यदि आप भविष्‍य को अनिश्चित देखना चाहते हैं .....

ज्‍योतिष के पक्ष्‍ा और विपक्ष में तर्कों की कमी नहीं , पर किसी का यह तर्क देना कि हम भविष्‍य को अनिश्चित ही देखना चाहते हैं , इसलिए ज्‍योतिष के अध्‍ययन की कोई आवश्‍यकता नहीं , सबसे बेकार का तर्क है। यदि आप भविष्‍य को अनिश्चित देखना चाहते हैं  ......

तो फिर दिशाओं का ज्ञान क्‍यूं आवश्‍यक है ??
तो फिर आप कलाई में घडी क्‍यूं लगाते हैं ??
तो फिर आप कैलेण्‍डर का उपयोग क्‍यूं करते हैं ??
तो आप भविष्‍यनिधि में जमा क्‍यूं करते हैं ??
आप विभिन्‍न योजनाओं में निवेश क्‍यूं करते हैं ??
मौसम विज्ञान का विभाग क्‍यूं स्‍थापित किया गया है ??
जीवन में एक स्‍थायी नौकरी या व्‍यवसाय की चाहत क्‍यूं रखते हैं ??
तो आप यात्रा करने से पहले रेलवे की टाइम टेबल क्‍यूं देखते हैं ??
बच्‍चे के उज्‍जवल भविष्‍य के लिए इतनी माथापच्‍ची क्‍यूं करते हैं ??

ये सब आप अपने समय का सदुपयोग कर उससे अधिक से अधिक फायदा उठाने के लिए करते हैं। सच तो यह है कि अस्‍सी प्रतिशत लोगों के पास आज की आवश्‍यकता के लिए सबकुछ होता है, पर वे भविष्‍य के लिए ही मेहनत करते हैं , वे भविष्‍य की अनिश्चितता को लेकर ही परेशान रहते हैं। इसी कारण भविष्‍य को मजबूत कर पाने के लिए मनुष्‍य का प्रयास लगातार जारी है। प्रकृति के हर रहस्‍य की जानकारी से हम कोई कार्य करते वक्‍त भविष्‍य के प्रति आश्‍वस्‍त हो जाते हैं।

जहां बीते हुए इतिहास को जानने के लिए इतने प्रयास किए जा रहे हों तथा आनेवाले भविष्‍य के लिए लोग इतने प्रयत्‍नशील हों , भविष्‍य जानने की कोई विधा को नकारने का कोई औचित्‍य नहीं लगता। यदि भविष्‍य की चिंता न करे , तो मनुष्‍य भी पशु के समान हो जाए। वैसे ज्‍योतिष सिर्फ संकेतों का विज्ञान है और उसके अध्‍ययन से कई रहस्‍यों से पर्दा अवश्‍य उठ सकता है , पर फिर भी भविष्‍य अनिश्चित ही रहेगा , उसे जान पाने के लिए जिस तपस्‍या की आवश्‍यकता है , आज वो संभव नहीं !!

विज्ञान गल्‍प कथाएं

2004 में 19 फरवरी से 21 फरवरी के मध्‍य राष्‍ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला में तृतीय अखिल भारतीय विज्ञान सममेलन हुआ था , जिसमें परंपरागत ज्ञान से संबंधित विषय को भी स्‍वीकार किया गया था। उस सम्‍मेलन के अवसर पर जो स्‍मारिका प्रकाशित हुई थी , उसमें दो तथ्‍यों को मैं आपके सम्‍मुख प्रस्‍तुत कर चुकी हूं। होशंगाबाद के शा गृहविज्ञान महाविद्यालय की छाया शर्मा ने अपने शोधपत्र के माध्‍यम से इस ओर ध्‍यान आकर्षित किया था कि वैदिक साहित्‍य के आख्‍यानों अथवा पौराणिक मिथकों को वस्‍तुत: मात्र चमत्‍कार गाथाएं नहीं मानी जानी चाहिए। वे ऐसी विज्ञानमय परिकल्‍पनाएं हैं , जिसमें अनेकानेक नवीन आविष्‍कारों की अनंत संभावनाएं छिपी हुई है।

इस प्रकार के तथ्‍य के अन्‍वेषण का कारण यह है कि प्राय: देखा जाता है कि विज्ञान का कोई नया आविष्‍कार सामने आते ही उससे मिलती जुलती पौराणिक कथाएं या शास्‍त्राख्‍यानों की तरु सहज ही ध्‍यान आकर्षित होता है और भारतीय मनीषी यह सोंचने लगते हैं कि उदाहरण के लिए डी एन ए के सिद्धांत के विकास के साथ जैसे ही विज्ञान ने इच्छित व्‍यक्ति के क्‍लोन बनाने की ओर कदम बढाए , तारकासुर के वध के लिए शिव के वीर्य से उद्भुत पुत्र की कथा सामने आ गयी। हृदय , किडनी , लीवर जैसे अंगों के प्रत्‍यारोपण की वैज्ञानिक क्षमता की तुलना में अज शिर के प्रत्‍यारोपण , जैी अनेक कथाएं से पौराणिक मिथक भंडार परिपूर्ण है , जहां तक विज्ञान को जाना शेष है। पार्वती द्वारा गणेश का निर्माण और देवताओं द्वारा अत्रि के आंसु से चंद्रमा के निर्माण की कथाएं मानव के लिए चुनौती हैं। वायुशिल्‍प की जिन ऊंचाइयों को रामायण और महाभारत के वर्णन छूते हैं , वहां तक पहुंच पाना हमें दुर्गम लगता है। वायुपुत्र हनुमान की परिकल्‍पना, उसकी समसत गतिविधियों में विज्ञान के बढते चरणों के लक्ष्‍य को नापने लगती है। मानव का पक्षी की तरह आकाश में उड पाने का सपना ही हनुमान का चरित्र है।

यद्यपि अनेक रहस्‍यमयी कथाओं को आध्‍यात्‍मपरक व्‍याख्‍या कर उन्‍हें योग विज्ञान के क्षेत्र में शामिल कर लिया गया है , फिर भी आवश्‍यकता है उन कथानकों के गूढ वैज्ञानिक इंगित को समझा जाए , जो काल के चतुर्थ आयाम को रेखांकित करती है और भविष्‍य से वर्तमान में आए चरित्रों की कथा जान पडती है। विंसेट एच गैडीज ने अपनी विज्ञान गल्‍प की परिभाषा में कहा है कि विज्ञान गल्‍व उन सपनों की अभिव्‍यक्ति है , जो बाद में थोडी संशोधित और संवर्धित होकर वैज्ञानिक उन्‍नति की वास्‍तविकता बन जाती हैं। फेंटेसी या कल्‍पकथा की अपेक्षा विज्ञान गल्‍प अपनी मूल संरचना में ही संभावनाओं को प्रस्‍तुत करता है और कल्‍पनाशील विचारों का वह भंडार तैयार करता है , जो कभी व्‍यवहारिक या प्रायोगिक चिंतन को प्ररित कर सकता है। इस आधार पर वैदिक साहित्‍य के इन आख्‍यानों और पौराणिक मिथकों को विज्ञान गल्‍प कथाएं कहा जा सकता है। रचनात्‍मक अध्‍ययन , अन्‍वेषण और आविष्‍कार के लिए भी इनका अध्‍ययन अत्‍यंत आवश्‍यक है।

दक्षिण: कुक्षौ पुत्रम् जीजनत् ...

कल दिब्‍या श्रीवास्‍तव जी के लेख मनचाही संतान कैसे प्राप्‍त करें के पोस्‍ट होने के बाद से ही ब्‍लॉग जगत में हमारे देश के परंपरागत तकनीकों के विरोध के स्‍वर मुखरित हो रहे हैं। पोस्‍ट के विवादास्‍पद होने का कारण यह विषय नहीं , वरन् इसके लिए आयुर्वेद के महत्‍व को माना जाना है। टिप्‍पणियों में अच्‍छी खासी चर्चा के बाद कई आलेख भी प्रकाशित किए गए हैं और उनमें भी पक्ष और विपक्ष में टिप्‍पणियां आ रही हैं। जिन महत्‍वपूर्ण आधारों पर हमारी परंपरागत जीवनशैली आधारित थी , जिसके कारण सदियों से एक अच्‍छी परंपरा चली आ रही है , उसे इतनी आसानी से अनदेखा नहीं किया जा सकता। आखिर बिना किन्‍हीं सिद्धांतों को परखे जांचे बिना हम किसी बात को सही गलत कैसे कह सकते हैं ??

आज डॉ अजीत गुप्‍ताजी ने गलत नहीं लिखा है।  इस देश को 250 वर्षों तक अंग्रेजों ने बेदर्दी से लूटा और लूटा ही नहीं हमारे सारे उद्योग धंधों को चौपट किया, हमारी शिक्षा पद्धति, चिकित्‍सा पद्धति, न्‍याय व्‍यवस्‍था, पंचायती राज व्‍यस्‍था आदि को आमूल-चूल नष्‍ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्‍होने अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए हमें आपस में ही खूब लडाया , हमारी परंपरा को गलत ठहराया और हममें एक गुलामों वाली मानसिकता विकसित की और इसी का कारण है कि हमें आज परंपरागत चीजें नहीं , सिर्फ आज का चकाचौंध ही अच्‍छा लगता है। लेकिन दिव्‍या जी का प्रश्‍न भी जायज है कि यदि आयुर्वेद का महत्‍व नहीं , तो हल्दी और नीम , सर्पगंधा, शंखपुष्पी, शतावरी, मुस्ली तथा जिस पर भी थोडा सा शोध होता है उसे विज्ञानं पटेंट कर क्‍यूं Allopath के साथ जोड़ देता है ?? आयुर्वेद में शोध से क्या फायदा ? शोध के नतीजे तो पटेंट होने के बाद Allopath का अंग बन जायेंगे। CDRI , Lucknow has patented 'bramhi' and 'Shankhpushpi' in year 2002.America has parented 'Haldi' and ' Neem ' recently.

मुझे याद है 2004 में विज्ञान भवन में एक विज्ञान सम्‍मेलन हुआ था , जिसमें परंपरागत ज्ञान विज्ञान के शोधों को भी शामिल किया गया था। दरअसल अमेरिका द्वारा किए गए कुछ पेटेंटो से आहत होकर माशेलकर जी ने इस दिशा में प्रयास किया था , पर आगे उसपर कोई कार्रवाई होते नहीं देखा। मुझे एक बात याद भी है , जर्नल में भी प्रकाशित किया गया है। उसमें जबलपुर के रानी दुर्गावती विश्‍वविद्यालय के एम जी महिला महाविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग से अंकिता बोहरे का शोधपत्र भी शामिल किया गया था। उन्‍होने अपने शोधपत्र में लिखा था कि आज के आधुनिक विज्ञान के युग में प्राचीन विचारकों तथा वैज्ञानिकों के द्वारा दिए गए तथ्‍यों व विचारों को सत्‍यापित कर स्‍थापित करने की रेणी में मानव प्रजनन कार्यकि में स्‍त्री और पुरूष के परस्‍पर समान भागिदारिता सिद्ध करने का एक प्रयास किया गया था। लिंग निर्धारण के लिए मात्र पुरूष ही नहीं , महिला भी उतनी ही उत्‍तरदायी है , इस बात का सत्‍यापन आयुर्वेद में वर्णित एक उक्ति दक्षिण: कुक्षौ पुत्रम् जीजनत् वाम कुक्षौ पुत्रीम् जीजनत्, के आधार पर किया गया। इस उक्ति का अर्थ है कि दायीं ओर से निक्षेपित अंड से पुत्र तथा बायीं ओर के अंड से पुत्री का निर्माण होता है।

इस उक्ति के सत्‍यापन के लिए यू जी सी के अंतर्गत एक रिसर्च प्रोजेक्‍ट शासकीय मेडिकल कॉलेज में संपन्‍न किया गया, जिसमें 84 प्रतिशत सफलता मिली। इस शोध कार्य में गाइनोकोलोजिस्‍ट तथा रेडियोलोजिस्‍ट की टीम ने मिलकर कार्य किया तथा सभी महिलाओं का सोनोग्राफिक परीक्षण किया गया। इस प्रोजेक्‍ट की सफलता से यह सत्‍यापित हुआ कि महिला की दायें अंडाशय से उत्‍पन्‍न होनेवाला अंड काफी सीमा तक पुरूष लिंग निर्मित करने के लिए सूचनाबद्ध होते हैं। इस धारणा को जैव रसायनिक आधार देने की भी कोशिश की जा रही थी। यह सत्‍यापन मानव प्रजनन की तथा आनुवंशिकी में नए सोपान निर्घारित कर सकता था। इस सफलता के बाद इस दिशा में अधिक रिसर्च होने हेतु सरकार की ओर से क्‍या प्रयास हुआ , नहीं कह सकती , पर इतना तो अवश्‍य है कि परंपरागत तकनीकों के विकास में सरकार का व्‍यवहार सौतेला है। जहां तक महत्‍व की बात है हर युग में हर पद्धति का महत्‍व होता है ......
जहां काम आवै सूई , क्‍या करे तलवारि !!

एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!


कल मैने एक लोकोक्ति पोस्‍ट की थी और पाठकों से उसका अर्थ पूछा था ..



आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त।



एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!

बहुत सारे रोचक जबाब आए ... पाठकों का बहुत आभार ... आप भी देखिए उनके जबाब ......


Divya said...


हुत अच्छी लोकोक्ति । अर्थ जानने के लिए दुबारा आउंगी.

Blogger रविकांत पाण्डेय said...
अर्थ कठिन नहीं है। पाहुन के आते ही यदि आदर न दिया गया और जाते वक्त हाथ न जोड़ा गया तो रिश्ता ज्यादा दिनों तक नहीं निभता। उसमें ख्टास आने लगती है। दूसरी ओर यदि आर्द्रा नक्ष्त्र के आते ही बारिश न हुई और हस्त नक्षत्र के जाते-जाते बारिश न हुई तो कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जो गृहस्थ के लिये दुखद है। प्रकारांतर से ये लोकोक्ति ऐसे भी सुनने में आती है
आवत आदर ना दिये जात न दिये हस्त
ये दोनों पछतात हैं पाहुन और गृहस्थ
Blogger Coral said...
संगीता जी मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी लिए धन्यवाद...
इस लोकोक्ति का अर्थ तो मै जानती नहीं हू जानेकी इच्छा है
Blogger डा० अमर कुमार said...
comments must be approved by the blog author
फिर भी..
इसका भावार्थ यह होगा ।
माघ की आर्द्रा और इस समय की हथिया ( हस्तिका ) सबके लिये बराबर है, चाहे मेहमान हों या गृहस्थ सभी अपनी जगह ठप्प पड़ जाते हैं ।
Blogger ajit gupta said...
संगीताजी, कहावत पहली बार सुनी है लेकिन फिर भी भावार्थ करने का प्रयास कर रही हूँ।
आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त।
एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!
अतिथि के आने पर जो आदर नहीं देता और उसके जाने पर जो हाथ नहीं जोड़ता उससे मेहमान और घर वाले दोनों ही चले जाते हैं।
Blogger सुज्ञ said...
आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त।
एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!
इस लोकोक्ति का अर्थ है,आने वाले अतिथि का आते जो आदर न करे,व जाता हुआ अतिथि हाथ जोड धन्यवाद न करे तो पाहुन(मह्मान)और गृहस्‍थ (मेज़बान)दोनो का जीवन व्यर्थ है।
Blogger Himanshu Mohan said...
आते हुए आर्द्रा में वर्षा न हो, और जाते हुए हस्त में तो अकाल से गृहस्थों को संकट होगा।
अभिधार्थ है कि यदि आते समय पानी को न पूछे और विदा के समय हाथ जोड़कर सम्मान से न विदा करे - तो अतिथि का घोर तिरस्कार है।
आपकी व्याख्या की प्रतीक्षा रहेगी, मैंने यह कहावत पहले सुनी नहीं है।
Blogger अन्तर सोहिल said...
पहली बार सुनी है जी
आप ही बतायें
प्रणाम
Blogger Himanshu Mohan said...
दोबारा सोचता हूँ तो लगता है कि कुछ सम्बन्ध आर्द्रा में यव या जौ (अर्थात इस फसल की) बुआई से हो शायद, और हस्त में जाँत (चक्की, या थोड़ा अर्थ को दूर तक ले जाएँ तो शायद खेती की निराई) से अर्थ सम्बन्धित हो सकता है। मगर लगता नहीं ऐसा, क्योंकि आर्द्रा-प्रवेश की सैद्धान्तिक महत्ता सिद्ध है - अत: वही अर्थ ग्राह्य लगता है।
Blogger vinay said...
अर्थ मुझे भी नहीं पता,अगर मालुम चले मुझे भी बताइगा ।
Blogger Aadarsh Rathore said...
अजीत गुप्ता जी ने एकदम सही सरलार्थ किया है..
भावार्थ है- जीवन में विनम्र रहो
पाहुने का अर्थ- मेहमान
जय हो
Blogger सुज्ञ said...
संगीता जी,
आत न आर्द्रा जो करे,
आते अतिथि का जो आदर न करे
लगते आर्द्रा(नक्षत्र)में जो बोवनी न करे

जात न जोडे हस्‍त।
जाते अतिथि को हाथ जोड बिदाई न करे
जाते हस्त(नक्षत्र)में उपज जोड न ले

एतै में दोनो गए,
ऐसे में दोनो के कार्य निष्फ़ल है

पाहुन और गृहस्‍थ !!
पाहुन अर्थार्त महमान,व गृहस्‍थ अर्थार्त मेज़बान
पाहुन अर्थार्त बरसात,व गृहस्‍थ अर्थार्त किसा
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...
लोकोक्ति और अर्थ दोनों ही मिल गए....
Blogger Science Bloggers Association said...
गागर में सागर जैसी है यह लोकाक्ति।
................
Blogger महफूज़ अली said...
मैं तो हिंदी में ख़ुद ही बहुत बड़ा नालायक हूँ.... ही ही ही ही....
Blogger शंकर फुलारा said...
लोकोक्ति को जानकर और टिप्पणियों के अध्ययन के बाद तो ज्ञान चक्षु खुल गए | ऐसा ज्ञान और काव्य क्षमता केवल भारत में ही संभव है | लोकोक्ति के लिए धन्यवाद।
Blogger हास्यफुहार said...
मुझे नहीं पता।
शायद देसिल बयना वाले करण जी जवब दें।
करण समस्तीपुरी said...
यह लोकोक्ति 'घाघ-भड्डरी' की लोक-कथाओं से आकलित है. अल्प वय में अनाथ हो चुके 'घाघ' की छोटी-छोटी बातें बड़ा महत्व रखने लगी. लोग उन्हें भविष्य वक्ता समझने लगे किन्तु सच तो यह था कि उन्हें 'मौसम विज्ञान' की बहुत गहरी समझ थी. उनका मौसम पूर्वानुमान प्रायः सच होता था. मौसम के उपयोगी जानकारी को इन्होने लोक-मानस से जोड़ कर अनेक कहावते गढ़ी. जैसे १. शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय। तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।। २. सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय। महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।। इसके अतिरिक्त उन्होंने लोक-मान्यताओं पर आधारित अनेक उक्तियाँ दी. जैसे दिशा-शूल के सम्बन्ध में उनका एक पद्य बड़ा प्रचलित है।
शनि-सोम पूर्व नहि चालु !
मंगल बुध उत्तर दिशी कालू !!

इसी तरह दिशा-शूल निवारण के लिए भी उनका एक पद्य-सूत्र इस प्रकार है,
रवि ताम्बूल, सोम को दर्पण !
भौमवार गुड़-धनिया चरबन !!
बुध को राई, गुरु मिठाई !
शुक्र कहे मोहे दधी सुहाई !!
शनि वे-विरंगी फांके,
इन्द्रहु जीती पुत्र घर आबे !

प्रस्तुत लोकोक्ति "आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त। एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!" भी घाघ की एक प्रसिद्द लोकोक्ति है. इसके बारे में मैं ने जितनी पढी और सुनी है उसके मुताबिक़ श्री राविकांत पाण्डेय जी के विवरण से अक्षरशः सहमत हूँ ! आते हुए आदर (आर्द्र नक्षत्र पानी) नहीं और जाते हुए हस्त (हस्ती या हथिया नक्षत्र नहीं बरसा) बोले तो हाथ में कुछ विदाई नहीं दिया तो इसमें गृहस्थ यानी कि किसान और पाहून दोनों गए काम से !!!
शिवम् मिश्रा said...
एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं
rashmi ravija said..
जानबूझकर इस पोस्ट पर देर से आई ताकि अर्थ पता चले...और कितना कुछ पता चला..
सच...ब्लॉग्गिंग का यही फायदा है...इतना विस्तारपूर्वक कोई नहीं बता सकता था.
एक नई लोकोक्ति और उसके अर्थ दोनों पता चले.

एक लोकोक्ति का अर्थ स्‍पष्‍ट करें .....

गांव में बोली जाने वाली एक लोकोक्ति की याद आ गयी , पाठकों से निवेदन है कि इसका अर्थ स्‍पष्‍ट करें .....

आत न आर्द्रा जो करे , जात न जोडे हस्‍त।
एतै में दोनो गए , पाहुन और गृहस्‍थ !!

18 जुलाई से 4 अगस्‍त तक बहुत अच्‍छी बारिश नहीं हो पाएगी !!

जब से मैने चिट्ठा लिखना शुरू किया है , 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की दृष्टि से ग्रहों के आधार पर जो आनेवाला मौसम होना चाहिए , उसके बारे में मैं अक्‍सर आलेख लिखा करती हूं। वैसे नियमित तौर पर पढनेवाले पाठक ही समझते होंगे कि मेरा आकलन कितना सही रहता है। 29 मार्च को पोस्‍ट किए गए अपने आलेख में ही मैने लिखा था कि 24 जून के तुरंत बाद शुभ ग्रहों का प्रभाव आरंभ होगा , जिसके कारण बादल बनने और बारिश होने की शुरूआत हो सकती है , यदि नहीं तो कम से कम मौसम खुशनुमा बना रह सकता है। हमारी गणना के अनुरूप ही 24 जून के बाद ही आसमान में बादल दिखाई देने लगें तथा यत्र तत्र बारिश के छींटे पडने लगे। जुलाई के पहले और दूसरे सप्‍ताह में पूरे भारतवर्ष में थोडी बहुत बारिश होती ही रही। 

वैसे तो उस आलेख में मैने यह भी लिख दिया था कि इस वर्ष यानि 2010 में मौसम की सबसे अधिक बारिश 4 अगस्‍त के आसपास से शुरू होकर 19 सितम्‍बर के आसपास तक होगी। यह समय पूर्ण तौर पर खेती का है , इसलिए इस वर्ष किसानों को अवश्‍य राहत मिलनी चाहिए। लेकिन इतना स्‍पष्‍ट न कर सकी थी कि 4 अगस्‍त से पहले के पंद्रह बीस दिन बहुत अच्‍छी बारिश के नहीं होंगे। आप पाठकों को यह जानकर थोडा कष्‍ट पहुंचेगा कि 18 जुलाई के पहले के मौसम की तुलना में 18 जुलाई के बाद का मौसम कुछ कष्‍टकर दिख रहा है। 30 जुलाई को आसमान में बनने वाले अशुभ ग्रहों की खास स्थिति और उनकी गत्‍यात्‍मक शक्ति के कारण इस योग के 12 दिन पूर्व और पश्‍चात् मौसम गर्म हो सकता है। इसलिए 18 जुलाई से 12 अगस्‍त के आसपास तक बादल छितराए होंगे और बहुत अच्‍छी बारिश नहीं हो पाएगी। 

लेकिन चूंकि भारतवर्ष के लिए यह मौसम पूर्ण तौर पर बारिश का है , इसलिए 17 , 18 , 23 , 24 , 25 , 31 जुलाई और 1 या 2 अगस्‍त को खासग्रहयोग के कारण यत्र तत्र बारिश होती रहेगी और उसके कारण अन्‍य स्‍थानों का भी वातावरण सुखद दिखाई पडेगा , पर कुल मिलाकर बारिश इतनी भी नहीं होगी , जो कृषि या अन्‍य जरूरतों के लिए जल की पूर्ति कर सके। खासकर जहां फसलों की रोपाई जुलाई में ही होती है , वहां अधिक मुसीबत आएगी। भला का बरखा जब कृषि सुखाने ??

पर खुशी की खबर ये है कि 6 और 7 अगस्‍त को आसमान में शुभ ग्रहों की स्थिति बन रही है , जिसके कारण 4 अगस्‍त के बाद बारिश की प्रचुरता होनी चाहिए , जिससे अगस्‍त में रोपाई होने वाले स्‍थानों पर किसानों को राहत मिल सकेगी। यह ग्रहयोग अशुभ ग्रहों के योग के प्रभाव को कुछ कम कर सकता है। जैसा कि मैने पहले भी अपने आलेखों में लिखा है , 4 अगस्‍त से लेकर 19 सितंबर तक प्रचुर मात्रा में बारिश होगी , पर प्राकृतिक असंतुलन के मध्‍य इस बारिश का हर स्‍थान पर बंटवारा सही होगा , इसपर कुछ संदेह तो रह ही जाता है। लेकिन इस मध्‍य अधिकांश स्‍थानों पर बारिश की कमी नहीं होनी चाहिए। इस तरह खेतों में पानी के लिए अभी किसानों को कुछ और इंतजार करना पड सकता है। 

दृढसंकल्‍प के आगे भूत भी हार मान जाता है !!

दुनिया में भूत प्रेत के किस्‍सों की कमी नहीं , पहले चारो ओर जंगल थे , शाम होते ही अंधेरा फैल जाता था , सन्‍नाटे को चीरती कोई भी आवाज भयावहता उत्‍पन्‍न करती थी , वैसे में भय का बनना स्‍वाभाविक था। पर जैसे जैसे जंगल कटकर गांव बनते गए , भय समाप्‍त होता गया , इससे माना जाने लगा कि घर में होनेवाले पूजा पाठ और यज्ञ हवन के कारण भूत प्रेत भी जगह छोडकर पीछे होते गए। पर अभी तक की घटना में इतना तो अवश्‍य पाया है कि किसी के घर द्वार आंगन खलिहान में भूतों वाली कोई घटना घटी हो , तो उसमें भय का ही समावेश देखा गया है। इन सबसे दूर जंगल में या श्‍मशान में भूतों ने अपने होने का कभी दावा नहीं किया , कभी आमने सामने नहीं आए । वरना इतनी सडकें बनी , इतने रेलवे की पटरियां बिछी , कभी भी बडे स्‍तर पर बाधा नहीं उपस्थित किया , जबकि वहां न तो पूजा पाठ होता है और न ही यज्ञ हवन।

मेरे दादाजी के जीवन की एक घटना का उल्‍लेख करना चाहूंगी , बात सन् 1944 की होगी , तबतक उनके परिवार में दादीजी के अलावे चार पुत्र और एक पुत्री थी। उस समय वे अपने पिताजी के एक पुराने मकान में थे , जिसके आंगन में और कमरा बनाने की जगह नहीं थी। उन्‍होने दूसरी जगह एक मकान बनाने का मन बनाया , थोडे शौकीन मिजाज होने के कारण उन्‍हें बडे अहाते की जरूरत थी और उसमें मकान भी बनाना था , जिसके लिए उन्‍हें अधिक पैसों की आवश्‍यकता थी , जो तब उनके पास नहीं थे। तब उन्‍होने सस्‍ते में गांव के किनारे की उस जमीन को खरीदने का मन बनाया जो भूतों के डेरा के रूप में प्रसिद्ध था और उस खेत में रोपा और कटनी के लिए भी मजदूर दिन रहते ही भाग जाया करते थे।

जमीन के मालिक ने खुशी खुशी रजिस्‍ट्री कर दी , दादाजी ने एक कुंआ बनवाया , उसी से निकली मिट्टी से मजबूत दीवाल बनवाया । हमारे यहां कच्‍चे मकान में पहले छत को बनाने के लिए लकडी और मिट्टी का उपयोग किया जाता है और दोमंजिले पर बांस और खपडे का, जिससे वातानुकूलित घर बनकर तैयार हो जाता है। बिल्‍कुल सामन्‍य ढंग से बने दो बेडरूम , एक बैठक , एक बरामदे , चार गौशाले और एक रसोई वाले इस घर को आज भी ज्‍यों का त्‍यों देखा जा सकता है। इसमें हर वर्ष बरसात से पूर्व टूटे खपडों को हटाकर फिर से नये खपडे लगाने पडते हैं। इसी प्रकार बरसात के बाद थोडी लिपाई पुताई करवानी पडती है ।

घर बनने के बाद बडे धूमधाम से गृहप्रवेश किया गया , पूजा पाठ , हवन , प्रसाद वितरण पूरे गांव को खिलाने पिलाने के बाद पूरा परिवार वहां शिफ्ट कर गया। गांव के बिल्‍कुल एकांत में बने उस मकान में रात के वक्‍त सीधा श्‍मशान ही दिखाई देता था , दादाजी अक्‍सर काम के सिलसिले में बाहर होते , पर शायद दादीजी भी दिल की मजबूत थी , कुछ दिनो तक कोई बात नहीं हुई । कुछ दिन बाद दादीजी पुन: गर्भवती हुईं , गर्भ के छह महीने तक तो कोई दिक्‍कत नहीं , उसके बाद दादीजी की तबियत अचानक खराब हो गयी। बच्‍चे ने हरकत करना बंद कर दिया था , गांव में महिला चिकित्‍सक भी नहीं थी , दादीजी को सीधा हजारीबाग ले जाया गया। वहां हालत हद से अधिक खराब हो गयी , दादीजी को शवगृह के निकट हॉल में रखा गया था , यह सोंचकर कि अब वो मरने ही वाली हैं। नर्स यदा कदा आकर दवाइयां पिला देती थी , पर उसी देखरेख में दादी जी को होश आ गया और कुछ दिनों में वे सामान्‍य होकर घर वापस आयी। ऐसा किस्‍सा एक बार नहीं , छह वर्षों के दौरान तीन तीन बार हुआ।

पूरे गांव को शक था कि भूत ही उन्‍हें परेशान कर रहा है , उनके माता पिता तो तब थे नहीं , भाई और भाभी दादाजी को अपने घर में वापस लौटने को कहते , पर दादाजी इसके लिए तैयार नहीं थे , उनका मानना था कि यदि भूत है तो वह बहुत कमजोर है। सिर्फ गर्भ के कमजोर बच्‍चों को ही नुकसान पहुंचा सकता है , देखता हूं , कबतक वह हमारा पीछा करता है। अगली बार दादीजी फिर गर्भवती हुईं , सबलोग उन्‍हें अपने अपने घर में बुलाते रहें , पर दादीजी का कहना था कि आज वे किसी के घर में रह सकती हैं , पर कल को बेटी बहू आएंगी और वे गर्भवती होंगी , तो उन्‍हें लेकर कहां कहां भटका जाएगा , अच्‍छा है , मेरा ही पीछा करे , कितने दिनों तक करता है ?

पर अगली बार कुछ भी नहीं हुआ , अंतिम क्षणों तक सबकुछ ठीक रहा और दादीजी ने एक स्‍वस्‍थ पुत्र को जन्‍म दिया। उसके बाद सभी बच्‍चों के हर प्रकार के विकास , उनकी पढाई लिखाई , सबके कैरियर , दादाजी को व्‍यवसाय में बडी सफलताएं , नौकर चाकर  , कई घर मकान और गाडी तक हर प्रकार की सफलता उसी घर में मिली। फिर पांचों बेटों की पांच बहूएं आयी , सबके चार पांच बच्‍चे हुए , पूरे आंगन का माहौल हर समय उत्‍सवी बना रहा। कभी भी कोई अनहोनी होते नहीं देखी गयी। इसलिए मेरे परिवार में कोई भी नहीं मानते कि भूत होते हैं , उनमें अपरिमित शक्ति होती है और वे अनिष्‍ट करते हैं। यदि सचमुच ऐसा मान भी लें तो यह कहा जा सकता है कि दृढ इच्‍छाशक्ति के आगे भूतों को भी हारना पडता है।

भाग्‍यशालियों को बधाई

मेरे पिछले आलेख के अंतिम वाक्‍य "वैसे जो भी हो , जिन भविष्‍यवाणियों को करने के लिए हमें गणनाओं का ओर छोर भी न मिल रहा हो , उसे आसानी से बता देने के लिए ऑक्‍टोपस और उनके मालिक को बधाई तो दी ही जा सकती है" पर हमारे कुछ मित्रों को गंभीर आपत्ति हुई है । उनका कहना है कि जब ऑक्‍टोपस द्वारा की गयी भविष्‍यवाणी मात्र तुक्‍का है तो उसे बधाई देने का क्‍या तुक है। हमारे वो मित्र नहीं जानतें कि बधाई हमेशा भाग्‍यशालियों को ही दी जाती है , अभागों को नहीं। समाज में सफल लोगों का गुणगान किया जाता है , मेहनतकशों का नहीं।

सारे प्रतिभाशाली विद्यार्थी नियमित तौर पर पढाई कर रहे हैं , सबके एक से बढकर एक परीक्षा परिणाम , युवा होते ही प्रतियोगिता की बारी आती है , कोई दो चार प्रश्‍नों के तुक्‍का सवालों का जबाब देकर आता है , उसके अधिक तुक्‍के सही हो जाते हैं , प्रतियोगिता में टॉप पर आने से उसे कोई नहीं रोक पाता। उसे बधाई देने वालों का तांता लग जाता है , पर उस मेहनती बच्‍चे को लोग कहां याद रख पाते हैं , ऐन परीक्षा के वक्‍त जिसकी तबियत खराब हो जाती है , जिसकी गाडी खराब हो जाती है या फिर बहुत सोंचसमझकर भी दो विकल्‍पों में से एक को चुनता है और वो भी गलत हो जाने से उसके प्राप्‍तांक का भी नुकसान हो जाता है और एक नंबर से वह प्रतियोगिता में चुने जाने से चूक जाता है।

सारे माता पिता अपने बच्‍चों के विवाह के लिए परेशान हैं , कुछ का संयोग काम करता है , उन्‍हें उपयुक्‍त पात्र मिल जाते हैं , वे वैवाहिक बंधन में बंध जाते हैं , उन्‍हें और उनके माता पिता को बधाई देनेवालों का तांता लग जाता है। पर कुछ बच्‍चों को , उनके माता पिता का दुर्योग उनसे बहुत दिनों तकं इतजार ही करवाता है , वे इतने वर्षों तक दौड धूप करते रह जाते हैं , कहीं उपयुक्‍त पात्र नजर नहीं आता , अब भला उन्‍हें किस बात की बधाई दी जाए।

जितने दंपत्ति विवाह बंधन में बंधते हैं , सबके घरों में बच्‍चों की किलकारियां गूंजने लगती है , उनके घर पर बधाइयों की झडी लगने लगती हैं , पर उन दंपत्तियों की मेहनत का कोई मूल्‍य नहीं , जो प्रतिदिन चेकअप के लिए डॉक्‍टर के पास जा रहे हैं , कडवी दवाइयां खा रहे हैं और शारिरीक रूप से कई कष्‍टों को झेलने के लिए बाध्‍य हैं या फिर उन दंपत्तियों के कष्‍टों का , जिनके बच्‍चे शारीरिक या मानसिक तौर पर  बीमार हैं।

आपने कभी जमीन या मकान के बारे में सोचा भी नहीं और अचानक आपको ऐसे मकान के बारे में पता चल जाता है , जिसका मालिक किसी विपत्ति में पडने के कारण उसे जल्‍द से जल्‍द बेचने को बाध्‍य है। आपके पास पैसे नहीं होते , पर कुछ मित्र या रिश्‍तेदार आपका साथ देने को तैयार होते हैं।  पैसों का प्रबंध हो जाता है और जमीन या मकान की रजिस्‍ट्री हो जाती है , आपको चारो ओर से बधाइयां मिलने लगती हैं , जबकि मकान या जमीन खरीदने को इच्‍छुक कितने ही व्‍यक्ति के पैसे बैंक में वर्षों तक पडे रह जाते हैं , उनको सही दर में भी मनमुताबिक जमीन नहीं मिल पाती , इसलिए वे बधाई के हकदार नहीं।

विश्‍वकप के बारे में ऑक्‍टोपस

मैने जब से ब्‍लॉग लिखना शुरू किया है , हर चर्चित मुद्दे पर , चाहे वो मौसम हो या राजनीति , खेल हो या कोई बीमारी , कुछ न कुछ भविष्‍यवाणियां करती आ रही हूं । आकलन में कितनी सत्‍यता होती है , वो तो हमारे पाठक ही बता सकते हैं , पर मैं तुक्‍का नहीं लगाती , एक निश्चित आधार होने पर ही भविष्‍यवाणियां करती हूं। यदि ऐसा नहीं होता तो विश्‍वकप फुटबॉल के बारे में मैं भविष्‍यवाणियां कर चुकी होती। अनिश्चितता के माहौल में इस प्रकार के आकलन का कुछ तो महत्‍व है ही ,  शायद यही कारण हो कि कल के पोस्‍ट पर शिक्षामित्र ने टिप्‍पणी कर पूछा कि क्या आप विश्वकप फुटबाल के बारे में कोई भविष्यवाणी करना चाहेंगी?

पहले भी कुछ पाठकों के मेल आने पर मैने विश्‍वकप फुटबॉल के बारे में जानकारी के लिए गणना करनी शुरू की थी। पर उस गणना से कुछ साफ तस्‍वीर नजर नहीं आ सकी और इसलिए मैने इसके बारे में कुछ भी नहीं लिखा। लेकिन मेरी या अन्‍य ज्‍योतिषियों की कमी ऑक्‍टोपस ने कर दी और अपनी सटीक हो रही भविष्‍यवाणियों के कारण वह दुनियाभर का हीरो बना हुआ है। जहां ज्‍योतिष के इतने सारे तथ्‍यों को ध्‍यान में रखते हुए एक एक भविष्‍यवाणियां करने में इतनी मुश्किलें आती है , खेलते कूदते ऑक्‍टोपस बाबा एक डब्‍बे पर बैठकर आसानी से भविष्‍यवाणी कर रहे हैं। 

इस घटना को सुनने के बाद मेरा ध्‍यान बहुत पुरानी कुछ घटनाओं पर गया, जहां किसी दुविधा की स्थिति में हाथ की दो उंगलियों में दो परिणामों को रखते हुए उन्‍हें आगे कर किसी बच्‍चे को उनमें से एक पकडने को कहा जाता था। मान्‍यता है कि बच्‍चे दिल के सच्‍चे होते हैं , इस कारण वे जो भी उंगली पकडेंगे , आनेवाला निर्णय वास्‍तव में वैसा ही आएगा। यह संयोग ही है कि अधिकांश समय बच्‍चे के द्वारा पकडी गयी उंगली वाला परिणाम ही देखने को मिलता था। जिस बच्‍चे के द्वारा पकडी गयी उंगली का अनुमान अधिक सही होगा , परिवार य समाज में उसे भाग्‍यशाली माना जाएगा ही। आखिर ईश्‍वर की विशेष कृपा होने से ही तो वह सही उंगली को पकड पाता था।

एक बार मेरे छोटे बेटे की तबियत बहुत गडबड थी , अस्‍पताल में मेरे बेटे का इलाज चल रहा था और मैं मायके में थी। मेरा भतीजा तब बहुत छोटा था , लेकिन उसकी मम्‍मी ने कहा कि उसकी ओर दो उंगलियां बढाएं , वह बिल्‍कुल सही उंगली पकडेगा। मैं इन सब बातों को नहीं मानती हूं , ग्रहों के हिसाब से मैने जो गणना की थी , उसके हिसाब से 18 तारीख तक का डेट सेंसिटीव था , कोई बुरी खबर भी मिल सकती थी , पर यदि जांच पडताल के क्रम में ही वो डेट टल जाए , तो स्थिति बिगडने वाली नहीं होगी। पर 19 तारीख में दस दिन की देर थी , इसलिए सबका मन घबडाया हुआ था। बच्‍चे की मम्‍मी ने ही अपने हाथ की दोनो उंगलियां उसकी ओर बढाया , जिसमें से उसने एक को पकडा। उसने बहुत खुश होते हुए मुझे बताया कि बेटा दवा से ही ठीक हो जाएगा , ऑपरेशन की आवश्‍यकता नहीं पडेगी। दस दिनों तक चेकअप चलता रहा और कई डॉक्‍टरों ने संयुक्‍त रूप से मिलकर फैसला किया कि ऑपरेशन की आवश्‍यकता नहीं है , दवा से ही ठीक हो जाएगा। आप सबों को जानकर ताज्‍जुब होगा कि यह परिणाम 19 तारीख को आया।

दो ऑप्‍शनों में से एक को चुनने के बाद उसका सही होने का सबसे बडा कारण लोगों का विश्‍वास होता है। प्रकृति के नियमों को समझना सरल नहीं , पर किसी बात पर आप पूरा विश्‍वास रखो , तो उस घटना के सही होने के चांसेज बढ जाते हैं। यही कारण है कि किसी के जीवन में एक बार सफलता की शुरूआत होती है , तो आत्‍मविश्‍वास बढता है और उसके साथ ही साथ सफलताओं का इतिहास बनता जाता है। इसके विपरीत यदि किसी के जीवन में असफलता की शुरूआत होती है , तो आत्‍मविश्‍वास घटता है और वह कई असफलताओं को जन्‍म देता है। आत्‍मविश्‍वास के कारण ही कभी कभी मनुष्‍य में एक छठी इंद्रिय भी काम करती है और आनेवाली घटनाओं को वह पहले से देखने लगता है।

मेरे ख्‍याल से ऑक्‍टोपस के द्वारा इस प्रकार की भविष्‍यवाणियों के सटीक होने में एक ओर उसके और उसके मालिकों के भाग्‍य का खेल है , तो दूसरी ओर लोगों का विश्‍वास भी काम कर रहा है।लेकिन इस प्रकार संकेत में प्राप्‍त की गयी भविष्‍यवाणियों का कोई आधार नहीं होता , भाग्‍य के साथ देने से कभी लगातार भी कई भविष्‍यवाणियां सही हो सकती है , जबकि भाग्‍य न साथ दे तो एक भी सही न हो। वास्‍तव में इस प्रकार की भविष्‍यवाणियां एक प्रकार का तुक्‍का है , इसलिए इसके बारे में दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता। अल्‍पावधि भविष्‍यवाणियों के मामलों में इस प्रकार की घटना कितनी भी लोकलुभावन क्‍यूं न हों , पर दीर्घावधि भविष्‍यवाणियों के लिए इनका कोई महत्‍व नहीं , क्‍यूंकि किसी का भाग्‍य हर वक्‍त तो साथ नहीं दे सकता। वैसे जो भी हो , जिन भविष्‍यवाणियों को करने के लिए हमें गणनाओं का ओर छोर भी न मिल रहा हो , उसे आसानी से बता देने के लिए ऑक्‍टोपस और उनके मालिक को बधाई तो दी ही जा सकती है।

मान गए मम्‍मी की एस्‍ट्रोलोजी को !!

बात मेरे बेटे के बचपन की है , हमने कभी इस बात पर ध्‍यान नहीं दिया था कि अक्‍सर भविष्‍य की घटनाओं के बारे में लोगों और मेरी बातचीत को वह गौर से सुना करता है। उसे समझ में नहीं आता कि मैं होनेवाली घटनाओं की चर्चा किस प्रकार करती हूं। लोगों से सुना करता कि मम्‍मी ने 'एस्‍ट्रोलोजी' पढा है , इसलिए उसे बाद में घटनेवाली घटनाओं का पता चल जाता है। यह सुनकर उसके बाल मस्तिष्‍क में क्‍या प्रतिक्रिया होती थी , वो तो वही जान सकता है , क्‍यूंकि उसने कभी भी इस बारे में हमसे कुछ नहीं कहा। पर एक दिन वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर सका , जब उसे अहसास हुआ कि मेरी मम्‍मी वास्‍तव में बाद में होने वाली घटनाओं को पहले देख पाती है। जबकि वो बात सामान्‍य से अनुमान के आधार पर कही गयी थी और उसका ज्‍योतिष से दूर दूर तक कोई लेना देना न था।

उसकी उम्र तब छह वर्ष की थी , हमें एक रिश्‍तेदार के यहां विवाह में सम्मिलित होना था। एक्‍सप्रेस ट्रेन का रिजर्वेशन था ,पर वहां तक जाने के लिए लगभग 10 किमी पैसेंजर ट्रेन पर चलना आवश्‍यक था। जुलाई की शुरूआत थी और चारो ओर शादी विवाह की धूम मची हुई थी। मुझे मालूम था कि पैसेंजर ट्रेन में काफी भीड होगी। इस कारण मैं सूटकेस और बैग अरेंज करने के क्रम में सामान कम रखना चाह रही थी , रखे हुए सामान को हटाकर मैं कहती कि लगन का समय है , इसलिए पैसेंजर ट्रेन में काफी भीड होगी। ज्‍योतिष की चर्चा के क्रम में लग्‍न , राशि , ग्रह वगैरह बेटे के कान में अक्‍सर जाते थे , इसलिए उसने समझा कि किसी ज्‍योतिषीय योग की वजह से ट्रेन में भीड होगी। फिर भी उसने कुछ नहीं कहा , और बडों को तो कभी समझ में नहीं आता कि बच्‍चे भी उनकी बात ध्‍यान से सुन रहे हैं।

स्‍टेशन पर गाडी आई तो भीड होनी ही थी , इतनी भीड में अपनी चुस्‍ती फुर्ती के कारण दोनो बच्‍चों और सामान सहित काफी मुश्किल से हम चढ तो गए , पर अंदर जाने की थोडी भी जगह नहीं थी। दोनो बच्‍चों और दो सामान को बडी मुश्किल से संभालते हुए हम दोनो पति पत्‍नी ने ट्रेन के दरवाजे पर खडे होकर 15 किमी का सफर तय किया। जब हमारा यह पहला अनुभव था , तो बेटे का तो पहला होगा ही। खैर दरवाजे पर होने से मंजिल आने पर उतरने में हमें काफी आसानी हुई , स्‍टेशन पर उतरकर जब एक्‍सप्रेस ट्रेन का इंतजार कर रहे थे , तो बेटे के मुंह से निकला पहला वाक्‍य था , 'मान गए मम्‍मी की एस्‍ट्रोलोजी को'  हमलोग तो समझ ही नहीं पाए कि बात क्‍या है , तब पूछने पर उसने बताया कि 'मम्‍मी ने कहा था , लगन का समय है , गाडी में भीड रहेगी।' बेटे के बचपन का यह भ्रम तब दूर हुआ , जब वह यह समझने लायक हुआ कि विवाह के समय को 'लगन का समय ' कहा जाता है और उस दिन मैने कोई भविष्‍यवाणी नहीं की थी। 

कल है ग्रहों का खास गत्‍यात्‍मक योग .. क्‍या पडेगा आपपर प्रभाव ??

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय दृष्टि से कल यानि 3 जुलाई का दिन खास है, क्‍यूंकि बृ‍हस्‍पति और चंद्र को केन्‍द्रगत करते हुए आसमान में बाकी ग्रहों की स्थिति के संयोग से एक खास प्रकार का योग तैयार हो रहा है। यह योग 3 जुलाई को 11 बजे से 12 बजे के लगभग मध्‍य रात्रि को उपस्थित होगा। इस योग के फलस्‍वरूप 24 घंटे पूर्व और 24 घंटे पश्‍चात तक का समय कुछ खास माना जा सकता है।  प्राचीन ढंग से गणना किए जानेवाले पंचांग पर विश्‍वास करें , तो लांगिच्‍यूड के हिसाब से इस योग का सर्वाधिक प्रभाव भारतवर्ष से ठीक पश्चिम में सटे  हुए देशों में होना चाहिए। भारत के पश्चिमी भागों में भी इसके प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता।

चूंकि बृहस्‍पति और चंद्र को केन्‍द्र में रखने से इस योग की उत्‍पत्ति हो रही है , इस कारण इस योग का प्रभाव विश्‍व के अधिकांश हिस्‍सों में सुखद ही रहना चाहिए , इस कारण भीषण गर्मी वाले क्षेत्रों में दो दिनों तक घने बादल बने रहने और यत्र तत्र बारिश होते रहने की संभावना है , इस प्रकार यहां मौसम सामान्‍य बना रहेगा। ठंड वाले क्षेत्रों में उतनी बारिश नहीं भी हो सकती है , पर बारिश के मौसम वाले जगहों पर अति बारिश हो सकती है। पृथ्‍वी के जिस क्षेत्र में यह योग अधिक प्रभावी होगा , वहां कुछ अनिष्‍ट की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता, खासकर बाढ , तूफान या भूकम्‍प की। लेकिन फिर भी बृहस्‍पति चंद्र जैसे शुभ ग्रहों के कारण विकरालता कुछ कम रहेगी।

वैसे तो इस ग्रहयोग का सर्वाधिक अच्‍छा प्रभाव 1934 , 1946 , 1958 , 1970 , 1982 ,1993 और 2005  के सितंबर माह तक जन्‍म लेने वाले पर पडेगा, जबकि 1932 , 1944 , 1956 , 1968 , 1980 ,1992 और 2004 में सितंबर तक जन्‍म लेनेवाले इसके बुरे प्रभाव में आ सकते हैं। इसी प्रकार तुला राशिवालों पर इस ग्रहयोग का अच्‍छा तथा सिंह राशिवालों पर इस ग्रहयोग का बुरा प्रभाव देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्‍त अक्‍तूबर और नवंबर माह में जन्‍म लेनेवालों पर कुछ अच्‍छा और अगस्‍त तथा सितंबर माह में जन्‍म लेने वालों पर कुछ बुरा प्रभाव पडेगा। बाकी लोगों के जीवन में इस ग्रह का प्रभाव प्रत्‍येक व्‍यक्ति के जीवन में बिल्‍कुल हल्‍के रूप में दिख सकता है। लग्‍न में विभिन्‍नता के कारण ग्रहों के प्रभाव के संदर्भो में अंतर पड सकता है , बृहस्‍पति जिन भावों का स्‍वामी होगा , इस योग के कारण उससे संबंधित संदर्भों की खुशी या कष्‍ट मिलनी चाहिए।

यहां भारतवर्ष में 3 जुलाई को सूर्योदय 5 बजकर 13 मिनट में होगा , जबकि सूर्यास्‍त 6 बजकर 30 मिनट पर। इलाहाबाद से पूर्व या पश्चिम होने से आपके शहर में सूर्योदय और सूर्यास्‍त के समय में थोडा अंतर हो सकता है। इस योग के फलाफल को समझने के लिए आप अपने शहर के सूर्योदय और सूर्यास्‍त के समय की जानकारी रखें। इस ग्रह का सर्वाधिक अच्‍छा प्रभाव सूर्यास्‍त से 6 घंटे पहले से साढे तीन घंटे पहले तक होगा , इसलिए यह  समय आपके लिए आनंददायक बना रहेगा, इस तरह के किसी न किसी कार्यक्रम से आप संयुक्‍त हो जाएंगे। जबकि सूर्यास्‍त से 4 घंटे बाद से 5 घंटे 32 मिनट बाद तक का समय इस योग के कारण बहुत ही महत्‍वपूर्ण बना रहेगा , इस कारण इस समय महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम में व्‍यस्‍तता बनी रह सकती है। इस ग्रहयोग का सर्वाधिक बुरा प्रभाव सूर्योदय के 3 घंटे 19 मिनट बाद से लेकर 5 घंटे 33 मिनट बाद तक बनने की आशंका है , इस कारण आप कुछ तनावपूर्ण वातावरण से गुजर सकते हैं।