क्‍या लालू , बालू और कालू की मजेदार कहानी आपको याद है ??

amari kahani

अचानक बचपन में किसी पत्रिका में पढी एक मजेदार कहानी की आज मुझे याद आ गयी। किसी गांव में तीन भाई रहा करते थे .. लालू , बालू और कालू । लालू और बालू खेतों में काम करते , जबकि कालू का काम उस गांव के दारोगा जी के लिए खाना बनाना होता था। खेतों की फसल और कालू की तनख्‍वाह से तीनो भाइयों का जीवनयापन खुशी खुशी हो रहा था। पर कुछ ही दिनों बाद लालू और बालू को अहसास हुआ कि उन्‍हें खेत में बहुत अधिक मेहनत करनी पडती है और लालू सिर्फ दो समय का खाना बनाकर अच्‍छा अच्‍छा खाना खाकर आराम का जीवन जी रहा है। इस बात का अहसास होते ही दोनो भाई कालू से झगडा करने लगे।

 कालू ने बहुत देर तक उन्‍हे समझाने की कोशिश की कि दारोगा जी का खाना बनाना बहुत आसान काम नहीं है , वे दोनो नहीं कर सकते। पर दोनो भाई इसे समझने को तैयार ही नहीं थे। दोनो भाइयों के विरोध को देखते हुए कालू ने उन्‍हें शांत करने के लिए दो चार दिनों तक उन्‍हें दारोगा जी के यहां खाना बनाने के लिए भेजने का निश्‍चय किया। दूसरे ही दिन लालू को इस कार्य के लिए भेजा गया , लालू थाने के अहाते में बने दारोगा जी के निवास पर पहुंचा। दारोगा जी ने उसका परिचय पूछा। उसने बताया कि वह कालू का भाई लालू है और उनका खाना बनाने के लिए यहां आया है।

दो दिन पहले गांव से लौटे दारोगा जी अपने चाचाजी की मृत्‍यु के क्रियाकर्म में अपना सर मुंडवा चुके थे और लॉन में बैठे पेपर पढ रहे थे। लालू की निगाह जब उनके सर पर पडी , तो वह जोर जोर से हंसने लगा। दारोगा जी ने उससे हंसने का कारण पूछा तो उसने बताया कि आपका सर तकला है , उसमें बिल्‍कुल भी बाल नहीं है , यदि किन्‍ही कारणों से आपका सर कट जाए तो उसे ढोया कैसे जाएगा ?

'तुम्‍हें बात करने की बिल्‍कुल भी तमीज नहीं , तुम्‍हें यहां किसने भेजा ?' अपने चाचाजी की मृत्‍यु से दुखी दारोगा जी को यह बात बिल्‍कुल पसंद नहीं आयी और नाराज होकर उन्‍होने लालू को थाने में बंद कर दिया। शाम को खेत से लौटने के बाद बालू और कालू काफी देर तक लालू का इंतजार करते रहें । जब वह नहीं आया तो शाम के अंधेरे में ही कालू उसे ढंढने थाने की ओर चला। 

वहां जाकर गुस्‍से से भरे दारोगा जी से सारी बातें मालूम हुई। उसने दारोगा जी से कहा ' क्‍या बताऊं दारोगा जी , इसको थोडी भी अकल नहीं , इसे माफ कर दीजिए , अरे इतना तो दिमाग लगाना ही चाहिए था कि यदि आपका सर कट भी जाए , तो मुंह तो खुला होगा न , उसमें डंडा डालकर उससे आपके सर को उठाते हुए आराम से कहीं भी ले जाया जा सकता है।

दारोगा जी का गुस्‍सा और बढना ही था। उन्‍होने नाराज होकर बालू को भी थाने में बंद कर दिया। दोनो भाइयों का इंतजार करते हुए जब कालू थक गया , तो देर रात वह भी दारोगा जी के यहां पहुंचा। दारोगा जी ने उसका स्‍वागत किया और कहा कि तुमने किन बेवकूफ भाइयों को मेरे यहां भेज दिया था। उसके बाद उसे पूरी कहानी सुनायी। 'क्‍या कहूं सर, मैं तो इतने दिनों से इन्‍हें झेल रहा था, यह सोंचकर उन्‍हें यहां भेजा कि आप इनकी दो दिनों में अवश्‍य छुट्टी कर देंगे , तब मैं काम पर लग ही जाऊंगा, पर ये तो एक घंटे भी नहीं टिक सकें।'

'सर ये इतने बेवकूफ हैं , इन्‍हें इतना भी नहीं पता कि यदि किसी तरह आपका सर कट ही जाए , तो एक कान से धागा डालकर दूसरे कान से निकालकर आराम से आपके सर को ढुलकाते हुए ले जाया जा सकता है।'


उसके बाद कालू का भी क्‍या हाल हुआ होगा , इसका अनुमान आप लगा ही सकते हैं !!

कैसा हो कलियुग का धर्म ??


प्रत्‍येक माता पिता अपने बच्‍चों को शिक्षा देते हैं , ताकि उसके व्‍यक्तित्‍व का उत्‍तम विकास हो सके और किसी भी गडबड से गडबड परिस्थिति में वह खुद को संभाल सके। पूरे समाज के बच्‍चों के समुचित व्‍यक्तित्‍व निर्माण के लिए जो अच्‍छी शिक्षा दे, वो गुरू हो जाता है। इसी प्रकार सारी मानव जाति के कल्‍याण के लिए बनायी गयी शिक्षा धर्म और उसे देनेवाले धर्म गुरू हो जाते हैं। इस शिक्षा का मुख्‍य उद्देश्‍य ज्ञान की प्राप्ति होनी चाहिए, जिसका आज गंभीर तौर पर अभाव है। 

सिर्फ गणित और विज्ञान को पढकर शिक्षा तो प्राप्‍त की जा सकती है , पर इससे व्‍यवहारिक ज्ञान नहीं प्राप्‍त किया जा सकता। माता पिता , गुरू या धर्मगुरू को शिक्षा देने से पूर्व आज के समाज को ध्‍यान में रखना अति आवश्‍यक है , तभी उसकी शिक्षा का सही महत्‍व होता है। प्राचीन काल में समाज के या जन जन के कल्‍याण के लिए प्रत्‍येक नागरिक को कर्तब्‍यों की डोर से बांधा गया था , जिसके पालन के लिए उन्‍हें ईश्‍वर का भय दिखाया गया था।

ग्रहों के प्रभाव की सटीक जानकारी के क्रम में एक बात तो स्‍पष्‍ट हो गयी है कि इस दुनिया में कोई भी काम किसी के चाहने या मेहनत करने मात्र से नहीं होता, वरन् एक स्‍पष्‍ट नियम से होता है, जिसे किसी भी समय प्रमाणित किया जा सकता है। इसलिए एक परम पिता परमेश्‍वर की संभावना से तो मैं इंकार नहीं कर सकती , भले ही यह हो सकता है कि हमारे अपने पिता , राष्‍ट्रपति या प्रधानमंत्री की तरह वो भी किसी नियम से चलने को मजबूर हों। इसलिए चाहते हुए भी त्‍वरित ढंग से किसी को बुरे कर्मों की सजा और किसी को अच्‍छे कर्मों का इनाम दे पाने में मजबूर हो , इसलिए उन्‍हें सर्वशक्तिमान रूप में नहीं देख पाने से हम उनके प्रति अक्‍सर भ्रम में होते हैं ।

मैने हिंदू धर्म में जन्‍म लिया है , पर किसी भी धार्मिक नियमों को मानने की मुझे कोई मजबूरी नहीं है। मेरी अंतरात्‍मा साथ दे , तो मैं पूजा करूं , यदि न दे , पूजा न करूं। जिस देवी देवता को पूजने की इच्‍छा हो , पूजूं , जिसका मजाक उडाने का मन हो , मजाक उडाऊं । गंगा में जाकर छठ का व्रत करूं , टब में जल भरवाकर या फिर एक कठौती में , मेरी मर्जी या देश , काल परिस्थिति पर निर्भर करता है। अलग से एक आयोजन रखकर बच्‍चे का मुंडन जनेऊ करवाऊं या किसी के विवाह में या फिर उसके खुद के विवाह में , पूरा बाल मुंडवाऊं या फिर एक लट ही काटूं , सब हमारी अपनी मर्जी। 

मरने के बाद शरीर के हर अंग को दान करने के लिए उसके काट छांट करवाऊं या फिर दाह संस्‍कार , वो भी अपनी आवश्‍यकता और रूचि के अनुसार। जंगलों की अधिकता हो तो लकडियों से अंतिम संस्‍कार हो सकता है , यदि कमी हो तो विद्युत शवगृहों में भी। जैसा देश , वैसा भेष बनाने की सुविधा हमें हमारा धर्म देता है, जैसा वास्‍तव में धर्म को होना चाहिए।

सिर्फ ग्रंथों को पढने लिखने से ही ज्ञान नहीं आता , गंभीर चिंतन मनन और समस्‍त चर अचर के प्रति प्रेम से इसमें निखार आता है। काफी दिनों से मैने ईश्‍वर और धर्म के बारे में मैने बहुत चिंतन मनन किया है , इसलिए इस बारे में कुछ अधिक लिखने की इच्‍छा अवश्‍य थी , पर वो कभी बाद में , अभी मैं वर्षों पहले अपनी डायरी में लिखी चंद लाइनों को पोस्‍ट कर रही हूं .........


कंप्‍यूटर युग का मानव है तू  , धर्मग्रंथों से इतना मत डर।
मानव जाति के विकास हेतु , धर्म का स्‍वयं निर्माण कर।।
माना वैदिककालीन विद्या है, उपयोगी होगी उस युग में।
इसका अर्थ कदापि नहीं कि ये पूजी जाए हर युग में।।

उन ऋषि मुनियों की तुलना में , क्‍या कम है तेरा दिमाग।
गंभीर चिंतन करो, तो मिटा सकोगे समाज की हर दाग ।।
धर्म कहता है , लालच मत कर, तरक्‍की होगी भला कैसे ?
महत्‍वाकांक्षा के बिना मंजिल निश्चित होगी नहीं जैसे ।।

अतिथि और असहायों की सेवा कर , धर्म बताता है।
आज इसी विश्‍वास का , बुरा फल ही देखा जाता है।।
टोने टोटके, व्रत जाप , कर्मकांड , धर्म के तत्‍व नहीं।
सच्‍ची प्रार्थना के आगे, किसी का कोई महत्‍व नहीं।।

कलियुग का सबसे बडा धर्म है , करते रहो प्रयोग ।
अपने तन मन धन संपत्ति का , करो उत्‍तम उपयोग।।
पीछे झांककर कभी न देखों , पीछे ही मत रह जाओ।
आगे बढते रहो हरदम, और सबको राह दिखाओ।।

विज्ञान का वास्‍तविक तौर पर प्रचार प्रसार काफी मुश्किल लगता है !!

भारतवर्ष में फैले अंधविश्‍वास को देखते हुए बहुत सारे लोगों , बहुत सारी संस्‍थाओं का व्‍यक्तिगत प्रयास अंधविश्‍वास को दूर करते हुए विज्ञान का प्रचार प्रसार करना हो गया है। मैं उनके इस प्रयास की सराहना करती हूं , पर जन जन तक विज्ञान का प्रचार प्रसार कर पाना इतना आसान नहीं दिखता। पहले हमारे यहां 7वीं कक्षा तक  विज्ञान की पढाई अनिवार्य थी , पर अब सरकार ने 10वीं कक्षा तक विज्ञान की पढाई को अनिवार्य बना दिया है । 

10वीं कक्षा के विद्यार्थियों को पढाने वाले एक शिक्षक का मानना है कि कुछ विद्यार्थी ही गणित और विज्ञान जैसे विषय को अच्‍छी तरह समझने में कामयाब है,  बहुत सारे विद्यार्थी विज्ञान की नैय्या को भी अन्‍य विषयों की तरह रटकर ही पार लगाते हैं । उनका मानना है कि एक शिक्षक को भी बच्‍च्‍े के दिमाग के अनुरूप ही गणित और विज्ञान जैसे विषय को पढाना चाहिए। जो विज्ञान के एक एक तह की जानकारी के लिए उत्‍सुक और उपयुक्‍त हों , उन्‍हें अलग ढंग से पढाया जाना चाहिए, जबकि अन्‍य बच्‍चों को रटे रटाए तरीके से ही परीक्षा में पास करवाने भर की जिम्‍मेदारी लेनी चाहिए।उनका कहना मुझे इसलिए गलत नहीं लगता , क्‍यूंकि एक एक मानव की मस्तिष्‍क की बनावट अलग अलग है।

जहां भारत में अधिकांश लोग साक्षर भी नहीं , कई लोग साक्षर होते हुए भी अशिक्षित और अज्ञानी हैं , वहीं पढे लिखे लोगों डिग्रीधारी लोगों तक में विज्ञान की समझ काफी कम देखने को मिलती है, जबकि विश्‍व में न जाने कितने वैज्ञानिक ऐसे हुए , जो कभी स्‍कूल भी नहीं जा सके थे, प्रतिभा को जन्‍मजात तौर पर स्‍वीकारने को बाय कर देता है। दैनिक जीवन में छोटी छोटी जगहों पर भी विज्ञान के नियमों का सहारा लेकर लाभ प्राप्‍त किया जा सकता है, पर अधिकांश लोगों को इस बारे में कुछ भी पता नहीं होता। और बताने पर भी समझने में दिलचस्‍प्‍ी नहीं रखते हैं, हां यदि फायदा हो तो उस कार्य को करना अवश्‍य शुरू कर देते हैं।

हमारी एक पडोसिन जाडे के दिनों में इलेक्ट्रिक रॉड के सहारे वह एक बाल्‍टी पानी गर्म किया करती , जिसका एक दो मग पानी परिवार के सदस्‍य अपने स्‍नान करने हेतु रखे गए पानी में मिला लिया करते थे। हमारे मुहल्‍ले में 8 बजे से 10 बजे तक के पावर कट से वे काफी परेशान रहने लगी थी , क्‍यूंकि पावर कट की वजह से  परिवार के एक या दो व्‍यक्ति के नहाने के बाद ही सारा पानी ठंडा हो जाया करता था और बाकी लोगों को स्‍नान करने के लिए 10 बजे लाइट के आने का इंतजार करना पडता था। 

काफी दिनों से उनके द्वारा झेली जा रही परेशानी की भनक मुझतक भी पहुंची। मैने उन्‍हें सलाह दी कि 8 बजे पावर कट होते ही वह उस एक बाल्‍टी खौलते पानी को एक बडे ड्रम में डाल दे, जिससे सारा पानी नहाने लायक हो जाएगा और परिवार के सभी सदस्‍य आराम से नहा पाएंगे। उसकी वजह तो आप सभी ज्ञानी पाठक अवश्‍य समझ जाएंगे , पर न तो उस महिला को और उसकी पढी लिखी बेटी तक को कारण समझ में आ सका , हां वे मेरे कहे का फायदा अवश्‍य उठाती रहीं।

इसी प्रकार एक पडोसन को कस्‍टर्ड बनाने वक्‍त सूखे कस्‍टर्ड पाऊडर को घोलने के लिए दूध को बिना खौलाए प्रयोग करते देखा , कस्‍टर्ड के घोल को खौलते दूध में डालते ही वह तापमान को कम कर देता है और गाढा हो जाता है , जिसके कारण सारा दूध फिर से 100 डिग्री तापमान पर नहीं आ पाता। इसलिए स्‍वास्‍थ्‍य की दृष्टि से यह सही है कि पूरे दूध को खौलाकर कस्‍टर्ड पाउडर घोलने के लिए थोडे से दूध को ठंढा कर प्रयोग में लाया जाए।पर बहुत सारी गृहिणियां अपनी सुविधा के लिए कच्‍चे दूध का उपयोग करती हैं , जिसे समझाने का भी उपनपर कोई असर नहीं होता। 

विज्ञान को न समझने वाले तार्किक दृष्टि न रखनेवाले किसी बात के अर्थ का अनर्थ कैसे कर डालते हैं , यह इस उदाहरण से स्‍पष्‍ट हों जाएगा। एक गृहिणी ने अपने पति और उनके कुछ मित्रों की बातचीत को सुना। पानी की गंदगी को लेकर वे काफी चिंतित थे और पानीउबालकर पीना चाहिए , इसकी वकालत कर रहे थे। सुननेवाली महिला तबतक पानी उबालकर ही पिया करती थी। बातचीत का यह वाक्‍य उसके कान में गया , ' पानी उबलने के बाद भी 10 मिनट तक उसका 100 डिग्री तापमान मेनटेन किया जाना चाहिए। इसलिए उचित ये है कि पानी न सिर्फ उबाला जाना चाहिए, उसे गर्म हीटर पर ऑफ करके थोडी देर छोड भी देना चाहिए।

उस महिला पर इस बात का ऐसा प्रभाव पडा कि तब से उसने भगोने को नल के पानी से भरकर हीटर पर चढाकर हीटर को ऑफ करना शुरू किया। एक दिन पति का उस बात पर ध्‍यान गया तो उसने बताया कि आपलोग ही तो बात कर रहे थे कि पानी को खौलाना ही जरूरी नहीं है , उसे गर्म हीटर पर 10 मिनट छोड देना चाहिए। जहां समाज में ऐसे लोग मौजूद हों , वहां विज्ञान का प्रचार प्रसार कागज पर ही हो सकता है , वास्‍तविक तौर पर मुश्किल लगता है।



छोटी छोटी बात में भी मौलिक सोंच

पिछले दिनों सहारा इंडिया की विभिन्‍न प्रकार के बचत स्‍कीमों के लिए काम कर रहे एक एजेंट के बारे में जानकारी मिली। रोजी रोटी की समस्‍या से निजात पाने के लिए वह इसका एजेंट तो बन गया , पर यहां भी राह आसान न थी। पांच दस रूपए व्‍यर्थ में बर्वाद करनेवाले और कभी दस पंद्रह हजार रूपए की जरूरत पर महाजनों के यहों बडी ब्‍याज दर पर पैसे लेने वाले छोटे छोटे लोगों को वह गांव गांव , मुहल्‍ले मुहल्‍ले जाकर बचत के बारे में समझाता फिर रहा था।

 शहर से लेकर गांव तक की यात्रा में सब , खासकर महिलाएं उनकी बातों से प्रभावित होती , लोग प्रतिदिन पैसे जमा करना भी शुरू कर देते , पर महीने के अंत में जबतक एजेंट उनके पास पहुंचता , बचाए धन का कुछ हिस्‍सा खर्च हो जाया करता था। इससे जहां एक एक पैसे जमा करने वाले लोगों को भी तकलीफ होती ही थी , एजेंट का भी सारा मेहनत व्‍यर्थ हो रहा था। आखिर कुछ कमीशन न बचे , तो वो अपनी रोजी रोटी की समस्‍या कैसे हल कर सकता था ?

पर छोटी छोटी बात में भी मौलिक सोंच के सहारे कोई व्‍यक्ति आगे बढ सकता है , कुछ दिनों के चिंतन मनन के बाद उसने एक हल निकाल ही लिया। वह एक बढई के यहां गया, उसने सौ दो सौ बक्‍से बनवाए, सभी बक्‍सों के ऊपर रूपए डालने के लिए एक लंबा छिद्र करवाया। बाजार से छोटे छोटे सौ दो सौ ताले खरीदे, सभी बक्‍सों में ताला लगाया । सबको उठाया और गांव से लेकर शहर तक पैसे जमा करने के उत्‍सुक लोगों में से प्रत्‍येक के घर में एक एक बक्‍से रख दिए और सभी चाबियों में उस महिला या पुरूष का नाम लिखकर अपने बैग में रख लिया। 

ऐसी स्थिति में पुरूष या महिला द्वारा उस बक्‍से में पैसे तो डाले सकते थे , पर किसी मुसीबत में भी उसे नहीं निकाला जा सकता था और महीने भर किसी दूसरे विकल्‍प के सहारे ही काम चलाने को बाध्‍य होना पडता था।इस तरह सारी समस्‍या हल हो चुकी थी , महीने के अंत में वह उस बक्‍से को खोलकर जरूरत भर पैसे निकाल लेता और पुन: ताला बंद कर उसे वहीं छोड दिया करता था। जहां लोगों के पैसे बच रहे थे, वहीं उसकी रोजी रोटी की समस्‍या भी हल हो चुकी थी। इस सोंच को आप क्‍या कहेंगे ??

क्‍या सचमुच हमारे सोने के चेन में उस व्‍यक्ति का हिस्‍सा था ??

कभी कभी जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं अवश्‍य घट जाती हैं , जिसे संयोग या दुर्योग का पर्याय कहते हुए हम भले ही उपेक्षित छोड दें , पर हमारे मन मस्तिष्‍क को झकझोर ही देती है। आध्‍यात्‍म को मानने वाले इस बात को समझ सकते हैं कि निश्चित परिस्थितियों और निश्चित सीमाओं में ही रहकर व्‍यक्ति अपने जीवन जीने को बाध्‍य हैं और जो भी अधिक या कम प्राप्‍त करता है , उसमें प्रकृति का सहयोग या असहयोग स्‍पष्‍टत: झलकता है। 

इसी वर्ष 8 फरवरी को मैने क्‍या प्रकृति में लेने और देने का परस्‍पर संबंध होता है ?? नामक एक पोस्‍ट किया था , जिसमें लिखा था कि अनजाने में किस प्रकार मैने एक अपरिचित महिला का आतिथ्‍य करने के दो महीने बाद उसे उसी के घर जाकर वसूल लिया था इसी प्रकार की एक और घटना मेरे जीवन में घट चुकी है , जिससे मेरी समझ में एक बात आ गयी है कि इस प्रकृति में सबों को हिस्‍सा तय है और वह हर व्‍यक्ति प्राप्‍त कर ही लेता है।

बात मेरे बचपन की है , जब गांव गांव में सोने चांदी की सफाई करनेवाले एक व्‍यक्ति ने मेरे घर में दस्‍तक दी। मम्‍मी के द्वारा दरवाजा खोलते ही उसने सोने और चांदी को साफ कर बिल्‍कुल नया कर देने का दावा किया। सोने के गहने तो महिलाएं किसी अनजान को नहीं सौंपती , पर चांदी में ऐसा कोई बडा रिस्‍क नहीं होता। मम्‍मी मेरी दो वर्ष की छोटी बहन के पैरों की गंदी पायल को साफ करवाने का लालच न रोक पायी। 

उसकी मजदूरी देकर मम्‍मी तो उसे वापस लौटाने की कोशिश कर रही थी , पर उसकी नजर तो मम्‍मी के गले में पडी सोने की चेन पर थी। उसने मम्‍मी को कहा कि दो मिनट में आपकी चेन भी बिल्‍कुल नई हो जाएगी। मम्‍मी काफी देर तक 'ना' 'ना' करती रही , पर उसके बहुत जिद करने पर कि चुटकियों में वह उनकी चेन को साफ कर देगा , थोडे लालच में पड गयी। दरअसल एक दो दिनों में उन्‍हें एक विवाह के सिलसिले में बाहर भी जाना था , वह भी एक वजह बन गयी।

पर उस व्‍यक्ति की मंशा तो कुछ और थी, हाथ में चेन मिलते ही उसने सफाई के क्रम में चेन को ऐसी प्रक्रियाओं से गुजारा कि दो मिनट की जगह मम्‍मी को दस मिनट इंतजार करना पडा। उसके बाद चेन का वजन काफी हल्‍का हो गया था , मम्‍मी ने हाथ में लेते ही ऐसा महसूस किया। मम्‍मी के हल्‍ला मचाने पर वह भागनेवाला ही था कि गांव के कुछ लोगों ने उसे घेर लिया। 

अपने को मुसीबत में घिरा पाकर उसने अपनी गल्‍ती स्‍वीकार की और अपने अम्‍ल के घोल में से सोना निकालकर वापस करने का वादा किया। उसने कई ईंट को जोडकर चूल्‍हा बनाया , एक कटोरे में कुछ रखकर उसे काफी देर खौलाता रहा और उसके बाद 8 ग्राम के लगभग सोने का एक चमकता टुकडा निकालकर वापस लौटाया। उसके बाद थाने और पुलिस की धमकी दे रहे सारे गांव के लोगों ने उसपर रहम खाते हुए उसे माफ करते हुए इस शर्त के साथ वापस भेज दिया कि अब वो ऐसा काम नहीं करेगा , क्‍यूंकि इस प्रकार लोगों को धोखा देने से कभी भी वह विपत्ति में पड सकता है।

काफी दिनों बाद हमलोग उस बात को भूल ही गए थे। मेरे विवाह के वक्‍त मेरी मम्‍मी ने उस टुकडे को निकाला और मेरी चेन में उसे मिला दिया। विवाह के बाद मैं उसे हमेशा पहनने लगी। एक दिन हमलोग घर में अकेले थे कि सोने और चांदी की सफाई करने का पाऊडर बेचता हुआ एक लडका आया। सफाई के मामलों में अधिक रूचि रखने वाले , इस प्रकार के हर प्रोडक्‍ट में दिलचस्‍पी रखनेवाले मेरे पति बरामदे में ही बैठे थे। इन्‍होने उसे बिठा लिया और उसके प्रोडक्‍ट को देखने लगे। बातचीत की आवाज सुनकर मैं भी बरामदे में आयी , तो इन्‍होने मेरा पायल मांगा। उसे देखते ही मुझे पुरानी बातें याद आ गयी , मैने इन्‍हें चुपचाप बुलाकर सारी बातें बतायी , पर इन्‍होने मुझसे पायल ले ही लिया।एक मिनट में उसने पायल को चमका दिया , जिसे देखकर ये काफी खुश हुए।

जैसे ही मैं अंदर से बाहर आयी , इन्‍होने मुझसे चेन मांगा ,मै 'ना' 'ना' कहती रही , पर इन्‍होने कहा कि वे खुद अपने हाथों से उसके इंस्‍ट्रक्‍शन के अनुसार सफाई करेंगे। मुझे चिंति‍त होने की कोई आवश्‍यकता नहीं। इनपर विश्‍वास करके मैने अपना चेन उतारकर दे दिया। वह लडका मेरे को अच्‍छी तरह समझ चुका था , इसलिए  मुझे व्‍यस्‍त करने का एक तरीका ढूंढ निकाला था , बार बार मुझसे कुछ न कुछ मांगता , एक छोटा बरतन , थोडा सा पानी या कुछ और चीज। और इसी क्रम में वह इनके हाथ से चेन ले चुका था। फटाफट उसने क्‍या क्‍या करके मेरे चेन को भी हल्‍का कर दिया। 

मैने हाथ में लेकर इस बात का अंदाजा करने की कोशिश की , पर जबतक समझती और इन्‍हें समझाती , वह रफूचक्‍कर हो चुका था। इन्‍होने तुरंत स्‍कूटर स्‍टार्ट कर पूरे शहर को छान मारा , पर वो कहीं भी दिखाई नहीं दिया। न तो इस घटना से पहले या उसके बाद आजतक कभी भी मेरे पति किसी भी ठगी के शिकार हुए हैं। उसी चेन का कुछ हिस्‍सा , जो मेरी मम्‍मी से नहीं छीना जा सका था , वही अंश मेरे द्वारा वसूल कर लिया गया था । सोचने को बहुत कुछ मजबूर कर देती है ये घटना , क्‍या सचमुच हमारे चेन में उसका हिस्‍सा था ?

आप सबों को नए विक्रमी संवत् की ढेर सारी शुभकामनाएं !!

पिछले कई दिनो से मैं इस ब्‍लॉग को अपडेट नहीं कर पायी , गत्‍यात्‍मक चिंतन पर मेरा चिंतन जरूर चल रहा था। उसमें लिखे पहली पोस्‍ट पर , हमारे विवाह की वर्षगांठ पर लिखी गयी दूसरी पोस्‍ट पर  और पाबला जी की पोस्‍ट पर आप सबों की ढेर सारी शुभकामनाएं मिली , जिसके लिए मैं आप सबों का आभार व्‍यक्‍त करती हूं। उम्‍मीद करती हूं , आगे भी आप सबों का ऐसा ही स्‍नेह बना रहेगा। 

आज अंग्रेजी कैलेण्‍डर के अनुसार काम करने की हमारी आदत हो गयी है। हिंदी तिथियों और महीनों का नाम भी हममे से बहुत लोग जानते नहीं होंगे। हमारे हिंदी कैलेण्‍डर का वर्ष संवत्‍सर कहलाता है। संवत्सर का अर्थ होता है ..  12 महीनों का समूह। इस संवत्‍सर के अनुसार ही हमारी काल गणना होती है। विक्रमी संवत के अनुसार, नव वर्ष की शुरुआत चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की पहली तारीख से होती है । धार्मिक अनुष्ठानों, मांगलिक कार्यो आदि में तिथियों का निर्धारण विक्रम संवत के अनुसार होता है। जहां अंग्रेजी कैलेण्‍डर में किसी तारीख से सिर्फ सूर्य की स्थिति का पता चलता है , हमारा अपना कैलेण्‍डर इसके साथ चंद्रमा की भी जानकारी देता है। इस तरह विक्रमी संवत अधिक वैज्ञानिक है। कहा जाता है कि विदेशियों के शासनकाल में इसे समाप्‍त कर दिया गया था , फिर से  विक्रम संवत की शुरुआत महाराजा विक्रमादित्य ने की थी। 

ब्रह्म पुराण के अनुसार, चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा तारीख से ही सृष्टि का आरंभ हुआ है। शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही चंद्र की कला का प्रथम दिवस है। अतः इसे छोड़कर किसी अन्य दिवस को वर्षारंभ मानना उचित नहीं है।संवत्सर शुक्ल से ही आरंभ माना जाता है क्योंकि कृष्ण के आरंभ में मलमास आने की संभावना रहती है जबकि शुक्ल में नहीं। विक्रम संवत की चैत्र शुक्ल की पहली तिथि से न केवल नवरात्रि में दुर्गा व्रत-पूजन का आरंभ होता है, बल्कि राजा रामचंद्र का राज्याभिषेक, युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, सिख परंपरा के द्वितीय गुरु अंगद देव का जन्म, आर्य समाज की स्थापना, महान नेता डॉ. केशव बलिरामका जन्म भी इसी दिन हुआ था। साथ ही, आर्य समाज की स्थापना भी इसी दिन हुई थी।

16 मार्च 2010 को चैत्र मास के शुक्‍ल पक्ष के आरंभ के साथ ही विक्रम संवत् 2067 का आरंभ होगा। कई प्रदेशों में इस दिन का स्वागत कड़वे घूँट से किया जाता है। सबसे पहले नीम का रस पिया जाता है। इस मौसम में नीम में फूल भी आते है और कोमल पत्ते भी आते है। कुछ लोग इसके कोमल पत्ते चबाते भी है। यह तो सभी जानते है कि नीम एक अच्छी औषधि है। नीम की पत्तियों और फूलों का रस पीने से रक्त शुद्ध होता है और त्वचा के रोग नहीं होते। पहले ही दिन कड़वा घूँट पीने का अर्थ है कि जीवन सिर्फ़ मीठा ही नहीं है अनेक कड़वे अनुभव भी होते है जिन्हें झेलने के लिए हमें तैयार रहना है। इस तरह हम मानसिक रूप से दुःखों का सामना करने के लिए तैयार रहेंगें और नीम का रस पीकर हम निरोग भी रहेंगें।

 भारत के कई राज्‍यों में नए वर्ष का स्‍वागत करते हुए उत्‍सव मनाया जाता है। यह दिन जम्मू-कश्मीर में नवरेह,पंजाब में वैशाखी, महाराष्ट्र में गुडीपडवा, सिंधी में चेतीचंड,केरल में विशु,असम में रोंगलीबिहूआदि के रूप में मनाया जाता है। आंध्र में यह पर्व उगादिनाम से मनाया जाता है। सिंधु प्रांत में नवसंवतको चेटीचंडो[चैत्र का चांद] नाम से पुकारा जाता है। सिंधी समाज इस दिन को बडे हर्ष और उल्लास के साथ उत्सव के रूप में मनाता है। इस दिन हम ईश्वर से यह प्रार्थना करते हैं कि नव वर्ष हर प्रकार से हमारे लिए कल्याणकारी हो। नया वर्ष आपके लिए बहुत खुशियां , बहुत सफलता से संयुक्‍त करे , आप सबों को नववर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएं !!

मेरे जीवन साथी के बारे में कुछ जानकारी

मेरे जीवन साथी के बारे में कुछ जानकारी


हमारे विवाह के समय के माहौल के बारे में कल ही आपको काफी जानकारी मिल चुकी , 1988 के 12 मार्च को हमारे विवाह के बाद 13 मार्च से शुरू हुई इस यात्रा के आज 22 वर्ष पूरे होने को हैं। इस अंतराल में हम दोनो पति पत्‍नी या हमारे दोनो बेटों के स्‍वास्‍थ्‍य या अन्‍य मामले में बिल्‍कुल सहज सुखद वातावरण बने होने के बावजूद विवाह के उपरांत के 10 वर्षों तक संयुक्‍त परिवार की कई तरह की समस्‍याओं और 12 वर्षों से बच्‍चों की बेहतर पढाई लिखाई के चक्‍कर में हम दोनो एक दूसरे को बहुत कम समय दे सके। यहां तक कि आरंभ के कई वर्षों तक विवाह की वर्षगांठ तक में भी हमलोग साथ साथ नहीं रह पाएं। पहले वर्ष ससुर जी का कलकत्‍ते में ऑपरेशन हो रहा था तो दूसरे , तीसरे वर्ष में भी ठीक इसी दिन कोई न कोई समस्‍या आती जाती रही। इसलिए आजतक फिर कभी भी इस दिन को सेलीब्रेट करने का कोई प्रोग्राम नहीं बनाया।

पर ईश्‍वर की दया है कि दूरी बने होने के बावजूद अभी तक आपसी समझ में थोडी भी कमी नहीं आयी। दूसरों के प्रति पापाजी का जो व्‍यवहार यानि पापाजी का जो रूप मैने बचपन से देखा , उनके जिन विचारों का मुझपर अधिक प्रभाव पडा , लगभग वही इनके व्‍यक्तित्‍व में भी देखने को मिला , इसलिए कभी भी मुझे सामंजस्‍य करने में कठिनाई नहीं आयी । यही कारण रहा होगा कि मेरे व्‍यवहार से इन्‍हें भी कभी कोई तकलीफ नहीं पहुंची। हम बडों को सम्‍मान देते हुए संयुक्‍त परिवार के सभी सदस्‍यों की जरूरतों का ख्‍याल करते हुए एक दूसरे के विचारों और भावनाओं की कद्र करते आए हैं। पर मेरे सबसे बडे आलोचक भी यही है और इसे सकारात्‍मक तौर पर लने से इसका मुझे बहुत अधिक फायदा मिला है।

विज्ञान के विद्यार्थी होने के कारण इन्‍हें पहले ज्‍योतिष पर बिल्‍कुल विश्‍वास नहीं था , पर तुरंत बाद हमारे वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझने के बाद इसमें रूचि लेने लगे । वैसे तो घर के अंदर की सारी जबाबदेही के साथ बच्‍चों की पढाई लिखाई से संबंधित मामलों को भी मैं खुद संभालती आयी हूं , पर मुझे अध्‍ययन मनन का पूरा समय मिल पाए, इसलिए बाहर की अधिकांश जिम्‍मेदारियां वे खुद ही संभालते आए हैं । परिवार के मामलों में निर्णय लेने में व्‍यावहारिक ज्ञान की इनमें कमी नहीं , पर ज्‍योतिष की जानकारी के कारण मेरी राय अब उनसे कम मायने नहीं रखने लगी है।

और हमारी नोक झोंक , वह बस घर के साफ सफाई के मुद्दे पर हो जाती रही है , पर यदि आप समझ रहे हों कि घर को साफ सुथरा बनाए रखने की मेरी कोशिश में वो बाधा डालते होंगे , तो आप गलतफहमी में हैं , दरअसल घर को साफ सुथरा बनाए रखने में ये महिलाओं से कई कदम आगे हैं। पिछले बारह वर्षों से बच्‍चों की पढाई के लिए हमलोगों को बोकारो स्‍टील सिटी में छोडकर खुद अकेले ही निवास कर रहे हैं , कभी इनके निवास स्‍थान पर जाकर तो देखिए , आपको 'बिन घरनी घर भूत का डेरा' कहावत को एक सिरे से नकारना पडेगा।

पर मेरी रूटीन में घर की सफाई का कुछ काम दिन भर में एक बार , कुछ सप्‍ताह भर में एक बार , कुछ महीने में एक बार और कुछ वर्ष में एक बार का होता है , अब 23वें घंटे , 6ठे दिन या 29वें दिन या 364वें दिन घर को अस्‍त व्‍यस्‍त देखकर ये नाराज हो जाएं या मुझे भला बुरा भी कह जाएं तो इसमें मेरी क्‍या गलती ? इसलिए मैने इनके दस से पंद्रह मिनट की इस नाराजगी या गुस्‍से की न तो कभी परवाह की और न ही आज तक अपने को सुधारा। 

'जिसे जितना दिमाग है , वह उतना ही सोंचेगा , करेगा या कहेगा। तुम्‍हारा जितना दिमाग है , तुम उतना सोंचो , करो और कहो। दूसरों से अपेक्षा न रखो , तो कभी तकलीफ नहीं होगी। तबतक तनाव न लो, जबतक तुम्‍हें अपने स्‍वभाव के विपरीत काम करने को मजबूर न कर दिया जाए' मुझे संयुक्‍त परिवार में समायोजन के योग्‍य बनाने में इन्‍हीं का दिया यह उपदेश कारगर था , जिसपर अमल करते हुए गडबड से गडबड परिस्थिति में मैं बिल्‍कुल सामान्‍य रह पाती हूं , जिसका पालन ये खुद नहीं कर पाते।

विवाह के 22 वर्षों बाद बोकारो स्‍टील सिटी में दोनो बेटों की पढाई के समाप्‍त होने के बाद ईश्‍वर ने फिर से मुझे एक नए मोड पर खडा कर दिया है , जहां से आगे की यात्रा करने में हमें एक बार फिर से कोई बडा निर्णय लेना है , हमारे निर्णय से आगे की जीवन यात्रा भी सुखद और सफल हो , इसके लिए आज बोकारो स्‍टील सिटी के भगवान जगन्‍नाथ जी के मंदिर में भगवान के दर्शन और पूजन को गयी , बेटे के मोबाइल कैमरे से खींचे गए वहां के चित्र  देखिए     ....

हमारे विवाह तय करने में थाने के वायरलेस को भी काम करना पडा था !!

प्रतिवर्ष फरवरी की समाप्ति के बाद मार्च के शुरूआत होते ही शनै: शनै: ठंढ की कमी और गर्मी के अहसास से जैसे जैसे कुछ सुस्‍ती सी छाने लगती है , वैसे वैसे मेरा मन मस्तिष्‍क 1988 की खास पुरानी यादों से गुजरने लगता है। नौकरी छोडकर गांव लौटकर दादाजी के व्‍यवसाय को संभालने का निर्णय ले चुके पापाजी के कारण ग्रामीण परिवेश में जीवन जीने को मजबूर मेरी मम्‍मी अपनी जीवनशैली को लेकर जितनी दुखी नहीं थी , उतना हम भाई बहनों के कैरियर और शादी विवाह के बारे में सोंचकर थी। एक वर्ष पहले अर्थशास्‍त्र में एम ए करने के बाद लेक्‍चररशिप की वैकेंसी के इंतजार में मैं घर पर अविवाहित बैठी थी , जो मेरी मम्‍मी के लिए काफी चिंता का विषय था और पापाजी 'अजगर करे ना चाकरी , पंक्षी करे न काम , दास मलूका कह गए , सबके दाता राम' की तर्ज पर आराम से घर में बैठे होते थे। 

भले ही एक ज्‍योतिषी के रूप में उनका मानना था कि हमें अपने कर्म और विचार अच्‍छे रखने चाहिए , इस दुनिया में सभी मनुष्‍यों के समक्ष खास प्रकार की परिस्थिति स्‍वयमेव उपस्थित होती है , जिसमें हम 'हां' या 'ना' करने को मजबूर होते हैं और अच्‍छे या बुरे ढंग से हमारा काम बन या बिगड जाता है , पर अपने संतान के प्रति मोह से वे वंचित नहीं हो सके थे और अपने पास आनेवाले हर लडके की जन्‍मकुंडली में कोई न कोई दोष निकाल कर बात को आगे बढने नहीं दे पाते थे।

एक दिन मम्‍मी के बहुत जिद करने पर हमारे गांव से 30 किलोमीटर दूर डी वी सी के पावर प्‍लांट में अच्‍छी नौकरी कर रहे एक लडके का पता मिलते ही पापाजी वहां पहुंच गए। हमारे गांव के एक दारोगा जी का स्‍थानांतरण दो चार महीने पूर्व वहीं हुआ था , पापाजी आराम से थाना पहुंचे , वहां अपने पहुंचने का प्रयोजन बताया। जैसे ही लडके के बडे भाई के पते पर दारोगा जी की निगाह गयी वो चौंके। यह पता तो उनके पडोसी का था , व्‍यस्‍तता के कारण उनका तो पडोसियों से संपर्क नहीं था , पर उनकी पत्‍नी का उनके यहां आना जाना था। 

दारोगा जी ने जानकारी लेने के लिए तुरंत घर पर फोन लगाया । उनकी पत्‍नी को आश्‍चर्य हुआ , फोन पर ही पूछ बैठी , 'एक ज्‍योतिषी होकर पूस के महीने में विवाह की बात तय करने आए हैं ?' तब पिताजी ने उन्‍हें समझाया कि पूस के महीने में यानि 15 दिसंबर से 15 जनवरी के मध्‍य ग्रहों की कोई भी ऐसी बुरी स्थिति नहीं होती कि विवाह से कोई अनिष्‍ट हो जाए। वास्‍तव में उन दिनों में खलिहानों में खरीफ की फसल को संभालने में लगे गृहस्‍थ वैवाहिक कार्यक्रमों को नहीं रखा करते थे। फिर भी परंपरा को मानते हुए पूस महीने में कोई वैवाहिक रस्‍म नहीं भी की जा सकती है , पर किसी व्‍यक्ति या परिवार का परिचय लेने देने या बातचीत में पूस महीने पर विचार की क्‍या आवश्‍यकता ?'

एक समस्‍या और उनके सामने थी , आजतक वे अपने पडोसियों को राजपूत समझती आ रही थी,  अभिभावको द्वारा तय किए जानेवाले विवाह में तो जाति का महत्‍व होता ही है , उन्‍होने दूसरा सवाल दागा, 'पर वे तो खत्री नहीं , राजपूत हैं' अब चौंकने की बारी पापाजी की थी। बिहार में खत्रियों की नाम मात्र की संख्‍या के कारण 'खत्री' के नाम से अधिकांश लोग अपरिचित हैं और हमें राजपूत ही मानते हें। पर भले ही 'क्षत्री' और 'खत्री' को मात्र उच्‍चारण के आधार पर अलग अलग माना गया हो , पर अभी तक हमलोगों का आपस में वैवाहिक संबंध नहीं होता है। 

खैर , थोडी ही देर बाद बातचीत में साफ हो गया कि वे खत्री ही हैं और पूस के महीने में भी वैवाहिक मामलों की बातचीत करने में उन्‍हें कोई ऐतराज नहीं है। सिर्फ मम्‍मी के कडे रूख के कारण ही नहीं , पापाजी ने भी इस बार सोंच लिया था कि कि वो लडके की जन्‍मकुंडली मांगकर अपने सम्‍मुख आए इस विकल्‍प को समाप्‍त नहीं करेंगे। मेरे ससुराल वाले भी कुंडली मिलान पर विश्‍वास नहीं रखते थे , इसलिए उन्‍होने भी मेरी जन्‍मकुंडली नहीं मांगी। बिहार में पांव पसारी 'दहेज' की भीषण समस्‍या भी तबतक 'खत्री परिवारों'  पर नहीं हावी हुई थी। इसलिए मात्र सबसे मिलजुल कर आपस में परिचय का आदान प्रदान कर पापाजी वापस चले आए।

एक महीने बाद 8 फरवरी 1988 को मुझसे 3 महीने छोटी ममेरी बहन का विवाह होते देख मम्‍मी मेरे विवाह के लिए  काफी गंभीर हो गयी थी। पर दारोगा जी के बारंबार तकाजा किए जाने के बावजूद अपने पिताजी के स्‍वास्‍थ्‍य में आई गडबडी की वजह से लडकेवाले बात आगे नहीं बढा पा रहे थे। 15 फरवरी तक कहीं भी कोई बात बनती नहीं दिखाई देने से मम्‍मी काफी चिंतित थी , पर उसके बाद दारोगा जी के माध्‍यम से सकारात्‍मक खबरों के आने सिलसिला बनता गया। उस वक्‍त फोन की सुविधा तो नहीं थी , दोनो थानों के वायरलेस के माध्‍यम से संवादों का आदान प्रदान हुआ और सारे कार्यक्रम बनते चले गए। 

बहुत जल्‍द दोनो परिवारों का आपस में मेल मिलाप हुआ और मात्र एक पखवारे के बाद 1 मार्च को सारी बातें तय होने के बाद लडके को टीका लगाकर सबलोग वहां से इस सूचना के साथ वापस आए कि 2 मार्च को मेरा सगुन और 12 मार्च को हमारी शादी होनी पक्‍की हो गयी है। मेरे ससुरालवालों की तो इच्‍छा थी कि विवाह जून में हो , पर मेरी एक दीदी की जून में हुई शादी के समय के भयानक रूप से आए आंधी, तूफान और बारिश से भयाक्रांत मेरे पापाजी इस बात के लिए बिल्‍कुल तैयार नहीं थे , पिताजी के बिगडते स्‍वास्‍थ्‍य को देखते हुए मेरे ससुराल वाले भी नहीं चाहते थे कि शादी नवम्‍बर में हो और इस तरह बिल्‍कुल निकट की तिथि तय हो गयी थी। दूसरे ही दिन 2 मार्च की शाम को मेरा सगुन हुआ। 

पर उसके बाद के बचे 9 दिनों में से दो दिन रविवार , एक दिन होली की छुट्टी , मतलब सिर्फ 6 दिन में सारी व्‍यवस्‍था , किस छोर से आरंभ किया जाए और कहां से अंत हो , किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। दो तीन दिन तो बैंक ही बंद थे , पैसे निकले तब तो कुछ काम हो। मैं पहली संतान थी , सो मेरे विवाह में कहीं कोई कमी भी नहीं होनी चाहिए थी । 

आखिरकार सारी व्‍यवस्‍था हो ही गयी , जल्‍दी जल्‍दी आवश्‍यक हर चीज की बुकिंग करने के बाद सबसे पहले कार्ड की स्‍केचिंग हुई , प्रिंट निकला और गांव में होली की छुट्टी के दौरान अलग अलग क्षेत्र से आए लोगों के माध्‍यम से अलग अलग क्षेत्र के कार्ड उसी क्षेत्र के पोस्‍ट ऑफिस में डाले गए , जिससे दो ही दिनो में कार्ड सबो को मिल गया और कोई भी रिश्‍तेदार और मित्र  न तो निमंत्रण से वंचित रहे और न ही विवाह में सम्मिलित होने से। चूंकि गांव का माहौल था , कार्यकर्ताओं की कमी नहीं थी ,  सो बाद के कार्य का बंटवारा भी सबके मध्‍य कर दिया गया और सबने अपने अपने कर्तब्‍यों का बखूबी पालन किया और दस दिनों के अंदर सारी तैयारियां पूरी हो गयी।

लेकिन असली समस्‍या तो हम दोनो वर वधू के समक्ष आ गयी थी , जहां मेरे ससुराल में अपने घर के अकेले कार्यकर्ता ये अपने विवाह के लिए बाजार और अन्‍य तैयारियों में ही अपने स्‍वास्‍थ्‍य की चिंता किए वगैर अनियमित खान पान के साथ एक सप्‍ताह तक  दौड धूप करते रहे , वही विवाह की भीड के कारण टेलरों ने मेरी सभी चचेरी ममेरी फुफेरी बहनों और भाभियों के कपडे सिलने से इंकार कर दिया था और मैं अपने रख रखाव की चिंता किए वगैर विवाह के शाम शाम तक उनके सूट और लहंगे सिलती रही थी। फिर भी बिना किसी बाधा के , बिल्‍कुल उत्‍सवी माहौल में 12 मार्च 1988 को विवाह कार्यक्रम संपन्‍न हो ही गया था और 13 मार्च को हम साथ साथ  एक नए सफर पर निकल पडे थे.............

पर पहले दिन का सफर ही झंझट से भरा था , हमारी विदाई सुबह 9 बजे हो गयी , थोडी ही देर में सारे बराती और घरवाले पहुंचकर हमारा इंतजार कर रहे थे और बीच जंगल में गाडी के खराब होने की वजह से हमलोग मात्र 30 किलोमीटर की यात्रा 10 घंटे में तय करते हुए 7 बजे शाम को ही वहां पहंच पाए थे। उसके बाद खट्टे मीठे अनुभवों के साथ 22 वर्षो से जारी है ये सफर , शायद कल इस बारे में आप सबों को विस्‍तार से जानकारी दे पाऊं !!

मेरे ब्‍लॉग पर पाठकों की संख्‍या 50,000 पहुंची

अगस्‍त 2007 में मुझे जब हिंदी में ब्‍लागिंग करने के बारे में जानकारी मिली थी , तो मैने इस दिशा में कदम बढा ही दिया था। जीमेल में मेरा अकाउंट नहीं था , इंटरनेट के बारे में आधी अधूरी जानकारी थी , फिर भी वर्डप्रेस पर नियमित रूप से लिखना तो शुरू कर दिया था , पर फिर भी ज्‍योतिष के प्रति अपने दृष्टिकोण के प्रचार प्रसार के लिए एक बडे माध्‍यम के रूप में इसे मन ही मन स्‍वीकार नहीं कर सकी थी। लेकिन हिंदी चिट्ठा के विभिन्‍न एग्रीगेटरों का शुक्रिया अदा करना चाहूंगी , जिनके फलस्‍वरूप एक वर्ष में ही स्‍टेट काउंटर ने पाठकों की संख्‍या को 25000 दिखलाना शुरू कर दिया था। हालांकि उसके बाद मैने वर्डप्रेस को छोडकर ब्‍लॉगस्‍पॉट पर लिखना शुरू किया , फिर भी सर्च इंजिन की सहायता से उसमें पाठक आते रहें और कुछ दिन पूर्व आंकडा 50000 को पार करते हुए आज 69100 तक पहुंच चुका है। जिस चिट्ठे पर पिछले डेढ वर्षों से कुछ भी न लिखा जाए , उसमें पाठकों की संख्‍या की बढोत्‍तरी को इंटरनेट में हिंदी के बढते पाठकों की संख्‍या से ही जोडा जा सकता है।

वर्डप्रेस पर काम करने में मुझे कोई कमजारी महसूस हुई या फिर नए नए प्रयोग करते रहने की आदत से लाचार होकर मैने ब्‍लॉग स्‍पॉट पर अकाउंट बनाया , यह तो मुझे अब याद भी नहीं , पर इसमें आने के बाद  मुझे अपेक्षाकृत अच्‍छा लगा , हालांकि वर्डप्रेस की तुलना में सर्च इंजिन से ब्‍लॉग स्‍पॉट पर पाठक कम आते हैं , इससे इंकार नहीं किया जा सकता। पर ब्‍लॉगस्‍पॉट पर मेरी नियमितता और हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडे लेखकों के कारण मैने यहां भी एक मुकाम हासिल कर लिया है । कल इस ब्‍लॉग पर भी पाठकों की संख्‍या 50,000 पार कर चुकी है। अब दोनो ब्‍लॉग को मिला दिया जाए , तो 69100 + 50000 यानि  मेरे द्वारा लिखे  1,19,100 पृष्‍ठ उल्‍टे जा चुके हैं , जिसके कारण अपने ब्‍लॉग लेखन को ज्‍योतिष के प्रति अपने दृष्टिकोण को प्रसारित करने के लिए एक माध्‍यम मानने से अब इंकार नहीं कर सकती। इसके साथ ही साथ मेरे ब्‍लॉगर प्रोफाइल को भी अबतक 20,000 लोगों ने विजिट किया है। जिस लेखक के इतने पृष्‍ठ उल्‍टे जा चुके हों , उसके विचारों का पाठकों पर कोई प्रभाव न पडा हो , यह तो नहीं माना जा सकता। इस तरह सामाजिक और ज्‍योतिषिय भ्रांतियों को दूर करने में कुछ कामयाबी तो मुझे मिल ही गयी है। पर अभी बहुत लंबा सफर बाकी है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

ब्‍लॉग जगत से जुडने के बाद मैने लगातार लेखन किया है , पुराने ब्‍लॉग में एक वर्षों तक नियमित पोस्‍ट करने के बाद इधर के डेढ वर्षों में ही अपने इस ब्‍लॉग पर 300 से अधिक पोस्‍ट डाल चुकी हूं ,  नॉल में भी मै पूरे 100 पोस्‍ट किया है। इसके अतिरिक्‍त हमारा खत्री समाज में 85 पोस्‍ट और गत्‍यात्‍मक चिंतन में 53 पोस्‍ट है। हिंदी विकीपीडिया को मैं अब तक सहयोग नहीं कर पायी , इसका मुझे दुख है। 

सिर्फ लेखन में ही मैने हिंदी ब्‍लॉग जगत को अपना योगदान नहीं दिया है , मैं नियमित तौर पर हिंदी ब्‍लॉगरों के आलेख पढती और उनमें टिप्‍पणियां भी करती हूं , नए ब्‍लॉगरों का स्‍वागत करने में भी मैं पीछे नहीं रहती । यही कारण है कि आशीष खंडेलवाल जी के आलेख में दिए गए इंस्‍ट्रक्‍शन के द्वारा अपने द्वारा की गयी टिप्‍पणियां गिनने की कोशिश की , तो इस संख्‍या पर मैं खुद भी विश्‍वास नहीं कर सकी। मैने गूगल सर्च में "संगीता पुरी said" कीवर्ड डाला , तो मुझे 56,100 परिणाम मिले , जब सर्च बॉक्‍स में "संगीता पुरी ने कहा" टाइप किया तो यह संख्‍या 21,700 थी। 

इस तरह विभिन्‍न ब्‍लॉगों में मेरे द्वारा 77,800 टिप्‍पणियों की पुष्टि हो चकी है। काफी दिनों से बी एस एन एल बोकारो के नेट की गति काफी कम है , इसलिए मैं पोस्‍टों को पढने के बावजूद टिप्‍पणियां नहीं कर पा रही , नहीं तो यह आंकडा एक लाख पार कर ही जाता। नेट की गति के बढने का इंतजार कर रही हूं, । सप्‍ताह भर से लेखन की गति थोडी धीमी चल रही है , इस पोस्‍ट का मुख्‍य लक्ष्‍य आप सभी पाठकों के प्रति आभार व्‍यक्‍त करना है। आपके सहयोग का ही असर है कि मैं यहां तक की यात्रा कर सकी हूं और लंबी यात्रा के प्रति आश्‍वस्‍त भी हूं !!


भला महिलाएं पुरूषों से अपना अधिकार क्‍यूं मांगे ??

अधिकार और कर्तब्‍यों का आपस में एक दूसरे से अन्‍योनाश्रय संबंध है। चाहे कोई भी स्‍थान हो , कर्तब्‍यों का पालन करने वालों को सारे अधिकार स्‍वयमेव मिल जाते हैं। पर सिर्फ अच्‍छे खाते पीते परिवार की कुछ बेटियों या कुछ प्रतिशत दुलारी बहुओं की बात छोडकर हम समाज के अधिकांश नारियों की बात करें , तो यहां तो बात ही उल्‍टी है , बचपन से बूढे होने तक और मौत को गले लगाने तक ये सारे कर्तब्‍यों का पालन करती हैं , पर फिर भी इन्‍हें अधिकार से वंचित किया जाता रहा है।

 बहुत सारे परिवार और ऑफिसों में महिलाएं शोषण और प्रताडना की शिकार बनीं सबकुछ सहने को बाध्‍य हैं। इनकी स्थिति को सुधारने की कोशिश में स्त्रियां अक्‍सरहा पुरूष वर्ग से अपने अधिकार के लिए गुहार लगाती हैं , जो कि बिल्‍कुल अनुचित है। इस सृष्टि को आगे बढाने में स्‍त्री और पुरूष दोनो की ही बराबर भूमिका है , महिलाओं की खुशी के बिना पुरूष खुश नहीं रह सकते , फिर महिलाओं को अपने को कमजोर समझने की क्‍या आवश्‍यकता ?? उनसे अधिकारों की भीख क्‍यूं मांगने की क्‍या आवश्‍यकता ??

प्राचीन काल में बालिकाओं का विवाह बहुत ही छोटी उम्र में होता था , संयु‍क्‍त परिवार में पालन पोषण होने से कई प्रकार के माहौल से उनका दिलो दिमाग गुजरता था , पर होश संभालते ही ससुराल का माहौल सामने होता था। उनपर अपने मायके का कोई प्रभाव नहीं होता था , सुसराल के माहौल में , चाहे वहां जो भी अच्‍छाइयां हों , जो भी बुराइयां हों , वे आराम से अपना समायोजन कर लिया करती थी। 

पर आज स्थिति बिल्‍कुल भिन्‍न है , एकल परिवारों और देर से विवाह होने के कारण बौद्धिक विकास में मायके का माहौल गहरा असर रखता है , उसे एक सिरे से भुलाया नहीं जा सकता , इस कारण नारी के लचीलेपन में कमी आयी है। अब जहां वह खुद को थोडा परिवर्तित करना चाहती है , तो ससुराल वालों से भी थोडे परिवर्तन की उम्‍मीद रखती है। वो पढी लिखी और समझदार आज के जमाने से कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है , उसकी इस मानसिकता को ससुराल वालों को सहज ढंग से स्‍वीकार करना चाहिए, पर ऐसा नहीं हो पाता। समय के साथ हर क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है , तो भला नारी के रहन सहन , सोंच विचार में परिवर्तन क्‍यूं नहीं होगा ??

आज पति या ससुराल वालों से समायोजन न हो पाने से वैवाहिक संबंधों के टूटने और बिखरने की दर में निरंतर बढोत्‍तरी हो रही है। ऐय्याश और लालची कुछ पतियों को छोड दिया जाए , तो बाकी मामलों में जितना दोष पतियों का नहीं होता , उससे अधिक उन्‍हें बरगलाने वाली नारी शक्ति का ही होता है। यहां तक की दहेज के लिए भी महिलाएं सास और ननदों के सहयोग से भी जलायी जाती हैं। इसके अतिरिक्‍त सिर्फ ससुराल पक्ष की माताजी ,बहनें और भाभियां निरंतर पीडिताओं को जलील करती हैं , पूरे समाज की महिलाएं भी उनके पीछे हाथ धोकर पड जाती हैं। 

इस कारण परित्‍यक्‍ताओं का जीना दूभर हो जाता है और समाज में इस प्रकार की घटनाओं को देखते हुए कोई भी नारी किसी बात का विरोध नहीं कर पाती , इसे अपनी नियति मानते हुए ससुराल में अत्‍याचारों को बर्दाश्‍त करती रहती है , विरोध की बात वह सोंच भी नहीं पाती। इस तरह अपनी बेटियों को पालने में भले ही माता पिता का नजरिया कुछ बदला हो , पर दूसरे की बेटियों के मामले में मानसिकता अभी तक थोडी भी नहीं बदली है। इस महिला दिवस पर महिलाएं प्रण लें कि दूसरों की बेटियों के कष्‍ट को भी अपना समझेंगे , उसे ताने उलाहने न देंगे , कोई महिला प्रताडित की जाए , तो उसके विरूद्ध आवाज उठाएंगे , तो ही महिला दिवस सार्थक हो सकता है। महिलाओं का साथ देकर अपना अधिकार वे स्‍वयं प्राप्‍त कर सकते हैं , भला वो पुरूषों से अपने अधिकार क्‍यूं मांगे ??


अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस पर सबों को शुभकामनाएं !!

हमारा गांव पेटरवार आर्सेलर-मित्‍तल को भी पसंद आया !!

रांची बोकारो मुख्‍य मार्ग पर बोकारो जिले में स्थित हमारा पैतृक गांव पेटरवार सिर्फ इस क्षेत्र के लोगों का ही नहीं ,दूर दराज के बहुत सारे लोगों का भी पसंदीदा रहा है। काफी दिनों से जहां मारवाडियों को व्‍यावसायिक दृष्टि से यह क्षेत्र पसंद आया है, वहीं हमारे गांव से रिटायरमेंट लेनेवाले अनेको सरकारी अधिकारी भी शांतिपूर्वक अवकाशप्राप्‍त जीवन जीने के लिए इसे चुना करते आए हैं। 

यही कारण है कि गांव फैलता जा रहा है और यहां के जमीन का भाव आसमान छूता जा रहा है। अब इसमें एक नया आयाम जुडनेवाला है , पेटरवार ब्‍लॉक का कुछ क्षेत्र आर्सेलर-मित्तल कम्पनी को 12 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का इस्पात संयंत्र लगाने के लिए पसंद आ गया है , ग्रामीणों में भी उन्‍हें सहयोग करने के लिए हरी झंडी दे दी है और वह दिन दूर नहीं, जब यहां कंपनी के द्वारा प्‍लांट का निर्माण कार्य भी शुरू हो जाए। विस्‍तार में यह खबर रांची एक्‍सप्रेस के सौजन्‍य से दी जा रही है ......

झारखंड प्रदेश का बोकारो जिला वास्तव में विकास की नयी बुलंदियों को ओर अग्रसर होता दिख रहा है। इस विकासयात्रा में जल्द ही एक और नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। आर्सेलर-मित्तल कम्पनी जिले के पेटरवार और कसमार में 12 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का इस्पात संयंत्र लगाने जा रही है। इस प्लांट के निर्माण के साथ ही पेटरवार, कसमार और आसपास के क्षेत्रों की दशा-दिशा बदल जायेगी।

 एक ओर जहां क्षेत्र का चतुर्दिक विकास होगा, वहीं मजदूरों के पलायन पर काफी हद तक विराम लग जायेगा। वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रदेश सरकार के साथ हुए एक समझौते के तहत आर्सेलर-मित्तल पेटरवार व कसमार में उक्त परियोजना को मूर्त रूप देने जा रही है। इसके क्रियान्वित होने से पेटरवार एवं कसमार प्रखंड के लुकैया, कोजरम, जरुवाटांड़, पोड़दाग, हसलता, ओरमो, बेमरोटांड़, बेदोटांड़, फुटलाही व आसपास बसे गांवों की तस्वीर बदल जायेगी। 

ग्रामीण भी विकास की इस नयी आस से काफी उत्साहित है। मालूम हो कि आर्सेलर-मित्तल कम्पनी के महाप्रबंधक पीएस प्रसाद ने हाल ही में क्षेत्र के रैयतों के साथ वार्ता की थी, जिसमें उन्होंने रैयतों की शर्तों को मानते हुए प्लांट निर्माण हेतु तत्परता दिखायी थी। इसके अलावा कम्पनी के अधिकारीगण कई बार इलाके का दौरा कर चुके हैं और रैयतों के बीच विस्थापन नीति की पुस्तिका भी वितरित की जा चुकी है। रैयतों ने भी कम्पनी द्वारा जारी प्रपत्रों पर अपनी स्वीकृति कम्पनी को दे दी है। 

अब अगर बिना किसी अड़ंगे के यह परियोजना धरातल पर उतरती है, तो क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी सहित तमाम सुविधाओं की पूर्ण व्यवस्था होगी और विकास की गंगा बहती दिखेगी। क्षेत्र के कुछ रैयतों ने ‘रांची एक्सप्रेस’ से बातचीत के दौरान अपनी सहमति जतायी है। पेटरवार प्रखंड के जरुवाटांड़ निवासी एजाजुल हक, अजहर हुसैन, पेटरवार के पवन महथा, कसमार के बेमरोटांड़ निवासी मुकेश कुमार प्रसाद, लुकैया के हारुण रसीद, बरई ग्राम के महानंद महतो, फुटलाही ग्राम निवासी सदानंद महतो आदि ने खुले दिल से आर्सेलर-मित्तल की उक्त पहल का स्वागत किया है। 

रैयतों ने प्लांट निर्माण के बहुआयामी फायदों की चर्चा करते हुए कहा कि जैसे बोकारो स्टील प्लांट से वहां बसे आसपास के गांवों में विकास हुए, वैसे ही यहां की भी रौनक बदल जायेगी। क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं का विकास तो होगा ही, बेरोजगारी और मजदूरों के पलायन पर भी अंकुश लगेगा। रैयतों का स्पष्ट कहना है कि कम्पनी उन्हें विस्थापित बनाकर सुव्यवस्थित तरीके से बसाये, नियोजन दे और अन्य शर्तों का पालन करे, तो निश्चय ही वह संयंत्रनिर्माण में हरसम्भव सहयोग करेंगे। 

प्लांट लगने से रैयतों को जो क्षति होगी, उसकी समुचित भरपाई जरूरी है। यकीनन रैयतों और प्रबंधन के बीच का मामला किसी दलाली हस्तक्षेप के बिना ही अगर सुलझ जाता है, तो इस क्षेत्र को विकास के मुकाम पर ले जाने से कोई नहीं रोक सकता। प्लांट निर्माण से न केवल पेटरवार, कसमार व बोकारो जिले का, बल्कि राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय फलक पर झारखंड का नाम गौरवान्वित होगा।