‍यम वर्गीय परिवारों की पढी लिखी महिलाओं की कहानी यही थी कि पढे लिखे होने के बावजूद घर परिवार संभालने की जिम्‍मेदारी के कारण अपने कैरियर पर अधिक ध्‍यान नहीं दे पाती थी। इस समय तक मुश्किल से दो प्रतिशत महिलाएं अपना कैरियर बना पायी , जिन्‍हें उनके पति और ससुरालवालों ने पूरा सहयोग दिया। बाकी की 98 प्रतिशत महिलाएं परिवार को संभालने के लिए , बच्‍चों की अच्‍छी परवरिश के लिए समझौते करती रही। उस वक्‍त बीएड करने वाली या प्रतियोगिता पास कर चुकी महिलाओं को भी घर परिवार संभालने के चक्‍कर में नौकरी छोडनी पडी। हमारे परिचय की एक स्‍त्री रोग विशेषज्ञा तक हैं , जिन्‍होने नौकरी के अधिकांश समय छुट्टियों में ही व्‍यतीत किए , फिर रिजाइन करना पडा , क्‍योंकि पतिदेव की पोस्टिंग जहां थी , वहां से वे तबादला नहीं करा सकते थे और ये न तो वहां आ सकती थी और न अकेले बच्‍चों को लेकर नौकरी संभालते हुए दूसरे शहर में रह सकती थी। सबसे बडी बात कि वे कैरियर को छोडकर भी राजी खुशी अपने पारिवारिक दायित्‍वों को निभाती रहीं। मैने खुद भी अपने परिवार और बच्‍चों को संभालने के लिए कैरियर के बारे में कभी नहीं सोंचा। पर आज की पीढी की लडकियां ऐसा समझौता नहीं कर सकती , ‘हमारा सबकुछ बर्वाद हो जाए , पर हम कैरियर को नहीं बर्वाद होने देंगे’ आज की पूरी पीढी की युवतियों की ये आवाज बन रही है और इसकी प्रेरणा उन्‍हें हम जैसी मांओं या चाचियों से ही मिल रही है , जो कल तक परिवार संभालने के कारण खुद के कैरियर पर ध्‍यान नहीं दे रही थी। समाज के लिए यह चिंतन का विषय है कि इन प्रौढ महिलाओं के चिंतन में बदलाव आने में कहीं उनका ही हाथ तो नहीं ?

नौकरी कर रही महिलाओं को दो चार साल भले ही कभी दुधमुंहे , कभी कमजोर ,कभी बीमार बच्‍चे को छोडकर नौकरी को संभाल पाने में दिक्‍कत होती हो , पर बच्‍चों के स्‍कूल में एडमिशन के पश्‍चात हल्‍के रूप में और बच्‍चों के बारहवीं पास करते ही अचानक महिलाओं को कुछ अधिक ही फुर्सत मिलने लगती है। कम पढी लिखी कम विचारशील महिलाएं मंदिरों में , अपनी अपनी मंडलियों में आ जाकर , फिल्‍में टीवी देखकर समय काट ही नहीं लेती , अपने दायित्‍व विहीन अवस्‍था का नाजायज फायदा उठाती हैं और समय का पूरा पूरा दुरूपयोग करती हैं। उनकी छोटी मोटी जरूरतें पतियों के द्वारा पूरी हो जाने से वे निश्चिंत रहती हैं। पर विचारशील महिलाएं कोई न कोई रचनात्‍मक कार्य करना चाहती है , पर बढती उम्र के साथ कुछ बाधाएं भी आती हैं , और उनको काम में परिवार , समाज का सहयोग भी नहीं मिल पाता , तब उन्‍हें ऐसा महसूस होने लगता है कि उनकी प्रतिभा का कोई महत्‍व नहीं। उनकी प्रतिभा को समाज में महत्‍व दिया जाता , तो आज उनका दृष्टिकोण ऐसा नहीं होता। जाहिर है , जिस त्‍याग को आज वे भूल समझ रही हों , वैसा त्‍याग अपनी बच्चियों से नहीं करवा सकती। पर इस तरह की सोंच से आनेवाली पीढी को बहुत नुकसान है , यह बात समाज को समझनी चाहिए।

आज की पूरी पीढी की युवतियों की यह सोंच कि परिवार के लिए कैरियर को छोडना उचित नहीं , आने वाले समय में बहुत बडी अव्‍यवस्‍था पैदा कर सकता है। पुरानी पीढी की गैर कामकाजी महिलाओं ने बच्‍चों के प्रत्‍येक क्रियाकलापो पर ध्‍यान रखा , उसे शारीरिक , नैतिक , बौद्धिक और चारित्रिक तौर पर सक्षम बनाया , जिससे समाज मजबूत बनता है। सारी कामकाजी महिलाओं के बच्‍चों का लालन पालन ढंग से न हो सका , ऐसी बात भी नहीं है , यदि परिवार में बच्‍चों पर ध्‍यान देने वाले कुछ अभिभावक हों या पति और पत्‍नी मिलकर ही बच्‍चों का ध्‍यान रख सकते हों , तो महिलाओं के नौकरी करने पर कोई दिक्‍कत नहीं आयी। पर आज की युवतियॉ कैरियर को अधिक महत्‍व देंगी , वो भी प्राइवेट जॉब को वरियता देती हैं , तो बच्‍चे आयाओं के भरोसे पलेंगे , उनके हिसाब से ही तो उनका मस्तिष्‍क विकसित होगा। एक भैया की शादी मेरे साथ ही हुई थी , पत्‍नी अपने जॉब में तरक्‍की कर रही हैं , इसलिए संतुष्‍ट हैं , पर बच्‍चों के विकास से संतुष्‍ट नहीं , अफसोस से कहती हैं , ‘जब सबका बच्‍चा बढ रहा था , मेरा बढा नहीं , जब सबका बच्‍चा पढ रहा है , मेरा पढा नहीं।‘ हां चारित्रिक तौर पर दोनो अच्‍छे हैं पर इस प्रकार की असंतुष्टि उस समय एक दो परिवार की कहानी थी , अब यही हर परिवार की कहानी होगी। हाल फिलहाल की कहानी है , पति के मना करने के बावजूद अपने बच्‍चे के जन्‍म के दो महीने बाद ही उसकी मां नौकरी पर जाने को तैयार थी , वो मानती थी कि बच्‍चे को संभालने की जिम्‍मेदारी पिता की भी बराबर ही है। हारकर पिता को ही नौकरी छोडनी पडी , घर से ही बच्‍चे को संभालते हुए कुछ काम करने लगा , पर बच्‍चे की परवरिश सामान्‍य नहीं हो सकी। आने वाली पीढी यानि आज के बच्‍चों का विकास ढंग से नहीं होगा , उनके व्‍यक्तित्‍व का पतन होगा तो उसे भी आनेवाले समय में देश को ही झेलना होगा।

कैरियर को महत्‍व देते हुए विवाह न करने या विवाह के बाद बच्‍चे न पैदा करने का व्‍यक्तिगत फैसला समाज के लिए दुखदायी नहीं है , पर विवाह कर बच्‍चे को जन्‍म देने के बाद उसका उचित लालन पालन न हो , यह समाज के लिए सुखद संकेत नहीं। आने वाले समय में बच्‍चों का पालन पोषण , देख रेख भी सही हो , और महिलाएं भी संतुष्‍ट रहे , इसके लिए सरकार को बहुत गंभीरता से एक उपाय करने की आवश्‍यकता है। नौकरी को लेकर महिलाओं के सख्‍त होने का सबसे बडा कारण यह है कि उम्र बीतने के बाद उनके लिए कोई संभावनाएं नहीं बचती , जबकि बच्‍चों को पढाने के क्रम में उनकी पढाई लिखाई चलती रहती है और भले ही अपने विशिष्‍ट विषय को भूल भी गयी हूं , उनका सामान्‍य विषयों का सामान्‍य ज्ञान कम नहीं होता। इसलिए महिलाओं के लिए हर प्रकार की नौकरी में उम्र सीमा समाप्‍त किया जाना चाहिए । साथ ही हर क्षेत्र में उन्‍हें पर्याप्‍त आरक्षण मिलना चाहिए। उन्‍हें व्‍यवसाय के लिए बैंको से कम ब्‍याज दरों पर ऋण और अन्‍य तरह की सुविधाएं मुहैय्या करायी जानी चाहिए, ताकि घर परिवार संभालते वक्‍त भविष्‍य में कुछ आशाएं दिखती रहें। आने वाली बेहतर पीढी का ढंग से पालन पोषण करते वक्‍त महिलाओं का भविष्‍य के लिए आश्‍वस्‍त रहना बहुत आवश्‍यक है। 

अन्‍य तीनों मुददों पर मेरे विचार इस प्रकार हैं .....

  1. हमारे देश में सदैव 'विविधता में एकता' की भावना विकसित होती रही है , इसलिए मेरे विचार से देश के लोगों की जाति , धर्म या रहन सहन जो भी हो कोई अंतर नहीं पडता , बस लोगों के अंदर देश भक्ति की भावना में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए , हम अपने बच्‍चों को ऐसी शिक्षा दें कि किसी के बहकावे में आकर वे देश का नुकसान न करें। सरकार को बस इतना करना है कि वे सभी नागरिकों को समान सुविधाएं दें। नौकरी में आरक्षण देकर समाज के कमजोर पक्ष को आर्थिक सुरक्षा भले ही आवश्‍यक हो , पर देश के हित के लिए जिम्‍मेदारी से भरे सरकारी उच्‍च पदों में या पदोन्‍नति में प्रतिभा को महत्‍व दिया जाना चाहिए। 
  2. देश की आनेवाली पीढी को यानि युवाओं को प्रतिभाशाली बनाने के लिए रटंत प्रणाली की शिक्षा को समाप्‍त कर इसे व्‍यावहारिक और उपयोगी बनाने पर बल दिया जाना चाहिए , अपनी अपनी रूचि और प्रतिभा के हिसाब से सभी युवाओं को सरकार की ओर से एक समान अवसर मिलना चाहिए। दबाबपूर्ण पाठ्यक्रम युवाओं के प्रतिभा को नुकसान पहुंचाती है। 
  3. आज प्राइवेट संस्‍थानों ने संचार क्रांति का पूरा फायदा उठाया है , एक एक कर्मचारी की गतिविधियों पर उनकी पूरी निगाह रहती है , सरकार के लिए तो यह और आसान है। संचार क्रांति के इस युग में सरकारी तंत्र की जनता के मध्‍य पारदर्शिता बहुत बडी बात नहीं , बस इच्‍छा शक्ति होनी चाहिए। 

अपनी मातृभाषा में विचारों की अभिव्‍यक्त


वैसे तो मनुष्‍य के पूरे शरीर की बनावट प्रकृति की एक उत्‍कृष्‍ट रचना है ही , खासकर इसके मन और मस्तिष्‍क की बनावट इसे दुनियाभर के जीवों से अलग करती है। जन्‍म लेने के पश्‍चात ही मनुष्‍य सूक्ष्‍मता से वातावरण का निरीक्षण करता रहता है। वातावरण में होनेवाले किसी भी परिवर्तन को ज्ञानेन्द्रियां तुरंत उसके मस्तिष्क तक पहुंचाती है। जानकारी से मनुष्‍य का मन प्रभावित होता है , निरंतर विचारों और भावनाओं का प्रवाह चलता रहता है। अपने ज्ञान, विचारों और भावनाओं को अभिव्‍यक्ति देने के लिए प्राचीन काल से ही मनुष्‍य ने अनेक तरीके ईजाद किए।

प्रारंभ में हाथ, पैर के इशारे और मुख के हाव भाव से तो कुछ समय बाद तरह तरह के चित्रों द्वारा परस्‍पर संवाद किया गया। इसी कारण दुनिया के हर क्षेत्र में तरह तरह के पेण्टिंग , नृत्‍य , चित्र , मूर्ति जैसी कलाओं का विकास हुआ। कालांतर में मुख की ध्‍वनियों को नियंत्रित कर बोली विकसित हुई, जिसे सुव्‍यवस्थित कर भाषा का रूप दिया गया। सशक्‍त माध्‍यम के रूप में लेखन कला को ही सबसे अधिक पहचान मिली । हर भाषा में साहित्‍य लिखे गए, हालांकि बहुतों का लेखन नष्‍ट हो गया, फिर भी जो हैं, उन्‍हें पढकर हर देश, काल की परिस्थिति का, उसके इतिहास का अनुमान लगाया जा सकता है। 

समय बदला, युग परिवर्तन के साथ साथ चिंतन का दायरा भी बढता गया, जिससे मानव मस्तिष्‍क में चलने वाली हलचल और बढने लगी, लोग अपने विचारो, भावनाओं को अभिव्‍यक्ति देने लगें। पर कुछ लोग ही इतने भाग्‍यशाली रहें , जिनका लिखा सुरक्षित रहा। अधिकांश का लिखा तो समकालीन भी नहीं पढ सकें। उनके अनुभव की पांडुलिपियां किसी न किसी बहाने कचरे तक पहुंच गयीं। कभी अपने परिवार , समाज और गांव के लोगों की, तो कभी किसी पत्र पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग की उपेक्षा से। 

खासकर आज के व्‍यावसायिक युग ने तो जहां नए लेखकों को पनपने नहीं दिया , वहीं दूसरी ओर सरल व्‍यक्तित्‍व वाले अच्‍छे लेखकों को भी समाज से दूर कर डाला। ऐसे ही भुक्‍तभोगी लोगों में मेरे पिता श्रीविद्या सागर महथा जी का नाम लिया जा सकता है , जिनके लेखों ने दस वर्षों तक ज्‍योतिषीय पत्र पत्रिकाओं में धूम मचायी , ज्‍योतिष के क्षेत्र में उन्‍हें राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कितने सम्‍मान दिलाए, पर ज्‍योतिष की एक नई शाखा ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ को स्‍थापित करने के बाद परंपरागत ज्‍योतिषियों से उनकी नहीं बनी । इस कारण दिल्‍ली में आठ वर्षों तक अपनी पांडुलिपियों को लेकर प्रकाशकों के चक्‍कर काटते, फिर भी उन्‍हें सफलता नहीं मिली। उनके चिंतन से प्रभावित होकर विभिन्‍न चैनलों के पत्रकारों ने उनकी इंटरव्‍यू लेते हुए वीडीयो भी बनायी, पर उसका प्रसारण भी रोक दिया गया।

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ से जुड जाने के बाद इसके विकास के लिए प्रयत्‍नशील मैं उनकी इस असफलता से निराश थी कि मेरे सामने चिट्ठाकारिता एक वरदान बनकर आया। मैने झटपट ब्‍लॉगस्‍पॉट में अपना चिट्ठा बनाया और अपने कुछ लेख इसमें प्रकाशित किए , पर वहां हिंदी फॉण्‍टों को स्‍वीकार नहीं किया गया। हिंदी की दशा देखकर मैं असंतुष्‍ट थी , मुझे मजबूरी में अपने अंग्रेजी आलेख डालने पडे। लेकिन कुछ ही दिनों में मुझे यूनिकोड के बारे में जानकारी मिली, फिर मैने वर्डप्रेस में अपना ब्‍लॉग बनाया और ज्‍योतिष की एक शाखा के रूप में विकसित किए गए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के बारे मे जानकारियां प्रकाशित करनी शुरू कर दी।

शुरूआती दौर में मैं हिंदी फॉण्‍ट में लिखे अपने आलेख को यूनिकोड में बदलती थी , पर बाद में शैलेश भारतवासी जी , अविनाश वाचस्‍पति जी आदि के सहयोग से मैने अपने कम्‍प्‍यूटर को हिंदीमय ही कर दिया। मेरा मानना है कि जिस तरह अपनी मातृभाषा में बच्‍चे को शिक्षा मिलने का अपना महत्‍व है , बिल्‍कुल वैसा ही अपनी मातृभाषा में विचारों की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का है। इसके अतिरिक्‍त हिंदी में चिट्ठाकारिता से ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के भारतवर्ष में हुए रिसर्च की प्रामाणिकता तय होती , मैं आनेवाले युग में अन्‍य शोधों की तरह इसे विवाद का विषय भी नहीं बनने देना चाहती थी।

नियमित चिट्ठा लिखने से एक फायदा हुआ कि हमें एक मंच मिल गया, जहां हम ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सिद्धांत की चर्चा कर सकते हैं , इससे जुडे अपने विचारों को अभिव्‍यक्ति दे सकते हैं। विभिन्‍न समयांतराल में आसमान में चल रहे भिन्‍न भिन्‍न ग्रहों की खास स्थिति का किनपर अच्‍छा और किनपर बुरा प्रभाव पड रहा है , इसकी चर्चा कर सकते हैं। मौसम , शेयर बाजार , राजनीति आदि के भविष्‍य के बारे में कुछ आकलन कर पाठकों के समक्ष रख सकते हैं। हालांकि ज्‍योतिष जैसा विषय लोगों के लिए सहज ग्राह्य नहीं , पर मेरी भविष्‍यवाणियों ने पाठकों पर खासा प्रभाव डाला है।

भूकम्‍प के बारे में एक खास तिथि को की गयी मेरी भविष्‍यवाणी के सत्‍य होने पर मेरे ब्‍लॉग में चार दिनों तक ज्‍योतिष के पक्ष और विपक्ष में चर्चा चलती रही थी। चार वर्षों के बाद अब भारत के हर शहर में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के नाम से परिचित कुछ लोग जरूर मिल जाएंगे , इसके विकास के लिए , इसके भविष्‍य के लिए यह सुखद चिन्‍ह है। इसके अलावा सिर्फ आत्‍म संतुष्टि से आरंभ किया गया चिट्ठाकारी कल व्‍यावसायिक सफलता की शुरूआत भी कर सकता है। विज्ञापन से अन्‍य भाषा के चिट्ठाकारों की कमाई शुरू हो गयी है , वह दिन देर नहीं , जब हिंदी के चिट्ठाकार भी कमाई कर पाएंगे।

अन्‍य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अधिकांश मनोरंजन की ही बातें होती हैं , कुछ मुद्दों पर तात्‍कालिक चर्चा परिचर्चा अवश्‍य होती हैं, पर वो उतना महत्‍व नहीं रखता। चिट्ठाकारिता की बात ही अलग है , हर विषय पर पूरा साहित्‍य बनता जा रहा है। हर तरह के कीवर्ड पर सर्च इंजिन से हिंदी के लेखों के लिंक ढूढे जा सकते हैं , इसपर आयी टिप्‍पणियां पढी जा सकती हैं। हमें संविधान द्वारा विचारों को अभिव्यक्ति देने का अधिकार बहुत पहले दे दिया गया था , पर उसका इस्‍तेमाल हम 15 अगस्त 1995 से कर पा रहे हैं , जब हमें इंटरनेट पर विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार मिला है।

पारदर्शिता बढ़ाने और जानकारी उपलब्ध कराने से लेकर लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में इसकी भागीदारी बढती जा रही है। मैं आरंभ से ही पत्र पत्रिकाएं पढने की शौकीन रही हूं , पर रेडियो, टेलीविजन या प्रकाशित सामग्री से अलग इंटरनेट के लेखों में एक ही विषय पर समान और असमान सोच वाले लोग मिलते हैं , जिससे निरपेक्ष चिंतन में मदद मिलती है। पर जैसा कि हर सुविधा का दुरूपयोग भी किया जाता है , यहां भी कुछ असामाजिक तत्‍व की सक्रियता हो सकती है। असमान विचार वालों को संतुलित ढंग से लेखों पर अपने विचार रखने की आवश्‍यकता है , ब्‍लॉगिंग की स्‍वतंत्रता को अक्षुण्‍ण बनाए रखने के लिए हमें पूरी सावधानी बनाए रखना चाहिए।

अपने समय को जानने समझने की वैज्ञानिक पद्धति


पृथ्‍वी को केन्‍द्र में मानकर पूरे आसमान के 360 डिग्री को जब 12 भागों में विभक्त किया जाता है , तो उससे 30-30 डिग्री की एक राशी निकलती है। इन्हीं राशियों को मेष , वृष , मिथुन ............... मीन कहा जाता है। किसी भी जन्मकुंडली में तीन राशियों को महत्वपूर्ण माना जाता है। पहली वह राशी , जिसमें जातक का सूर्य स्थित हो, वह सूर्य-राशी के रुप में, जिसमें जातक का चंद्र स्थित हो, वह चंद्र-राशी के रुप में तथा जिस राशी का उदय जातक के जन्म के समय पूर्वी क्षितीज मे हो रहा हो , वह लग्न-राशी के रुप में महत्वपूर्ण मानी जाती है। एक महीने तक जन्‍म लेनेवाले सभी व्‍यक्ति एक सूर्य राशि के अंतर्गत आते हैं , जबकि ढाई दिन तक जन्‍म लेनेवाले एक चंद्रराशि के अंतर्गत।

आजकल बाजार में लगभग सभी पत्रिकाओं में राशी-फल की चर्चा रहती है, कुछ पत्रिकाओं में सूर्य-राशी के रुप में तथा कुछ में चंद्र-राशी के रुप में भविष्यफल का उल्लेख रहता है , किन्तु ये पूर्णतया अवैज्ञानिक होती हैं और व्यर्थ ही उसके जाल में लाखों लोग फंसे होते हैं। इसकी जगह लग्न-राशी फल निकालने से पाठकों को अत्यधिक लाभ पहुंच सकता है , क्योंकि जन्मसमय में लगभग दो घंटे का भी अंतर हो तो दो व्यक्ति के लग्न में परिवर्तन हो जाता है, जबकि चंद्रराशी के अंतर्गत ढाई दिन के अंदर तथा सूर्य राशी के अंतर्गत एक महीनें के अंदर जन्मलेनेवाले सभी व्यक्ति एक ही राशी में आ जाते हैं। लेकिन चूंकि पाठकों को अपने लग्न की जानकारी नहीं होती है, इसलिए ज्योतिषी लग्नफल की जगह राशी-फल निकालकर जनसाधारण के लिए सर्वसुलभ तो कर देते हें , पर इससे ज्योतिष की वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

किसी प्रकार की सामयिक भविष्यवाणी किसी व्यक्ति के लग्न के आधार पर सटीक रुप में की जा सकती है , किन्तु इसकी तीव्रता में विभिन्न व्यक्ति के लिए अंतर हो सकता है। किसी विशेष महीनें का लिखा गया लग्न-फल उस लग्न के करोड़ों लोगों के लिए वैसा ही फल देगा , भले ही उसमें स्तर , वातावरण , परिस्थिति और उसके जन्मकालीन ग्रहों के सापेक्ष कुछ अंतर हो। जैसे किसी विशेष समय में किसी लग्न के लिए लाभ एक मजदूर को 25-50 रुपए का और एक व्यवसायी को लाखों का लाभ दे सकता है। इस प्रकार की भविष्यवाणी `गत्यात्मक गोचर प्रणाली´ के आधार पर की जा सकती है। जिन्हें अपने लग्न की जानकारी न हो , वे अपनी जन्म-तिथि , जन्म-समय और जन्मस्थान के साथ मुझसे संपर्क कर सकते हैं। उन्हें उनके लग्न की जानकारी दे दी जाएगी।