दिसंबर 2012 में माया पंचांग के समाप्त होने के कारण विश्व में प्रलय आने की संभावना को काटती हुई मेरे आलेखों की श्रृंखला अभी पूरी भी नहीं हुई और कल से ही मेरे पास चंद्रग्रहण से शुरू होनेवाले इस वर्ष में ग्रहों के अच्छे या बुरे प्रभाव की जिज्ञासा को लेकर फोन आ रहे हैं। एक ब्लॉगर महेश कुमार वर्मा जी के अनुरोध पर विशेष रूप से समय निकालकर मै इस आलेख को लिखकर पोस्ट कर रही हूं। 20 जुलाई को सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के जड चेतन पर पडने वाले प्रभाव को काटते हुए मैने इस बात को स्पष्टत: समझाया था कि ऋषि, महर्षियों ने जन्मकुंडली निर्माण से लेकर भविष्य कथन तक के सिद्धांतों में कहीं भी आसमान के त्रिआयामी स्थिति को ध्यान में नहीं रखा है ।
क्या ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास? इस ब्लॉग में आप ज्योतिष के आधुनिक सूत्रों से सम्बद्ध नवीन ज्योतिषीय सिद्धांत के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे, जो ज्योतिष की सटीकता पर शोध, ज्योतिष में नए शोध और निष्कर्ष के उपरांत विकसित किया गया है, नए ज्योतिष सूत्रों के माध्यम से कुंडली विश्लेषण, इन ज्योतिष के नए नियमों से भविष्यवाणी कैसे करें, 'ज्योतिष सीखने के लिए नए सूत्र और विधियाँ बताई गयी हैं।
पूर्णिमा और कई ग्रहों की अनुकूलता
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
2010 आपके लिए मंगलमय हो !!
इस दुनिया में आने के बाद हमारी इच्छा हो या न हो , हम अपने काल , स्थान और परिस्थिति के अनुसार स्वयमेव काम करने को बाध्य होते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं , अपने काल , स्थान और परिस्थिति के अनुरूप ही हमें फल प्राप्त करने की लालसा भी होती है। पर हमेशा अपने मन के अनुरूप ही प्राप्ति नहीं हो पाती , जीवन का कोई पक्ष बहुत मनोनुकूल होता है , तो कोई पक्ष हमें समझौता करने को मजबूर भी करता रहता है। पर यही जीवन है , इसे मानते हुए , जीवन के लंबे अंतराल में कभी थोडा अधिक , तो कभी थोडा कम पाकर भी हम अपने जीवन से लगभग संतुष्ट ही रहते हैं। यदि संतुष्ट न भी हों , तो आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इतनी भागदौड करनी पडती है और हमारे पास समय की इतनी कमी होती है कि तनाव झेलने का प्रश्न ही नहीं उपस्थित होता।
पर समय समय पर छोटी बडी अच्छी या बुरी घटनाएं आ आकर कभी हमारा उत्साह बढाती है , तो कभी हमें अपने कर्तब्यों के प्रति सचेत भी करती है। यदि हमें सर्दी जुकाम हो , तो इसका अर्थ यह है कि प्रकृति के द्वारा अगली बार ठंड से बचने के लिए हमें आगाह किया जाता है। इसी प्रकार पेट की गडबडी हो तो हम संयम से खाने पीने की सीख लेते हैं। ऐसी घटनाओं में कभी भी अनर्थ नहीं हुआ करता। पर इस दुनिया के लाखों लोगों में से कभी कभी किसी एक के साथ कोई बडी सुख भरी या कोई दुखभरी घटना घट जाया करती है , जो सिर्फ उसके लिए ही नहीं , पूरे समाज और देश तक के लिए आनंददायक या कष्टकर हो जाती है।
प्रकृति में ये घटनाएं सामूहिक रूप से हमारा उत्साह बढाने या हमें सावधान करने के लिए होती रहती है। कहीं ठीक से पालन पोषण होने से किसी का बच्चा 'बडा आदमी' बन जाता है तो कहीं ठीक से न होने से किसी का बच्चा 'चोर डाकू' भी बन जाता है। कहीं पर रिश्तो की मजबूती हमारे जीवन को स्वर्ग बनाने में सक्षम है तो कहीं ढंग से रिश्तो को नहीं निभाए जाने से पति पत्नी के मध्य तलाक तक की नौबत आती है। कहीं ढंग से काम न करने से किसी प्रकार की दुर्घटना होती है , तो कहीं सही देखभाल न होने से किसी की मौत। यदि सामूहिक तौर पर देखा जाए एक लाख से भी अधिक लोगों में से किसी एक व्यक्ति के साथ हुई इस प्रकार की घटना से बाकी 99,999 से भी अधिक लोग सावधानी से जीना सीख जाते हैं।
पर सावधान बने रहने की इस सीख को भयावह रूप में देखकर हम अक्सर अपने तनाव को बढा लेते हैं। प्रकृति में अति दुखद घटनाओं की संख्या बहुत ही विरल होती है। ऐसी समस्याएं अक्सर नहीं आती, कभी कभार ही लोगों को इस प्रकार की समस्या में जीना पडता है। पर प्रकृति के इस नियम को हम बिल्कुल नहीं समझ पाते। सबसे पहले तो अपने धन , पद और आत्मविश्वास में हम किसी प्रकार की अनहोनी की संभावना को ही नकार देते हैं। प्रकृति के महत्व को ही स्वीकार नहीं करते और जब कोई छोटी समस्या भी आए तो उसे छोटे रूप में स्वीकार ही नहीं कर पाते। मामूली बातों को भी वे भयावह रूप में देखने लगते हैं।
जैसे किसी अच्छे स्कूल या कॉलेज में बच्चे का दाखिला न हो सका , तो हमें बच्चे का पूरा जीवन व्यर्थ नजर आने लगता है। बच्चे को कहीं थोडी सी चोट लग गयी हो तो भयावह कल्पना करते हुए हमारा मन घबराने लगता है , बेटे का पढाई में मन नहीं लग रहा तो भविष्य में उसके रोजी रोटी की समस्या दिखने लगती है। बच्ची का विवाह नहीं हो रहा हो , तो उसके जीवनभर अविवाहित बने रहने की चिंता सताने लगती है। लेकिन ऐसा नहीं होता , देश , काल और परिस्थिति के अनुसार सभी के काम होने ही हैं , इसलिए अपने परिवार के कर्तब्यों का पालन करते हुए इसकी छोटी छोटी चिंता को छोड हमें अपने कर्तब्यों के द्वारा देश और समाज को मजबूत बनाने के प्रयास करने चाहिए।
अपने अनुभव में मैंने पाया है कि चिंता में घिरे अधिकांश लोग सिर्फ शक या संदेह में अपना समय बर्वाद करते हैं। इस दुनिया में सारे लोगों का काम एक साथ होना संभव नहीं , यह जानते हुए भी लोग बेवजह चिंता करते हैं। हमारे धर्मग्रंथ 'गीता' का सार यही है कि हमारा सिर्फ कर्म पर अधिकार है , फल पर नहीं। इसका अर्थ यही है कि फल की प्राप्ति में देर सवेर संभव है। इस बात को समझते हुए हम कर्तब्य के पथ पर अविराम यात्रा करते रहें , तो 2010 ही क्या , उसके बाद भी आनेवाला हर वर्ष हमारे लिए मंगलमय होगा। मैं कामना करती हूं कि आनेवाले वर्ष आपके लिए हर प्रकार की सुख और सफलता लेकर आए !
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
2012 में दुनिया के अंत की संभावना 2
हम सभी जानते हैं कि घडी या कैलेण्डर समय को याद रखने का एक माध्यम भर है , यह अपने में बिल्कुल तटस्थ है और हरेक व्यक्ति को अपनी सुविधानुसार इसका उपयोग करना होता है। न तो किसी प्रकार की खुशी और न ही किसी प्रकार के गम से इसका कोई लेना देना होता है। अपनी सुविधा के लिए हम घडी और कैलेण्डर की तरह अन्य साधनों का निर्माण करते हैं। किसी न किसी दिन सबका अंत होना ही है , कंप्यूटर इंजीनियरों द्वारा कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर की प्रोग्रामिंग 2000 तक के लिए की गयी थी।
2000 के एक दो वर्ष पूर्व से ही इस बात को लेकर हंगामा मचा हुआ था कि Y2K की समस्या के कारण हमारे सारे कंप्यूटर बेकार हो जाएंगे , पर ऐसा नहीं हुआ। उस समस्या को दूर किया गया और आज भी हम उसका उपयोग कर रहे हैं। पिछले लेख में आपने पढा कि 2010 तक ही अपने सॉफ्टवेयर की प्रोग्रामिंग किए होने से 2012 दिसंबर की ग्रहीय गणना में मेरे समक्ष भी बाधा आयी। अब यदि इस मध्य मैं दुनिया में न होती , तो मेरे किसी शिष्य के द्वारा इस बात का भयावह अर्थ लगाना भी संभव था।
किसी असामान्य परिस्थिति में इस प्रकार का भ्रम पैदा हो जाना बिल्कुल स्वाभाविक है , पर हर वक्त हमें अपने विवेक से काम लेना चाहिए। सिर्फ माया कैलेण्डर की चर्चा में ही पोस्ट की लंबाई बढ गयी है , जबकि 2012 के प्रलय की संभावना के बारे में बहुत सारे सबूत जुटाए गए हैं , सबकी चर्चा के लिए फिर अगली कडी का इंतजार करवाने को बाध्य हूं।
'गत्यात्मक ज्योतिष' टीम
गत्यात्मक ज्योतिष एप्प
नोट - जल्दी करें, निःशुल्क सदस्यता की अवधि लगभग समाप्त होनेवाली है।
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अंधकार युग से निकलकर भारत के युवाओं का स्वर्णयुग में प्रवेश
आज आप किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार में पहुंच जाएं , उसके युवा पुत्र या पुत्री मल्टीनेशनल कंपनी में लाखों के पैकेज वाली नौकरी कर रहे हैं , कितने की तो विदेशों से ऐसी आवाजाही है मानों भारत घर है और विदेश आंगन। उच्च वर्गीय लोगों के लिए ही विदेशों की यात्रा होती है ,यह संशय मध्यम वर्गीय परिवारों में मिट चुका है और अनेक माता-पिता भी अपने बच्चों के कारण विदेश यात्रा का आनंद ले चुके हैं। इसी प्रकार प्रत्येक परिवार का किशोर वर्ग , चाहे वो बेटा हो या बिटिया , बडे या छोटे किसी न किसी संस्था से इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढाई कर रहे है और आनेवाले समय में उसके लिए भी नौकरी की पूरी संभावना दिख रही है।
जो विद्यार्थी जीवन में बिल्कुल सामान्य स्तर के थे , उनके कैरियर की मजबूती भी देखकर आश्चर्य होता है। महंगे पढाई करवा पाना किसी अभिभावक के लिए कठिन हो , तो बैंक भी कर्ज देने को तैयार होती है और किशोरों की पढाई में कोई बाधा नहीं आने देती। प्राइवेटाइजेशन के इस युग में तकनीकी ज्ञान रखनेवालों लाखों विद्यार्थियों के रोजगार की व्यवस्था से आज के युवा वर्ग की स्थिति स्वर्णिम दिख रही है।
वे पूरी मेहनत करना पसंद करते हैं , पर अपने जीवन में थोडा भी समझौता करना नहीं चाहते , उनकी पसंद सिर्फ ब्रांडेड सामान हैं, रईसी का जीवन है। इसका भविष्य पर क्या प्रभाव पडेगा , यह तो देखने वाली बात होगी , पर यदि 20 वी सदी के अंत से इसकी तुलना की जाए तो 21 सदी के आरंभ में आया यह परिवर्तन सामान्य नहीं माना जा सकता।
यदि हम पीछे मुडकर देखें , तो1990 तक यत्र तत्र सरकारी नौकरियों में जगह खाली हुआ करती थी , भ्रष्टाचार भी एक सीमा के अंदर था , प्रतिभासंपन्न युवाओं को कहीं न कहीं नौकरी मिल जाया करती थी। अपने स्तर के अनुरूप सरकारी सेवा में सीमित तनख्वाह में रहते हुए भी जहां युवा वर्ग निराश नहीं था, वहीं अभिभावक भी प्रतिभा के अनुरूप अपने संतान की स्थिति को देखकर संतुष्ट रहा करते थे। पर 1990 के बाद सरकारी संस्थाओं में भी छंटनी का दौर शुरू हुआ , जब पुराने कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा रहा हो , तो नए लोगों को रखने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता ?
2000 के दशक में कहीं कोई रिक्त पद नहीं , यदि कहीं से दो चार पदों पर नियुक्ति की कोई संभावना भी दिखी तो पद या पैसे वालों को उसपर कब्जा करने में देर नहीं होती थी। एक से एक मेधावी बच्चे , जिन्होने 1990 से 2000 के मध्य अपनी पढाई समाप्त की , एक ऐसे अंधकार युग में अपने कैरियर चुनने को विवश हुए , जहां विकल्प के नाम पर अपने परंपरागत व्यवसाय या फिर समय काटने के लिए कोई प्राइवेट नौकरी करनी थी। कोई अमीर अभिभावक पैसे खर्च कर अपने बेटों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की प्राइवेट डिग्री दिलवा भी देता था , तो नौकरी के बाजार में उसकी कोई इज्जत नहीं थी। वह नाम के लिए ही डॉक्टर या इंजीनियर हो जाता था और पूरे जीवन कोई व्यसाय के सहारे ही चलाने को बाध्य होते थे।
बिना तकनीकी ज्ञान के अपने काम और अनुभव के सहारे कोई अपना कैरियर बनाने में सक्षम हुए , तो कोई अपनी रूचि न होने के बावजूद किसी व्यवसाय में लगकर अपनी जीवन नैया को खींचने को समझौता करने को तैयार हुए। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि उस दशक में सभी युवा भाग्य भरोसे जीने को बाध्य हुए । मात्र दस वर्ष में हुए इस परिवर्तन को देखते हुए ही मैं अक्सर कहा करती हूं कि युवा वर्ग ने अंधकार युग से निकलकर स्वर्णिम युग में प्रवेश किया है !!
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एक बडी सीख
ब्यूटी पार्लर आरंभ करने जा रही मेरी भांजी ने शायद पंडित या ज्योतिषी को भगवान ही समझ लिया , तभी तो उसने अपनी दुकान खोलने के लिए मुझे एक ऐसा मुहूर्त्त देखने को कहा , जिसमें खोलने पर उसकी दुकान में घाटे का कोई सवाल ही नहीं हो। ज्योतिष की सहायता से कोई दुकान खोलने या न खोलने या देर सवेर करने की सलाह दी जा सकती है , पर शकुन और मुहूर्त्त पर तो गत्यात्मक ज्योतिष बिल्कुल विश्वास नहीं करता , कई दिन पूर्व इसपर पापा जी के द्वारा एक पोस्ट भी किया जा चुका है , मुझे इस सोंच पर अचंभा हुआ।
उसने मुझे ही समझाते हुए कहा कि उसके शहर में एक पंडित है , जो ऐसा मुहूर्त्त निकालकर देते हैं , जिससे आपके फर्म में घाटे की कोई गुंजाइश नहीं। पढे लिखे लोग भी कभी कभी ऐसे भ्रम में कैसे पड जाते हैं , जो अव्यवहारिक हो। ग्रहों के पृथ्वी पर पडनेवाले प्रभाव के रहस्य को हम ढूंढ भी लें , किसी के भाग्य को समझने में सफलता भी प्राप्त कर लें , पर इसे बदलने में सफलता प्राप्त करना संभव है भला ? इसी संदर्भ में मुझे विद्वान भास्कराचार्य और उनकी पुत्री लीलावती की कथा याद आ गयी , जिसे मैने उसे भी समझाया और आज आपको सुनाने जा रही हूं ...
भास्कराचार्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। उनका जन्म और पालन पोषण ही एक ऐसे घर में हुआ था , जहां स लोग ज्योतिषी थे। इनका जन्म 1114 ई0 में हुआ था। भास्कराचार्य उज्जैन में स्थित वेधशाला के प्रमुख थे. यह वेधशाला प्राचीन भारत में गणित और खगोल शास्त्र का अग्रणी केंद्र था। लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था। जब लीलावती का जन्म हुआ , तो उसकी जन्मकुंडली देखकर या उसके जन्म के समय आसमान में ग्रहों की खास स्थिति देखकर भास्कराचार्य परेशान हो गए।
उसकी कुंडली में वैधब्य योग था, वह योग बडा प्रबल था और उसके घटित होने की शत प्रतिशत संभावना थी। वे दिन रात किसी ऐसे उपाय की सोंच में थे जिससे कि उसके वैधब्य योग को काटा जा सके। देखते ही देखते लीलावती सयानी हो गयी , विवाह योग्य होने पर उसका विवाह आवश्यक था , पर पिता उसके विधवा रूप की कल्पना कर ही कांप जाते। अंत में चिंतन मनन कर उन्होने एक उपाय निकाल ही लिया।
उस वर्ष विवाह का एक ऐसा विशेष मुहूर्त्त आने वाला था , जहां किसी भी कन्या का विवाह किए जाने से उसके अखंड सौभाग्यवती रहने की संभावना थी।भास्कराचार्य ने उसी मुहूर्त्त में लीलावती का ब्याह करने का निश्चय किया। मुहूर्त्त देखने के लिए उस समय घडी तो होती नहीं थी , आकाश में ग्र्रहों नक्षत्रों की स्थिति से ही समय का आकलन किया जाता था । ब्याह की पूरी तैयारी की गयी , लेकिन ऐन मौके पर कोई अति आवश्यक कार्य निकल आया। भास्कराचार्य के पास हर क्षण का हिसाब किताब हुआ करता था , पर उनके जाने से शुभ मुहूर्त्त में ब्याह होना मुश्किल था।
इसलिए काम पर जाने से पहले उन्होने एक यंत्र बनाया , एक बरतन में अपनी गणना के अनुसार जल डाला और उसके प्रवाह के लिए एक छिद्र बनाया। उस बरतन के पूरे जल के बह जाने के तुरंत बाद उस विवाह योग को शुरू होना था , परिवार के सब लोगों को समझाकर वे अपने काम पर चल पडें। पर बरतन के ढक्कन को उठाकर बार बार जल के स्तर को देखने के क्रम में लीलावती के गले के माले का एक मोती या कुछ और बरतन में गिर पडा और उससे जल का प्रवाह रूक गया।
जल के प्रवाह में रूकावट आने से जल पूरा बह न सका और देखते ही देखते विवाह का मुहूर्त्त निकल गया। पिता के लौटने तक तो बहुत देर हो चुकी थी , मजबूरन किसी और मुहूर्त्त मे उसका विवाह करवाना पडा। इस कहानी से सीख मिलती है कि सचमुच प्रकृति के नियमों को कोई नहीं बदल सकता। फिर वहीं हुआ , जो लीलावती की जन्मकुंडली में लिखा था, विवाह के एक वर्ष के अंदर ही उसके पति की मृत्यु हो गयी।
लीलावती को अपने पिताजी के ज्ञान पर और ज्योतिष पर विश्वास होना ही था। वह पिता के साथ ही गणित और ज्योतिष के अध्ययन में जुट गयी। लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही "सिद्धान्त शिरोमणि" नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया , जिसके चार भाग हैं (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय।
‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है। यहां तक कि आजकल हम कहते हैं कि न्यूटन ने ही सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण की खोज की, परन्तु उसके 550 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को विस्तार में समझा दिया था।
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एक आलेख में ये कमेंट
Role of religion in indian society
पता नही क्यूं , अंधविश्वासी स्वभाव नहीं होने के बावजूद प्राचीन परंपराएं मुझे बुरी नहीं लगती , धर्म मुझे बुरा नहीं लगता । क्यूंकि मैं मानती हूं कि विदेशी आक्रमणों के दौरान हमारी सभ्यता और संस्कृति का जितना विनाश हुआ , उससे कहीं कम इस स्वतंत्र भारत में धर्म के क्षेत्र में घुसकर कमाने खाने वाले चोर डाकुओं ने नहीं किया। इस कारण धर्म का जो भी रूप हमारे सामने है , हम जैसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवालों को पच ही नहीं सकता। पर धर्म तो धारण करने योग्य व्यवहार होता है , उससे हम कब तक दूर रह सकते हैं , आज हमें धर्म के पालन के लिए नए नियम बनाने की आवश्यकता है। आज हर क्षेत्र में झूठ और अन्याय का बोलबाला है , क्या हम हर क्षेत्र को ही समाप्त कर सकते हैं ? सबमें सुधार की आवश्यकता है , पर बस हम सिर्फ दोषारोपण करते रहें , तो बात सुधरनेवाली नहीं। यही कारण है कि जब भी मैं धर्म विरोधियों के आलेख देखती हूं , मैं उसमें कमेंट दिए बिना नहीं रह पाती , दो दिन पूर्व भी धर्म और ईश्वर के विरोध में लिखे गए एक आलेख में मैने ये कमेंट कर दिया है .............
ईश्वर को किसी ने देखा नहीं .. इसलिए इसे मानने की जबरदस्ती किसी पर नहीं की जा सकती .. पर हजारो हजार वर्षों से बिना संविधान के .. बिना सरकार के यदि यह समाज व्यवस्थित ढंग से चल रहा है .. तो वह धर्म के सहारे से ही .. यदि भाग्य, भगवान और स्वर्ग नरक का भय या लालच न होता .. तो समर्थों के द्वारा असमर्थों को कब का समाप्त कर दिया जाता .. शरीर और दिल दोनो से कमजोर नारियों की रक्षा अभी तक धर्म के कारण ही हो सकी है .. बुद्धि , बल और व्यवसायिक योग्यता में से कुछ भी न रखनेवालों को भी रोजगार के उपाय निकालकर उनके रोजी रोटी की व्यवस्था भी धर्म के द्वारा ही की गयी थी .. गृहस्थों को इतने कर्मकांडों में उलझाया जाता रहा कि दीन हीनों को कभी रोजगार की कमी न हो .. दूनिया के हर धर्म में समय समय पर साफ सफाई की आवश्यकता रहती थी .. पर इसका परिशोधन न कर हम अपनी परंपराओं को , अपने धर्म को गलत मानते रहे .. तो आनेवाले युग में भयंकर मार काट मचेगी .. आज ही पैसे कमाने के लिए कोई भी रास्ता अख्तियार करना हमें गलत नहीं लगता .. क्यूंकि किसी को भगवान का भय नहीं रह गया है .. जो बहुत बडे वैज्ञानिक हैं .. क्या उनके वश में सबकुछ है .. वे भगवान को माने न माने पकृति के नियमों को मानना ही होगा .. और मैं दावे से कहती हूं कि इस प्रकृति में कुछ भी संयोग या दुर्योग नहीं होता है .. हमारे एक एक काम का लेखा जोखा है प्रकृति के पास .. और जब हर व्यक्ति इस बात को समझ जाएंगे .. ये दुनिया स्वर्ग हो जाएगी .. मेरा दावा है !!
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कन्या भ्रूण की हत्या की गलत परंपरा
ज्योतिष जैसे विषय से मेरे संबंधित होने के कारण मेरे समक्ष परेशान लोगों की भीड लगनी ही है। तब मुझे महसूस होता है कि इस दुनिया में समस्याओं की कमी नहीं , सारे लोग किसी न किसी प्रकार के दुख से परेशान हैं। इसमें वैसे अभिभावकों की संख्या भी कम नहीं , जो अपने पुत्र या पुत्रियों के विवाह के लिए कई कई वर्षों से परेशान हैं। प्रतिवर्ष मेरे पास आनेवाले परेशान अभिभावकों को मदद करने के क्रम में एक दो विवाह मेरे द्वारा भी हो जाया करते हैं। पर इधर कुछ वर्षों से मैं महसूस कर रही हूं कि हमारे पास आनेवाले परेशान अभिभावकों में बेटियों के माता पिता कम हैं और बेटों के अधिक। इससे स्पष्ट है कि वर की तुलना में विवाह के लिए वधूओं की संख्या कम है।
कन्या भ्रूण हत्या के फलस्वरूप भविष्य में इस प्रकार की स्थिति के बनने की आशंका तो सबों को है , पर इसके इतनी जल्दी उपस्थित हो जाने से मुझे बडी चिंता हो रही है। आज विवाह के लिए जो भी वर और कन्या तैयार दिख रहे हैं , उनका जन्म 1975 से 1985 के मध्य का माना जा सकता है। उस समय शायद भ्रूण हत्या को तो कानूनी मान्यता मिल गयी थी , पर इतनी जल्दी गर्भ में लिंग परीक्षण होने की विधि विकसित नहीं हुई थी कि परीक्षण करने के बाद उसकी हत्या की जा सके। उस वक्त भ्रूण हत्या के द्वारा अनचाही संतान को ही दुनिया में आने से रोका जाता था। पर इससे भी लिंग असंतुलन हो ही गया , वो इस कारण कि जिस दंपत्ति के दो या तीन बेटे हो गए , उन्होने तीसरे या चौथे संतान को ही आने से रोक दिया , जबकि जिस दंपत्ति की दो या तीन बेटियां थी , उन्होने लडके को जन्म देने के लिए चौथे या पांचवे संतान का भी इंतजार किया। इससे कन्याओं की संख्या मामूली घटी और इसका ही प्रभाव हम आज पा रहे हैं ।
तीसरी संतान न होने देना कोई गुनाह नहीं था , पर जब इसका इतनी छोटी सी बात का इतना भयावह प्रभाव सामने नजर आ रहा है , तो मात्र 15 वर्षों के बाद समाज में लिंग परीक्षण कर कन्या भ्रूण की हत्या की जो गलत परंपरा शुरू हुई है , उसका असर भी मात्र 15 वर्षों में क्या होगा , ये चिंता करने वाली बात है। पर अभी तक समाज को कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा , अभी भी निरंतर कन्याओं की भ्रूण हत्या हो रही है और बालिकाओं की संख्या में कमी होती जा रही है। सारे अस्पताल तो सेवा के अपने धर्म को भूलकर पैसे कमाने की एक बडी कंपनी बन चुके हैं। स्वयंसेवी संस्थाएं बेकार रह गयी है। सरकारी कार्यक्रम फाइलों की शोभा बढा रहे हैं। यदि कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में कडे कानून भी बनें तो भी कोई उपाय नहीं दिखता है। आवश्यकता है लोगों में स्वयं की जागरूकता के आने की। तभी आनेवाले दिनों में कन्या की संख्या को बढाया जा सकता है , अन्यथा बहुत ही भयावह स्थिति के उपस्थित होने की आशंका दिख रही है, और जब ये समय आएगा , हमारे सम्मुख कोई उपाय नहीं होगा
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
सीट सुरक्षित रखने की कोशिश
मनुष्य के शारीरिक मानसिक विकास की चर्चा करने के क्रम में एक 'टीन एजर' बात अवश्य आ जाती है। यह शब्द 13 से 19 वर्ष तक के किशोरों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। शारीरिक विकास के मामले में यह उम्र तो विशेष है ही , मानसिक संतुलन बनाए रखने में भी इस उम्र की बडी भूमिका होती है। इसी उम्र में जब कोई बच्चे सा काम करे , तो तुरंत फटकार मिलती है कि वे अब बच्चे नहीं रहे और जब बडे जैसा व्यवहार करते करने जा रहे होते , उन्हें टोका जाता है कि वे अभी बच्चे हैं।यदि अभिभावक समझदार हों और उनके साथ उनका दोस्ताना व्यवहार हो , तो भी इस समय बच्चों का व्यवहार सचमुच अजीब सा हो जाता है। कभी कभी तो अपनी पढाई लिखाई सबकुछ भूलकर वे ऐसी संगति में आ जाते हैं , बुरी आदतें अपना लेते हैं कि बच्चों को देखकर भी ताज्जुब हो सकता है।
एक मनोचिकित्सक उम्र के इस दौर को किसी भी प्रभाव से जोड सकता है। पर सिर्फ शारीरिक और मानसिक परिवर्तन की दौर से गुजरने के कारण ही किशोरों का16 से 20 वर्ष की उम्र तक यह व्यवहार अपनी चरम सीमा पर नहीं होता , हमारा अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि इस वक्त शनि के खास ज्योतिषीय प्रभाव के कारण जातक के समक्ष एक अलग प्रकार की परिस्थिति उपस्थित होती है। यदि आप अपनी जन्मतिथि में 16 और 20 वर्ष जोड दें , तो बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे , जो ऐसा नहीं पाएंगे कि कोई गल्ती न करने के बावजूद इन चार वर्षों के मध्य का कोई ढाई वर्ष खासकर 17 वां , 18 वां या 19 वां वर्ष आपने किसी खास तरह की गडबड परिस्थिति में गुजारे हैं। लगातार किसी परीक्षा में मन मुताबिक परिणाम न आना , शारीरिक अस्वस्थता का बने रहना या पिता या माता से किसी विचारों का विरोध जैसी कुछ बातों के निरंतर बने रहने के कारण अधिकांश जगहों पर शनि के प्रभाव की पुष्टि इस तरह हो जाएगी।
जो बच्चे पढाई लिखाई के क्षेत्र में नहीं हैं , उनसे कोई बडा अपराध इन्हीं दिनों में हो जाता है , जिसके कारण उनका पूरा जीवन बेकार हो जाता है। इसके अलावे आज के बच्चों और अभिभावकों की पढाई लिखाई के प्रति मानसिकता के कारण विद्यार्थियों के लिए यह उम्र तो और भी कष्टकर हो गया है। इसी उम्र के दौरान के कोई तीन वर्ष दसवीं , ग्यारहवी और बारहवीं की पढाई के साथ ही साथ किसी अच्छे कॉलेज में नामांकण कराने के भी होते हैं , इसलिए उनका दबाब भी बहुत अधिक होता है। वैसे तो हर कॉलेज में सीट कम होने के कारण किशोरों के समक्ष मनोनुकूल परिणाम की संभावना कम ही रहती है और अधिकांश को समझौता करते हुए ही अपनी पढाई को आगे ले जाना होता है। पर इस दौरान कुछ छात्र ऐसे होते हैं , जिनको बहुत बडा समझौता करना पडता है। हमेशा से अच्छे अच्छे स्कूलों और विभिन्न कोचिंग सेंटरों में टॉपर रहे किशोरों को अपनी आशा के विपरीत छोटे छोटे कॉलेजों मे दाखिला लेने को विवश होना पडता है।
व्यवहारिक कारण से ऐसा क्यूं होता है , इसे मैं परिभाषित नहीं कर सकती। लाखों की संख्या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों में से किस अव्यवस्था के कारण ऐसे परिणाम आ जाते हैं , प्रतियोगिता की परीक्षाओं में पारदर्शिता न होने के कारण कह पाना मुश्किल है ।अब पहले वाली बात तो रही नहीं ,पिछले वर्ष छत्तीसगढ के मेडिकल इंटरेंस की परीक्षा में टॉप करने वाले विद्यार्थी ने परीक्षा ही नहीं दी थी , पिछले वर्ष ही होहल्ले के कारण झारखंड इंजीनियरिंग की परीक्षा का परिणाम भी दुबारा निकालना पडा, इन सब बातों को देखते हुए कुछ प्रतिशत खामियों से इंकार नहीं किया जा सकता। सामान्य बच्चे थोडी कमी बेशी के साथ आगे बढ भी जाएं , पर बहुत ही परेशान हालत में अधिकांश प्रतिभा संपन्न किशोरों को ही दंश झेलते हुए मैने अपने पास आते देखा है।
अभी फिर से सभी कॉलेजों के लिए इंटरेंस की परीक्षाओं के फॉर्म भरे जा रहे हैं। अपने अनुभव के आधार पर मेरा विद्यार्थियों से अनुरोध है कि वे अधिक से अधिक जगहों पर फॉर्म भरे और अपने लिए कोई न कोई सीट सुरक्षित रखने का प्रयास करें। कौन सी परीक्षा देते वक्त आपकी मन:स्थिति कैसी रहेगी और परीक्षा अच्छी हो जाने के बाद भी कौन सा परिणाम कितना अच्छा या बुरा होगा , इसकी कोई गारंटी नहीं होती। यदि आप सामान्य विद्यार्थी हैं , तो आप कुछ निश्चिंत रह भी सकते हैं , पर असाधारण प्रतिभा है आपमें तो आपको और सतर्क रहने की आवश्यकता है। अधिक से अधिक फॉर्म भरें और कहीं भी दाखिला लेकर अपनी पढाई पूरी करें। प्रतिभा किसी का मुहंताज नहीं होती , समय आने पर अपनी प्रतिभा से आप अपनी जगह बना ही लेंगे , समय एक जैसा नहीं होता , आशा है मेरे संकेत को आप समझ चुके होंगे।
रिजल्ट होने के बाद विकल्पों का चुनाव करते वक्त भी किशोरों को बहुत सावधानी रखनी चाहिए , जिसकी जानकारी देते हुए मैं एक पोस्ट परीक्षा परिणामों के बाद लिखूंगी !
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
लोकतंत्र मूर्खों का शासन तो है
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क्या कंप्यूटर और इंटरनेट के जानकार मेरी कुछ मदद कर सकते हैं ??
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नई पीढी
इस पृथ्वी पर मनुष्य का अवतरण भी तो अन्य जीवों की तरह ही हुआ होगा , जहां प्रकृति ने सभी पशु पक्षियों कोसिर्फ अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए आवश्यक दिमाग प्रदान किया है , वहीं मनुष्य को ऐसी विलक्षण मस्तिष्क भेंट की है, जिसके कारण वह प्रकृति में मौजूद सारे रहस्यों को समझने और उनका सहारा लेकर अपने जीवन को सहज बनाने में प्रयासरत रहा। एक एक पशु पक्षी के कमजोरियों का पता कर उन्हें वश में करने और उनकी मजबूती से अपने जीवन को मजबूत बनाने का क्रम निरंतर चलता रहा। हजारों वर्षों के नियमित अध्ययन और मनन का परिणाम है हमारी ये जीवन शैली , जिसपर आज हम नाज करते हैं। प्राचीन भारत में कला और विज्ञान तथा गणित के हर क्षेत्र का इतना विकास हमारे पूर्वजों की महत्वाकांक्षाओं का ही परिणाम है ।
अन्य जीव जंतुओं की तरह ही आदिम मानव रहे हमारे पूर्वजों का क्रमश: सभ्य होते हुए इतने संगठित होकर जीवन यापन करने को देखते हुए एक बात तो साबित होती है कि मनुष्य स्वभावत: बहुत ही महत्वाकांक्षी होता है। वह अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं रहना चाहता और अपने को , अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए प्रयास जारी रखता है। वैसे अलग अलग व्यक्ति उम्र के अलग अलग भाग में और जीवन के अलग अलग पक्ष को लेकर महत्वाकांक्षी होते हैं। व्यक्ति के महत्वाकांक्षा के जन्म लेने के पीछे भी कोई बडी वजह होती है। यदि सबकुछ कमजोर होते हुए भी सामान्य ढंग से चलता रहे , तो व्यक्ति महत्वाकांक्षी नहीं बन पाते हैं , पर किसी भी क्षेत्र में असामान्य परिस्थितियों के उपस्थित होने से जीवन बुरे ढंग से प्रभावित होता है , तो व्यक्ति उस संदर्भ में महत्वाकांक्षी बन जाता है। व्यक्ति उस खामी को समाप्त कर सबके जीवन को आसान बनाने की कोशिश में जुट जाता है।
इस प्रकार आजतक महत्वाकांक्षी व्यक्ति समाज के लिए वरदान बनकर सामने आते रहे हैं , पर आज अन्य शब्दों के साथ ही साथ महत्वाकांक्षा की भी परिभाषा बदल गयी है। आज का महत्वाकांक्षी व्यक्ति बहुत स्वार्थी होता जा रहा है , जो समाज के लिए घातक है। प्राचीन काल में प्रकृति के असीमित संसाधनों की रक्षा करते हुए और अतिरिक्त सामग्रियों का प्रयोग करते हुए , सभी जीव जंतुओं की रक्षा करते हुए और उसके गुणों से फायदा उठाते हुए और संपूर्ण मानव जाति के कल्याण की कामना से महत्वाकांक्षी व्यक्ति कार्यक्रम बनाते थे। हालांकि मध्ययुग में विदेशियों के आक्रमण के फलस्वरूप उनके शासन काल के दौरान हमारा संपूर्ण ज्ञान , हमारी संपूर्ण व्यवस्था छिन्न भिन्न हो गयी , पर आजादी के समय महत्वाकांक्षी व्यक्तियों ने पुन: अपने स्वार्थों का त्याग कर , जीवन हथेली पर रखते हुए , मौत को आगोश में लेते हुए देश को आजादी दिलाने में बडी भूमिका निभायी।
संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि हमारी महत्वाकांक्षा ऐसी होनी चाहिए , जिससे प्रकृति की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए , इसके सारे जीव जंतुओं का कल्याण करते हुए मनुष्य के जीवन को अधिक से अधिक सुख सुविधा संपन्न बनाए , महत्वाकांक्षा ऐसी कभी नहीं होनी चाहिए , जो प्रकृति को तहस नहस करते हुए , सारे जीव जंतुओं का विनाश करते हुए अपनी मानव जाति के हित तक की चिंता न करते हुए सिर्फ अपने जीवन को अधिक सुख सुविधा संपन्न बनाएं । पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज महत्वाकांक्षा का यही रूप देखने को मिल रहा है , पढाई भी इसी की हो रही है , करोडों लोगों की जेब से एक एक सिक्के निकालकर अपने लिए एक करोड बना लेने की शिक्षा तक आज नई पीढी को दी जा रही है , जबकि उन्हें यह शिक्षा दिए जाने की आवश्यकता है कि कि वे करोडों के जेब में एक एक सिक्के डालते हुए अपने लिए करोड की व्यवस्था भी कर सकें।
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पूरे एक महीने मिला मुझे अपने गुरू का सान्निध्य
भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही पिता का विशेष महत्व है। वाल्मीकि(रामायण, अयोध्या काण्ड) में कहा गया है ...
न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिपा॥
(यानि पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।)
दूसरी ओर यहां गुरू की महिमा भी कम नहीं आंकी गयी है ...
गुरू गोविन्द दोऊ खडे काके लागूं पायं।
बलिहारी गुरू आपनो गोविंद दियों बताए।।
यानि गुरू के पद को ईश्वर के बराबर महत्व दिया गया है।
जब पिता और गुरू दोनों का अलग अलग इतना महत्व हो , उनकी तुलना बडे बडे धर्म और ईश्वर से की जाती हो और जब पिता ही किसी के गुरू बन जाएं, तो उसका स्थान स्वयमेव सबसे ऊंचा हो जाता है। इस दृष्टि से मेरे पिता श्री विद्या सागर महथा जी मेरे लिए ईश्वर से कम नहीं। मेरा रोम रोम उनका ऋणी माना जा सकता है, पर समाज की ऐसी व्यवस्था में मात्र पुत्री होने के कारण मैं इस कर्ज को किसी तरह नहीं उतार सकती। इसके अतिरिक्त ज्योतिष के क्षेत्र में किए गए उनके अध्ययन के कारण उनके चरित्र के सैकडों पहलुओं में से किसी एक का भी चित्रण ब्लॉग जगत में मौजूद बहुतों को नहीं पच पाएगा और मैं इस पवित्र पोस्ट को विवादास्पद नहीं बनाना चाहती।
इसलिए चाहते हुए भी एक शिष्य के रूप में उनकी प्रतिभा, उनके संयमित जीवन, उनके सीख और उनके ज्ञान की चर्चा यहां नहीं करना चाहूंगी। समय आने पर सबके गुण अवगुण सामने आ ही जाते हैं। पर इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि छह माह की उम्र में हुए चेचक से इनका स्वास्थ्य इतना बुरा हो गया था , इनके शरीर को इतना कष्ट था कि इनकी मुक्ति के लिए मेरी दादी जी इन्हें खुशी से बारंबार देवी मां को सौंपती थी कि वे इसे ले जाएं। पर देवी मां ने दादी जी की बात न मानकर हमारा बडा कल्याण किया, क्यूंकि इन्होने प्रकृति के एक बडे रहस्य को उजागर किया है , जिसे मैं 2011 के शुरूआत में दुनिया के सामने रखूंगी।
पूरे एक महीने के झारखंड प्रवास के बाद पिताजी वापस कल लौट गए , इस दौरान अधिकांश समय उन्होने बोकारो में ही व्यतीत किया , कहीं भी जाते , दो चार दिनों में पुन: मेरे यहां वापस हो जाते। विवाह के बाद मायके जाने पर ही कभी मुझे इतने दिनों तक साथ रहने का मौका मिला हो , पर इस बार मेरे घर पर उन्होने इतना समय दिया , वो मेरे जीवन में पहली बार हुआ। अपनी छह संतान में जितना स्नेह उन्होने मुझे दिया है , शायद ही किसी को मिला हो। मुझे तो यह देखकर ताज्जुब होता है कि सांसारिक सफलता की ओर कम ध्यान रहने के बावजूद बचपन से अभी तक की मेरी एक एक बात उन्हें याद रहती है।
सात महीने की उम्र में पेट के बल चलती हुई साफ सुथरे घर में एक सरसों के दाने पर मेरी न सिर्फ दृष्टि ही गयी थी , उसे मैंने अपनी उंगलियों से पकड भी लिया था। डेढ वर्ष की उम्र में पलंग से अपने पैरों को नीचे कर तुतलाते हुए 'दिल' 'दिल' कहकर स्वयं के गिर जाने की उन्हें धमकी दिया करती थी। तीन वर्ष की उम्र में मैने हिंदी अक्षरों को पहचानना शुरू कर दिया था और 'फ' 'ल' 'फल' , 'च' 'ल' 'चल' पढना शुरू कर दिया था।
चार वर्ष की उम्र में न सिर्फ 'ताली ताली तू तू तलती , दो हल डाली डाली फिरती' जैसी तुतलाती जुबान से 'कोयल रानी' की पूरी कविता सुनाया करती थी , वरन् 'छोटी चिडियां' नाम की कहानी को कंठस्थ कर लिया था और एक एक अर्द्धविराम , पूर्ण विराम पर जरूरत के अनुसार ठहराव के साथ लोगों को सुनाया करती थी। एक मां के लिए ये सब यादें स्वाभाविक है , पर पहली बार अपने पिता को मैने अपने जीवन की इतनी बातें याद रखते देखा है। मेरे मानसिक विकास पर कितनी पैनी निगाह थी उनकी ?
अध्यापन के अतिरिक्त भी मेरे पीछे उन्होने जितनी मेहनत की , अन्य भाई बहनों पर कभी उतना ध्यान नहीं दिया। अपने मामाजी के यहां से ग्रेज्युएशन करने के बाद मुझे बी एड कर लेने की सलाह दी गयी , पर मैने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की पढाई करने का फैसला किया। मेरे परिवार में पहले किसी बहन ने गांव के स्कूल से मैट्रिक करने से अधिक पढाई नहीं की थी। पहली बार मेरे दादा जी और दादी जी मुझे हॉस्टल में डालने को तैयार नहीं थे।
सो मैने एडमिशन लेकर घर में ही एम ए की पढाई करने का निश्चय किया। घर में ही दो वर्षों तक तैयारी की और फार्म भी भर लिया। एक एक पेपर की परीक्षा हर पांचवें दिन होनी थी। प्रत्येक परीक्षा से एक दिन पहले दोपहर के बाद वे मेरे साथ रांची के लिए निकलते , रातभर वहां कहीं ठहरते , सुबह परीक्षा देने के बाद अपने गांव वापस लौटते। यहां तक कि मैं चार घंटे परीक्षा भवन में होती , तो शहर में कई रिश्तेदार होने के बाद भी वे कहीं न जाते। उतनी देर भी वे गेट के बाहर ही टहलते रहते , इस भय से कि कहीं लडकों ने वॉक आउट किया तो ये कहां जाएगी। अन्य भाई बहनों पर इतना ध्यान देते मैने उन्हें कभी नहीं देखा।
अध्ययन मनन में विश्वास रखने वाले पिता जी का पद या अर्थोपार्जन के लिए पढाई लिखाई करने पर विश्वास नहीं था और यही कारण है कि सिर्फ अध्ययन मनन नहीं , वरन् मौलिक चिंतन में मेरे लगे होने से वे अपनी परंपरा को जीवित देखकर मुझसे खुश बने रहें। वैसे तो ज्ञान का खजाना ही है उनके पास , जब भी मिलना होता है , उनकी उपस्थिति में सिर्फ कुछ न कुछ जानने और सीखने में ही मेरा ध्यान लगा होता है।
वे एक बेहतर दुनिया का स्वप्न देखते हैं , पर सैद्धांतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद अत्यधिक भावुकता होने तथा व्यवहारिकता की कमी से अपने सपने को पूरा नहीं कर पाते। वे मुझमें बडी उम्मीद देखते हैं , शायद मैं उनका सपना पूरा कर सकूं। 70 वर्ष की उम्र पार कर चुके पापा जी अभी पूर्ण रूप से स्वस्थ है और अभी भी दिन रात चिंतन में लगे हैं। मैं उनके स्वस्थ और दीर्घजीवी होने की कामना करती हूं !
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विज्ञान और ज्योतिष में दिलचस्पी
भिन्न भिन्न वर्षों में भी किसी खास तिथि को जन्मलेने वालों की कुंडली में सूर्य की स्थिति बिल्कुल उसी स्थान पर होती है। इस एकमात्र सूर्य की स्थिति को ध्यान में रखते हुए ग्रंथों में जातक के फलाफल के बारे में बहुत कुछ लिखा मिलता है , जिसकी चर्चा ज्योतिषी बहुत दावे से किया करते हैं। इस आधार पर , चाहे वो ज्योतिषी हो या न्यूमरोलोजिस्ट और वे जिस भी विधा से भविष्यवाणी किया करते हों , यह पोस्ट उनकी विधा को विवादास्पद अवश्य बना रही है , जिसमें अलग अलग वर्षों में ही सही ,अरविंद मिश्रा जी के और मेरे एक ही दिन जन्म लेने की सूचना सारे ब्लॉग जगत को दी गयी है। पाठकों की जिज्ञासा स्वाभाविक है कि एक ही दिन विज्ञान और ज्योतिष जैसे विरोधाभासी विषय में जुनून से हद तक की दिलचस्पी रखने वाले यानि भिन्न भिन्न स्वभाव के दो लोग कैसे जन्म ले सकते हैं ?
मनुष्य मूलत: बहुत ही स्वार्थी होता है और किसी ऐसी व्यवस्था को पसंद नहीं करता , जिससे उसे अधिक समझौता करना पडे। इस कारण वह अपने जैसे स्वभाव के लोगों से मित्रता , संबंध और रिश्ते रखना चाहता है। कभी कभी वह इतना समर्थ होता है या उसके संयोग इतना काम करते हैं कि वह ऐसा करने में सफल हो जाता है , पर यदि शत प्रतिशत मामलों में यही प्रवृत्ति रहे , तो कुछ ही दिनों में विचारों के आधार पर ही तरह तरह के गुट बनेंगे , पारस्परिक मित्रता से लेकर , विवाह शादी तक अपने ही गुटों में होंगी और उसमें आनेवाली अगली पीढी भी उन्हीं विचारों को पसंद करेगी।
इस हालत में विचारों से विरोध रखनेवाले बिल्कुल गैर हो जाएंगे और अधिक शक्तिमान की मनमानी चलेगी। पर प्रकृति हमेशा एक औसत व्यवस्था में सबों को ले जाने की प्रवृत्ति रखती है , ताकि हर प्रकार के लोगों का एक दूसरों के विचारों से जोर शोर से टकराव हो और परिणामत: एक समन्वयवादी विचारधारा का जन्म हो, जिसके बल पर आगे का युग और प्रगतिशील बन सके। एक ही दिन में दो भिन्न विचारों वाले व्यक्ति का जन्म प्रकृति की ऐसी ही व्यवस्था में से एक हो सकती है।
यदि एक ज्योतिषी की हैसियत से इस प्रश्न का जबाब दिया जाए तो यह बात कही जा सकती है कि विभिन्न कुंडलियों में सूर्य अलग अलग भाव का स्वामी होता है , इस कारण अलग अलग लग्न के अनुसार जातक पर सूर्य के प्रभाव का संदर्भ बदल जाता है , इस कारण आवश्यक नहीं कि दोनो का सूर्य एक हो तो दोनो के अध्ययन का विषय भी एक ही हो। सूर्य किसी के अध्ययन को प्रभावित कर सकता है , तो किसी के पद प्रतिष्ठा के माहौल को और किसी के घर गृहस्थी को।
इसलिए इसके एक जैसे फल नहीं दिखाई पड सकते हैं। यदि ऐसा भी मान लिया जाए कि एक ही तिथि को जन्म लेनेवाले दो व्यक्ति एक ही लग्न के हों और सूर्य का प्रभाव दोनो के अध्ययन के विषय पर ही पडता हो , तो यह आवश्यक है कि दोनो में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऐसी रूचियां रहेंगी। ऐसी स्थिति में एक के विज्ञान के विषयों और एक के ज्योतिष पढने की संभावना तभी बन सकती है , जब ज्योतिष को भी विज्ञान का ही एक विषय मान लिया जाए।
पर अभी ज्योतिष को विज्ञान मानने में बडी बडी बाधाएं हैं । और इस कारण पाठकों के मन में यह भ्रांति है कि ज्योतिष को पढनेवाले अंधविश्वासी ही हैं , तभी मन में ऐसे प्रश्न जन्म लेते हैं। भले ही ज्योतिष इस स्थिति में नहीं पहुंच सका है कि इसे पूर्ण विज्ञान मान लिया जाए , पर वैज्ञानिक रूचि रखनेवाले जातक भी इसमें हमेशा से रहे हैं। इसमें से अंधविश्वासों को ढूंढ ढूंढकर अलग करने और इसके वैज्ञानिक पक्ष को इकट्ठे करने का काम करते जाया जाए , तो ज्योतिष को विज्ञान में बदलते देर नहीं लगेगी।
पापा जी के 40 वर्षों के नियमित रिसर्च के बाद मैं भी इसी दिशा में प्रयासरत हूं और बहुत जल्द समाज के समक्ष ज्योतिष को विज्ञान के रूप में मान्यता दिलवाना मेरा लक्ष्य हैं। अरविंद मिश्रा जी ने नियंता के इस संकेत को स्वीकार कर लिया है कि विज्ञान और ज्योतिष का सहिष्णु साहचर्य रहे , आप सभी भी स्वीकार करेंगे , ऐसा मुझे विश्वास है।
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
सुख का अहसास
आज सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों में अच्छी पढाई न होने से समाज के मध्यम वर्ग की जीवनशैली पर बहुत ही बुरा असर पड रहा है। चार वर्ष के अपने बच्चे का नामांकण किसी अच्छे विद्यालय में लिखाने के लिए हम परेशान रहते हैं , क्यूंकि उसके बाद 12 वीं तक की उसकी पढाई का सारा तनाव समाप्त हो जाता है। यदि उस बच्चे का उस विद्यालय के के जी या नर्सरी में नाम नहीं लिखा सका तो बाद में उस विद्यालय में नाम लिखाना मुश्किल है। जिनकी सिर्फ खेलने कूदने की उम्र होती है , उनका कई कई कि मी दूर के उस विद्यालय में नामांकण से अभिभावक भले ही निश्चिंत हो जाते हों , पर उस दिन से बच्चों का बचपन ही समाप्त हो जाता है।
विद्यालय के अंदर पढाई का वातावरण अच्छा भी हो , पर वहां आने और जाने में बच्चों को जो व्यर्थ का समय लगता है , उससे उनके खाने पीने पर अच्छा खासा असर पडता है। यहीं से उसके शारिरीक तौर पर कमजोरी की शुरूआत हो जाती है। देश में सबसे पहले ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि पांचवी कक्षा तक की पढाई के लिए हर बच्चे के अपने मुहल्ले में ही व्यवस्था हो और पांचवीं के बाद ही मुहल्ले के बाहर जाना पडे । दस वर्ष तक के बच्चों को मामूली पढाई के लिए इतनी दूर भेजा जाना क्या उचित है ?
बारहवीं के बाद बच्चे कॉलेज की पढाई के लिए परिवार से कितने दूर चले जाएंगे , वे खुद भी नहीं जानते। देश में हर क्षेत्र और हर विषय में कॉलेजों का रैंकिंग हैं। प्रतिभा के अनुसार बच्चों के नामांकण होते हैं । अच्छे कॉलेजों से पढाई करने के बाद बच्चों का कैरियर अपेक्षाकृत अधिक उज्जवल दिखता है , इसलिए उसमें पढाने के लिए बच्चे मां बाप से दूर देश के किसी कोने में चले जाते हैं। कम प्रतिभावाले बच्चे को भी जुगाड लगाकर या ऊंची फी के साथ दूर दराज के कॉलेजों में नामांकण करा दिया जाता है।
हम सभी जानते हैं कि किशोरावस्था और युवावस्था के मध्य के इस समयांतराल में बच्चों को परिवार या सच्चे गुरू के साथ की आवश्यकता होती है , पर ऐसे समय में अकेलापन कभी कभी उन्हें गुमराह कर देता है और जीवनभर उन्हें भटकने से नहीं बचा पाता। वास्तव में सरकार की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि हर जिले में हर क्षेत्र और हर विषय के हर स्तर के कॉलेज हों और प्रतिभा के अनुसार उनका अपने जिले के कॉलेजों में ही नाम लिखा जाए , ताकि वे सप्ताहांत या माहांत में परिवार से मिलकर अपने सुख दुख शेयर कर सकें। पर ऐसा नहीं होने से क्या हमारे किशोरों को भटकने को बाध्य नहीं किया जा रहा ?
हमारी पूरी कॉलोनी में 60 प्रतिशत किराएदार परिवार ऐसे होंगे , जिनके पति नौकरी में तीन तीन वर्षों में स्थानांतरण का दर्द खुद झेलते हुए अपने पढाई लिखाई कर रहे बच्चों को कोई तकलीफ नहीं देना चाहते और बोकारो के अच्छे विद्यालय में अपने बच्चों का नामांकण करवाकर पत्नी को बच्चों की देखभाल के लिए साथ छोड देते हैं। झारखंड में रांची और जमशेदपुर में भी बहुत मांएं बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढाने के लिए अकेले रहने को विवश हैं। जबतक बच्चे बारहवीं से नहीं निकलते , पूरा परिवार पर्व त्यौहारों में भी मुश्किल से साथ रह पाता है।
अनियमित रूटीन से पति के स्वास्थ्य पर असर पडता है , पति की अनुपस्थिति में पत्नी पर पडी जिम्मेदारी भी कम नहीं होती । घर में पापा के न होने से बच्चें की उच्छृंखलता भी बढती है। वास्तव में सरकार की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि अपने कर्मचारियों का जहां स्थानांतरण करवाए , वहां उसके बच्चों के लिए पढाई की सुविधा हो। इसके अभाव में क्या कोई परिवार सही जीवन जी पा रहा है ?
परिवार का एक एक सदस्य बिखरा रहे , हर उम्र के हर व्यक्ति कष्ट में हों तो हमारी समझ में यह नहीं आता कि हम सुखी कैसे हैं ? क्या सिर्फ टी वी , फ्रिज , वाशिंग मशीन , कार , ए सी ही सुख का अहसास करा सकते हैं ?
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
अपने जन्मदिन पर कुछ शब्द
अपने जन्मदिन पर कुछ शब्द
चाहे सुखभरी हों या दुखभरी , बचपन की यादें कभी हमारा पीछा नहीं छोडती। खासकर जब भी कोई विशेष मौका आता है , पुरानी यादें अवश्य ताजी हो जाती हैं। जिस संयुक्त परिवार में मेरा जन्म हुआ, उसमें उस समय दादा जी , दादी जी के अलावे उनके पांच बेटों के साथ साथ दो बेटों का परिवार भी था, दो चाचाजी उस समय अविवाहित ही थे। पर मेरे बडे होने तक दो और के विवाह हो गए थे और कुछ नौकरों चाकरों को लेकर 35 लोगों का परिवार था। पांच बेटे में इकलौती प्यारी बिटिया से दूर होना दादा जी और दादी जी के लिए बहुत कठिन था , सो उनका विवाह भी गांव में ही किया गया था। पर्व, त्यौहार या जन्मदिन वगैरह किसी कार्यक्रम में अपने पांच बच्चों सहित बुआ और फूफा जी की उपस्थिति हमारे यहां अनिवार्य थी , जिसके कारण बिना किसी को निमंत्रित किए हमलोगों की संख्या 45 तक पहुंच जाती थी।
हमारे घर में हिन्दी पत्रक से ही बच्चे-बडे सबका जन्मदिन मनाया जाता था। उस समय केक काटने की तो कोई प्रथा ही नहीं थी, नए कपडे भी नहीं बनते थे। सिर्फ खीर पूडी या अन्य कोई पकवान बनता , भगवान जी को भोग लगाया जाता और सारे लोग मिलजुलकर खुशी खुशी खाते पीते। हर महीने में दो तीन लोगों के जन्मदिन तो निकलने ही थे। कम से कम 3-4 किलो चावल के खीर के लिए 15 किलो से अधिक ही दूध की व्यवस्था होती , पीत्तल की एक खास बडी सी कडाही को निकाला जाता , खीर बनते ही दादी जी 40 से अधिक कटोरे में उसे ठंडा होने को रखती , फिर उसमें से एक कटोरे के खीर का बच्चे द्वारा भगवान जी को भोग लगाया जाता। कई अन्य व्यंजन बनते , उसके बाद खाना पीना शुरू किया जाता।
पर 1963 के दिसंबर में एक बडी समस्या उपस्थित हो गयी थी। 27 नवम्बर 1954 को पौष शुक्ल पक्ष की द्वितीया को जन्म लेनेवाले छोटे चाचा जी का जन्मदिन मनाने के लिए तिथि निश्चित करने की समस्या खडी हो गयी थी। ऐसा इसलिए क्यूंकि उस वर्ष के पंचांग में 15 दिनों का मार्गशीर्ष और पंद्रह दिनों का पौष ही था। आखिरकार 18 दिसम्बर को पौष महीने की शुक्ल पक्ष की तिथि को देखते हुए उनका जन्मदिन मनाने का निश्चय किया गया। रात 11 बजे तक घर में उत्सवी वातावरण में व्यस्त रही मम्मी की 11 बजे के बाद तबियत खराब हो गयी और वे 19 दिसंबर की सुबह मेरे जन्म के बाद ही सामान्य हो सकी। इस तरह हिन्दी पंचांग के अनुसार मेरा जन्म ऐसे पौष महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि में हुआ है , जो एक ही पक्ष का यानि 15 दिनों का ही था। सौरवर्ष के साथ चंद्र वर्ष का तालमेल करने के क्रम में बहुत वर्षों बाद ही पंचांग में इस तरह का समायोजन किया जाता है।
यूं तो परिवार में हर महीने कई जन्मदिन मनाए जाते थे , पर ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि एक जन्मदिन के दूसरे ही दिन दूसरा जन्मदिन हो , जैसा कि दूसरे वर्ष मेरे पहले जन्मदिन में आया,चाचा जी के जन्मदिन के बाद दूसरे ही दिन मेरा। लगातार एक जैसा कार्यक्रम तो निराश करता है , पहले वर्ष तो सबने विधि अनुसार ही किया , पर दूसरे वर्ष से मेरे जन्मदिन में भगवान जी को मिठाई का भोग लगने लगा , मुझे चाचाजी के जन्मदिन का बचा खीर चखाया जाता रहा और अन्य लोगों के लिए अलग पकवान की व्यवस्था की जाने लगी। जब मैं बडी हुई तो मैने अपना जन्मदिन अन्य लोगों से भिन्न तरीके से मनता पाया , तब मुझे सारी बाते बतायी गयी । मुझे मीठा अधिक पसंद भी नहीं , इसलिए कभी भी खीर बनाने की जिद नहीं की और अपेक्षाकृत कम मीठे पुए से ही खुश होती रही।
पर विवाह के बाद आजतक मेरा जन्मदिन अंग्रेजी तिथि के अनुसार ही मनाया जाता रहा। वर्ष 2009 का मेरा यह जन्मदिन इसलिए बहुत ही खास हो गया है , क्यूंकि जहां आज एक ओर दिसम्बर की 19 तारीख है , वहीं दूसरी ओर पौष महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया भी , यानि इस जन्मदिन मे सूर्य के साथ साथ चंद्रमा की स्थिति भी उसी जगह है , जहां मेरे जनम के समय थी। इसके अलावे इस जन्मदिन पर मेरे खुश रहने का एक और भी वजह है कि बहुत दिनों बाद मेरे यहां जन्मदिन पर पापा जी की उपस्थिति का संयोग भी इसी बार बना है। इसलिए बचपन की यादें और ताजी हो गयी हैं। मेरे जन्मदिन में बनाए जानेवाले हमारे क्षेत्र के परंपरागत व्यंजनों में से दो का मजा आप भी लें .....
1. पुआ .. एक कप सुगंधित महीन चावल को आधा भीगने के बाद छानकर एक कप खौलते दूध मे डालकर व खौलाकर आधे घंटे छोड दें। उसके बाद उसे पीसकर उसमें स्वादानुसार शक्कर , कटी हुई गरी , किशमिश , इलायची वगैरह डालकर बिल्कुल गाढे घोल को ही रिफाइंड में तलें , स्वादिष्ट चावल के पुए तैयार मिलेंगे। दूध और शक्कर कुछ कम ही डालें , नहीं तो घोल रिफाइंड में ही रह जाएगा।
2. धुसका .. दो कप चावल और एक कप चने के दाल को अच्छी तरह भीगने दें , फिर उसे पीसते वक्त उसमें थोडी प्याज , हरी मिर्च और अदरक डालें , पुए की अपेक्षा थोडे ढीले घोल में नमक , धनिया तथा जीरा का पाउडर डालकर उसे रिफाइंड में तले , यह नमकीन पुआ हमारे यहां 'धुसका' कहा जाता है , जिसे देशी चने के गरमागरम छोले के साथ खाएं !
दो तीन दिनों से मुझे निरंतर जन्मदिन की बधाई और शुभकामनाएं मिल रही हैं, सबों को बहुत बहुत धन्यवाद। उम्मीद रखती हूं , आप सबो का स्नेह इसी प्रकार बना रहेगा !
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ये रही मेरी 250 वीं पोस्ट
यदि आप अभी मेरी प्रोफाइल खोलकर देखे , तो आपको 'गत्यात्मक ज्योतिष' में कुल 279 पोस्ट दिखाई पडेंगे , पर सही समय या संपादन के अभाव में सारी पोस्टें प्राकशित नहीं की जा सकी है और आज मै इसमें 250वां आलेख ही पोस्ट कर रही हूं। इसलिए मेरे इस ब्लॉग में कुल प्रविष्टियां 250 ही दिखाई पडेंगी। इसके अलावे अन्य जगहों पर लिखी गयी सारी पोस्टों को सम्मिलित कर दिया जाए , तो मेरे आलेखों की संख्या बहुत ऊपर चली जाएगी। वर्डप्रेस के अपने पुराने ब्लॉग पर मैं सौ से ऊपर पोस्ट लिख चुकी हूं, 'फलित ज्योतिष : सच या झूठ' में मैं दो पोस्ट लिख चुकी , साहित्य शिल्पी में पांच कहानियां छप चुकी , नुक्कड में दस पोस्ट कर चुकी , मां पर दो आलेख पोस्ट किए । इसके अलावे मोल तोल डॉट इन पर पिछले नवम्बर से हर सप्ताह एक आलेख पोस्ट कर रही हूं। इस उपलब्धि पर मुझे खुद आश्चर्य हो रहा है।
बचपन से ही पढाई लिखाई और अन्य मामलों में हर बात को गहराई में जाकर देखने की आदत से मैं अनुभव तो रखती थी , पर उन्हें कलम की सहायता से पन्नों में सटीक अभिव्यक्ति दे सकती हूं , इसपर मुझे खुद ही विश्वास नहीं था। यही कारण था कि 1990 के आसपास हमारे कॉलोनी के 'हिन्दी साहित्य परिषद' की 25वीं सालगिरह पर प्रकाशित हो रहे स्मारिका में मुझसे एक रचना मांगी गयी , तो मैं 'ना' तो नहीं कर सकी थी , पर इस फिराक में थी कि पापाजी के ढेरो रचनाओं में से , जो कि यूं ही कबाड की तरह पडी हुई हैं , एक अपने नाम से प्रकाशित कर दूं। पर मुझे इतना समय ही नहीं दिया गया कि मैं उन्हें मंगवा सकती और दबाब में कुछ लिखने बैठ गयी। कुछ दिन पूर्व मेरे पति के हाथ में ज्योतिष की एक पत्रिका , जो वे मेरे लिए ला रहे थे , को देखकर एक व्यक्ति ने उनसे कुछ प्रश्न पूछे थे , उन्हीं का जबाब देने में मैने एक आलेख 'फलित ज्योतिष : सांकेतिक विज्ञान' लिखकर उन्हें सौंप दिया , इस तरह मेरी पहली रचना उसी स्मारिका में छप सकी।
इस तरह मेरी जन्मकुंडली में चौथे भाव में स्थित स्वक्षेत्री बृहस्पति ने दूसरे की लिखी रचना का श्रेय मुझे न देकर मुझे एक पाप से भी बचा लिया था। भले ही मांगे जाने पर मेरे पिताजी अपनी रचना मुझे सहर्ष सौंप देते , पर आज मुझे महसूस होता है कि कोई भी रचनाकार या तो अपने व्यवसाय या फिर मजबूरी के कारण ही रचना का श्रेय किसी और को देता है। माता पिता बच्चों के लिए तन, मन और धन ही नहीं , जीवन भी समर्पित कर देते हैं , ऐसी घटना इतिहास में मिल जाएगी , पर कहीं भी ऐसा पढने को नहीं मिला कि अपनी कृति को किसी ने अपनी संतान के नाम कर दिया। इससे यह भी स्पष्ट है कि किसी की रचना को चुराकर अपने नाम से प्रकाशित करना एक जुर्म ही है , यदि किसी के विचारों का प्रचार प्रसार करना है तो लेखक को सहयोग की जा सकती है , पर कभी भी रचना के मालिक बनने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए।
इस रचना के बाद ही अपने भावों को अभिव्यक्ति देने की मेरी हिम्मत बढ गयी थी। मैने कई ज्योतिषीय पत्रिकाओं , खासकर 'बाबाजी' के लिए लिखना शुरू कर दिया था , पापाजी द्वारा प्रदान किए गए ज्योतिषीय ज्ञान के कारण विषयवस्तु की प्रचुरता से लेखों को तैयार करने में भले ही मुझे कामयाबी मिलती गयी और इसी कारण उन्हें प्रकाशित भी कर दिया जाता रहा , पर उस वक्त का लेखन भाषा की दृष्टि से आज भी मुझे काफी कमजोर दिखता है। फिर भी यह भाग्य की ही बात रही कि सिर्फ फोन पर हुए बातचीत के बाद ही बाबाजी में प्रकाशित किए गए आलेखों के संकलन के रूप में तैयार मुझ जैसी नई और अनुभवहीन लेखिका की पुस्तक को छापने के लिए दिल्ली का एक प्रकाशन 'अजय बुक सर्विस' तैयार हो गया और इस तरह मेरी पहली पुस्तक न सिर्फ बाजार में आ गयी, बल्कि डेढ वर्ष के अंदर बाजार में धडाधड उसकी प्रतियां भी बिकी और तुरंत इसका दूसरा संस्करण भी प्रकाशित करवाना पडा।
यहां तक की यात्रा में मैने सिर्फ ज्योतिष पर ही लिखा। हिन्दी ब्लॉग जगत में आने के बाद भी काफी दिनों तक मैं ज्योतिष पर ही लिखती रही , क्यूंकि मुझे विश्वास ही नहीं था कि मैं किसी अन्य विषय पर भी कुछ लिख सकती हूं। पर धीरे धीरे अंधविश्वास को दूर करने वाली कुछ घटनाओं , कई संस्मरण , मनोविज्ञान , धर्म आदि के मामलों में दखल देते हुए हर मामले पर कुछ न कुछ लिखने का प्रयास करती जा रही हूं। आप पाठकों की स्नेह भरी प्रतिक्रियाओं ने मुझे हर विषय पर कलम चलाने की शक्ति दी है और इसके लिए आपका जितना भी आभार व्यक्त करूं कम ही होगा। आगे भी आप सबों का स्नेह इसी प्रकार बना रहेगा , ऐसी आशा और विश्वास के साथ यह पोस्ट समाप्त करती हूं।
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आज टेलीविजन का सार्थक उपयोग क्यूं नहीं हो रहा है !!
जब मैं बालपन में थी , रेडियो पर गाने बजते देखकर आश्चर्यित होती थी । फिर कुछ दिनों में इस बात पर ध्यान गया कि रेडियो में लोग अपनी अपनी रूचि के अनुसार गाने सुनते हैं। पहले तो मैं समझती थी कि हमारा रेडियो पुराना है और पडोस के भैया का नया, इसलिए अपने घर में मेरे पापाजी , मम्मी और चाचा वगैरह पुराने गाने सुना करते हैं और वो लोग नए , पर एक दिन आश्चर्य मुझे इस बात से हुआ कि मेरे ही रेडियो में भैया अपने पसंदीदा गीत सुन रहे थे। तब पापाजी ने ही मुझे जानकारी दी कि रेडियो के विभिन्न चैनलों से हर प्रकार के गीतों और कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है और जिसकी जैसी पसंद और आवश्यकता हो उसके अनुरूप गीत या कार्यक्रम सुन सकता है।
इसके बाद चौथी या पांचवीं कक्षा में एक पाठ में टेलीविजन के बारे में जानकारी मिली , रेडियो में जो कुछ भी हम सुन सकते हैं , टेलीविजन में देखा जा सकता है। यानि गीत , संगीत , समाचार या अन्य मनोरंजक कार्यक्रमों का आस्वादन कामों के साथ साथ आंख भी कर पाएंगा । इस पाठ को समझाते हुए पापाजी बतलाते कि टेलीविजन के आने के बाद हर प्रकार के ज्ञान विज्ञान का तेजी से प्रचार प्रसार होगा , बहुत सी सामाजिक समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए इस प्रकार के शोध को सुनकर मेरे आश्चर्य की सीमा न थी।
कल्पना के लोक में उमडते घुमडते मन को पहली बार 1984 में टी वी देखने का मौका मिला। उस वर्ष पहली बार स्वतंत्रता दिवस , गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम के साथ ही इंदिरा गांधी की अंत्येष्टि तक को देखने का मौका मिला , जिसके कारण इस बडी वैज्ञानिक उपलब्धि के प्रति मैं नतमस्तक थी और भविष्य में समाज को बदल पाने में टी वी के सशक्त रोल होने की कल्पना को बल मिल चुका था।
आज समय और बदल गया है। हर घर में टेलीवीजन हैं , रेडियो की तरह ही इसमें भी चैनलों की कतार खडी हो गयी है , रिमोट से ही चैनल को बदल पाने की सुविधा हो गयी है , पर किसी चैनल में ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं , जो हमारी आशा के अनुरूप हो। समाचार चैनल राष्ट्र और समाज के मुख्य मुद्दे से दूर छोटे छोटे सनसनीखेज खबरों में अपना और दर्शकों का समय जाया करते हैं।
मनोरंजक चैनल स्वस्थ मनोरंजन से दूर पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों के विघटन के कार्यक्रमों तथा अश्लील और फूहड दृश्यों में उलझे हैं। इसी प्रकार धार्मिक चैनल आध्यात्म और धर्म को सही एंग से परिभाषित करने को छोडकर अंधविश्वास फैलाने में व्यस्त हैं।
ऐसी स्थिति में हम सोचने को मजबूर है कि क्या इसी उद्देश्य के लिए हमारे वैज्ञानिकों की इतनी बडी उपलब्धि को घर घर पहुंचाया गया था ।
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हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे !!
बीज तो हर दिमाग में होते हैं , पर समय पर ही उनकी देखभाल हो पाती है , अंकुरण हो पाता है , विकास के क्रम में उन्हें हर प्रकार का वातावरण मिल पाता है और वह छोटा सा बीज एक विशाल वृक्ष बन पाता है। आज के सामाजिक राजनीतिक हालत में अनेको दिमाग के बीज दिमाग में ही सोए पडे रह जाते हैं और अनेको प्रकृति की मार से मौत के मुंह में भी चले जाते हैं। मैं आशा करती हूं कि हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे , ताकि हमारे चारो ओर विशाल ही विशाल वृक्ष नजर आए , सभी अपनी अपनी विशेषताओं की घनी पत्तियों से छांव , सुगंधित पुष्पों से वातावरण में सुगंध और मीठे फलों से लोगों को असीम तृप्ति प्रदान करे।
प्रकृति के सहयोग प्राप्त होने से बहुत लोग मेहनत और आवश्यकता से बहुत अधिक प्राप्त कर रहे होते हैं , इन्हें अपने सामर्थ्य का उपयोग दूसरों की असमर्थता को दूर करने में करना चाहिए , क्यूंकि प्रकृति पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता कि आज वो आपका साथ दे रही है और संयोग से आपके काम बनते जा रहे हैं , तो कल भी आपकी यही स्थिति होगी। कभी भी आपको किसी और की आवश्यकता पड सकती है। किसी की मदद करते समय इस बात का भी ध्यान रखें कि उसे बार बार मदद करने की आवश्यकता न पडे , उसे इस प्रकार की मदद करें कि आनेवाले दिनों में वो इतना मजबूत हो सके कि वो पुन: दो चार लोगों की मद कर उन्हें भी इस लायक बना सके कि वो दूसरों की मदद कर सके।
मेरे ख्याल से हमारी जीवनशैली ऐसी होनी चाहिए कि वह आनेवाली पीढी को शारीरिक , आर्थिक , मानसिक , नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक से अधिक मजबूत बनाती चली जाए। इनमें किसी का भी महत्व आनेवाले समय में कम नहीं होता है। इनकी मजबूती हमें हर परिस्थिति में खुशी से जीना सीखा देती है, जो मस्तिष्क में किसी प्रकार का तनाव कम करने में सहायक है।
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
फिर वह बाबा मेरे पिताजी के पैरों पर गिर पडा .. मुझे बचा लो !!
'आपलोगों ने सुना या नहीं , कालीचरण लौट गया है' आंगन में आते ही 'खबर कागज' ने समाचार सुनाया। हमेशा की तरह हमलोगों के लिए यह एक सनसनीखेज खबर थी , इसी प्रकार की खबर सुनाने के लिए ही तो हमलोगों ने मुहल्ले के उस व्यक्ति को 'खबर कागज' की पदवी दी थी। हमलोग सब चौंक पडे 'कहां है अभी वो' 'अभी वह फलाने गांव में है , दो चार घंटे में यहां पहुंच जाएगा , 'बाबा' बना कालीचरण उस गांव में भिक्षा के लिए आया था , लोगों ने उसे पहचान लिया है , उसे लेने के लिए लोग चले गए हैं' हमलोगों को सूचित कर वे दूसरों के घर चल पडे , गांव में इस प्रकार के खबर के बाद उनकी व्यस्तता बढनी ही थी। कालीचरण के लौटने की खबर से पूरे गांव में खुशी की लहर थी।
हमलोगों के लिए यह खबर तो बिल्कुल खास थी , क्यूंकि हमारे बिल्कुल बगल में हमारे गोशाले से सटा हुआ कालीचरण के परिवार में उसके माता पिता , दो भाई और एक बहन रहते थे। गांव गांव में हर तरह की बिजली की चक्की के आने से उनलोगों की रोजी रोटी की समस्या खडी हो गयी थी , क्यूंकि उन्हीं की जाति के लोगों के यहां के कोल्हू में गांव भर के तेल की पेराई होती थी। कुछ दिनों तक तंगी झेलने से उसके पिताजी हताश और निराश थे , पर उसकी मां ने रोजी रोटी का एक साधन निकाल लिया था। गृहस्थों के घरों से धान खरीदकर उससे चावल बनवाकर बाजार में बेचने का कार्य शुरू किया। बहुत मेहनत करने के बावजूद महाजनों को ब्याज देने के बाद खाने पीने की व्यवस्था मात्र ही हल हो सकी थी , फिर भी उसने दोनो बेटो से मजदूरी न करवाकर स्कूल में नाम लिखवा दिया था। धीरे धीरे दोनो बेटे मैट्रिक पास कर गए थे और पढे लिखे और सभ्य शालीन अपने पुत्रों को देखकर मां की खुशी का ठिकाना न था।
शादी भी हो गयी और बच्चे भी , पर किसी प्रकार की नौकरी पा लेने की उनकी आशा निराशा में ही बदल गयी। सरकार के द्वारा दिए जाने वाले रिजर्वेशन का फायदा भी ऐसे लोगों को नहीं मिलना उसके औचित्य पर एक बडा प्रश्न खडा करता है। मैट्रिक पास करने से कुछ नहीं होता , अंत में उन्हें मजदूरी करने को बाध्य होना पडा। दिमाग चला चुके उनके बेटों के लिए इतनी शारिरीक मेहनत बर्दाश्त के बाहर था , उन्हें अक्सर चिडचिडाहट होती और कभी कभार झगडे झंझट की आवाज हमारे कानों में भी पडती। एक दिन बात कुछ अधिक ही बढ गयी , गुस्से से कालीचरण घर से निकला , तो लौटकर वापस ही नहीं आया। बरसात का दिन था , सभी नदी नाले में तेज पानी का बहाव , कहीं कूदकर जान ही दे दी हो , पर ये बात परिवार वालों को संतोष देता रहा कि शायद 'कालीचरण' बाबा बन गया हो। इस बात के दस वर्ष पूरे हो गए थे। कालीचरण के जाने से दुखी बाल और दाढी न बनाने के प्रण से उसके पिताजी का रूप भी बाबाजी का ही हो गया था।
सचमुच दो बजे को उस बाबा को उसके घर लाया गया। उस गांव के लोगों को बाबा भले ही कालीचरण लग रहा हो , पर हमारे गांववालों को उसके चेहरे में फर्क दिखा। कारण पूछने पर उसने बताया कि दीक्षा के दौरान उसे कई योनियों में परिवर्तित किया गया है , इसलिए उसका रूप कुछ अलग है। इस बात से गांववालों की पूरी सहानुभूति उसे मिल गयी। उसके दर्शन के लिए गांववालों का तांता लग गया। क्या गांववाले , क्या परिवार वाले , क्या बहन , क्या पत्नी ... सबने मान लिया था कि वह कालीचरण ही है। पर योनि परिवर्तन की बात कुछ पढे लिखे लोगों को नहीं जंच रही थी , खासकर उसकी इसी बात को सुनकर मेरे पिताजी मान चुके थे कि यह कालीचरण नहीं कोई ठग है। पर इतने लोगों के बीच में एक की सही बात को भी कौन सुनेगा , यही सोंचकर उसके पोल के खुद खुलने का इंतजार कर रहे थे।
बाबा जी की पूरी सेवा हो रही थी , बहन तेल मालिश कर रही थी , तो भाई नहला रहा था। मां और पत्नी उसे स्वादिष्ट खाने खिलाए जा रही थी। यहां तक तो ठीक था , उस घर में कोई बडी संपत्ति तो नहीं थी , कालीचरण का रूप धरे उस बाबाजी के द्वारा लूटे जाने का भय होता। पर एक अबला स्त्री कहीं उसके धोखे में आ जाए , पापाजी को यही चिंता सता रही थी। पर एकबारगी विरोध भी नहीं किया जा सकता था , सो कोई उपाय निकालने की दिशा में वे चिंतन कर रहे थे। उसी वक्त मुहल्ले के तीन व्यक्ति हमारे आंगन में आ गए , एक ने पापाजी से पूछा कि क्या उन्हे विश्वास है कि वह बाबा कालीचरन ही है।
मेरे पापाजी ने 'ना' में सर हिलाया , उनमें से एक व्यक्ति के लिए इतना ही काफी था , वे तेजी से कालीचरन के आंगन में पहुंचे और पूछा 'क्या तुम कालीचरण हो'
उसका 'हां' कहना था कि गाल में एक चांटा।
'सामने किसका घर है'
'फलाने का' गाल में दूसरा चांटा।
'ये कौन है'
'फलाने हैं' गाल में तीसरा चांटा।
'मुझे माफ कर दो , उनलोगो ने जबरदस्ती किया , मैने नहीं कहा कि मैं कालीचरण हूं' तुरंत उसने दया की भीख मांगनी शुरू की और वो चांटे पर चांटा लगाए जा रहे थे। हल्ला गुल्ला सुनकर पापाजी वहां पहुंचे और उस सज्जन को डांटना शुरू किया.. 'गांव में आए मेहमान के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं क्या'
'मेहमान है तो मेहमान की तरह रहे , यहां सबको बेवकूफ क्यूं बना रहा है' वो गुस्से से तमतमाए था और पूरा गांव तमाशा देख रहा था। उसके रौद्र रूप को देखकर वो बाबा बहुत भयभीत था , मेरे पापाजी के हमदर्दी भरे शब्द को सुनकर वह उनके पैरों पर वह गिर पडा 'मुझे बचा लो' ।
फिर पापाजी ने सबको शांत किया और मौका देखते ही वह बाबा सिर पर पैर रखकर भागा
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
धर्म का पालन अंधविश्वास नहीं !!
एक लेख में मैंने बताया है कि किस तरह आध्यात्म , धर्म , अंधविश्वास और जादू टोना एक दूसरे से अलग हैं। युग के परिवर्तन के साथ ही साथ धर्म की परिभाषा बदलने लगती है। आज के विकसित समाज में भी परिवार में हर सुख या दुख के मौके की वर्षगांठ मनायी जाती है , इसके माध्यम से हम खुशी या दुखी होकर आपनी भावनाओं का इजहार कर पाते हैं , जिन माध्यमों से हमे या हमारे परिवार को सुख या दुख मिल रहा हो , उसे याद कर पाते हैं , उनके प्रति नतमस्तक हो पाते हैं।
एक पूरे समाज में मनाए जानेवाले किसी त्यौहार का ही संकुचित रूप है ये , पर जब किसी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पूरे समाज पर प्रभाव डाल रही हो , तो वैसे महान व्यक्ति का जन्मदिन या पुण्य तिथि पूरा समाज एक साथ मनाता है। यह हमारा कर्तब्य है , हमें मनाना चाहिए , पर इसे मनाने न मनाने से उन महान आत्माओं के धर्म में कोई परिवर्तन नहीं होगा। उनका काम कल्याण करना है , तो वे अपने धर्म के अनुरूप कल्याण ही करते रहेंगे। पर उन्हें याद कर हमें उनके गुणों से सीख लेने की प्रेरणा अवश्य मिल जाती है।
प्राचीन काल के संदर्भ में हम इसी बात को देखे तो आग , जल , वायु , सूर्य से लेकर प्रकृति की अन्य वस्तुओं में एक मनुष्य की तुलना में कितनी गुणी अधिक शक्ति है , इसकी कल्पना करना भी नामुमकिन है। आग हमें जला भी सकती है , पर ऐसा विरले करती , वह हमें गर्म रखने से लेकर हमारे लिए स्वादिष्ट खाना बनाने की शक्ति रखती है। जल हमें अपने आगोश में ले सकते हैं , पर वे ऐसा नहीं करते और हमारे जीवन यापन के हर पल में सहयोग करते हैं।
वायु हमें कहां से उडाकर कहां तक ले जा सकती है , पर वो ऐसा नहीं करती , हमारे प्राण को बचाए रखने के लिए ऑक्सीजन का इंतजाम करती है। सूर्य हमें जलाकर खाक कर सकता है , पर हमारी दिनचर्या को बनाए रखने के लिए प्रतिदिन उदय और अस्त होता है। ये सब इसलिए होता है , क्यूंकि कल्याण करना उनका स्वभाव है।
हम प्रकृति की वस्तुओं के इसी स्वरूप की पूजा करते हैं । पूजा करने के क्रम में हम इनको सम्मान तो देते ही हैं , उनसे सीख भी लेते हैं कि हम अपने गुणों से संसार का कल्याण करेंगे। प्रकृति के एक एक कण में कुछ न कुछ खास विशेषताएं हैं , जो हमारी सेवा में तत्पर रहती हैं। यदि हम ढंग से प्रयोग करें , तो फूल से लेकर कांटे तक और अमृत से लेकर विष तक , सबमें किसी न किसी प्रकार का फायदा है।
हर वर्ष का एक एक दिन हमने इनकी पूजा के लिए निर्धारित किया है , ताकि हम इनके गुणों को याद कर सके और इनसे सीख ले सकें। इसलिए इसे हमारे धर्म से जोडा गया है। यदि इस ढंग से सोंचा जाए कि हम इनकी पूजा नहीं करेंगे यानि इसका दुरूपयोग करेंगे , तो इनके सारे गुण अवगुण में बदल जाएंगे यानि तरह तरह की प्राकृतिक आपदाएं आएंगी , तो यह अंधविश्वास नहीं हकीकत ही है।
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धर्म और ज्योतिष को यूं बदनाम न करो
दुनिया भर के खासकर भारत में गली गली , मुहल्ले मुहल्ले विचरण करने वाले बाबाओं , तुम अपने शहर में न जाने कितने अपराध करते हो , पर काफी दिनों तक पुलिस की लापरवाही या उनसे मिलीभगत से तुम पकडे नहीं जाते , इस उत्साह से बडी बडी गलतियां करने लगते हो , फिर जब तुमपर शिकंजे कसे जाने लगते हैं , तो शहर से भागना और पुलिस से बचना ही तुम्हारा एक लक्ष्य हो जाता है , बचने का सबसे बडा रास्ता तुम्हें बाबाजी बनने में दिखाई देता है , बडी मूंछ और दाढी के कारण लोगों के लिए तुम्हारे चेहरे को पहचानना काफी मुश्किल हो जाता है , बाबा का रूप धारण कर लेने से जनता की आस्था का भी तुम नाजायज फायदा उठा लेते हो , यदि किसी की आस्था तुमपर नहीं बन रही होती , तो डराना और धमकाना तो तुम्हारा स्वभाव है, इसलिए इस राह में चलकर आराम से अपनी महत्वाकांक्षा के अनुरूप पैसे का इंतजाम तो तुम कर लेते हो !
बाबा बनने के बाद तो तुम्हारा जीवन और रंगीन बन जाता है , श्मशान सिद्ध कर चुके हो तुम , यह कहकर भक्तों के सम्मुख भी शराब पीने से तुम कोई परहेज नहीं करते , कमाख्या मंदिर में सिद्धि प्राप्त कर चुके हो , इसलिए मांस से भी कोई परहेज की आवश्यकता नहीं , महिलाओं को मां मानते हो , इसलिए उनसे घिरे होने में भी तुम्हें दिक्कत नहीं , कन्याओं से सेवा करवाकर तुम उनकी मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दे देते हो , हत्या और लूटपाट के पाप के साथ तुम लोगों के कल्याण का दावा कर लेते हो , महात्मा होने के बावजूद भविष्यवाणी करने का रिस्क नहीं लेते , उपाय की पूरी व्यवस्था कर देते हो , एक शहर में तुम्हें रहना नहीं , इसलिए साख बनाए रखने की कोई चिंता नहीं , लोगों से पैसों की बरसात करवा लेते हो तुम , इस तरह अपराधी के नाम से भी जो सुख सुविधा नहीं मिलती , वो बाबा बनकर तुम्हें मिल जाती है !
तुमसे नाम पूछा जाता है तो अपने को हिंदुस्तानी बताते हो , गांव , जिला या प्रदेश पूछा जाता है तो हिंदुस्तान कहते हो , मानो हम सब देशद्रोही हैं और तुम सच्चे देशभक्त , महान आत्माओं के जन्म से लेकर मृत्यु तक की हर घटना इतिहास में दर्ज होती है , अपना नाम , अपना गांव , अपना प्रदेश क्यूं छिपाते हो , वहीं से तो स्पष्ट हो जाता है कि तुम अपने जीवन का कोई भाग छुपा रहे हो , तुम इतिहास की किताबों में अपना नाम क्यूं नहीं दर्ज करवाना चाहते , अपने भयानक सच को सामने न लाकर अपने बाबा के स्वरूप को सामने रखकर तुम जनता के आस्था के साथ खिलवाड करते हो , उनके मनोवैज्ञानिक कमजोरी का नाजायज फायदा उठाते हो , अपने स्वार्थ में अंधे होकर कुछ भी करो तुम , पर धर्म और ज्योतिष को यूं बदनाम न करो बाबा , मेरी प्रार्थना है तुमसे !
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2012 में दुनिया के अंत की संभावना 1
जिस तरह जन्म और मृत्यु जीवन का सत्य है , उसी प्रकार आशा और आशंका हमारे मन मस्तिष्क के सत्य हैं। जिस तरह गर्भ में एक नन्हीं सी जान के आते ही नौ महीने हमारे अंदर आशा का संचार होता रहता है , वैसे ही किसी बीमारी या अन्य किसी परिस्थिति में बुरी आशंका भी हमारा पीछा नहीं छोडती। मन मस्तिष्क में आशा के संचार के लिए हमारे सामने उतने बहाने नहीं होते , पर आशंका के लिए हम पुख्ता सबूत तक जुटा लेते हैं। कुछ दिनों से लगातार 2012 दिसम्बर के बारे में विभिन्न स्रोतो से भयावह प्रस्तुतियां की जा रही हैं। इससे भयभीत या फिर जिज्ञासु पाठक एक माह से मुझसे इस विषय पर लिखने को कह रहे हैं , पर दूसरे कार्यो में व्यस्तता की वजह से इतने दिन बाद आज मौका मिला है।
आखिर इस विषय पर विभिन्न विचारकों की क्या दलील है , इसे जानने के लिए मैने 25 नवम्बर को गूगलिंग की , इस विषय पर आठ दस विंडो खुले हुए थे और 12 बजकर पांच मिनट रात्रि मैं इसके अध्ययन में तल्लीन थी कि अचानक हमारे यहां भूकम्प का एक तेज झटका आया , दूसरी मंजिल पर होने के बावजूद मैं हिल गयी। पर झारखंड भूकम्प का क्षेत्र नहीं , पच्चीस पच्चास वर्षों बाद यहां कभी भूकम्प आता हो। मैं तो सोंच में पड गयी , इस प्रकार के लेखों को पढने के कारण शायद मुझे ऐसा भ्रम हुआ हो , पर जब अपने कमरे में पढ रहे मेरे बेटे ने आकर कहा कि वह बेड पर बिल्कुल डोल रहा था , तब ही मुझे तसल्ली हुई। फिर कुछ ही देर में इससे संबंधित जानकारी लेने के बाद मैंने कंप्यूटर बंद कर दिया। किसी समाचार से कोई जानकारी नहीं मिली , पर सुबह बोकारो के सारे लोगों ने पुष्टि की कि वास्तव में रात में भूकम्प आया था।
21 दिसम्बर 2012 ... यही वह दिन है , जिसके बारे में भयानक प्राकृतिक आपदा के उपस्थित होने की आशंका बन रही है । आखिर क्या कह रहे हैं , उस दिन के ग्रह नक्षत्र । यह जानने के लिए मैने अपने सॉफ्टवेयर में विवरण डाला , पर परिणाम देखकर चौंक पडी , जिन ग्रहों को आसमान के 360 डिग्री में रहना चाहिए था , वे 500 डिग्री तक में दिख रहे थे। ‘गत्यात्मक ज्योतिष’ के अनुसार जिन ग्रहों की जिन शक्तियों के पूर्ण मार्क्स 100 दिए जाने थे , वे 200 यहां तक कि 400 दिखा रहे थे। यह किस चक्कर में पड गयी मैं , मैं तो एक बार फिर से भयभीत हो गयी , क्या उस दिन सचमुच कुछ उल्टा होनेवाला तो नहीं । पर जब प्रोग्राम के अंदर देखने की चेष्टा की , तो समझ में आया कि ‘गत्यात्मक ज्योतिष’ के सिद्धांतों पर आधारित इस सॉफ्टवेयर की प्रोग्रामिंग मैने 2010 तक के लिए ही की थी और 2012 के दिसम्बर की गणना की वजह से यह परेशानी आ रही थी।
अब इतनी जल्दी सॉफ्टवेयर को ठीक कर पाना संभव न था , आलेख को लिखने की हडबडी भी थी , मैन्युली काम करना ही पडेगा , फार्मूले को किसी डायरी से ढूंढकर उतना गणना करना आसान तो न था , पर संयोग अच्छा था कि पिताजी बोकारो आए हुए थे , उनकी अपनी शोध , अपना फार्मूला , अपने नियम , उन्होने फटाफट सारे ग्रहों की सब गणना कर डाली। बस उसके बाद उन्हें कुछ करने की आवश्यकता नहीं थी। उनके सिद्धांतों के आधार पर हर क्षेत्र का रिसर्च और उससे संबंधित भविष्यवाणियां करने की जबाबदेही मुझ पर ही है। पूरे जीवन की मेहनत के बाद उत्साह बढाने वाली भी कोई बात हो , तभी तो इतनी उम्र में वे पुन: मेहनत कर सकते थे। लेकिन सारी गणना करने के बाद क्या निकला परिणाम , इसे जानने के लिए आपको अगली कडी का इंतजार करते हुए एक बार आप सभी पाठकों को और तकलीफ करनी पडेगी।
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जेली के बहाने फायदेमंद अमृतफल आंवला अपने बच्चों को खिलाएं !!
अमृतफल आंवले से भला कौन परिचित न होगा , फिर भी इसके बारे में वैज्ञानिक जानकारी के लिए विकिपीडीया का यह पृष्ठ पढें। एशिया और यूरोप में बड़े पैमाने पर आंवला की खेती होती है. आंवला के फल औषधीय गुणों से युक्त होते हैं, इसलिए इसकी व्यवसायिक खेती किसानों के लिए भी फायदेमंद होता है। डॉ. इशी खोसला , लीडिंग न्यूट्रीशिनिस्ट, डॉ. रुपाली तलवार , फोर्टिस हॉस्पिटल, डॉ. सोनिया कक्कड़ , सीताराम भरतिया हॉस्पिटल जैसे विशेषज्ञों द्वारा बैलेंस्ड डाइट तैयार करने में भी आंवले को महत्व दिया गया है , जिसे आप इस पृष्ठमें पढ सकते हैं। मीडिया डॉक्टर प्रवीण चोपडा जी ने भी अपने ब्लॉग में आंवले की काफी प्रशंसा की है।
इसके धार्मिक महत्व को जानना हो तो आप इस पृष्ठ पर क्लिक कर सकते हैं , जिसमें कहा गया है कि जो भगवान् विष्णु को आंवले का बना मुरब्बा एवं नैवेध्य अर्पण करता है, उस पर वे बहुत संतुष्ट होते हैं। यह भी कहा जाता है कि नवमी को आंवला पूजन स्त्री जाति के लिए अखं ड सौभाग्य और पेठा पूजन से घर में शांति, आयु एवं संतान वृद्धि होती है। पुराणाचार्य कहते हैं कि आंवला त्यौहारों पर खाये गरिष्ठ भोजन को पचाने और पति-पत्नी के मधुर सबंध बनाने वाली औषधि है।
आंवले में इतना विटामिन सी होता है कि इसे सुखाने , पकाने या अचार बनाने के बावजूद भी पूरा नष्ट नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्यवर्द्धक होने के कारण ही प्राचीन काल से ही भारतीय रसोई में आंवले का काफी प्रयोग किया जाता है। सालभर के लिए न सिर्फ आंवले का अचार , चटनी , मुरब्बा वगैरह ही बनाए जाते हैं , सुखाकर इसका चुर्ण भी रखा जाता है। अचार बनाने की विधि आप निम्न लिंको पर प्राप्त कर सकते हैं। मुरब्बा बनाने की विधि के लिए आप यहां पर क्लिक कर सकते हैं।
पर ये सारे व्यंजन बडे लोग तो आराम से खा लेते हैं , पर बच्चे नहीं खा पाते, इस कारण बच्चे आंवले के लाभ से वंचित रह जाते हैं। पर यदि आंवले की जेली बना ली जाए तो आंवले का कडुआपन या खट्टापन समाप्त हो जाता है और यह मीठा हो जाता है , इसलिए बच्चे इसे पसंद करते हैं। इस जेली को ब्रेड में लगाकर या फिर रोटी के साथ ही या यूं ही बच्चों को चम्मच में निकालकर खाने को दे सकते हैं। इस जेली को बनाने की विधि नीचे दे रही हूं।
एक किलो आंवले को अच्छी तरह धोकर थोडे पानी के साथ कुकर में एक सीटी लगा कर छानकर रख लें। फिर बीज निकालकर उसे अच्छी तरह मैश कर लें। अब एक कडाही में कम से कम सौ ग्राम घी, थोडा अधिक भी डाला जा सकता है, डालकर उसे गर्म कर उसमें मैश किए आंवले को डालें। दस पंद्रह मिनट तेज आंच पर भूनने के बाद उसमें 750 ग्राम चीनी डाल दें । चीनी काफी पानी छोड देता है , इसलिए पानी डालने की आवश्यकता नहीं , जो पानी है , उसे ही सुखाना पडेगा और थोडी ही देर में जेली तैयार हो जाएगी। बहुत अधिक सुखाने पर वह कडी हो जाती है , इसलिए थोडी गीली रहने पर ही उसे उतार दें। तब यह ठंडा होने पर सामान्य रहता है।
इसी विधि से घर में ही आंवले का च्यवनप्राश भी बनाया जा सकता है। पर अभी मुझे वह डायरी नहीं मिल रही , जिसमें उन मसालों के नाम और उसकी मात्रा लिखी हुई है , जिसे कूटकर इस जेली में डालना पडता है , जिससे कि यह च्यवनप्राश बन सके। सस्ती और अपेक्षाकृत कम स्वादिष्ट होते होते हुए भी बाजार में मिलनेवाले च्यवनप्राश की तुलना में यह अधिक फायदेमंद होती है। जबतक वह डायरी नहीं मिलती है, तबतक मैं भी इस जेली का ही उपयोग कर रही हूं और पूरे जाडे आप भी इस जेली को ही प्रतिदिन एक चम्मच खाइए।
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
ये रहा मेरा पहला प्रयोग .. यह त्रिवेणी ही है या कुछ और ??
अपने ब्लॉग के लिए इतने लंबे लंबे आलेख और 'साहित्य शिल्पी' में लंबी लंबी कहानियां लिखकर प्रकाशित करते हुए मैं अपना जितना समय जाया करती हूं , उससे कम पाठकों का भी नहीं होता , जबकि कुछ ब्लागर एक छोटी सी त्रिवेणी लिखकर अपना संदेश पाठकों तक पहुंचाकर प्रशंसा भरी ढेर सारी टिप्पणियां प्राप्त कर लेते हैं। ब्लॉग जगत में इतने दिनों में डॉ अनुराग जी के ढेर सारी त्रिवेणियॉं पढने के बाद यत्र तत्र प्रकाशित कुछ अन्य त्रिवेणियों को भी समझने की कोशिश करती रही । इस प्रकार मुझे अभिव्यक्ति की एक नई शैली की जानकारी मिली, किसी भी तरह का प्रयोग करने में मैं पीछे नहीं रहा करती , ये रहा मेरा पहला प्रयोग। ये भी पता नहीं कि यह त्रिवेणी है या कुछ और ... इसलिए आप सबों की आलोचनाओं के लिए तैयार हूं .....
धुंधला आईना, चेहरे की सारी कमियों को छुपा देता है ,
अखबार के गीले टुकडे से इसे चमकाने की जल्दबाजी क्यूं,
थोडी देर ही सही, भ्रम में रहकर खुश तो हो लें !
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723


